<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846</id><updated>2012-02-01T00:41:59.215+05:30</updated><category term='लघुकथा'/><category term='आलेख - राजनीति'/><category term='ब्लागिंग'/><category term='पुराण कथा..'/><category term='स्त्री विमर्श'/><category term='सामाजिक समस्या'/><category term='Dharm'/><category term='धर्म आध्यात्म'/><category term='पौराणिक आख्यान'/><category term='Adhyatm'/><category term='नैतिक मूल्य'/><category term='आरक्षण'/><category term='कविता'/><category term='साहित्यिक पत्रिका  ...'/><category term='कथा'/><category term='अध्यात्म'/><category term='धार्मिक कर्मकांड'/><category term='गीत.बसंत ऋतु.'/><category 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हाँफते, बेहोश से हुए जा रहे हैं.कला कई कई सीढियाँ एक साथ फांदता हुआ नयी&amp;nbsp;ऊँचाइयाँ&amp;nbsp;जो पा रहा है..सत्य यह स्थापित और रूढ़ होता जा रहा कि कला का वास नग्नता में है, इसलिए होड़ मची है कि कला को कौन कितना उत्कर्ष दे सकता है और दर्शकों के मुंह से ऊह!! आह!! आउच!! संग ऊ-- ला-- ला!! कौन कितना निकलवा सकता है..&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;एक फिल्म बनी-"डर्टी पिक्चर" , यह कह कि त्रासदी देखो !!!..पर चकाचौंध में नेपथ्य में जा लुप्त हो गया सन्देश, कि इस मार्ग पर चल, धन भले मिल जाए पर अंततः हताशा निराशा एकाकीपन और असह्य मानसिक संताप के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता ..&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;महेश बाबू कहते हैं "मुझे पसंद हैं वो लोग जो जिन्दगी अपनी शर्तों पर जीते हैं" . यानि&amp;nbsp;कि अश्लीलता के कीर्तीमान स्थापित करते समय परिवार समाज, आत्मा परमात्मा पर थूकने में&amp;nbsp;जो जितना बड़ा वीर (निर्लज्ज)&amp;nbsp;, वही&amp;nbsp;महान .."बोल्ड एंड ब्यूटीफुल" वही जो जितना बड़ा निर्लज्ज और जो जितना बड़ा निर्लज्ज, वह धन, मान, प्रसिद्धि ,प्रतिष्ठा सबसे उतना ही सफल और बड़ा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनोरंजन को जबतक रेडियो उपलब्ध था,लोग दृश्यों की कल्पना करते और सोचते कि काश यह सब दृश्यगत भी होता..यह हुआ और दूरदर्शन ने एक ही मंच पर ज्ञान विज्ञान खेल कूद और समाचार से लेकर मनोरंजन तक सब कुछ उपलब्ध कराया. पर मनोरंजन का यह सिमित कोटा विस्तार पाए,लोग इसके लिए लालायित&amp;nbsp;थे..हमारी सरकार ने जनभावनाओं को समझा, पर उसे आदर देने हेतु&amp;nbsp;दूरदर्शन का विस्तार नहीं किया, अपितु अपने ह्रदय द्वार खोल दिए असंख्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए, कि आओ और मनोरंजन परोसो..इन कंपनियों की सहूलियत के लिए दूरदर्शन को इतना इतना उबाऊ बना दिया कि लोग इसे कूड़ा समझ इससे पूर्णतः किनारा कर लें. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और फिर अचानक ही हमारे देश की सुंदरियाँ विश्व स्तर पर सौन्दर्य प्रतियोगिताएं जीतने लगीं.देश का गौरव ,महान उपलब्धि ठहराया गया इसे.लोग गर्व से गदगद उभचुभ...आश्चर्य यह कि उन दो तीन वर्षों से पहले या&amp;nbsp;बाद&amp;nbsp;भारत में तथाकथित "ब्यूटी विथ ब्रेन" का पूर्ण अकाल पड़ गया..क्यों ?? प्रश्न -ग्लोबलाइजेशन, बाजारवाद का यह रहस्य सात पर्दों में कैद रह गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत बड़ा बाज़ार है हमारा देश, जहाँ सौन्दर्य तथा मनोरंजन क्षेत्र एक विस्तृत हरा भरा चारागाह है..लेकिन समस्या यह है कि आत्मोन्नति, सादा जीवन उच्च विचार,भौतिकता से दूरी आदि भारतीय संस्कार विचार बाज़ार का सबसे बड़ा शत्रु है..संस्कारहीन किये बिना व्यक्ति को विलासी, भौतिकवादी नहीं बनाया जा सकता...और जबतक व्यक्ति भौतिकवादी नहीं होगा पूरे बाज़ार को समेट अपने घर में बसा लेने के रोग से ग्रसित कैसे होगा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहलेसिनेमा से लेकर बुद्धू बक्से(टी वी)द्वारा महलनुमा घर, बहुमूल्य कपडे व साजो सामान की चकाचौंध में व्यक्ति की बुद्धि को चुंधिया उसे भोग के उन वस्तुओं&amp;nbsp;लिए लालायित करना और फिर लुभावने विज्ञापन द्वारा उपभोक्ता का प्रोडक्ट के प्रति ज्ञानवर्धन कर&amp;nbsp;उसे पा लेने को प्रतिबद्ध करना आठो याम अबाध जारी रहता है.दर्शक/उपभोक्ता इन सब से निर्लिप्त रहे भी तो कैसे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस विराट बाज़ार में अन्य समस्त भौतिक वस्तुओं के साथ स्त्री भी एक वस्तु है "पारस" सी अनमोल. एक ऐसी वस्तु, जिसे किसी भी वस्तु के साथ खड़ा कर दो, उस वस्तु को चमका दे, उसे मूल्यवान बना दे.. कार से सेविंग ब्लेड तक और दियासलाई से हवाई यात्रा तक, फ्रंट में सुंदरियों को चिपकाया नहीं कि ग्राहक हँसते हँसते अक्ल और जेब लुटा देता है ...और अब तो हसीनाएं दिखा, पुरुष ग्राहकों को पटाने की प्रथा अपार विस्तार पा, "हैंडसम" दिखा, महिला ग्राहकों को लुभाने का भी आ गया है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुन्दर सुगठित मोहक शरीर और अदाओं वाले युवक युवतियों की मार्केट में भारी डिमांड है..पहले जो यह विभेद था कि ए ग्रेड की हसीनाएं इतना ही उघड़ेंगी, बी ग्रेड वाली इससे अधिक और सी ग्रेड वाली इससे काफी आगे बढ़कर, बाज़ार यह फर्क मिटा देने पर आमदा है..उसे कोई सीमा नहीं चाहिए,सब असीम चाहिए... तो, इसमें स्पेशल ग्रेड(पोर्न स्टार) को उतरा गया..अब इस स्पेशल ग्रेड को इतना अधिक महिमामंडित किया जाएगा, इसपर धन प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा की ऐसी वर्षा की जायेगी, कि ए- बी- सी में होड़ मच जायेगी इस ग्रेड में शामिल होने के लिए.."बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा" विश्वास अपार सुदृढ़ता पा सिद्ध अकाट्य हो जायेगा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संचार के समस्त&amp;nbsp;दृश्य श्रव्य माध्यमो द्वारा व्यक्ति के मन में अहर्निश अश्लीलता, कुसंस्कार, भौतिकवादिता के प्रति प्रेम उतार मनुष्य को केवल और केवल एक उपभोक्ता बनाने का अभियान चल रहा है.. एक वह समाज जिसे पीढ़ियों से यह सिखा पोषित किया गया है कि भोग तुच्छ और अधोगामी है , उन मूल्यों से विलग कर विलासप्रिय भोगवादी बनाये बिना बाज़ार का प्रयोजन कैसे सिद्ध होगा..व्यक्ति जबतक यह न माने कि जीवन और शरीर इन्द्रिय भोग के लिए ही मिला है,भोग की और उन्मुख कैसे होगा..? और सांसारिक समस्त भोगों के साधनों को जुटाने का एकमात्र&amp;nbsp;साधन तो&amp;nbsp;"धन" ही है, तो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित कर, निकृष्ट प्रतिस्पर्धा(जिसमे कोई किसी का संगी नहीं,प्रतियोगी है जिसके हाथ से अवसर लूट अपने कब्जे में करना&amp;nbsp;ही सक्सेसफुल मैनेजर होने की शर्त है) में लगा ,उप्भोग्तावादी संस्कृति को मजबूती देता बाज़ार फलता फूलता जा रहा है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या विडंबना है, एक समय था जब शिक्षा&amp;nbsp;, समाजिक सरोकारों से पूर्णतः काट स्त्री को संपत्ति और केवल उपभोग की वस्तु बना छोड़ा गया था..पिता भाई पति या पुत्र के अधीन जीवन भर उसे हाड मांस के एक पुतले सा चलना पड़ता था..किसीके भी सही गलत का प्रतिवाद करना, उनके सम्मुख ऊंची आवाज में बात करना,बिना उनकी आज्ञा या परामर्श के निर्णय लेना, स्त्री की स्वेच्छाचारिता मानी जाती थी.परिवार के पुरुष सदस्यों से अधिक महिला सदस्य इसके लिए सजग रहती थी कि किसी भी भांति किसी भी स्त्री में स्वविवेक व स्वनिर्णय का विध्वंसक गुण न आ जाये.इसके लिए जो कुछ भी किया जा सकता था, किया गया. शिक्षा से दूर रख उनके व्यक्तित्व को इतना कुंठित किया गया कि दब्बूपना उनके स्वभाव में स्थायी रूप से स्थिर हो गया और सबसे मजे की बात कि इस दब्बूपना को शील, लज्जा,संस्कार,सच्चरित्रता कह पर्याप्त महिमामंडित किया गया. अज्ञान के अंध कूप में पड़ी स्त्रियों ने हथियार डाल दिए और स्वयं को असहाय निर्बल मानते हुए पिता भाई पति तक को ही नहीं पुत्र को भी अपना स्वामी मान लिया..कभी गर्वोन्नत हो यह माना कि वह अमूल्य संपत्ति है जिसकी रक्षा पुरुष सदस्यों(सबल) द्वारा होनी आवश्यक है, तो कभी मान लिया कि वह तो सचमुच एक उपयोग उपभोग की वस्तु मात्र है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर समय ने समाज को जब यह सिखाया कि उसका निर्बल पड़ा पूरा आधा भाग परिवार समाज के विकास में सहभागिता नहीं निभा पा रहा, तो जागृति फ़ैली और इस वर्ग सबल करने पर पूरा ध्यान दिया जाने लगा..और आज जब शारीरिक,मानसिक व बौद्धिक विकास का अवसर नारी पुरुष को सामान रूप प्राप्त है, स्त्रियों ने दिखा दिया है कि शारीरिक बल में भले वे पुरुषों से कभी कभार उन्नीस पड़ जाती हों पर मानसिक और बौद्धिक बल में वे सरलता से उन्हें पछाड़ सकती हैं..लेकिन यह अपार सामर्थ्य संपन्न नवजागृत समूह जिस प्रकार दिग्भ्रमित हो रहा है, असह्य दुखदायी है यह..इतने लम्बे संघर्ष के उपरांत प्राप्त अवसर को एक बार पुनः स्वयं को उत्पाद और वस्तु रूप में स्थापित कर स्त्री कैसे नष्ट&amp;nbsp;कर रही है.. इस पेंच को वह&amp;nbsp;नहीं समझ पा रही कि बोल्डनेस कह जिस नग्नता को महिमामंडित किया जा रहा है,वह पूरा उपक्रम उसे मनुष्य से पुनः उपभोग की एक सुन्दर वस्तु बना छोड़ने की&amp;nbsp;है.. व्यभिचार को आचार ठहरा उसका मानसिक विकास का आधार नहीं तैयार हो रहा बल्कि उसके शारीरिक शोषण का बाज़ार तैयार हो रहा है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आवश्यकता साक्षर भर होने की नहीं बल्कि सही मायने में शिक्षित होने की है, विवेक को जगाने और आत्मोत्थान की है.स्त्री स्वयं जबतक अपने आप को केवल शरीर.. और शरीर को, धनार्जन का साधन नहीं मानेगी&amp;nbsp;, मजाल नहीं कि कोई पुरुष उसे इसके लिए बाध्य कर सकेगा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;___________________ &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-2053287371577846058?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/2053287371577846058/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=2053287371577846058&amp;isPopup=true' title='27 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/2053287371577846058'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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trbidi="on"&gt;सांस सांस कर चुकती जाती, साँसों की यह पूंजी,&lt;br /&gt;जीवन क्यों,जगत है क्या, है अभी तलक अनबूझी..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी लगे यह विषम पहेली, अनुपम कभी सहेली,&lt;br /&gt;संगसाथ चलने का भ्रम दे, कर दे निपट अकेली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी लगे है क्या कुछ ऐसा, जो मैं न कर पाऊं,&lt;br /&gt;काल&amp;nbsp;तरेरे भौं जब भी तो&amp;nbsp;, दंभ पे अपनी लजाऊँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी लगे है बचा हुआ क्या, जो न अबतक देखा,&lt;br /&gt;तभी रचयिता विहंस के पूछे, क्या है अबतक देखा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कूड़ा कचड़ा ही तो समेटा, जन्म कर दिया जाया,&lt;br /&gt;महत ज्ञानसागर का अबतक, बूँद भी कहाँ पाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचा था पावन जीवन को, सार्थक कर है जाना,&lt;br /&gt;अर्थ ढूंढते समय चुका , वश है क्या गुजरा पाना. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाने किस पल न्योता आये, क्षण में उठ जाए डेरा,&lt;br /&gt;माया में भरमाया चित, किस विध समझे यह फेरा.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.............................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-7978880946725921322?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/7978880946725921322/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=7978880946725921322&amp;isPopup=true' title='35 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/7978880946725921322'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/7978880946725921322'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/12/blog-post_23.html' title='जीवन..'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>35</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-4891698636601892296</id><published>2011-12-07T15:44:00.003+05:30</published><updated>2011-12-09T00:54:07.260+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति..'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>हाथ का साथ ....</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अईसे काहे बघुआ के, अंखिया तरेर के देख रहा है बे, &lt;br /&gt;साला..नंगा..भुक्खर&amp;nbsp;...???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आ ...समझा !!! ... भूखा है ???&lt;br /&gt;त ई से हमको मतलब..???&lt;br /&gt;सब अपना अपना भाग का खाते हैं...&lt;br /&gt;हम भी अपना पुन्न का&amp;nbsp;स्टाक से खा और इतरा रहे हैं...&lt;br /&gt;तू भूखा.. नंगा... ई तोरा भाग...&lt;br /&gt;त&amp;nbsp;फिर&amp;nbsp;हमरा भरलका मलाईदार छप्पन भोग थरिया देख के ई जलन काहे.. ई आक्रोस काहे..आयं&amp;nbsp;&amp;nbsp;??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चल भाग इहाँ से..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं भागेगा..??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त,,, का कल्लेगा बोल..???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जल्ला कट्टा बोली मारेगा...???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हा हा हा हा...कैसे ??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तोरा जीभ&amp;nbsp;त है, हमरे&amp;nbsp;जेब में&amp;nbsp;...!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त,,, अब का ...???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओ....गोली मारेगा..???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन कैसे बे...???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथ है...???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबका हाथ काट के हम जमा कर लिए अपना खजाना में...&lt;br /&gt;अब हाथ, केवल औ केवल हमरे पास है...&lt;br /&gt;आ जिसके हाथ में हमरा दिया हाथ है, ओही किसीको भी बोली या&amp;nbsp;गोली, कुच्छो&amp;nbsp;मार सकता है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एहिलिये न कहते हैं, धड से आके धर लो ई हाथ...ससुर, राज करेगा राज ...!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" हमरा हाथ, हमरा हाथ धरने वाले हर जन- जनावर के साथ " &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.......................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-4891698636601892296?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/4891698636601892296/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=4891698636601892296&amp;isPopup=true' title='35 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/4891698636601892296'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/4891698636601892296'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='हाथ का साथ ....'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>35</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-5291442617109344476</id><published>2011-11-15T18:48:00.002+05:30</published><updated>2011-11-15T21:42:25.177+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंगकथा'/><title type='text'>न्यायप्रिय राजा ....</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div&gt;&lt;u&gt;&lt;/u&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक राजा थे, बड़े ही न्यायप्रिय..न्याय करना एक तरह से उनका शौक था,जूनून  था,जिन्दगी थी...जबतक दिन भर में सौ, डेढ़ सौ न्याय न कर लेते उन्हें चैन न  मिलता,खाना न पचता..कहते हैं, जस राजा तस प्रजा.. उनके  विश्वस्त स्वामिभक्त दरबारियों को भी न्याय प्रक्रिया में भाग लेने से प्रिय और कुछ भी न था..वे भी अपना  सब काम धाम किनारे कर राजा को न्याय करते देखते रहते और इस एकमात्र विषय की जुगाली  करते रहते .&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तो एक दिन ऐसे ही न्याय प्रक्रिया के बीच दो अपराधियों को लाया गया.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;राजा ने दोनों के अपराध पूछे. तो बताया गया कि "क" ने दस चूहे और पचास मच्छर  जान से मारे हैं, कोतवाल को थप्पड़ से मारा है और राजा को अन्यायी कहा है... &lt;br /&gt;और "ख" ने पंद्रह  आदमियों को मारा, बीस एक डाके डाले ,करीब डेढ़ दर्जन बलात्कार किया और कई  हेराफेरियां की हैं..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;राजा अत्यंत क्रोधित हो गए कि जिस राज्य को वे रामराज्य बनाने के लिए दिन रात सोचते रहते हैं,वहीँ उनकी प्रजा ऐसे कारनामों से उनके अभियान पर पानी फेरने को तैयार रहती है...&lt;br /&gt;घुडकते हुए वे गरजे - अरे  दुष्टों, क्यों की तुम लोगों ने ऐसी हरकतें..जीव हत्या !!! ऐसा जघन्य अपराध !!! दे दूँ  फांसी..???&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;"क" हड़का नहीं, बल्कि अड़ गया और बोला - &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"महाराज, ये भी क्या बात हुई..चूहे  मेरी फसलों को नष्ट कर रहे थे, तो न मारता उन्हें...और आपको पता भी है, आपके राजमहल  के बाहर क्या स्थिति है .जिन म्युनिसिपैलिटी वालों को नगर की सफाई व्यवस्था देखनी  है, मच्छड मारना है, वे तो राजमहल चमकाने और यहाँ के मच्छड मारने में लगे रहते हैं ,तो जो मच्छड दिन रात हमारा खून पीते रहते हैं,उन्हें मार हम अपना खून नहीं बचा  सकते..? &lt;br /&gt;और यह कोतवाल , वर्दी की धौंस दिखाकर हफ्ता मांग मांग हमें कंगाल किये हुए है..आज मैंने मना किया&amp;nbsp;तो इसने मुझपर कोड़े बरसाए , तो बताइए न धोता उस अन्यायी को ..? "&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;"क" की दबंगई और ध्रिष्ट्ता देख राजा समेत समस्त दरबारी हतप्रभ रह गए..&lt;br /&gt;&amp;nbsp;"ख" की  उपस्थिति और अपराध तो लोग भूल ही गए...&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐसा दुस्साहस ..!!!&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सन्नाटा पसर गया दरबार में...&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐसे में सबसे पहली आवाज उभरी "ख" की - &lt;br /&gt;धिक्कार है,धिक्कार है...शेम शेम...&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हमारे अन्नदाता प्रजापालक के साथ ऐसी बेहूदगी से सवाल- जवाब, ऊंची आवाज ..यह तो राज्य को चुनौती  है..देशद्रोह है..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सबने "ख" से सहमति जताते हुए - शेम शेम और धिक्कार है, धिक्कार है.. उचारा ..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;काफी समय लगा कोलाहल शान्त होने में..फिर बारी आई "ख" की ..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उससे पूछा गया कि&amp;nbsp;ये हत्याएं और अपराध उसने क्यों किये...बिना एक पल गँवाए  अत्यंत कातर और विनीत स्वर में गिडगिडा उठा वह ..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;"महाराज ये जो भी अपराध गिनाये गए हैं, अपराध हैं,यह मैंने अभी अभी  जाना है...सर्वथा अनभिज्ञता में यह सब कर गया&amp;nbsp; .. अब चूँकि मैंने ईश्वरपुत्र महाराज के  साक्षात दर्शन कर लिए तो एकदम से विवेक जाग उठा मेरा, मन निर्मल हो गया... और अभी के अभी मैं ईश्वरपुत्र   हमारे &lt;span id="6_TRN_4t"&gt;महान&lt;/span&gt; राजा तथा पवित्र धर्मग्रन्थ की शपथ लेकर कहता  हूँ कि अब आगे से कभी भी ऐसे कर्मों में लिप्त नहीं होऊंगा.. "&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दोनों पक्षों की सुन ली गई थी.गहन मंत्रणा हुई. और पवित्र न्यायप्रिय राजा ने  अपना न्याय सुनाया :-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;"ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की ,सब जीवों को जीवन जीने का सामान अधिकार  दिया,जिसे लेने का मनुष्य को कोई अधिकार नहीं..इस तरह हत्या के तो "क" और "ख" दोनों  ही सामान रूप से दोषी हैं, परन्तु जैसा कि सबने देखा "क" को न ही अपने किये पर  पश्चाताप है और न ही आगे वह ऐसा नहीं करेगा, इसका उनसे कोई आश्वासन दिया है, इसके  साथ ही राज्य या सत्ता के प्रति इसके मन में स्नेह या आदर का कोई भाव लक्षित नहीं  होता..ऐसे अपराधी मनोवृत्ति के मनुष्य का समाज में खुले घूमना घातक है.अतः "क" को उसके जघन्य कृत्य और मानसिकता के लिए मृत्युदंड दिया जाता है..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;और जैसा कि आप सबने अभी देखा कि देशभक्ति राष्ट्रप्रेम की भावना कैसे कूट कूट  कर "ख" में भरी हुई है, कैसे उसे अपने कृत्य पर घोर पश्चाताप है..कैसे निर्मल और उच्च विचार हैं इसके.. साथ ही इसने  आगे ऐसे किसी भी अपराध में लिप्त न होने की सौगंध खायी है ..अतः "ख" को  अपराध&amp;nbsp;मुक्त किया जाता है और साथ ही उसकी पवित्र भावना का आदर करते हुए ससम्मान&amp;nbsp; न्याय  समिति में सलाहकार पद पर नियुक्त किया जाता है.."&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दूध और पानी को अलग करता ऐसा विवेकपूर्ण&amp;nbsp;न्याय...!!! प्रजा एक स्वर से साधु साधु कर उठी..जयघोष से राजमहल  गुंजायमान हो उठा..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;____________________ &lt;/div&gt;&lt;div&gt;समझे, कथा सन्देश (माने&amp;nbsp; कि&amp;nbsp; ओही -&amp;nbsp;मोरल आफ द इस्टोरी) ???&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;..................................&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;चलिए हमहीं बता&amp;nbsp;देते हैं&amp;nbsp;- &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;त मोरल ई है कि, राजनीति में पाप-पुण्य,  सही-गलत, निति-नियम ..सब ऊ निर्धारित करता है जिसके हाथ में सत्ता होती है...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;जदी राजा सही, त सबकुछ सही, आ राजा गोबर, त राष्ट्र गोबर... बाकी कोई मोरल बाला  चिचिया छ&lt;span id="6_TRN_ai"&gt;टपटा&lt;/span&gt; के का कर लेगा... चीं चपड़ जरूरत से जादे  करेगा त भांग भूजते सूली लटकेगा..&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;****************&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-5291442617109344476?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/5291442617109344476/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=5291442617109344476&amp;isPopup=true' title='31 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5291442617109344476'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5291442617109344476'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='न्यायप्रिय राजा ....'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>31</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-1488000881904378351</id><published>2011-10-10T17:12:00.000+05:30</published><updated>2011-10-10T17:12:28.964+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='श्री शरद जोशी जी के संकलन &quot;जादू की सरकार&quot; के &quot;तीस साल का इतिहास&quot; से'/><title type='text'>तीस साल का इतिहास...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div&gt;तीन, साढ़े तीन दशक  !!!! बहुत लम्बा समय होता है यह..एक पूरी जन्मी पीढी स्वयं जनक बन जाती है इस अंतराल में.चालीस से अस्सी बसंत गुजार चुके किसी से पूछिए कि इस अंतराल में क्या क्या बदला देखा उन्होंने..समय की रफ़्तार की वे बताएँगे..परन्तु कई बार कुछ चीजों को देख प्रवाह और परिवर्तन की यह बात एकदम गलत और झूठी लगने लगती है.लगता है इस क्षेत्र विशेष में तो कुछ भी नहीं बदला.यहाँ आकर घड़ी की सुइयां एकदम स्थिर हो टिक टिक कर चलने ,गुजरने का केवल भ्रम दे रही हैं..  &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;लगभग तीन दशक पहले मूर्धन्य व्यंगकार श्री शरद जोशी जी ने समय के उस टुकड़े को कलमबद्ध किया था अपने आलेख "तीस साल का इतिहास" में जो उनकी पुस्तक " जादू की सरकार" में संकलित है..&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;कईयों ने पढ़ा होगा &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;इसे, पर मैं अस्वस्त हूँ कि इसका पुनर्पाठ किसी को भी अप्रिय न लगेगा ...प्रस्तुत है श्री शरद जोशी जी द्वारा लिखित उनकी पुस्तक "जादू की सरकार" का आलेख " तीस साल का इतिहास " जिसे पढ़कर बस यही लगता है कि राजनीति में कभी कुछ नहीं बदलता,चाहे समय कितना भी बदल जाए..&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;"तीस साल का इतिहास"&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस को राज करते करते तीस साल बीत गए . कुछ कहते हैं , तीन सौ साल बीत गए . गलत है .सिर्फ तीस साल बीते . इन तीस सालों में  कभी देश आगे बढ़ा , कभी कांग्रेस आगे बढ़ी . कभी दोनों आगे बढ़ गए, कभी दोनों नहीं बढ़ पाए .फिर यों हुआ कि देश आगे बढ़ गया और कांग्रेस पीछे रह गई. तीस सालों की यह यात्रा कांग्रेस की महायात्रा है. वह खादी भंडार से आरम्भ हुई और सचिवालय पर समाप्त हो गई.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;पुरे तीस साल तक कांग्रेस हमारे देश पर तम्बू की तरह तनी रही, गुब्बारे की तरह फैली रही, हवा की तरह सनसनाती रही, बर्फ सी जमी रही. पुरे तीस साल तक कांग्रेस ने देश में इतिहास बनाया, उसे सरकारी कर्मचारियों ने लिखा और विधानसभा के सदस्यों ने पढ़ा. पोस्टरों ,किताबों ,सिनेमा की स्लाइडों, गरज यह है कि देश के जर्रे-जर्रे पर कांग्रेस का नाम लिखा रहा. रेडियो ,टीवी डाक्यूमेंट्री , सरकारी बैठकों और सम्मेलनों में, गरज यह कि  दसों दिशाओं  में सिर्फ एक ही गूँज थी और वह कांग्रेस की थी. कांग्रेस हमारी आदत बन गई. कभी न छुटने वाली बुरी आदत. हम सब यहाँ वहां से दिल दिमाग और तोंद से कांग्रेसी होने लगे. इन तीस सालों में हर भारतवासी के अंतर में कांग्रेस गेस्ट्रिक ट्रबल की तरह समां गई. &lt;/div&gt;&lt;div&gt;जैसे ही आजादी मिली कांग्रेस ने यह महसूस किया कि खादी का कपड़ा मोटा, भद्दा और खुरदुरा होता है और बदन बहुत कोमल और नाजुक होता है. इसलिए कांग्रेस ने यह निर्णय लिया कि खादी को महीन किया जाए, रेशम किया जाए, टेरेलीन किया जाए. अंग्रेजों की  जेल में कांग्रेसी के साथ बहुत अत्याचार हुआ था. उन्हें पत्थर और सीमेंट की बेंचों पर सोने को मिला था. अगर आजादी के बाद अच्छी क्वालिटी की कपास का उत्पादन बढ़ाया गया, उसके गद्दे-तकिये भरे गए. और कांग्रेसी उस पर विराज कर, टिक कर देश की समस्याओं पर चिंतन करने लगे. देश में समस्याएँ बहुत थीं, कांग्रेसी भी बहुत थे.समस्याएँ बढ़ रही थीं, कांग्रेस भी बढ़ रही थी. एक दिन ऐसा आया की समस्याएं कांग्रेस हो गईं और कांग्रेस समस्या हो गई. दोनों बढ़ने लगे.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पुरे तीस साल तक देश ने यह समझने की कोशिश की कि कांग्रेस क्या है? खुद कांग्रेसी यह नहीं समझ पाया कि कांग्रेस क्या है? लोगों ने कांग्रेस को ब्रह्म की तरह नेति-नेति के तरीके से समझा. जो दाएं नहीं है वह कांग्रेस है.जो बाएँ नहीं है वह कांग्रेस है. जो मध्य में भी नहीं है वह कांग्रेस है. जो मध्य से बाएँ है वह कांग्रेस है. मनुष्य जितने रूपों में मिलता है, कांग्रेस उससे ज्यादा रूपों में मिलती है. कांग्रेस सर्वत्र है. हर कुर्सी पर है. हर कुर्सी के पीछे है. हर कुर्सी के सामने खड़ी है. हर सिद्धांत कांग्रेस का सिद्धांत है है. इन सभी सिद्धांतों पर कांग्रेस तीस साल तक अचल खड़ी हिलती रही.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;तीस साल का इतिहास साक्षी है कांग्रेस ने हमेशा संतुलन की नीति को बनाए रखा. जो कहा वो किया नहीं, जो किया वो बताया नहीं,जो बताया वह था नहीं, जो था वह गलत था. अहिंसा की नीति पर विश्वास किया और उस नीति को संतुलित किया लाठी और गोली से. सत्य की नीति पर चली, पर सच बोलने वाले से सदा नाराज रही.पेड़ लगाने का आन्दोलन चलाया और ठेके देकर जंगल के जंगल साफ़ कर दिए. राहत दी मगर टैक्स बढ़ा दिए. शराब के ठेके दिए, दारु के कारखाने खुलवाए; पर नशाबंदी का समर्थन करती रही. हिंदी की हिमायती रही अंग्रेजी को चालू रखा. योजना बनायी तो लागू नहीं होने दी. लागू की तो रोक दिया. रोक दिया तो चालू नहीं की. समस्याएं उठी तो कमीशन बैठे, रिपोर्ट आई तो पढ़ा नहीं. कांग्रेस का इतिहास निरंतर संतुलन का इतिहास है. समाजवाद की समर्थक रही, पर पूंजीवाद को शिकायत का मौका नहीं दिया. नारा दिया तो पूरा नहीं किया. प्राइवेट सेक्टर के खिलाफ पब्लिक सेक्टर को खड़ा किया, पब्लिक सेक्टर के खिलाफ प्राइवेट सेक्टर को. दोनों के बीच खुद खड़ी हो गई . तीस साल तक खड़ी रही. एक को बढ़ने नहीं दिया.दूसरे को घटने नहीं दिया.आत्मनिर्भरता पर जोर देते रहे, विदेशों से मदद मांगते रहे. 'यूथ' को बढ़ावा दिया, बुड्द्धों को टिकेट दिया. जो जीता वह मुख्यमंत्री बना, जो हारा सो गवर्नर हो गया. जो केंद्र में बेकार था उसे राज्य में भेजा, जो राज्य में बेकार था उसे  उसे केंद्र में ले आए. जो दोनों जगह बेकार थे उसे एम्बेसेडर बना दिया. वह देश का प्रतिनिधित्व करने लगा.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;एकता पर जोर दिया आपस में लड़ाते रहे. जातिवाद का विरोध किया, मगर अपनेवालों का हमेशा ख्याल रखा. प्रार्थनाएं सुनीं और भूल गए. आश्वासन दिए, पर निभाए नहीं. जिन्हें निभाया वे आश्वश्त नहीं हुए. मेहनत पर जोर दिया, अभिनन्दन करवाते रहे. जनता की सुनते रहे अफसर की मानते रहे.शांति की अपील की, भाषण देते रहे. खुद कुछ किया नहीं दुसरे का होने नहीं दिया. संतुलन की इन्तहां यह हुई कि उत्तर में जोर था तब दक्षिण में कमजोर थे. दक्षिण में जीते तो उत्तर में हार गए. तीस साल तक पुरे, पुरे तीस साल तक, कांग्रेस एक सरकार नहीं, एक संतुलन का नाम था. संतुलन, तम्बू की तरह तनी रही,गुब्बारे की तरह फैली रही, हवा की तरह सनसनाती रही बर्फ सी जमी रही पुरे तीस साल तक.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कांग्रेस अमर है. वह मर नहीं सकती. उसके दोष बने रहेंगे और गुण लौट-लौट कर आएँगे. जब तक पक्षपात ,निर्णयहीनता ढीलापन, दोमुंहापन, पूर्वाग्रह , ढोंग, दिखावा, सस्ती आकांक्षा और लालच कायम है, इस देश से कांग्रेस को कोई समाप्त नहीं कर सकता. कांग्रेस कायम रहेगी. दाएं, बाएँ, मध्य, मध्य के मध्य, गरज यह कि कहीं भी किसी भी रूप में आपको कांग्रेस नजर आएगी. इस देश में जो भी होता है अंततः कांग्रेस होता है. जनता पार्टी भी अंततः कांग्रेस हो जाएगी. जो कुछ होना है उसे आखिर में कांग्रेस होना है. तीस नहीं तीन सौ साल बीत जाएँगे, कांग्रेस इस देश का पीछा नहीं छोड़ने वाली...&lt;/div&gt;&lt;div&gt;______________________&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;साभार, व्यंगकार श्री शरद जोशी जी के संकलन "जादू की सरकार" के "तीस साल का इतिहास" से !!! &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-1488000881904378351?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/1488000881904378351/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=1488000881904378351&amp;isPopup=true' title='41 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/1488000881904378351'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/1488000881904378351'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='तीस साल का इतिहास...'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>41</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-5269428470450082043</id><published>2011-09-21T15:24:00.005+05:30</published><updated>2011-09-27T00:27:47.112+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>माँ सी...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;जब भी कभी हममे से कोई &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जो दूर हुआ करते थे उससे&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बात बेबात अक्सर &lt;/div&gt;&lt;div&gt;कैसे दलकती थी छाती&lt;/div&gt;&lt;div&gt;भरभराई रहती थी आँखें&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माँ की...&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पका देती भले वो हर रसोई &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सब ही के रूचि की,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पर उस पल जो न वहां मौजूद होता &lt;/div&gt;&lt;div&gt;कहाँ वह चीज उसके&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कंठ उतरा था &lt;/div&gt;&lt;div&gt;कभी भी...&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हरेक आहट पर मन और कान पातें,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बेचैन फिरती &lt;/div&gt;&lt;div&gt;कि जब तक लौटकर हम&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पास उसके आ न जाते. &lt;/div&gt;&lt;div&gt;हमारी गलतियों पर जो सदा &lt;/div&gt;&lt;div&gt;बनती थी चंडी &lt;/div&gt;&lt;div&gt;हमारे हित रही हर सांस &lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह मन्नत मानती..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बिना मतलब की ठहरा कर &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सदा उसके डरों को &lt;/div&gt;&lt;div&gt;थे कितना हम सभी &lt;/div&gt;&lt;div&gt;खिल्ली उड़ाते ..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जो पहरों कथा प्रवचनों में &lt;/div&gt;&lt;div&gt;रहती मन रमाये&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सुना करती थी &lt;/div&gt;&lt;div&gt;दुःख के मूल कारण,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कहाँ थी क्षण को भी उस मोह से &lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह&amp;nbsp;मुक्ति&amp;nbsp;पाती. &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;थी कच्ची बुद्धि मेरी और&lt;/div&gt;&lt;div&gt;किताबी समझ भी थी&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तभी तो उसका जीवन &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;निरा विषादमय &lt;/span&gt;लगा था...&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जहाँ बलिदान स्व का और &lt;/div&gt;&lt;div&gt;केवल दुःख ही दुःख था&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जहाँ न लक्ष्य या &lt;/div&gt;&lt;div&gt;कोई दिशा थी..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;लिया संकल्प न उस सा बनूंगी &lt;/div&gt;&lt;div&gt;जो कारण है दुखों का दुर्गति का &lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्रबल माया से मैं निसदिन बचूंगी &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सजग निर्लिप्त रह है कर्म करना &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सिखाया ग्रंथों ने ज्यों यूँ जिउंगी..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;पर&amp;nbsp;क्षण&amp;nbsp;में यह क्या हो गया.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह जैसे ही मेरे वक्ष से लगा..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सोता जो फूटा वह अंतस &lt;/div&gt;&lt;div&gt;जाने कहाँ छुपा था अबतक &lt;/div&gt;&lt;div&gt;बहा अभीतक का सब संचित &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सोच समझ सारा संकल्पित .&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आलौकिक थी वह अनुभूति &lt;/div&gt;&lt;div&gt;हाथ लगे ज्यों सर्व विभूति. &lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसने मुझको पूर्ण कर दिया &lt;/div&gt;&lt;div&gt;नव चिंतन युगबोध दे दिया..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;उसकी सम्पूर्ण चेष्टाओं में &lt;/div&gt;&lt;div&gt;गुंथे प्राण ध्यान जग सिमटा &lt;/div&gt;&lt;div&gt;कहूँ क्या बाल चेष्टाओं की &lt;/div&gt;&lt;div&gt;मुझमे अलौकिक सुख जो भरा &lt;/div&gt;&lt;div&gt;उर जो उपजा भाव अनोखा &lt;/div&gt;&lt;div&gt;जड़ चेतन&amp;nbsp;हित करुणा छलका .&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;मेरा जो भी ऋण है उसपर &lt;/div&gt;&lt;div&gt;तुच्छ बड़ा उसका जो मुझपर&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ममता बरसी मेरी असंख्य पर&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसकी तो "माँ ", मैं थी केवल... &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;बुद्धि विवेक संकल्प या साहस&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;वह&amp;nbsp; अपार&amp;nbsp;मुझसे वृहत्तर&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;शंका नहीं तनिक भी यह कि &lt;/div&gt;&lt;div&gt;हारेगा वह जीवन पथ पर &lt;/div&gt;&lt;div&gt;मगर विलग जब भी होता है &lt;/div&gt;&lt;div&gt;मन क्यों ऐसे बिसुरा करता है ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कलप कलप कर जी क्यों पूछे - &lt;/div&gt;&lt;div&gt;मेरा लाल,&amp;nbsp; कुशल से तो है..? &lt;/div&gt;&lt;div&gt;खाया है न ठीक ठाक से ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चिंता कोई तुझे तो न है ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जब भी ध्यान चढ़े वह क्षण कि &lt;/div&gt;&lt;div&gt;कैसे वह है गोद दुबकता&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जब भी रोग कोई है ग्रसता &lt;/div&gt;&lt;div&gt;दिए सहारा एक दूजे को &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सदा ही काटा कठिन घड़ी को&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आये ऐसा कोई क्षण जो &lt;/div&gt;&lt;div&gt;हम कैसे काटेंगे विलग हो . &lt;/div&gt;&lt;div&gt;लाख मनालूं ,लाख सम्हालूं&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तर्कों से मन को बहलाऊं &lt;/div&gt;&lt;div&gt;फिर भी भर भर&amp;nbsp;आयें&amp;nbsp;आँखें ..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जैसे माँ की भर आती थी..&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;.............................&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-5269428470450082043?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/5269428470450082043/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=5269428470450082043&amp;isPopup=true' title='42 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5269428470450082043'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5269428470450082043'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/09/blog-post_21.html' title='माँ सी...'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>42</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-5868636727209618110</id><published>2011-09-07T18:33:00.001+05:30</published><updated>2011-09-09T14:44:23.760+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन दर्शन.'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रामचरित मानस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तुलसीदास'/><title type='text'>गोस्वामी जी का युगबोध ...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं एक बार अकबर ने सूरदास जी से पूछा कि वे और गोस्वामी जी दोनों ही तो एक ही विष्णु के भिन्न अवतारों को मानते हुए कविता रचते हैं, तो अपने मत से बताएं कि दोनों में से किसकी कविता अधिक सुन्दर और श्रेष्ठ है. सूरदास जी ने तपाके उत्तर दिया कि कविता की पूछें तो कविता तो मेरी ही श्रेष्ठ है..अकबर सूरदास जी से इस उत्तर अपेक्षा नहीं रखते थे,मन तिक्त हो गया उनका...मन ही मन सोचने लगे , कहने को तो ये इतने पहुंचे हुए संत हैं,पर आत्ममुग्धता के रोग ने इन्हें भी नहीं बख्शा..माना कि अपनी कृति या संतान सभी को संसार में सर्वाधिक प्रिय और उत्तम लगते हैं,पर संत की बड़ाई तो इसी में है कि वह सदा स्वयं को लघु और दूसरे को गुरु माने...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकबर के मन में ये विचार घुमड़ ही रहे थे कि सूरदास जी ने आगे कहा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाशय आपने कविता की पूछी तो मैंने आपको कविता की बात बताई..मैंने जो लिखा है वह सचमुच उत्कृष्ट कविता है,पर गोस्वामी जी ने जो लिखा है,वह तो कविता नहीं साक्षात मंत्र हैं, उसे कविता कहने से बड़ा कोई और पाप हो ही नहीं सकता. समय के साथ जिस प्रकार देवभाषा (संस्कृत) का पराभव और लोप होता जा रहा है, वेद उपनिषद पुराणों आदि के निचोड़ को सरल एवं ग्रहणीय लोक भाषा में जन जन तक पहुँचाने के लिए स्वयं भगवान् शंकर ने गोस्वामी जी के हाथों यह लिखवाया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचमुच यदि ध्यान से देखा जाय तो शायद ही कोई दोहा चौपाई ऐसी मिले जो कहीं न कहीं किसी श्लोक का लोकभाषा में सरलीकरण न हो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गीता में कहा गया -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत, अभ्युत्थानं अधर्मस्य.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रामचरित में देखिये-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब जब होहिं धरम के हानी, बढ़हिं असुर अधम अभिमानी....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर ,मानने वाले यदि इस अलौकिकता के तर्क को न भी मानें ,तो भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि जो विराट जीवन दर्शन इस महत ग्रन्थ में समाहित है, प्राणिमात्र यदि उसका शतांश भी ग्रहण कर ले, आचरण में उतार ले तो जीवन को सच्चे अर्थों में सुखी और सार्थक कर सकता है..केवल हिन्दुओं के लिए नहीं, जीवन और जगत को समझने, इसे सुखद सुन्दर बनाने की अभिलाषा रखने वाले किसी भी देश, भाषा और धर्म पंथ के अनुयायी को यहाँ से वह सबकुछ मिलेगा ,जिसका व्यवहारिक उपयोग वह जीवन के किसी भी क्षेत्र में कर सकता है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केवल एक कथा भर नहीं लिखी है गोस्वामी जी ने, जिस प्रकार से वे प्रकृति से, समाज से, मानव चरित्र और व्यवहार से छोटी छोटी बातों को लेकर चित्र और दृष्टान्त गढ़ते हैं, मन मुग्ध और विस्मित होकर रह जाता है उनकी इस विराट चेतना और विस्तृत युगबोध पर..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किष्किन्धा में पर्वत शिखर पर गुह्य कन्दरा में बैठे राम लक्ष्मण के मध्य संवाद द्वारा गोस्वामी जी ने क्या विहंगम चित्र खींचा है देखिये- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दामिनि दमक रही&amp;nbsp;घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें । खल के बचन संत सह जैसें।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होई अचल जिमि जिव हरि पाई।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो0- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ।।14।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;–*–*–&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्क जबास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो0-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।।15(क)।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।15(ख&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन प्राकृतिक बिम्बों के माध्यम से मनुष्य चरित्र के जिन लक्षणों को वे रेखांकित करते हैं, सुख और सद्गति के लिए जो दर्शन देते हैं,प्रकृति से सीखने का जिस प्रकार आह्वान करते हैं , क्या मनुष्यमात्र के लिए अनुकरणीय नहीं है? क्या विडंबना है, लोग सुखी तो होना चाहते हैं, पर इसके सिद्ध ,स्थायी सात्विक स्रोतों से जुड़ना नहीं चाहते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुधा&amp;nbsp; लोगों को&amp;nbsp; कहते सुना है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* तुलसीदास जी ने स्त्री और शूद्र के प्रति सम्मान का भाव नहीं रखा,इसलिए हम उनका विरोध करते हैं.फलतः ग्रन्थ पढने का प्रश्न ही कहाँ उठता है...?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*बड़े पक्षपाती थे तुलसीदास जी. केवल राम और सीता का गुणगान ही करते रह गए..या फिर जो कोई राम के टहल टिकोरे में थे उन्हें महानता का सर्टिफिकेट दिया ..लक्षमण और भरत की पत्नी जिसने चौदह वर्ष महल में रह कर भी वनवास काटा, उनके लिए खर्चने को तुलसीदास के पास एक शब्द नहीं था...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*क्या पढ़ें रामायण, बात बात पर तो देवताओं से फूल बरसवाने लगते हैं तुलसीदास..अझेल हो जाता है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* नया क्या है कहानी में...सब तो जाना सुना है...इतने मोटे किताब में सर खपाने कौन जाए... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिना किसी पूर्वाग्रह के मुक्त ह्रदय से आदि से अंत तक एक बार पढ़कर देखा जाय तो आशंकाओं जिज्ञासाओं के लिए कोई स्थान ही नहीं बचेगा..किसी अलौकिक ब्रह्म की कथा सुनने नहीं, अपने ही आस पास को तनिक और स्पष्टता से जानने, दिनों दिन भौतिक साधनों अविष्कारों की रेल पेल के बाद भी निस दिन दुरूह होते जीवन में शांति और सुख के मार्ग संधान के लिए, जीवन दर्शन को समझने के लिए, जीते जी एक बार अवश्य पढने का प्रयास कर लेना चाहिए.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;********************&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-5868636727209618110?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/5868636727209618110/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=5868636727209618110&amp;isPopup=true' title='45 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5868636727209618110'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5868636727209618110'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='गोस्वामी जी का युगबोध ...'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>45</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-7825550728122277624</id><published>2011-07-11T17:51:00.004+05:30</published><updated>2011-07-13T23:22:21.761+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सामाजिक राजनितिक चेतना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='युग बोध'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्यिक पत्रिका  ...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>चुप्पी तोड़ो ------</title><content type='html'>निरंतर ह्रासोन्मुख स्थिति यह आस संजोने नहीं देती कि कभी न कभी फिर से अपने देश में वह स्थति आयेगी जब हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाओं के दिन बहुर जायेंगे, यह पुनः उस सम्मान और स्तर को प्राप्त होगा जो आज से छः सात आठ दशक पहले था...पढने की तीव्र उत्कंठा लिए ढूँढने निकलो तो अधिकांशतः हाथ मलते रह जाना पड़ता है...ऐसे में जब पत्रिका "समकालीन अभिव्यक्ति " मेरे हाथ आई और अद्योपरांत इसे पढ़ा, तो निराश ह्रदय ने अपार संबल पाया...छोटी सी है यह पत्रिका ,पर इसमें संकलित रचनाओं को पढ़ न केवल रचनाकरों अपितु चयन कर्ता संपादक मंडल के प्रति भी मन श्रद्धा तथा आभारनत हो जाता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपादक "श्री उपेन्द्र कुमार मिश्र " जी पत्रिका के सम्पादकीय में अपने मनोभावों को जिस प्रकार पद्य रूप में प्रेषित करते हैं , वह न केवल उनकी सुस्पष्ट सोच और श्रृजन क्षमता प्रतिबिंबित करती अभिभूत करती है,अपितु वह महत आह्वान ह्रदय को झकझोर कर सचमुच ही चुप्पी तोड़ने को विवश कर देती है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्रैमासिक पत्रिका (जनवरी- मार्च २०११) के सम्पादकीय को इस मंच पर उन सब के साथ सांझा करना चाहूंगी,जिन्होंने इसे न पढ़ा हो...&lt;br /&gt;&lt;div&gt;निम्नलिखित&amp;nbsp; रचना में भाव निकले अवश्य मिश्र जी के ह्रदय से हैं पर शायद ही कोई संवेदनशील पाठक होगा जिसे यह अपने मन की बात न लगेगी..&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;" चुप्पी तोड़ो "...............&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आओ !!!&lt;br /&gt;डूब मरें ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब कायर&lt;br /&gt;नपुंसक&lt;br /&gt;बेशर्म&lt;br /&gt;और मुर्दादिल जैसे शब्द &lt;br /&gt;हमें झकझोरने में &lt;br /&gt;हो जाएँ बेअसर&lt;br /&gt;घिघियाना &lt;br /&gt;गिड़गिडाना &lt;br /&gt;और लात जूते खाकर भी &lt;br /&gt;तलवे चाटना&lt;br /&gt;बन जाए हमारी आदत&lt;br /&gt;अपने को मिटा देने की सीमा तक&lt;br /&gt;हम हो जाएँ समझौतावादी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो आओ !!!&lt;br /&gt;डूब मरें.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब खून में उबाल आना&lt;br /&gt;हो जाए बंद&lt;br /&gt;भीतर महसूस न हो &lt;br /&gt;आग की तपिश&lt;br /&gt;जब दिखाई न दे&lt;br /&gt;जीने का कोई औचित्य&lt;br /&gt;कीड़े- मकौडों का जीवन भी&lt;br /&gt;लगने लगे हमसे बेहतर &lt;br /&gt;हम बनकर रह जाएँ केवल&lt;br /&gt;जनगणना के आंकड़े &lt;br /&gt;राजनितिक जलसों में &lt;br /&gt;किराए की भीड़ से ज्यादा &lt;br /&gt;न हो हमारी अहमियत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो आओ !!!&lt;br /&gt;डूब मरें...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब हमारी मुर्दानगी के परिणामस्वरूप&lt;br /&gt;सत्ता हो जाए स्वेच्छाचारी &lt;br /&gt;हमारी आत्मघाती सहनशीलता के कारण &lt;br /&gt;व्यवस्था बन जाए आदमखोर &lt;br /&gt;जब धर्म और राजनीति के बहुरूपिये&lt;br /&gt;जाति और मज़हब की अफीम खिलाकर&lt;br /&gt;हमें आपस में लड़ाकर &lt;br /&gt;' बुल फाईट ' का लें मजा&lt;br /&gt;ताली पीट - पीटकर हँसे &lt;br /&gt;हमारी मूर्खता पर &lt;br /&gt;और हम&lt;br /&gt;उनकी स्वार्थ सिद्धि हेतु&lt;br /&gt;मरने या मारने पर &lt;br /&gt;हो जाएँ उतारू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो आओ !!!&lt;br /&gt;डूब मरें...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले कि &lt;br /&gt;इतिहास में दर्ज हो जाए &lt;br /&gt;मुर्दा कौम के रूप में &lt;br /&gt;हमारी पहचान&lt;br /&gt;राष्ट्र बन जाए &lt;br /&gt;बाज़ार का पर्याय&lt;br /&gt;जहाँ हर चीज हो बिकाऊ&lt;br /&gt;बड़ी- बड़ी शोहरतें&lt;br /&gt;बिकने को हों तैयार&lt;br /&gt;लोग कर रहे हों&lt;br /&gt;अपनी बारी का इन्तजार&lt;br /&gt;जहाँ बिक रही हो आस्था&lt;br /&gt;बिक रहा ईमान &lt;br /&gt;बिक रहे हों मंत्री &lt;br /&gt;बिक रहे दरबान&lt;br /&gt;धर्म और न्याय की&lt;br /&gt;सजी हो दूकान&lt;br /&gt;सौदेबाज़ों की नज़र में हों&lt;br /&gt;संसद और संविधान&lt;br /&gt;देश बेचने का &lt;br /&gt;चल रहा हो खेल&lt;br /&gt;और हम सो रहे हों&lt;br /&gt;कान में डाले तेल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो आओ !!!&lt;br /&gt;डूब मरें.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब आजाद भारत का अंगरेजी तंत्र&lt;br /&gt;हिन्दी को मारने का रचे षड़यंत्र&lt;br /&gt;करे देवनागरी को तिरस्कृत&lt;br /&gt;मातृभाषा को अपमानित&lt;br /&gt;उडाये भारतीय संस्कृति का उपहास&lt;br /&gt;पश्चिमी सभ्यता का क्रीतदास&lt;br /&gt;लगाये भारत के मस्तक पर &lt;br /&gt;अंगरेजी का चरणरज&lt;br /&gt;तब इस तंत्र में शामिल &lt;br /&gt;नमक हरमों को &lt;br /&gt;देशद्रोही, गद्दारों को&lt;br /&gt;कूड़ेदान में फेंकने के बदले&lt;br /&gt;अगर हम बैठाएं सिर- आँखों पर&lt;br /&gt;करें उनका जय-जयकार &lt;br /&gt;गुलामी स्वीकार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो आओ !!!&lt;br /&gt;डूब मरें...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब सरस्वती&amp;nbsp;के आसन पर हो &lt;br /&gt;उल्लुओं का कब्ज़ा &lt;br /&gt;भ्रष्ट, मक्कार और अपराधी&lt;br /&gt;उच्च पदों पर हों प्रतिष्ठित&lt;br /&gt;मानवतावादियों को दी जाए&lt;br /&gt;आजीवन कारावास की सजा &lt;br /&gt;हिंसा को धर्म मानने वाले &lt;br /&gt;रच रहें हों देश को तोड़ने की साज़िश &lt;br /&gt;और हम तटस्थ हो&lt;br /&gt;बन रहें हों बारूदी गंध के आदी&lt;br /&gt;हथियारबंद जंगलों में &lt;br /&gt;उग रही हो आतंक की पौध&lt;br /&gt;हथियारों की फसल &lt;br /&gt;लूट ,हत्या बलात्कार&lt;br /&gt;बन गएँ हों दैनिक कर्म&lt;br /&gt;तो गांधी से आँखें चुराते हुए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आओ !!!&lt;br /&gt;डूब मरें...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब सत्य बोलते समय&lt;br /&gt;तालू से चिपक जाए जीभ&lt;br /&gt;दूसरे को प्रताड़ित होता देख&lt;br /&gt;हम इतरायें अपनी कुशलता पर&lt;br /&gt;समृद्धि पाने के लिए&lt;br /&gt;बेच दें अपनी आदमियत&lt;br /&gt;जब भूख से दम तोड़ते लोग &lt;br /&gt;कुत्तों द्वारा छोडी हड्डियाँ चूसकर &lt;br /&gt;जान बचाने की कर रहे हों कोशिश&lt;br /&gt;खतरनाक जगहों, घरों, ढाबों में&lt;br /&gt;काम करते बच्चे &lt;br /&gt;पूछ रहे हों प्रश्न -&lt;br /&gt;पैदा क्यों किया?&lt;br /&gt;बचपन क्यों छीना?&lt;br /&gt;हमसे कोई प्यार क्यों नहीं करता?&lt;br /&gt;तब आप चाहें हों&lt;br /&gt;किसी भी दल के समर्थक&lt;br /&gt;विकास के दावे पर थूकते हुए&lt;br /&gt;होते हुए शर्मशार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आओ !!!&lt;br /&gt;डूब मरें...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जब&lt;br /&gt;टूटती उमीदों के बीच&lt;br /&gt;आकस्मात &lt;br /&gt;कोई लेकर निकल पड़े मशाल&lt;br /&gt;अँधेरे को ललकार&lt;br /&gt;लगा दे जीवन को दांव पर&lt;br /&gt;तो उस निष्पाप, पुण्यात्मा को &lt;br /&gt;यदि हम दे न सकें&lt;br /&gt;अपना समर्थन&lt;br /&gt;मिला न सकें&lt;br /&gt;उसकी आवाज़ में आवाज़&lt;br /&gt;चल न सकें दो कदम उसके साथ &lt;br /&gt;अन्धकार से डरकर&lt;br /&gt;छिप जाएँ बिलों में&lt;br /&gt;बंद कर लें कपाट&lt;br /&gt;तो यह&lt;br /&gt;अक्षम्य अपराध है&lt;br /&gt;अँधेरे के पक्ष में खड़े होने का&lt;br /&gt;षड़यंत्र है&lt;br /&gt;उजाले को रोकने का&lt;br /&gt;इसलिए लोकतंत्र को&lt;br /&gt;अंधेरों के हवाले करने से पहले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आओ !!!&lt;br /&gt;डूब मरें....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;____________________________________&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(पत्रिका प्राप्ति हेतु पता-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपादक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समकालीन अभिव्यक्ति&lt;br /&gt;फ्लैट नंबर 5, तृतीय तल,984,वार्ड नंबर- 7,&lt;br /&gt;महरौली, नयी दिल्ली-30.)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****************************************&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-7825550728122277624?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/7825550728122277624/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=7825550728122277624&amp;isPopup=true' title='63 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/7825550728122277624'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/7825550728122277624'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='चुप्पी तोड़ो ------'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>63</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-5910685469055908377</id><published>2011-06-22T13:31:00.000+05:30</published><updated>2011-06-22T13:31:14.121+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>पूर्णाहुति ...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;तो क्या हुआ यदि पांचवीं में तीन साल फेल होने के बाद, फिर कभी फिरकर उसने विद्यालय का मुंह नहीं देखा था. व्यक्ति और परिस्थतियों को नियंत्रित करने की उसकी जो क्षमता थी,वह कोई शिक्षण संस्थान किसी को नहीं सिखाता... दुनियादारी के गुर किताबें सिखा भी कहाँ पाती हैं , बल्कि किताबों में जो होते हैं, उन निति सिद्धांतों पर आँख कान दिए सरपट चले आदमी, तो अपना बेडा ही गर्क न करा ले..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी जन्मदायिनी अथाह लगाव था उसे. अन्धानुगामिनी थी वह उसकी. यहाँ तक कि उसके पिता अपनी पत्नी के जिन दुर्गुणों से त्रस्त और क्षुब्ध रहते थे, वे समस्त गुण उसे खासे जीवनोपयोगी लगते थे..पिता का क्षोभ उसे असह्य था..और फिर एक दिन जब विवेकहीना माता ने नितांत महत्वहीन बात पर क्रोधावेग में अपने शरीर को अग्नि में विसर्जित कर दिया , इस दुर्घटना का पूर्ण दोषी भी उसने अपने जनक को ही ठहराया. फांसी के फंदे तक उन्हें पहुंचा छोड़ने को वह प्रतिबद्ध हो उठी..वो तो नाते रिश्तेदारों ने मिलकर किसी प्रकार स्थिति को सम्हाला और माता के साथ साथ पिता से भी वंचित होने से उन चारों बहनों को बचाया था.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तात्कालिक क्षोभ का ज्वार जब उसका उतरा तो बारह वर्षीय उस बाला ने पूरे सूझ बूझ के साथ अपने घाटे भले का भली प्रकार अंकन किया और इस दुर्घटना में भी अपने लिए सुनहरा अवसर ही पाया..सुविधानुसार जीवन भर वह इसे भुनाती रही..उसने कभी भी अपने पिता को विस्मृत नहीं करने दिया कि वह एक पत्नी हन्ता पापी है..स्वयं को पीड़ित व्यथित और पिता को हीन ठहरा उसने अपने लिए हर किसी का ध्यान और अपार महत्त्व अर्जित किया..जब जो वह चाहती घर में सब उसीके अनुसार होता..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलता तो यह जीवन भर रहता ,पर उसके मार्ग में पहाड़ सी अवरोधक बनी उसकी विमाता..अपने भर उसने पूरा प्रयत्न किया कि पिता के जीवन में सुख की क्षीण ऊष्मा न पहुंचे , परन्तु सम्पूर्ण यत्न कर भी इस विवाह को वह रोक न पायी..हालाँकि पिता भी सहज भाव से इस विवाह हेतु प्रस्तुत न हुए थे, पर परिवार समाज वालों का दवाब और चार चार नन्ही बच्चियों के लालन पालन और भविष्य की चिंता ने उनके लिए दूसरा कोई मार्ग नहीं छोड़ा था.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने पिता के द्वितीय विवाह को उसने अपने पराजय और चुनौती रूप में स्वीकारा था. इस पीड़ा को सदा उसने ह्रदय में जगाये रखा और प्रतिशोधस्वरूप जीवन भर अपने पिता को न तो अपनी दूसरी पत्नी के गुणों को देखने परखने का अवसर दिया और न ही उन्हें इस अपराध बोध से मुक्त होने दिया कि विमाता ला, उन्होंने अपनी पुत्रियों पर कितना बड़ा अत्याचार किया है..अपने चतुर युक्तियों से घटनाओं को संचालित करती शांति प्रेम सद्भाव को कभी उसने अपने घर की चौखट लांघ अन्दर आने न दिया..मानसिक संताप और अशांति तले अहर्निश कुचले जाते पिता को असमय ही कालकलवित होते देख भी उसका ह्रदय न पसीजा था.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीनो बहनों को भी वह इस प्रकार नियंत्रित करती थी कि जब कभी भी उनका मन अपनी विमाता के ममत्व पर पिघलने को होता था, पल में उस आवेग को अपने समझाइश की झाडू से बुहार वह उनके मन के घृणा के पौध को लहलहा देती थी.. चारों के मन से वितृष्णा निकालने के उपक्रम में विमाता ने क्या न किया. इनका घर बसाने को उन्होंने अपने देह के गहने चुन चुन कर हटा दिए, आधे से अधिक खेत बारी निपटा दिए ,पर फिर भी वह इनके मन में अपने लिए छोटा सा एक कोना नहीं निकाल पाई...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और एक दिन जैसे ही उसे पता चला कि जिस देश में वह रह रही है,वहां के संविधान ने उसे यह अधिकार दिया है कि वह पिता की संपत्ति के टुकड़े कर अपना हिस्सा उगाह सकती है, अपनी बहनों को समझा बुझा फुसला कर वह मायके लेती गयी और अब तक की बची खुची संपत्ति के पांच भाग करा, अपने हिस्से के घर घरारी और खेत बारी बेच, अपने उस सौतेले भाई को उस स्थिति में पहुंचा दिया जिसमे कि वह अपने जनम को कोसता.. परिवार नातेदार और गाँव घर वाले सब उसके खिलाफ एकजुट होकर लड़े थे यह लड़ाई, पर विजय उसे ही मिली ,क्योंकि देश का कानून उसके साथ था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुहरी जीत हुई थी उसकी .एक तरफ जहाँ उसने अपने बाल बच्चों के सुखद भविष्य हेतु इतना सारा धन संचित कर लिया था ,वहीँ लगे हाथों विमाता को भी वह आघात दिया था जिससे उबर कर अपने प्राण बचा पाना उसके लिए संभव न था.. जिस विमाता को उसने जीवन भर समस्त समस्याओं का जड़ माना, बिना कोई अस्त्र शस्त्र चलाये उसके प्राण लेने में वह सफल हो गई थी.वर्षों संघर्ष के उपरांत उसके अवसान से उसके प्रतिशोध को पूर्णाहुति मिली थी..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर कलपते हुए अंतिम हिचकी के साथ विमाता भी ईश्वर से एक विनती कर गयी थी- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हे ईश्वर !!! इन बच्चियों का घर, बाल बच्चों और धन धान्य से सदा पूर्ण रखना और कभी न कभी इन्ही के द्वारा न्याय अवश्य करना .." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;----------------------- &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-5910685469055908377?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/5910685469055908377/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=5910685469055908377&amp;isPopup=true' title='43 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5910685469055908377'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5910685469055908377'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/06/blog-post_22.html' title='पूर्णाहुति ...'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>43</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-4115405869823170261</id><published>2011-06-01T14:50:00.001+05:30</published><updated>2011-06-01T15:25:51.114+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><title type='text'>प्रेम पत्र....</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;अपार उर्जा उत्साह उस्तुकता आशाओं आकांक्षाओं और स्वर्णिम भविष्य के संजोये स्वपनों से भरा किशोर वय जब पहली बार उस देहरी को लांघता है जिसके बाद उसकी वयस्कता को सामाजिक मान्यता मिलती है,उसे समझदार और समर्थ माना जाने लगता है,बात बात पर बच्चा ठहराने के स्थान पर अचानक हर कोई उसे, अब तुम बच्चे हो क्या ?? कहने लगते हैं, तो वह नव तरुण हर उस विषय को जान लेने को उत्कंठित हो उठता है, जिसतक आजतक उसकी पहुँच नहीं थी...यह रोमांचक देहरी होती है महाविद्यालय की देहरी..&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;बुद्धि चाहे जितनी विकसित हुई हो तब तक, पर एक तो बचपने के तमगे से मुक्ति की छटपटाहट और दूसरे बारम्बार अपने लिए बच्चे नहीं रह जाने की उद्घोषणा उस वय को स्वयं को परिपक्व युवा साबित करने को प्रतिबद्ध कर देती है. और फिर इस क्रम में जो प्रथम प्रयास होता है,वह होता है प्रेम व्रेम, स्त्री पुरुष सम्बन्ध आदि उन विषयों का अधिकाधिक ज्ञान प्राप्ति का प्रयास जो आज तक नितांत वर्ज्य प्रतिबंधित घोषित कर रखा गया था इनके लिए... पर विडंबना देखिये, उक्त तथाकथित बड़े से बड़ा और समझदार होने की अपेक्षा तो सब करते हैं, पर उसके आस पास के सभी बड़े इस चेष्टा में अपनी समस्त उर्जा झोंके रहते हैं कि इस गोपनीय विषय तक उनके बच्चों की पहुँच किसी भांति न हो पाए . यह अनभिज्ञता उनके गृहस्थ जीवन तक इसी प्रकार बनी रहे, इसके लिए उससे हर बड़े ,हर प्रयत्न और प्रबंध किये रहते हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय के साथ जैसे जैसे समाज में खुलापन आता गया है, टी वी सिनेमा इंटरनेट आदि माध्यमों ने इस प्रकार से सबकुछ सबके लिए सुलभ कराया है, कि जो और जितना ज्ञान हमारे ज़माने के बच्चों को बीस बाइस या पच्चीस में प्राप्त होता था, बारह ग्यारह दस नौ करते अब तो सात आठ वर्ष के बच्चों को सहज ही उतना प्राप्त हो जाता है..आज मनोरंजन के ये असंख्य साधन बच्चों को जल्द से जल्द वयस्क बन जाने और अपनी वयस्कता सिद्ध करने को प्रतिपल उत्प्रेरित प्रतिबद्ध करते रहते हैं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, बात हमारे ज़माने की..एकल परिवार के बच्चे हम सिनेमा और कुछेक कथा कहानी उपन्यासों को छोड़ प्रणय सम्बन्ध और प्रेम पत्र ,रोमांटिसिज्म प्रत्यक्षतः देख सीख जान पाने के अवसर कहीं पाते न थे. घर में जबतक रहे, जिम्मेदारियों के समय " इतने बड़े हो गए, इतना भी नहीं बुझाता " और इन वयस्क विषयों के समय निरे बच्चे ठहरा दिए जाते थे..सिनेमा काफी छानबीन के बाद दिखाया जाता था,जिसमे ऐसे वैसे किसी दृश्य की कोई संभावना नहीं बचती थी और विवाह से ढेढ़ साल पहले जब घर में टी वी आया भी तो दूरदर्शन पर दिखाए जा रहे किसी सिनेमा में जैसे ही किसी ऐसे वैसे दृश्य की संभावना बनती , हमें पानी लाने या किसी अन्य काम के बहाने वहां से भगा दिया जाता था..जानने को उत्सुक हमारा मन, बस कसमसाकर रह जाता था..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर जब बी ए में छात्रावास गए भी तो वह तिहाड़ जेल को भी फेल करने वाला था..बड़े बड़े पेड़ों से घिरे जंगलों के विशाल आहाते में एक चौथाई में छात्रावास था और बाकी में कॉलेज. चारों ओर की बाउंड्री बीस पच्चीस फीट ऊँची, जिसपर कांच कीले लगी हुईं. छात्रावास और कॉलेज कम्पाउंड के बीच ऊंचा कंटीले झाड़ों वाला दुर्गम दीवार और कॉलेज कैम्पस में खुलने वाला एक बड़ा सा गेट जो कॉलेज आवर ख़त्म होते ही बंद हो जाता था..ग्रिल पर जब शाम को हम लटकते तो लगता कि किसी जघन्य अपराध की सजा काटने आये हम जेल में बंद अपराधी हैं..जबतक हमसे दो सीनियर बैच परीक्षा दे वहां से निकले नहीं और हम सिनियरत्व को प्राप्त न हुए यह जेल वाली फिलिंग कुछ कम होती बरकरार ही रही..लेकिन हाँ,यह था कि समय के साथ जैसे जैसे सहपाठियों संग आत्मीयता बढ़ती गई, ढहती औपचारिकता की दीवार के बीच से इस विषय पर भी खुलकर बातें होने लगीं और अधकचरी ही सही,पर ठीक ठाक ज्ञानवर्धन हुआ हमारा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब संस्कार का बंधन कहिये या अपने सम्मान के प्रति अतिशय जागरूकता, कि विषय ज्ञानवर्धन की अभिलाषा के अतिरिक्त व्यवहारिक रूप में यह सब आजमा कर देखने की उत्सुकता हमारे ग्रुप में किसी को नहीं थी..बल्कि पढ़ाई लिखाई को थोडा सा साइड कर मेरी अगुआई में हमारा एक छोटा सा ग्रुप तो इस अभियान में अधिक रहता था कि हमारे सहपाठियों से लेकर जूनियर मोस्ट बैचों तक में इस तरह के किसी लफड़े में फंस किसी ने कुछ ऐसा तो न किया जिससे हमारे छात्रावास तथा उन विद्यार्थियों के अभिभावकों का नाम खराब होने की सम्भावना बनती हो ..आज के बजरंग दल, शिव सैनिक या इसी तरह के संस्कृति रक्षक संगठन वेलेंटाइन डे पर प्रेमियों के खिलाफ जैसे अभियान चलाते हैं, उससे कुछ ही कमतर हमारे हुआ करते थे..यही कारण था कि छात्रावास प्रबंधन के हम मुंहलगे और प्रिय थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो एक दिन इसी मुंहलगेपन का फायदा उठाते हुए हमने कमरा शिफ्ट करती,करवाती परेशान हाल अपनी छात्रावास संरक्षिका से पेशकश की कि हम उनकी मदद कर के ही रहेंगे..बाकी कर्मचारी इस काम में लगे हुए थे, हमारी कोई आवश्यकता इसमें थी नहीं, पर फिर भी हम जी जान से लग गयीं कि यह अवसर हमें मिले और अंततः मैं और मेरी रूम मेट सविता ने उन्हें इसके लिए मना ही लिया... असल में हमारे छात्रावास से जाने और आने वाले दोनों ही डाक (चिट्ठियां) पहले छात्रावास की मुख्य तथा उप संरक्षिका द्वारा पढ़ी जातीं थीं, उसके बाद ही पोस्ट होती थी या छात्रों में वितरित होती थी. यहाँ से जाने वाले डाक में तो कोई बात नहीं थी..कौन जानबूझकर ऐसी सामग्रियां उनके पढने को मुहैया करवाता,पर आने वाले डाकों पर इन कारगुजारियों में लिप्त लड़कियां पूर्ण नियंत्रण नहीं रख पातीं थीं..छात्रावास का पता इतना सरल था कि यदि कोई विद्यार्थी का नाम और पढ़ाई का वर्ष जान लेता तो आँख मूंदकर चिट्ठी भेज सकता था..और जो ऐसी चिट्ठी आ जाती,तो जो सीन बनता था..बस क्या कहा जाय..यूँ सीन बनकर भी ये चिट्ठियां कभी उन्हें मिलती न थी जिसके लिए होती थी,बल्कि ये सब प्रबंधिका के गिरफ्त में ऑन रिकोर्ड रहती थीं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सहायता बनाम खोजी अभियान में जुटे&amp;nbsp; छोटे मोटे सामान इधर से उधर पहुँचाने के क्रम में हमने वह भण्डार खोज ही लिया..शाल के अन्दर छुपा जितना हम वहां से उड़ा सकते थे, उड़ा लाये. और फिर तो क्या था, प्रेम पत्रों का वह भण्डार कई महीनों तक हमारे मनोरंजन का अन्यतम साधन बना रहा था.प्रत्यक्ष रूप में मैंने पहली बार प्रेम पत्र पढ़े.वो भी इतने सारे एक से बढ़कर एक..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक पत्र का कुछ हिस्सा तो आज भी ध्यान में है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" &lt;span style="color: red;"&gt;मेरी प्यारी स्वीट स्वीट कमला&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(&lt;span style="color: lime;"&gt;इसके बाद लाल स्याही से एक बड़ा सा दिल बना हुआ था,जिसमे जबरदस्त ढंग से तीर घुसा हुआ था..खून के छींटे इधर उधर बिखरे पड़े थे और हर बूँद में कमला कमला लिखा हुआ था) &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;ढेर सारा किस "यहाँ ".."यहाँ".. "यहाँ"..." यहाँ&lt;/span&gt; "....&lt;br /&gt;&lt;span style="color: lime;"&gt;(उफ़ !!! अब क्या बताएं कि कहाँ कहाँ ) &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;तुम क्यों मुझसे इतना गुस्सा हो..दो बार से आ रही हो, न मिलती हो, न बात करती ही,ऐसे ही चली जाती हो..अपने दूकान में बैठा दिन रात मैं तुम्हारे घर की तरफ टकटकी लगाये रहता हूँ कि अब तुम कुछ इशारा करोगी,अब करोगी..पर तुमने इधर देखना भी छोड़ दिया है..क्या हुआ हमारे प्यार के कसमे वादे को? तुम इतनी निष्ठुर कैसे हो गयी कमला..?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;( &lt;span style="color: lime;"&gt;काफी लंबा चौड़ा पत्र था.. अभी पूरा तो याद नहीं, पर कुछ लाजवाब लाइने जो आज भी नहीं झरीं हैं दिमाग से वे हैं -)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: lime;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;देखो तुम इतना तेज सायकिल मत चलाया करो..पिछला बार जब इतना फास्ट सायकिल चलाते मेरे दूकान के सामने से निकली ,घबराहट में दो किलो वाला बटखरा मेरे हाथ से छूट गया और सीधे बगल में बैठे पिताजी के पैर पर गिरा..पैर थुराया सो थुराया..तुम्हे पता है सबके&amp;nbsp;सामने&amp;nbsp;मेरी कितनी कुटाई हुई..सब गाहक हंस रहा था..मेरा बहुत बुरा बेइजत्ती हो गया...लेकिन कोई गम नहीं ...जानेमन तुम्हारे लिए मैं कुछ भी सह सकता हूँ...&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;और तुम आम गाछ पर इतना ऊपर काहे चढ़ जाती हो....उसदिन तुम इतना ऊंचा चढ़ गयी थी, तुम्हारी चिंता में डूबे मैंने गाहक के दस के नोट को सौ का समझकर सौदा और अस्सी रुपये दे दिया ..वह हरामी भी माल पैसा लेकर तुरंत चम्पत हो गया..लेकिन तुम सोच नहीं सकती पिताजी ने मेरा क्या किया...प्लीज तुम ऐसा मत किया करो..&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;बसंत अच्छा लड़का नहीं है.कई लड़कियों के साथ उसका सेटिंग है...तुम्हारे बारे में भी वह गन्दा गन्दा बात करता है, तुम मिलो तो तुमको सब बात बताएँगे...तुमको पहले भी तो मैं बताया हूँ फिर भी तुम उससे मिलती हो,हंस हंस के बात करती हो..क्यों करती हो तुम ऐसा...वह तुम्हे पैसा दे सकता है,बहुत है उसके पास..पर प्यार मैं तुम्हे दूंगा..&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;...... .......... ............&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह कमला कौन थी और उसकी निष्ठुरता का कारण क्या था,यह जानने की उत्सुकता हमारी वर्षों बरकरार रही...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* * * &lt;br /&gt;देह दशा में हमसे बस बीस ही थी श्यामा ( हमारा किया नामकरण ) ,पर उसकी शारीरिक क्षमता हमसे चौगुनी थी..जब कभी हम बाज़ार जाते और सामान का वजन ऐसा हो जाता कि लगता अब इज्जत का विचार त्याग उसे सर पर उठा ही लेना पड़ेगा, श्यामा संकट मोचन महाबलशाली हनुमान बन हमारा सारा भार और संकट हर लेती..या फिर जब महीने दो महीने में कभी छात्रावास का पम्प खराब हो जाने की वजह से पहले माले तक के हमारे बाथरूम में समय पर पानी न पहुँच पाता और कम्पाउंड के चापाकल से पानी भर बाथरूम तक पानी ले जाने की नौबत बनती ,जहाँ मैं और सविता मिल एक बाल्टी पानी में से आधा छलकाते और पंद्रह बार रखते उठाते कूँख कांखकर आधे घंटे में पानी ऊपर ले जाते थे,श्यामा हमारे जम्बोजेट बाल्टियों में पूरा पानी भर दोनों हाथों में दो बाल्टी थाम, एक सांस में ऊपर पहुंचा देती थी.चाहे शारीरिक बल का काम हो या उन्घाये दोपहर में क्लास अटेंड कर हमारे फेक अटेंडेंस बना हमारे लिए भी सब नोट कर ले आने की बात , सरल सीधी हमारी वह प्यारी सहेली हमेशा मुस्कुराते हुए प्रस्तुत रहती थी..असीमित अहसान थे उसके हमपर..हम हमेशा सोचा करते कि कोई तो मौका मिले जो उसके अहसानों का कुछ अंश हम उतार पायें...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईश्वर की कृपा कि अंततः एक दिन हमें मौका मिल ही गया..कुछ ही महीने रह गए थे फायनल को, फिर भी दोपहर की क्लास बंक कर हम होस्टल में सो रहे थे और सदा कि भांति श्यामा पिछली बैंच पर बैठ हमारा अटेंडेस देने और नोट्स लाने को जा चुकी थी..गहरी नींद में पहुंचे अभी कुछ ही देर हुआ था कि हमें जोर जोर से झकझोरा गया..घबरा कर अचकचाए क्या हुआ क्या हुआ कह धड़कते दिल से हम उठ बैठे..देखा श्यामा पसीने से तर बतर उखड़ी साँसों से बैठी हुई है.. पानी वानी पीकर जब वह थोड़ी सामान्य हुई तो पता चला कि आज बस भगवान् ने खड़ा होकर उसकी और हमारे पूरे ग्रुप की इज्जत बचाई है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुआ यूँ कि जब वह क्लास करने जा रही थी, गेट से निकली ही थी कि छात्रावास की डाक लेकर आ रहा डाकिया पता नहीं कैसे उससे कुछ दूरी पर गिर गया और उसका झोला पलट गया..श्यामा उसकी मदद करने गयी और बिखरी हुई चिट्ठियां बटोर ही रही थी कि उसकी नजर एक सबसे अलग ,सबसे सुन्दर लिफ़ाफ़े पर पडी जिसपर कि उसीका नाम लिखा हुआ था..डाकिये को किसी तरह चकमा दे उसने अपना वह पत्र पार किया था और जो बाद में खोला तो देखा उसके नाम प्रेम पत्र था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी बात सुन पल भर को थरथरा तो हम भी गए..पर फिर उसे ढ़ाढस बंधा हमने इसकी तफ्शीस शुरू की..पता चला कि यह युवक श्यामा से कुछ महीने पहले किसी रिश्तेदार की शादी में मिला था और उससे इतना अधिक प्रभावित हुआ था कि उसने श्यामा के घर विवाह का प्रस्ताव भेजा था..श्यामा के समाज में रिश्ते लड़कीवाले नहीं लड़केवाले मांगने आते थे और जैसे नखरे हमारे समाज में लड़केवालों के हुआ करते हैं,वैसे इनके यहाँ लड़कीवालों के हुआ करते थे.. चूँकि इनके समाज में उन दिनों पढी लिखी लड़कियों की बहुलता थी नहीं, तो श्यामा जैसी लड़कियों का भारी डिमांड था. थे तो वे एक ही बिरादरी के और लड़का काफी पढ़ा लिखा और अच्छे ओहदे पर था, पर शायद कुछ पारिवारिक कारण रहे होंगे जो श्यामा के परिवार को यह रिश्ता स्वीकार्य नहीं था..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, हम तो हिस्ट्री ज्योग्राफी जान जुट गए प्रेम पत्र पढने में..लेकिन जो पढना शुरू किया तो दिमाग खराब हो गया..छः सात लाइन पढ़ते पढ़ते खीझ उठे हम..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" ई साला शेक्सपीयर का औलाद, कैसा हार्ड हार्ड अंगरेजी लिखा है रे...चल रे, सबितिया जरा डिक्सनरी निकाल,ऐसे नहीं बुझाएगा सब ..." और डिक्सनरी में अर्थ ढूंढ ढूंढ कर पत्र को पढ़ा गया..एक से एक फ्रेज और कोटेशन से भरा लाजवाब साहित्यिक प्रेम पत्र था... पत्र समाप्त हुआ तबतक हम तीनो जबरदस्त ढंग से युवक के सोच और व्यक्तित्व से प्रभावित हो चुके थे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गंभीर विमर्श के बाद&amp;nbsp; हमने श्यामा को सुझाव दिया कि पढ़े लिखे सेटल्ड सुलझे हुए विचारों वाले ऐसे लड़के और रिश्ते को ऐसे ही नहीं नकार देना चाहिए...न ही जल्दीबाजी में हां करना चाहिए न ही न.. कुछ दिन चिट्ठियों का सिलसिला चला, उसके सोच विचार के परतों को उघाड़ कर देख लेना चाहिए और तब निर्णय लेना चाहिए.ठीक लगे तो माँ बाप को समझाने का प्रयास करना चाहिए.और जो वे न माने तो प्रेम विवाह यूँ भी उनके समाज में सामान्य बात है.. नौबत आई तो यहाँ तक बढा जा सकता है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो&amp;nbsp;निर्णय हुआ&amp;nbsp;कि इस पत्र का जवाब दिया ही जाय..लेकिन समस्या थी, कि जैसा पत्र आया था,उसके स्तर का जवाब, जिससे श्यामा की भी धाक जम जाए, लिखे तो लिखे कौन..श्यामा तो साफ़ थी, क्या अंगरेजी और क्या साहित्यिक रूमानियत.. सविता की अंगरेजी अच्छी थी, तो हम&amp;nbsp;पिल पड़े उसपर&amp;nbsp;...खीझ पड़ी वह- &lt;br /&gt;" अबे, अंगरेजी आने से क्या होता है, लिखूं क्या, हिस्ट्री पोलिटिकल साइंस " ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात तो थी...सब पहलुओं पर विचार कर यह ठहरा कि साहित्यिक स्तर का प्रेम पत्र अगर कोई लिख सकता है तो वह मैं ही हूँ..पर मेरी शर्त थी कि मैं लिखूंगी तो हिन्दी में लिखूंगी..तो बात ठहरी पत्र हिन्दी में मैं लिखूंगी, सविता उसका इंग्लिश ट्रांसलेशन करेगी और फिर श्यामा उसे अपने अक्षर में फायनल पेपर पर उतारेगी.. इसके बाद अभियान चला लेटर पैड मंगवाने का , क्योंकि अनुमानित किया गया था कि जिस पेपर और लिफ़ाफ़े में पत्र आया है एक कम से कम बीस पच्चीस रुपये का तो होगा ही होगा ,तो जवाब में कम से कम दस का तो जाना ही चाहिए..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जीवन में पहली बार (आगे भी कुछ और) मैंने जो प्रेम पत्र लिखा, अपनी उस सहेली के लिए लिखा, जबकि उस समय तक मेरा कट्टर विश्वास था कि मुझे कभी किसी से प्रेम हो ही नहीं सकता,यदि मेरा वश चले तो जीवन भर किसी पुरुष को अपने जीवन और भावक्षेत्र में फटकने न दूं, क्योंकि पुरुष, पिता भाई चाचा मामा इत्यादि इत्यादि रिश्तों में रहते ही ठीक रहते हैं, स्त्री का सम्मान करते हैं,एक बार पति बने नहीं कि स्त्री स्वाभिमान को रौंदकर ही अपना होना सार्थक संतोषप्रद मानते हैं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...............&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(स्मृति कोष से- )&lt;br /&gt;&amp;nbsp;***********&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-4115405869823170261?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/4115405869823170261/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=4115405869823170261&amp;isPopup=true' title='45 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/4115405869823170261'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/4115405869823170261'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='प्रेम पत्र....'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>45</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-8657650463629718245</id><published>2011-05-10T13:05:00.000+05:30</published><updated>2011-05-10T13:05:25.302+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कथा'/><title type='text'>मन के माने -</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;(भाग-३)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठाकुर जी ने त्यागा अपना मंदिर आ दिन भर डोलते रहते थे सेवक के संग संग..उनसे पूछ पूछ उनके पसंद के ज्योनार तैयार करता सेवक तो ठाकुर जी भी हर काम में उसकी मदद करते..दो जने मिलते तो झटपट निपट जाता सारा काम ..और जैसे ही सेवक निपटता,ठाकुर जी उसे साथ लेकर तरह तरह के खेल खेलने में व्यस्त हो जाते..जिस सेवक ने कभी जाना ही नहीं कि बचपन क्या होता है, मुरलीधर के साथ बालपन का स्वर्णिम सुख लूट रहा था..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिनों तक तो लीला आश्रम प्रांगण में ही सिमटी रही पर धीरे धीरे यह बाहर भी निकली...अब दोनों जने आश्रम की गायों, ढोरों आदि को ले दूर जंगल में निकल जाते और उहाँ पहुँच जो ठाकुर जी बंसी की धुन छेड़ते तो जंगल के सभी जीव जंतु आकर इन्हें घेर लेते..जल्दी ही जंगल के कई चरवाहे आकर इनके मित्र बन गए और फिर नित्यप्रति ही मंडली आश्रम में जीमने लगी..सब जने जमा होते आ खूब पूरी कचौड़ी उड़ाई जाती..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजे तो खूब थे,लेकिन गड़बड़ी यह हुई कि बाबा जी का साल भर के लिए जमा किया हुआ राशन पानी का स्टाक बीस बाइस दिन जाते जाते झाँय हो गया..सेवक घोर चिंतित कि अब ठाकुर जी को क्या खिलाया जाय..इधर ठाकुर जी का खुराक भी चार गुना हो गया था..जब तब सेवक से किसी न किसी आइटम की फरमाइश किया करते थे..अनाज का जुगाड़ कहाँ से किया जाय, इसका कोई आइडिया नहीं था बेचारे को..अंत में उसने युक्ति निकाली.. अक्सर ही वह देखता था, बाबा एकादशी या कोई अन्य तिथि बताकर फलाहार या उपवास किया करते थे..अब उन्हें उपवास तो नहीं करवा सकता था , पर आश्रम में फल मूल इतने थे कि फलाहार के नाम पर आराम से कई दिनों तक इनपर गुजर हो सकता था..तो अगले दिन से कभी एकादशी तो कभी कोई और तिथि बताकर वह ठाकुर जी को तरह तरह के फल जुटाकर खिलाने लगा.उनके जो संगी साथी आते ,उन्हें भी फलाहार ही कराता..पर हाँ,इतना था कि अपने लिए वह इन फलों का न्यूनतम उपयोग किया करता, ताकि अधिकाधिक समय तक इनसे काम चला सके..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महीने भर के जगह पर सवा महीने लगा दिए बाबा जी ने वापस आने में और तबतक तो यह हालत हो गई थी कि कई दिनों से ठाकुर जी को फल जिमाकर सेवक खुद केवल जल पर ही दिन काट रहा था..बाबा जी के इन्तजार का एक एक घड़ी उसको पहाड़ लग रहा था..जैसे ही बाबा जी को उसने देखा,उसके जान में जान आई.भागकर वह बाबा के चरणों में लोट गया..पर उसकी जीर्ण स्थिति देख बाबा चिंतित हो गए..उन्हें अंदेशा हुआ कि कहीं सेवक को किसी रोग वोग ने तो नहीं धर&amp;nbsp;लिया.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा ने पूछताछ शुरू की और जो कारण यह जाना कि अन्न के बिना सेवक की यह हालत है..कुल भण्डार निपट चुका है...बाबा को अपने कानो पर विश्वास नहीं हुआ. लम्बे डग भर वे भण्डार में पहुंचे..बात सत्य थी..बाहर नजर घुमाई तो देखा पेड़ों पर फूल बतिया के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं..बाबा परेशान कि ऐसा कैसे हो सकता है कि एक वर्ष का अन्न महीने भर में कोई खा जाय ,आ और तो और फलों से लदे रहने वाले बगीचे में पेड़ों पर बतिया भी न बचे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तरह तरह की आशंकाओं से बाबा का दिमाग भर गया. कड़ककर उन्होंने सारा हिसाब माँगा ...और जो भी था,पर सेवक की इमानदारी पर कभी किसीने शक न किया था.अपने पर इल्जाम लगता देख सेवक तिलमिला उठा और बताने लगा कि कब कैसे क्या खर्च हुआ..ठाकुर जी ने कब क्या खाया और उनके दोस्तों ने कितनी दावतें उड़ाई..बाबा कड़के..क्या कहा,ठाकुर जी ने सब खाया..कैसे खाया...ठाकुर जी कैसे खा सकते हैं ???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेवक के आँखों से आंसू झरने लगे..बाबा का पारा सातवें आसमान पर ..एक तो चोरी,ऊपर से रो के दिखा रहा है..बाबा दहाड़े ..ठाकुर जी पर इल्जाम लगाता है..ठाकुर जी खाते हैं,चल खिला कर दिखा ठाकुर जी को..देखूं कैसे खाते हैं ठाकुर जी..यह कहकर उन्होंने रास्ते के चने चबेने वाली पोटली फेंकी सेवक की ओर..थाली में उसे सजाकर सेवक पहुंचा ठाकुर जी के मंदिर..दिल तो उसका चाक चाक हुआ जा रहा था पर चबेना पाते ही सबसे पहले उसके दिमाग में यह आया कि चलो अच्छा हुआ बाबा की पोटली से ठाकुर जी के खाने का इंतजाम हो गया ,नहीं तो कई दिन से बेचारे फलाहार पर ही समय काट रहे थे.. उत्साहित मन वह ठाकुर जी को खिलाने पहुंचा..उसने सोचा , चलो पहले प्रभुजी को यह खिला दिया जाय..फिर तो आपै आप वे मेरी गवाही दे ही देंगे, मुझे कुछ कहने की जरूरत ही कहाँ रहेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर यह क्या, सामने परोसी थाली, इतने दिन से अन्न को तरस रहे ठाकुर जी पर आज वे अन्न को हाथ ही नहीं लगा रहे..खूब अनुनय विनय की सेवक ने, पर प्रभु होठों पर मुरली धरे पत्थर की मूरत बने हुए..सेवक परेशान कि ये क्या बात हुई..रोज तो मांग मांग कर परेशान कर देते थे और आज ये सामने परोसी थाली छोड़कर मूरत क्यों बने हुए हैं..और उधर बाबा, आपे से बाहर..अपने हाथ की छडी ले वे पिल पड़े सेवक पर..उसे झूठा, चोर ,धोखेबाज़ ,मक्कार और न जाने क्या क्या कहने लगे..अपने आप को वे ठगा महसूस कर रहे थे, क्योंकि सेवक पर अपार विश्वास किया था उन्होंने.. क्रोध के अतिरेक ने उनका धैर्य क्षमा वैराग्य, सब बहा दिया था..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेवक रोता जाता था और अपने को बेक़सूर बताता जाता था. उसका दिल अलग फटा जा रहा था कि देखो जिसकी इतने दिन से इतने मन से सेवा की, जो मुझे दोस्त दोस्त कहते न थकता था, उसके सामने मेरी सब गति हो रही है,मुझे चोर धोखेबाज ठहराया जा रहा है और वह चुपचाप खड़ा सुन रहा है..माथा पीट पीटकर वह रोने लगा..और तब प्रभु प्रगटे और भोजन की थाल लेकर खुद भी खाने लगे और सेवक के मुंह में भी डालने की चेष्टा करने लगे..हवा में लटका थाल ,हवा में जाता हुआ कौर तो बाबा जी को दिखा पर आधार उन्हें न दिखा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उन्हें समझते देर न लगी कि सेवक ने झूठ नहीं कहा था..प्रभु ने सचमुच सेवक की सेवा प्रत्यक्ष होकर स्वीकारी थी...अब चूँकि उनकी आँखों पर माया और अविश्वास का चश्मा चढ़ा हुआ था, तो ठाकुर जी का साकार रूप दीखता कैसे ..कितने अभागे हैं वे और कितना भाग्यवान है सेवक..रोम रोम में रोमांच भर आया बाबा के..आँखों से अविरल अश्रुधारा बरस पड़ी..कातर भाव से कह उठे, प्रभु,मुझपर भी दया करो, मुझे भी दर्शन दे दो प्रभु...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जब मन ने समस्त आवरण उतार प्रभु दर्शन और मिलन की उत्कट अभिलाषा की बाबा ने, भक्ति शिखर पर पहुँच कातर याचना की ... प्रभु नयनाभिराम हो उठे..विह्वल हो उठे बाबा. आज जन्म सार्थक हो गया था उनका. आज उन्हें समझ में आया था कि आजतक वे प्रभु की जो सेवा करते थे, वह धार्मिक कर्मकांड मान करते थे,जिससे उनकी आध्यात्मिक उन्नति होती..उनके मन मस्तिष्क ने यह कभी माना नहीं था कि प्रभु साकार रूप में भी भक्तों के बीच उन जैसे ही बनकर रहते हैं...और जब माना नहीं था तो इस असंभव की अभिलाषा भी उन्होंने कभी नहीं की थी.लेकिन सेवक, उसको उन्होंने जो कहा सेवक ने निर्मल भाव से उसे मान लिया और उसके मन के विश्वास ने निराकार को साकार कर दिया.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त इस तरह कथा हुई संपन्न...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिशुभम !!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;हम अक्सर कहते सोचते रहते हैं, अमुक अमुक बुराई हम छोड़ना चाहते हैं,यह यह अच्छा करना चाहते हैं,ऐसा अच्छा बनना चाहते हैं,पर क्या करें ,हमसे हो नहीं पाता.. कुल्लमकुल हथियार डाल देते हैं पहले ही.. याद नहीं रख पाते कि मन के माने हार है,मन के माने जीत.पहले मन को कन्विंस कर के अपने अन्दर के बुराई,कमजोरी का समूल नाश करने का यदि हम प्रण ले लें ,तो पत्थर के ईश्वर यदि साकार हो सामने उपस्थित हो सकते हैं,तो ऐसा क्या है जो हम नहीं कर सकते..&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-----------------------------&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-8657650463629718245?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/8657650463629718245/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=8657650463629718245&amp;isPopup=true' title='43 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/8657650463629718245'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/8657650463629718245'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/05/blog-post_10.html' title='मन के माने -'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>43</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-2893797646106852874</id><published>2011-05-03T13:25:00.002+05:30</published><updated>2011-05-03T13:28:58.690+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कथा कहानी.'/><title type='text'>मन के माने ...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;(भाग&amp;nbsp;-&amp;nbsp;२)&lt;/div&gt;सबकुछ बड़ा बढ़िया चल रहा था कि एक दिन बाबा के गुरुभाई ने अपने शिष्य के हाथों बाबा को खबर भिजवाई की जीवन की अंतिम घड़ी में वे उनका सानिध्य सुख चाहते हैं.उनकी अस्वस्थता ऐसी है की किसी भी घड़ी साँसों को समेटना पड़ सकता है.. अपने आत्मीय की रुग्णता की खबर ने बाबा को व्याकुल कर दिया और तत्क्षण वे चलने को उद्धत हो उठे , पर अचानक उनके उठे पैर ठिठक गए..उन्हें ख़याल आया की आश्रम तो सेवक सम्हाल लेगा,पर ठाकुर जी की पूजा सेवा कौन करेगा..इस सम्पूर्ण प्रक्रिया से तो वह पूर्णतः&amp;nbsp;अनभिज्ञ&amp;nbsp;है ...और ऐसा कि यह इतनी लम्बी चौड़ी प्रक्रिया कोई दो घड़ी में तो सिखाई नहीं जा सकती थी..बाबा अत्यंच चिंतित.. परेशान... कि क्या करें, क्या न करें..पर सेवक अपने मालिक को चिंतित रहने देता ? उसने आश्वस्त किया कि कौनो चिंता न करें,बस क्या करना है ई बता दें, सब हो जायेगा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा दिमाग लगाये कि इतना कम टाइम में मंतर उंतर रटाने और विधि कंठस्थ कराना तो संभव है नहीं , सो इसको इसकी समझ के हिसाब से ऐसे सब समझाते हैं कि रटाया हुआ बात बराबर इसके ध्यान में रहे और ठाकुर जी का पूजा सेवा ठीक ठाक होता रहे..तो बाबा सेवक को समझाने लगे...देखो बचवा, ई जो ठाकुर जी हैं न, हमरे मालिक,हमरे प्राण ही नहीं हमरे बच्चे जैसे भी हैं, जितना और जैसा सेवा तुम हमरा करते हो, उससे भी दस गुना आगे बढ़कर इनका करना ..इनका खूब खूब खूब ख़याल रखना... टोटल में ई समझ लो कि पहले जैसे धनिकराम जी की और अब मेरी सेवा तुम करते हो उससे दस गुना आगे बढ़कर तुम इनकी करना और अब आज से इन्हें ही अपना मालिक समझना...फिर शार्ट कट में उन्होंने सेवक को समझा दिया कि ठाकुर जी को ऐसे सुबह में उठाना है, नहलाना धुलाना, चन्दन टीका लगाना है, फूल माला इत्यादि से श्रिंगार कर चारों पहर खूब प्रेम से उन्हें भोजन कराना है.. और जो वो भोजन कर लें, तभी स्वयं प्रसाद खाना..सब समझा बुझा के बाबा ने भण्डार की चाभी ,जिसमे कि साल भर से अधिक का राशन संरक्षित था, सेवक को पकडाया और निकल पड़े गंतब्य की ओर.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठाकुर जी को दुपहरिया तक का भोजन पानी तो बाबा ने करा दिया था,सेवक का ड्यूटी उसके बाद से शुरू हुआ. आजतक सेवक ठाकुर जी के मंदिर गया न था,उसका ड्यूटी बाहरे बाहरे रहता था, इसलिए उधर के हाल चाल का उसे कोई अंदाजा न था..लेकिन बाबा ने जितना भरोसा उसपर किया था और जो जिम्मेदारी उसको दिया था तो हर हालत में सेवक ने उसपर खरा उतरना ही था..तो उसने अपने अगले कर्तब्य की ओर ध्यान लगाया और सोचा कि अभी तो ठाकुर जी भोजन कर विश्राम कर रहे होंगे,तो चलो चलकर उनका गोड़ दबा देते हैं, उन्हें बड़ा सुख मिलेगा.. यह सोच हौले से किवाड़ खोल वह अन्दर गया...पर यह क्या, अन्दर पहुँच देखता क्या है कि ठाकुर जी का बिछौना एक तरफ आ ठाकुर जी दूसरे तरफ..होंठों पर बंसिया धरे आ टांग में टांग फंसाए मुस्कुराते हुए खड़े हैं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेवक को लगा, हो सकता है अभी इनका सोने का मूड न हो, बंसिया ही बजाना चाहते हों..तो कल जोड़ कर उनके सामने बैठ गया और पुचकारते हुए बोला..ठीक है मालिक, चलिए बंसिया ही बजाइए, हम सुन रहे हैं..और टकटकी लगाकर उनके तरफ देखने लगा..बड़ी देर हो गई इन्तजार करते..सेवक हर थोड़ी देर पर बोलता....हूँ ... तो मालिक सुरु किया जाय, हम सुन रहे हैं..पर पोजीशन वही का वही..सेवक परेशान, कि ई का बात हो गई भला, ठाकुर जी सुरु काहे नहीं कर रहे..इतना बोल रहे हैं ,पर न हूँ कर रहे हैं न हाँ..आ बजाने का तो सवाल ही नहीं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर सेवक ने दिमाग लगाया..आज पहला बार हमको देखे हैं न..हो सकता है इसीलिए हमरे सामने झिझक रहे हैं.. चलो,यहाँ से निकल के किवाड़ उन्ग्ठा देते हैं, अकेले में सायद गा बजा लें..ई सायद सेवक का ही गलती है..काहेकि बाबा जी भी खिला पिलाकर ठाकुर जी को एकांत में छोड़ देते थे..जबतक उनका मन होता होगा बजाते होंगे और जब मन करता होगा सो जाते होंगे..कान पकड़ कर माफी मांग सेवक बाहर निकल आया और बाग़ बगीचे की सफाई कर शाम का खाना बनाने में जुट गया..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संध्या हुई और सेवक दिया बत्ती करने मंदिर में पहुंचा..किवाड़ खोलता है तो देखता क्या है कि अभीतक ठाकुर जी उसी पोज में खड़े हैं..सेवक परेशान !!! ई क्या बात हुई है..न हिल रहे हैं, न डोल रहे हैं न बंसिया बजा रहे हैं क्या हो गया इन्हें..आ इतने देर से ऐसे खड़े खड़े जो हाथ पैर मोड़े हुए हैं, सब तो अकड़ उकड़ गया होगा..सेवक उनसे हाल चाल , समस्या पूछने में डट गया कि मालिक कहें तो उनके हिसाब से सेवा करे..पर मालिक तो मौन के मौन..थक गया सेवक पूछते पूछते पर मालिक ने तो जैसे मौन व्रत धर लिया था. चिंता से व्याकुल सेवक, कि ऐसी क्या भूल हो गई उससे कि मालिक अनबोला व्रत ले लिए...उसे याद आया कि कभी कभी जब धनिकराम उससे खिसिया जाते थे तो ऐसे ही चुप्पी साध लेते थे और कुछ करके भी न बोलते थे..ऐसे समय में उनके आगे पीछे डोल कितनी मिन्नतें करनी पड़ती थी, कितना सेबना पड़ता था .. तभी उसे ख़याल पड़ा कि इ सब चक्कर में तो रात ही हो गया और ठाकुर जी को खाना ही नहीं दिया उसने..घबराकर कान पकड़ माफी मांगते और मन में अनुमान लगाते कि हो सकता है इसके वजह से मालिक औरो खिसिया गए होंगे, वह खाना लाने भागा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खूब बढ़िया से परोसकर और उनके सामने चौका लगाकर भोजन लेकर वह बैठ गया और मिन्नतें करने लगा कि अब गुस्सा छोडो और दो कौर खा लो प्रभु..पर प्रभुजी, न टस न मस..अनुनय विनय करके जब थक गया सेवक तो ख़याल आया शायद इसी लिए बाबा बोले थे कि ई खाली हमरे मालिक नहीं संतान सामान हैं..अब देखने में भी तो इतने छौने से ही हैं आ बाबा भी तो लगता है दुलार उलार करके इनको तनिक जादा ही सनका दिए हैं, इसलिए तो ऊ ऐसे हठी बने हुए हैं...अब कैसे समझाएं इन्हें..ई जो दुनू हाथ से बंसुरिया धरे हैं,पाहिले उसको छोड़ें तभी न भोजन ओजन करेंगे..बस आगे बढ़ सेवक ने मुरलिया छीन कर धर दी एक तरफ और लगा हाथ को सीधा करने...गजब का चमत्कार हुआ ,ठोस पत्थर के उस मूरत का हाथ बिना टूटे सीधा हो गया और मुरलिया सेवक के हाथ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेवक को पहली जीत मिली..और उसे समझ आ गया कि अधिक दुलारने से यहाँ बात नहीं बनेगी..छोटे से छौने से ही तो हैं ठाकुर जी, ठीक हैं कि मालिक यही हैं, पर इन्हें तनिक अनुशासन में रखना पड़ेगा..चलो यह तो हो गया..अब जरा इन्हें खिला देना है और फिर जम के इनका तेल पानी कर देना है, ताकि इनका अकडा हाथ पैर तनिक सीधा हो जाए..पर पुचकारते पुचकारते भोर हो गया और ठाकुर जी भोजन करने चौके पर जीमे ही नहीं..सेवक को लगा कि हो सकता है बाबा जी का विछोह ठाकुर जी से नहीं सहा जा रहा होगा, इसीलिए भोजन भात त्यागे हुए हैं..सो तनिक मन वन बहलाना पड़ेगा इनका ताकि इनका ध्यान बँट जाए आ ई खाने को राजी हो जाएँ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर क्या था, जितने स्वांग सेवक भर सकता था, उसने ठाकुर जी के सामने भर लिए..नाचा, गाया, ढोल मृदंग बजाई,तरह तरह के मुंह बनाकर ,चुटकुले सुनाकर उनका मन मोहने की कोशिश की, पर सब बेकार गया..अगला दिन भी पूरा दिन ऐसे ही बीत गाया. तीसरा दिन भी ऐसे ही निकला..सेवक कभी बुकार फाड़ के रोये ,कभी गाये ,कभी पुचकारे,पर किसी बात का कोई असर उनपर हो ही नहीं रहा था..इस बीच ठाकुर जी को बिछौने पर सुला और तेल पानी लगाकर सेवक ने उनके पैर भी सीधे कर दिए थे..अब उसे कोई उपाय न सूझ रहा था,जो कर वह काम बना पाता..तब आया सेवक को गुस्सा..उसने सोचा ,जो बाबा जी लौटकर आयेंगे और देखेंगे कि इसने खाना पीना त्याग अपना हाल बेहाल कर लिया है, तो कितना दुखी होंगे..तो चलो जो प्यार से बात नहीं बन रही है तो रार से ही सही...बस बाहर जा एक मोटा सोंटा ले सेवक लौटा और ठाकुर जी पर चिन्घारा..ढेर हुआ प्यार दुलार..जदि दो पल के अन्दर उठकर अच्छे बच्चे की तरह खाना नहीं खाया न..तो आज ठीक ठाक मरम्मत करूँगा आपकी, फिर चाहे बाबाजी मेरी जान ले लें..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और चमत्कार हुआ..जैसे ही सेवक ने सोंटा घुमाया, मुरलीधर अच्छे बच्च की तरह आकर चुपचाप बैठकर खाने लगे..सेवक के हाथ का सोंटा जहाँ का तहां स्थिर रह गया और सारा गुस्सा झरकर आँखों से बहने लगा..जो मन गुस्से से जल रहा था ,उतनी ही तीव्रता से ग्लानि की आग में दहकने लगा..कि आजतक किसी भी मालिक के आगे जो आँखें सीधी न उठी थीं, वो आज इनके सामने न केवल उठीं बल्कि इन्हें मारने को भी चल निकला था वह..धडाम से सेवक गिर पड़ा स्वामी के चरणों में.. ठाकुर जी ठठाकर हंस पड़े..और सेवक को उठाते हुए बोले..अरे मैं तो चुहल कर रहा था..तुम्हे पता नहीं मुझे स्वांग भरने, खेलने में कितना आनंद आता है..अब चुप भी करो,मुझे खाने दोगे कि नहीं, तीन दिन से भूखा हूँ..चलो जाओ, भागकर जरा चटनी और ले तो आओ ,कितनी स्वादिष्ट बनी है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन भर आया सेवक का,गला रुंध गाया..भागा वह चटनी लेने..खूब प्रेम से परोस परोस आग्रह कर कर के उसने भोजन कराया ठाकुर जी को..भोजन कर चुके तो ठाकुर जी ने भी पुचकार पुचकार कर सेवक को खाना खिलाया..और फिर आग्रह कर उसे अपने कक्ष में ही ठहरा लिया..अब, आगे का का बताएं भैया ...फिर तो लीला ही लीला,,लीला ही लीला..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रमशः :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;---------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-2893797646106852874?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/2893797646106852874/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=2893797646106852874&amp;isPopup=true' title='27 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/2893797646106852874'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/2893797646106852874'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='मन के माने ...'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>27</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-5342958888596787764</id><published>2011-04-28T17:07:00.002+05:30</published><updated>2011-05-03T13:30:44.240+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>मन के माने -</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;(भाग -&lt;strong&gt;१&lt;/strong&gt;)&lt;/div&gt;ढेर दिन तक लिखाई पढ़ाई से किनारे रहो तो दिमागी हालत एकदम से भोथराये गंदलाये काई कोचर आ जलकुम्भी से युक्त उस पोखरिया सी हो जाती है जो ढेर दिन तक बिना पानी के आवक जावक,आमद खर्चा के सीमित परिधि में कैद रहे.. विचार प्रवाह भी ढेरे दिन तक कुंद बाधित रहे तो दिमाग का हालत कुछ ऐसा ही बन के रह जाता है..और दीर्घ अंतराल उपरांत इससे उबरने का कोशिस करो भी तो बुझैबे नहीं करता कि शुरुआत कहाँ से किया जाय...का पढ़ा जाय, का लिखा जाय....भारी भारी कन्फ्यूजन !!! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर जो हो, निकलना तो पड़ेगा ही इससे..तो करते ऐसा हैं कि इससे उबरने को ऊ नुस्खा आजमाते हैं,जो माइंड रिफ्रेश करने ,अनमनाहट भागने के लिए हम बचपन में किया करते थे. छुटपन में जब कभी मन ऐसे ठंढाता सुस्ताता था, इसका उंगली पकड़, इसको खिस्सा कहानी का स्वप्निल संसार में ले जा के घुमा आते थे, आ बस एक बार उधर से हो के ई आया नहीं कि कई कई दिन तक एकदम चकचकाया रहता था.. अब ऐसा है कि ई काम हम अकेले अपने आप में भी कर सकते हैं..पर का है कि चित्त को जबतक उत्तरदायित्व का रस्सा से कस न दीजिये, इसका सुस्ती और फरारीपना ख़तम नहीं होता... इसलिए इसको ई समझाए हैं कि खिस्सा आपको अपने लिए मने मन नहीं दोहराना है,बल्कि स्रोता समाज को सुनना है,आ कथावाचक का कर्तब्य तब समाप्त होता है जब खिस्सा समाप्त हो जाय..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त चलिए अब फालतू का बात बंद, आ सीधे खिस्सा शुरू :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तनिक पुराने ई उ ज़माने का खिस्सा है जब जल्मुक्त धरती पर जितने बड़े भूभाग में बस्ती बसा रहता था, उससे बीस तीस गुना बड़े भाग में जंगल पहार पसरा रहता था..आमजन बस्तियों में और समाज को दिशा देने वाले, आत्मा परमात्मा आ सत्य संधान में लगे रहने वाले साधु संतजन जंगलों में रहा करते थे..त ऐसे ही किसी बस्ती के बाहर दूर तक पसरे जंगल में छोटा सा पर फल फूलों से लदकद गाछ वृच्छों से घिरे अतिमनोरम, अतिपावन आश्रम में बाबा रामसुख दास जी का बसेरा था.. बाबा पहुंचे हुए संत थे..उनका पुन्य प्रताप आ सात्विकता ऐसा था कि आस पास का पूरा क्षेत्र पावन पुन्य तीर्थ बन गया था..वहां पहुँच मनुष्य तो क्या हिंसक पशु भी हिंसा भाव भूल परम शांति पाते थे.. माया के मारे लोग यदा कदा बाबा के आश्रम में पहुँच उनसे आशीर्वाद आ मार्गदर्शन ले जीवन सुखी सुगम बनाते रहते थे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जमाना कोई भी हो,अच्छे बुरे लोग हर समय संसार में हुआ करते हैं आ सात्विक धार्मिक लोग अपने आस पास घटित होते गलत को देख सदा ही दुखी उदास खिन्न ह्रदय समय को कोसते समय काटते रहते हैं.. ऐसे ही असंतुष्टों में माता लक्ष्मी के कृपापात्र सेठ धनिकराम भी थे ...घोर धार्मिक प्रवृत्ति के सेठ जी पर पता नहीं कितने जन्मों का वांछित संचित था कि उनको पत्नी, पुत्र सभी घोर धर्मभ्रष्ट मिले. असल में हुआ ई कि अधवयसु में बियाह किये थे और बियाह से पाहिले छानबीन किये नहीं कि चित्त प्रवृत्ति से स्त्री है कैसी. बस गरीब घर की कन्या की सुन्दरता देखी और उसे गुदड़ी का नगीना मान शीश पर सजा लिया. उनकी धारणा थी कि अभाव और दरिद्रता स्वाभाविक ही चरित्र को उदात्त बना देती है,ह्रदय को विशालता देती है.. पर विपरीत हुआ. स्त्री निकली घोर तामसिक प्रवृत्ति की.. उसको जो सबसे पहले खटका वह पति का धार्मिक सुभाव ही था. पति को अपने अनुरूप बनाने की उसने यथेष्ट चेष्टा की पर जब विफलता उसके हाथ लगी तो उग्र विद्रोहिणी ने अपने साथ साथ अपने संतानों को भी घोर पथभ्रष्ट बना लिया...पुत्रों के बड़े होने तक तो सेठ जी ने किसी तरह सब निबाहा पर उमर के साथ साथ माता के संरक्षण में उनकी उद्दंडता ऐसी बढ़ी कि धनिकराम जी अपने जीवन से ही ऊब गए..एक दिन जब अति हो गया तो उन्होंने घर त्याग दिया और जीवन त्याग देने के विचार से घर से निकल पड़े. घर से निकलते समय अपनी तरफ से तो उन्होंने सर्वस्व त्याग दिया था, पर विगत बीस वर्षों से छाया की भांति उनका साथ निभाने वाले उनके विश्वासपात्र सेवक सेवकराम ने उनका साथ ठीक इसी तरह न छोड़ा जैसे जीवन की अंतिम बेला तक धर्म मनुष्य का साथ नहीं छोड़ता.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस्ती बस्ती , जंगल जंगल भटकते भटकते दोनों बाबा रामसुखदास के आश्रम में पहुंचे.. धनिकराम आश्रम क्या पहुंचे, कि जैसे उनका पाप का कोटा ओभर आ पुन्न का कोटा ऑन हो गया...ऊ तो एकदम्मे जैसे नया जनम पा लिए. बाबा का सात्विक सानिध्य उनके लिए अलौकिक था....अध्ययन मनन, धर्म चर्चा, पेड़ पौधे तथा पशुओं की सेवा, आगंतुकों की सेवा आदि में स्वर्गिक आनंद पाते हुए उन्होंने अपना बचा समय अत्यंत सुखपूर्वक बिताया और फिर अपने प्रिय सेवक को बाबा को सौंप एक दिन स्वेच्छा से अपना जीर्ण शरीर त्याग गोलोकगमन किया..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेवकराम जन्मजात घोषित अभागा था..जन्मते ही माता जहान छोड़ चली थी और जो छः बरस का हुआ तो पिता भी माँ का साथ निभाने ऊ लोक को निकल पड़े.. जाते जाते अच्छा बस इ किये कि नन्हे सेवक को सेठ धनिकराम को सौंप गए ...पुश्तों से सेवक राम का परिवार धनिकराम परिवार का सेवक रहा था.. नमकहलाली उनके रगों में था.. नन्हे सेवक ने भी जनमघूंटी में ही यह पिया था कि इस धरती पर साक्षात दिखने वाले भगवान् के प्रतिनिधि, मालिक ही होते हैं.. भगवान् दुनिया के पालनहार और मालिक इनके पालनहार.. इसलिए इनके डाइरेक्ट भगवान् मालिक हैं.. मालिक का कहा हर वाक्य उसके लिए भगवान् का वाक्य था, उपेक्षा या संदेह का तो कोई प्रश्न ही न था..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माता के जाने का तो उसको ज्ञान न था, पिता गए तो खूब रोया था, क्योंकि लोग बाग़ रो रहे थे और उसे समझा रहे थे कि पिता जिस दुनिया में गए हैं, वहां से कभी लौटकर नहीं आयेंगे..लेकिन धनिकराम का जाना वह सह नहीं पा रहा था..धनिकराम एक साथ ही उसके माता पिता और मालिक सभी थे..हालाँकि मालिक ने उसकी निष्ठा बाबा को ट्रांसफर कर दी थी, इसलिए टहल बजाने में वह कोई कोताही नहीं बरतता था, पर दिल का घाव तो घाव ही था, ऐसे कैसे तुरंत मिट जाता...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर भाग का बलवान था सेवक ..धनिकराम चले भी गए तो जो वास उसे दे गए थे, वह बड़े बड़े दुखों के पहाड़ को पल में ढाह देने वाला था..ऊपर से बाबा का स्नेहिल व्यवहार..जल्दी ही सेवक के हृदयासन पर वे विराजित हो गए और पूरे प्राणपन से वह आश्रम तथा बाबा की सेवा टहल में लग गया.. उसके आसरे बाबा एकदम निश्चिन्त से होते चले गए. ठाकुर जी की पूजा और भोग आदि लगाने के कार्य के अतिरिक्त सभी उत्तरदायित्व सेवक ने अपने पर ले लिया..ऐसा भक्त चेला पा बाबा भी अपने भाग्य को सराहने लगे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रमशः :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;--------------------------------&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-5342958888596787764?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/5342958888596787764/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=5342958888596787764&amp;isPopup=true' title='40 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5342958888596787764'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5342958888596787764'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='मन के माने -'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>40</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-5227160380012976437</id><published>2011-03-11T14:33:00.003+05:30</published><updated>2011-04-28T17:12:27.516+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रष्टाचार'/><title type='text'>स्वाभिमान रैली ....</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;बहुत बहुत शिकायत है मुझे स्वयं से ,कि अतिसंक्षिप्त कलेवर में मैं कोई बात कह नहीं पाती..और उसपर भी यह विषय ??? इसपर तो बोलना न शुरू करूँ तो ही अच्छा है..क्योंकि मन मस्तिष्क में कैद यह एक ऐसा ज्वालामुखी है, जो यह फट जाए तो दूसरों को ही नहीं स्वयं को भी क्षत विक्षत कर डाले....यूँ यह विषय केवल मेरा ही नहीं, मुट्ठी भर उन लोगों को छोड़ जो इस रोग के पोषक प्रसारक हैं, बहुसंख्यक भारतवासी के लिए यह एक रोग,यह दंश एक ऐसा दंश है,जिससे शायद ही कोई ह्रदय ऐसा हो जो पीड़ित नहीं...&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आज अधिक कुछ कहूंगी नहीं..कुछ लिंक दे रही हूँ..देखें...&lt;br /&gt;सड़कें, सरकारी विद्यालय,चिकित्सालय,विभिन्न&amp;nbsp;&amp;nbsp;कार्यालय, मंत्रालय या जो तंत्र हमारे यहाँ संचालित है सरकार द्वारा ,उसे कौन चला रहा है ??? हम और आप...हम जो पैसे इन्हें देते हैं विभिन्न टैक्सों के माध्यम से उसपर सारी शान सवारी है...तो जो पैसा हम इन्हें देते हैं,उसका ये क्या करते हैं,यह&amp;nbsp;जानने का पूरा हक है हमें..हमारे पैसों पर ये&amp;nbsp;राजा और हम याचक...अब ये तो हमें हिसाब देंगे नहीं...तोचलिए उन स्रोतों तक पहुंचे जहाँ से थोड़ी बहुत जानकारी हमें मिल जाए...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जितने कुमार्गगामी साधु संत हमने जीवन में देखे&amp;nbsp;सुने&amp;nbsp;हैं, सहज ही&amp;nbsp; विश्वास करना कठिन होता है कि अमुक संत सचमुच सत्पुरुष होगा..पर ठीक है, सद्वाणी बोलने वाला, सत का प्रचार करने वाला, स्वयं कितना सदाचारी&amp;nbsp;है, इस विचार&amp;nbsp;को कुछ समय के लिए हम पूर्णतः किनारे रख दें और ध्यान उस जानकारी पर दें जो ये उपलब्ध करा रहे हैं...यूँ भी मुझे लगता है की अच्छी,कल्याणकारी बातें कौन कह रहा है यह ध्यान में रखने के स्थान पर यदि हम&amp;nbsp; केवल&amp;nbsp;कल्याणकारी&amp;nbsp;बातों &amp;nbsp;पर ध्यान केन्द्रित करें और उन बातों को जीवन में उतारें तो निश्चित ही हम अपना अधिक भला कर पायेंगे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो यू ट्यूब पर ये सभी लिंक उपलब्ध हैं..परन्तु मैंने देखा कि एक फालतू से जोक, अश्लील गीत या दृश्यों पर जहाँ लाखों करोड़ों विजिट होते हैं, वहां इन लिंकों पर विजिट कुछ सौ या हजार ही हैं...आज के बाजारू ख़बरों के पोषक टी वी चैनलों को तो फुर्सत नहीं कि ये तथ्य&amp;nbsp; आमजन तक पहुंचाएं...तो चलिए हम ही इस सद्प्रयास में जुटें और अधिकाधिक लोगों तक इसे&amp;nbsp;पहुंचाएं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा अनुरोध है कि अपने व्यस्त समय से थोडा समय निकाल इन वीडियो को पूरा सुने...यहाँ मैं सभी लिंक नहीं दे रही हूँ..यदि आप सुनना चाहें तो यू ट्यूब पर जाकर सारे लिंक खोल कर देख /सुन सकते हैं.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;27-02-2011-WAR-AGAINST-CORRUPTION-RALLY-RAMLILA-GROUND-DELHI हेडिंग पर जायेंगे तो सभी लिंक वहां उपलब्ध हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल के लिए दो लिंक..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=zceePdmaQY8"&gt;विश्व बंधु गुप्ता जी का भाषण &lt;/a&gt;:-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=f4Sfmx8gcNY&amp;amp;feature=related"&gt;बाबा रामदेव जी का खुलासा( सत्य जो सिहरा देगा) :-&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और यदि कविता सुनना चाहें तो ,&amp;nbsp;&lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=mQOOudQ02Bo"&gt;हरिओम&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial; font-size: 14px; line-height: 30px;"&gt;पवार&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=mQOOudQ02Bo"&gt;जी की कविता :-&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृपया अवश्य देखें कि क्या सब हो रहा है देश में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-5227160380012976437?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/5227160380012976437/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=5227160380012976437&amp;isPopup=true' title='50 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5227160380012976437'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5227160380012976437'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='स्वाभिमान रैली ....'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>50</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-3393649698418018002</id><published>2011-02-15T18:56:00.003+05:30</published><updated>2011-02-18T11:39:34.382+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्मरण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वेलेंटाइन डे'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>प्रेम पर्व ..</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;प्रेम का पावन साप्ताहिकी अनुष्ठान&amp;nbsp; हर्षोल्लास के साथ अंततः संपन्न हुआ. एक दो दिन में आंकड़े आ जायेंगे कि इन सात दिनों में फूल,कार्ड तथा गिफ्ट आइटमों का कितने का कारोबार हुआ है. खैर, कल पूरे दिन मुझे मेरी नानी याद आती रही. मन कचोट कचोट जाता रहा कि आज अगर वे होतीं तो कितना मजा आता..उन्हें इस पर्व के बारे में हम बताते और उनकी प्रतिक्रिया देखते. अपना क्या कहें, प्रेम-प्यार, परिवार विस्तार सब हो कर एक दशक से अधिक बीत गया, तब जाकर पहली बार इस पुनीत पर्व का नाम सुनने का सौभाग्य मिला .. भकुआए हम, पतिदेव से पूछे , ई का होता है जी, अखबार ,टी वी सब में इ नाम का घनघोर मचा हुआ है. पहले तो घुड़कते हुए उन्होंने मेरा गड़बड़ाया&amp;nbsp;उच्चारण सुधारा, फिर मेरे गँवईपन की जमकर खिल्ली उडी और तब जाकर इस पावन पर्व की महत कथा श्रवण का सुयोग&amp;nbsp; मिला.. उस दिन भी सबसे पहले ध्यान में नानी ही आई थी...मन में आया कि अविलम्ब ट्रेन पकड़ नानी के पास जाऊं और उन्हें यह सब सविस्तार बताऊँ...पर अफ़सोस कि मैंने ट्रेन पकड़ने में देर कर दी और जबतक मैं उनके पास जाती उन्होंने गोलोकधाम की ट्रेन पकड़ ली..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे गाँव में नया नया सिनेमा हाल खुला. अब यह अलग बात थी कि मिट्टी की दीवार और फूंस की टट्टी से छराया वह गोहाल टाईप हाल केवल प्रोजेक्टर और परदे के कारण सिनेमा हाल कहलाने लायक था, पर हमारे लिए तो वह किसी मल्टीप्लेक्स से कम न था. क्या क्रेज था उसका.ओह... हम भाई बहन तो भाग कर दो तीन बार उधर हो आये थे ,पर बेचारी मामियों को इसका सौभाग्य न मिला था..उसपर भी जब हम आनंद रस वर्णन सरस अंदाज में उनके सम्मुख परोसते&amp;nbsp;तो बेचारियाँ हाय भरकर रह जातीं थीं..खैर उनकी हाय हमारे ह्रदय तक पहुँच हमें झकझोर गई और हमने निर्णय लिया कि नानी को पटा मामियों का सौभाग्य जगाया जाय. तो बस दो दिनों तक नानी के पीछे भूत की तरह लग आखिर उन्हें इसके लिए मना ही लिया..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नानी के गार्जियनशिप में घर की सभी बहुएं, दाइयां ,नौकर और हम भाई बहन मिला करीब तीस पैंतीस लोग सिनेमा देखने गए..उस अडवेंचर और आनंद का बखान शब्दों में संभव नहीं..पर उससे भी आनंद दायक रहा कई माह तक नानी का उस फिल्म के प्रणय दृश्यों पर झुंझलाना और गरियाना. नानी को घेर हम प्रसंग छेड़ देते और फिर जो नानी उसपर अपनी टिपण्णी देती कि, ओह रे ओह...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" पियार&amp;nbsp;..पियार ..पियार ...ई का चिचियाने ,ढिंढोरा पीटने का चीज है...कोई शालीनता लिहाज,लाज होना चाहिए कि नही..." जिस अंदाज में वे कहतीं कि हँसते हँसते पेट में बल पड़ जाता...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार घर के सारे पुरुष सदस्य रिश्तेदारी में शादी में चले गए थे. घर में बच गयीं मामियां, बाल बुतरू, नानी और नानाजी. जाते तो नानाजी भी ,लेकिन उनकी तबियत कुछ सुस्त थी सो वे घर पर ही रुक गए थे. इधर पुरुषों को निकले एक पहर भी नहीं बीता था कि उल्टी दस्त और बुखार से नानाजी की स्थिति गंभीर हो गई. वैद जी बुलाये गए. उन्होंने कुछ दवाइयाँ दीं जिसे कुछ कुछ देर के अंतराल पर देनी थी.. लेकिन समस्या थी कि घर में बहुओं के आने के बाद से वर्षों से ही नानाजी दरवाजे (बैठक ) पर ही रहते आये थे, जहाँ घर की स्त्रियाँ जाकर रह नहीं सकती थीं. तो मामियों ने जोर देकर नानाजी को जनानखाने में बुलवाया और खूब फुसला पनियाकर नानीजी को उनकी सेवा में लगाया. एक तरफ पति की बीमारी की चिंता और दूसरी तरफ बहुओं से लिहाज के बीच नानी का जो हाल हमने देखा था, आज भी नहीं भूल पाए हैं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उम्र के साथ नानीजी के आँख की रौशनी तेजी से मंद पड़ती जा रही थी..नमक की जगह चीनी और दस टकिये की जगह सौ टकिये का लोचा लगातार ही बढ़ता चला जा रहा था..सब समझाते डॉक्टर को दिखाने को, पर नानी टालती जाती थी. पर एक बार जब सात मन आटे के ठेकुए में चार मन नमक डाल&amp;nbsp; आटा मेवा&amp;nbsp;घी आदि की बलि चढी जिसे कुत्ते और गोरू भी सूंघकर छोड़ देते थे, तो नानी डाक्टर को दिखाने को राजी हुईं. डॉक्टर ने देखा और चश्मा बन गया...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो दिन बाद मामा जी ने नानी से पूछा , अब तो ठीक से दिख रहा है न माँ, कोई दिक्कत नहीं न. सुस्त सी आवाज में उन्होंने कहा, हाँ बेटा ठीक ही है..मामा ने कहा,ठीक है, तो ऐसे मरियाये काहे कह रही है..तो नानी ने तुरंत बुलंद आवाज में भरोसा दिलाया कि ,सब ठीक है,बढ़िया है..लेकिन मामाजी ताड़ गए थे,उनके पीछे पड़ गए..तब उन्होंने बताया कि डॉक्टर जब आँख पर शीशा लगा रहा था, तो एक जो शीशा उसने लगाया,जैसे ही लगाया ,भक्क से सब उजियार हो गया,सब कुछ दिखने लगा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामा परेशान..तो क्या इस शीशा से ठीक से नहीं दिखा रहा ???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नानी - दिखा रहा है बेटा..काम चल जा रहा है..पर उ बेजोड़ था..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामा अधिक परेशान - तो फिर ई वाला शीशा काहे ली..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नानी- ऐसे ही पैसा लगा देती ???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामा - माने ?????&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नानी- अरे, जादा दीखता तो जादा पैसा लगता न....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नानी ने कम दिखाई पड़ने वाले शीशे से काम चला अपने पति पुत्र का पैसा बचा लिया था...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदमी तो आदमी कुत्ते बिल्ली से भी नानी प्रेम करतीं थीं. घर के सारे कुत्ते बिल्ली नानी के आगे पीछे&amp;nbsp; डोलते रहते थे..बिल्लियाँ तो उनके कर(शरीर) लग ही सोती थीं ..गाँव भर में मियाँ बीबी की लड़ाई हो या किसीके घर कोई बीमार पड़े. नानी वहां उपस्थित होतीं थीं..सारे गाँव का दुःख दर्द,पौनी पसारी(मेहमान) नानी के अपने थे..देवीं थीं वे सबके लिए..नानी नाना से लगभग पच्चीस वर्ष छोटी थीं ,लेकिन नानाजी के देहांत के बाद उनकी बरखी से पहले ही उनका साथ निभाने चट पट दुनियां से निकल गयीं. नानाजी के साथ ही जैसे उनका जीवन सोत भी सूख गया .. नानाजी गुजरे उस समय भी उन्हें अटैक आया था,पर यह तब लोग जान पाए जब नानाजी के बरखी के पहले उन्हें मेजर अटैक आया..शहर के सबसे बड़े अस्पताल में उन्हें भरती कराया गया. सबकी दुआ थी कि हफ्ते भर में वे आई सी यू से बाहर आ गयीं... केबिन में उन्हें रखा गया और डॉक्टर ने कहा कंडीशन ठीक रहा तो चार दिन बाद डिस्चार्ज कर देंगे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन भर पूरे टोले मोहल्ले घर घर को नानी ने जितना प्यार बांटा था, उन्हें देखने वालों का अस्पताल में तांता लगा हुआ था..नानी के उन्ही भक्तों में से एक अभागे ने मामा लोगों की बड़ाई कर नानी को सुखी करने के ख़याल से कह दिया..." ऐसे बेटे भगवान् सबको दें. लाखों लाख बाबू उझल दिए अपनी माँ पर, पर माथे पर शिकन नहीं लाये ,यही तो है आपकी कमाई .. और का चाहिए जीवन में..".. बस इतना काफी था उनके लिए. बेटों का पैसा पानी हो,यह वे बर्दाश्त कर सकतीं थीं ?? दो मिनट के अन्दर उन्होंने प्राण त्याग दिया...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेम क्या होता है ,कैसे निभाया जाता है, मेरे कच्चे मन ने बहुत कुछ समझा गुना था उनसे ..आज सोचती हूँ तो लगता है,व्यक्तिगत सुख के प्रति आवश्यकता से अधिक सजग, हममे क्या प्रेम कर पाने की क्षमता है????&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, हम भी न.. का कहने निकले थे और का कहने बैठ गए..आज अखबार में पढ़ा प्रेम पर्व विरोधी, प्रेमियों को झाडी झाडी ढूंढ ढूंढ कर परेशान किये हुए हैं (ई अलग बात है कि पुलिस भी इन संस्कृति रक्षकों को दौड़ा दौड़ा के तडिया रही है)...बड़ा खराब लगा हमको..देखिये न कैसे प्रेम का दुश्मन जमाना बना हुआ है.आज ही क्या सदियों सदियों से.. जहाँ कोई प्रेमी मिला नहीं कि उसे कीड़े की तरह मसल देने को समाज मचल उठता है..बताइये , ई भी कोई बात हुआ.अरे मिलने दीजिये प्रेमी जोड़ों को, ऐसा भी क्या खार खाना. ऐसा कीजिये कि मार काट छोडिये...प्रेमियों में प्रेम पनपे और विरह उरह वाला स्थिति आये, उससे पहले उनके प्रेम को फुल फेसिलिटेट कर परवान चढ़ा दीजिये..ब्याह शादी कर दीजिये और साल भर के लिए प्रेमी जोड़े को स्वादिष्ट भोजन पानी,ओढना बिछौना, शौचालय आदि आदि सभी सुविधाओं से लैस एक खूब सुन्दर कमरे में अच्छी तरह से केवल औ केवल प्रेम कर लेने को बंद कर दीजिये..और भर भर के कमाइए पुन्न..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे मुझे लगता है लैला मजनू,शीरी फरहाद ,रोमियो जूलियट या असंख्य ऐसे जोड़ों को यदि मार डालने के स्थान पर प्रेम करने की इस तरह की एकमुश्त सुविधा दी जाती तो उन्हें मारने वालों को अपने हाथ मैले न करने पड़ते.. साल भर के लिए प्रेमी एक कमरे में सब काम छोड़ केवल प्रेम करने को बाध्य रहते तो हम दावा करते हैं छः महीना के अन्दर प्रेम प्यार साफ़ आ&amp;nbsp; कत्लेआम मच जाता.. प्रेम में विछोह रहे ,तभिये तक प्रेम प्यारा लगता है...प्रेम कर लेना तो सबसे आसान है ..पर निभाना...&lt;br /&gt;एक आग का दरिया है और डूब के जाना है... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;_________________________________&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-3393649698418018002?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/3393649698418018002/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=3393649698418018002&amp;isPopup=true' title='72 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/3393649698418018002'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/3393649698418018002'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/02/blog-post_15.html' title='प्रेम पर्व ..'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>72</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-7467035121203250109</id><published>2011-02-07T14:45:00.001+05:30</published><updated>2011-02-07T14:52:11.083+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य कविता'/><title type='text'>नेता....</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;भइया, सुनो पते की बात&lt;br /&gt;जो तुमको बनना हो नेता &lt;br /&gt;तो मारो शरम को लात.&lt;br /&gt;भैया, सुनो पते की बात ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झूठ, कपट, चोरी, बेईमानी&lt;br /&gt;साध इसे करना मनमानी &lt;br /&gt;दीन धरम और नीति की बातें &lt;br /&gt;केवल मुख से है चुभलानी,&lt;br /&gt;जो कभी भाव ये ह्रदय विराजे,&lt;br /&gt;तो जायेगी जात...&lt;br /&gt;कि भैया सुनो पते की बात...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढना लिखना पाप समझना ,&lt;br /&gt;पर जुगाड़ के डिग्री&amp;nbsp; रखना ,&lt;br /&gt;सात्विक बातें , मोहक वाणी,&lt;br /&gt;सुथरे कपडे पहन के ठगना,&lt;br /&gt;अगर नहीं कर सकते तिकड़म &lt;br /&gt;नहीं बनेगी बात...&lt;br /&gt;ओ भैया सुनो पते की बात..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले अस्त्र शस्त्र चमकाओ,&lt;br /&gt;जन मन में आतंक बसाओ,&lt;br /&gt;फिर जा बैठो नेता के दर ,&lt;br /&gt;राजनीति में छवि चमकाओ,&lt;br /&gt;फहराओ गर भय का झंडा &lt;br /&gt;तभी बढे औकात... &lt;br /&gt;कि भैया सुनो पते की बात..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्ता की बस यही कला है &lt;br /&gt;इसी पे चलकर हुआ भला है &lt;br /&gt;सद्विचार संस्कार धर्म ने &lt;br /&gt;राजनीति को सदा छला है &lt;br /&gt;छाया भी तेरा प्रतिद्वंदी है &lt;br /&gt;दे न रहा यदि साथ....&lt;br /&gt;कि भैया सुनो पते की बात...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार जो कुर्सी धर ली &lt;br /&gt;समझो भवसागर ही तर ली,&lt;br /&gt;माल बनालो ऐसे जमकर &lt;br /&gt;दस&amp;nbsp;पुश्तों&amp;nbsp;के जनम सुधर ली.&lt;br /&gt;राजा के सम&amp;nbsp; नहीं जिए तो..&lt;br /&gt;जीने में क्या स्वाद ..&lt;br /&gt;कि भैया सुनो पते की बात..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो तुमको बनाना हो नेता &lt;br /&gt;तो मारो शरम को लात.&lt;br /&gt;कि भैया सुनो पते की बात ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-7467035121203250109?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/7467035121203250109/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=7467035121203250109&amp;isPopup=true' title='44 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/7467035121203250109'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/7467035121203250109'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='नेता....'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>44</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-4907561909363310389</id><published>2011-01-27T16:51:00.003+05:30</published><updated>2011-01-29T18:40:28.152+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कृष्ण चरित्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धर्म आध्यात्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ललित निबंध'/><title type='text'>महानायक !!!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: small;"&gt;(भाग -२)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रुति और स्मृति में संरक्षित हिन्दू धर्म ग्रंथों के उपलब्ध लिखित अंशों को सुनियोजित ढंग से प्रक्षेपांशों द्वारा विवादित बना छोड़ने और हिन्दुओं को दिग्भ्रमित करने में अन्य धर्मावलम्बियों ने शताब्दियों में अपार श्रम और साधन व्यय किया है. आस्था जिस आधार पर स्थिर और संपुष्ट होती है, उसको खंडित किये बिना समूह को दुर्बल और पराजित करना संभव भी तो नहीं... और देखा जाए तो एक सीमा तक यह प्रयास सफल भी रहा है.. अन्य धर्मावलम्बियों की तो छोड़ ही दें हिन्दुओं में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं जो कृष्ण को नचैया विलासी ठहरा उसका मखौल उड़ाते हैं और जो कृष्ण में आस्था रखने वाले हैं भी वे स्वयं को भक्त मान तो लेते हैं पर निश्चित और निश्चिन्त हो दृढ़ता पूर्वक इन आक्षेपों का तर्कपूर्ण खंडन नहीं कर पाते. कृष्ण को भगवान् ठहरा पूजा भजन भक्ति भाव में रमे वे अपने आराध्य के दोषों पर दृष्टिपात करना या सुनना घोर पाप ठहरा उसपर चर्चा किये बिना ही निकल जाते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काव्य कोई समाचार या इतिहास निरूपण नहीं होता,जिसमे ज्यों का त्यों घटनाओं को अंकित कर दिया जाय. काव्य में रस साधना प्रतिस्थापना के लिए अतिरंजना स्वाभाविक है,परन्तु सकारात्मक या नकारात्मक मत और आस्था स्थिर करते समय तर्कपूर्ण और निरपेक्ष ढंग से तथ्यों को देख परख लिया जाय तो भ्रम और शंशय का स्थान न बचेगा.. कृष्ण के सम्पूर्ण जीवन वृत्तांतों और कृतित्वों पर एक लघु आलेख में चर्चा तो संभव नहीं,यहाँ हम उन आक्षेपों पर संक्षेप में विचार करेंगे जो बहुधा ही उनके चरित्र पर लगाये जाते हैं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुप्रचलित प्रसंग है कि गोपियाँ जब यमुना जी में स्नान करती थीं तो कान्हा उनके वस्त्र लेकर निकट कदम्ब के पेड़ पर चढ़ जाते थे और निर्वसना गोपियों को जल से बाहर आ वस्त्र लेने को बाध्य करते थे.. एक बार एक कृष्ण भक्त साधु से मैंने इस विषय में पूछा, तो उनका तर्क था कि कृष्ण गोपियों को देह भाव से ऊपर उठा माया से बचाना चाहते थे..तर्क मेरे गले नहीं उतर पाया..लगा कहीं न कहीं मानते वे भी हैं कि यह कृत्य उचित नहीं और अपने आराध्य को बचाने के लिए वे माया का तर्क गढ़ रहे हैं..अंततः बात तो वहीँ ठहरी है कि कृष्ण की अभिरुचि गोपियों को निर्वस्त्र देखने में थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तनिक विचारा जाए, गोपियाँ यमुना जी में जहाँ स्नान करतीं थीं , वह एक सार्वजानिक स्थान था. भले परंपरा में आज भी यह है कि नदी तालाब के जिस घाट पर स्त्रियाँ स्नान करती हैं, वहां पुरुष नहीं जाते ..परन्तु एक सार्वजानिक स्थान पर स्त्री समूह का निर्वस्त्र जल में स्नान करना, न तब उचित था, न आज उचित है... कृष्ण भी सदैव इसके लिए गोपियों को बरजा करते थे और जब उन्होंने इनकी न सुनी तो उन्होंने उन्हें दण्डित करने का यह उपक्रम किया और विलास संधान में उत्सुक सहृदयों द्वारा प्रसंग को कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया गया. एक महत कल्याणकारी उद्देश्य को विलास सिद्ध&amp;nbsp;कर छोड़ दिया गया..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही भ्रम कृष्ण के बहुपत्नीत्व को लेकर भी है..राजनितिक, औद्योगिक घरानों में प्रयास आज भी होते हैं कि विवाह द्वारा प्रतिष्ठा तथा प्रभाव विस्तार हो..प्राचीन काल में तो अधिकाँश विवाह ही राज्य/ प्रभुत्व विस्तार या जय पराजय उपरान्त संधि आदि राजनितिक कारणों से हुआ करते थे. कृष्ण के विवाह भी इसके अपवाद नहीं.एक रुक्मिणी भर से इनका विवाह प्रेम सम्बन्ध के कारण था, बाकी सत्यभामा और जाम्बवंती से इनका विवाह विशुद्ध राजनितिक कारणों से था..रही बात सोलह हजार रानियों की, तो आज के विलासी पुरुष जो बात बात में कृष्ण की सोलह हजार पत्नियों का उदहारण देते हैं,क्या कृष्ण का अनुकरण कर सकते हैं ?? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भौमासुर वध के उपरान्त जब उसके द्वारा अपहृत सोलह हजार स्त्रियों को कृष्ण ने मुक्त कराया, तो उनमे से कोई इस स्थिति में नहीं थी कि वापस अपने पिता या पति के पास जातीं और उनके द्वारा स्वीकार ली जातीं..देखें न, आज भी समाज&amp;nbsp;अपहृताओं को नहीं स्वीकारता ,सम्मान देना तो दूर की बात है,तो उस समय की परिस्थितियां क्या रही होंगी....अब ऐसे में आत्महत्या के अतिरिक्त इन स्त्रियों के पास और क्या मार्ग बचा था..कृष्ण ने इनकी स्थिति को देखते हुए सामूहिक रूप से इनसे विवाह कर इन्हें सम्मान से जीने का अधिकार दिया. इनके भरण पोषण का महत उत्तरदायित्व लिया और यह स्थापित किया कि अपहृत या बलत्कृत स्त्रियाँ दोषमुक्त होती हैं,समाज को सहर्ष इन्हें अपनाना चाहिए,सम्मान देना चाहिए...बहु विवाह या बहु प्रेयसी के इच्छुक कितने पुरुष आज ऐसा साहस कर सकते हैं ??? चाहे राधा हों, गोपियाँ हों, या यशोदा, कुंती, द्रौपदी, उत्तरा आदि असंख्य स्त्रियाँ ,स्त्रियों को जो मान सम्मान कृष्ण ने दिया, पुरुष समाज के लिए सतत अनुकरणीय है... जिसे लोग विलासी ठहराते हैं,उसके पदचिन्हों पर पुरुष समाज चल पड़े तो समाज में स्त्रियों के अनादर और उपेक्षा की कोई स्थिति ही नहीं बचेगी . &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे महत्वपूर्ण बात, राधा कृष्ण तथा गोपी कृष्ण के रसमय लीलाओं की श्रृंगार रचना में पन्ने रंगने वाले यह नहीं स्मरण रख पाते कि तेरह वर्ष की अवस्था तक ही कृष्ण गोकुल में रहे थे, मथुरा गमन और कंश के विनाश के उपरान्त वे गुरु संदीपन के पास शिक्षा ग्रहण को गुरुकुल चले गए थे और जो वहां से लौटे तो उत्तरदायित्वों ने ऐसे घेरा कि जीवन पर्यंत कभी फिरकर गोकुल नहीं जा पाए . तो तेरह वर्ष की अवस्था तक में कोई बालक ( किशोर कह लें) कितने रास रच सकता है?? हाँ, सत्य है कि कृष्ण गोपियों के प्राण थे,पर यह तो स्वाभाविक ही था.. वर्षों से दमित समूह जिसे पाकर अपने को समर्थ पाने लगता है,उसपर अपने प्राण न्योछावर क्योंकर न करेगा..उनका वह नायक समस्त दुर्जेय शक्तियों को पल में ध्वस्त कर उनकी रक्षा करता है और फिर भी उनके बीच का होकर उनके जैसा रह उनसे अथाह प्रेम करने वाला है, तो कौन सा ह्रदय ऐसा होगा जो अपने इस दुलारे पर न्योछावर न होगा&amp;nbsp;.. और केवल गोपियाँ ही क्यों गोप भी अपने इस नायक पर प्राणोत्सर्ग को तत्पर रहते थे..कंस के पराभव में यही गोप तो कृष्ण की शक्ति बने थे..अब प्रेमाख्यान रचयिताओं को कृष्ण के अनुयायियों भक्तों के प्रेमाख्यान क्यों न रुचे ,यह तो विचारणीय है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बालक जिसके जन्म के पूर्व ही उसकी मृत्यु सुनिश्चित कर दी गई हो, जीवन भर हँसते मुस्कुराते संघर्षरत धर्म स्थापना में रत रहा..रोकर रिरियाकर उसने दिन नहीं काटे, बल्कि उपलब्ध साधनों संसाधनों का ही उपयोग कर समूह को संगठित नियोजित किया और एक से बढ़कर एक दुर्जेय बाधाओं को ध्वस्त करता हुआ एक दिन यदि विश्व राजनीति की ऐसी धुरी बन गया कि सबकुछ उसी के इर्द गिर्द घूमने लगा, कैसी विलक्षण प्रतिभा का धनी रहा होगा वह.. इस तेजस्वी बालक ने एक दमित भयभीत समूह को गीत संगीत का सहारा दे, कला से जोड़ मानसिक परिपुष्टता दी. गौ की सेवा कर दूध दही के सेवन से शरीर से हृष्ट पुष्ट कर अन्याय का प्रतिकार करने को प्रेरित किया..प्रकृति जिससे हम सदा लेते ही लेते रहते हैं,उनका आदर करना संरक्षण करना सिखाया .माँ माटी और गौ से ही जीवन है और इसकी सेवा से ही सर्वसिद्धि मिल सकती है,बालक ने प्रतिस्थापित किया..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न्याय अन्याय के मध्य अंतर समझाने को उसने व्यापक जनचेतना जगाई और लोगों को समझाया कि राजा यदि पालक होता है तो रक्षक भी होता है और जो रक्षक यह न स्मरण रख पाए कि उसकी प्रजा भूखी बीमार और त्रस्त है,उसे कर लेने का भी अधिकार नहीं है.अपने सखा समूह संग माखन मलाई लूट लेना खा लेना और चोरी छुपे दही मक्खन छाछ लेकर मथुरा पहुँचाने जाती गोपियों की मटकी फोड़ देना ,विद्रोह और सीख का ही तो अंग था..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने&amp;nbsp;जन की रक्षा&amp;nbsp;क्रम&amp;nbsp;में&amp;nbsp; न उसे रणछोर कहलाने में लज्जा आई न षड्यंत्रकारियों के षड्यंत्रों का प्रति उत्तर छल से देने में... कृष्ण के सम्पूर्ण जीवन और कृत्यों में श्रृंगार संधान के स्थान पर यदि उनकी समूह संगठन कला, राज्य प्रबंधन कला और उनके जीवन दृष्टिकोण को विवेचित किया जाय और उनके द्वारा स्थापित मूल्यों को अंगीकार किया जाय तो मनुष्यमात्र अपना उद्धार कर सकता है. इस महानायक के जन्म से लेकर प्रयाण पर्यंत जो भी चमत्कारिक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं, तर्क की कसौटी पर कसकर देखें कुछ भी अतिशयोक्ति न लगेगी.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान परिपेक्ष्य में आहत व्यथित मन एक ऐसे ही विद्वान् जननायक, महानायक की आकांक्षा करता है..लगता है एक ऐसा ही व्यक्तित्व हमारे मध्य अवतरित हो जो धूमिल पड़ती धर्म और मनुष्यता की परिभाषा को पुनर्स्थापित करे. भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी राजनीति को निर्मल शुद्ध करे,इसे लोकहितकारी बनाये.नैतिक मूल्यों को जन जन के मन में बसा दे और मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनने को उत्प्रेरित करे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-----------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(कृष्ण जीवन से सम्बंधित जितनी पुस्तकें आजतक मैंने पढ़ीं हैं,उनमे आचार्य रामचंद्र शुक्ल और श्री नरेन्द्र कोहली जी की प्रतिस्थापनाओं ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया है.मन इनके प्रति बड़ा आभारनत है..विषय के जिज्ञासुओं को इनकी कृतियाँ&amp;nbsp;बड़ा आनंदित करेंगी,पढ़कर देखें ) &lt;br /&gt;***&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-4907561909363310389?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/4907561909363310389/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=4907561909363310389&amp;isPopup=true' title='50 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/4907561909363310389'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/4907561909363310389'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/01/blog-post_27.html' title='महानायक !!!'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>50</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-1690999001646645133</id><published>2011-01-21T13:28:00.001+05:30</published><updated>2011-01-21T13:28:58.861+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कृष्ण चरित्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ललित निबंध- अध्यात्म'/><title type='text'>महानायक !!!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी कालखंड में काल विशेष के प्रसिद्द चर्चित व्यक्तित्वों के चरित्र और कृतित्व के विषय में लोक में जो कुछ भी प्रचारित रहता है, क्या वह वही होता है जो वास्तव में वह हैं या थे?? शायद नहीं न !!! क्योंकि व्यक्ति विशेष के विषय में लिखित रूप में जो कुछ भी संगृहित होता है,वस्तुतः वह लेखक /प्रचारक या लिखवाने प्रचारित करवाने वाले के हिसाब से होता है..लेखक अपने रूचि और संस्कार के अनुरूप व्यक्ति विशेष का चरित्र एवं कृतित्व गढ़ उसे लोक तक पहुंचता है. कभी कभी तो यह सत्य वास्तविकता से कोसों दूर हुआ करती है. कालांतर में व्यक्ति विशेष के विषय में जो विचार धारा सर्वाधिक प्रचार पाती है, वही मत स्थिर करने का आधार भी बनती है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज मिडिया सिने अभिनेता अमिताभ बच्चन जी का नाम " सदी के महानायक " लगाये बिना नहीं लेती..अमिताभ जी परिपक्व अभिनेता और प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी हैं,सुसंस्कृत शालीन सज्जन प्राणी हैं.. मेरे मन में उनके लिए बड़ा आदर भाव है,परन्तु उनके लिए इस उपाधि का प्रयोग मुझे अखर जाता है. हिन्दी भाषा जानने, शब्दों के अर्थ और महत्त्व समझने वालों की तो छोडिये, भारतीय सिनेमा के दर्शक /प्रशंशक भी क्या ह्रदय पर हाथ धर निरपेक्ष निष्पक्ष भाव से कह पाएंगे कि भारतीय सिनेमा के पिछले सौ वर्षों (सदी) में अमिताभ बच्चन जी सा धुरंधर अभिनेता हिन्दी सिनेमाँ में और कोई हुआ ही नहीं है ??? और जहाँ तक बात रही महानायकत्व की तो 'महानायक' शब्द का प्रयोग "महान अभिनेता" के अर्थ में होना चाहिए या "महान नेतृत्वकर्ता " के रूप में, यह हिन्दी भाषा के ज्ञाता विचार कर निर्धारित सकते हैं. वर्तमान का सत्य यही है कि यह उपाधि इतना प्रचारित कर दिया गया है कि इसपर प्रश्चिन्ह लगाने का कोई सोच भी नहीं पाता..यह प्रचार अतिरंजना ऐसे ही विस्तृत हुआ तो बहुत बड़ी बात नहीं कि आज से कुछ दशक या शतक वर्ष उपरान्त इनके चरित्र के साथ कुछ चमत्कारिक किंवदंतियाँ भी जुड़ जाएँ.. इन्हें महान अवतार ठहरा मंदिरों में प्रतिस्थापित करने लगा जाए और फूल फल अगरबत्ती से इनकी पूजा अर्चना आरम्भ हो जाए... अपने चारों ओर ऐसे दृष्टान्तों की कोई कमी नहीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और दृष्टान्त... आज खूब चर्चा में हैं डॉक्टर विनायक सेन..कुछ लोग इन्हें महान ठहराने में एड़ी चोटी साधे हुए हैं, तो कुछ आतंकवादियों का सहयोगी ठहरा अहर्निश निंदा में व्यस्त हैं..एक ही साथ,एक ही समय में , दो एक दम विपरीत विचारधाराएँ प्रचारित हैं. आमजन दिग्भ्रमित हैं कि इस व्यक्तित्व की वास्तविकता आखिर है क्या. अच्छा, बुरा क्या मानें इन्हें??.. आज जब व्यक्ति हमारे बीच उपस्थित है, तब तो वास्तविकता तक हमारी पहुँच नहीं, मान लिया आज से कुछ सौ वर्ष बाद इनपर चर्चा हुई या इनके विषय में मत स्थिर करना होगा, तो हम किस आधार पर करेंगे ??? संभवतः इसका आधार आज की बहुप्रचरित धारा ही होगी...नहीं ?? चलिए, वर्तमान की बात हो या दो ढाई सौ वर्ष पीछे की बात,किसी प्रसंग की सत्यता तक कोई अनुसंधानकर्ता पहुँच भी जाए ,पर बात जब हजारों या लाखों वर्ष पहले की हो तब ?? सत्यान्वेषण इतना ही सरल होगा क्या ???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्व में प्रचलित धर्म सम्प्रदायों में चाहे वह इस्लाम हो,इसाई हो या अन्यान्य कोई भी धर्म सम्प्रदाय, किसीमे भी अपने धर्म संस्थापकों, प्रवर्तकों , नायकों ,पूज्य श्रेष्ठ व्यक्तियों के चरित्र को लेकर अनास्था या मत विभिन्नता उतनी नहीं जितनी कि हिन्दुओं में है. यूँ भी एक परंपरा सी बनी हुई है कि हिन्दुओं के पौराणिक पात्रों तथा प्रसंगों को मिथ या कल्पना ठहरा नकार दिया जाए.. इधर कुछेक संस्थाओं , विद्वानों ने इनकी सत्यता जांचने का बीड़ा उठाया तो है, पर देखा जाय कि उनके प्रयोजन कितने निष्पक्ष हैं.. मुझे विश्वास है कि इस दिशा में यदि गंभीर और निष्पक्ष प्रयास किये जायं तो समय सिद्ध करेगा कि ये पौराणिक पात्र विशुद्ध इतिहास के अंग हैं, मिथ या कपोल कल्पना नहीं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात जब पौराणिक पात्रों युगपुरुषों, महानायकों की होती है,तो मर्यादापुरुसोत्तम राम और महानायक कृष्ण का नाम ध्यान में सबसे पहले आता है.. पर इनके विषय में लिखित संरक्षित साहित्य का अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि युग के इतिहास का रुख मोड़ देने वाले इन दो महापुरुषों में से राम के चरित्र के साथ कलमकारों ने जितना न्याय किया उतना कृष्ण के चरित्र के साथ नहीं किया. तुलसीदास जैसे सहृदय कवि ने जिस प्रकार राम कथा तथा उनके चरित्र को विस्तार दे इसे जन जन के ह्रदय में प्रतिष्ठित कर जनमानस के लिए पूज्य और अनुकरणीय बनाया, ऐसा सौभाग्य कृष्ण चरित्र को प्राप्त न हुआ..वैसे तुलसीदास ही क्या राम का चरित्र जिन हाथों गया और विवेचित हुआ अधिकाँश ने उसके साथ न्याय किया,परन्तु विडंबना रही कि कृषण के जीवन और चरित्र को प्रत्येक कलमकारों ने अपने रुचिनुसार खण्डों में ले खंडविशेष को ही विस्तार दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई कृष्ण के बाल रूप पर मुग्ध हो, वात्सल्य रस में लेखनी डुबो बालसुलभ चेष्टाओं को चित्रांकित करने में लगा रहा तो कोई श्रृंगार में निमग्न उसे पराकाष्ठा देने में एडी चोटी एक करता रह गया..किसीने उन्हें अलौकिक,चमत्कारिक परमेश्वर ठहराया तो किसीको कृष्ण धूर्त चतुर कूटनीतिज्ञ और राजनीतिज्ञ भर लगे. समग्र रूप में इस विराट व्यक्तित्व के सम्पूर्ण जीवन और कर्म की विवेचना करने में भक्तिकाल से लेकर रीतिकाल तक के किसी भी मूर्धन्य कवि ने अभिरुचि न दिखाई ..कृष्ण के लोक रंजक रूप पर तो खूब पन्ने रंगे गए पर उनके लोकरक्षक रूप को लोक के लिए अनुकरणीय रूप में समुचित ढंग से कोई नहीं रख पाया...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीतिकालीन साहित्यकारों में तो श्रृंगार के प्रति आसक्ति ऐसी थी कि राज्याश्रित कवियों ने कृष्ण को लम्पट कामी और लुच्चा ही बनाकर छोड़ दिया.एक साधारण मनुष्य तक की गरिमा न छोडी उनमे.. यूँ भी श्रुति और स्मृति में संरक्षित हिन्दू धर्म ग्रंथों के उपलब्ध लिखित अंशों को सुनियोजित ढंग से प्रक्षेपांशों द्वारा विवादित बना छोड़ने और हिन्दुओं को दिग्भ्रमित करने में अन्य धर्मावलम्बियों ने शताब्दियों में अपार श्रम और साधन व्यय किया है. आस्था जिस आधार पर स्थिर और परिपुष्ट होती है,उसको खंडित किये बिना समूह को दुर्बल और पराजित करना सरल भी तो नहीं.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रमशः :-&lt;br /&gt;------------------------------&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-1690999001646645133?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/1690999001646645133/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=1690999001646645133&amp;isPopup=true' title='31 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/1690999001646645133'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/1690999001646645133'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='महानायक !!!'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>31</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-179853602367107034</id><published>2010-12-30T18:06:00.002+05:30</published><updated>2010-12-31T11:54:44.275+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता.'/><title type='text'>बीत रहा .......</title><content type='html'>&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;एक और वर्ष बीत रहा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;बीत रहे पल छिन संग&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;हम भी तो बीत रहे&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;साँसों के जल से भरा, &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;घट भी तो रीत रहा.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;यह वर्ष भी बीत रहा.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;जश्न हम मनाएं क्या&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;गीत नया गायें क्या&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;संचित अभिलाषा की &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;कथा अब सुनाएँ क्या&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;देख दशा अग जग की &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;मन तो भयभीत खड़ा ,&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;हौसला है अस्त पस्त &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;पार कहाँ सूझ रहा.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;यह वर्ष भी बीत रहा.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;स्मृति की अट्टालिका मे&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;पल छिन जो ठहरे हैं&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;अगणित रंगों मे घुले&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;रंग बड़े गहरे हैं&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;उसमे गुमसुम से सभी &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;सपने सुनहरे हैं&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;पाँव तो हैं ठिठके&amp;nbsp; पर&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;समय प्रवाह जीत रहा.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;यह वर्ष भी बीत रहा.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;पर पास खड़ा नया साल&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;देखो मुस्काता&amp;nbsp; है&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;मद्धिम सी छेड़ तान&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;हम को&amp;nbsp;&amp;nbsp;बहलाता है&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;प्राणों मे फ़िर से वही &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;आस फ़िर जगाता है&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;बीता जो लम्हा वह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;बीत गया बात गयी &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;आगे का हर पल तो&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;तेरा बस तेरा है&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;जाने दे उस पल को&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;जो बीत रहा बीत रहा.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;*******************************&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-179853602367107034?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/179853602367107034/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=179853602367107034&amp;isPopup=true' title='58 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/179853602367107034'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/179853602367107034'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/12/blog-post_30.html' title='बीत रहा .......'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' 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/&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा - हाँ..हाँ, क्यों नहीं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला - देख न, समझ में नहीं आ रहा कि गिफ्ट क्या लूँ.....वैसे तूने क्या लिया ??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा - वियाग्रा...शिलाजीत !!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला - हा हा हा हा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा - हा हा हा हा...बता न.... और क्या दिया जाय ???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला - हाँ ,बोल तो सही ही रही हो..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बताओ न,यह भी कोई उम्र है शादी करने की??? पचास तो पार हो ही गया होगा, नहीं ???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा- पचास नहीं रे...बावन...!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला - ओह !!! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है, तीनो बच्चों ने विद्रोह कर दिया है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा - हाँ, और क्या..दोनों बेटे तो हॉस्टल से आये भी नहीं है..छोटी बेटी ने तो अपने को कमरे में कैद ही कर लिया है जब से चोपड़ा जी इंगेजमेंट कर के आये हैं.. किसी से मिलती जुलती नहीं, खेलती घूमती नहीं..दादी बुआ और चाचियाँ समझा कर थक गए हैं....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला - सही तो है...इस उम्र में बच्चे सौतेली माँ बर्दास्त कैसे करेंगे,उसपर भी जबकि उसे गुजरे ढेढ़ साल भी न बीते हों..आसान नहीं है बच्चों के लिए....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा,लडकी का पता है ???? सुना है, एकदम जवान है, सत्ताईस अट्ठाईस की ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा - हाँ रे,, सही सुना..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला - विधवा तलाकशुदा है या कुआंरी है ????&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा- एकदम कुआंरी ???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला - सोच तो क्या देखकर माँ बाप ब्याह रहे हैं इस बुढाऊ से ???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा - देखेंगे क्या..पद है, पैसा है, रुतबा है और शरीर भी कोई ऐसा ढला हुआ तो है नहीं. दिखने में चालीस से ज्यादा के नहीं दीखते ...और लडकी बेचारी पांच बहन है.एक कलर्क पाँच पाँच बेटियों के लिए जवान और कमाऊ लड़का कहाँ से खोजेगा ??? वो तो भला हो कि चोपड़ा जी ने उनका उद्धार कर दिया उसका...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला - सही कह रही हो..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा - लेकिन एक बात है,उद्धार करना ही था तो तेरी पड़ोसन का करते तो ज्यादा अच्छा होता.... नहीं??????&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला - तू भी तो बात करती है. चोपड़ा जी इसका उद्धार करते तो फिर बेचारे मजनूँ का कौन करता ?????&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हा हा हा हा....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा - हा हा हा हा...वो तो है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे क्या चल रहा है अभी ???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला - अरे तुझे बताना भूल गई ..पता है, परसों क्या हुआ, कि मेरा एक कजिन देल्ही से हमारे यहाँ आया...ट्रेन लेट हो गई थी, रात साढ़े ग्यारह के बदले यह भोर चार बजे पहुंची ....उसके लिए दरवाजा खोला ,तो देखती क्या हूँ, कि मजनू मियां मैडम के छोटे बेटे को गोद में उठाये फ़्लैट के नीचे लिए चले जा रहे हैं और मैडम बड़ी बेटी को घर में ही सोती छोड़ दरवाजा बंद करके उनके पीछे जा रही हैं...यूँ तो मैं नहीं टोकती,पर मुझसे रहा न गया तो मैंने पूछ ही लिया, कि क्या हुआ ,कहाँ जा रही हैं इतनी रात को...तो कहने लगीं, बेटे की तबियत बहुत बिगड़ गई है ,डॉक्टर के पास जा रहे हैं....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बता, इतनी सुबह जो घर से निकले, मतलब रात भर मजनू मियां इनके घर ही रहे होंगे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले पहल तो जब आना जाना शुरू हुआ था तो मैडम कहतीं थीं,कलीग हैं,,, मदद कर देते हैं...बच्चों को पढ़ाने आते हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर देखा वो साहब इनकी सब्जी भाजी और राशन भी ढ़ोने लगे और अब तो कोई हिसाब ही नहीं कि कब आयेंगे और कब जायेंगे... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा - ऐसा ही है तो दोनों शादी क्यों नहीं कर लेते ????&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला - पागल हुई हो क्या ????? सब टाइम पास है ???? जवान है हैंडसम है ठीक ठाक पैसा कमाता है,उसे कुआंरी लडकी नहीं मिलेगी क्या जो सैंतीस अडतीस साल की दो बच्चे की अम्मा से शादी करेगा...वैसे तुझे बता दूं..मैंने सुना है कि इसकी शादी कहीं फिक्स हो गई है..दो तीन महीने के अन्दर ही हो जायेगी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा - हाय !!! फिर मैडम का क्या होगा....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हा हा हा हा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला - होगा क्या ?? कोई और मिल जायेगा..इतनी सुन्दर हैं, दिखने में चौबीस पच्चीस से ज्यादा की नही लगतीं ... ऐसी सुन्दर बेवाओं के पीछे घूमने वालों की कोई कमी थोड़े न होती है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा - सही कहा रे...अच्छा अपने मियां को बचा कर रखना ..कहीं वो भी न ट्यूशन पढ़ाने निकल पड़ें...हा हा हा हा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला - अरे यार..ये टेंशन तो कभी पीछा नहीं छोडती..इसलिए तो न खुद उधर झांकती हूँ ,न इन्हें झाँकने देती हूँ..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा - सही कहा रे...गजब टेंशन है ये भी..मरद जात का कोई भरोसा नहीं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा चल तुझसे बाद में बात करती हूँ..पार्लर वाली आ गई है.. फेसियल कराने के लिए उसे यहीं बुला लिया है..पार्लर की भीड़ मुझे नहीं जमती....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चल शाम में मिलते हैं...देखें बूढ़ी घोडी की लगाम कैसी है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हा हा हा हा....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चल बाय !!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीमा - ओके... बाय !!! शाम में मिलते हैं..ठीक आठ बजे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओके...!!! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.............&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-1312921787665136113?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/1312921787665136113/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=1312921787665136113&amp;isPopup=true' title='31 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/1312921787665136113'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/1312921787665136113'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/12/blog-post_24.html' title='लाल लगाम !!!'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>31</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-3056827395677310727</id><published>2010-12-14T12:48:00.002+05:30</published><updated>2010-12-16T17:19:50.732+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य. हिन्दी भाषा.आधुनिकता'/><title type='text'>मीठा माने ????</title><content type='html'>बच्चे से कुल औ गाँव के आँख के तारे रहे हैं हमरे पवन भैया.बड़े परतिभा शाली.दसवीं में बिहार बोर्ड में टॉप किये रहे और उनका बम्पर नंबर उनको सीधे सीधे इंजीनियरिंग कालेज के गेट्वा के अन्दर ले गया..गणित विज्ञान इतना तगड़ा रहा उनका कि उहाँ भी टॉप किये और उनका रिजल्ट पर न जाने कितने कम्पनी वाले लहालोट हुए. अंततः एक बड़का नामी कम्पनी उनको लूट अपने इहाँ ले जाने में सफल हुआ.उर्जा से ओत प्रोत भैया को शायद ही कभी किसीने थकते या परिश्रम से उबते देखा बरसों बरसों में.घर घर में गार्जियन लोग अपने बच्चों को उनके नाम पर कनैठी दिया करते थे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन संझा काल में उनसे मिलने गए तो देखते का हैं कि भाई जी दफ्तर से आकर निढाल भुइयें पर पसर गए हैं.हमको बड़ा अजीब लगा, लाड़ से हम पूछे ,का बात है भाई जी, तबियत उबियत ठीक तो है न ?? का हुआ,चेहरवा ऐसे कुम्हलाया काहे है ?? लाइए, हम गोड़ दबा देते हैं,पांच मिनट में एकदम चकाचक फ्रेस हो जाइएगा..त भैया थके थके सुर में बोले,अरे नहीं रे छुटकी ,रहने दे, गोड़ नहीं मुडी दुखा रहा है..हम कहे, काहे...मुडिया में का हो गया ???? त भैया कहे, भारी कसरत कर के आ रहे हैं रे ...हम कहे....कसरत...दफ्तर में ??? और कसरत किये भी त, उमे मूडी कैसे दुखा गया ??? त बताये कि छः घंटा भाषण दे के आय रहे हैं..दिक्कत भाषण में त नहीं था, पर तिहरा ट्रांसलेशन कर कर के मथवा पिरा गया है.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात त सहिये है..अब भाय, हम सबको सदा से आदत है अपना बात अपना मातृभाषा में ही सोचने का, त पाहिले त मातृभाषा में सब बात /सोच को सजाओ ,फिर उको ट्रांसलेट करो राष्ट्र भाषा हिन्दी में और फिर सबको अंगरेजी में रूपांतरित करते हुए जिभिया घुमाय घुमाय के , शब्दन को चबाय चबाय के सबके सामने परोसो और ऊ भी किनके सामने, जो ज्ञान लेने को नहीं बल्कि भरब एडभरब और टेंस का गलती पकड़ने को हाथ मुंह खोलकर सामने बैठे हुए हों.. सबसे ज्यादा कोफ़्त तो ई सोचकर होता है कि स्रोता समाज में एको आदमी ऐसा नहीं जो हिन्दी नहीं जानता समझता है,लेकिन विडंबना देखिये कि अपने ही लोगों के सामने ज्ञान बघारने और भारी बने रहने के लिए हमको अंगरेजी चुभलाना पड़ता है..मन भारी नहीं होगा ई परिस्थिति में त और का होगा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ा दिक्कत है भाई, हमरे ज़माने में बाकी विषय तो छोडिये अन्ग्रेजियो हिंदिये में पढाया जाता था. तीसरा चौथा किलास में जाके गुरूजी शुरू होते थे...बोलो बच्चों - ए से एप्पल, एप्पल माने सेब !!! बी से बैट, बैट माने बल्ला !!! सी से कैट,कैट माने बिल्ली....!!! लय ताल में इसे गवा दिया जाता था और हम भी रस लेके इसे घोंट जाते थे..ई लयकारी दिमाग का भित्ती पर ऐसे जाकर चुभुक के चिपट जाता था कि फिर मरते घड़ी तक दिमाग से ए से एप्पल और बी से बैट नहीं निकलता था.एही लयकारी का बदौलत दू एकम दू और दू दूनी चार का पहाडा कम स कम पच्चीस तक आज भी ऐसे दिमाग में संरक्षित है कि एक बार ऊ लय में पहाडा पटरी पर डाले नहीं कि सब ध्यान के सामने नाच उठता है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर,समय बदल गया है.अब लयकारी वाले रटंत विद्या का जमाना नहीं रहा.पहाडा पढके हिसाब करने का श्रम और समय कौन लगाये.यन्त्र उपलब्ध है,बटन दबाओ और दन से बड़का बड़का नंबर का हिसाब राफ साफ़.. लाख ज्ञान होते हुए भी हमरे ज़माने के लोगों को जो आज भी कसरत करनी पड़ती है समय के साथ कदम ताल कर टाई वाला बनाने में. जीभ निकाल कर जिन्दगी के ई फास्ट चूहे दौड़ में हाँफते पिछुआये भागते चले जा रहे हैं,पर रास्ता पार नहीं पड़ रहा.पर अब बहुत हुआ, हमारे अगले जेनरेशन को ई सबसे निजात मिलना ही चाहिए. भला हो सरकार का जो हमलोगों की समस्या को भली परकार समझी है,इसीलिए तो अंगरेजी अब ओप्सनल विषय नहीं मुख्य विषय बना दिया गया है इस्कूली शिक्षा में..खाली एक विषय क्या ,बल्कि अब तो सारे ही विषय अंगरेजी में ही पढने पढ़ाने की सुगम व्यवस्था है अपने देश में.पांच हजार मासिक कमाने वाला अभिभावक भी आज अपने बच्चों को अंगरेजी माध्यम इस्कूल में ही पढ़ाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश के ई छोर से ऊ छोर तक गली गली चप्पे चप्पे पर सरकारी, गैर सरकारी ,सहकारी,बेकारी (बेरोजगार युवकों द्वारा चलाई जाने वाली) अंगरेजी इस्कूलों का जाल बिछ गया है और जोर शोर से पूरा परबंध कर दिया गया है कि देश में एक भी बच्चा ऐसा न बचे जिसे इस तिहरे ट्रांसलेशन के बोझ तले दबे कुचले रहना पड़े. गैर सरकारी बड़का इस्कूल सब में तो अंगरेजी ज्ञान के प्रति इतनी सजगता है कि एक तरह से अंगरेजी का रोड रोलर ही चला दिया जाता है बच्चों पर. इस्कूल प्रांगन में रहते कोई बच्चा अगर अपने संगी साथी या शिक्षक से अपनी मातृभाषा या हिन्दी में बतिया ले तो इससे कठोर दंडनीय अपराध और दूसरा कुछ भी नहीं होता..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरूरी है भाई,एतना सख्त नियम न रहे तो बच्चा सीखेगा कैसे. खुद गम खाए माँ बाप भी आज जबरदस्त सजग हो गए हैं.बच्चा शब्द बोलने भर हुआ कि नहीं उसको नाक आँख कान नहीं नोज आईज और इयर ही सिखाते हैं. और जो वाक्य बोलने भर हुआ तो बा बा बलैक शीप आ ट्विंकल ट्विंकल लिटिल इस्टार तुतलाते आवाज पर रोप देते हैं. इका माने का हुआ,अब यह नहीं बताया जाता. अंगरेजी का हिन्दी माने बताना अब बड़ा ही हेय दृष्टि से देखा जाता है.माना जाता है कि बच्चा बोलते बोलते और सुनते सुनते सब समझने लगेगा.बित्तन बित्तन भर के बच्चों को टीचर अंग्रेजी में हांक देते हैं और बच्चे भंगिमा देखकर अंदाजा लगा लेते हैं कि उन्हें क्या बोला जा रहा होगा. सहिये है , जबतक सोच के स्तर तक अंगरेजी न बिछे आदमी को इस ट्रांसलेशन रोग से निजात कैसे मिलेगा..भाई, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर झंडे गाड़ना है,हिन्दुस्तान को बुलंदी पर पहुँचाना है तो उसके लिए बहुत जरूरी है कि मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के मोह से आदमी किनारा करे और खाए पिए सोचे समझे सब खालिस अंगरेजी में... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ई पुनीत अभियान में फिल्म विज्ञापन तथा दृश्य संचार माध्यम तंत्र बड़ा रोड़ा अटका रहा है.. अब बताइए कि एक तरफ तो आदमी परेशान है देसी भदेसी भाषा से पीछा छुडाने में और&amp;nbsp;बाजार को इसी सब भाषा पर भरोसा है. उसको लगता है कि एही भाषा का घाघरा पहिन उसका प्रोडक्ट घर घर में घुस पायेगा. कहीं बीडी जलाइले गाना सिनेमा में ठूंसकर सिनेमा हिट कराने का लोग जुगत भिड़ाते हैं तो कहीं चुलबुल पाण्डेय के बिहारी इस्टाइल दिखाकर लोगों को लुभाते हैं. हम पहुँच गए बिना 'माने' कहे ए फॉर एप्पल और बी फॉर बाल पर...और अमिताभ बच्चन साहब कह रहे हैं- मीठा माने ??? अरे समझे सर,मीठा माने केड्बरीज चाकलेट ..पर सर ऐसे माने माने कहके सिस्टम न बिगाडिये.केतना मोसकिल से तो ई माने से पीछा छूटा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में आपलोग डेराते&amp;nbsp;बहुत हैं.आपको लगता है देसी भदेसी भासा का पंख पर अपना प्रोडक्ट बैठा दीजियेगा तो यह सफल उड़ान उड़ लेगा.लेकिन ऐसा नहीं है आप चाहे देसी हिन्दी में परचारिये या अंगरेजी में, अंगरेजी खान पान रहन सहन को अपनाने घर से निकल चुकी जनता को केवल ई जानकारी भर मिल जाए कि ई है अंगरेजी इस्टाइल ,बस जनता उसे सर माथे लगा अपने दिल में जगह दे देगी.&lt;br /&gt;का कहे विस्वास नहीं हो रहा....&lt;br /&gt;अरे !!! &lt;br /&gt;देख नहीं रहे ,आज की हमारी पीढी भात दाल को नहीं पिज्जा बर्गर और मैगी को ही खाद्य पदार्थ समझती है. आइसक्रीम और चाकलेट स्वतः ही उसके द्वारा मिष्टान्न रूप में स्वीकार्य हो चुकी है.रोजाना एक गिलास बियर पीना उसे स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक लगने लगा है. हाय सेक्सी...!!! आज हमारी बालाओं को गाली नहीं काम्प्लीमेंट लगती है.किशोर वय यदि बिना ब्वाय गर्ल फ्रेंड और डेटिंग के निकल जाय तो इन्हें जीवन और जवानी धिक्कारने लायक लगती है.पैर छूकर परनाम नहीं किया जाता आज, जानना मर्दाना एक दुसरे से मिलते हैं तो गाल से गाल सटाकर हवा में चुम्बन फायर किया जाता है...इतना सब तो हो गया है और क्या चाहिए. अरे अंगरेजी रंग में जितना आज हम भारतीय रंगे हैं, उतना&amp;nbsp;तो किसी पश्चिमी देश का मजाल नहीं कि रंग जाय..तो फिर और माने काहे को समझा रहे हैं. निश्चिन्त रहिये ...आप अन्ग्रेजिये में सब परचारिये न...बिक्री बट्टा होगा ही होगा..बल्कि हम तो कह रहे हैं कि अभी जेतना हो रहा है उससे बहुत जेयादा होगा.काहेकि अंगरेजी भाषा और प्रोडक्ट भारतीय को बिना कोई प्रमाण के ही अपार विश्वसनीय लगता है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;..................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-3056827395677310727?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/3056827395677310727/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=3056827395677310727&amp;isPopup=true' title='58 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/3056827395677310727'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/3056827395677310727'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='मीठा माने ????'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>58</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-6218462018173541880</id><published>2010-11-19T13:58:00.001+05:30</published><updated>2010-11-19T17:42:09.662+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रष्टाचार'/><title type='text'>अंधेर नगरी ....</title><content type='html'>कॉलेज में एक हमारे प्रोफ़ेसर थे.भारी विद्वान् .अपनी विद्वता के बल पर कई सारे गोल्ड मेडल जुटाए थे उन्होंने. उनके नाम के साथ सदा फलां फलां विषय में " एम् ए, पी एच डी, गोल्ड मेडलिस्ट " लिखा रहता था. हमने कभी पढ़ा तो नहीं पर सुन रखा था कि उन्होंने कई सारी किताबें लिख डाली हैं.. पर जब वे विद्वान् प्रोफ़ेसर साहब हमे पढ़ाने आते तो क्लास में बैठे उनकी ओर दीदे फाड़े हमें अपनी आँखों से नींद भागने के लिए ठीक उतनी ही मसक्कत करनी पड़ती थी, जितनी अमेरिका को बिन लादेन को ढूँढने में करनी पड़ रही है...हम भगवान् से एकदम कलपकर मनाते&amp;nbsp;कि कभी उन्घाये दुपहरिया में उन महामहिम का क्लास न पड़े..हर क्लास के ख़तम होने पर हम जी भरकर उस अनजाने व्यक्ति को गरियाते, जिसने इन्हें गोल्ड मेडल पकडाया और जिसने प्रोफ़ेसर बनाया. अगर अटेंडेंस पूरा करने की बाध्यता न होती तो शायद ही कोई विद्यार्थी उनकी क्लास अटेंड करता.प्रोफ़ेसर साहब विद्वान् चाहे जितने रहे हों पर पढ़ाने की कला का 'क' भी उन्हें नहीं पता था. खुद विद्वान् होना और दूसरे को विद्वान् बना देने की कला में बड़ा भारी अंतर होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज जब अपने प्रधान मंत्री जी की स्थिति देखती हूँ तो बरबस मुझे वही प्रोफ़ेसर साहब याद आ जाते हैं.हमारे प्रोफ़ेसर साहब भी बड़े ही भले मानुस थे और पहुंचे हुए विद्वान् भी,पर अध्यापन के जिस कर्म में वे संलग्न थे,एक तरह से विद्यार्थियों का भविष्य ही न चौपट कर रहे थे. अपने वृहत ज्ञान को विद्यार्थीयों के मन में उतनी ही कुशलता पूर्वक यदि वे उतार पाते ,तभी तो उनके ज्ञान की सार्थकता होती. भला नहीं होता कि वे बैठकर किताबें ही लिखते और विद्यार्थियों को एक ऐसा शिक्षक मिलता जो उनकी समझ के हिसाब से उन्हें विषय समझाकर विद्वान् बना पाता..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकतंत्र का ऐसा विद्वान् मालिक/नायक /कर्णधार किस काम का, जिसे अपने लोक का ही पता न हो..मन अत्यंत खिन्न और क्षुब्ध हो जाता है इनकी प्रशासन क्षमता देखकर.आखिर ऐसी भी क्या विवशता है, कि न तो ये देश के भीतर देश को तोड़ रहे तत्वों से निपट पा रहे हैं और न ही बाहरी विध्वंसक शक्तियों को प्रभावी ढंग से हडका पा रहे हैं..इनके एन नाक के नीचे भ्रष्टाचार&amp;nbsp; पराकाष्ठा&amp;nbsp;को प्राप्त कर चुका है, कैसे विश्वास करें कि इन सबमे इनकी संलिप्तता सह्भागिका या सहमति नहीं है ?? कैसे मान लें, तमाम भ्रष्ट और बेईमानो के बीच ये दूध के धुले पाक साफ़ हैं&amp;nbsp;? माना कि ये बस रबर स्टाम्प ही हैं और दिखावे भर के लिए ही कुर्सी इन्हें मिली है, लेकिन क्या उस कुर्सी में कोई शक्ति नहीं ?? यह कुर्सी क्या महज किसी मैडम के ड्राइंग रूम की कुर्सी भर है,जिसपर मालिकाना हक ये नहीं जता सकते ?? अरे कुछ नहीं तो ये स्वामिभक्त इतना तो स्मरण रख सकते हैं न, कि इस कुर्सी में देश की सौ करोड़ जनता की शक्ति है और कागज पर इन्हें जो अपरिमित अधिकार मिले हैं,वह कागज यूँ ही हल्की फुल्की हवा में उड़ जाने वाला कागज नहीं बल्कि उसपर सौ करोड़ जनता के हस्ताक्षर ने उसे इतना कीमती और वजनदार बना दिया है कि यूँ ही फूंक मार कोई उसे उड़ा नहीं सकता.. जो सत्य न्याय के पथ पर दृढ़ता से चलेंगे, देश के हर छोटे बड़े हित के लिए कठोर निर्णय लेंगे, तो भले इनका सारा कुनबा इनके विरुद्ध खड़ा हो जाए,जनता इनके पक्ष में ही रहेगी..और चाहे सब कुछ छोड़ दिया जाए,तो व्यक्तिगत तौर पर इतना मान इस कुर्सी का तो रख ही लेना चाहिए न कि आज इसी के बदौलत इनका यह खान पान और मान है.माना कि सरलमना स्वभाव से ही स्वामिभक्त हैं, तो कुछ वफादारी/जवाबदेही&amp;nbsp;&amp;nbsp;इनका कुर्सी/देश की जनता के प्रति भी बनता है या नहीं ??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भारत का दुर्भाग्य ही है कि आज इसके पास कांग्रेस का एक भी मजबूत और साफ़ सुथरा दृढ नैतिकता वाला विकल्प मौजूद नहीं है,नहीं तो कितना समय लगता इनकी जड़ उखड जाने में... एक समय इनके इन्ही रवैयों से मजबूर होकर जनता ने वर्षों के लिए सत्ता इनके लिए सपना बना दिया था.इन्हें क्यों नहीं लगता कि इनके लुभावने विज्ञापन जनता की आँखों को अधिक समय तक चुन्धियाये नहीं रख सकते.इनका विकल्प कोई हो या न हो पर मंहगाई भ्रष्टाचार का जो नंगा नाच अपनी खुली आँखों से जनता रोज देख रही है और पिस रही है,इतनी सरलता से इसे बिसरा मटिया देगी ?? और जो अगली बार फिर से खंडित जनादेश हुआ तो ये और कमजोर ही होंगे न...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य लगता है, घोटालों के जिस सच्चाई को सारा देश जान चुका होता है,जब जमकर उसपर हंगामा होता है,तो शीर्ष&amp;nbsp; सत्ता आहिस्ते से हिलते डुलते हुए मिमियाती सी आवाज़ में कहने के लिए उठती है कि "इसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा,जांच कराई जायेगी " और हल्ला अधिक बढा तो मांग लिया इस्तीफा और बिठा दिया सी बी आई जांच..हंसी आती है,कौन नहीं जानता सी बी आई की सच्चाई,कि यह किसके अधीन है.सी बी आई या एक्स वाय जेड आयोग जो दशकों दशकों में चार्ज फ़ाइल करेगी और दोषी तो तबतक दुनिया से भी आराम से खा पीकर उठ चुका होगा, ऐसी तो है अपने यहाँ दंड व्यवस्था. नाग नाथ को कुछ समय के लिए पुचकारकर पद से हटाया और सांपनाथ को बैठा दिया कुर्सी पर...हो गया न्याय !!! क्यों भला कोई डरेगा घोटाला करने से ?? ऐसी सुविधाजनक स्थिति तो इमानदार को भी बेईमान बना दे,फिर पहले से ही भ्रष्ट बेईमान की तो बात ही क्या.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या इतना भोला अंजान और लाचार है शीर्ष नेतृत्व ,कि इतने इतने पैसे निकल गए और इन्हें पता ही नहीं चला.कुछेक पदाधिकारी,इने गिने मंत्री ,बस इतनों की ही संलिप्तता है इन हजारों लाखों करोड़ों करोड़ के घोटालों में..बाकी सारे के सारे निरीह और भोले ?? हजारों करोड़ का घोटाला हो गया और धराये मधु कोड़ा..क्या अकेले मधु कोड़ा,ए राजा, रामालिंगम राजू,सुरेश कलमाडी आदि आदि ने ही गटक लिया सारा पैसा ?? इस पूरे क्रम में ये और इनके नीचे वालों की ही संलिप्तता थी ?? क्या हम विश्वास कर लें कि इन इकलौते जांबाजों का ही हाजमा इतना दुरुस्त है ??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मधु कोड़ा एक निर्दलीय, झारखण्ड के मुख्यमंत्री क्यों बनाये गए ?? क्योंकि उस पूरे समूह में वही एक सबसे फिट कैंडिडेट थे,जिसके मुंह में जुबान,मन में हिम्मत और माथा में तिड़कमी दिमाग नहीं था.यही आदमी रबर स्टाम्प की तरह काम कर सकता था,जिसे जब चाहा जुतिया दिया ,जब चाहा चुमिया दिया और जो चाहा करवा लिया.लालू जी को क्या राजद में कोई योग्य व्यक्ति नहीं मिला था जब वे जेल नशीन हुए थे ?? या कि राजद के सभी योग्य नेताओं को रबरी देवी ही सबसे कुशल,सबसे योग्य प्रशासक लगी थीं ?? कोड़ा से मनमोहन तक,इन अनेक&amp;nbsp;उदाहरणो&amp;nbsp; का क्यों कैसे का हिसाब आम जनता के लिए इतना भी अबूझ नहीं रह गया है अब...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस यही लगता है, क्या कभी भारत की वह जनता जो अपने बच्चों को भरपेट रोटी भले न खिला पाए,तन न ढांक पाए,इलाज न करा पाए और अच्छी शिक्षा तो यूँ भी बड़ी मंहगी है,सो सवाल ही नहीं उठता... नमक खरीदने पर दिए टैक्स से लेकर प्रत्यक्ष परोक्ष कदम कदम पर टैक्स भरती है,कभी जान पायेगी कि उसके पैसों का क्या क्या हो रहा है या इसे अनैतिक ढंग से किस किस ने और कितना कितना खाया ?? यह जनता क्या यह आस संजो सकती है कि जो इने गिने मंत्री संतरी जगजाहिर हो पकडाए भी, उनसे वह अपार धन वसूला जाएगा और वह धन सरकारी खजाने में जमा कर जनता को टैक्स और मंहगाई से राहत मिल जायेगी ?? क्या आम जनता यह अपेक्षा कर सकती है कि कभी भी किसी सरकारी महकमे में छोटे से छोटे काम से लेकर बड़े काम तक करवाने में उसे रिश्वत नहीं देनी पड़ेगी ?? क्या आम जनता मन में यह विश्वास रख सकती है कि लोकतंत्र के तथाकथित रक्षक की आत्मा जग जायेगी और वह सचमुच ही उसके आर्थिक सामाजिक धार्मिक सांस्कृतिक हितों की निरपेक्ष भाव से रक्षा करेगी ??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;........&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-6218462018173541880?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/6218462018173541880/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=6218462018173541880&amp;isPopup=true' title='45 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/6218462018173541880'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/6218462018173541880'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/11/blog-post_19.html' title='अंधेर नगरी ....'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>45</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-171413116648072470</id><published>2010-11-01T17:59:00.008+05:30</published><updated>2010-11-23T17:02:28.142+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता.'/><title type='text'>तरु और लता...</title><content type='html'>&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;कहीं किसी एक कानन में, था सघन वृक्ष एक पला बढ़ा,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;था उन्नत उसका अंग अंग, गर्वोन्नत भू पर अडिग अड़ा.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;वहीँ पार्श्व में पनपी थी, कोमल तन सुन्दर एक लता. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;नित निरख निरख तरु की दृढ़ता, हर्षित उसका चित था डोला.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;तरुनाई कोमलता उसकी , तरुवर के मन को भी भायी,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;निज शाख झुकाकर उसने भी, कोंपल की उंगली थाम ही ली. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;प्रिय ने जो अंगीकार किया, तन मन अपना वह वार चली,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;हर शाख शाख पत्ते पत्ते, लिपटी लिपटी वह खूब खिली.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;था प्रेम प्रगाढ़ ही दोनों में,पर तरु का मन था अहम् भरा,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;आश्रयदाता अवलम्बन वह ,यह भी मन में था बसा रहा.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;लघु तुच्छ सदा उसे ठहरा कर, तरु तुष्टि बड़ा ही पाता था,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;निज लाचारी को देख ,लता का ह्रिदय क्षुब्ध हो जाता था.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;था आत्मविश्वास न रंचमात्र, जो प्रतिकार वह कर पाती,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;अपमान गरल नित पी पीकर, भाग्य मान सब सह जाती. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;आशंका से मन था कम्पित, कहीं तरु निज हाथ छुड़ा न ले,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;कैसे उस बिन जी पायेगी, कहाँ जायेगी इस तन को ले.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;तरु ने यदि त्याग दिया उसको,फिर कहाँ ठौर वह पायेगी,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;जो भूमि पड़ी उसकी काया, नित पद से&amp;nbsp; कुचली जायेगी.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;था पड़ा सुप्त उसका चेतन, उसको न किंचित भान रहा,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;योगक्षेम वाहक जग का, अखिलेश्वर केवल एक हुआ.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;जीवन दाता सब जीवों का, सुखकर्ता सबका दुःख हरता,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;उसकी कृति ही हर एक प्राणी,नहीं कोई हीन न कोई बड़ा. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;सत का सूरज उर में प्रकटा , निर्भय विभोर निश्चिन्त हुई,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;मृदुस्वर से प्रिय को समझाकर, उस से हित की ये बात कही.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;है सत्य मेरे आधार तुम्ही, तेरे प्रश्रय से विस्तार मेरा,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;तुम सदा रहे रक्षक मेरे, तुमसे सुरभित संसार मेरा.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;पर तुच्छ नहीं मैं भी इतनी, है व्यर्थ नहीं मेरा होना,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;जिस सर्जक की तुम रचना हो,वह ही तो मेरा हेतु बना.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;माना कि तुम सम बली नहीं,तुम सा मेरा सामर्थ्य नहीं,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;पर कर्तब्य परायण मैं भी हूँ, कभी छोड़ा तेरा संग नहीं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;तुम मुझे सम्हाले रहते हो, तो मैं भी तो रक्षक तेरी,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;हो धूप कि आंधी या वर्षा,तुझसे पहले मैं सह लेती .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;विपदा जो तेरी ओर बढे ,मैं सदा ढाल बन अडती हूँ ,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;मेरे होते कोई वार करे, यह कभी न मैं सह सकती हूँ. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;चाहा तेरा है साथ सदा, चाहे जिस ओर गति तेरी,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;यूँ ही जीवन भर संग रहूँ , नहीं दूजी कोई साध मेरी.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;फिर क्या तुलना क्या रंज भेद, क्यों मन में कोई घाव भरें,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;आ स्नेह से हिल मिल संग रहें,क्यों सुखमय जीवन नष्ट करें. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;था सार छुपा इसमें सुख का, तरुवर के मन को भी भाया,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;जो अहम् बना दुःख का कारण, तरुवर ने उसको त्याग दिया.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white; color: blue;"&gt;...........&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-171413116648072470?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/171413116648072470/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=171413116648072470&amp;isPopup=true' title='39 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/171413116648072470'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/171413116648072470'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='तरु और लता...'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>39</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-4899439489303860601</id><published>2010-10-22T14:05:00.003+05:30</published><updated>2010-10-28T14:49:26.819+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रेम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नैतिक मूल्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><title type='text'>अँधा प्रेम !!!</title><content type='html'>प्रेम,एक ऐसी दिव्य अनुभूति, जिससे सुन्दर,जिससे अलौकिक संसार में और कोई अनुभूति नहीं.जब यह ह्रदय में उमड़े तो फिर सम्पूर्ण सृष्टि&amp;nbsp;रसमय सारयुक्त लगने लगती है.ह्रदय विस्तृत हो ब्रह्माण्ड में और ब्रह्माण्ड ह्रदय में समाहित हो जाता है. मन और कल्पनाएँ अगरु के सुवास से सुवासित और उस जैसी ही हल्की हो व्योम में धवल मेघों के परों पर सवार हो चहुँ ओर विचरने लगता है. मन तन से और तन मन से बेखबर हो जाता है. यह बेसुधी ही आनंद का आगार बन जाती है.पवन मादक सुगंध से मदमाने लगता है और मौन में संगीत भर जाता है. जीवन सार्थकता पाया लगता है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुष्य ही क्या संसार में जीवित ऐसा कोई प्राणी नहीं, जो प्रेम की भाषा न समझता हो और इस दिव्य अनुभूति का अभिलाषी न हो . आज तक न जाने कितने पन्ने इस विषय पर रंगे गए परन्तु इसका आकर्षण ऐसा, इसमें रस ऐसा, कि न तो आज तक कोई इसे शब्दों में पूर्ण रूपेण बाँध पाया है और न असंख्यों बार विवेचित होने पर भी यह विषय पुराना पड़ा है.आज ही क्या, सृष्टि&amp;nbsp;के आरम्भ से इसके अंतिम क्षण तक यह भाव,यह विषय, अपना शौष्ठव,अपना आकर्षण नहीं खोएगा, क्योंकि कहीं न कहीं यही तो इस श्रृष्टि का आधार है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना जाता है प्रेम सीमाएं नहीं मानता. यह तो अनंत आकाश सा असीम होता है और जो यह मन को अपने रंग में रंग जाए तो ह्रदय को नभ सा ही विस्तार दे जाता है.प्रेम का सर्वोच्च रूप ईश्वर और ईश्वर का दृश्य रूप प्रेम है..और ईश्वर क्या है ?? करुणा,प्रेम, परोपकार इत्यादि समस्त सद्गुणों का संघीभूत रूप. तो तात्पर्य हुआ जो हृहय प्रेम से परिपूर्ण होगा वहां क्रोध , लोभ , इर्ष्या, असहिष्णुता, हिंसा इत्यादि भावों के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा. प्रेमी के ह्रदय में केवल ईश्वर स्वरुप सत का वास होगा और जहाँ सत हो, असत के लिए कोई स्थान ही कहाँ बचता है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर वास्तविकता के धरातल पर देखें, ऐसा सदैव होता है क्या ?? प्रेम पूर्णतया दैवीय गुण है,परन्तु इसके रहते भी व्यक्ति अपने उसी प्रेमाधार के प्रति शंकालु , ईर्ष्यालु , प्रतिस्पर्धी, स्वार्थी, कपटी,क्रोधी,अधीर होता ही है. तो क्या कहें ?? प्रेम का स्वरुप क्या माने ?? हम दिनानुदिन तो देखते हैं, प्रेम यदि ह्रदय को नभ सा विस्तार देता है तो छुद्रतम रूप से संकुचित भी कर देता है और कभी तो दुर्दांत अपराध तक करवा देता है. फिर क्या निश्चित करें ? क्या यह मानें कि प्रेम व्यक्ति की एक ऐसी मानसिक आवश्यकता है,जो अपने आधार से केवल सुख लेने में ही विश्वास रखता है, प्रेम के प्रतिदान का ही आकांक्षी होता है? प्रेमी उसकी प्रशंशा करे, उसपर तन मन धन न्योछावर कर दे, उसके अहम् और रुचियों को सर्वोपरि रखे, उसे अपना स्वत्व समर्पित कर दे,तब प्रेमी को लगे कि उसने सच्चे रूप से प्रेम पाया...क्या यह प्रेम है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या इस भाव को जिसे अलंकृत और महिमामंडित कर इतना आकर्षक बना दिया गया है, वैयक्तिक स्वार्थ का पर्यायवाची नहीं ठहराया जा सकता ? एक प्रेमी चाहता क्या है? अपने प्रेमाधार का सम्पूर्ण समर्पण ,उसकी एकनिष्ठता,उसका पूरा ध्यान ,उसपर एकाधिकार, उसपर वर्चस्व या स्वामित्व, कुल मिलाकर उसका सर्वस्व. एक सतत सजग व्यापारी बन जाता है प्रेमी,जो व्यक्तिगत लाभ का लोभ कभी नहीं त्याग पाता. लेन देन के हिसाब में एक प्रेमी सा कुशल और कृपण तो एक बनिक भी नहीं हो पाता.हार और हानि कभी नहीं सह सकता और जहाँ यह स्थिति पहुंची नहीं कि तलवारें म्यान से बाहर निकल आतीं हैं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेम पाश में आबद्ध प्रेमी युगल प्रेम के प्रथम चरण में परस्पर एक दूसरे में सब कुछ आलौकिक देखता है.जो वास्तव में सामने वाले में रंचमात्र भी नहीं,वह भी परिकल्पित कर लेता है. सामने वाले में उसे रहस्य और सद्गुणों का अक्षय भण्डार दीखता है..युगल परस्पर एक दूसरे के गहन मन का एक एक कोना देख लेने,जान लेने और उसे आत्मसात कर लेने की सुखद यात्रा पर निकल पड़ते हैं. आरंभिक अवस्था में युगल एक दूसरे के लिए अत्यधिक उदार रहते हैं, प्रतिदान की प्रतिस्पर्धा लगी रहती है,जिसमे दोनों अपनी विजय पताका उन्नत रखना चाहते हैं, पर जैसे जैसे ह्रदय कोष्ठक की यह यात्रा संपन्न होती जाती है,कल्पनाओं का मुल्लम्मा उतरने लगता है,यथार्थ उतना सुन्दर ,उतना आकर्षक नहीं लगता फिर. रहस्य जैसे जैसे संक्षिप्तता पाता है,कल्पना के नील गगन में विचारने वाला मन यथार्थ के ठोस धरातल पर उतरने को बाध्य हो जाता है,जहाँ कंकड़ पत्थर कील कांटे सब हैं..इसे सहजता से स्वीकार करने को मन प्रस्तुत नहीं होता और तब आरम्भ होता है हिसाब किताब,कृपणता का दौर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो युगल एक दूसरे के लिए प्राण न्योछावर करने को आठों याम प्रस्तुत रहते थे, अपने इस प्रेम को जीवन की सबसे बड़ी भूल मानने लगते हैं,इस परिताप की आंच में जलते प्रेमी क्षोभ मिटाने को सामने वाले को अतिनिष्ठुर होकर दंडित करने लगते हैं और एक समय के बाद इस प्रेम पाश से मुक्ति को छटपटाने लगते हैं या फिर एक बार फिर से एक सच्चे प्रेम की खोज में निकल पड़ते हैं. कहाँ है प्रेम,किसे कहें प्रेम ?? इस युगल ने भी तो बादलों की सैर की थी तथा प्रेम के समस्त लक्ष्ण जिए थे और मान लिया था कि उनका यह प्रेम आलौकिक है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब एक और पक्ष -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेम स्वतःस्फूर्त घटना है,जो किसे कब कहाँ किससे और कैसे हो जायेगा ,कोई नहीं कह सकता..इसपर किसी का जोर नहीं चलता और न ही यह कोई नियम बंधन मानता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अस्तु,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पचहत्तर हजार आबादी वाला एक गाँव, जिसमे पांच महीने में चौदह वर्ष से लेकर पचपन वर्ष तक के छः प्रेमी जोड़े अपना स्वप्निल संसार बसाने समाज के समस्त नियमों के जंजीर खंडित करते घर से भाग गए.यह आंकडा उक्त गाँव के स्थानीय पुलिस थाने में दर्ज हुए जिसे लोगों ने जाना. ऐसे कितने प्रकरण और हुए जिसे परिवार वालों ने लोक लाज के बहाने दबाने छिपाने का प्रयास किया,कहा नहीं जा सकता. इन छः जोड़ों में से तीन जोड़ा था ममेरे चचेरे भाई बहनों का,एक जोड़ा मामा भगिनी का, एक जोड़ा गुरु शिष्या का और एक जोड़ा जीजा साली का. निश्चित रूप से उसी अलौकिक प्रेम ने ही इन्हें कुछ भी सोचने समझने योग्य नहीं छोड़ा.यह केवल स्थान विशेष की घटना नहीं,विकट प्रेम की यह आंधी सब ओर बही हुई है जो अपने वेग से समस्त नैतिक मूल्यों को ध्वस्त करने को प्रतिबद्ध है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर प्रेम तो प्रेम होता है,इसमें सही गलत कुछ नहीं होता,मान कर इन घटनाओं को सामाजिक स्वीकृति/मान्यता मिल जानी चाहिए क्या ?? यह यदि आज गंभीरता पूर्वक न विचारा गया तो संभवतः मनुष्य और पशु समाज में भेद करना कठिन हो जायेगा. शहरों महानगरों में गाँवों की तरह सख्त बंदिश नहीं होती और वहां परिवार तथा आस पड़ोस में ही प्रेम के आधार ढूंढ लेने की बाध्यता भी नहीं होती ,इसलिए वहां चचेरे ममेरे भाई बहनों में ही यह आधार नहीं तलाशा जाता..पर एक बार अपने आस पास दृष्टिपात किया जाय..आज जो कुछ यहाँ भी हो रहा है,सहज ही स्वीकार लेना चाहिए?? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंपरा आज की ही नहीं ,बहुत पुरातन है, पर आज बहुचर्चित है..यह है "&lt;strong&gt;आनर किलिंग&lt;/strong&gt;". इसके समर्थक और विरोधी दोनों ही अपना अपना पक्ष लेकर मैदान में जोर शोर से कूद पड़े हैं.पर "आनर किलिंग" के नाम पर न तो डेंगू मच्छरों की तरह पकड़ पकड़ कर प्रेमियों का सफाया करने से समस्या का समाधान मिलेगा और न ही प्रेम को इस प्रकार अँधा मान कर बैठने से सामाजिक मूल्यों के विघटन को रोका जा सकेगा . आज आवश्यकता है व्यक्तिमात्र द्वारा व्यक्तिगत नैतिकता,सामाजिक मूल्यों की सीमा रेखाओं को सुदृढ़ करने की और प्रेम के सच्चे स्वरुप को पहचानने और समझने की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;समग्र रूप में जो प्रेम व्यक्ति के ह्रदय को नभ सा विस्तृत न बनाये,फलदायी सघन उस वृक्ष सा न बनाये जो अपने आस पास सबको फल और शीतल छांह देती है,जो व्यक्ति को सात्विक और उदार न बनाये,उसका नैतिक उत्थान न करे , वह प्रेम नहीं, प्रेम का भ्रम भर है. प्रेम अँधा नहीं होता,बल्कि उसकी तो हज़ार आँखें होती हैं जिनसे वह असंख्य हृदयों का दुःख देख सकता है और उनके सुख के उद्योग में अपना जीवन समर्पित कर सकता है..&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-4899439489303860601?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/4899439489303860601/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=4899439489303860601&amp;isPopup=true' title='44 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/4899439489303860601'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/4899439489303860601'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='अँधा प्रेम !!!'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>44</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-7222951198925230376</id><published>2010-09-27T16:36:00.004+05:30</published><updated>2010-10-05T13:22:02.058+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वंदना..'/><title type='text'>आन बसो हिय मेरे.....</title><content type='html'>&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;प्रभुजी प्यारे ,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;आन बसो हिय मेरे...&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;साँसों से मैं डगर बुहारूँ,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;नैनन जल से पाँव पखारूँ,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;चुन चुन भाव के मूंगे मोती,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;हार तुझे पहनाऊं ...&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;हे स्वामी प्यारे,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;आन बसो हिय मेरे...&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;लाख चौरासी योनि भटका,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;मानुस तन को ये मन तरसा,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;तब ही जीव पाए यह काया ,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;जब तूने उसे परसा ...&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;ओ ठाकुर न्यारे,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;ना छोडो कर मेरे....&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;प्रभुजी प्यारे,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;आन बसो हिय मेरे...&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;तू न बसे जो ह्रदय हमारे,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;मोह गर्त से कौन उबारे,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;पञ्च व्याधि ले डोरी फंदा,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;बैठा सांझ सकारे ...&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;ओ पालन हारे,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;त्रिताप हरो हमारे ....&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;प्रभुजी प्यारे,&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;आन बसो हिय मेरे...&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;.......... &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-7222951198925230376?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/7222951198925230376/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=7222951198925230376&amp;isPopup=true' title='46 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/7222951198925230376'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/7222951198925230376'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/09/blog-post_27.html' title='आन बसो हिय मेरे.....'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>46</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-6315210056209940344</id><published>2010-09-15T17:14:00.008+05:30</published><updated>2010-09-19T12:52:55.390+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी..'/><title type='text'>किला फतह</title><content type='html'>परीक्षा फल तीन महीने बाद निकलने वाला था,सो उसबार वहां गयी तो पूरे ढाई महीने रहने का अवसर मिल गया ... आनंद सर्वत्र पसरा पड़ा था वहां जिसमे हम दिन रात डूबते उतराते रहते थे..आनंद के अजस्र स्रोतों मध्य सर्वाधिक  सुखकारी उसका वह साहचर्य सुख ही  था जो मेरी ममेरी बहन की सहपाठी सातवीं कक्षा में अध्यनरत छात्रा थी.. प्रतिदिन सुबह विद्यालय जाने से पूर्व वह यहाँ अपनी सखी को संग लेने आया करती थी. पहली बार जब उसपर दृष्टि पड़ी थी तो ठिठक कर रह गयी थी..उसके भोलेपन और अनिद्य सौंदर्य ने ह्रदय को ऐसे बाँधा कि उसके सानिध्य को यह विकल रहने लगा था.. बहन को मैंने मना लिया कि विद्यालय से वापसी में प्रतिदिन उसे वह अपने साथ लेती आये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूध में गुलाब की पंखुडियां घोल शायद ईश्वर ने उसे रंग दिया था. हंसती तो रक्ताभ कपोल ह्रदय में उजास भर देते थे.. बड़ी बड़ी विस्तृत आँखें और सघन पलकें बिना काजल लगाये भी कजरारी लगतीं थीं और उसके अधर...उफ़ !!! बात बात पर उसका खिलखिलाना किसी भी मुरझाये मन को तरोताजा करने में समर्थ था. जान बूझ कर मैं उन दोनों को अपने पास बिठा लेती और कभी कहानियां सुना तो कभी चुटकुले उन्हें भरमाती..वे मुग्ध हो अपने मुख मंडल पर प्रसंगोनुकूल भाव बिखेरतीं और मैं विभोर होकर अपने हिस्से का रस लेती..कभी कहीं किसी पटचित्र  में राधा रानी की मनोहारी छवि देखी थी, उस बाला में मुझे वही रूप साकार दीखता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे उस पूरे प्रवास में यह  क्रम कभी बाधित न हुआ था.. वहां से वापसी से हफ्ते भर पहले पता चला कि उसका विवाह सुनिश्चित हो गया है जो कि छठवें ही दिन होनेवाला है...बैठक में उसके दादाजी मेरे नानाजी को न्योतने आये थे..तिलमिलाती हुई मैं उनके सम्मुख पहुँची. हालाँकि तब मेरी भी अवस्था ऐसी न थी कि कोई मुझ किशोरी को गंभीरता से लेता. पर इससे मैं अपने प्रश्न पूछने की अर्हता थोड़े न खोने वाली थी..मैंने जाकर प्रश्न दाग ही दिया..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संभवतः वे स्वयं ही अपना पक्ष रख शान बघारने और मेरे नानाजी को सीख देने के लिए इस प्रश्न की आकांक्षा कर रहे थे, सो अतिउत्साहित हो उन्होंने अपना पक्ष रखा ..." हमारे मैथिल समाज में कन्यादान की परंपरा है..कन्या का अर्थ है ऐसी कन्या, जो सचमुच ही कन्या हो. यदि कन्या अपने मायके में ही बड़ी ही जाती है तो माता पिता नरकगामी होते हैं. समय भले कितना भी बदल गया हो,पर हमारे वंश में आजतक इस परंपरा का खंडन न हुआ है और न होगा...." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले छः दिन मैं तिलमिलाती रही और ठान लिया था कि जो हो जाए, किसी स्थिति में नहीं जाउंगी इस विवाह में..पर न जाने कौन सी डोर थी जिसमे आबद्ध  सम्मोहित सी अन्य परिवार जनों संग मैं उनके घर की ओर बढ़ चली..जब हम पहुंचे,द्वार पूजा संपन्न हो चुकी थी और अगले रीति की प्रतीक्षा में वर अपने संगी साथियों संग पंडाल में ही विराज मान थे..माथे पर सुशोभित मौर के कारण वर का मुख मंडल तो न दिखा पर उनका पहलवान सा डील डौल मेरी पिंडलियों को कंपकपा गया...वहां हँसी हिलोड़ का माहौल था और गुजरते हुए मेरे कानों में वर के एक संगी का स्वर गया - "देखो, आज जदि किला फतह न किया न...तो फिर......, फिर जीवन भर गुलाम बने रहना ,सो ध्यान रहे......हा हा हा हा....." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पीली साड़ी और आभूषण से सुसज्जित उस गुडिया का मुग्धकारी रूप नैनों को ऐसे मोह गया कि पलकें, कई पल को अपना स्वाभाविक गुण ही भूल गयीं.एकटक स्थिर हो गयीं उसपर जाकर.पर यह अवस्था अधिक देर तक न रह पाई.जैसे ही परिस्थिति का ध्यान आया, आँखें धार बहाने लगीं.उनके घर के निकट ही हमारा घर था, छोटी बहन को नानी को बता देने को कह मैं घर वापस चली आई...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नानी मामी जब वापस आयीं तो वर और वर के घर के गुण बखाने नहीं अघा रही थीं..कई पीढ़ियों से लक्ष्मी जी ने झा जी के घर में स्थायी  निवास बना रखा था.पर सरस्वती जी की कृपा दृष्टि उन्हें अबतक न मिली थी.. झा जी ने अपने जीवन में बड़ा प्रयास किया पर दो पीढ़ियों में न तो कोई बाल बच्चा उच्च शिक्षा पा सका न ही चाहकर भी अबतक वे कोई इंजीनियर डाक्टर दामाद दरवाजे पर उतार पाए थे. परन्तु इस बार ईश्वर ने उनकी साध पूरी कर दी थी.. वर के घर केवल लक्ष्मी जी ही नहीं सरस्वती जी भी बसती थीं.वर बिजली विभाग में कनीय अभियंता थे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसबार जो ननिहाल से वापस आई तो फिर दो वर्ष बाद ही ममेरे भाई के विवाह के अवसर पर पुनः जाने का सुयोग बना ..प्रणाम पाती, कुशल क्षेम ,भोजन इत्यादि का उद्योग संपन्न हुआ ही था कि छोटी बहन पूछ बैठी...दीदी आपको मेरी वो सखी याद है ?? मिलेंगी उससे ??? मेरा ह्रदय उस स्मृति गंध से आलोड़ित हो गया.तीव्र उत्कंठित हो मैंने उससे आग्रह किया कि बाकी सब बाद में होता रहेगा,पहले तू मुझे उससे मिलवा दे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक अच्छी परंपरा थी उनमे, कि विवाह भले बाल्यावस्था में हो जाए पर द्विरागमन(गौना) कम से कम तीन, पांच या सात वर्ष बाद ही हुआ करता था.दामाद भले अपने ससुराल आता जाता रहता था,पर कन्या गौने के बाद ही अपने ससुराल जाती थी. अभी उसका गौना नहीं हुआ था इसलिए वह यहीं रह रही थी..लम्बे डग भरते हम उसके घर पहुँच गए.बड़ा परिवार था उनका , कई महिलायें आँगन में विराजित थीं. शिष्टाचार निभाते पैर छूने का अभियान चल पड़ा और इसी क्रम में बच्चे को गोद में लिए मैंने जिसके पैर छुए ,अनायास वहां हंसी की फुहार फूट पडी .. वह भी लपक कर पीछे हट गई. सिर उठाकर देखा तो प्रथम दृष्टया पहचान न पाई..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहन ने झकझोरा...अरे दी, नहीं पहचाना आपने...इसी से तो मिलने दौड़ी हुई आयीं थीं आप. ध्यान से देखा, तो कलेजा दरक गया. वह जो छवि मन में बसी थी,उसकी क्षीण सी रेखा बची थी वहां. पूरा चेहरा बरौनियों से भरा हुआ. रंग उतरकर गेहूंआ भी नहीं बच गया था. लम्बी अवश्य हो गई थी पर लावण्यता रंचमात्र भी न बची थी उसमे.. कहीं अनजाने में यदि देखती तो किसी हालत में उसे नहीं पहचान पाती मैं..एक और धमाका हुआ...बताया गया कि यह गोद का बालक उसी का कोखजाया है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किला केवल फतह ही नहीं हुआ था, अपितु  उसे पूर्णतः ध्वस्त भी कर दिया गया था..... &lt;br /&gt;...............&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-6315210056209940344?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/6315210056209940344/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=6315210056209940344&amp;isPopup=true' title='46 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/6315210056209940344'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/6315210056209940344'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/09/blog-post_15.html' title='किला फतह'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>46</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-8028762165685313003</id><published>2010-09-09T17:39:00.004+05:30</published><updated>2010-09-09T23:53:39.864+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुराण कथा..'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आध्यात्म'/><title type='text'>दानवीर राजा बलि !!!</title><content type='html'>राजा बलि विष्णु के अनन्य उपासक भक्तप्रवर प्रहलाद के पौत्र थे. थे तो राक्षस कुल के , परन्तु परम सात्विक तथा भगवान् विष्णु के परम भक्त थे. सदाचारी राजा सत्कार्य में लीन रह प्रजा का पुत्रवत पालन करते. इनकी दानशीलता जगद्विख्यात थी. इनके द्वार से कोई याचक रिक्तकर कभी न लौटा था. परन्तु कालांतर में इसी बात का राजा बलि को अभिमान हो गया. सर्वविदित है, भक्त का अभिमान प्रभु का भोजन हुआ करता है.तो जैसे भगवान् ने महर्षि नारद का मोह और अहंकार भंग किया था, वैसे ही अपने इस भक्त के चरित्रमार्जन को भी प्रस्तुत हो गए..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन जब राजा बलि पूजनोपरांत याचकों को दान देने हेतु द्वार से बाहर आये तो उन्होंने क्षत्र तथा कमण्डलु धारण किये बावन उंगली के बाल याचक को देखा. राजन ने सबसे पहले उन्ही से उनके अभीष्ट की जिज्ञासा की और वामन ने उनसे तीन पग भूमि दान में माँगा. राजन आश्चर्यचकित हो गए उन्हें याचक के बुद्धि विवेक पर अपार शंका हुई और उन्होंने सोचा कि  हो सकता है याचक अपनी क्षमता से अनभिज्ञ है.अब यह छोटा बालक कितने भी प्रयास से भूमि पर डग भरेगा  तो भी कितनी भूमि घेर पायेगा. अतः उसकी सहायतार्थ उन्होंने उनसे आग्रह किया कि इतनी तुच्छ वस्तु मांग वे उन्हें लज्जित न करें.वे चाहें तो कुछ गाँव अथवा राज्य ही मांग लें अन्यथा कुछ बहुमूल्य ऐसा मांगे जिसे देने में भी उन्हें प्रसन्नता हो.पर वामन भी थे कि अड़ गए कि उन्हें चाहिए तो तीन पग भूमि या नहीं तो कुछ नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हार कर राजन ने उनका प्रस्ताव स्वीकार लिया . पर वामन भी कम न थे..उन्होंने राजन से कहा कि ऐसे ही न लूँगा, पहले आप संकल्प कीजिये और वचन दीजिये कि बाद में आप न मुकरेंगे तभी मैं अपनी इच्छित लूँगा. मामला उलझा देख राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य ने जब अपनी दिव्य दृष्टि से देखा तो याचक और उसकी उसकी मंशा सब उनके सम्मुख प्रकट हो गयी..उन्होंने राजा को समझाना प्रारंभ किया कि वे इस वामन की बातों में न आयें ,यह छलिया है उन्हें कहीं का न छोड़ेगा.परन्तु वचनबद्ध राजन कब पीछे हटने वाले थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजन दानी और वामन यजमान बन कुश के आसन पर विराजे और वामन ने अपने कमण्डलु का जल संकल्प के लिए कुश पकडे राजन के कर में डालने का उपक्रम किया.इधर जब शुक्राचार्य ने बात बनती न देखी तो अपने योग बल से वे अतिशूक्ष्म रूप धर कर कमण्डलु की टोंटी में जाकर बैठ गए और जलधार को ही अवरुद्ध कर दिया. उन्हें भय हुआ कि राजन का सब कुछ दान में जब यह वामन ही ले लेगा तो मेरे लिए क्या बचेगा.अतः इस कार्य को बाधित करना अतिआवश्यक था..इधर जल धार अवरुद्ध देख वामन ने अपने कुषाशन से एक कुषा खींचकर टोंटी में डाल कर खरोंच दिया जिससे कि अवरोध दूर हो जाय. कुषा जाकर सीधे शुक्राचार्य की आँख में लगी और रुधिर प्रवाह होने लगा.छटपटाकर शुक्राचार्य जी बाहर निकले और एक आँख वाले काने बनकर रह गए. तभी से यह कहावत चल पड़ी कि दान में जो विघ्न डाले,नजर लगाये, वह काना हो जाता है.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संकल्प पूरा हुआ और राजन ने वामन से कहा कि अब इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जहाँ की भी भूमि लेना चाहें निःसंकोच ले लें.वामन, अबतक जो बावन उंगली के थे, ने अपना विराट रूप प्रकट किया और एक पग पाताल पर रख धरती होते हुए दूसरे पग से सारा आकाश नाप लिया और तीसरा पग धरने को राजन से स्थान माँगा. राजन सोच में पड़ गए,परन्तु त्वरित गति से उनकी पत्नी ने जो कि परम विदुषी ही नहीं विष्णुभक्त भी थी,ने स्थिति सम्हाली. उसने प्रभु का आशय समझ लिया और राजन को समझाया कि अभी तक तो आपने भौतिक भूमि दान किया है, पंचतत्वों से निर्मित आपका यह शरीर भी तो भूमि सामान ही है जो अभी बच ही रहा है,अब इसे प्रभु को अर्पित कर दें..राजन ने झट अपना शीश प्रभु के सम्मुख नत कर स्वयं को प्रभु को अर्पित कर दिया..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजन परम भक्त थे ,परन्तु मोह ने उन्हें विभ्रम में डाल दिया था.वे जानते थे कि इस ब्रह्माण्ड के एकाधिकारी प्रभु ही हैं ,पर इस बात को वे व्यवहार और स्मरण में नहीं रख पाए थे.तभी तो वे किसी को भी कुछ यह सोचकर देते थे कि अपनी वस्तु वे दान कर रहे हैं.प्रभु पर उनकी श्रद्धा थी,पर उन्होंने अबतक स्वयं को पूर्ण रूपेण प्रभु को समर्पित नहीं किया था, तभी तो सहज ही अहंकार ने उन्हें ग्रस लिया था. और प्रभु उन्हें पूर्णतः दुर्गुणों से मुक्त कर पवित्र कर देना चाहते थे. प्रभु अपने सच्चे भक्तों की देख भाल ठीक ऐसे ही करते हैं जैसे एक वैद्य अपने रोगी की करता है.प्रभु ने भी अपने इस परम स्नेही भक्त के इस रोग से त्राण के लिए यह स्वांग रचा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजन ने जब स्वयं को निश्छल भाव से प्रभु को समर्पित कर दिया तो भगवान् अति प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा बलि से पुरुष्कार स्वरुप इच्छित वर मांगने को कहा. बलि अबतक समझ चुके थे कि प्रभु पर आस्था होते हुए भी चूँकि आजतक उन्होंने उन्हें अपने चित्त का प्रहरी न बनाया था तो सहज ही दुर्गुणों ने उनपर अपना आधिपत्य जमा लिया .तो जबतक इस चित्त के प्रहरी स्वयं विष्णु न होंगे माया से बचे रहना संभव नहीं है. सो उन्होंने प्रभु से आर्त प्रार्थना की कि अब से प्रभु सदैव उनके नयनों के सम्मुख रहें और किसी भी प्रकार के दुर्गुण दोष से उनकी रक्षा ठीक ऐसे ही करें जैसे एक स्वामिभक्त द्वारपाल सतत सजग रह द्वार पर डटे अपने राजा की करता है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान् तो ऐसे ही सत्पुरुष भक्त से बंध जाते हैं,तो यहाँ तो वे वचन से भी बंधे हुए थे. उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक यह अधिभार लिया और पातालपुरी में राजा बलि के राज्य में आठों प्रहर राजा के सम्मुख सशरीर उपस्थित रह उनकी रक्षा करने लगे . इधर वैकुण्ठ से बाहर रहे जब बहुत दिन हो गए तो सभी देवी देवता समेत लक्ष्मी जी अत्यंत चिंतित हो गयीं...सब सोच में पड़े थे कि ऐसा कबतक चलेगा.जैसी स्थिति थी इसमें न भगवान् भक्त को छोड़ सकते थे और भक्त द्वारा स्वेच्छा से उन्हें मुक्त करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था..तब इस कठिन काल में नारद जी ने माता लक्ष्मी को एक युक्ति बताई. उन्होंने कहा कि एक रक्षा सूत्र लेकर वे राजा बलि के पास अपरिचित रूप में दीन हीन दुखियारी बनकर जाएँ और राजा बलि को भाई बनाकर दान में प्रभु को मांग लायें..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लक्ष्मी जी राजा बलि की दरबार में उपस्थित हुईं और उन्होंने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें भाई बनना चाहती हैं.राजन ने उनका प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया और उनसे रक्षासूत्र बंधवा लिया. रक्षासूत्र बंधवाने के उपरान्त राजन ने लक्ष्मी जी से आग्रह किया कि वे अपनी इच्छित कुछ भी उनसे मांग लें,जबतक वे कुछ उपहार न लेंगी,उन्हें संतोष न मिलेगा..लक्ष्मी जी इसी हेतु तो वहां आयीं थीं. उन्होंने राजन से कहा कि आप मुझे अपनी सबसे प्रिय वस्तु दे दें.. राजन घबडा गए. उन्होंने कहा मेरा सर्वाधिक प्रिय तो मेरा यह प्रहरी है,परन्तु इसे देने से पूर्व तो मैं प्राण त्यागना अधिक पसंद करूँगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब लक्ष्मी जी ने अपना परिचय उन्हें दिया और बताया कि मैं आपके उसी प्रहरी की पत्नी हूँ,जिन्हें आपने इतने दिनों से अपने यहाँ टिका रखा है. अब तो राजा पेशोपेश में पड़ गए..बात हो गई थी कि जिन्हें उन्होंने बहन माना था, उसके सुख सौभाग्य और गृहस्थी की रक्षा करना भी उन्ही का दायित्व था और यदि बहन की देखते तो उन्हें अपने प्राणों से भी प्रिय अपने इष्ट का साथ छोड़ना पड़ता.. पर राजन भक्त संत और दानवीर यूँ ही तो न थे.. उन्होंने अपने स्वार्थ से बहुत ऊपर भगिनी के सुख को माना और प्रभु को मुक्त कर उनके साथ वैकुण्ठ वास की सहमति दे दी ..परन्तु इसके साथ ही उन्होंने लक्ष्मी जी से आग्रह किया कि जब बहन बहनोई उनके घर आ ही गए हैं तो कुछ मास और वहीँ ठहर जाएँ और उन्हें आतिथ्य का सुअवसर दें..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लक्ष्मी जी ने उनका आग्रह मान लिया और श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) से कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि (धनतेरस ) तक विष्णु और लक्ष्मी जी वहीँ पाताल लोक में रजा बलि के यहाँ रहे . धनतेरस के बाद प्रभु जब लौटकर वैकुण्ठ को गए तो अगले दिन पूरे लोक में दीप पर्व मनाया गया. माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष रक्षा बंधन से धनतेरस तक विष्णु लक्ष्मी संग राजा बलि के यहाँ रहते हैं और  दीपोत्सव का अन्य कई कारणों संग एक कारण यह भी है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भी जब किसी को रक्षा सूत्र बंधा जाता है तो यह मंत्र उच्चारित किया जाता है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" &lt;b&gt;ॐ एन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः &lt;br /&gt;   तेन त्वा मनुबधनानि रक्षे माचल माचल &lt;/b&gt;" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*************************************&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-8028762165685313003?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/8028762165685313003/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=8028762165685313003&amp;isPopup=true' title='32 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/8028762165685313003'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/8028762165685313003'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='दानवीर राजा बलि !!!'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>32</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-882105351790766335</id><published>2010-08-18T15:16:00.001+05:30</published><updated>2010-08-19T13:05:03.671+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी..'/><title type='text'>आखिरी ख्वाहिश ....</title><content type='html'>बरसों तक केवल चैनपुर ही नहीं, आस पास के कई गांवों के मामले भी बिना  मियां हबीबुल्लाह अंसारी के  सरपंची के निपटता न था. अपनी नेकदिली और शराफत के बदौलत सबके दिलों पर बादशाहत हासिल थी उन्हें.. मियां बीबे के झगडे से लेकर इलाके के बड़े बड़े मसले  वे चुटकियों में ऐसे  निपटा देते , कि उनकी अक्लमंदी देख लोग दंग रह जाते...लेकिन  कहते हैं न पूर्व जन्म के कु और सु कर्म वर्तमान जन्म में इंसान  को औलाद  के रूप में मिलते हैं.तो शायद  यही वजह  रही होगी कि  निहायत ही शरीफ मियां जी के पिछले सभी जन्मों का हिसाब बराबर  करने को अल्लाह मियां ने तीन तीन नालायक  औलाद से नवाज दिया...मियां की  लाख कोशिशों के बाद भी न तो  वे तालीम हासिल कर पाए ,न नेकदिल इंसान बन पाए . अव्वल बढ़ती उम्र के साथ दिन ब दिन लंठई और लुच्चई में  खरे होते  गए. आये दिन अपने कारनामो से  ये बाप की जान छीलते रहते थे..&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;लोग शिकायत फ़रियाद लेकर आते,पंचयती बैठती,फैसला भी होता,पर उसे मानता कौन.. थक हार कर लोगों ने मियां जी से किनारा कर लिया..न कोई उन्हें अपने मामलों में बुलाता और न ही उनके बेटों की शिकायत लेकर उनके पास जाता.मियां जी के पास जाने से सीधे थाने जाना लोगों को  अधिक जंचने लगा. लेकिन इन गुंडे मवालियों ने थानेदार से भी ऐसी सांठ गाँठ कर रखी थी कि  वह  इन लफंगों की नहीं थाने पहुंचे शिकायतकर्ता  पर ही गाज गिराता था...&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;औलाद की करतूतों ने मियांजी को  खुद से नजरें मिलाने लायक भी न छोड़ा था...एक तो अन्दर की  टूटन ऊपर से बेवफा बुढ़ापा.आठों पहर दोजख की आग में जलते रहते वे..साठ की उमर पहुँचते पहुँचते  जैसे ही रतौंधी ने ग्रसा, कि मौके का  फायदा उठा उनकी औलादों  ने धोखे  से जायदाद के कागजातों पर उनसे दस्तखत करवा,उनका सबकुछ कब्जिया लिया..इसके बाद तो रोटी के दो कौर के लिए कुत्ते से भी बदतर उनकी जिदगी बना दी..&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;लम्बे समय तक  खटियाग्रस्त रहने के बाद, अपना अंत नजदीक जान  एक दिन हबीब  मियां ने अपने सभी बेटे और बहुओं को ख़ास राज बताने  के लिए बुलाया..बेटों को लगा अब्बा शायद किसी गड़े छिपे धन के बारे में बताएँगे...और सचमुच मियांजी ने उन्हें  अपने वालिद की तस्वीर के पीछे छिपा कर रखी हुई  सौ अशर्फियों का पता दे दिया, लेकिन इससे  पहले उन्होंने उनसे करार करवा लिया कि वे उनकी आखिरी ख्वाहिश जरूर पूरी करेंगे..&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;उनकी यह ख्वाहिश कुछ यूँ थी - &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;" बचपन में जिस सरकारी स्कूल में उन्होंने अपनी पढ़ाई की थी,उसके  आहते में एक आसमान छूता आम का  पेड़ था..पेड़ों पर चढ़ने में वे इतने उस्ताद थे कि पेड़ की जिस शाख  पर बन्दर भी चढ़ने से पहले तीन बार सोचते थे,पलक झपकते ही वे चढ़ जाते थे और फिर चाहे  उसपर  डोल पत्ता खेलने की बात हो, या कच्चे पक्के आम तोड़ने की बात, उनसा  अव्वल पूरे गाँव में  कोई न था..अपने इस उस्तादी के बल पर वे सब के लीडर बने थे और इसी दरख़्त ने  उन्हें हरदिल अजीज बनाया था...&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;तो मियांजी की आखिरी ख्वाहिश यही थी कि जब भी उनका इंतकाल हो , बिना किसी को खबर लगे,  रात के  नीम अँधेरे  में  उन्हें  उस दरख़्त की सबसे ऊंची शाख (जहाँ तक उनके बच्चे पहुँच सकते हों) पर  उनके पैरों में रस्सी  बाँध, उन्हें  उल्टा लटका कर पूरे चौबीस घंटे के लिए छोड़ दिया जाय..इन दुनिया को छोड़ कर जाने से पहले वे अपने उस  अजीज, महबूब, दरख़्त के आगोश से मन भर लिपट लेना  चाहते थे.. अगरचे ऐसा न किया गया तो  उनकी  रूह  कभी सुकून न पायेगी,यह दावा था उनका....&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;और जबतक वे  पेड़ पर लटके हों , उनके बच्चे  अपने तमाम  यार दोस्तों और समधियाने वालों को इकट्ठी  कर, उनके  दिए इन अशर्फियाँ में से दो अशर्फियाँ खर्च कर,सबको खूब अच्छी सी दावत दें..लेकिन सनद रहे, कि दावत ख़त्म  होने तक किसी को यह इल्म न हो कि उनका  इंतकाल हो गया है..अपने बच्चों और अजीजों को  खाते पीते जश्न मानते देख वे  खुशी खुशी जन्नतनशीन हो जायेंगे..."&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;बड़ी अटपटी सी थी यह ख्वाहिश...पर बेटे बहुओं ने सोचा,चलो जिन्दगी भर तो बुड्ढे की एक बात न रखी..अब इस छोटी सी बात को रख लेने में कोई हर्ज नहीं है..वैसे भी इसकी ख्वाहिश न पूरी  की,  तो हो सकता है बुढऊ  जिन्न  बनकर जीना हराम कर दे..सो तय हुआ कि अब्बा हुजूर की यह ख्वाहिश जरूर पूरी की जायेगी...&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;संयोग से महीने भर के अन्दर हबीब  मियां अल्लाह को प्यारे हो गए..ढलती शाम में उनका इंतकाल हुआ था..बेटों ने रात गहराने का इन्तजार किया और तबतक सभी यार दोस्तों को अगली दोपहर के दावत के लिए  न्योत आये..और फिर जैसा मियां  ने कहा था,वैसा ही कर दिया..अगले दिन दोपहर को उस शानदार दावत में  थानेदार, आस पास के इलाके के सभी लफंगे और  बहुओं के मायके वालों का जबरदस्त मजमा लगा.. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इधर दावत शबाब पर थी और उधर शहर में एस पी के पास गाँव वालों का खाफिला इस शिकायत के साथ पहुंचा हुआ था कि हबीब  मियां के तीनो मवाली बेटों ने  अपने बाप का खून कर उसे स्कूल के आहते में पेड़ पर लटका दिया है,जिस दरिंदगी  मे थानेदार की भी शह है और अब सारे मिल मजलूम बाप के मौत का जलसा मना रहे हैं.बदमाशों  से निजात पाने को लालायित  कई लोग  खुद को इस वाकये के  चश्मदीद गवाह भी ठहरा रहे  थे..&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;एस पी को दल बल सहित पहुंचकर कार्यवाई  करनी ही पडी..वहां पहुँच एस पी की भी लौटरी खुल गयी..क्योंकि एकसाथ इक्कट्ठे इतने अपराधियों को पकड़ना कोई हंसी थोड़े न था.. इलाके के लगभग सभी नामी गिरामी गुंडे और भ्रष्ट अफसर बैठे ठाले एस पी के हाथ लग गए.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;और मियां हबीबुल्लाह अंसारी ... जीते जी जो न्याय  नहीं कर पाए ,मरते मरते कर गए थे.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****************&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-882105351790766335?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/882105351790766335/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=882105351790766335&amp;isPopup=true' title='48 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/882105351790766335'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/882105351790766335'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/08/blog-post_18.html' title='आखिरी ख्वाहिश ....'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>48</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-6006981360271029148</id><published>2010-08-06T17:31:00.001+05:30</published><updated>2010-08-12T11:48:48.056+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='झारखंड'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रष्टाचार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नक्सलवाद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>धन का सदुपयोग ..</title><content type='html'>अस्त्र सश्त्रों के विषय में मेरी अल्पज्ञता ठीक वैसी ही है ,जैसी मंत्री पद पर आसीन किसी जनसेवक की अपने क्षेत्र की जनसमस्याओं के विषय में हुआ करती है..सो पूर्णतः अनभिज्ञ हूँ कि एक  इंसास रायफल का क्रय या विक्रय (चोर बाजार में)मूल्य क्या होता है, परन्तु  इतना मैं जानती हूँ कि यदि इंसास रायफल बेचकर साढ़े तीन लाख रुपये मिले और उस पैसे से एक आटा चक्की लगवाई जाय, एक स्कूटी,एक टी वी तथा कुछ अन्य घरेलू उपकरण खरीदने के उपरान्त भी इसमें से  एक लाख रुपये बचाकर भविष्य कोष में संरक्षित  रख लिया जाय, तो इससे अच्छा निवेश, इससे अच्छी दूरंदेसी तथा इससे अच्छा धन का सदुपयोग  और कुछ नहीं हो सकता.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसंग स्पष्ट न हुआ ?? अरे, स्पष्ट होगा भी कैसे ,राहुल डिम्पी में व्यस्त हमारे  राष्ट्रीय चैनलों को यह अवकाश कहाँ कि अपना कैमरा इन उल्लेखनीय समाचारों पर भी घुमाएं. प्रकरण यह है कि, विगत कुछ दिनों से थानों से अस्त्र  लुप्त होने की घटनाएं हमारे प्रादेशिक समाचार पत्र  को शोभायमान कर रहे थे ,जिसमे कि इसके संरक्षकों (पुलिसकर्मियों) की ही संलिप्तता थी.कई दिनों तक अखबार के पांचवें छट्ठे पन्ने पर  स्थान पाता  हुआ  यह समाचार अंततः  मुख्यपृष्ठ को प्राप्त हुआ ,जिसमे प्रमाण सहित उधृत  था कि अमुक पुलिसकर्मी के नाम आवंटित, अमुक  इंसास को, अमुक व्यक्ति ने  कोलकाता के, अमुक व्यक्ति को साढ़े तीन लाख में बेचा और प्राप्त उस धन को, अमुक अमुक मद में व्यय किया...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी दृष्टि में महत्वपूर्ण व उल्लेखनीय यह चौरकर्म नहीं , अपितु  वह निवेश है, जिसे इतनी दूरदर्शिता व  कुशलता से निष्पादित दिया गया है..यह प्राणिमात्र के लिए प्रेरक और  अनुकरणीय है...यह, यह भी सिखाता है कि अपने जीवन यापन हेतु केवल  सरकार या किसी संस्था विशेष पर आश्रित न रहा जाय बल्कि  व्यक्ति अपने पुरुषार्थ के बल पर अपने तथा अपने परिवार का  भविष्य  निर्मित करे ..और सबसे महवपूर्ण बात यह कि  धन चाहे ईमानदारी से कमाया हुआ हो या  चोरी चकारी घूसखोरी,बेईमानी से ,अर्जित धन को  ऐश मौज ,हँड़िया - दारू  में व्यर्थ न गंवाते  हुए व्यक्ति  भविष्य संवारने में लगाये ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असाधारण यह प्रसंग यूँ ही ठठ्ठा  में उड़ा  दिया जाने योग्य नहीं, बहुआयामी चिंतन योग्य  भी है...समाचार पत्र ने उक्त व्यक्ति  द्वारा क्रयित  उपकरणों की जो तालिका प्रस्तुत की है,यह चतुर्थ वर्ग के सरकारी कर्मचारी की करुण आर्थिक स्थिति की बेमिसाल झांकी है...अवकाश प्राप्ति के निकट पहुंचा एक पुलिसकर्मी , इतने वर्षों की चाकरी के उपरान्त  भी अपने लिए एक नंबर के पैसे से स्कूटी, टी वी जैसे सामान्य उपकरण भी न खरीद पाए ,तो इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है...और ऐसे में  इस नीरीह जीव से यदि हम  अपेक्षा करें  कि अपना सर्वस्व न्योछावर करने में तो वह एक पल न लगाये ,पर अपने और अपने संतान के भविष्य के लिए वह किंचित भी चिंतित न हो ,तो यह इनके प्रति अन्याय नहीं तो और क्या है ???   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे तो यह नहीं समझ आ रहा कि यह भलामानुष चोर या अपराधी कैसे हुआ..इतने वर्षों में  जहाँ झारखण्ड के दिग्गज लालों ने कई कई हज़ार करोड़ की राशि यूँ ही डकार,पचा, अपने तथा अपने पीढ़ियों के लिए स्विस बैंक में संरक्षित रख रखा है, तो उसके सामने सागर जल में से एक बूँद यदि इस झारखंडी लाल ने अपने लिए निकाल लिया तो इसमें हाय तौबा लायक क्या है..इन दिग्गजों के सम्मुख इन निरीहों को चोर कहना इस शब्द तथा कृत्य की घोर अवमानना है . इस महान व्यक्ति को तो गद्दार नहीं ,देशभक्त कहना होगा, जिसने धन से किसी और का घर नहीं भरा बल्कि पूरा का पूरा धन यहीं  अपने ही क्षेत्र में,घर के एकदम बगल में ऐसे स्थान में निवेश किया जहाँ आटा,मसाला आदि पिसवाने की भी सुविधा नहीं है..इस तरह एक साथ अपना और अपने आस पास का भला सोचने वाले  आज  कितने राजनेता हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे  भी तो ये अस्त्र शस्त्र नक्सली लूट ही ले जाते और फिर इन्ही के अस्त्रों से इन्हें निपटा डालते...तो अच्छा ही हुआ न कि इन्होने अपने प्राण भी बचाए और इन अस्त्रों को सदगति भी  दे दी..अब इन बेचारों को अपराधियों नक्सलियों से भिड़ने, उन्हें मारने की आज्ञा तो है नहीं, क्योंकि उनमे से अधिकाँश या तो सीधे स्वयं ही नेता हैं और बाकी बचे उन नेताओं के सगे संबंधी या लगुए भगुए , तो यूँ ही  वर्षों से व्यर्थ पड़े  जंग लग रहे अस्त्रों को उपयुक्त हाथों बेच इन्होने पुण्य का काम ही किया है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात दिन अपनी तथा इन अस्त्रों की रक्षा करते करते बेचारे पुलिसकर्मियों  के प्राण यूँ ही सांसत में फंसे  रहते हैं ,ऐसे में स्वयं को  तनाव मुक्त रखने का इससे उपयुक्त उपाय और कुछ हो सकता है भला ??  मुझे तो लगता है इस अनुकरणीय कृत्य को प्रत्येक  थाने में, प्रत्येक पुलिस कर्मी  द्वारा अपनाना चाहिए...बल्कि यही क्यों, अपने पुलिस कर्मियों को समय पर वेतन भत्ते सुविधाएँ  दे पाने में अक्षम झारखण्ड सरकार को चाहिए कि अस्त्र शस्त्र सहित पूरा पुलिस बल ही नक्सलियों को इस अनुबंध  के साथ आउटसोर्स (हस्तांतरित) कर दे कि सुव्यवस्थित व सुसंगठित ढंग से व्यवस्था चलाने  में सिद्धहस्त ये संगठन राज्य तथा पुलिस बल की सुरक्षा करें..अपरोक्ष रूप से नहीं, बल्कि सीधे सीधे प्रत्यक्षतः  राज्य व्यवस्था का सञ्चालन करें.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने की आवश्यकता नहीं कि पिछले एक दशक से भी कम समय में, जिस प्रकार से इन संगठनों ने अपने आप को सुसंगठित ,सुदृढ़ तथा प्रभावशाली बनाया है,यह इनकी कुशल प्रबंधन क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण है.इनके हाथों राज्य की बागडोर आते ही निश्चित ही राज्य का बहुमुखी विकाश होगा..राज्य व्यवस्था प्रत्यक्ष इनके हाथों होगी तो , न तो इनके द्वारा न आमजन द्वारा हड़ताल, बंदी या अन्य अव्यवस्था की स्थिति बनेगी. तो ऐसे में निश्चित है कि राज्य का आय बढेगा ही बढेगा.इसमें समग्र रूप से नेता ,जनता तथा संगठन सबका हित होगा...   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखिये कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि दस बीस दर्जन पुलिस कर्मी एक साथ मर जाएँ तो भी सरकार कहती है कि ,इन्हें तो रखा ही गया है भिड़ने मरने के लिए..लेकिन  एक नक्सली मारा जाये तो पांच पांच राज्यों की सांस एक साथ  इनके एक आवाज पर  बंद हो जाती है..संगठन में भरती के लिए न शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता ,न जात पात या आरक्षण की किचकिच, बस दिल में जज्बा हो और हथियार चलाने का हुनर,फिर जीवन और भविष्य सुरक्षित..मरने पर परिवार वालों को कम्पंशेशन पाने का कोई चक्कर नहीं.ऐसे में बस एक इस पार से उसपार जाते ही पुलिसकर्मी कितने सुखी और सुरक्षित हो जायेंगे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, ये सब बड़ी बड़ी बाते हैं, झारखण्ड सरकार पूरे पुलिस तथा शासन  तंत्र को नक्सलियों के हवाले करे न करे या जब करे तब करे, अभी मैं सरकार से निवेदन करना चाहती हूँ कि, इस महत घटना में लिप्त पुलिसकर्मियों को अवश्य ही पुरस्कृत करे दे.. क्योंकि यदि यह न किया गया तो जनमानस को कभी न समझाया जा सकेगा कि धन चाहे इमानदारी का हो या बेईमानी का सदा उसका सदुपयोग ही करना चाहिए...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;......................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-6006981360271029148?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/6006981360271029148/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=6006981360271029148&amp;isPopup=true' title='33 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/6006981360271029148'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/6006981360271029148'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='धन का सदुपयोग ..'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>33</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-629000977891996597</id><published>2010-07-30T18:10:00.005+05:30</published><updated>2010-08-01T17:44:48.774+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्य व्यंग्य..'/><title type='text'>महाप्रलय...</title><content type='html'>युधिष्ठिर द्वारा यक्ष के प्रश्न - किमाश्चर्यम ?? का उत्तर " व्यक्ति प्रतिपल देखता है कि इस संसार में जन्मा व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो रहा है,फिर भी व्यक्ति स्वयं के मरण का स्मरण नहीं रख पाता,इससे बड़ा आश्चर्य क्या हो सकता है.." मेरे मस्तिष्क में गहरे उतर जम गया है..सचमुच कितना सटीक कहा था उन्होंने...अपने आस पास सबको मरते देखती हूँ,जानती हूँ कि एक न एक दिन मुझे भी मरना ही है,पर पूरे मन से विश्वास नहीं होता इसपर.सारी दुनिया का मरण कल्पित हो पाता है ,पर अपने अंत की कल्पना बस कल्पना ही लगती है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईमानदारी से कहूँ तो मरने से बहुतै डर लगता है भैया. इतना सब कुछ मर मर के जमा किया यहाँ.. और औचक एक दिन टन्न से टाँय बोल जायेंगे  सब यहीं छोड़ छाड़ कर...कहाँ जायेंगे,क्या होगा उसके बाद, कुछ पाता नहीं. इसलिए बेहतर है कि इसे भुलाए ही रखा जाय... मुझे तो बड़ी कोफ़्त होती है, यदि कोई बार बार याद दिलाये मरने की बात...इसलिए आजतक किसी इंश्योरेंस वाले को फटकने नहीं दिया, गोया दस मिनट सामने बैठ जाएँ तो पक्का भरोसा दिला देते हैं कि  बस अब अगले ही किसी दुर्घटना में मेरा मरना तय है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बाबा लोग जो शरीर और जीवन को व्यर्थ नश्वर सिद्ध करते चलते हैं, इनके चक्कर से भी लम्बी दूरी रखना ही मुझे श्रेयकर लगता है..एक हमारे परिचित हैं,उनके पिताजी ऐसे ही बाबाओं के कुछ महीनों के संगत के बाद शरीर और दुनिया को नश्वर मान अपना सारा कमाया धन  बाबाजी के ट्रस्ट के नाम कर, लोटा डोरी लेकर निकल पड़े धाम यात्रा को.फिर कहाँ गए,कोई खोज खबर न मिली उनकी..बेचारे बच्चे उनके संपत्ति के लिए ट्रस्ट के साथ केस में उलझे पड़े हैं कई वर्षों से..इसलिए बाबा...ना बाबा ना...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देखिये न , अतिवृष्टि अनावृष्टि ,पानी की कमी,अनाज की कमी, इसकी कमी, उसकी कमी आदि आदि देख देख कर ऐसे ही मन घबराया रहता है,ऊपर से ये पर्यावरण वाले , ग्लोबल वार्मिंग का रट्टा लगाकर दिमाग घुमाए दिए रहते हैं. खतरा तो ऐसे बताते हैं ,जैसे बस कुछ महीनो की ही बात हो..सारा ग्लेशियर पिघला और धरती डूबी..आये दिन डराने और मरण याद दिलाने वाले इन कमबख्तों ने चैन से जीना मुहाल कर दिया है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी कुछ ही महीने पहले की बात है,पखवाड़े तक हमारे महान भारतीय समाचार चैनल चीख चीख कर रात दिन एक किये हुए थे कि बस अमुक तिथि को महाप्रलय आया ही आया..कोई माई का लाल टाल नहीं सकता इसे.संग साथ में ऐसे ऐसे दृश्य दिखा रहे थे, जैसे पिछले प्रलय में इन्होने उसकी रिकोर्डिंग कर रखी हो....हाय !!! जान मुंह को आ जा रहा था सब देख देख कर..वो तो भला हो कि भगवान् ने छंटाक भर दिमाग और तर्क शक्ति दे दी थी, जिसने कि डूबते जान को सहारा देते हुए डपटते हुए कहा...&lt;br /&gt;"अरे बुरबक , ई चैनल वाला लोक का आफिस भी तो इसी धरती पर है न...महापरलय के समय ई सब क्या दूसरे ग्रह पर चले जायेंगे और वहां से सीधा प्रसारण दिखाएँगे ?? अरे ई सब जब इतना आश्वस्त होकर दर्शक से कह रहे हैं कि महापरलय का सीधा परसारण केवल इनके चैनल पर सबसे बढ़िया दिखाया जाएगा, इसलिए कोई और चैनल न देख इनका चैनल देखो ...तो निश्चित ही इनको विश्वास है कि इनको या इनके दर्शकों को कुछ नहीं होने वाला..इसलिए कुछ नहीं होगा ,निश्चिन्त रहो..."  ओह !! जान बची..               &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सनसना सनसना के इतना डराते हैं ये मुए चैनल वाले कि हमने तो छोड़ ही दिया इन माध्यमों से समाचार देखना. अब देश विदेश का समाचार जानने को हम तीन रुपये का प्रादेशिक  समाचार पत्र तीन मिनट में पढ़ लेते हैं.तीन मिनट इसलिए कि इससे ज्यादा समय में विस्तार में समाचार पढने से रक्त चाप पर बड़ा ही नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और हम नहीं चाहते कि हमारे अस्वस्थता या मरण का कारण ये फालतू के समाचार बने..लेकिन क्या करें ,इनको भी चैनल वाला बीमारी लग गया है... सफलता का फार्मूला इनको भी सनसनी ही लगता है.. आज सुबह समाचार पत्र पढ़ रहे थे कि एक जगह जाकर ध्यान टंग गया..कुछ पश्चिमी वैज्ञानिकों ने फिर से  दावा ठोंका है कि , दो हजार बारह में  महाप्रलय आएगा ही आएगा..उनका कहना है कि  एक बड़ा भारी भरकम  विशालकाय  ग्रह  तेजी से पृथ्वी  की ओर दौड़ा भागा चला आ रहा है और जब यह पृथ्वी से टकराएगा  तो  पृथ्वी दीपावली में फोड़े जाने वाले साउंड बोम्ब की तरह  भड़ाम करके फूट लेगी और उक्त ग्रह में समां जायेगी..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;..उफ़.... फिर से महाप्रलय !!!  ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन भैया हम नहीं मानेंगे...बचपन से पूजा आयोजन के समय सुनते आये हैं - कलियुगे प्रथम चरणे, आर्यावर्ते, भरतखंडे, अमुक वासस्थाने, मासोत्तमे अमुक मासे......&lt;br /&gt;मन धीर धरो...निश्चिन्त रहो....अभी कलियुग प्रथम चरण में ही हैं... और जब से हम जन्मे हैं,पहला चरण खिसका नहीं है तनिको..एक एक चरण इतना इतना बड़ा है इसका..ऐसा ऐसा तीन चरण बचा हुआ है अभी..एक एक चरण कई कई हजार साल का..अभी तुरंत फुरंत में कुछ नहीं होने वाला.. अभी तो कितना कुछ बचा हुआ है घटित होने को..जिस जिस बात पर मुंह पर हाथ रखकर लम्बी सांस खींचकर  हम कहते हैं .." समय बदल गया भैया, घोर कलयुग आ गया.." , तो अभी तो यह सब कुछ ,सारा पाप बाल्यावस्था में ही है ..अभी तो आगे बढ़ यह किशोर वय, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था,वृद्धावस्था ...सब पार करेगा .. जब सचमुच ही सबकुछ नष्ट भ्रष्ट हो जाएगा..पाप पाप ही नहीं रहेगा,क्योंकि पुण्य नाम का कुछ बचबे नहीं करेगा जो आदमी फरक करे...तब आएगा परलय..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने ग्रंथों में वृहत्त  व्याख्या है कलियुग के अगले चरणों की और समय के साथ सबका प्रमाण भी उपलब्ध होता जा रहा है...कहा गया, कलयुग के आरम्भ में ही सरस्वती नदी लुप्त हो जायेंगी....हो गया..यमुना जी के सूखने का जो काल बताया गया है,वह भी सत्य होता दीख रहा है और युग के मध्य तक गंगा जी के पृथ्वी छोड़ने की जो बात कही गयी है,देख लीजिये..अविश्वास करने लायक  लगता है क्या...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्म, समाज,संस्कृति में अभी तो बहुत कुछ बदलना लिखा है..अभी बहुत टाइम है भाई प्रलय होने में..अभी तो इतने सारे जंगल पेड़ पहाड़ बचे हुए हैं.सब को आदमी दोनों हाथों से मन भर काटेगा, तो भी सब ख़तम होने में टाइम लगेगा. भगवान् की बनाई दुनिया का हुलिया जब पूरी तरह आदमी बदल देगा तब न  आएगा प्रलय...और तब तक तो हम न जाने और कितना जनम ले लेंगे. लेकिन असली टेंशन तो इसी में है.अभिये दुनिया का हालत देख देख कर मन त्रस्त है, अगले जनम में इससे भी बुरा देखना पड़ा तो कितना कष्ट होगा..इससे तो अच्छा है कि अभिये ,इसी जिन्दगी में परलय आ जाये कि सब कहानी ख़तम हो जाए....और बुरा देखने लायक कुछ न बचे..और जो अगला जनम होवे तो सीधे सतयुग में होवे..  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;_________________________________________&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-629000977891996597?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/629000977891996597/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=629000977891996597&amp;isPopup=true' title='38 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/629000977891996597'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/629000977891996597'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='महाप्रलय...'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' 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भी तो ढूंढ न पाऊं, &lt;br /&gt;स्वयं को खो दूँ तुममे रमकर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न ही चाहना धन वैभव की,&lt;br /&gt;न ही कामना स्वर्ग मोक्ष की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हृदय तेरे बस ठौर मिले औ,&lt;br /&gt;मुखाग्नि पाऊं तेरे कर...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;=========================&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-6773980461437993935?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/6773980461437993935/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=6773980461437993935&amp;isPopup=true' title='51 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/6773980461437993935'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/6773980461437993935'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/06/blog-post_21.html' title='प्रेम से तुमने देखा जो प्रिय !!!'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>51</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-4515091835919885144</id><published>2010-06-09T18:26:00.000+05:30</published><updated>2010-06-09T18:26:37.725+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिक्षा'/><title type='text'>शिक्षा और आत्मविकास</title><content type='html'>कथा कहानियों से मेरा लगाव संभवतः  जन्मगत ही था ,जो स्वतः ही मुझे इसके विभिन्न श्रोतों  से सदैव ही जोड़ता रहा..कथा संसार में तन्मयता से विचरण कर  नित नवीन अनुभव प्राप्त करना और उसे जीवन  सन्दर्भ में देखना गुनना  मुझे अतिशय  प्रिय था. बचपन में नयी कक्षा में जाने के बाद जैसे ही नयी पुस्तकें मुझे मिलती , कक्षा में पढाये जाने की प्रतीक्षा किये बिना मैं उन्हें चाटने बैठ जाया करती. सबसे पहले हिंदी की पुस्तक फिर इतिहास की  और जब सब चाट  चुकती  तो भूगोल  आदि की पुस्तकें मैं घोंट जाया करती..इनके साथ पाए रोमांचक अनुभव मुझे असीम तृप्ति दिया करते..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे कॉलेज शिक्षा क्रम में भी मैंने साहित्य, इतिहास,समाज शास्त्र  तथा राजनीति शास्त्र ही मुख्य विषय रूप में लिया,जो अंतत स्नातकोत्तर में साहित्य के साथ संपन्न हुआ..परन्तु एक बड़ी भारी समस्या थी..इतिहास की पूरी पुस्तक कहानी या उपन्यास की तरह तो मुझे कंटस्थ रहती , पर  घटनाक्रमों की तिथियाँ  और उलटे पुल्टे नाम मेरे मस्तिष्क  से कभी चिपक  न पाते.. इसी तरह राजनीति शास्त्र  में भी  सिद्धान्तकारों की  उक्तियों/सिद्धांतों  को जो कि लगभग एक से ही हुआ करते थे, उन्हें रटना और शब्द प्रतिशब्द परीक्षा में लिख पाना मुझसे कभी न हो पाया...मुझे लगता, सबने लगभग एक ही बात तो कही,फिर क्या फर्क पड़ता है कि वाक्य में किस शब्द का प्रयोग किया गया...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ एक ओर सैद्धांतिक (किताबी) तथा व्यावहारिक राजनीति (व्यवहार में राजनीति जिस रूप में  है) में मुझे कोई साम्य न दीखता और फलतः इसकी उपयोगिता संदिग्ध  दीखती थी वहीँ इतिहास भी  मुझे रटने नहीं सीखने की बात लगती थी..मुझे लगता था,हजारों हजारों वर्ष का इतिहास हमें सिर्फ यही तो सिखाता है कि हमें अपने आज को कैसे सुखद बनाना है,क्या करने से बचना है और क्या अवश्य ही करना है..घटनाक्रमों की तिथियों में मगजमारी कर उन्हें रटने से अधिक आवश्यक है दुर्घटनाओं  से  सीख ले आगे के लिए सतर्क सजग रह जीवन और जगत में खुशहाली के लिए सचेष्ट रहना .वस्तुतः व्यापक रूप में शिक्षा का उद्देश्य मुझे आत्मविकास के अतिरिक्त और कुछ नहीं लगता...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिनानुदिन शिक्षा का संकुचित होता उद्देश्य मुझे बड़ा  ही विछुब्ध  करता  रहा है और यही समस्त विसंगतियों का भी  कारण लगता है. हम चाहे कोई भी विषय ,कितना  भी पढ़ जाएँ और विषय पर लाख विशारद्ता हासिल कर लें, नए नए अविष्कार कर लें,एक से बढ़कर एक नवीन कीर्तिमान स्थापित कर लें ,जब तक हम अपना नैतिक विकास नहीं कर लेते,एक सच्चा  और अच्छा मनुष्य नहीं बन जाते , क्या हम सुशिक्षित होने का दंभ भर सकते है और सच्चे अर्थों में जीवन में सुख पा सकते हैं ?? आज शिक्षा का  एकमात्र उद्देश्य  धनोपार्जन रह गया है और ऐसे में हम कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि व्यक्ति परिवार समाज और देश सुसंस्कृत, सुगठित और शांत रहेगा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखिये न,  रोज तो नए नए अविष्कार हुए जा रहे हैं, भौतिक सुख सुविधाओं  के उपकरणों से घर  और बाज़ार अटे पटे पड़े हैं, पर मनुष्य रोज थोडा और अशांत ,थोडा और अकेला, थोडा और भयभीत होता चला जा रहा है. अशांत छटपटाता दिग्भ्रमित मनुष्य कुछ और साधन जुटा  उसमे सुख ढूँढने बैठ जाता है.उसे लगता है,फलां सामान यदि वह खरीद ले तो पूरा संतुष्ट हो जायेगा और फिर उस सामान को जुटाने के लिए धन कमाने की होड़ में जुट जाता है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वय का  एक हिस्सा डिग्रियां जुटाने में, दूसरा हिस्सा डिग्रियां भंजा उपकरण जुटाने में और तीसरा हिस्सा भौतिक विलासिता में डूब  अबतक  क्षरित  रोगयुक्त काया  को रोगमुक्त करने के प्रयासों में जुट मनुष्य संपन्न करता है ..जीवन जो इस उद्देश्य और महत्वाकांक्षा  संग आरम्भ हुआ कि येन केन प्रकारेण अधिकाधिक धन जुटाना है,विलासिता के साधन जुटाना है अंततः अशांति और व्याकुलता ही पाता है. जिसके पास जितना धन वह उतना ही अधिक व्याकुल. संसार का एक मनुष्य नहीं जो यह कहे,नहीं बस इतना ही मुझे चाहिए,इससे अधिक अब एक पैसा नहीं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि आज निचली कक्षा से लेकर ऊपरी  कक्षाओं  के पाठ्यक्रमो तक में चरित्र निर्माण या नैतिक उत्थान के पाठ्य सामग्री नहीं हैं. सत्य बोलना,आचरण को शुद्ध  व्यवस्थित अनुशाषित  तथा उद्दात्त रखने वाले पाठ नहीं हैं, पर समस्या यह है कि उन अच्छी बातों को भी इस तरह पढाया जाता है,जिसे बच्चे केवल रटने और परीक्षा में अंक लाने भर की उपयोगिता  योग्य समझते हैं.व्यावहारिक रूप में न ही परिवार में अभिभावक अपने बच्चों में यह बैठा पाते हैं कि वे उन्हें शिक्षा इसलिए दिलवा रहे हैं ताकि उनके संस्कार परिष्कृत हों, उनका आत्मोत्थान हो और न ही शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा व्यावहारिक रूप से यह प्रयास किया जाता है. आज व्यक्तित्व निर्माण अर्थोपार्जन के सम्मुख पूर्णतः गौण हो चुका है.मुझे तो सदैव ही यही लगता है कि आज जो शिक्षा व्यवस्था है वह मनुष्य नहीं भेड़ों की भीड़ तैयार कर रही है,जिसमे प्राण तो हैं पर चिंतन योग्यता नहीं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे समय में मुझे रामायण ,महाभारत भगवतगीता आदि की उपयोगिता, प्रासंगिकता जो कि तेजी से हमारे घरेलू परिवेश आचरण और विश्वास से त्यज्य हुए जा रहे हैं, कुछ अधिक ही  लगती है. इन के कथाओं में उल्लिखित पात्र,उनके जीवन चरित्र और परिस्थितियां वस्तुतः कोरे सैद्धांतिक नहीं,बल्कि पूर्णतः व्यवहारिक हैं,जो कि मनुष्यमात्र के विवेक और संस्कार का परिष्करण पुष्टिकरण और मार्गदर्शन करने की क्षमता रखते हैं..जबतक परिवार समाज का आस्तित्व इस धरती पर है,किसी भी धर्म पंथ के अनुयायी समाज के लिए यह प्रासंगिक रहेगा. इनकी शिक्षाओं में आज भी वह शक्ति है जो समाज को दिशा दिखा मनुष्यमात्र का नैतिक उत्थान कर सकती है.  यह अलग बात है कि पूर्वाग्रह ग्रस्त हमारी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष  सरकार इन से सम्बंधित  पुस्तकों को  पूर्णतः एक धर्म विशेष की पूजा पाठ संबंधी  पुस्तकें  ठहरा इन्हें पाठ्यक्रम से बाहर रखना ही श्र्येकर मानती है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन परिस्थितियों में गंभीरता से हमें विचार करना होगा कि हमें अपने और अपने संतान के सुख के लिए आत्मोत्थान के इन माध्यमो से जुड़ना ही होगा ,जीवन दृष्टिकोण को वृह्हत्तर करना ही होगा. संतोष और शांति साधन में नही होता बल्कि यह तो मनुष्य के ह्रदय में ही अवस्थित होता है,बस शाश्वत चिंतन द्वारा इस शक्ति को जागृत कर पाया जा सकता है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;----------------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-4515091835919885144?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/4515091835919885144/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=4515091835919885144&amp;isPopup=true' title='32 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/4515091835919885144'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/4515091835919885144'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='शिक्षा और आत्मविकास'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' 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में मुझे इस उन्माद  में भी एक बड़ी अच्छी बात दिखी . मुझे लगा नशा, नशेड़ी  का भले लाख अहित करे पर जब किसी को जानना समझना और उसके प्रति अपनी धारणा स्थिर करनी हो, तो यह बड़े काम की  हुआ करती  है.क्योंकि और कुछ हो न हो उन्माद/नशा व्यक्ति को हद दर्जे का ईमानदार  अवश्य बना देती है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार व्यक्ति टुन्नावस्था को प्राप्त हुआ नहीं कि देख लीजिये, अपने सारे मुखौटे अपने हाथ नोचकर वह अपने वास्तविक  स्वरुप में आपके सामने उपस्थित हो जायेगा.फिर जी भरकर उसे देखिये परखिये और अपना अभिमत स्थिर कीजिये . मन के सबसे निचले खोह  में यत्न पूर्वक संरक्षित दु -  सु वृत्तियों  ,भावों  और  स्वार्थों  को  एकदम प्लेट में सजा वह आपको सादर समर्पित कर देगा फिर  आश्वस्त  होकर  निश्चित कीजिये की सामने वाले को कितना  महत्त्व  तथा  अपने जीवन में स्थान देना है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह विभ्रम  न पालें  कि सामने वाला यदि गलियां दे रहा है तो दोष  उस  नशीले  पदार्थ  का  है.वस्तुतः यह तो उसकी स्वाभाविक अंतर्वृत्तियां हैं,जिसपर से  जैसे ही बुद्धि का नियंत्रण शिथिल पड़ा  नहीं कि मन  मनमौजी बन बैठा... इस परम पावन  टुन्नावस्था  में सभी लोग गलियां ही नहीं देते जहाँ  कुछ लोग अत्यधिक  भावुक हो जाते हैं, कुछ  आक्रोशित , तो कुछ  एकदम सुस्त पस्त हो जातें है और कई तो कवि शायर तक  हो जाते हैं...अपने यहाँ कई महान गायक ऐसे हैं जो बिना मद्यपान के उत्कृष्ट प्रदर्शन ही नहीं कर पाते....&lt;br /&gt;वो अमिताभ बच्चन जी ने जो परम दार्शनिक अविस्मरनीय अमृतवाणी कही थी इस सन्दर्भ  में,  वह यूँ ही नहीं कही थी..." नशा शराब में होता तो नाचती बोतल...."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो बात तय रही कि जब व्यक्ति उन्मादित  हो तो सरलता पूर्वक  मुखौटे के पीछे  के व्यक्ति को देखा परखा  जा  सकता  है...सो जो नशा नहीं करते और इससे घृणा करते हैं,इस आधार पर इसे कल्याणकारी  मान सकते हैं.. वैसे नशा केवल शराब गांजा भांग अफीम इत्यादि इत्यादि अवयवों का ही नहीं होता ,बल्कि  कुछ  उन्माद / नशा तो ऐसे  होते  हैं कि इनके  आगे बड़े से बड़े ड्रग्स भी पानी भरते हैं. खाने  पीने  वाले  अवयवों से उन्माद तो इनके सेवनोपरान्त ही चढ़ता है, जो कुछ समयोपरांत स्वतः ही उतर जाता है, पर " &lt;b&gt;अहंकार&lt;/b&gt; " का मद तो ऐसा मद है जो व्यक्ति को आभास भी नहीं हो पाता  कि  कब यह  सर चढ़ कर कुण्डली मार बैठ गया और  से ऐसे ऐसे कार्य करवाने लगा जो उसके पतन को सुनिश्चित किये  चला जा रहा है. अब चाहे यह  धन ,बल ,बुद्धि,  समृद्धि, पद ,रूप या इस प्रकार के किसी भी गुण का अहंकार उन्माद हो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूँ  सन्मार्ग पर चलने का, परोपकार करने का या अच्छे काम करने का नशा भी कई लोगों को होता है और जिन लोगों को यह नशा होता है ऐसे ही लोग  दुनियां को दिशा  देते हैं,मानवता  को सिद्ध और सार्थक  करते  हैं,पर यह  नशा जरा दुर्लभ है. तनिक  ध्यान देकर दोनों प्रकार के उन्माद  का अंतर समझना होगा.  सात्विक उन्मादी  निश्चित ही विशाल हृदयी ,विनयशील ,परदुखकातर होते हैं , उनके  समस्त प्रयास कल्याणकारी  होते हैं. सत्य, धर्म के रक्षार्थ  सहज ही  प्राणोत्सर्ग को ये  तत्पर रहते हैं.  करुणा  क्षमा  ममत्व  इनके स्थायी गुण होते हैं,इनकी सोच समझ चिंतन,सब सात्विक और विराट हुआ करते हैं  और इसके ठीक विपरीत अभिमानी अपने सुख संतोष और तुष्टि हित  ही समस्त उद्यम करते हैं , किसी को अपमानित प्रताड़ित कर ये परमसुख पाते हैं... और तो और यदि कोई इनका  अहित करे ,कहीं इनका  अहम् आहत  हो तो किसीके  प्राण  लेने  में  भी ये पल को  नहीं झिझकते ..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ी विडंबना है...नाम यश पद प्रतिष्ठा  सुख एकत्रित   करने को, हर प्रकार से बड़ा होने को, जो व्यक्ति प्रतिपल सजग  सचेष्ट रहता है,वह स्मरण नहीं रख पाता कि यदि उसे बड़ा होना है ,मान पाना है, तो सचमुच ही बड़ा बनना पड़ेगा, संकीर्ण  ह्रदय,छोटी सोच का रह वह कभी  बड़ा नहीं हो सकता. कितना भी कुशल अभिनेता  क्यों न हो, मुखौटा लगा, कुछ समय के लिए व्यक्ति नाम,मान, यश, प्रतिष्ठा यदि कमा  भी ले, तो उसे चिरस्थायी नहीं रख सकता. कोई न कोई पल ऐसा आएगा जब  अभिमान  मद में चूर हो व्यक्ति चूकेगा ही और सारी पोल पट्टी खुलते  क्षण  न लगेगा ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंगुलिमाल जब गंडासा ले भगवान् बुद्ध की हत्या करने को उद्धत हो उनके सामने आ खड़ा हो गया तो भी भगवान् बुद्ध की जो स्थायी प्रवृत्ति क्षमा दया करुणा  और शांति थी,वही बनी रही और उनके इसी गुण ने, उनके विराट व्यक्तित्व  ने, अंगुलिमाल को भी हत्यारे से योगी बना दिया. यह होता है सात्विक स्वरुप और उसका असर . यह कहकर हथियार रखा जा सकता है कि ये सब बड़ी बड़ी बातें हैं, हम साधारण जन भगवान् बुद्ध थोड़े न बन सकते हैं,पर भाई  एक बार अपने ह्रदय को टटोल कर देखें, यदि यह अवसर मिले  कि मन भर मान सम्मान,पद प्रतिष्ठा की मात्रा  बटोर लेने का अवसर मिले , तो  अपने  रूचि  के  क्षेत्र  में   भगवान् बुद्ध सा  सफल,  सिद्ध, प्रसिद्द और पूज्य  कौन  नहीं होना चाहेगा ?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुलसी दास जी ने कहा है- " कुमति सुमति सबके उर रहहीं..."  सभी धर्मों, सम्प्रदायों, पंथों ने स्वीकारा है कि  मनुष्य के भीतर देव और दानव दोनों  ही  बसते हैं, बस बात है कि किसे किसने अपने वश में कर रखा है..दानव देव के वश में होगा तो मनुष्य देवतुल्य हो जायेगा और देव दानव के वश में होगा तो मनुष्य असुर सम  होगा. महाभारत के महा संग्राम में रथ पर बैठे अर्जुन और सारथि बने कृष्ण कितना कुछ सिखा जाते हैं.... जबतक व्यक्ति स्वयं को अपनी वृत्तियों को  इस प्रकार निबंधित न करेगा ,वह जीवन संग्राम नहीं जीत सकता.इस रथ में जुटे घोड़े वस्तुतः काम क्रोध लोभ मोह और अहंकार रूपी स्वेच्छाचारी घोड़े हैं जो सदैव ही मनुष्य को तीव्र वेग से अपनी अपनी दिशा में भगा ले जाने को उद्धत रहते हैं..परन्तु एक बार जब इनकी लगाम व्यक्ति कुशल  सारथी  ईश्वर  (विवेक) के हाथों सौंप  देता है, अभ्यास  द्वारा  बल(अर्जुन के रथ पर विराजमान हनुमान  जी )  को साध  निष्काम  कर्म को तत्पर और समर्पित  होता है, जीवन संग्राम में  धर्ममार्ग  से क्षण को भी विलगित नहीं होता है , तो फिर साधन साथ  हो न हो,विजयश्री उसे मिलती ही है... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया में इतने सारे लोग जो इस प्रकार  विभिन्न  व्यसनों में लिप्त  हैं, उन्मादित होने  को लालायित रहते हैं , ऐसा नहीं है कि  प्रमाद /नशा में कोई सुख नहीं. सुख है, और बहुत बहुत सुख है.सुख है तभी तो लोग इसकी ओर इस तरह  भागते हैं...पर तय यह करना होगा कि कौन सा सुख  किस कीमत पर लेना है.दुनियां में मुफ्त कुछ भी नहीं होता, हर सुख की कोई न कोई कीमत होती है, बस चयन में जो  चपलता, बुद्धिमानी दिखायेगा ,वही जय या पराजय पायेगा...              &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;--------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-5987000610903612669?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/5987000610903612669/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=5987000610903612669&amp;isPopup=true' title='35 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5987000610903612669'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/5987000610903612669'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='उन्माद सुख ....'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>35</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-6407520790773004449</id><published>2010-04-07T18:05:00.004+05:30</published><updated>2011-05-28T12:18:58.445+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन दर्शन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><title type='text'>खुजली का सुख</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;मनुष्य शरीर में व्यापने वाले असंख्य व्याधियों में ऐसी कोई व्याधि नहीं जो कष्टकर न हो...परन्तु " खुजली " एक ऐसी व्याधि है जो भले त्वचा को लाख घात पहुंचाए, पर खुजाने के सुख आनंद और तृप्ति का वह भली प्रकार कह सकता है जो कभी भी इस व्याधि के चपेट में आ चुका हो और खुजाने का सुख पा चुका हो....सोचिये न ,कहीं किसी ऐसे स्थान और स्थिति में जहाँ चहुँ ओर से हम वरिष्ठ जनों से घिरे हुए हों और उसी पल शरीर के नितांत वर्ज्य प्रदेश में जोर की खजुआहट मचे.. शिष्टाचार का तकाजा, हम खुलकर खजुआ ही नहीं सकते...कैसी कष्टप्रद स्थिति बनती है, कितनी कसमसाहट होती है...घोर खुजलीकारक उस क्षण में यदि मन भर खुजलाने का सुअवसर मिल जाए तो वह सुख बड़े बड़े सुखो को नगण्य ठहराने लायक हो जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुजली एक ऐसा रोग है, जितना खुजाओ, त्वचा जितनी ही छिले जले , आनंद उतना ही बढ़ता चला जाता है...खुजाते समय इस बात का किंचित भी भान कहाँ रहता है कि चमड़ी की क्या गत बन रही है..परन्तु क्या खुजली का निराकरण खुजलाना है ???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं !!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बल्कि समय रहते यदि इसका उपचार न कराया गया तो कभी कभी त्वचा पर पड़ा दाग जीवन भर के लिए अमिट बनकर रह जाता है या फिर कई अन्य असाध्य रोग का कारण भी बन जाता है.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आगे, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या खुजली केवल एक बाह्य शारीरिक रोग है,जो शरीर के त्वचा में ही हुआ करती है????&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं !!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुजली का प्रभावक्षेत्र केवल शरीर नहीं...मन भी है. शारीरिक खुजली के विषय में तो हम सभी जानते हैं,चलिए आज हम मानसिक खुजली को जाने,जो कि त्वचा के रोग से कई लाख गुना अधिक गंभीर और अहितकारी है.. शारीरिक खुजली तो कतिपय औषधियों द्वारा मिटाई भी जा सकती है, परन्तु मानसिक खुजली के निराकरण हेतु तो बाह्य रूप में खा सकने वाली कोई गोली या सिरप अभी तक बनी ही नहीं है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब यह मानसिक खुजली है क्या ?? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"जीवन में घटित दुखद कष्टदायक घटनाओं की स्मृति को वर्षों तक स्मृति पटल पर संरक्षित और पोषित रखना ही मानसिक खुजली है".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस प्रकार शारीरिक खुजली त्वचा को घात पहुंचाते हुए भी सुखकारी लगती है,ठीक वैसे ही यह मानसिक खुजली भी मन मस्तिष्क को क्षत विक्षत करते संतोषकारी लगती है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचेत रहें ,देखते रहें , जब भी हमारी प्रवृत्ति इस प्रकार की बनने लगे कि हम अपने जीवन में घटित दुर्घटनाओं को, दुखद स्मृतियों को बारम्बार दुहराने लगे हैं, नित्यप्रति उनका स्मरण करने और दुखी होने को सामान्य दिनचर्या का अंग बनाते जा रहे हैं, तो निश्चित मानिए कि हम उस गंभीर असाध्य रोग से ग्रसित हो रहे हैं..यह रोग आगे बढ़ते हुए दीमक की भांति मनुष्य के अंतस को खोखला करता जीवन दृष्टिकोण ही नकारात्मक करने लगता है और इसके चपेट में आया मनुष्य इसका आभास भी नहीं कर पाता..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस व्याधि संग हमें दुखी रहने का व्यसन लग जाता है.. हम दुखी रहने में ही सुख पाने लगते हैं.. अवस्था यहाँ तक पहुँच जाती है कि यदि कभी कोई दिन ऐसा बीता कि दुखद स्मृतियों को दुहराया नहीं,तो और दुखी हो जाते हैं और फिर यह जीवन जगत सब निस्सार अर्थ हीन लगने लगता है..हमारे सम्मुख लाख सुख आकर क्यों न बिछ जाँय हम हर्षित नहीं हो पाते और यही नहीं हमारे आस पास हमारा नितांत ही आत्मीय भी यदि प्रसन्न हो तो हम यथासंभव प्रयास करेंगे कि वह हमारे दुःख के कुएं में आ उसमे डूब जाय और ऐसा न हुआ तो अपने उस आत्मीय की प्रसन्नता से ही चिढ होने लगेगी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन और मष्तिष्क यदि निरंतर ही दुखद ( नकारात्मक ) स्थिति में पड़ा रहे, तो न केवल हमारे संरचनात्मक सामर्थ्य का ह्रास होता है अपितु यह तीव्रता से शरीर को भी रोग ग्रस्त कर देता है..स्वाभाविक ही तो है,शरीर का नियंत्रक मन मष्तिष्क ही जब स्वस्थ न रहे,तो हम कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि मनन चिंतन सोच कार्य व्यवहार सब स्वस्थ और सकारात्मक हो .... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब विचार रोग के स्रोतों पर :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्न जल के रूप में जो भोज्य पदार्थ हम ग्रहण करते हैं वह शारीरिक सञ्चालन हेतु भले यथेष्ट हो ,पर मनुष्य को इतना ही तो नहीं चाहिए, उसे मानसिक आहार भी चाहिए.यद्यपि ग्रहण की गयी अन्न जल वायु रूपी आहार भी मनोवस्था पर प्रभाव डालती है,पर इसके अतिरिक्त विभिन्न दृश्य श्रव्य माध्यमो से तथा मनन चिंतन द्वारा नित्यप्रति जो हम ग्रहण करते हैं,वह आहार मुख्य रूप से हमारे मानसिक स्वस्थ्य को प्रभावित और नियंत्रित करता है.. और जैसे दूषित भोजन शारीरिक अस्वस्थता का कारण होता है,वैसे ही विभिन्न दृश्य श्रव्य माध्यमों से ग्रहण की गयी दूषित/नकारात्मक सोच विचार हमारे मानसिक अस्वस्थता का हेतु बनती है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विडंबना है कि दिनानुदिन जटिल होते जीवन चक्र के मध्य जितनी मात्रा में हमारे मानसिक सामर्थ्य का ह्रास/खपत हो रहा है, उतनी मात्रा में न तो पौष्टिक शारीरिक आहार जुटा पाने में हम सक्षम हो पा रहे हैं और न ही स्वस्थ मानसिक आहार..आज तनाव ग्रस्त मष्तिष्क जब मनोरंजन के माध्यम से विश्राम चाहता है, तो मनोरंजन के साधन रूप में उसे सबसे सुगम साधन टी वी के रूप में ही मिलता है. और देखिये न, मन मष्तिस्क और नयनों को चुंधियाते इस चमकीले माध्यम ने ,जो अहर्निश नकारात्मक पात्र कथाएं परोस परोस कर, षड़यंत्र ,अश्लीलता और सनसनी दिखा दिखाकर लोगों को क्या खुराक दे रहा है..बड़े आराम से यह मानव मन मस्तिष्क का प्रेम पूर्वक भक्षण कर रहा है. यद्यपि ऐसा नहीं है कि इससे नियमित जुड़े रहने वाले भी यह सब देख खीझते नहीं हैं,पर इनमे स्थित रहस्य रोमांच इन्हें इनसे दूर नहीं होने देता और फलतः सब जानते समझते भी इस से जुड़े रहते हैं..अपनी हानि देख सह भी उसी से जुड़े रहना, यह मानसिक खुजली नहीं तो और क्या है ??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पठन पाठन, बागवानी,समाज सेवा ,विभिन्न कला माध्यम, इत्यादि अनेक रचनात्मक कार्य जो व्यक्ति में असीमित सकारात्मक उर्जा भर सकते हैं...पर आज कितने लोग रह गए हैं जो इन श्रोतों के साथ जुड़े हुए सुख संतोष पाने को प्रयासरत हैं ?? भौतिक सुख सुविधायों के साधनों की आज कैसी बाढ़ सी आई हुई है,पर जितनी तीव्रता से इनकी भरमार हो रही है, उससे दुगुनी तीव्रता से मानवमात्र में मानसिक अवसाद भी बढ़ रहा है,मनोरोग बढ़ रहें हैं, आत्महत्याएं बढ़ रही हैं, सम्बन्ध आत्मीयता सहनशीलता धैर्य सब ध्वस्त हुए जा रहे हैं,परिवार ,समाज और देश टूट रहा है..यह सब टूट इसलिए रहा है क्योंकि इसकी प्रथम इकाई मनुष्य रोज स्वस्थ मानसिक आहार के आभाव में अन्दर से टूट रहा है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस त्रासद अवस्था में गंभीर रूप से आत्मावलोकन तथा शारीरिक मानसिक स्वस्थ्य के प्रति यथेष्ट सचेष्ट रहने की आवश्यकता है.नहीं तो हमारा सुखी रहने का ध्येय कभी पूर्णता न पायेगा.. व्यापक रूप में हमें अपने जीवन दृष्टिकोण को भी निश्चित रूप से बदलना पड़ेगा...हमारा वश अपने भाग्य पर, अपने जीवन में घटित घटनाओं पर भले न हो ,पर हमारा वश इसपर अवश्य है कि हम उन घटनाओं को किस रूप में देखें..इस संसार का एक भी मनुष्य यह दावा नहीं कर सकता कि उसके जीवन में सुखद कुछ भी न घटा है...तो हमें करना यही होगा कि दुखद स्मृतियाँ जो घट चुकी हैं,बीत चुकी हैं,उन्हें बीत जाने दें,मुट्ठी में भींच कर ,ह्रदय से लगाकर सदा उन्हें जीवित पोषित न रखें और इसके विपरीत सुखद स्मृतियों को सदा ही जिलाएँ रखें,नित्यप्रति उसे दुहराते रहें...जब हम अपने सुखद स्मृतियों की तालिका को दुहराते रहने की प्रवृत्ति बना लेंगे, न केवल दुखद परिस्थितियों के धैर्यपूर्वक सामना करने की अपरिमित क्षमता पाएंगे बल्कि हमारी प्रसन्न और प्रत्येक परिस्थिति में सहज, धैर्यवान रहने की जीवन दृष्टियुक्त सकारात्मक सोच, कईयों के जीवन में सुख और सकारात्मकता बिखेरने का निमित्त बनेगी... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.............................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-6407520790773004449?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/6407520790773004449/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=6407520790773004449&amp;isPopup=true' title='48 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/6407520790773004449'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/6407520790773004449'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='खुजली का सुख'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>48</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-577887489956579917</id><published>2010-03-16T16:35:00.001+05:30</published><updated>2010-03-26T15:19:24.895+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आलेख - राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आरक्षण'/><title type='text'>आ'रक्षण - रक्षण किसका ??</title><content type='html'>नेताजी बहुतै खिसियाये हुए हैं.आजकल जहाँ देखिये वहां चैनल सब पर चमक रहे हैं और सबको चमका रहे हैं...एलान किये हैं कि उनका लाश पर महिला आरक्षण बिल पास होगा.....नेताजी फरमाते हैं .....वे महिलाओं के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वो तो इतना चाहते हैं कि महिला आरक्षण का लाभ पढी लिखी फ़र फ़र उडती फिरती परकटी बलकटी उन महिलाओं को नहीं ,बल्कि यह उन महिलाओं को मिले, जो नरेगा के अंतर्गत बोझा ढ़ोने का काम करती हैं,जो अल्पसंख्यक समाज से आती हैं,जो अत्यंत पिछड़े वर्ग से आती हैं..संसद में जा राज्य व्यवस्था चलाने का अधिकार उन महिलाओं को मिलना चाहिए जो शिक्षा से वंचित हैं,पारिवारिक सामाजिक अधिकार से वंचित हैं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखिये तो,कितना पवित्र बात करते हैं नेताजी , कितना बड़ा ह्रदय है उन का..जो लोग मंत्री जी को घाघ और महिला विरोधी सिद्ध करते उनकी कथनी करनी में भेद बताते हैं,वे यह भूल जाते हैं कि यदि नेताजी महिलाओं के खिलाफ होते तो एक गोबर थपनी, अंगूठा छाप को मुख्यमंती बनाते..भाई बहुत हुआ , बहुत दिन राज कर लिया पढ़े लिखों ने अब तो अवसर उन्हें मिलना चाहिए जिनका कलम किताब से कोई वास्ता न हो..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेताजी महान समाजवादी हैं...वे समाज में ऊंच नीच का भेद समाप्त करने में नहीं,बल्कि सभी नीच को ऊंच बना देने और सभी ऊंच को नीच बना देने में विश्वास करते हैं..और हाँ,नीच और ऊंच का पैमाना है जाति और धर्म..नेताजी कहते हैं राजनीति खून बनकर उनके नस नस में बहती है..उनके बाप दादा चप्पलो नहीं पहनते थे...पर देखिये तो, ऊ अपना कैसा मकाम बनाये हैं (....कि उनका कम से कम अगला सात पीढी कुछो नहीं कमाएगा तो भी जमीन पर बिना पाऊं रखे जीवन बिता सकता है,एकदम राजशाही अंदाज में...) एहिसे सब लोग उनसे जलता है और उनका बदनाम करने का हर घड़ी साजिश रचता रहता है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम तो भाई लोहा मान लिए इनका और इनके जैसे जैसों का..राजनीति सही माने से ये ही लोग सीखे हैं और कर रहे हैं...किसी भी देश में एकछत्र शासन जमाये रखने और चलाने के लिए जो सबसे सफल टोटका काम में आता है,ऊ एहई है....जितना फूट डालोगे जितना आमजन को भरमाओगे, ओतना सुखी और समृद्ध रहोगे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महिला आरक्षण वाला ई केस में नेताजी को मालूम है, जदी इनका ई गोटी चल गया तो दू तीन झक्कास ऑप्शन खुलेगा...सबसे प्रबल सम्भावना तो इसीका बनेगा कि महिला आरक्षण का ई बिले पास नहीं हो,जैसे एतना साल से लटका हुआ है ...खुदा न खास्ता, पास होइयो गया तो उसमे इतना इतना पेंच होगा कि देश और महिलाओं को अगला दो टर्म उसे समझने में ही लग जायेगा और तबतक तो नेताजी का नैया शुभ शुभ करके पार हो लेगा.....और तीसरा सबसे बड़ा सफलता ई होगा कि संसद में स्थान, महिला हो कि पुरुष, केवल अनपढ़ ,लंठ लठैत लोग के लिए बचेगा.अपना दादागिरी सदा सर्वदा के लिए कायम रखने को ई बड़ा आवश्यक है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब भाई बहिनी लोग कभी जाति के नाम पर,कभी भाषा और छेत्रवादिता के नाम पर और कभी धर्म के नाम पर सिर फुटौअल करते रहें,ये माई बाप लोग देश के बाहरी भीतरी लंठों / आतंकियों की सेनाओं को पोसते रहें और अंततः दिहाड़ी कमाने वालों से लेकर बड़े बड़े औद्योगिक घराने तक खाने पीने सूंघने की चीजों से लेकर उपयोग की हर वस्तु पर टैक्स अदा कर कर के इनके स्विस बैंक को आबाद करने के लिए पिसते रहें...हो गयी राजनीति...हम भी खुश कि हम सबसे बड़े प्रजातान्त्रिक  राष्ट्र में रहते हैं और ये भी मस्त कि ये इतने बड़े जनतंत्र को चलाते हैं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलिए हम सब मिलकर इनकी हाथों को और मजबूत बना दें ताकि देश में बस एक ही योग्यता चले कि हम आप जन्मे किस जाति में हैं या कौन देवी देवता को पूजते हैं...तो क्या हुआ यदि किसीने कलम कागज़ घिस घिस कर अस्सी,पचासी,नब्बे प्रतिशत अंक अर्जित किया है....यदि आप निम्न जाति के नहीं, अल्पसंख्यक(??) नहीं, तो भाई आपके लिए नौकरी के नाम पर मैकडोनाल्ड,पिज्जा हट , कॉल सेंटरों या कोर्पोरेट हाउसों में काम है (...अभी हाल फिलहाल के लिए तो बस ये ऐसे कुछ राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय संस्थान हैं, जहाँ आरक्षनासुर पहुंचा नहीं है)...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज हमारे माननीय नेतागण चित्त में पूर्णतः धंसा चुके हैं कि देश/प्रशासन को चलाने के लिए प्रतिभा की नहीं, बल्कि जातिगत योग्यता की आवश्यकता है.सवर्ण यदि पंचानवे प्रतिशत अंक भी लाता है तो उसमे कुशल प्रबंधन की वह योग्यता, प्रतिभा नहीं होगी जो चालीस पैंतालीस प्रतिशत अंक लाने वाले पिछड़े,अल्पसंख्यक इत्यादि जातिवालों में होगी..और जहांतक पंचायत से लेकर विधान सभा, लोकसभा या राज्यसभा इत्यादि में जा देश/ प्रशासन के कुशल प्रबंधन की बात है,उसके लिए न तो किसी भी प्रकार के शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता है और न ही पूर्वानुभव की..अपने देश में राजनीति एकमात्र रोजगार है जिसके लिए न किसी परीक्षा में उतीर्ण होने की, न कार्य/प्रभाग के विशेषज्ञता की या पूर्वानुभव की आवश्यकता है...बल्कि अधिकांशतः तथाकथित गरीबों के मसीहा,जमीनी नेताओं को विश्वास है कि एक अशिक्षित महिला/पुरुष जितनी कुशलता से राज काज चला सकता है,उतना पढ़ा लिखा तो कदापि नहीं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ा जी कर रहा है कि पूछूं ...नेताजी यदि महिलाओं के लिए सीट आरक्षित हो भी जाती है तो क्या उसमे ऐसा कोई प्रावधान होगा क्या, कि गाँव शहर से पढी लिखी काबिल महिलाओं को खोज खोज कर आप लायेंगे और उन्हें संसद तक पहुंचाएंगे ??? अरे भाई, डरते काहे को हैं,आज अपने देश में जितने भी राजनितिक दल हैं,कुछेक अपवादों को छोड़ लगभग सबके सब तो दलविशेष के शीर्ष "नेता एंड फेमिली" के ही हैं और "राजा/रानी एंड संस" के तर्ज पर ही पीढी दर पीढी चल रहे हैं, तो भाई आप जिसे अपनी पार्टी का टिकट देंगे वही तो चुनाव में खड़ा होगा न ??? तो भाई ,आप अपने और अपने परिवार वालों तथा लग्गू भग्गुओं की पत्नी ,बहु बेटियों को ही टिकट दीजियेगा.....और हाँ यदि आपको यह लगता है कि पढ़ी लिखी महिला केवल रबर स्टंप न रह कुर्सी चुभुक कर धर अपना कब्ज़ा जमा सकती है, तो थोडा मेहनत कीजिये,परिवार से ऐसी महिला को चुनिए जो एकदम ठप्पा हो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे.... अरे ,ई मति समझिये कि हम "&lt;b&gt;आ-रक्षण&lt;/b&gt;" के विरिधी हैं...हम कद्दू आम जन तो बस एही आकांक्षा रखते हैं कि समाज में दबे कुचले वंचित प्रत्येक जन का रक्षण शासन प्रशासन करे...पर भाई, ऐसे नहीं,जैसे आज आप लोग कर रहे हैं....तनिक आँख खोलकर चारों ओर देखिये...आज अमीरी गरीबी जातिगत नहीं रह गया है, गरीबी किसीको भी जाति  के आधार पर नहीं बख्सता....तो सरकार, तनिक रहम कीजिये, साधनहीन को साधन दीजिये,खाने-पीने, पढने-लिखने, स्वस्थ रहने और जीने का सामान अधिकार और सुविधा , प्रत्येक देशवासी  को बिना जात-पात, धर्म, भाषा, क्षेत्र का भेद किये दीजिये..देश को प्रगति के पथ पर ले जाना है तो प्रतिभावान को अवसर दीजिये,उसके हाथों तंत्र / व्यवस्था  दीजिये,जिससे वह जनतंत्र को सच्चे मायने में सफल सजग और मजबूत बना सके....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;....................................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-577887489956579917?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/577887489956579917/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=577887489956579917&amp;isPopup=true' title='33 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/577887489956579917'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3630123509017373846/posts/default/577887489956579917'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='आ&apos;रक्षण - रक्षण किसका ??'/><author><name>रंजना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/01215091193936901460</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-NIrIiqhwxOQ/TiPxOnBjztI/AAAAAAAAAQE/1muWF3ia48g/s220/%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE.jpg'/></author><thr:total>33</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3630123509017373846.post-1555885732224809517</id><published>2010-02-22T17:31:00.001+05:30</published><updated>2010-02-22T20:56:46.706+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गीत.बसंत ऋतु.'/><title type='text'>बहुत याद आये !!!</title><content type='html'>&lt;b&gt;मादक मंद समीर बसंती,&lt;br /&gt;छूकर तन, मन को सिहराए,&lt;br /&gt;इस मोहक  बेला में साथी, आये, बहुत याद तुम आये !!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नींद पखेरू,पलकों को तज,&lt;br /&gt;स्मृति गगन में चित भटकाए,&lt;br /&gt;इस नीरव बेला में साथी,आये, बहुत याद तुम आये !!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूनम का चंदा ये चकमक,&lt;br /&gt;छवि बन तेरा, नेह लुटाये, &lt;br /&gt;इस मादक बेला में साथी, आये, बहुत याद तुम आये !!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उर चातक के स्वाति प्यारे, &lt;br /&gt;तुम बिन तृष्णा कौन बुझाये,&lt;br /&gt;आकर साथी कंठ लगा ले, पाए हृदय मिलन-सुख पाए !!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*********************&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3630123509017373846-1555885732224809517?l=samvednasansaar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samvednasansaar.blogspot.com/feeds/1555885732224809517/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3630123509017373846&amp;postID=1555885732224809517&amp;isPopup=true' title='54 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Samaaj'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Aadhyatm'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Dharm'/><title type='text'>भक्ति शक्ति युक्ति आगार...</title><content type='html'>कौनो घनघोर मजबूरी में, घटाटोप भु
