भगवान् ने अपनी पसंद से माँ बाप संतान या रिश्तेदार चुनने का हक किसी को नहीं दिया है,यदि दिया होता तो ऐसे असंख्य लोग होते जिन्होंने अपने से जुड़े लोग बदल लिए होते....
अपनी मेहनत और काबिलियत के बल पर गुरबत में भी इंजीनियरिंग और एम् बी ए की डिग्रियां हासिल कर गुप्ता अंकल ने ऊंचा ओहदा हासिल किया और इसी ऊंचे ओहदे के बल पर आंटी जैसी स्मार्ट मेधावी लड़की पत्नी रूप में पाया यहाँ तक तो सब उनके बस में था पर आगे की जिन्दगी में बहुत कुछ ऐसा घटा जिनपर उनका कोई वश नहीं चला॥
गुप्ता आंटी अपने समय में बड़ी ही मेधावी और महत्वकांक्षी थीं लेकिन हाथ आये इतने अच्छे रिश्ते को उनके अभिभावक छोड़ना नहीं चाहते थे,सो उन्होंने आंटी के आगे पढने और बढ़ने के सारे सपनो को विराम दे उनके हाथों बड़े साहब की पत्नी बनने का सौभाग्य और मिसेज गुप्ता नाम की डिग्री पकडा दी।
गुप्ता आंटी भी कम जीवट न थी। जबतक गुप्ता अंकल कलकत्ते में रहे, शादी और बेटे राजीव के जन्म के बाद भी आंटी ने हार नही मानी और बेटे को स्कूल भेजने के बाद उन्होंने अपनी पढाई का सिलसिला जो कि इन्टरमीडियेट के बाद रुक गया था फिर से चलाया और एक बच्चे को लेकर भी उन्होंने ग्रेजुएसन और ला की पढाई पूरी की.एक अच्छे फार्म में उन्होंने प्रैक्टिस भी शुरू कर दी थी.लेकिन इसी बीच अंकल को एक नए आ रहे फैक्टरी में बहुत ही ऊंचे पोस्ट का आफर मिला और अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए उन्होंने उस कम्पनी को ज्वाइन कर लिया॥
यह नयी फैक्टरी ऐसे उजाड़ बियावान में बसाया जा रहा था जिसके सबसे नजदीक के शहर से दूरी डेढ़ सौ किलोमीटर थी...अंकल के सितारे तो बुलंद हो गए पर आंटी का अपने पैरों पर खड़े होने,अपनी पहचान बनाने के सपनों पर फिर से धूल पड़ गया। राजीव को होस्टल में डाल दिया गया था. आंटी के पास अब कोई इंगेजमेंट नहीं बचा था॥वे बुरी तरह डिप्रेस रहने लगीं.अंकल को और कोई उपाय न सूझा तो उन्होंने आंटी को फिर से मातृत्व रूपी इंगेजमेंट दे दिया...
यहीं रागिनी का जन्म हुआ था।अंकल और हमलोग पडोसी थे.उनके बड़े से बंगले के बगल में हमारा छोटा बंगला.मेरे पापा अंकल से दो पोस्ट नीचे थे.इस अंतर को ऑफिस से लेकर घर तक पूरी तरह मेंटेन किया जाता था.न ही हम दोनों परिवार में बहुत अधिक घनिष्टता थी और न ही दूरी.
रागिनी मुझसे तीन साल छोटी और मेरी छोटी बहन बबली से साल भर बड़ी थी।दूध सी गोरी चिट्टी बड़ी बड़ी आँखों वाली रागिनी किसी की भी आँखें बांध लेती थी पर उम्र के साथ साथ स्पष्ट अनुभव किया जाने लगा कि उसका मेंटल और फिजिकल ग्रोथ एक सामान नहीं हो रहा था. उनके सामने हमारी बबली थी जो इतनी तेज थी कि जैसे लगता था मानसिक परिपक्वता में वह रागिनी से न जाने कितने साल बड़ी है॥
आंटी ने न कभी अपना हारना बर्दाश्त किया था और न ही वो अपने बच्चों का किसी भी बात में किसी से भी कम होना बर्दाश्त कर सकती थीं।रागिनी की कमजोरी भी वह बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर पाती थीं॥जब उन्होंने डाक्टरों को दिखाना शुरू किया और उन्होंने भी इस बात से सहमति जताई कि रागिनी पूर्णतः मंदबुद्धि तो नहीं पर उसका दिमागी विकास सामान्य बच्चों से कुछ धीमा जरूर है..तो भी आंटी यह मानने को तैयार न थी कि उनकी बेटी में इस तरह की कोई कमी हो सकती थी.
वो बहुत ही फ़्रसटेटेड रहने लगीं।उनका सारा गुस्सा अंकल और रागिनी पर निकलता था.जैसे जैसे रागिनी बड़ी हो रही थी अंकल आंटी की बढती चिंताओं के साथ डाक्टरों के पास उनका भाग दौड़ भी बढ़ रहा था.पर कोई बहुत अधिक सुधार होता नहीं दिख रहा था॥दस बारह वर्ष की उम्र में भी उसकी बुद्धि पांच छः वर्ष के बच्चे से अधिक न थी.बहुत ही सरल और भोली थी वह.बल्कि कहा जाय कि न ही यह दुनिया इस सरल भोली लडकी के लायक थी और न ही इस समझदारों की दुनिया में इसकी सच्ची क़द्र थी..
भोलेपन में की गयी उसकी हरकतें बड़ी अजीब हुआ करती थीं। वह करीब ग्यारह साल की थी.एक दिन वह मेरे साथ कहीं जा रही थी. उसने मुझसे कहानी सुनाने की जिद की तो मैं उसे एक कहानी सुनाने लगी.आंटी के यहाँ एक बड़ा सा कुत्ता था जो कि रागिनी का बेस्ट फ्रेंड था॥रागिनी को कुत्ते बहुत पसंद थे सो मैं उसे कुत्तों की ही कहानी सुनाने लगी......अचानक उसे क्या हुआ कि उसने मुझे कहा...दी, पता है डॉगी कैसे शूशू करता है और जबतक मैं उसे पकड़ती सम्हालती,सड़क किनारे पैंटी खोलकर लैंप पोस्ट के ऊपर पैर उठाकर उसने शू शू कर दिया..आते जाते लोग हंसते हुए खड़े हो गए.मैंने झपटकर उसे पकडा और लगभग घसीटते हुए घर ले कर आई और घर पहुंचकर उसे एक चांटा लगाया.बेचारी गाल सहलाती रह गयी कि इसमें बुरा क्या किया उसने....
दुनियादारी से पूरी तरह अनजान ,इतनी भोली और मासूम थी वह कि बहुत सी सामान्य बातें वह समझ ही नहीं पाती थी।पढाई की बातें भी उसे समझ नहीं आती थी.अब चूँकि कंपनी का ही स्कूल था तो हरेक क्लास में किसी में साल भर किसी में दो साल तक फेल होने पर अंकल का लिहाज कर उसे प्रोमोशन दे दिया जाता था.पर अंकल आंटी बहुत ही चिंतित थे रागिनी के भविष्य को लेकर...
संयोग से एक बार कंपनी ने अपने कर्मचारियों के मेंटल फिटनेस के लिए सात दिवसीय योग साधना शिविर आयोजित कराया..आयोजन इतना सफल रहा कि अगले महीने इसे कर्मचारियों के परिवार वालों के लिए भी आयोजित कराया गया.माँ पापा के कहने रागिनी को भी आंटी शिविर में ले गयीं...
आश्चर्यजनक परिणाम मिले...आजतक वर्षों से खिलाई जा रही सारी दवाईयां जो न कर सकी इस सात दिन के शिविर ने वह चमत्कार कर दिखाया॥
योग गुरु ने दावा किया कि अधिकतम साल डेढ़ साल में वे रागिनी को पूरी तरह ठीक कर देंगे...अंकल आंटी के खुशी का पारावार न रहा था।लेकिन समस्या यह थी कि तो अस्थायी शिविर था.योग आश्रम में अकेले रागिनी को लम्बे समय तक छोड़ना भी मुश्किल था॥
अंकल ने हाइयर मैनेजमेंट से बात कर यह व्यवस्था करवा दी कि योग आश्रम का एक योग प्रशिक्षक वहीँ कम्पनी के पे रोल पर बहाल कर दिया जायेगा जो रेगुलर बेसिस पर स्कूल में योगा क्लासेस लिया करेगा और कम्पनी के कर्मचारियों तथा उनके परिवारवालों के लिए भी नियमित कार्यशालाएं आयोजित करवाया करेगा।
जब से रागिनी इस योग क्लास को रेगुलर अटेंड करने लगी थी,उसमे अप्रत्यासित सुधार होने लगा था।पढाई में भी अब उसे बहुत दिक्कत नहीं रही थी॥योगा टीचर तो अंकल आंटी के लिए भगवान् बन गए थे.अंकल आंटी उन्हें अपने सर माथे पर बिठाते थे.वे जब चाहें उनके घर आ जा सकते थे..एक तरह से रागिनी के गार्जियन वही हो गए थे. बीच बीच में रागिनी को उनके साथ विशेष प्रशिक्षण के लिए आश्रम भी भेज दिया जाता था.
रागिनी का ऐसा काया पलट हो रहा था की उसका एक नया ही रूप सब देख रहे थे। दो साल पहले मैं तो शहर के कालेज होस्टल में रहने लगी थी पर बबली से रागिनी के बारे में बहुत कुछ सुनती रहती थी.बबली की खूब बनती थी उसके साथ.
उन्ही दिनों जब मैं होस्टल में थी,एक दिन अप्रत्यासित रूप से माँ ने फोन पर ऐसी खबर दी कि मैं अन्दर तक हिल गयी।
रागिनी ने आत्महत्या कर ली थी।अपने कानो पर मुझे बिलकुल भी भरोसा न हुआ॥माँ ने बताया कि सुबह करीब दस बजे गुप्ता आंटी ने फोन कर बबली को बताया कि रागिनी उसे बुला रही है॥बबली जब उनके घर पहुँची तो आंटी ने कहा कि रागिनी नहाने गयी है और उसे इन्तजार करने को कहा है..आधे घंटे इन्तजार करने के बाद भी जब रागिनी बाहर नहीं आई तो आंटी ने बबली से कहा कि जाओ उसे आवाज दो..बबली ने बाथरूम के दरवाजे के बाहर से उसे तीन चार आवाजें लगायी पर अन्दर केवल पानी गिरने की आवाज आती रही रागिनी ने कोई जवाब नहीं दिया...
बबली चिढ़कर आंटी के पास जाकर बोली कि आंटी वह पता नहीं और कितने देर नहायेगी,मैं जा रही हूँ निकलने पर उसे कह दीजियेगा वही मेरे पास आ जाय।आंटी ने बबली को साथ लेकर यह कहते हुए कि चलो उसे डांटती हूँ बाथरूम तक ले गयी और कई आवाजें लगायी.जब अन्दर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्होंने दरवाजा ठेला और अन्दर देखा कि रागिनी के गले में चुन्नी बंधी हुई थी जिसका छोर वेंटिलेटर में बंधा हुआ था.
केस पुलिस तक पहुँची। कालोनी क्या आस पास के पूरे इलाके में खबर तूफ़ान सा फ़ैल गया॥केस के गवाह में बबली का नाम भी फंसा और उसके दोस्तों के फेरहिस्त में मेरा नाम भी आया था.पूरी सम्भावना थी कि पुलिस मुझसे भी पूछताछ करती.माँ ने इसी वजह से मुझे फोन किया था कि अगर पुलिस आकर मुझसे होस्टल में या घर आने पर पूछती है तो उन्हें बस इतना ही बताना था कि रागिनी अपने पढाई में पिछड़ने को लेकर बहुत ही हतास और फ़्रसटेटेड रहा करती थी और हमेशा सुसाईट की बातें किया करती थी,हो सकता है इसी वजह से उसने ऐसा किया हो....
यह सरासर गलत था ...मैं जितना जानती थी रागिनी को कभी उसे हतास परेशान नहीं देखा था या ऐसा कोई भी कारण नहीं महसूस किया था जो उसे आत्महत्या करने को मजबूर करता...फोन पर माँ से बहुत पूछा कि इस अनहोनी की वजह क्या हो सकती है,पर माँ ने कुछ नहीं बताया।
मेरे दिमाग में सवालों ने भूचाल मचा दिया था।किसी तरह विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस रागिनी को बात बात पर इतना डर लगता था,जो पिछले कुछ सालों से अपने सफलता से इतनी खुश रहने लगी थी, जिसे आंटी के फ्रस्टेशन और गुस्से को सहने की आदत पड़ी हुई थी और ये कभी भी उसे विचलित नहीं करते थे... वह आत्महत्या जैसा कदम कैसे उठा सकती थी......
जिस वेंटिलेटर से लटकने की बात हो रही थी,वह वेंटिलेटर तो पांच ही फिट ऊपर था,उसपर कैसे लटका जा सकता था....माँ ने कहा फंदा गले में लगा था और वह बाथरूम में बैठी हुई थी...ऐसे मरना कैसे संभव था...मेरा सर फटा जा रहा था इन सवालों के जवाब पाने को....
भागी हुई मैं घर पहुँची थी।बबली इस हादसे से इतनी डर गयी थी कि उसे कम्पोज का इंजेक्सन देकर कई दिन तक सुलाए रखा गया था।माँ पापा तथा डाक्टरों की सख्त हिदायत थी कि बबली के सामने उस हादसे का कोई जिक्र न किया जाय. मैं तो अपने सवालों के जवाब पाने के लिए बस छटपटा कर रह गयी थी, उससे कुछ पूछने का रास्ता ही बंद हो गया था....
केस को तो किसी तरह पुलिस के साथ गंठजोड़ कर निपटा दिया गया था...पर जो सवाल उठे थे उन्हें कैसे खामोश किया जा सकता था।सालों तक वह हवाओं में तैरता रहा॥
घटना के सात महीने बाद गुप्ता अंकल ने यह कंपनी छोड़ एक विदेशी कम्पनी ज्वाइन कर लिया और सपरिवार भारत को अलविदा कह वहीँ जा बसे।
कई महीनो बाद एक दिन अचानक माँ पापा और राजन अंकल जो कि गुप्ता अंकल के सहयोगी थे और जिन्होंने गुप्ता अंकल के केस के निपटारे में बड़ा ही महत्वपूर्ण रोल निभाया था,उनकी फुसफुसाती आवाजें मेरे कानो में पड़ गयी और उन कुछ वाक्यों ने मेरे सारे सवालों के जवाब मुझे दे दिए...
पोस्ट मार्टम में खुलासा हुआ था कि रागिनी तीन महीने की गर्भवती थी और उसकी शरीर की कई हड्डियाँ टूटी हुई थी।शरीर पर गहरे घावों के निशान पाए गए थे.... पर जो पोस्ट मार्टम रिपोर्ट दर्ज हुई उसमे से ये सारी बातें लाखों रुपये के झाडू से साफ़ कर दिए गए थे॥फाइनल रिपोर्ट में इस केस को सिंपल आत्महत्या का केस करार दिया गया था...
एक मासूम जान चली गयी ..........असली गुनाहगार कौन था ........
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12.6.09
29.5.09
भोज !!!!
कहाँ नहीं मनौती मानी गयी।अंगरेजी डाक्टर, बैद हकीम, गंडा ताबीज क्या क्या न किया गया॥आखिर शादी के बारहवें बरस में भाग बना और देवकी बाबू के घर चिराग जला था...सरोज के विकल ममत्व को स्नेह अवलंबन मिला....नन्हा सोनू दोनों के जीवन का सार था.दोनों पति पत्नी की आँखे आठों पहर उसी पर लगी रहती थी..
और लड़का था भी ऐसा कि देखने वालों की आँखें बाँध लेता था...ऐसा कोई दिन न होता जब सरोज उसकी दीठ न उतारती हो।उसका बस चलता तो उसे आँचल तले ही छुपाये रखती. पर हाथ पैर वाले बच्चे को आँचल तले कितने दिन रखा जा सकता था,बच्चा भाग दौड़ में लग जाता और आशंकित सरोज कभी भी निश्चिंत होकर उसके बाल क्रियाओं का मन भर सुख न ले पाती......
चार साल तक तो सरोज ने उसे घर खलिहान और आँगन तक में सीमित रखा,पर आखिर ऐसे ही सारी उम्र घर में घुसाए तो न रखा जा सकता था॥शिक्षा की बात आई तो सरोज ने जिद ठान दी कि सोनू स्कूल नहीं जायेगा,बल्कि उसके शिक्षा की व्यवस्था घर पर ही कर दी जाय। बड़ी मशक्कत से देवकी बाबू ने सरोज को समझा बुझाकर बच्चे का दाखिला स्कूल में करवाया.
देवकी बाबू नहीं चाहते थे कि उनका बच्चा भी उनकी तरह जमींदारी की इस डूबती नैया के भरोसे अनपढ़ बैठा रहे॥अपने लाल के लिए उनकी आँखों में बहुत बड़े बड़े सपने थे..उन्होंने सोच रखा था कि किसी भी तरह हाई स्कूल की शिक्षा के लिए वे उसे शहर के सबसे बड़े स्कूल में डाल देंगे और अपना पूरा सामर्थ्य इस बच्चे के उज्जवल भविष्य निर्माण में लगा देंगे..
ज्यों ज्यों दिन बीतते गए उनका सोनू अपनी प्रतिभा से उनके सपने को और भी पुख्ता करता गया।उसके प्रतिभा से स्कूल से मास्टर भी अचंभित रहा करते थे. छठी कक्षा तक पहुँचते पहुँचते सोनू स्कूल की शान बन गया था.
लेकिन विधाता भी कैसे खेल खेला करता है, कि कभी कभी उससे निष्ठुर संसार में कोई नहीं लगता। स्कूल के आहते में ही आम का एक विशाल पेड़ था. उस साल वह फल से लद सा गया था.नीचे के सभी फल तो बच्चों ने चढ़कर या डंडे पत्थर मारकर बतिया में ही झाड़ लिए थे,पर ऊपर की टहनियों पर जो कुछ फल बच गए थे,बच्चों को हमेशा चुनौती दे चिढाया करते थे.... रोज ही बच्चों में दावं लगाया जाता कि जो भी बच्चा ऊपर वाली टहनियों से बीस फल तोड़ लाएगा वही स्कूल का लीडर ,सबसे बहादुर माना जाएगा.
फिर क्या था,इसी होड़ में एक दिन सोनू चढ़ गया ऊपर वाली टहनियों पर॥नीचे से सारे बच्चे ललकार रहे थे और सोनू फुनगियों की तरफ बढा चला जा रहा था।हरेक आम के साथ उसका उत्साह बढा ही चला जा रहा था.पंद्रह आम तोड़ लिए थे उसने .लेकिन जैसे ही सोलहवें की ओर बढा, एक कमजोर टहनी ऐसे टूटी कि वह सोनू के लिए यमराज बन गयी.सर में इतनी भारी चोट आई कि जमीन पर गिरने के बाद उसके मुंह से आवाज तक नहीं फूटी....एक पल में देवकी बाबू और सरोज का वह सुन्दर संसार लुट गया.
देवकी बाबू के घर में पूरा गाँव उमड़ आया था।देवकी बाबू के कुछेक गोतिया लोगों को छोड़ शायद ही कोई ऐसा था जिसकी आँखें नहीं बह रही थी.सरोज की नजर जैसे ही अपने बच्चे के लहूलुहान शरीर पर पडी बदहवास भागती उसे गोद में झपट लिया...लेकिन उसके ठंढे पड़े शरीर ने जैसे ही उसे यथार्थ बोध कराया तो वह अपने होशो हवाश खो बैठी.उसके बाद तो किसी तरह जैसे ही उसे होश में लाया जाता,एक चित्कार के साथ फिर से वह अपने होश गवां बैठती.देवकी बाबू बेहोश भले न हुए थे,पर बेटे के मृत शरीर के आगे जो पत्थर होकर बैठे,तो लग ही नहीं रहा था कि उनके काठ बने शरीर में प्राण बचा हुआ है.
दोपहर को घटना घटी थी और सूरज डूबने को आया था...सबके समझाने बुझाने पर किसी तरह अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हुई।देवकी बाबू का माथा तो सुन्न पड़ा था,गोतिया दियाद तथा ग्रामीणों ने ही मिलकर सारी तैयारियां कीं.अंतिम विदाई के ह्रदय विदारक दृश्य ने सबके कलेजे दहला दिए थे॥
दाह संस्कार के अगले दिन सभी सम्बन्धियों पुरोहितों तथा गणमान्य ग्रामीणों की देवकी बाबू के घर बैठकी हुई। आगे के कार्यक्रम की रूपरेखा पर विचार शुरू हुआ. कुछ भलेमानसों ने जैसे ही राय दी कि दुःख की इस घड़ी में क्रिया कर्म में कोई ताम झाम न किया जाय,बाकियों ने उन्हें इतना दुरदुराया कि उन्होंने चुप रहने में ही भलाई समझी.लोगों का तर्क था कि अब चूँकि सोनू का जनेऊ हो चुका था, इसलिए उसका सारा कर्म एक वयस्क सा ही होना चाहिए. इन विरोधी स्वरों में देवकी बाबू के अलग हो चुके भाइयों का स्वर सबसे मुखर था.
यह तो उनके लिए एक सुनहरा अवसर था,जिसके द्वारा वे अपना सारा गुप्त वैर निकाल मन ठंढा कर सकते थे।एकसाथ मानसिक और आर्थिक आघात दे वे अपना अगला पिछला सब हिसाब चुकता कर सकते थे,जो जमीन विभाजन के समय से उनके मन में पल रहे थे॥इस सुनहरे अवसर को वे भला क्योंकर गवांते.
क्रिया कर्म दान इत्यादि की लम्बी फेरहिस्त बनी।लगभग दो घंटे तक इस बात पर विचार या कहें वाद विवाद चलता रहा कि चार दिनों के भोज में किस दिन कौन सा व्यंजन रखा जायेगा, कितने किस्म की कौन कौन सी मिठाई का प्रावधान रखा उचित होगा॥ पूरी परिचर्चा ऐसे हो रही थी जैसे वह सोनू के विवाहोत्सव का अवसर हो.मिठाइयों के स्वाद ने सबकी बुद्धि और जीभ को ऐसे मोहित किया कि उनका हर्ष परिचर्चा में परिहास ले आया.हंसी ठठा से पूरा माहौल गमगमा गया.
उसी समय देवकी बाबू की आँखों के आगे दृश्य घूम गया कि उनका सोनू पेड़ से गिर रहा है और जबतक वे उसे अपने हाथों में थामते कि वह जमीन पर गिरकर लहूलुहान हो गया है। देवकी बाबू चिंघाड़ मारकर बिलख पड़े और संज्ञाशून्य हो कर जमीन पर गिर पड़े.माहौल अचानक ही बदल गया.पानी के छींटे और हवा कर किसी तरह उन्हें होश में लाया गया. लोगों ने दबी जुबान से एक दुसरे को परिचर्चा को विराम देने को खबरदार किया॥अभी इसे आगे बढ़ाने का उचित माहौल नहीं रह गया था.. अगले दिन बैठक के निर्धारण के साथ उस दिन की सभा बीच में ही स्थगित हो गयी..
दो पुस्त पहले तक बड़ी भारी जमींदारी थी उनकी। जहाँ तक नजर दौडाओ उनके ही खेत नजर आते थे...खलिहान में फसल के अम्बार लगे रहते थे...कमला नदी का आर्शीवाद था.साल में तीन फसल हुआ करते थे.उनके ज्यादातर जमीन कमला जी के किनारे ही थे॥लेकिन समय के साथ सब तहस नहस होता चला गया.नालायक निकम्मी पीढी ने केस मुक़दमे तथा अय्यासी में सारा धन कमला जी के सतत प्रवाहित धार सा पानी कर बहा दिया...
आज बस सब ऊपरी दिखावा भर रह गया था॥अन्दर से सभी खोखले थे। यह भी जो आज बचा था देवकी बाबू के पिताजी रामनारायण बाबू सूझ बूझ के कारण ही बचा था.उन्होंने अपनी जिन्दगी में ही अपने बेटियों को निपटाकर सातों बेटों को फरिया दिया था.. पर बाँट बखरा के बाद सातों भाइयों के हिस्से जो जमीन आई थी,वह इतनी न थी कि उसके भरोसे ठीक से पहना ओढा या शान बघारा जा सकता था.
जब हैसियत थी तब इन्होने मरनी जीनी शादी ब्याह सबमे बेहिसाब पैसे लुटाये थे, कुत्ते बिल्लियों के भी धूम धाम से ब्याह रचाए थे॥पर आज वह सब करना नामुमकिन था।आज हैसियत के हिसाब से काम क्रिया का मतलब था,कम से कम छः सात लाख की चोट.देवकी बाबू अपने हिस्से की लगभग सारी जमीन बेच देते तो ही इतनी रकम का इंतजाम हो सकता था.
लेकिन जमीन बेचना भी क्या इतना आसान था।लोग इसी ताक में तो रहते थे.सख्त जरूरत के ऐसे मौकों पर खरीदार के हजार नखरे होते थे.मजबूरी में औने पौने दाम पर लोगों को जमीन बेचना पड़ता था या फिर सूदखोरों के पास चक्रवृद्धि ब्याज पर जमीन गिरवी रखना पड़ता था,जिसके मूल और सूद चुकाने में पीढियों के तेल निकल जाते थे.
एक तो बेटे के मौत का गम ऊपर से इतना बड़ा खर्चा....देवकी बाबू विक्षिप्त से हुए जा रहे थे।अपने मुंह से अपने आर्थिक स्थिति की पोल तो खोल नहीं सकते थे...सो उन्होंने सोचा कि मानसिक स्थिति का हवाला देकर किसी तरह पंचों को मानाने का प्रयत्न करेंगे॥
अगले दिन की बैठक में उन्होंने पंचों के सामने जैसे ही अपना अनुनय रखा कि वर्तमान मानसिक अवस्था में उनका मन जरा भी गवाही नहीं दे रहा इस आयोजन को वृहत रूप में करने का॥कि सारे लोग इस बात पर उखड गए।पीढियों से चली आ रही परंपरा, रीत रिवाज के ये ही तो रक्षक थे.माना कि दुःख बहुत बड़ा था,लेकिन इसका यह तो मतलब नहीं था कि लोकाचार से मुंह मोड़ लिया जाय..एक से एक किस्से निकलने लगे कि कैसे फलाने ने अपने फलाने के आकस्मिक निधन पर क्रिया कर्म में कितने शान से खर्च किया ,फलाने ने नहीं किया तो उसके खानदान पर कितनी विपदा आई.आखिर इस आसमयिक मौत से आत्मा अतृप्त होकर जो भटकेगी,उसके शांति का रास्ता इन्ही कर्मो से होकर तो निकलेगा.जितने अच्छे ढंग से कर्म होगा आत्मा उतनी ही तृप्त होगी.
आखिर इनके तर्क और क्षोभ के सामने देवकी बाबू ने अपने हथियार डाल दिए और अंततः उन्हें कूबूलना ही पड़ा कि अभी इस समय इस रूप में यह सब करने में वे आर्थिक रूप से पूर्णतः अक्षम हैं। अब अगर पञ्च सहारा दें,इस विषम समय में हाथ पकडें,तभी वे यह सब संपन्न कर सकते हैं.
बस क्या था,सांत्वना और सहानुभूति का दौर सा चल निकला॥वाणी में मधु घोलते हुए सबने समवेत स्वर में अपने विशाल ह्रदय और अपनापन का भरोसा दिया..देवकी बाबू को लताड़ भी लगायी कि उनके रहते वे अपने आप को ऐसा असहाय कैसे समझ सकते हैं...
पुराहितों और पंचों ने पूरी सहृदयता से आयोजन की विस्तृत रूपरेखा बनाई ।खर्च का हिसाब लगाया गया और सबने अपना अपना भाग तय कर दिया॥कुछ ही पलों में पूरे पैसों का इंतजाम हो गया था..सबकी राय थी कि कहीं किसी बात की कोई कमी उनके रहते न रखी जाय..
सब कुछ तय कर तृप्त ह्रदय से चाय नाश्ते के साथ सभा संपन्न हुई.एक एक कर लोग उठ उठ कर जाने लगे.जाते समय व्यक्तिगत आश्वासन देने के बहाने सब एकांत में देवकी बाबू से मिलते गए और फुसफुसाते हुए उनके कान में अपने पसंदीदा जमीन के कागजात निश्चित रूप से लेकर आने की ताकीद करते गए...
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और लड़का था भी ऐसा कि देखने वालों की आँखें बाँध लेता था...ऐसा कोई दिन न होता जब सरोज उसकी दीठ न उतारती हो।उसका बस चलता तो उसे आँचल तले ही छुपाये रखती. पर हाथ पैर वाले बच्चे को आँचल तले कितने दिन रखा जा सकता था,बच्चा भाग दौड़ में लग जाता और आशंकित सरोज कभी भी निश्चिंत होकर उसके बाल क्रियाओं का मन भर सुख न ले पाती......
चार साल तक तो सरोज ने उसे घर खलिहान और आँगन तक में सीमित रखा,पर आखिर ऐसे ही सारी उम्र घर में घुसाए तो न रखा जा सकता था॥शिक्षा की बात आई तो सरोज ने जिद ठान दी कि सोनू स्कूल नहीं जायेगा,बल्कि उसके शिक्षा की व्यवस्था घर पर ही कर दी जाय। बड़ी मशक्कत से देवकी बाबू ने सरोज को समझा बुझाकर बच्चे का दाखिला स्कूल में करवाया.
देवकी बाबू नहीं चाहते थे कि उनका बच्चा भी उनकी तरह जमींदारी की इस डूबती नैया के भरोसे अनपढ़ बैठा रहे॥अपने लाल के लिए उनकी आँखों में बहुत बड़े बड़े सपने थे..उन्होंने सोच रखा था कि किसी भी तरह हाई स्कूल की शिक्षा के लिए वे उसे शहर के सबसे बड़े स्कूल में डाल देंगे और अपना पूरा सामर्थ्य इस बच्चे के उज्जवल भविष्य निर्माण में लगा देंगे..
ज्यों ज्यों दिन बीतते गए उनका सोनू अपनी प्रतिभा से उनके सपने को और भी पुख्ता करता गया।उसके प्रतिभा से स्कूल से मास्टर भी अचंभित रहा करते थे. छठी कक्षा तक पहुँचते पहुँचते सोनू स्कूल की शान बन गया था.
लेकिन विधाता भी कैसे खेल खेला करता है, कि कभी कभी उससे निष्ठुर संसार में कोई नहीं लगता। स्कूल के आहते में ही आम का एक विशाल पेड़ था. उस साल वह फल से लद सा गया था.नीचे के सभी फल तो बच्चों ने चढ़कर या डंडे पत्थर मारकर बतिया में ही झाड़ लिए थे,पर ऊपर की टहनियों पर जो कुछ फल बच गए थे,बच्चों को हमेशा चुनौती दे चिढाया करते थे.... रोज ही बच्चों में दावं लगाया जाता कि जो भी बच्चा ऊपर वाली टहनियों से बीस फल तोड़ लाएगा वही स्कूल का लीडर ,सबसे बहादुर माना जाएगा.
फिर क्या था,इसी होड़ में एक दिन सोनू चढ़ गया ऊपर वाली टहनियों पर॥नीचे से सारे बच्चे ललकार रहे थे और सोनू फुनगियों की तरफ बढा चला जा रहा था।हरेक आम के साथ उसका उत्साह बढा ही चला जा रहा था.पंद्रह आम तोड़ लिए थे उसने .लेकिन जैसे ही सोलहवें की ओर बढा, एक कमजोर टहनी ऐसे टूटी कि वह सोनू के लिए यमराज बन गयी.सर में इतनी भारी चोट आई कि जमीन पर गिरने के बाद उसके मुंह से आवाज तक नहीं फूटी....एक पल में देवकी बाबू और सरोज का वह सुन्दर संसार लुट गया.
देवकी बाबू के घर में पूरा गाँव उमड़ आया था।देवकी बाबू के कुछेक गोतिया लोगों को छोड़ शायद ही कोई ऐसा था जिसकी आँखें नहीं बह रही थी.सरोज की नजर जैसे ही अपने बच्चे के लहूलुहान शरीर पर पडी बदहवास भागती उसे गोद में झपट लिया...लेकिन उसके ठंढे पड़े शरीर ने जैसे ही उसे यथार्थ बोध कराया तो वह अपने होशो हवाश खो बैठी.उसके बाद तो किसी तरह जैसे ही उसे होश में लाया जाता,एक चित्कार के साथ फिर से वह अपने होश गवां बैठती.देवकी बाबू बेहोश भले न हुए थे,पर बेटे के मृत शरीर के आगे जो पत्थर होकर बैठे,तो लग ही नहीं रहा था कि उनके काठ बने शरीर में प्राण बचा हुआ है.
दोपहर को घटना घटी थी और सूरज डूबने को आया था...सबके समझाने बुझाने पर किसी तरह अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हुई।देवकी बाबू का माथा तो सुन्न पड़ा था,गोतिया दियाद तथा ग्रामीणों ने ही मिलकर सारी तैयारियां कीं.अंतिम विदाई के ह्रदय विदारक दृश्य ने सबके कलेजे दहला दिए थे॥
दाह संस्कार के अगले दिन सभी सम्बन्धियों पुरोहितों तथा गणमान्य ग्रामीणों की देवकी बाबू के घर बैठकी हुई। आगे के कार्यक्रम की रूपरेखा पर विचार शुरू हुआ. कुछ भलेमानसों ने जैसे ही राय दी कि दुःख की इस घड़ी में क्रिया कर्म में कोई ताम झाम न किया जाय,बाकियों ने उन्हें इतना दुरदुराया कि उन्होंने चुप रहने में ही भलाई समझी.लोगों का तर्क था कि अब चूँकि सोनू का जनेऊ हो चुका था, इसलिए उसका सारा कर्म एक वयस्क सा ही होना चाहिए. इन विरोधी स्वरों में देवकी बाबू के अलग हो चुके भाइयों का स्वर सबसे मुखर था.
यह तो उनके लिए एक सुनहरा अवसर था,जिसके द्वारा वे अपना सारा गुप्त वैर निकाल मन ठंढा कर सकते थे।एकसाथ मानसिक और आर्थिक आघात दे वे अपना अगला पिछला सब हिसाब चुकता कर सकते थे,जो जमीन विभाजन के समय से उनके मन में पल रहे थे॥इस सुनहरे अवसर को वे भला क्योंकर गवांते.
क्रिया कर्म दान इत्यादि की लम्बी फेरहिस्त बनी।लगभग दो घंटे तक इस बात पर विचार या कहें वाद विवाद चलता रहा कि चार दिनों के भोज में किस दिन कौन सा व्यंजन रखा जायेगा, कितने किस्म की कौन कौन सी मिठाई का प्रावधान रखा उचित होगा॥ पूरी परिचर्चा ऐसे हो रही थी जैसे वह सोनू के विवाहोत्सव का अवसर हो.मिठाइयों के स्वाद ने सबकी बुद्धि और जीभ को ऐसे मोहित किया कि उनका हर्ष परिचर्चा में परिहास ले आया.हंसी ठठा से पूरा माहौल गमगमा गया.
उसी समय देवकी बाबू की आँखों के आगे दृश्य घूम गया कि उनका सोनू पेड़ से गिर रहा है और जबतक वे उसे अपने हाथों में थामते कि वह जमीन पर गिरकर लहूलुहान हो गया है। देवकी बाबू चिंघाड़ मारकर बिलख पड़े और संज्ञाशून्य हो कर जमीन पर गिर पड़े.माहौल अचानक ही बदल गया.पानी के छींटे और हवा कर किसी तरह उन्हें होश में लाया गया. लोगों ने दबी जुबान से एक दुसरे को परिचर्चा को विराम देने को खबरदार किया॥अभी इसे आगे बढ़ाने का उचित माहौल नहीं रह गया था.. अगले दिन बैठक के निर्धारण के साथ उस दिन की सभा बीच में ही स्थगित हो गयी..
दो पुस्त पहले तक बड़ी भारी जमींदारी थी उनकी। जहाँ तक नजर दौडाओ उनके ही खेत नजर आते थे...खलिहान में फसल के अम्बार लगे रहते थे...कमला नदी का आर्शीवाद था.साल में तीन फसल हुआ करते थे.उनके ज्यादातर जमीन कमला जी के किनारे ही थे॥लेकिन समय के साथ सब तहस नहस होता चला गया.नालायक निकम्मी पीढी ने केस मुक़दमे तथा अय्यासी में सारा धन कमला जी के सतत प्रवाहित धार सा पानी कर बहा दिया...
आज बस सब ऊपरी दिखावा भर रह गया था॥अन्दर से सभी खोखले थे। यह भी जो आज बचा था देवकी बाबू के पिताजी रामनारायण बाबू सूझ बूझ के कारण ही बचा था.उन्होंने अपनी जिन्दगी में ही अपने बेटियों को निपटाकर सातों बेटों को फरिया दिया था.. पर बाँट बखरा के बाद सातों भाइयों के हिस्से जो जमीन आई थी,वह इतनी न थी कि उसके भरोसे ठीक से पहना ओढा या शान बघारा जा सकता था.
जब हैसियत थी तब इन्होने मरनी जीनी शादी ब्याह सबमे बेहिसाब पैसे लुटाये थे, कुत्ते बिल्लियों के भी धूम धाम से ब्याह रचाए थे॥पर आज वह सब करना नामुमकिन था।आज हैसियत के हिसाब से काम क्रिया का मतलब था,कम से कम छः सात लाख की चोट.देवकी बाबू अपने हिस्से की लगभग सारी जमीन बेच देते तो ही इतनी रकम का इंतजाम हो सकता था.
लेकिन जमीन बेचना भी क्या इतना आसान था।लोग इसी ताक में तो रहते थे.सख्त जरूरत के ऐसे मौकों पर खरीदार के हजार नखरे होते थे.मजबूरी में औने पौने दाम पर लोगों को जमीन बेचना पड़ता था या फिर सूदखोरों के पास चक्रवृद्धि ब्याज पर जमीन गिरवी रखना पड़ता था,जिसके मूल और सूद चुकाने में पीढियों के तेल निकल जाते थे.
एक तो बेटे के मौत का गम ऊपर से इतना बड़ा खर्चा....देवकी बाबू विक्षिप्त से हुए जा रहे थे।अपने मुंह से अपने आर्थिक स्थिति की पोल तो खोल नहीं सकते थे...सो उन्होंने सोचा कि मानसिक स्थिति का हवाला देकर किसी तरह पंचों को मानाने का प्रयत्न करेंगे॥
अगले दिन की बैठक में उन्होंने पंचों के सामने जैसे ही अपना अनुनय रखा कि वर्तमान मानसिक अवस्था में उनका मन जरा भी गवाही नहीं दे रहा इस आयोजन को वृहत रूप में करने का॥कि सारे लोग इस बात पर उखड गए।पीढियों से चली आ रही परंपरा, रीत रिवाज के ये ही तो रक्षक थे.माना कि दुःख बहुत बड़ा था,लेकिन इसका यह तो मतलब नहीं था कि लोकाचार से मुंह मोड़ लिया जाय..एक से एक किस्से निकलने लगे कि कैसे फलाने ने अपने फलाने के आकस्मिक निधन पर क्रिया कर्म में कितने शान से खर्च किया ,फलाने ने नहीं किया तो उसके खानदान पर कितनी विपदा आई.आखिर इस आसमयिक मौत से आत्मा अतृप्त होकर जो भटकेगी,उसके शांति का रास्ता इन्ही कर्मो से होकर तो निकलेगा.जितने अच्छे ढंग से कर्म होगा आत्मा उतनी ही तृप्त होगी.
आखिर इनके तर्क और क्षोभ के सामने देवकी बाबू ने अपने हथियार डाल दिए और अंततः उन्हें कूबूलना ही पड़ा कि अभी इस समय इस रूप में यह सब करने में वे आर्थिक रूप से पूर्णतः अक्षम हैं। अब अगर पञ्च सहारा दें,इस विषम समय में हाथ पकडें,तभी वे यह सब संपन्न कर सकते हैं.
बस क्या था,सांत्वना और सहानुभूति का दौर सा चल निकला॥वाणी में मधु घोलते हुए सबने समवेत स्वर में अपने विशाल ह्रदय और अपनापन का भरोसा दिया..देवकी बाबू को लताड़ भी लगायी कि उनके रहते वे अपने आप को ऐसा असहाय कैसे समझ सकते हैं...
पुराहितों और पंचों ने पूरी सहृदयता से आयोजन की विस्तृत रूपरेखा बनाई ।खर्च का हिसाब लगाया गया और सबने अपना अपना भाग तय कर दिया॥कुछ ही पलों में पूरे पैसों का इंतजाम हो गया था..सबकी राय थी कि कहीं किसी बात की कोई कमी उनके रहते न रखी जाय..
सब कुछ तय कर तृप्त ह्रदय से चाय नाश्ते के साथ सभा संपन्न हुई.एक एक कर लोग उठ उठ कर जाने लगे.जाते समय व्यक्तिगत आश्वासन देने के बहाने सब एकांत में देवकी बाबू से मिलते गए और फुसफुसाते हुए उनके कान में अपने पसंदीदा जमीन के कागजात निश्चित रूप से लेकर आने की ताकीद करते गए...
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20.5.09
दृष्टिकोण ...........
कभी कहीं पढ़ी हुई ,सुनी हुई एक सामान्य प्रसंग ,एक साधारण वाक्य या घटना भी कभी कभी मर्म को स्पर्श कर मन एवं चिंतन को ऐसे आंदोलित कर दिया करती है कि सोच की दिशा बदल जीवन धारा ही बदल जाया करती है....
आज अपनी एक नितांत ही व्यक्तिगत और गोपनीय अनुभूति यह सोचकर सार्वजानिक कर रही हूँ कि क्या पता जैसे प्रसंग ने मेरे सोच को परिवर्तित कर मुझे अनिर्वचनीय सुख लाभ का सुअवसर दिया,संभव है किसी और के सोच की दिशा को भी प्रभावित करे और उसके सुख का निमित्त बने...
भीड़ भाड़ सदैव ही मुझे आतंकित भयग्रस्त किया करती रही है और इससे बचने में मैं अपना पूरा सामर्थ्य लगा दिया करती हूँ...बाकी भीड़ से तो बच भी जाती थी पर अपने धर्मभीरू माता पिता संग मंदिरों के भीड़ का सामना छुटपन से ही करना पड़ा. धार्मिक स्थलों की अपार अव्यवस्थित भीड़,गन्दगी,पंडों की लूट खसोट,चारों और फ़ैली अव्यवस्था मन में इतनी वितृष्णा भरती थी कि मेरे समझ में नहीं आता था,इन सब के मध्य लोग अपनी श्रद्धा भक्ति का निष्पादन और भक्ति भाव का संवरण कैसे कर पाते हैं.इसके साथ ही तथाकथित भक्तों का क्षद्म रूप भी मुझे बड़ा ही आहत किया करता था और एक तरह से मंदिरों, कर्मकांडों के प्रति मेरी अरुचि दृढ से दृढ़तर होती गयी...मेरे अभिभावक मुझसे बड़े ही क्षुब्ध रहा करते थे. उनकी दृष्टि में मैं घोर नास्तिक थी....
मेरे विवाह के पहले तक हमारे अभिभावक वर्ष में एक बार देवघर (वैद्यनाथ धाम) अवश्य जाते थे. वहां के विहंगम दृश्य के क्या कहने......लोटे का जल शायद ही शिवशम्भू के मस्तक तक पहुँच पाता था.....समस्त पुष्प पत्र जल इत्यादि भक्तों पर ही गिरते थे..गर्भ गृह की यह अवस्था होती थी कि अधिकांशतः भोलेनाथ ही भक्तों के चरण रज प्राप्त करते थे.. यदि कोई उनके स्पर्श का सुअवसर पा जाता तो लगता यदि भोलेनाथ धरती को इतने जकड़ कर न पकडे होते तो कबके भक्त उन्हें समूल उठा अपने जेब में रख चलते बनते...
इस धक्का मुक्की में भक्ति भाव कितना बचा रहता था पता नहीं,हर व्यक्ति दुसरे को अपने स्थान का अपहर्ता घोर शत्रु सम लगता था और वश चलता तो सामने वाले को खदेड़ कर वहां से भगा देता. इस भीड़ में चोरों,जेबकतरों और ठगों की चांदी कटती थी....
उत्तर भारत के प्रायः सभी धर्मस्थलों की कमोबेश यही स्थिति आज भी है .हाँ दक्षिण भारत के जितने भी धर्मस्थलों पर आज तक भ्रमण किया ,अपार भीड़ के बावजूद मंदिर प्रशासन तथा स्थानीय प्रशासन के हस्तक्षेप से क्रमबद्ध कतारों के कारण बहुत अधिक धक्का मुक्की की स्थिति कहीं नहीं देखी...
बचपन में तो अभिभावकों के साथ जब कभी भी इस भीड़ भाड़ में जाने की बाध्यता बनी,मेरा प्रयास होता था ,शीघ्रता से उस भीड़ से निपटकर मंदिर प्रांगन में कोई ऐसा स्थान खोजना और वहां शांति से समय गुजरना जहाँ कि पर्याप्त नीरवता हो.बाद में जब स्वयं निर्णायक बनी तब बहुधा यही प्रयास रहा कि देवस्थानों पर ऐसे समय में जाया जाय जब भीड़ की संभावना न्यूनतम हो.
वर्षो तक देवस्थानों की इस भीड़ और अव्यवस्था ने मन को बड़ा ही तिक्त और खिन्न किया ...परन्तु सुसंयोग से करीब सत्रह अठारह वर्ष पहले एक बार चैतन्य महाप्रभु की जीवनी पढ़ने का अवसर मिला. संभवतः हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की लिखी हुई थी वह.. सम्पूर्ण कथानक इतने हृदयस्पर्शी ढंग से उल्लिखित था कि उसने मन प्राणों को बाँध लिया .....उसी कथानक में विवरण था कि जब चैतन्य महाप्रभु यात्रा क्रम में पुरी के जगन्नाथ मंदिर पहुंचे तो मुख्यद्वार पर पहुँचते ही प्रिय के सानिध्य स्मरण ने उन्हें भावविभोर कर दिया,उनके शरीर में रोमांच भर आया, नयनो से अविरल अश्रुधार प्रवाहित होने लगी, भक्ति और प्रेम के आवेग में वे मूर्छित हो गए.....
जब मैंने यह अंश पढ़ा तो न जाने इस प्रसंग ने ह्रदय के किस तंतु को झकझोरा .... मेरे मन ने मुझे बड़ा दुत्कारा ...मुझे लगा जिस पुरी मंदिर में जाने पर मुझे आजतक भीड़ अव्यवस्था,पण्डे , गन्दगी इत्यादि ही दिखे थे,उसी मंदिर में तो चैतन्य महाप्रभु को श्याम सलोने के दर्शन हुए .....यह तो मेरा ही दृष्टिदोष है जो आज तक मेरी दृष्टि इन अवयवों पर ही केन्द्रित रही थी . मेरा ध्यान जिन वस्तुओं पर था,मुझे वही दिखाई दिया...चैतन्य महाप्रभु के दृष्टि वलय में जो था, उन्हें वह दिखाई दिया...
इस विचार ने मुझे इतने गहरे प्रभावित किया कि ,इसने मेरा दृष्टिकोण ही बदल दिया...और उस दिन के बाद जब भी किसी देवस्थान पर गयी हूँ और मन ध्यान से वहां की सकारात्मक उर्जा से जुड़ने का प्रयत्न किया है,शायद ही कभी असफलता मिली है और उसके उपरांत तो कोई भी कारण ध्यान क्रम को बाधित नहीं कर पाया है..प्रेम और भक्ति रस में आकंठ निमग्न होने पर तन मन की जो स्थिति होती है,जो परमानंद प्राप्त होता है उसके सम्मुख संसार की कोई भी वस्तु कोई भी असुविधा अर्थहीन लगती है.....
जो हम अपनी इस स्थूल शरीर की सीमित सामर्थ्यवान नयनो से दृष्टिगत नहीं कर पाते , उसका आस्तित्व ही नहीं है ,ऐसी धारणा नितांत ही भ्रामक और मूर्खता पूर्ण है. जो ईश्वरीय सत्ता को अस्वीकृत करते हैं ,उनके साथ मैं बहस में नहीं पड़ना चाहती. उन्हें यदि यह सोच शांति और सुख देता है तो,यह बहुत ही अच्छी बात है,वे ऐसे ही सुखी रहें......मैं उनके उन्मुख हूँ जो ईश्वरीय सत्ता को तो मानते हैं ,परन्तु बाह्य अवयवों में फंस उस अपरिमित सुख प्राप्ति से वंचित रह जाते हैं..उन्हें एक बार इस दृष्टिकोण के प्रति सजग करना मुझे अपना कर्तब्य लगा....
धर्म में दिखावे और आडम्बर युक्त कोरे कर्मकांडों की धुर विरोधी मैं भी हूँ..कर्म कांडों की उपयोगिता और आवश्यकता मैं इतने भर के लिए मानती हूँ कि कहीं न कहीं ये मुझे वैज्ञानिक तथा भक्ति प्रेम के उद्दीपक लगते हैं. जैसे अपने किसी प्रिय श्रेष्ठ का सानिध्य हमें सुखद लगता है,उसके सम्मान और प्रेम प्रदर्शन हेतु हम भांति भांति की चेष्टाएँ करते हैं और अंततोगत्वा अपार सुख प्राप्त करते हैं,वैसे ही उस सर्वेश्वर के प्रति स्नेह प्रदर्शन सेवा सम्मान भी भक्ति उद्दीपक तथा सुख के साधन ही हैं.
धार्मिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों को सिरे से नकारना भी पूर्णतः उचित नहीं है क्योंकि इसके रूप को विकृत मनुष्यों और पण्डे पुजारियों ने ही किया है नहीं तो इनमे निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण पूर्ण रूपेण जीवनोपयोगी हैं.यह सत्य है की मानवमात्र का धर्म बह्याडम्बरों की अपेक्षा ईश्वर को मन कर्म व्यवहार में धारण करना है,परन्तु जो भी उपाय ईश्वर के प्रति श्रद्धा निष्ठां भक्ति और प्रेम को सुदृढ़ करने में सहायक हों,जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान करता हो,मेरी दृष्टि में वह ग्रहणीय एवं वन्दनीय है.
यह पूर्ण और अकाट्य सत्य है कि ईश्वर का वास मन आत्मा में होता है,हमारी भावनाओं में होता है,सकारात्मक सोच और कर्म में होता है.परन्तु ईश्वर का वास उस पत्थर और स्थान में भी होता है जो अनंत काल से असंख्य श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है.. यह निश्चित जानिए कि यदि हमारी अनुभूति क्षमता प्रखर है तो हम भी उसी प्रकार पत्थर की मूरत में श्याम को देख सकते हैं जैसे मीरा और सूर ने देखा था..रामकृष्ण ने माँ काली को देखा था....और ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं......तो क्यों न एक बार हम भी प्रयास कर देखें. उस अनिर्वचनीय सुख और आनंदलाभ का प्रयास करें....अधिक कहाँ कुछ करना है,एक दृष्टिकोण भर तो बदलना है इसके लिए.....
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आज अपनी एक नितांत ही व्यक्तिगत और गोपनीय अनुभूति यह सोचकर सार्वजानिक कर रही हूँ कि क्या पता जैसे प्रसंग ने मेरे सोच को परिवर्तित कर मुझे अनिर्वचनीय सुख लाभ का सुअवसर दिया,संभव है किसी और के सोच की दिशा को भी प्रभावित करे और उसके सुख का निमित्त बने...
भीड़ भाड़ सदैव ही मुझे आतंकित भयग्रस्त किया करती रही है और इससे बचने में मैं अपना पूरा सामर्थ्य लगा दिया करती हूँ...बाकी भीड़ से तो बच भी जाती थी पर अपने धर्मभीरू माता पिता संग मंदिरों के भीड़ का सामना छुटपन से ही करना पड़ा. धार्मिक स्थलों की अपार अव्यवस्थित भीड़,गन्दगी,पंडों की लूट खसोट,चारों और फ़ैली अव्यवस्था मन में इतनी वितृष्णा भरती थी कि मेरे समझ में नहीं आता था,इन सब के मध्य लोग अपनी श्रद्धा भक्ति का निष्पादन और भक्ति भाव का संवरण कैसे कर पाते हैं.इसके साथ ही तथाकथित भक्तों का क्षद्म रूप भी मुझे बड़ा ही आहत किया करता था और एक तरह से मंदिरों, कर्मकांडों के प्रति मेरी अरुचि दृढ से दृढ़तर होती गयी...मेरे अभिभावक मुझसे बड़े ही क्षुब्ध रहा करते थे. उनकी दृष्टि में मैं घोर नास्तिक थी....
मेरे विवाह के पहले तक हमारे अभिभावक वर्ष में एक बार देवघर (वैद्यनाथ धाम) अवश्य जाते थे. वहां के विहंगम दृश्य के क्या कहने......लोटे का जल शायद ही शिवशम्भू के मस्तक तक पहुँच पाता था.....समस्त पुष्प पत्र जल इत्यादि भक्तों पर ही गिरते थे..गर्भ गृह की यह अवस्था होती थी कि अधिकांशतः भोलेनाथ ही भक्तों के चरण रज प्राप्त करते थे.. यदि कोई उनके स्पर्श का सुअवसर पा जाता तो लगता यदि भोलेनाथ धरती को इतने जकड़ कर न पकडे होते तो कबके भक्त उन्हें समूल उठा अपने जेब में रख चलते बनते...
इस धक्का मुक्की में भक्ति भाव कितना बचा रहता था पता नहीं,हर व्यक्ति दुसरे को अपने स्थान का अपहर्ता घोर शत्रु सम लगता था और वश चलता तो सामने वाले को खदेड़ कर वहां से भगा देता. इस भीड़ में चोरों,जेबकतरों और ठगों की चांदी कटती थी....
उत्तर भारत के प्रायः सभी धर्मस्थलों की कमोबेश यही स्थिति आज भी है .हाँ दक्षिण भारत के जितने भी धर्मस्थलों पर आज तक भ्रमण किया ,अपार भीड़ के बावजूद मंदिर प्रशासन तथा स्थानीय प्रशासन के हस्तक्षेप से क्रमबद्ध कतारों के कारण बहुत अधिक धक्का मुक्की की स्थिति कहीं नहीं देखी...
बचपन में तो अभिभावकों के साथ जब कभी भी इस भीड़ भाड़ में जाने की बाध्यता बनी,मेरा प्रयास होता था ,शीघ्रता से उस भीड़ से निपटकर मंदिर प्रांगन में कोई ऐसा स्थान खोजना और वहां शांति से समय गुजरना जहाँ कि पर्याप्त नीरवता हो.बाद में जब स्वयं निर्णायक बनी तब बहुधा यही प्रयास रहा कि देवस्थानों पर ऐसे समय में जाया जाय जब भीड़ की संभावना न्यूनतम हो.
वर्षो तक देवस्थानों की इस भीड़ और अव्यवस्था ने मन को बड़ा ही तिक्त और खिन्न किया ...परन्तु सुसंयोग से करीब सत्रह अठारह वर्ष पहले एक बार चैतन्य महाप्रभु की जीवनी पढ़ने का अवसर मिला. संभवतः हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की लिखी हुई थी वह.. सम्पूर्ण कथानक इतने हृदयस्पर्शी ढंग से उल्लिखित था कि उसने मन प्राणों को बाँध लिया .....उसी कथानक में विवरण था कि जब चैतन्य महाप्रभु यात्रा क्रम में पुरी के जगन्नाथ मंदिर पहुंचे तो मुख्यद्वार पर पहुँचते ही प्रिय के सानिध्य स्मरण ने उन्हें भावविभोर कर दिया,उनके शरीर में रोमांच भर आया, नयनो से अविरल अश्रुधार प्रवाहित होने लगी, भक्ति और प्रेम के आवेग में वे मूर्छित हो गए.....
जब मैंने यह अंश पढ़ा तो न जाने इस प्रसंग ने ह्रदय के किस तंतु को झकझोरा .... मेरे मन ने मुझे बड़ा दुत्कारा ...मुझे लगा जिस पुरी मंदिर में जाने पर मुझे आजतक भीड़ अव्यवस्था,पण्डे , गन्दगी इत्यादि ही दिखे थे,उसी मंदिर में तो चैतन्य महाप्रभु को श्याम सलोने के दर्शन हुए .....यह तो मेरा ही दृष्टिदोष है जो आज तक मेरी दृष्टि इन अवयवों पर ही केन्द्रित रही थी . मेरा ध्यान जिन वस्तुओं पर था,मुझे वही दिखाई दिया...चैतन्य महाप्रभु के दृष्टि वलय में जो था, उन्हें वह दिखाई दिया...
इस विचार ने मुझे इतने गहरे प्रभावित किया कि ,इसने मेरा दृष्टिकोण ही बदल दिया...और उस दिन के बाद जब भी किसी देवस्थान पर गयी हूँ और मन ध्यान से वहां की सकारात्मक उर्जा से जुड़ने का प्रयत्न किया है,शायद ही कभी असफलता मिली है और उसके उपरांत तो कोई भी कारण ध्यान क्रम को बाधित नहीं कर पाया है..प्रेम और भक्ति रस में आकंठ निमग्न होने पर तन मन की जो स्थिति होती है,जो परमानंद प्राप्त होता है उसके सम्मुख संसार की कोई भी वस्तु कोई भी असुविधा अर्थहीन लगती है.....
जो हम अपनी इस स्थूल शरीर की सीमित सामर्थ्यवान नयनो से दृष्टिगत नहीं कर पाते , उसका आस्तित्व ही नहीं है ,ऐसी धारणा नितांत ही भ्रामक और मूर्खता पूर्ण है. जो ईश्वरीय सत्ता को अस्वीकृत करते हैं ,उनके साथ मैं बहस में नहीं पड़ना चाहती. उन्हें यदि यह सोच शांति और सुख देता है तो,यह बहुत ही अच्छी बात है,वे ऐसे ही सुखी रहें......मैं उनके उन्मुख हूँ जो ईश्वरीय सत्ता को तो मानते हैं ,परन्तु बाह्य अवयवों में फंस उस अपरिमित सुख प्राप्ति से वंचित रह जाते हैं..उन्हें एक बार इस दृष्टिकोण के प्रति सजग करना मुझे अपना कर्तब्य लगा....
धर्म में दिखावे और आडम्बर युक्त कोरे कर्मकांडों की धुर विरोधी मैं भी हूँ..कर्म कांडों की उपयोगिता और आवश्यकता मैं इतने भर के लिए मानती हूँ कि कहीं न कहीं ये मुझे वैज्ञानिक तथा भक्ति प्रेम के उद्दीपक लगते हैं. जैसे अपने किसी प्रिय श्रेष्ठ का सानिध्य हमें सुखद लगता है,उसके सम्मान और प्रेम प्रदर्शन हेतु हम भांति भांति की चेष्टाएँ करते हैं और अंततोगत्वा अपार सुख प्राप्त करते हैं,वैसे ही उस सर्वेश्वर के प्रति स्नेह प्रदर्शन सेवा सम्मान भी भक्ति उद्दीपक तथा सुख के साधन ही हैं.
धार्मिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों को सिरे से नकारना भी पूर्णतः उचित नहीं है क्योंकि इसके रूप को विकृत मनुष्यों और पण्डे पुजारियों ने ही किया है नहीं तो इनमे निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण पूर्ण रूपेण जीवनोपयोगी हैं.यह सत्य है की मानवमात्र का धर्म बह्याडम्बरों की अपेक्षा ईश्वर को मन कर्म व्यवहार में धारण करना है,परन्तु जो भी उपाय ईश्वर के प्रति श्रद्धा निष्ठां भक्ति और प्रेम को सुदृढ़ करने में सहायक हों,जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान करता हो,मेरी दृष्टि में वह ग्रहणीय एवं वन्दनीय है.
यह पूर्ण और अकाट्य सत्य है कि ईश्वर का वास मन आत्मा में होता है,हमारी भावनाओं में होता है,सकारात्मक सोच और कर्म में होता है.परन्तु ईश्वर का वास उस पत्थर और स्थान में भी होता है जो अनंत काल से असंख्य श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है.. यह निश्चित जानिए कि यदि हमारी अनुभूति क्षमता प्रखर है तो हम भी उसी प्रकार पत्थर की मूरत में श्याम को देख सकते हैं जैसे मीरा और सूर ने देखा था..रामकृष्ण ने माँ काली को देखा था....और ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं......तो क्यों न एक बार हम भी प्रयास कर देखें. उस अनिर्वचनीय सुख और आनंदलाभ का प्रयास करें....अधिक कहाँ कुछ करना है,एक दृष्टिकोण भर तो बदलना है इसके लिए.....
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14.5.09
सुख का मार्ग !!!
समाचार पत्र के साथ भी बड़ी विचित्र विडंबना है...सुबह के पहली किरण के साथ जितनी उत्सुकता और स्नेह से इसका स्वागत होता है,पाठोपरांत उतनी ही निर्ममता से इसका तिरस्कार भी होता है..परन्तु इन समाचार पत्रों में बहुत कुछ कभी न पुराने पड़ने तथा सहेजने योग्य सामग्री होती हैं,जो चाहे कितनी भी तिथियाँ बदल जायं अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता नहीं खोती...
ऐसे ही सफाई के क्रम रद्दी में पड़े पुराने समाचार पत्र के एक आलेख ने मन और आँखों को बाँध लिया..
समाचार था - तीन विवाहित पुत्रियों और नाती नतिनियों वाली सड़सठ वर्षीय नंदिता विश्वास ने बी.ए. आनर्स की परीक्षा दी.नंदिता पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के खड़गपुर शहर के वार्ड नंबर अठारह के मलिंचा में रहती हैं.माध्यमिक व जूनियर बेसिक की ट्रेनिंग के बाद नंदिता ने एक सरकारी विद्यालय में अध्यापन कार्य आरम्भ किया.१९८३ से २००३ तक उन्होंने अध्यापन कार्य किया और सेवानिवृति उपरांत उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अपने उस अधूरे स्वप्न को जो कि पारिवारिक एवं शैक्षणिक दायित्वों के व्यस्तता क्रम में अपूर्ण रह गया था,उसे पूर्णता प्रदान करने का संकल्प लिया...
पहले तो जिसने भी सुना, सबने उनका उपहास उड़ाया और पर्याप्त हतोत्साहित किया.परन्तु उनके दृढ संकल्प को देखकर परिवार वालों ने इन्हें सहयोग दिया .बाईस फरवरी २००९ से नेताजी ओपन यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित परीक्षा में उन्होंने बी ए आनर्स में समाज शास्त्र विषय से परीक्षा दी.नंदिता न केवल अपने सफलता के प्रति आश्वस्त हैं बल्कि उतीर्ण होकर आगे भी पढाई जारी रखने को दृढ संकल्प भी हैं...
हो सकता है बहुत लोगों को यह मूर्खता पूर्ण और व्यर्थ लगे,क्योंकि अधिकांशतः शिक्षा को लोग आत्मकल्याण आत्मोत्थान का नहीं धनार्जन का ही साधन मानते हैं.परन्तु नंदिता जैसे लोग परिवार समाज को प्रेरणा देते हैं,नयी राह दिखाते हैं और सही मायने में ऐसे ही लोग जीवन को सच्चा आदर देकर उसे सार्थकता देते हैं.
जीवन जीने और उसमे भी सुखपूर्वक जीने के लिए जितना महत्वपूर्ण स्वस्थ शरीर और धन की आवश्यकता है, आत्मसंतोष और अपने होने की सार्थकता अनुभूत करना,उससे भी अधि़क आवश्यक है.. यूँ तो किसी भी उम्र में जीवन को सुखद आत्मसंतोष ही बनाता है, परन्तु जीवन के उतरार्ध में जिजीविषा के लिए सार्थक सकारात्मक लक्ष्य निर्धारण एवं आत्मसंतुष्टि परम आवश्यक है..
दो ढाई वर्ष की अवस्था में ही शिक्षण में संलिप्त हुआ बालपन समय के साथ उत्तरोत्तर व्यस्त से व्यस्ततम होता चला जाता है.वय के साथ उत्तरदायित्व बढ़ता ही जाता है और कहीं न कहीं उसीमे व्यक्ति अपने होने की सार्थकता ढूंढ लेता है.गृहस्थी के प्रारंभ से लेकर अगली पीढी के तैयार होने और उनकी गृहस्थी बसने तक स्त्री पुरुष परिवार के केंद्र में होते हैं.समस्त परिवार घटनाक्रम और हित अनहित के निर्णय व्यक्ति की मुठ्ठी में होते हैं और एक तरह से परिवार रुपी साम्राज्य के वे स्वामी/स्वामिनी हुआ करते हैं...
परन्तु अगली पीढी के परिवार विस्तार के साथ ही जैसे जैसे इनका उत्तरदायित्व संक्षिप्त होने लगता है, इनके पास रिक्त समय की बहुलता रहने लगती है और अगली पीढी द्वारा स्वविवेक से लिए जाने वाले निर्णय के क्रम में ये स्वयं को निर्णायक भूमिका में नहीं पाते, घोर उपेक्षित अनुपयोगी अनुभूत करने लगते हैं. अनजाने ही इनके मनोभाव कुछ इस प्रकार होने लगते हैं जैसे, इनके इर्द गिर्द दूसरे राज्य पनपने लेगे हैं,जिनपर इनका कोई वश नहीं.अबतक परिवार पर एकक्षत्र शासन का अभ्यास क्रम जैसे ही बाधित होता है,व्यक्ति सहजता से स्वयं को सम्हाल नहीं पाता और विचलित होता हुआ अवसादग्रस्त हो जाता है.भाग दौड़ में फंसे युवा वर्ग के पास न तो इनके मन की सुनने जानने का समय होता है न धैर्य. व्यक्ति अपने ही परिवार के बीच स्वयं को अवांछित अनुपयोगी पाता है,तो तिलमिला जाता है.यदि पहले से इसके लिए मानसिक रूप से तैयार न हो और जबरन सत्तासीन होने का प्रयत्न करने लगता है तो घर की शांति पूर्णतया बाधित होती है.
स्त्रियों की तो इस मामले में और भी दयनीय स्थिति होती है.क्योंकि आम तौर पर पुरुष अपनी संलिप्तता घर के बाहर भी ढूंढ लेते हैं,परन्तु स्त्रियाँ घर संसार के बाहर स्वयं को निकाल ढाल नहीं पातीं.लक्ष्यहीनता और संसारिकता का मोह इन्हें पुराने अभ्यास को बदलने का न तो नया कारण ढूँढने देता है और न ही अपने अवसाद और उग्रता पर इनका वश होता है.फलतः बहुधा ही नयी पीढी के काम में मीन मेख निकाल उन्हें नीचा दिखा ये स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर आत्मसंतोष पाने में जुट जाती हैं.
सहज ही अनुमानित किया जा सकता है कि स्वयं को उपेक्षित अनुभूत करते व्यक्ति के पास लक्ष्य रूप में जब मृत्यु की प्रतीक्षा ही रह जाय तो मनोस्थिति कितनी त्रासद होगी।आज पारिवारिक सामाजिक ढांचा जिस प्रकार बदलता जा रहा है, पूरे विश्व में यह त्रासद स्थिति और भी चिंताजनक होती जा रही है. वय का अवसादग्रस्त चौथपन जीवन को भार सा बना देता है और फिर अवसादग्रस्त व्यक्ति आत्मकेंद्रित हो अपने ही सहेजे संजोये उस परिवार की सुख शांति को भी छिन्न भिन्न करने लगता है.
व्यक्ति ,परिवार और समाज को सुव्यवस्थित रखने हेतु इन्ही कारणों से प्रबुद्ध मनीषियों ने वय के उत्तरार्ध के लिए संन्यास तथा वानप्रस्थ आश्रम की व्यवस्था की थी।अपने अगली पीढी को उतरदायित्व सौंपने के बाद संन्यास ले लिया जाता था.परन्तु संन्यास का तात्पर्य यह नहीं था कि गृह त्याग कर दिया जाय.संन्यास का तात्पर्य था उत्तरदायित्व सौंपने के उपरांत गृहस्थी में ही रहकर संसारिकता के प्रति निर्लिप्त भाव रखना.उत्तराधिकारियों को उनके अग्रहनुसार अपेक्षित मार्गदर्शन देना और अपने आत्मोत्थान के मार्ग पर जीवन को अग्रसर करना.वानप्रस्थ का तात्पर्य था,परिवार से आगे बढ़ समाज तथा अन्य जीव जंतुओं के संरक्षण ,उनकी सेवा में प्रवृत्त होना॥
मन और मष्तिष्क का वय शरीर से बंधा नहीं होता.इसी कारण शरीर की अवस्था से यह किंचित भी अक्षम या बाधित नहीं होता.परन्तु मन मष्तिष्क को यदि निश्चेष्ट रखने का प्रयास किया जायेगा,बलपूर्वक उसे निर्लिप्त रखने का प्रयास किया जायेगा तो वह विद्रोह करेगा ही.इसलिए आवश्यक है कि उसे सकारात्मक कारणों में संलिप्तता दी जाय.एक बार जब उत्तरदायित्व पूर्ण हो गया तो फिर अपने पुराने अधूरे पड़े संकल्पों रुचियों जिसमे आत्मिक आनंद मिलता हो,उसमे संलिप्त हुआ जाय..संगीत ,साहित्य,बागबानी,भ्रमण,सीना पिरोना,पाक कला,इत्यादि इत्यादि न जाने कितने ही कार्य हैं जिसमे व्यक्ति स्वयं को संलिप्त कर सकता है तथा जिन्हें साध व्यक्ति आत्मसंतोष भी पा सकता है और दूसरों को भी ज्ञान और प्रेरणा दे सकते हैं..परोपकार के कार्यों में अपना समय लगा परम संतोष पा सकता है.. ऐसे उपाय .जिजीविषा को कभी क्षीण नहीं पड़ने देते.
मनुष्य चाहे तो अंतिम सांस तक अपने आस पास को बहुत कुछ दे सकता है...और कुछ नहीं तो दो मीठे बोल देकर किसी को भी सुख तो दे ही सकता है और बदले में अकूत संतोष रुपी धन अर्जित कर सकता है.लेकिन यह तभी संभव है जब व्यक्ति स्वयं प्रसन्न और संतुष्ट हो.स्वयं को सुखी करने का साधन कहीं बाहर नहीं हमारी अपनी मुट्ठी में ही है,बस खुले हाथों को बांधकर भींच लेना है..अपने अहम् को दरकिनार कर ,ह्रदय को थोडा बड़ा कर उसमे स्नेह का सागर भरना है,फिर चहुँ और स्नेह ही तो बिखेरेगा मनुष्य.
जिसने आज जन्म लिया उसे भी और जिसने चालीस पचास वर्ष पहले जन्म लिया उसे भी,जीवित बचा तो उसी मोड़ पर पहुंचना है और आगे जाना है,जिसे बुढापा कहते हैं..यदि उम्र के दूसरे तीसरे पड़ाव से ही चौथेपन की तैयारी कर ले , तो सहजता से व्यक्ति उस कष्टदायक अवांछित स्थिति से बच सकता है.
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ऐसे ही सफाई के क्रम रद्दी में पड़े पुराने समाचार पत्र के एक आलेख ने मन और आँखों को बाँध लिया..
समाचार था - तीन विवाहित पुत्रियों और नाती नतिनियों वाली सड़सठ वर्षीय नंदिता विश्वास ने बी.ए. आनर्स की परीक्षा दी.नंदिता पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के खड़गपुर शहर के वार्ड नंबर अठारह के मलिंचा में रहती हैं.माध्यमिक व जूनियर बेसिक की ट्रेनिंग के बाद नंदिता ने एक सरकारी विद्यालय में अध्यापन कार्य आरम्भ किया.१९८३ से २००३ तक उन्होंने अध्यापन कार्य किया और सेवानिवृति उपरांत उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अपने उस अधूरे स्वप्न को जो कि पारिवारिक एवं शैक्षणिक दायित्वों के व्यस्तता क्रम में अपूर्ण रह गया था,उसे पूर्णता प्रदान करने का संकल्प लिया...
पहले तो जिसने भी सुना, सबने उनका उपहास उड़ाया और पर्याप्त हतोत्साहित किया.परन्तु उनके दृढ संकल्प को देखकर परिवार वालों ने इन्हें सहयोग दिया .बाईस फरवरी २००९ से नेताजी ओपन यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित परीक्षा में उन्होंने बी ए आनर्स में समाज शास्त्र विषय से परीक्षा दी.नंदिता न केवल अपने सफलता के प्रति आश्वस्त हैं बल्कि उतीर्ण होकर आगे भी पढाई जारी रखने को दृढ संकल्प भी हैं...
हो सकता है बहुत लोगों को यह मूर्खता पूर्ण और व्यर्थ लगे,क्योंकि अधिकांशतः शिक्षा को लोग आत्मकल्याण आत्मोत्थान का नहीं धनार्जन का ही साधन मानते हैं.परन्तु नंदिता जैसे लोग परिवार समाज को प्रेरणा देते हैं,नयी राह दिखाते हैं और सही मायने में ऐसे ही लोग जीवन को सच्चा आदर देकर उसे सार्थकता देते हैं.
जीवन जीने और उसमे भी सुखपूर्वक जीने के लिए जितना महत्वपूर्ण स्वस्थ शरीर और धन की आवश्यकता है, आत्मसंतोष और अपने होने की सार्थकता अनुभूत करना,उससे भी अधि़क आवश्यक है.. यूँ तो किसी भी उम्र में जीवन को सुखद आत्मसंतोष ही बनाता है, परन्तु जीवन के उतरार्ध में जिजीविषा के लिए सार्थक सकारात्मक लक्ष्य निर्धारण एवं आत्मसंतुष्टि परम आवश्यक है..
दो ढाई वर्ष की अवस्था में ही शिक्षण में संलिप्त हुआ बालपन समय के साथ उत्तरोत्तर व्यस्त से व्यस्ततम होता चला जाता है.वय के साथ उत्तरदायित्व बढ़ता ही जाता है और कहीं न कहीं उसीमे व्यक्ति अपने होने की सार्थकता ढूंढ लेता है.गृहस्थी के प्रारंभ से लेकर अगली पीढी के तैयार होने और उनकी गृहस्थी बसने तक स्त्री पुरुष परिवार के केंद्र में होते हैं.समस्त परिवार घटनाक्रम और हित अनहित के निर्णय व्यक्ति की मुठ्ठी में होते हैं और एक तरह से परिवार रुपी साम्राज्य के वे स्वामी/स्वामिनी हुआ करते हैं...
परन्तु अगली पीढी के परिवार विस्तार के साथ ही जैसे जैसे इनका उत्तरदायित्व संक्षिप्त होने लगता है, इनके पास रिक्त समय की बहुलता रहने लगती है और अगली पीढी द्वारा स्वविवेक से लिए जाने वाले निर्णय के क्रम में ये स्वयं को निर्णायक भूमिका में नहीं पाते, घोर उपेक्षित अनुपयोगी अनुभूत करने लगते हैं. अनजाने ही इनके मनोभाव कुछ इस प्रकार होने लगते हैं जैसे, इनके इर्द गिर्द दूसरे राज्य पनपने लेगे हैं,जिनपर इनका कोई वश नहीं.अबतक परिवार पर एकक्षत्र शासन का अभ्यास क्रम जैसे ही बाधित होता है,व्यक्ति सहजता से स्वयं को सम्हाल नहीं पाता और विचलित होता हुआ अवसादग्रस्त हो जाता है.भाग दौड़ में फंसे युवा वर्ग के पास न तो इनके मन की सुनने जानने का समय होता है न धैर्य. व्यक्ति अपने ही परिवार के बीच स्वयं को अवांछित अनुपयोगी पाता है,तो तिलमिला जाता है.यदि पहले से इसके लिए मानसिक रूप से तैयार न हो और जबरन सत्तासीन होने का प्रयत्न करने लगता है तो घर की शांति पूर्णतया बाधित होती है.
स्त्रियों की तो इस मामले में और भी दयनीय स्थिति होती है.क्योंकि आम तौर पर पुरुष अपनी संलिप्तता घर के बाहर भी ढूंढ लेते हैं,परन्तु स्त्रियाँ घर संसार के बाहर स्वयं को निकाल ढाल नहीं पातीं.लक्ष्यहीनता और संसारिकता का मोह इन्हें पुराने अभ्यास को बदलने का न तो नया कारण ढूँढने देता है और न ही अपने अवसाद और उग्रता पर इनका वश होता है.फलतः बहुधा ही नयी पीढी के काम में मीन मेख निकाल उन्हें नीचा दिखा ये स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर आत्मसंतोष पाने में जुट जाती हैं.
सहज ही अनुमानित किया जा सकता है कि स्वयं को उपेक्षित अनुभूत करते व्यक्ति के पास लक्ष्य रूप में जब मृत्यु की प्रतीक्षा ही रह जाय तो मनोस्थिति कितनी त्रासद होगी।आज पारिवारिक सामाजिक ढांचा जिस प्रकार बदलता जा रहा है, पूरे विश्व में यह त्रासद स्थिति और भी चिंताजनक होती जा रही है. वय का अवसादग्रस्त चौथपन जीवन को भार सा बना देता है और फिर अवसादग्रस्त व्यक्ति आत्मकेंद्रित हो अपने ही सहेजे संजोये उस परिवार की सुख शांति को भी छिन्न भिन्न करने लगता है.
व्यक्ति ,परिवार और समाज को सुव्यवस्थित रखने हेतु इन्ही कारणों से प्रबुद्ध मनीषियों ने वय के उत्तरार्ध के लिए संन्यास तथा वानप्रस्थ आश्रम की व्यवस्था की थी।अपने अगली पीढी को उतरदायित्व सौंपने के बाद संन्यास ले लिया जाता था.परन्तु संन्यास का तात्पर्य यह नहीं था कि गृह त्याग कर दिया जाय.संन्यास का तात्पर्य था उत्तरदायित्व सौंपने के उपरांत गृहस्थी में ही रहकर संसारिकता के प्रति निर्लिप्त भाव रखना.उत्तराधिकारियों को उनके अग्रहनुसार अपेक्षित मार्गदर्शन देना और अपने आत्मोत्थान के मार्ग पर जीवन को अग्रसर करना.वानप्रस्थ का तात्पर्य था,परिवार से आगे बढ़ समाज तथा अन्य जीव जंतुओं के संरक्षण ,उनकी सेवा में प्रवृत्त होना॥
मन और मष्तिष्क का वय शरीर से बंधा नहीं होता.इसी कारण शरीर की अवस्था से यह किंचित भी अक्षम या बाधित नहीं होता.परन्तु मन मष्तिष्क को यदि निश्चेष्ट रखने का प्रयास किया जायेगा,बलपूर्वक उसे निर्लिप्त रखने का प्रयास किया जायेगा तो वह विद्रोह करेगा ही.इसलिए आवश्यक है कि उसे सकारात्मक कारणों में संलिप्तता दी जाय.एक बार जब उत्तरदायित्व पूर्ण हो गया तो फिर अपने पुराने अधूरे पड़े संकल्पों रुचियों जिसमे आत्मिक आनंद मिलता हो,उसमे संलिप्त हुआ जाय..संगीत ,साहित्य,बागबानी,भ्रमण,सीना पिरोना,पाक कला,इत्यादि इत्यादि न जाने कितने ही कार्य हैं जिसमे व्यक्ति स्वयं को संलिप्त कर सकता है तथा जिन्हें साध व्यक्ति आत्मसंतोष भी पा सकता है और दूसरों को भी ज्ञान और प्रेरणा दे सकते हैं..परोपकार के कार्यों में अपना समय लगा परम संतोष पा सकता है.. ऐसे उपाय .जिजीविषा को कभी क्षीण नहीं पड़ने देते.
मनुष्य चाहे तो अंतिम सांस तक अपने आस पास को बहुत कुछ दे सकता है...और कुछ नहीं तो दो मीठे बोल देकर किसी को भी सुख तो दे ही सकता है और बदले में अकूत संतोष रुपी धन अर्जित कर सकता है.लेकिन यह तभी संभव है जब व्यक्ति स्वयं प्रसन्न और संतुष्ट हो.स्वयं को सुखी करने का साधन कहीं बाहर नहीं हमारी अपनी मुट्ठी में ही है,बस खुले हाथों को बांधकर भींच लेना है..अपने अहम् को दरकिनार कर ,ह्रदय को थोडा बड़ा कर उसमे स्नेह का सागर भरना है,फिर चहुँ और स्नेह ही तो बिखेरेगा मनुष्य.
जिसने आज जन्म लिया उसे भी और जिसने चालीस पचास वर्ष पहले जन्म लिया उसे भी,जीवित बचा तो उसी मोड़ पर पहुंचना है और आगे जाना है,जिसे बुढापा कहते हैं..यदि उम्र के दूसरे तीसरे पड़ाव से ही चौथेपन की तैयारी कर ले , तो सहजता से व्यक्ति उस कष्टदायक अवांछित स्थिति से बच सकता है.
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17.4.09
सप्त्शी के तालीबानी....
किसी भी धर्म के पूज्य ग्रंथोँ, जिन्हें कि न जाने कितने महत अन्वेश्नोपरांत लिखा गया है, को केवल ऊपरी सतही तौर पर पढ़कर, यदि हम शब्द आधारित विश्लेषण करेंगे और उसके विषय में अपना अभिमत स्थिर करेंगे तो यह उस ग्रन्थ और उसके रचयिता के श्रम और उद्देश्य की अवमानना होगी,उसके प्रति सरासर अन्याय होगा..जिस प्रकार गहरे सागर में से मोती चुनने के लिए बार बार गहन तल में उतारना पड़ता है,वैसे ही भाव /ज्ञान रुपी मोती को पाने के लिए एकाधिक बार ग्रन्थ रूपी उस अथाह समुद्र में भी उतरना चाहिए....
जिस किसी ने भी इसका अनुभव किया होगा वह सहज ही इससे सहमत होगा कि रामायण गीता हो या कुरान बाइबिल ,जितनी बार उसे पढ़ा बांचा जाता है,हर बार जैसे नयी नयी परतें खुलती जातीं हैं..हर बार एक नया अनुभव होता है..लगता है.....अरे इतनी बार पहले भी पढ़ा ,पर इसबार तो यह नितांत ही नवीन तथ्य दृष्टिगत हुआ..
कालजयी रचनाओं के विषय में ठोस धारणा स्थापित करने से पहले कम से कम पूर्ण समर्पित भाव से अपने पूर्वाग्रहों को परे कर न्यूनतम दो तीन बार अवश्य पढ़नी चाहिए,इसके पश्चात ही किसी निर्णय पर पहुँच समालोचना देनी चाहिए...
इसी क्रम में एक कथा का स्मरण हो आया..किसी सत्संग सभा में रामकथा पर प्रवचन हो रहा था...कथोपरांत प्रश्न काल में एक महोदय ने तुलसीदास जी के प्रति अपना क्षोभ व्यक्त करते हुए संत से कहा कि, तुलसीदास जी ने रामायण के समस्त पात्रों के साथ सामान न्याय नहीं किया है.राम और सीता का तो उन्होंने इतना गुणगान बखान किया ,पर लक्षमण,उर्मिला,दशरथ इत्यादि पात्रों के उल्लेखनीय व्यक्तित्व को बड़े ही संक्षिप्त कलेवर में समेट दिया.
संत ने उनकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा कि - भाई,अब चूँकि यह रामचरितमानस है,इसलिए इसमें राम के व्यक्तित्व और कृतित्व को प्रमुखता दी गयी है,यदि यह दशरथ वंशावली होती तो निश्चित ही इसमें प्रत्येक पात्र के कृतित्वों की वृहद् विस्तृत व्याख्या की गयी होती.
मैंने अपने अनुभव में अधिकांशतः यह देखा है कि धर्म और धर्मग्रंथों की सर्वाधिक आलोचना करने वालों में बहुलता से वे ही होते हैं, जिन्होंने एक बार भी इन्हें पढने तथा निरपेक्ष भाव से इन्हें जानने का प्रयास नहीं किया है. धर्म हो, चाहे कोई भी अन्य विषय, किसी भी विषय पर अपना अभिमत स्थिर करने तथा उसकी निंदा स्तुति करने से पूर्व उसे एक बार ठीक ठीक जानने का प्रयास अवश्य करना चाहिए तथा अपने मत के साथ साथ दूसरों के दृष्टिकोण को भी सुनना समझना चाहिए..
साधारनतया हमारे धर्मग्रंथों या धार्मिक आख्यानों में जिस प्रकार से कथा वर्णित होती है, प्रथम दृष्टया ग्राह्य नहीं लगते और कुछ हद तक हास्यास्पद भी लगते हैं..परन्तु उन शब्द योजनाओं से आगे जाकर यदि उनके सारगर्भित भावों उद्देश्यों को देखेंगे तो वे बहुत ही समसामयिक लगेंगे..और यही कारण है कि शताब्दियाँ बीत गयीं पर ये आज भी आस्तित्व में हैं और आगे भी रहेंगी.
अभी कुछ दिनों पूर्व नवरात्र में दुर्गा सप्त्शी का पाठ कर रही थी और हटात कथानक को पढ़ मन में कौंधा कि , जिस प्रकार से उसमे वर्णित है कि, देवताओं को राज्यच्युत कर जब राक्षसों ने श्रृष्टि को त्रास देना आरम्भ किया तो उन्होंने रक्षार्थ देवी का आह्वान किया और भीषण युद्ध के उपरांत देवी ने असुरों का विनाश कर सात्विक संस्कृति की रक्षा की...आज के प्रसंग में यदि इस कथा को देखें तो...लगेगा कितनी प्रासंगिक है यह आज भी...इसमें राक्षस और देव दोनों ही रूपक या प्रतीक हैं,संस्कृति के विध्वंसक और पोषक के..
समय के अनंत कालखंड में उत्तरोत्तर प्रगति और विकास के पथ पर चलकर जो सभ्यता सुदृढ़ वैभवशाली हुई है.धार्मिक ,सांस्कृतिक,वैज्ञानिक और सामाजिक प्रत्येक क्षेत्र में जो जीवनोपयोगी अविष्कार किये गए हैं , नवीन मानदंड स्थापित हुए हैं,जिसने जीवन को सुन्दर सुखद बनाने में महत भूमिका निभाई है. मानव जगत का एक वर्ग उसे पूर्णतः नष्ट भ्रष्ट और ध्वस्त कर देना चाहता है.आज भी संसार में देव और दानव मनुष्य के अंतस में विद्यमान हैं.इसमें देव वो लोग हैं,जो किसी भी सकारात्मक प्रगति के पक्षधर हैं तथा किसी न किसी प्रकार इसके पोषण संरक्षण में संलग्न हैं और दनाव वो लोग हैं जो इस प्रगति को नकार कर व्यवस्था को छिन्न भिन्न नष्ट भ्रष्ट कर सभ्यता समाज को, जीवन को मूल्यहीन बर्बर पाषणयुगीन दौर में ले जाना चाहते हैं.
देखिये न ....आज मानव जगत का एक वर्ग जो उग्र विध्वंसक बन प्रगति का धुर विरोधी है,क्या वह पुराण कथाओं में वर्णित दानवों से किसी भांति कम है....तालिबानी के नाम से जाने जाने वाले इस वर्ग के जो भी कार्य कलाप या विचारधारा है,क्या वह बर्बर दानवों से किसी मायने में कम है...
कल्पना कर देखिये की यदि यह वर्ग सचमुच ही सफल हो जाय और पूरे संसार पर इनका आधिपत्य हो जाय...इनके जो भी नियम कानून हैं, उसके अंतर्गत पशुवत जीवन यापन करने को हम बाध्य हों, प्रगति और संस्कृति के पोषक रक्षक इन विध्वंसकों से पराजित हो असहाय हो जायं.....फिर तो लगभग वही स्थिति होगी जो असुरों से पराजित हुई सत्ता शक्ति विहीन शाप्ताशी कथा में वर्णित उन देवों की हुई थी.
आज सभ्यता की विध्वंसक शक्तियां इसलिए सफलता प्राप्त कर रही है क्योंकि वह संगठित है.....अस्त्र शस्त्र दृढ संकल्प शक्ति कठोर अनुशासन और संगठन की वह शक्ति जितनी सुदृढ़ है,रक्षक शक्तियों में इन सबका अभाव है इसलिए चाहकर भी वह इन क्रूर शक्तियों के आगे पराजित हो जाती हैं...जिस दिन देव (रक्षक) शक्तियां संगठित हो जाएँगी और अपने सर्वोच्च तेज पुंज को एकत्रित कर उनके विरुद्ध खड़ी हो jayengee , असुर शक्ति का विनाश हो जायेगा। शांति के पोषक प्रगति के कर्णधार जब तक विखण्डित रहेंगे,असुर शक्तियां फलती फूलती जायेंगी.
दुर्गा का अर्थ ही होता है "संगठित शक्ति" और दुर्गा सप्त्शी की यह कथा मूल रूप में यही दिखाती सिखाती है। सकारात्मक शक्तियां संगठित और अनुशाषित होकर ही दुराचारी विनाशकारी शक्तियों को सहज ही पराजित कर सकती हैं,भले वह शक्ति एक स्त्री शक्ति ही क्यों न हो.
अब बात रही दुर्गा को स्त्री और माँ कहने की,बात तो कुछ लम्बी हो जायेगी,संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि ... शक्ति स्त्रीलिंग है,इसलिए इस शक्तिपुंज को भी स्त्री रूप में माना गया है.दुसरे, जब कभी भी हम कष्ट में होते हैं ,सबसे पहले हमें जिस नाम का स्मरण होता है,वह "माँ" का ही होता है.हम कितने भी कष्ट में रहें " माँ" का नाम दुहराते ही जैसे लगता है जैसे कष्ट कम हो गया....तो शाप्त्शी में भी जो माता के आह्वान की कथा है ,वह इसी भाव में है.
पौराणिक आख्यानों में वस्तुतः जो भी कथा वर्णित है,वह दृष्टान्त या रूपक हैं,जिसे युग विशेष के परिप्रेक्ष्य में देखने समझने का प्रयास करना चाहिए.जिस समय ये कथानक रचित हुए थे ,उस समय के जो भी राजनितिक सामाजिक परिदृश्य थे ,उन रूपकों के साथ ये कथा वर्णित किये गए थे...
एक बात और है,धार्मिक आख्यानों में जिस प्रकार से दंड विधान नियोजित हैं तथा धार्मिक आख्यानों में जिस प्रकार के कथानक रखे गएँ हैं,उनके एकमात्र उद्देश्य यही हैं कि वे अशिक्षित जनसाधारण द्वारा भी सहज ही बोधगम्य ग्राह्य हो और भयवश जनसाधारण नियमों में बंधे रहें। .
"सार्वजानिक स्थान पर धूम्रपान वर्जित है " पता नहीं कितने समय से यह निर्देश सार्वजानिक स्थलों पर उद्दृत रहता था....परन्तु दंड(भय) के अभाव में यह पूर्णतः निरस्त था.जबसे इसके लिए अर्थ दंड का प्रावधान किया गया ,लोग सतर्क रहने लगे. बहुत कुछ इसी आशय से धर्म में भी जो स्वर्ग नर्क ,पाप पुन्य दंड इत्यादि की व्याख्या है,उसका निहितार्थ यही है कि भयवश ही सही लोग धर्माचरण में प्रवृत्त हों और समाज संतुलित सुव्यवस्थित रहे.
एक बात और ....आज हमारे जो भी धर्मग्रन्थ जिस रूप में हमें उपलब्ध हैं,लगभग कोई भी अपने मूल रूप में नहीं रह गए हैं.परवर्ती काल में इसमें बहुत से प्रक्षेपांश जोड़े गए हैं.धर्म को विवादस्पद और दिग्भ्रमित किये रखने के लिए बड़े ही सुनियोजित ढंग से ये प्रयास विशेषकर मध्यकाल में मुस्लिम शासकों द्वारा करवाए गए हैं.उद्देश्य स्पष्ट है,धर्म ही व्यक्ति को दृढ बंधन में आबद्ध कर संगठित करता है,उसमे जितने विवाद होंगे,शासक का काम उतना ही आसान होगा..जात पांत छूआ छूट वैमनस्य फैलाकर और लोगों को असंगठित कर ही कोई भी शासक अपने कुचक्रों में सफल हो सकता है.अब देखिये न एक तरफ जहाँ भगवान् को भी शूद्रों के जूठन खाने की बात कही गयी,स्त्री को सर्वोच्च शक्ति और पूज्य माना गया वहीँ आज उपलब्ध इन्ही ग्रंथों में शूद्रों की उपेक्षा और नारी की अवमानना की बातें भी मिल जातीं हैं...अब सोचने वाली बात यह है कि कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति ऐसी विरोधाभासी बातें कैसे लिख सकता है....यह केवल हिन्दू ग्रंथों के साथ ही नहीं हुआ है,बल्कि अन्य धर्मग्रंथों के साथ भी हुआ है.
इसलिए आज आवश्यकता यह है की अपनी बुद्धि का उपयोग कर हम इन पवित्र ग्रंथों को पढें और इनके प्रक्षेपांशों को नकारते हुए कल्याणकारी सुन्दर बातों को हृदयंगम करने और उनका अनुकरण करने का प्रयास करें.
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जिस किसी ने भी इसका अनुभव किया होगा वह सहज ही इससे सहमत होगा कि रामायण गीता हो या कुरान बाइबिल ,जितनी बार उसे पढ़ा बांचा जाता है,हर बार जैसे नयी नयी परतें खुलती जातीं हैं..हर बार एक नया अनुभव होता है..लगता है.....अरे इतनी बार पहले भी पढ़ा ,पर इसबार तो यह नितांत ही नवीन तथ्य दृष्टिगत हुआ..
कालजयी रचनाओं के विषय में ठोस धारणा स्थापित करने से पहले कम से कम पूर्ण समर्पित भाव से अपने पूर्वाग्रहों को परे कर न्यूनतम दो तीन बार अवश्य पढ़नी चाहिए,इसके पश्चात ही किसी निर्णय पर पहुँच समालोचना देनी चाहिए...
इसी क्रम में एक कथा का स्मरण हो आया..किसी सत्संग सभा में रामकथा पर प्रवचन हो रहा था...कथोपरांत प्रश्न काल में एक महोदय ने तुलसीदास जी के प्रति अपना क्षोभ व्यक्त करते हुए संत से कहा कि, तुलसीदास जी ने रामायण के समस्त पात्रों के साथ सामान न्याय नहीं किया है.राम और सीता का तो उन्होंने इतना गुणगान बखान किया ,पर लक्षमण,उर्मिला,दशरथ इत्यादि पात्रों के उल्लेखनीय व्यक्तित्व को बड़े ही संक्षिप्त कलेवर में समेट दिया.
संत ने उनकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा कि - भाई,अब चूँकि यह रामचरितमानस है,इसलिए इसमें राम के व्यक्तित्व और कृतित्व को प्रमुखता दी गयी है,यदि यह दशरथ वंशावली होती तो निश्चित ही इसमें प्रत्येक पात्र के कृतित्वों की वृहद् विस्तृत व्याख्या की गयी होती.
मैंने अपने अनुभव में अधिकांशतः यह देखा है कि धर्म और धर्मग्रंथों की सर्वाधिक आलोचना करने वालों में बहुलता से वे ही होते हैं, जिन्होंने एक बार भी इन्हें पढने तथा निरपेक्ष भाव से इन्हें जानने का प्रयास नहीं किया है. धर्म हो, चाहे कोई भी अन्य विषय, किसी भी विषय पर अपना अभिमत स्थिर करने तथा उसकी निंदा स्तुति करने से पूर्व उसे एक बार ठीक ठीक जानने का प्रयास अवश्य करना चाहिए तथा अपने मत के साथ साथ दूसरों के दृष्टिकोण को भी सुनना समझना चाहिए..
साधारनतया हमारे धर्मग्रंथों या धार्मिक आख्यानों में जिस प्रकार से कथा वर्णित होती है, प्रथम दृष्टया ग्राह्य नहीं लगते और कुछ हद तक हास्यास्पद भी लगते हैं..परन्तु उन शब्द योजनाओं से आगे जाकर यदि उनके सारगर्भित भावों उद्देश्यों को देखेंगे तो वे बहुत ही समसामयिक लगेंगे..और यही कारण है कि शताब्दियाँ बीत गयीं पर ये आज भी आस्तित्व में हैं और आगे भी रहेंगी.
अभी कुछ दिनों पूर्व नवरात्र में दुर्गा सप्त्शी का पाठ कर रही थी और हटात कथानक को पढ़ मन में कौंधा कि , जिस प्रकार से उसमे वर्णित है कि, देवताओं को राज्यच्युत कर जब राक्षसों ने श्रृष्टि को त्रास देना आरम्भ किया तो उन्होंने रक्षार्थ देवी का आह्वान किया और भीषण युद्ध के उपरांत देवी ने असुरों का विनाश कर सात्विक संस्कृति की रक्षा की...आज के प्रसंग में यदि इस कथा को देखें तो...लगेगा कितनी प्रासंगिक है यह आज भी...इसमें राक्षस और देव दोनों ही रूपक या प्रतीक हैं,संस्कृति के विध्वंसक और पोषक के..
समय के अनंत कालखंड में उत्तरोत्तर प्रगति और विकास के पथ पर चलकर जो सभ्यता सुदृढ़ वैभवशाली हुई है.धार्मिक ,सांस्कृतिक,वैज्ञानिक और सामाजिक प्रत्येक क्षेत्र में जो जीवनोपयोगी अविष्कार किये गए हैं , नवीन मानदंड स्थापित हुए हैं,जिसने जीवन को सुन्दर सुखद बनाने में महत भूमिका निभाई है. मानव जगत का एक वर्ग उसे पूर्णतः नष्ट भ्रष्ट और ध्वस्त कर देना चाहता है.आज भी संसार में देव और दानव मनुष्य के अंतस में विद्यमान हैं.इसमें देव वो लोग हैं,जो किसी भी सकारात्मक प्रगति के पक्षधर हैं तथा किसी न किसी प्रकार इसके पोषण संरक्षण में संलग्न हैं और दनाव वो लोग हैं जो इस प्रगति को नकार कर व्यवस्था को छिन्न भिन्न नष्ट भ्रष्ट कर सभ्यता समाज को, जीवन को मूल्यहीन बर्बर पाषणयुगीन दौर में ले जाना चाहते हैं.
देखिये न ....आज मानव जगत का एक वर्ग जो उग्र विध्वंसक बन प्रगति का धुर विरोधी है,क्या वह पुराण कथाओं में वर्णित दानवों से किसी भांति कम है....तालिबानी के नाम से जाने जाने वाले इस वर्ग के जो भी कार्य कलाप या विचारधारा है,क्या वह बर्बर दानवों से किसी मायने में कम है...
कल्पना कर देखिये की यदि यह वर्ग सचमुच ही सफल हो जाय और पूरे संसार पर इनका आधिपत्य हो जाय...इनके जो भी नियम कानून हैं, उसके अंतर्गत पशुवत जीवन यापन करने को हम बाध्य हों, प्रगति और संस्कृति के पोषक रक्षक इन विध्वंसकों से पराजित हो असहाय हो जायं.....फिर तो लगभग वही स्थिति होगी जो असुरों से पराजित हुई सत्ता शक्ति विहीन शाप्ताशी कथा में वर्णित उन देवों की हुई थी.
आज सभ्यता की विध्वंसक शक्तियां इसलिए सफलता प्राप्त कर रही है क्योंकि वह संगठित है.....अस्त्र शस्त्र दृढ संकल्प शक्ति कठोर अनुशासन और संगठन की वह शक्ति जितनी सुदृढ़ है,रक्षक शक्तियों में इन सबका अभाव है इसलिए चाहकर भी वह इन क्रूर शक्तियों के आगे पराजित हो जाती हैं...जिस दिन देव (रक्षक) शक्तियां संगठित हो जाएँगी और अपने सर्वोच्च तेज पुंज को एकत्रित कर उनके विरुद्ध खड़ी हो jayengee , असुर शक्ति का विनाश हो जायेगा। शांति के पोषक प्रगति के कर्णधार जब तक विखण्डित रहेंगे,असुर शक्तियां फलती फूलती जायेंगी.
दुर्गा का अर्थ ही होता है "संगठित शक्ति" और दुर्गा सप्त्शी की यह कथा मूल रूप में यही दिखाती सिखाती है। सकारात्मक शक्तियां संगठित और अनुशाषित होकर ही दुराचारी विनाशकारी शक्तियों को सहज ही पराजित कर सकती हैं,भले वह शक्ति एक स्त्री शक्ति ही क्यों न हो.
अब बात रही दुर्गा को स्त्री और माँ कहने की,बात तो कुछ लम्बी हो जायेगी,संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि ... शक्ति स्त्रीलिंग है,इसलिए इस शक्तिपुंज को भी स्त्री रूप में माना गया है.दुसरे, जब कभी भी हम कष्ट में होते हैं ,सबसे पहले हमें जिस नाम का स्मरण होता है,वह "माँ" का ही होता है.हम कितने भी कष्ट में रहें " माँ" का नाम दुहराते ही जैसे लगता है जैसे कष्ट कम हो गया....तो शाप्त्शी में भी जो माता के आह्वान की कथा है ,वह इसी भाव में है.
पौराणिक आख्यानों में वस्तुतः जो भी कथा वर्णित है,वह दृष्टान्त या रूपक हैं,जिसे युग विशेष के परिप्रेक्ष्य में देखने समझने का प्रयास करना चाहिए.जिस समय ये कथानक रचित हुए थे ,उस समय के जो भी राजनितिक सामाजिक परिदृश्य थे ,उन रूपकों के साथ ये कथा वर्णित किये गए थे...
एक बात और है,धार्मिक आख्यानों में जिस प्रकार से दंड विधान नियोजित हैं तथा धार्मिक आख्यानों में जिस प्रकार के कथानक रखे गएँ हैं,उनके एकमात्र उद्देश्य यही हैं कि वे अशिक्षित जनसाधारण द्वारा भी सहज ही बोधगम्य ग्राह्य हो और भयवश जनसाधारण नियमों में बंधे रहें। .
"सार्वजानिक स्थान पर धूम्रपान वर्जित है " पता नहीं कितने समय से यह निर्देश सार्वजानिक स्थलों पर उद्दृत रहता था....परन्तु दंड(भय) के अभाव में यह पूर्णतः निरस्त था.जबसे इसके लिए अर्थ दंड का प्रावधान किया गया ,लोग सतर्क रहने लगे. बहुत कुछ इसी आशय से धर्म में भी जो स्वर्ग नर्क ,पाप पुन्य दंड इत्यादि की व्याख्या है,उसका निहितार्थ यही है कि भयवश ही सही लोग धर्माचरण में प्रवृत्त हों और समाज संतुलित सुव्यवस्थित रहे.
एक बात और ....आज हमारे जो भी धर्मग्रन्थ जिस रूप में हमें उपलब्ध हैं,लगभग कोई भी अपने मूल रूप में नहीं रह गए हैं.परवर्ती काल में इसमें बहुत से प्रक्षेपांश जोड़े गए हैं.धर्म को विवादस्पद और दिग्भ्रमित किये रखने के लिए बड़े ही सुनियोजित ढंग से ये प्रयास विशेषकर मध्यकाल में मुस्लिम शासकों द्वारा करवाए गए हैं.उद्देश्य स्पष्ट है,धर्म ही व्यक्ति को दृढ बंधन में आबद्ध कर संगठित करता है,उसमे जितने विवाद होंगे,शासक का काम उतना ही आसान होगा..जात पांत छूआ छूट वैमनस्य फैलाकर और लोगों को असंगठित कर ही कोई भी शासक अपने कुचक्रों में सफल हो सकता है.अब देखिये न एक तरफ जहाँ भगवान् को भी शूद्रों के जूठन खाने की बात कही गयी,स्त्री को सर्वोच्च शक्ति और पूज्य माना गया वहीँ आज उपलब्ध इन्ही ग्रंथों में शूद्रों की उपेक्षा और नारी की अवमानना की बातें भी मिल जातीं हैं...अब सोचने वाली बात यह है कि कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति ऐसी विरोधाभासी बातें कैसे लिख सकता है....यह केवल हिन्दू ग्रंथों के साथ ही नहीं हुआ है,बल्कि अन्य धर्मग्रंथों के साथ भी हुआ है.
इसलिए आज आवश्यकता यह है की अपनी बुद्धि का उपयोग कर हम इन पवित्र ग्रंथों को पढें और इनके प्रक्षेपांशों को नकारते हुए कल्याणकारी सुन्दर बातों को हृदयंगम करने और उनका अनुकरण करने का प्रयास करें.
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30.3.09
श्रद्धा पूजा आधार वही !!!
पथ के कंटक गुंथ ह्रदय मेरे,
जिस पल भी व्याकुल करते हैं.
सब ताप मेरे संताप मेरे,
उन नयनो में घिर झरते हैं.
उन अश्रु कणों के सागर में,
आकंठ निमग्न अस्तित्व मेरा,
जलधि बाहर क्योंकर आऊं,
जो जल ही जीवन सार निरा.
व्रत रक्षा स्नेह समर्पण का,
वह पूर्ण प्रतिष्ठित करता है.
मेरे सुख भर के ही निमित्त,
अपनी हर सांस वह धरता है.
मैं ध्येय हूँ उसके जीवन का,
वह ईश मेरे मन मंदिर का,
कर दिया समर्पित निज अवगुण,
प्रतिरूप है वह परमेश्वर का.
मेरे रोम रोम वह ही रमता,
बन रक्त शिराओं में बहता.
उसके बिन मैं जल बिन मछली,
मेरे बिन वह भी चातक सा.
श्रद्धा पूजा आधार वही,
सपना सुन्दर संसार वही.
वह संग चिरायु सतत रहे,
मेरा तो साज सिंगार वही...
जिस पल भी व्याकुल करते हैं.
सब ताप मेरे संताप मेरे,
उन नयनो में घिर झरते हैं.
उन अश्रु कणों के सागर में,
आकंठ निमग्न अस्तित्व मेरा,
जलधि बाहर क्योंकर आऊं,
जो जल ही जीवन सार निरा.
व्रत रक्षा स्नेह समर्पण का,
वह पूर्ण प्रतिष्ठित करता है.
मेरे सुख भर के ही निमित्त,
अपनी हर सांस वह धरता है.
मैं ध्येय हूँ उसके जीवन का,
वह ईश मेरे मन मंदिर का,
कर दिया समर्पित निज अवगुण,
प्रतिरूप है वह परमेश्वर का.
मेरे रोम रोम वह ही रमता,
बन रक्त शिराओं में बहता.
उसके बिन मैं जल बिन मछली,
मेरे बिन वह भी चातक सा.
श्रद्धा पूजा आधार वही,
सपना सुन्दर संसार वही.
वह संग चिरायु सतत रहे,
मेरा तो साज सिंगार वही...
24.3.09
लेडी डॉक्टर (संस्मरण)
यह संभवतः प्रत्येक पीढी के साथ होता है कि ३५ - ४० या ४५ की वय पार कर जाने के बाद, लोग मानसिक रूप से अतीत में जीने में सुखानुभूती करते हैं. ईश्वर ने मानव मस्तिष्क में ऐसी व्यवस्था कर दी है कि समय के साथ स्वतः ही दुखद स्मृतिया धुंधली पड़ क्षीण हो जाती हैं.पूर्णत समाप्त न भी हों तो व्यथा की तीव्रता अवश्य क्षीण कर जाती है.परन्तु व्यवस्था की अलौकिकता है कि एक ओर जहाँ दुखद स्मृतियाँ समय के मस्तिष्क पटल से मिटने लगती हैं प्रभावहीन होती जाती हैं वहीँ सुखद स्मृतियाँ समय के साथ और भी प्रखर होती जाती हैं और सच पूछिए तो यही मनुष्य को उर्जा भी प्रदान करती है.उसमे भी बालपन के संस्मरण संभवतः सर्वाधिक सुखद हुआ करती हैं.आज एक संस्मरण आपलोगों के साथ भी बांटती हूँ..
बाल्यकाल से युवावस्था तक अपने भोंदुपने में हमने ऐसे ऐसे कारनामे किये कि आज भी उक्त घटनाये मेरे संग संग उनके साक्षी रहे लोगों के मनोरंजन के साधन हैं.
संयोग ऐसा रहा कि बाल्यकाल और विवाहोपरांत भी मेरे जीवन के २७ वर्ष तक ऐसे स्थानों पर हमारा वास रहा जहाँ नागरी सभ्यता संस्कृति की पहुँच न थी. .उन स्थानों को हम न देहात कह सकते हैं न ही शहर.मेरे पिताजी माइनिंग इंजीनियर थे और हम सदा ही पहाडों जंगलों के बीच कम्पनी द्वारा बसाये छोटे से कालोनियों में रहे ,जहाँ जंगलों पहाडों के बीच विशुद्ध प्राकृतिक परिवेश में वर्षों तक हमारी सरलता संरक्षित रही.
बात उन दिनों की है जब मैं बी.ए. प्रथम वर्ष में थी. घर से दूर शहर में एक महाविद्यालय में कुछ दिन पूर्व ही दाखिला हुआ था सो किसी के साथ घनिष्टता नही हुई थी.यूँ भी मैं बहुत अधिक अंतर्मुखी स्वभाव की थी.बहुत अधिक मेल जोल मेरा किसी से न था.मित्र के नाम पर अब तक पुस्तकें और मेरे दो छोटे भाई ही मेरे मित्र थे जिनकी संगति में स्वाभाविक ही मेरा सामान्य ज्ञान निम्नतम स्तर पर था.
पता नही कैसे मेरे सीने (ब्रेस्ट) में एक घाव हो गया,जो प्रत्येक दिन के साथ बढ़ता हुआ असह्य कष्टकारक होता गया.पन्द्रह सोहल दिन होते होते यह स्थिति हो गई कि उस असह्य पीडा ने मुझे कलम तक पकड़ने में अक्षम कर दिया...मुझे कराहते छटपटाते देख कुछ सहपाठियों ने जोर देकर मुझसे कारण जान लिया और फ़िर बात छात्रावास की अधीक्षिका तक पहुँचा दी गयी.
पता नहीं क्या सोचकर हमारे महिला क्षात्रावास के लिए पुरुष चिकित्सक नियुक्त किया गया था.आज सा दिमाग रहता तो इसीके लिए एक आन्दोलन कर बैठती..पर उस समय यह सब सोचना नहीं आता था.खैर,अधीक्षिका ने उक्त बुजुर्ग पुरुष चिकित्सक को बुलवा लिया और उनके आने पर मुझे बुलाया गया.
चिकित्सक और अधीक्षिका ने लाख पुचकारा पर मैंने उन्हें वह घाव का स्थान नहीं दिखाया..अब महिला चिकित्सक होती तो कोई और बात होती. हारकर बुजुर्ग चिकित्सक महोदय ने अंदाजे से अपने अनुभव के आधार पर कुछ औषधियां लिख दीं. पर उनकी विद्वता और अनुभव पूर्णतः विफल रहा और उन दवाइयों के सेवन ने मेरी रही सही गति भी निकाल दी.
जहाँ हम रहते थे, माइंस के छोटे अस्पताल में भले और कोई सुविधा न हो पर एक पुरूष और एक महिला चिकित्सक अवश्य होते थे..यह अलग बात थी कि तब तक सिलाई बुनाई में दक्ष उन महिला चिकित्सकों से मैंने कभी अपनी कोई बीमारी नही दिखाई थी.आज तक जरूरत जो न पड़ी थी.
अगले दिन दुखद सन्देश के साथ छोटा भाई क्षात्रावास मुझे लिवाने आया कि अविलम्ब चलना है,माताजी का सड़क दुर्घटना में पैर टूट गया है जिन्हें जमशेदपुर के अस्पताल में रखा गया है. कुछ समय के लिए तो अपनी पीड़ा बिसरा गई मैं और ट्रेन पकड़ भागती हुई माताजी के पास पहुँची. तबतक तो प्लास्टर और ट्रैकसन वगैरह लग चुका था और वे कुछ व्यवस्थित भी हो चुकी थीं ,पर हम दोनों माँ बेटी खूब रोई.
माताजी तो रोकर चुप हो गयीं पर चिकित्सक महोदय के उन पीडाहारी औषधि ने मेरी जो स्थिति की थी कि मारे पीडा के मेरे आंसू थमने का नाम नही ले रहे थे.जब तीसरे दिन भी माताजी ने मुझे रोते देखा तो अबतक जो मुझे सांत्वना दिए जा रहीं थीं,कुछ झुंझला सी पड़ीं. उनका झुंझलाना था कि मैं बुरी तरह रो पड़ी और उन्हें अपने घाव के बारे में बताया.
माताजी ने पिताजी को बताया और अविलम्ब मुझे किसी महिला चिकित्सक(लेडी डाक्टर) से दिखवाने को कहा.जिस अस्पताल में हम थे वह काफी बड़ा था और यहाँ हरेक बीमारी के लिए अलग अलग विभाग थे.पिताजी पूरे अस्पताल का एक पूरा चक्कर लगा आए और वापस आकर उन्होंने माताजी से मंत्रणा की.देर तक मंत्रणा हुई और फ़िर पिताजी ने मुझे अपने साथ चलने को कहा.
उन दिनों हमारे स्वभाव में ही नहीं हुआ करता था कि अभिभावकों से अधिक प्रश्न पूछते या जब उनके पीछे चलना हो तो अपना दिमाग लगाते कि कहाँ जा रहे हैं, जरा देख जान लें. पिताजी ने एक विभाग में मेरा नंबर लगा दिया था और टोकन लाकर मेरे हाथ पकड़ा दिया ,चूंकि वहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित था सो उन्होंने मुझे अपना नंबर आने पर दिखाकर और दवा लेकर माताजी के पास चले जाने की हिदायत दी और स्वयं वहां से चले गए.
उन दिनों शहरों या बड़े भीड़ भाड़ वाले स्थानों में हमारी स्थिति वैसी ही होती थी जैसा कि किसी जंगल में निवास करने वाले सीधे साधे वन्य पशु की शहर के भीड़ भाड़ वाले सड़क पर आने पर होती है. जहाँ मैं बैठी थी पचास के ऊपर केवल महिलाएं ही थीं.परन्तु फिर भी मैं उस अपरिचित भीड़ में बड़ी असहजता का अनुभव कर रही थी.पर वहां से भागने का कोई चारा न था सो मन मार कर बैठी रही. मेरा क्रमांक संभतः बत्तीसवां था.अपनी पारी की प्रतीक्षा में बैठी थी.
मुझे तो यूँ भी आस पास किसी से मतलब नही रहा करता था पर मेरा दुर्भाग्य था कि वहां अधिकाँश को मुझमे बड़ी दिलचस्पी थी और प्रत्येक दो तीन मिनट के अन्तराल पर महिलाएं मुझसे प्रश्न करने लगी.मुझे लगा आस पास की सभी महिलाओं में मैं शायद सबसे छोटी हूँ इसलिए मुझसे सहनुभूतिवस प्रश्न कर रही हैं.पर अधिकांशतः उनके प्रश्नों का आशय मैं समझ नही पा रही थी और मैं जो उत्तर उन्हें दे रही थी वह संभवतः उन्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा था..
उनका प्रश्न होता -
"शादी हो गई ??"मैं - जी नही." कौन सा महिना चल रहा है ?"" जी फरवरी " ........ उसके बाद वे एक दूसरे का मुंह देखने लगती थीं और फ़िर प्रश्न करती " तुम्हारा कौन सा महीना है ??? "
मैं निरुत्तर उनके मुंह देखने लगती और वे अगल बगल वालियों से फुसफुसाने लगतीं. मैं हैरान कि ये क्या पूछ रही हैं और ऐसे मुझे क्यों घूर रही हैं...
लम्बी प्रतीक्षा के बाद मेरी पारी आई.चिकित्सिका के कक्ष में एक साथ तीन मरीजों को भेजा जा रहा था.मैं दूसरे नंबर पर थी.जैसे ही मुझसे पहले वाली उस मुस्लिम महिला ने अपने कागज दिखाए वह अधेड़ खडूस सी चिकित्सिका उसके ऊपर उबल पड़ी.
फ़िर से आ गई ........मैं तुम्हे नही देखूंगी........जाओ अपने आदमी (पति) को बुलाकर लाओ.तुम्हे पिछली बार ही कहा था न कि अब और बच्चे पैदा नही करो.........ये तुम्हारा दसवां है न.........क्यों नही बंद करवाती???????
महिला ...... " जी हमारे मजहब में यह हराम है जी....हमें सब धरम से बहार निकाल देंगे.........मैंने अपने आदमी से कहा था पर उसने मुझे बहुत गलियां दी और छोड़ देने की धमकी भी..........मैं क्या करूँ......वह दूसरी शादी कर लेगा.........."
काफी देर तक दोनों उलझी रहीं और झुंझलाते हुए चिकित्सिका ने उसे डांटते डांटते ही मुझे आदेश दिया....
" खड़ी क्या हो, लेट जाओ........."
मैं चुपचाप जाकर बेड पर लेट गई.जब वो मुड़कर मेरी ओर आई और मुझे चुपचाप सावधान की मुद्रा में लेटे देखा तो फ़िर से उबल पड़ी........
लाख बार कहा तुमलोगों से कि साड़ी पहनकर आया करो और अगर सलवार पहनकर आना ही है तो पहले से खोल कर रखा करो........पर नही ..........केवल टाइम वेस्ट करना है मेरा.....
भयभीत मैं सुन रही थी,पर मेरी समझ में नही आ रहा था कि मैं सलवार क्यों खोलूं भला.
मैंने डरते डरते इंगित करते हुए कहा....
" जी, लेकिन मुझे तो तकलीफ यहाँ ऊपर है........."
अब चौंकने की बारी उसकी थी.
"ऊपर मतलब??"
"....मुझे घाव हो गया है."
चिकित्सिका - कहाँ घाव हुआ है????
मैंने हाथ से ईशारा किया........." यहाँ "
चिकित्सिका - " घाव हुआ तो यहाँ क्यों आई, मालूम नही यह गाइनिक डिपार्टमेंट है और आज के दिन केवल प्रेग्नेंट लेडी का चेकअप होता है..........किसने भेजा तुम्हे यहाँ.......... जाओ मेडिसीन या सर्जरी में दिखाओ.."
मैं उस से क्या कहती कि लेडी डाक्टर से दिखाने के लिए पिताजी ने मुझे यहाँ भेजा था.
अब बेचारे पिताजी भी क्या करते, मेडिसीन या सर्जरी डिपार्टमेंट में कोई महिला चिकित्सक न थीं और हमारे लिए तो डाक्टर मतलब डाक्टर होता था. तो क्या हुआ यदि वे प्रसूती विभाग में थीं.
आज लगता है ,बहुत ही अच्छा हुआ जो हमारा एक्सपोजर बहुत सारे सन्दर्भों, विशेषकर सेक्स संबन्धी परिपेक्ष्यों में नगण्य रहा. ऐसा नही है कि सिर्फ़ मैं ही ऐसी थी,उस समय सामाजिक परिवेश कुछ ऐसा था कि किशोर और युवा वय की बहुसंख्यक लड़कियां ऐसी ही होती थी.पर आज के परिपेक्ष्य में जब देखती हूँ तो एक धक्का सा जरूर लगता है.
स्कूल कालेजों में जो प्रयास यौन शिक्षा ( सेक्स एजुकेसन ) के लिए किया जा रहा है उसमे ज्ञान वर्धन कितना हो रहा है पता नहीं, पर ये बहुत हद तक " कामुद्दीपन" में सहायक या प्रयुक्त होते हैं. वैसे भी आज सेक्स शिक्षा कितनी प्रासंगिक रह गई है जबकि सिनेमा, इश्तेहार, पुस्तकें, इंटरनेट या अन्यान्य मध्यमो से, चारों ओर से ही उस अल्पवय मस्तिष्क पर इस प्रकार के दृश्य श्रव्य अवयवों की वर्षा सी हो रही है.अल्पवय में गुप्त ज्ञान का व्यापक ज्ञान कभी उपयोगी या श्रेयकर नहीं होता...हमें मिलकर इससे बचने का कोई उपाय अवश्य सोचना होगा,नहीं तो इसके परिणाम निश्चित ही घातक होंगे...
खैर ,कभी कभी जब निर्णय के लिए बैठती हूँ तो निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाती कि वह नादानी भली थी या आज की यह समझदारी... ।
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पोस्ट के प्रकाशन के उपरांत जब रंजू दी (रंजना भाटिया) की यह टिपण्णी देखी - (रंजना तुम्हारा यह संस्मरण बहुत से सवाल छोड़ गया ।वह वक़्त मासूम बहुत था ॥अपने शारीरिक बदलाव के बारे में भी पूछना ,बताना बहुत हिम्मत का काम होता था जो अक्सर हम कर ही नहीं पाते थे पर जिस तरह की तकलीफ तुमने भोगी वह भी विचारणीय है ॥आज के बच्चे बहुत सी बाते हमसे भी अधिक जानते हैं ..किसी भी शिक्षा का उद्देश्य सही दिशा में हो तो वह लाभकारी है ...पर यह भी उतना ही कड़वा सच है कि आज का खुला माहौल एक उन्मुक्त भयवाह वातावरण बना रहा है ..सेक्स शिक्षा के साथ साथ सही शारीरिक शिक्षा अपने स्वस्थ के प्रति सचेत रहना आज की जरुरत बनती जा रही है)
जिसने कि मुझे बहुत ही प्रभावित किया. तो लगा कि बात लम्बी अवश्य हो जायेगी पर इसे थोडा और विस्तार अवश्य दिया जाय...
रंजू दी की बात से मैं बहुत अधिक सहमत हूँ.संभवतः इस आलेख के माध्यम से मैं अपना आशय अभी तक स्पष्ट नहीं कर पाई थी.वस्तुतः जो उन्होंने कहा,वही मैं भी कहना चाह रही थी...अपने शरीर के प्रति अल्पज्ञता किस भांति हमें कष्ट में डाल देती थीं,इसके अनुभवों के भण्डार हैं हमारे पास.
शरीर का ज्ञान होना और उसके प्रति सजगता अत्यंत आवश्यक है,किन्तु शरीर का समय से पूर्व जग जाना...यह समाज को अस्वस्थ कर देता है...
जैसे प्राण रक्षक औसधि की भी नियत से अधिक मात्रा का सेवन प्राणघातक होता है,वैसे ही ज्ञान की मात्रा भी अवश्य ही वयानुसार नियत होनी चाहिए...
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बाल्यकाल से युवावस्था तक अपने भोंदुपने में हमने ऐसे ऐसे कारनामे किये कि आज भी उक्त घटनाये मेरे संग संग उनके साक्षी रहे लोगों के मनोरंजन के साधन हैं.
संयोग ऐसा रहा कि बाल्यकाल और विवाहोपरांत भी मेरे जीवन के २७ वर्ष तक ऐसे स्थानों पर हमारा वास रहा जहाँ नागरी सभ्यता संस्कृति की पहुँच न थी. .उन स्थानों को हम न देहात कह सकते हैं न ही शहर.मेरे पिताजी माइनिंग इंजीनियर थे और हम सदा ही पहाडों जंगलों के बीच कम्पनी द्वारा बसाये छोटे से कालोनियों में रहे ,जहाँ जंगलों पहाडों के बीच विशुद्ध प्राकृतिक परिवेश में वर्षों तक हमारी सरलता संरक्षित रही.
बात उन दिनों की है जब मैं बी.ए. प्रथम वर्ष में थी. घर से दूर शहर में एक महाविद्यालय में कुछ दिन पूर्व ही दाखिला हुआ था सो किसी के साथ घनिष्टता नही हुई थी.यूँ भी मैं बहुत अधिक अंतर्मुखी स्वभाव की थी.बहुत अधिक मेल जोल मेरा किसी से न था.मित्र के नाम पर अब तक पुस्तकें और मेरे दो छोटे भाई ही मेरे मित्र थे जिनकी संगति में स्वाभाविक ही मेरा सामान्य ज्ञान निम्नतम स्तर पर था.
पता नही कैसे मेरे सीने (ब्रेस्ट) में एक घाव हो गया,जो प्रत्येक दिन के साथ बढ़ता हुआ असह्य कष्टकारक होता गया.पन्द्रह सोहल दिन होते होते यह स्थिति हो गई कि उस असह्य पीडा ने मुझे कलम तक पकड़ने में अक्षम कर दिया...मुझे कराहते छटपटाते देख कुछ सहपाठियों ने जोर देकर मुझसे कारण जान लिया और फ़िर बात छात्रावास की अधीक्षिका तक पहुँचा दी गयी.
पता नहीं क्या सोचकर हमारे महिला क्षात्रावास के लिए पुरुष चिकित्सक नियुक्त किया गया था.आज सा दिमाग रहता तो इसीके लिए एक आन्दोलन कर बैठती..पर उस समय यह सब सोचना नहीं आता था.खैर,अधीक्षिका ने उक्त बुजुर्ग पुरुष चिकित्सक को बुलवा लिया और उनके आने पर मुझे बुलाया गया.
चिकित्सक और अधीक्षिका ने लाख पुचकारा पर मैंने उन्हें वह घाव का स्थान नहीं दिखाया..अब महिला चिकित्सक होती तो कोई और बात होती. हारकर बुजुर्ग चिकित्सक महोदय ने अंदाजे से अपने अनुभव के आधार पर कुछ औषधियां लिख दीं. पर उनकी विद्वता और अनुभव पूर्णतः विफल रहा और उन दवाइयों के सेवन ने मेरी रही सही गति भी निकाल दी.
जहाँ हम रहते थे, माइंस के छोटे अस्पताल में भले और कोई सुविधा न हो पर एक पुरूष और एक महिला चिकित्सक अवश्य होते थे..यह अलग बात थी कि तब तक सिलाई बुनाई में दक्ष उन महिला चिकित्सकों से मैंने कभी अपनी कोई बीमारी नही दिखाई थी.आज तक जरूरत जो न पड़ी थी.
अगले दिन दुखद सन्देश के साथ छोटा भाई क्षात्रावास मुझे लिवाने आया कि अविलम्ब चलना है,माताजी का सड़क दुर्घटना में पैर टूट गया है जिन्हें जमशेदपुर के अस्पताल में रखा गया है. कुछ समय के लिए तो अपनी पीड़ा बिसरा गई मैं और ट्रेन पकड़ भागती हुई माताजी के पास पहुँची. तबतक तो प्लास्टर और ट्रैकसन वगैरह लग चुका था और वे कुछ व्यवस्थित भी हो चुकी थीं ,पर हम दोनों माँ बेटी खूब रोई.
माताजी तो रोकर चुप हो गयीं पर चिकित्सक महोदय के उन पीडाहारी औषधि ने मेरी जो स्थिति की थी कि मारे पीडा के मेरे आंसू थमने का नाम नही ले रहे थे.जब तीसरे दिन भी माताजी ने मुझे रोते देखा तो अबतक जो मुझे सांत्वना दिए जा रहीं थीं,कुछ झुंझला सी पड़ीं. उनका झुंझलाना था कि मैं बुरी तरह रो पड़ी और उन्हें अपने घाव के बारे में बताया.
माताजी ने पिताजी को बताया और अविलम्ब मुझे किसी महिला चिकित्सक(लेडी डाक्टर) से दिखवाने को कहा.जिस अस्पताल में हम थे वह काफी बड़ा था और यहाँ हरेक बीमारी के लिए अलग अलग विभाग थे.पिताजी पूरे अस्पताल का एक पूरा चक्कर लगा आए और वापस आकर उन्होंने माताजी से मंत्रणा की.देर तक मंत्रणा हुई और फ़िर पिताजी ने मुझे अपने साथ चलने को कहा.
उन दिनों हमारे स्वभाव में ही नहीं हुआ करता था कि अभिभावकों से अधिक प्रश्न पूछते या जब उनके पीछे चलना हो तो अपना दिमाग लगाते कि कहाँ जा रहे हैं, जरा देख जान लें. पिताजी ने एक विभाग में मेरा नंबर लगा दिया था और टोकन लाकर मेरे हाथ पकड़ा दिया ,चूंकि वहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित था सो उन्होंने मुझे अपना नंबर आने पर दिखाकर और दवा लेकर माताजी के पास चले जाने की हिदायत दी और स्वयं वहां से चले गए.
उन दिनों शहरों या बड़े भीड़ भाड़ वाले स्थानों में हमारी स्थिति वैसी ही होती थी जैसा कि किसी जंगल में निवास करने वाले सीधे साधे वन्य पशु की शहर के भीड़ भाड़ वाले सड़क पर आने पर होती है. जहाँ मैं बैठी थी पचास के ऊपर केवल महिलाएं ही थीं.परन्तु फिर भी मैं उस अपरिचित भीड़ में बड़ी असहजता का अनुभव कर रही थी.पर वहां से भागने का कोई चारा न था सो मन मार कर बैठी रही. मेरा क्रमांक संभतः बत्तीसवां था.अपनी पारी की प्रतीक्षा में बैठी थी.
मुझे तो यूँ भी आस पास किसी से मतलब नही रहा करता था पर मेरा दुर्भाग्य था कि वहां अधिकाँश को मुझमे बड़ी दिलचस्पी थी और प्रत्येक दो तीन मिनट के अन्तराल पर महिलाएं मुझसे प्रश्न करने लगी.मुझे लगा आस पास की सभी महिलाओं में मैं शायद सबसे छोटी हूँ इसलिए मुझसे सहनुभूतिवस प्रश्न कर रही हैं.पर अधिकांशतः उनके प्रश्नों का आशय मैं समझ नही पा रही थी और मैं जो उत्तर उन्हें दे रही थी वह संभवतः उन्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा था..
उनका प्रश्न होता -
"शादी हो गई ??"मैं - जी नही." कौन सा महिना चल रहा है ?"" जी फरवरी " ........ उसके बाद वे एक दूसरे का मुंह देखने लगती थीं और फ़िर प्रश्न करती " तुम्हारा कौन सा महीना है ??? "
मैं निरुत्तर उनके मुंह देखने लगती और वे अगल बगल वालियों से फुसफुसाने लगतीं. मैं हैरान कि ये क्या पूछ रही हैं और ऐसे मुझे क्यों घूर रही हैं...
लम्बी प्रतीक्षा के बाद मेरी पारी आई.चिकित्सिका के कक्ष में एक साथ तीन मरीजों को भेजा जा रहा था.मैं दूसरे नंबर पर थी.जैसे ही मुझसे पहले वाली उस मुस्लिम महिला ने अपने कागज दिखाए वह अधेड़ खडूस सी चिकित्सिका उसके ऊपर उबल पड़ी.
फ़िर से आ गई ........मैं तुम्हे नही देखूंगी........जाओ अपने आदमी (पति) को बुलाकर लाओ.तुम्हे पिछली बार ही कहा था न कि अब और बच्चे पैदा नही करो.........ये तुम्हारा दसवां है न.........क्यों नही बंद करवाती???????
महिला ...... " जी हमारे मजहब में यह हराम है जी....हमें सब धरम से बहार निकाल देंगे.........मैंने अपने आदमी से कहा था पर उसने मुझे बहुत गलियां दी और छोड़ देने की धमकी भी..........मैं क्या करूँ......वह दूसरी शादी कर लेगा.........."
काफी देर तक दोनों उलझी रहीं और झुंझलाते हुए चिकित्सिका ने उसे डांटते डांटते ही मुझे आदेश दिया....
" खड़ी क्या हो, लेट जाओ........."
मैं चुपचाप जाकर बेड पर लेट गई.जब वो मुड़कर मेरी ओर आई और मुझे चुपचाप सावधान की मुद्रा में लेटे देखा तो फ़िर से उबल पड़ी........
लाख बार कहा तुमलोगों से कि साड़ी पहनकर आया करो और अगर सलवार पहनकर आना ही है तो पहले से खोल कर रखा करो........पर नही ..........केवल टाइम वेस्ट करना है मेरा.....
भयभीत मैं सुन रही थी,पर मेरी समझ में नही आ रहा था कि मैं सलवार क्यों खोलूं भला.
मैंने डरते डरते इंगित करते हुए कहा....
" जी, लेकिन मुझे तो तकलीफ यहाँ ऊपर है........."
अब चौंकने की बारी उसकी थी.
"ऊपर मतलब??"
"....मुझे घाव हो गया है."
चिकित्सिका - कहाँ घाव हुआ है????
मैंने हाथ से ईशारा किया........." यहाँ "
चिकित्सिका - " घाव हुआ तो यहाँ क्यों आई, मालूम नही यह गाइनिक डिपार्टमेंट है और आज के दिन केवल प्रेग्नेंट लेडी का चेकअप होता है..........किसने भेजा तुम्हे यहाँ.......... जाओ मेडिसीन या सर्जरी में दिखाओ.."
मैं उस से क्या कहती कि लेडी डाक्टर से दिखाने के लिए पिताजी ने मुझे यहाँ भेजा था.
अब बेचारे पिताजी भी क्या करते, मेडिसीन या सर्जरी डिपार्टमेंट में कोई महिला चिकित्सक न थीं और हमारे लिए तो डाक्टर मतलब डाक्टर होता था. तो क्या हुआ यदि वे प्रसूती विभाग में थीं.
आज लगता है ,बहुत ही अच्छा हुआ जो हमारा एक्सपोजर बहुत सारे सन्दर्भों, विशेषकर सेक्स संबन्धी परिपेक्ष्यों में नगण्य रहा. ऐसा नही है कि सिर्फ़ मैं ही ऐसी थी,उस समय सामाजिक परिवेश कुछ ऐसा था कि किशोर और युवा वय की बहुसंख्यक लड़कियां ऐसी ही होती थी.पर आज के परिपेक्ष्य में जब देखती हूँ तो एक धक्का सा जरूर लगता है.
स्कूल कालेजों में जो प्रयास यौन शिक्षा ( सेक्स एजुकेसन ) के लिए किया जा रहा है उसमे ज्ञान वर्धन कितना हो रहा है पता नहीं, पर ये बहुत हद तक " कामुद्दीपन" में सहायक या प्रयुक्त होते हैं. वैसे भी आज सेक्स शिक्षा कितनी प्रासंगिक रह गई है जबकि सिनेमा, इश्तेहार, पुस्तकें, इंटरनेट या अन्यान्य मध्यमो से, चारों ओर से ही उस अल्पवय मस्तिष्क पर इस प्रकार के दृश्य श्रव्य अवयवों की वर्षा सी हो रही है.अल्पवय में गुप्त ज्ञान का व्यापक ज्ञान कभी उपयोगी या श्रेयकर नहीं होता...हमें मिलकर इससे बचने का कोई उपाय अवश्य सोचना होगा,नहीं तो इसके परिणाम निश्चित ही घातक होंगे...
खैर ,कभी कभी जब निर्णय के लिए बैठती हूँ तो निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाती कि वह नादानी भली थी या आज की यह समझदारी... ।
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पोस्ट के प्रकाशन के उपरांत जब रंजू दी (रंजना भाटिया) की यह टिपण्णी देखी - (रंजना तुम्हारा यह संस्मरण बहुत से सवाल छोड़ गया ।वह वक़्त मासूम बहुत था ॥अपने शारीरिक बदलाव के बारे में भी पूछना ,बताना बहुत हिम्मत का काम होता था जो अक्सर हम कर ही नहीं पाते थे पर जिस तरह की तकलीफ तुमने भोगी वह भी विचारणीय है ॥आज के बच्चे बहुत सी बाते हमसे भी अधिक जानते हैं ..किसी भी शिक्षा का उद्देश्य सही दिशा में हो तो वह लाभकारी है ...पर यह भी उतना ही कड़वा सच है कि आज का खुला माहौल एक उन्मुक्त भयवाह वातावरण बना रहा है ..सेक्स शिक्षा के साथ साथ सही शारीरिक शिक्षा अपने स्वस्थ के प्रति सचेत रहना आज की जरुरत बनती जा रही है)
जिसने कि मुझे बहुत ही प्रभावित किया. तो लगा कि बात लम्बी अवश्य हो जायेगी पर इसे थोडा और विस्तार अवश्य दिया जाय...
रंजू दी की बात से मैं बहुत अधिक सहमत हूँ.संभवतः इस आलेख के माध्यम से मैं अपना आशय अभी तक स्पष्ट नहीं कर पाई थी.वस्तुतः जो उन्होंने कहा,वही मैं भी कहना चाह रही थी...अपने शरीर के प्रति अल्पज्ञता किस भांति हमें कष्ट में डाल देती थीं,इसके अनुभवों के भण्डार हैं हमारे पास.
शरीर का ज्ञान होना और उसके प्रति सजगता अत्यंत आवश्यक है,किन्तु शरीर का समय से पूर्व जग जाना...यह समाज को अस्वस्थ कर देता है...
जैसे प्राण रक्षक औसधि की भी नियत से अधिक मात्रा का सेवन प्राणघातक होता है,वैसे ही ज्ञान की मात्रा भी अवश्य ही वयानुसार नियत होनी चाहिए...
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