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22.6.11

पूर्णाहुति ...

तो क्या हुआ यदि पांचवीं में तीन साल फेल होने के बाद, फिर कभी फिरकर उसने विद्यालय का मुंह नहीं देखा था. व्यक्ति और परिस्थतियों को नियंत्रित करने की उसकी जो क्षमता थी,वह कोई शिक्षण संस्थान किसी को नहीं सिखाता... दुनियादारी के गुर किताबें सिखा भी कहाँ पाती हैं , बल्कि किताबों में जो होते हैं, उन निति सिद्धांतों पर आँख कान दिए सरपट चले आदमी, तो अपना बेडा ही गर्क न करा ले..

अपनी जन्मदायिनी अथाह लगाव था उसे. अन्धानुगामिनी थी वह उसकी. यहाँ तक कि उसके पिता अपनी पत्नी के जिन दुर्गुणों से त्रस्त और क्षुब्ध रहते थे, वे समस्त गुण उसे खासे जीवनोपयोगी लगते थे..पिता का क्षोभ उसे असह्य था..और फिर एक दिन जब विवेकहीना माता ने नितांत महत्वहीन बात पर क्रोधावेग में अपने शरीर को अग्नि में विसर्जित कर दिया , इस दुर्घटना का पूर्ण दोषी भी उसने अपने जनक को ही ठहराया. फांसी के फंदे तक उन्हें पहुंचा छोड़ने को वह प्रतिबद्ध हो उठी..वो तो नाते रिश्तेदारों ने मिलकर किसी प्रकार स्थिति को सम्हाला और माता के साथ साथ पिता से भी वंचित होने से उन चारों बहनों को बचाया था..

तात्कालिक क्षोभ का ज्वार जब उसका उतरा तो बारह वर्षीय उस बाला ने पूरे सूझ बूझ के साथ अपने घाटे भले का भली प्रकार अंकन किया और इस दुर्घटना में भी अपने लिए सुनहरा अवसर ही पाया..सुविधानुसार जीवन भर वह इसे भुनाती रही..उसने कभी भी अपने पिता को विस्मृत नहीं करने दिया कि वह एक पत्नी हन्ता पापी है..स्वयं को पीड़ित व्यथित और पिता को हीन ठहरा उसने अपने लिए हर किसी का ध्यान और अपार महत्त्व अर्जित किया..जब जो वह चाहती घर में सब उसीके अनुसार होता..

चलता तो यह जीवन भर रहता ,पर उसके मार्ग में पहाड़ सी अवरोधक बनी उसकी विमाता..अपने भर उसने पूरा प्रयत्न किया कि पिता के जीवन में सुख की क्षीण ऊष्मा न पहुंचे , परन्तु सम्पूर्ण यत्न कर भी इस विवाह को वह रोक न पायी..हालाँकि पिता भी सहज भाव से इस विवाह हेतु प्रस्तुत न हुए थे, पर परिवार समाज वालों का दवाब और चार चार नन्ही बच्चियों के लालन पालन और भविष्य की चिंता ने उनके लिए दूसरा कोई मार्ग नहीं छोड़ा था..

अपने पिता के द्वितीय विवाह को उसने अपने पराजय और चुनौती रूप में स्वीकारा था. इस पीड़ा को सदा उसने ह्रदय में जगाये रखा और प्रतिशोधस्वरूप जीवन भर अपने पिता को न तो अपनी दूसरी पत्नी के गुणों को देखने परखने का अवसर दिया और न ही उन्हें इस अपराध बोध से मुक्त होने दिया कि विमाता ला, उन्होंने अपनी पुत्रियों पर कितना बड़ा अत्याचार किया है..अपने चतुर युक्तियों से घटनाओं को संचालित करती शांति प्रेम सद्भाव को कभी उसने अपने घर की चौखट लांघ अन्दर आने न दिया..मानसिक संताप और अशांति तले अहर्निश कुचले जाते पिता को असमय ही कालकलवित होते देख भी उसका ह्रदय न पसीजा था..

तीनो बहनों को भी वह इस प्रकार नियंत्रित करती थी कि जब कभी भी उनका मन अपनी विमाता के ममत्व पर पिघलने को होता था, पल में उस आवेग को अपने समझाइश की झाडू से बुहार वह उनके मन के घृणा के पौध को लहलहा देती थी.. चारों के मन से वितृष्णा निकालने के उपक्रम में विमाता ने क्या न किया. इनका घर बसाने को उन्होंने अपने देह के गहने चुन चुन कर हटा दिए, आधे से अधिक खेत बारी निपटा दिए ,पर फिर भी वह इनके मन में अपने लिए छोटा सा एक कोना नहीं निकाल पाई...

और एक दिन जैसे ही उसे पता चला कि जिस देश में वह रह रही है,वहां के संविधान ने उसे यह अधिकार दिया है कि वह पिता की संपत्ति के टुकड़े कर अपना हिस्सा उगाह सकती है, अपनी बहनों को समझा बुझा फुसला कर वह मायके लेती गयी और अब तक की बची खुची संपत्ति के पांच भाग करा, अपने हिस्से के घर घरारी और खेत बारी बेच, अपने उस सौतेले भाई को उस स्थिति में पहुंचा दिया जिसमे कि वह अपने जनम को कोसता.. परिवार नातेदार और गाँव घर वाले सब उसके खिलाफ एकजुट होकर लड़े थे यह लड़ाई, पर विजय उसे ही मिली ,क्योंकि देश का कानून उसके साथ था.

दुहरी जीत हुई थी उसकी .एक तरफ जहाँ उसने अपने बाल बच्चों के सुखद भविष्य हेतु इतना सारा धन संचित कर लिया था ,वहीँ लगे हाथों विमाता को भी वह आघात दिया था जिससे उबर कर अपने प्राण बचा पाना उसके लिए संभव न था.. जिस विमाता को उसने जीवन भर समस्त समस्याओं का जड़ माना, बिना कोई अस्त्र शस्त्र चलाये उसके प्राण लेने में वह सफल हो गई थी.वर्षों संघर्ष के उपरांत उसके अवसान से उसके प्रतिशोध को पूर्णाहुति मिली थी..

पर कलपते हुए अंतिम हिचकी के साथ विमाता भी ईश्वर से एक विनती कर गयी थी-

"हे ईश्वर !!! इन बच्चियों का घर, बाल बच्चों और धन धान्य से सदा पूर्ण रखना और कभी न कभी इन्ही के द्वारा न्याय अवश्य करना .."



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10.5.11

मन के माने -


(भाग-३)


ठाकुर जी ने त्यागा अपना मंदिर आ दिन भर डोलते रहते थे सेवक के संग संग..उनसे पूछ पूछ उनके पसंद के ज्योनार तैयार करता सेवक तो ठाकुर जी भी हर काम में उसकी मदद करते..दो जने मिलते तो झटपट निपट जाता सारा काम ..और जैसे ही सेवक निपटता,ठाकुर जी उसे साथ लेकर तरह तरह के खेल खेलने में व्यस्त हो जाते..जिस सेवक ने कभी जाना ही नहीं कि बचपन क्या होता है, मुरलीधर के साथ बालपन का स्वर्णिम सुख लूट रहा था..

कुछ दिनों तक तो लीला आश्रम प्रांगण में ही सिमटी रही पर धीरे धीरे यह बाहर भी निकली...अब दोनों जने आश्रम की गायों, ढोरों आदि को ले दूर जंगल में निकल जाते और उहाँ पहुँच जो ठाकुर जी बंसी की धुन छेड़ते तो जंगल के सभी जीव जंतु आकर इन्हें घेर लेते..जल्दी ही जंगल के कई चरवाहे आकर इनके मित्र बन गए और फिर नित्यप्रति ही मंडली आश्रम में जीमने लगी..सब जने जमा होते आ खूब पूरी कचौड़ी उड़ाई जाती..

मजे तो खूब थे,लेकिन गड़बड़ी यह हुई कि बाबा जी का साल भर के लिए जमा किया हुआ राशन पानी का स्टाक बीस बाइस दिन जाते जाते झाँय हो गया..सेवक घोर चिंतित कि अब ठाकुर जी को क्या खिलाया जाय..इधर ठाकुर जी का खुराक भी चार गुना हो गया था..जब तब सेवक से किसी न किसी आइटम की फरमाइश किया करते थे..अनाज का जुगाड़ कहाँ से किया जाय, इसका कोई आइडिया नहीं था बेचारे को..अंत में उसने युक्ति निकाली.. अक्सर ही वह देखता था, बाबा एकादशी या कोई अन्य तिथि बताकर फलाहार या उपवास किया करते थे..अब उन्हें उपवास तो नहीं करवा सकता था , पर आश्रम में फल मूल इतने थे कि फलाहार के नाम पर आराम से कई दिनों तक इनपर गुजर हो सकता था..तो अगले दिन से कभी एकादशी तो कभी कोई और तिथि बताकर वह ठाकुर जी को तरह तरह के फल जुटाकर खिलाने लगा.उनके जो संगी साथी आते ,उन्हें भी फलाहार ही कराता..पर हाँ,इतना था कि अपने लिए वह इन फलों का न्यूनतम उपयोग किया करता, ताकि अधिकाधिक समय तक इनसे काम चला सके..

महीने भर के जगह पर सवा महीने लगा दिए बाबा जी ने वापस आने में और तबतक तो यह हालत हो गई थी कि कई दिनों से ठाकुर जी को फल जिमाकर सेवक खुद केवल जल पर ही दिन काट रहा था..बाबा जी के इन्तजार का एक एक घड़ी उसको पहाड़ लग रहा था..जैसे ही बाबा जी को उसने देखा,उसके जान में जान आई.भागकर वह बाबा के चरणों में लोट गया..पर उसकी जीर्ण स्थिति देख बाबा चिंतित हो गए..उन्हें अंदेशा हुआ कि कहीं सेवक को किसी रोग वोग ने तो नहीं धर लिया..

बाबा ने पूछताछ शुरू की और जो कारण यह जाना कि अन्न के बिना सेवक की यह हालत है..कुल भण्डार निपट चुका है...बाबा को अपने कानो पर विश्वास नहीं हुआ. लम्बे डग भर वे भण्डार में पहुंचे..बात सत्य थी..बाहर नजर घुमाई तो देखा पेड़ों पर फूल बतिया के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं..बाबा परेशान कि ऐसा कैसे हो सकता है कि एक वर्ष का अन्न महीने भर में कोई खा जाय ,आ और तो और फलों से लदे रहने वाले बगीचे में पेड़ों पर बतिया भी न बचे..

तरह तरह की आशंकाओं से बाबा का दिमाग भर गया. कड़ककर उन्होंने सारा हिसाब माँगा ...और जो भी था,पर सेवक की इमानदारी पर कभी किसीने शक न किया था.अपने पर इल्जाम लगता देख सेवक तिलमिला उठा और बताने लगा कि कब कैसे क्या खर्च हुआ..ठाकुर जी ने कब क्या खाया और उनके दोस्तों ने कितनी दावतें उड़ाई..बाबा कड़के..क्या कहा,ठाकुर जी ने सब खाया..कैसे खाया...ठाकुर जी कैसे खा सकते हैं ???

सेवक के आँखों से आंसू झरने लगे..बाबा का पारा सातवें आसमान पर ..एक तो चोरी,ऊपर से रो के दिखा रहा है..बाबा दहाड़े ..ठाकुर जी पर इल्जाम लगाता है..ठाकुर जी खाते हैं,चल खिला कर दिखा ठाकुर जी को..देखूं कैसे खाते हैं ठाकुर जी..यह कहकर उन्होंने रास्ते के चने चबेने वाली पोटली फेंकी सेवक की ओर..थाली में उसे सजाकर सेवक पहुंचा ठाकुर जी के मंदिर..दिल तो उसका चाक चाक हुआ जा रहा था पर चबेना पाते ही सबसे पहले उसके दिमाग में यह आया कि चलो अच्छा हुआ बाबा की पोटली से ठाकुर जी के खाने का इंतजाम हो गया ,नहीं तो कई दिन से बेचारे फलाहार पर ही समय काट रहे थे.. उत्साहित मन वह ठाकुर जी को खिलाने पहुंचा..उसने सोचा , चलो पहले प्रभुजी को यह खिला दिया जाय..फिर तो आपै आप वे मेरी गवाही दे ही देंगे, मुझे कुछ कहने की जरूरत ही कहाँ रहेगी.

पर यह क्या, सामने परोसी थाली, इतने दिन से अन्न को तरस रहे ठाकुर जी पर आज वे अन्न को हाथ ही नहीं लगा रहे..खूब अनुनय विनय की सेवक ने, पर प्रभु होठों पर मुरली धरे पत्थर की मूरत बने हुए..सेवक परेशान कि ये क्या बात हुई..रोज तो मांग मांग कर परेशान कर देते थे और आज ये सामने परोसी थाली छोड़कर मूरत क्यों बने हुए हैं..और उधर बाबा, आपे से बाहर..अपने हाथ की छडी ले वे पिल पड़े सेवक पर..उसे झूठा, चोर ,धोखेबाज़ ,मक्कार और न जाने क्या क्या कहने लगे..अपने आप को वे ठगा महसूस कर रहे थे, क्योंकि सेवक पर अपार विश्वास किया था उन्होंने.. क्रोध के अतिरेक ने उनका धैर्य क्षमा वैराग्य, सब बहा दिया था..

सेवक रोता जाता था और अपने को बेक़सूर बताता जाता था. उसका दिल अलग फटा जा रहा था कि देखो जिसकी इतने दिन से इतने मन से सेवा की, जो मुझे दोस्त दोस्त कहते न थकता था, उसके सामने मेरी सब गति हो रही है,मुझे चोर धोखेबाज ठहराया जा रहा है और वह चुपचाप खड़ा सुन रहा है..माथा पीट पीटकर वह रोने लगा..और तब प्रभु प्रगटे और भोजन की थाल लेकर खुद भी खाने लगे और सेवक के मुंह में भी डालने की चेष्टा करने लगे..हवा में लटका थाल ,हवा में जाता हुआ कौर तो बाबा जी को दिखा पर आधार उन्हें न दिखा..

लेकिन उन्हें समझते देर न लगी कि सेवक ने झूठ नहीं कहा था..प्रभु ने सचमुच सेवक की सेवा प्रत्यक्ष होकर स्वीकारी थी...अब चूँकि उनकी आँखों पर माया और अविश्वास का चश्मा चढ़ा हुआ था, तो ठाकुर जी का साकार रूप दीखता कैसे ..कितने अभागे हैं वे और कितना भाग्यवान है सेवक..रोम रोम में रोमांच भर आया बाबा के..आँखों से अविरल अश्रुधारा बरस पड़ी..कातर भाव से कह उठे, प्रभु,मुझपर भी दया करो, मुझे भी दर्शन दे दो प्रभु...

और जब मन ने समस्त आवरण उतार प्रभु दर्शन और मिलन की उत्कट अभिलाषा की बाबा ने, भक्ति शिखर पर पहुँच कातर याचना की ... प्रभु नयनाभिराम हो उठे..विह्वल हो उठे बाबा. आज जन्म सार्थक हो गया था उनका. आज उन्हें समझ में आया था कि आजतक वे प्रभु की जो सेवा करते थे, वह धार्मिक कर्मकांड मान करते थे,जिससे उनकी आध्यात्मिक उन्नति होती..उनके मन मस्तिष्क ने यह कभी माना नहीं था कि प्रभु साकार रूप में भी भक्तों के बीच उन जैसे ही बनकर रहते हैं...और जब माना नहीं था तो इस असंभव की अभिलाषा भी उन्होंने कभी नहीं की थी.लेकिन सेवक, उसको उन्होंने जो कहा सेवक ने निर्मल भाव से उसे मान लिया और उसके मन के विश्वास ने निराकार को साकार कर दिया..


त इस तरह कथा हुई संपन्न...

इतिशुभम !!!


हम अक्सर कहते सोचते रहते हैं, अमुक अमुक बुराई हम छोड़ना चाहते हैं,यह यह अच्छा करना चाहते हैं,ऐसा अच्छा बनना चाहते हैं,पर क्या करें ,हमसे हो नहीं पाता.. कुल्लमकुल हथियार डाल देते हैं पहले ही.. याद नहीं रख पाते कि मन के माने हार है,मन के माने जीत.पहले मन को कन्विंस कर के अपने अन्दर के बुराई,कमजोरी का समूल नाश करने का यदि हम प्रण ले लें ,तो पत्थर के ईश्वर यदि साकार हो सामने उपस्थित हो सकते हैं,तो ऐसा क्या है जो हम नहीं कर सकते..

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28.4.11

मन के माने -

(भाग -)
ढेर दिन तक लिखाई पढ़ाई से किनारे रहो तो दिमागी हालत एकदम से भोथराये गंदलाये काई कोचर आ जलकुम्भी से युक्त उस पोखरिया सी हो जाती है जो ढेर दिन तक बिना पानी के आवक जावक,आमद खर्चा के सीमित परिधि में कैद रहे.. विचार प्रवाह भी ढेरे दिन तक कुंद बाधित रहे तो दिमाग का हालत कुछ ऐसा ही बन के रह जाता है..और दीर्घ अंतराल उपरांत इससे उबरने का कोशिस करो भी तो बुझैबे नहीं करता कि शुरुआत कहाँ से किया जाय...का पढ़ा जाय, का लिखा जाय....भारी भारी कन्फ्यूजन !!!

पर जो हो, निकलना तो पड़ेगा ही इससे..तो करते ऐसा हैं कि इससे उबरने को ऊ नुस्खा आजमाते हैं,जो माइंड रिफ्रेश करने ,अनमनाहट भागने के लिए हम बचपन में किया करते थे. छुटपन में जब कभी मन ऐसे ठंढाता सुस्ताता था, इसका उंगली पकड़, इसको खिस्सा कहानी का स्वप्निल संसार में ले जा के घुमा आते थे, आ बस एक बार उधर से हो के ई आया नहीं कि कई कई दिन तक एकदम चकचकाया रहता था.. अब ऐसा है कि ई काम हम अकेले अपने आप में भी कर सकते हैं..पर का है कि चित्त को जबतक उत्तरदायित्व का रस्सा से कस न दीजिये, इसका सुस्ती और फरारीपना ख़तम नहीं होता... इसलिए इसको ई समझाए हैं कि खिस्सा आपको अपने लिए मने मन नहीं दोहराना है,बल्कि स्रोता समाज को सुनना है,आ कथावाचक का कर्तब्य तब समाप्त होता है जब खिस्सा समाप्त हो जाय..

त चलिए अब फालतू का बात बंद, आ सीधे खिस्सा शुरू :-

तनिक पुराने ई उ ज़माने का खिस्सा है जब जल्मुक्त धरती पर जितने बड़े भूभाग में बस्ती बसा रहता था, उससे बीस तीस गुना बड़े भाग में जंगल पहार पसरा रहता था..आमजन बस्तियों में और समाज को दिशा देने वाले, आत्मा परमात्मा आ सत्य संधान में लगे रहने वाले साधु संतजन जंगलों में रहा करते थे..त ऐसे ही किसी बस्ती के बाहर दूर तक पसरे जंगल में छोटा सा पर फल फूलों से लदकद गाछ वृच्छों से घिरे अतिमनोरम, अतिपावन आश्रम में बाबा रामसुख दास जी का बसेरा था.. बाबा पहुंचे हुए संत थे..उनका पुन्य प्रताप आ सात्विकता ऐसा था कि आस पास का पूरा क्षेत्र पावन पुन्य तीर्थ बन गया था..वहां पहुँच मनुष्य तो क्या हिंसक पशु भी हिंसा भाव भूल परम शांति पाते थे.. माया के मारे लोग यदा कदा बाबा के आश्रम में पहुँच उनसे आशीर्वाद आ मार्गदर्शन ले जीवन सुखी सुगम बनाते रहते थे...

लेकिन जमाना कोई भी हो,अच्छे बुरे लोग हर समय संसार में हुआ करते हैं आ सात्विक धार्मिक लोग अपने आस पास घटित होते गलत को देख सदा ही दुखी उदास खिन्न ह्रदय समय को कोसते समय काटते रहते हैं.. ऐसे ही असंतुष्टों में माता लक्ष्मी के कृपापात्र सेठ धनिकराम भी थे ...घोर धार्मिक प्रवृत्ति के सेठ जी पर पता नहीं कितने जन्मों का वांछित संचित था कि उनको पत्नी, पुत्र सभी घोर धर्मभ्रष्ट मिले. असल में हुआ ई कि अधवयसु में बियाह किये थे और बियाह से पाहिले छानबीन किये नहीं कि चित्त प्रवृत्ति से स्त्री है कैसी. बस गरीब घर की कन्या की सुन्दरता देखी और उसे गुदड़ी का नगीना मान शीश पर सजा लिया. उनकी धारणा थी कि अभाव और दरिद्रता स्वाभाविक ही चरित्र को उदात्त बना देती है,ह्रदय को विशालता देती है.. पर विपरीत हुआ. स्त्री निकली घोर तामसिक प्रवृत्ति की.. उसको जो सबसे पहले खटका वह पति का धार्मिक सुभाव ही था. पति को अपने अनुरूप बनाने की उसने यथेष्ट चेष्टा की पर जब विफलता उसके हाथ लगी तो उग्र विद्रोहिणी ने अपने साथ साथ अपने संतानों को भी घोर पथभ्रष्ट बना लिया...पुत्रों के बड़े होने तक तो सेठ जी ने किसी तरह सब निबाहा पर उमर के साथ साथ माता के संरक्षण में उनकी उद्दंडता ऐसी बढ़ी कि धनिकराम जी अपने जीवन से ही ऊब गए..एक दिन जब अति हो गया तो उन्होंने घर त्याग दिया और जीवन त्याग देने के विचार से घर से निकल पड़े. घर से निकलते समय अपनी तरफ से तो उन्होंने सर्वस्व त्याग दिया था, पर विगत बीस वर्षों से छाया की भांति उनका साथ निभाने वाले उनके विश्वासपात्र सेवक सेवकराम ने उनका साथ ठीक इसी तरह न छोड़ा जैसे जीवन की अंतिम बेला तक धर्म मनुष्य का साथ नहीं छोड़ता..

बस्ती बस्ती , जंगल जंगल भटकते भटकते दोनों बाबा रामसुखदास के आश्रम में पहुंचे.. धनिकराम आश्रम क्या पहुंचे, कि जैसे उनका पाप का कोटा ओभर आ पुन्न का कोटा ऑन हो गया...ऊ तो एकदम्मे जैसे नया जनम पा लिए. बाबा का सात्विक सानिध्य उनके लिए अलौकिक था....अध्ययन मनन, धर्म चर्चा, पेड़ पौधे तथा पशुओं की सेवा, आगंतुकों की सेवा आदि में स्वर्गिक आनंद पाते हुए उन्होंने अपना बचा समय अत्यंत सुखपूर्वक बिताया और फिर अपने प्रिय सेवक को बाबा को सौंप एक दिन स्वेच्छा से अपना जीर्ण शरीर त्याग गोलोकगमन किया..

सेवकराम जन्मजात घोषित अभागा था..जन्मते ही माता जहान छोड़ चली थी और जो छः बरस का हुआ तो पिता भी माँ का साथ निभाने ऊ लोक को निकल पड़े.. जाते जाते अच्छा बस इ किये कि नन्हे सेवक को सेठ धनिकराम को सौंप गए ...पुश्तों से सेवक राम का परिवार धनिकराम परिवार का सेवक रहा था.. नमकहलाली उनके रगों में था.. नन्हे सेवक ने भी जनमघूंटी में ही यह पिया था कि इस धरती पर साक्षात दिखने वाले भगवान् के प्रतिनिधि, मालिक ही होते हैं.. भगवान् दुनिया के पालनहार और मालिक इनके पालनहार.. इसलिए इनके डाइरेक्ट भगवान् मालिक हैं.. मालिक का कहा हर वाक्य उसके लिए भगवान् का वाक्य था, उपेक्षा या संदेह का तो कोई प्रश्न ही न था..

माता के जाने का तो उसको ज्ञान न था, पिता गए तो खूब रोया था, क्योंकि लोग बाग़ रो रहे थे और उसे समझा रहे थे कि पिता जिस दुनिया में गए हैं, वहां से कभी लौटकर नहीं आयेंगे..लेकिन धनिकराम का जाना वह सह नहीं पा रहा था..धनिकराम एक साथ ही उसके माता पिता और मालिक सभी थे..हालाँकि मालिक ने उसकी निष्ठा बाबा को ट्रांसफर कर दी थी, इसलिए टहल बजाने में वह कोई कोताही नहीं बरतता था, पर दिल का घाव तो घाव ही था, ऐसे कैसे तुरंत मिट जाता...

पर भाग का बलवान था सेवक ..धनिकराम चले भी गए तो जो वास उसे दे गए थे, वह बड़े बड़े दुखों के पहाड़ को पल में ढाह देने वाला था..ऊपर से बाबा का स्नेहिल व्यवहार..जल्दी ही सेवक के हृदयासन पर वे विराजित हो गए और पूरे प्राणपन से वह आश्रम तथा बाबा की सेवा टहल में लग गया.. उसके आसरे बाबा एकदम निश्चिन्त से होते चले गए. ठाकुर जी की पूजा और भोग आदि लगाने के कार्य के अतिरिक्त सभी उत्तरदायित्व सेवक ने अपने पर ले लिया..ऐसा भक्त चेला पा बाबा भी अपने भाग्य को सराहने लगे..


क्रमशः :-

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17.7.09

बेटी - लक्ष्मीस्वरूपा....

पिताजी की चिट्ठी आई थी,माँ की तबियत कुछ खराब है,तुमसे मिलने की जिद ठाने हुए है,हो सके तो दो दिन के लिए आकर मिल जाओ...चार दिन बाद से थर्ड ईयर के पेपर शुरू होने वाले थे...मैं ऊहापोह में था कि क्या करूँ...लेकिन माँ का मोह सब पर भारी पड़ा और मैं स्टेशन की तरफ निकल पड़ा...सोचा ,जल्दी से जाकर पहली ही ट्रेन पकड़ लूँ और मिलकर कल रात तक वापस आ जाऊं...स्टेशन की तरफ तेज कदमो से बढा चला जा रहा था, दस फर्लांग की ही दूरी बची होगी कि ट्रेन खुल गयी...बदहवास सा मैं दौड़ पड़ा...पर भीड़ में घिरा मैं आगे बढ़ने में असमर्थ रहा और मेरे सामने से सीटी बजाती हुई ट्रेन निकल गयी....


दिमाग सीटियों के शोर से भर गया.....बार बार लगातार किसी न किसी प्लेटफार्म पर सीटियों का जैसे सिलसिला सा चल निकला....उस कनफोडू शोर से बचकर भागने के लिए मैं तेजी से स्टेशन से बाहर की ओर भागा... कि अचानक किसी के सामन से मेरा पैर टकराया और गिरते हुए मैं सीढियों से नीचे चला गया ........


तभी अचानक आँख खुली....अपने चारों तरफ आँखें फाड़ फाड़ कर देखने लगा...सारे दृश्य गायब हो चुके थे.....मैं स्टेशन पर नहीं अपने कमरे में था और अपने बिस्तर से नीचे गिरा हुआ था....लेकिन सीटियों का शोर अब भी वैसा ही था...तभी तंद्रा कुछ भंग हुई और आभास हुआ कि यह शोर सीटियों का नहीं बल्कि लगातार बजते कॉल बेल का था ... दीवार पर लटके घडी पर नजर डाली तो देखा रात के सवा दो बज रहे हैं....


आशंकित सा आगे बढ़ बत्ती जलाते हुए मैंने दरवाजा खोला....एक औरत और मर्द आकर पैरों से लिपट गए....हतप्रभ सा होते हुए मैं पीछे हटने लगा...बड़ी मुश्किल से किसी तरह मैंने उनसे अपने पैर छुडाये....वे खड़े हुए तो पहचाना, गली के अगले छोर पर रहने वाले अम्मा और झुमरू हैं....दोनों घिघिया रहे थे....डाक्टर बाबू रधिया को बचा लो,नहीं तो वह मर जायेगी.


पता चला दो दिनों से उसे जचगी का दर्द उठा हुआ था,पर दाई जचगी करवा नहीं पा रही थी और अब हारकर उसने राधा को अंग्रेजी डाक्टर को दिखने की बात कही थी....मैंने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की कि मैं इसमें कुछ नहीं कर पाउँगा ,वे लोग राधा को लेकर तुंरत अस्पताल के लिए निकल जाएँ...पर उन्होंने ऐसी जिद ठान रखी थी कि आखिर झुककर मुझे वहां जाना ही पड़ा....


जाकर देखा तो सचमुच राधा की स्थिति बहुत खराब थी...बच्चे की धड़कन सुनने की कोशिश की तो वह भी बिलकुल क्षीण हो रही थी....मैंने उनसे अपनी लाचारी बताई और कहा कि अब ज़ल्द से जल्द अस्पताल ले जाकर ओपरेशन करवाए बगैर उन्हें बचाने का कोई उपाय नहीं...


उन लोगों की स्थिति देख मेरा दिल पसीज गया और फिर मैंने अपने एक सीनियर के बड़े भाई के नर्सिंग होम में बात कर किसी तरह केस लेने को उन्हें मनवाया...मेरी निगरानी में दो ओटो रिक्शाओं में बैठकर वह काफिला मेरे संग नर्सिंग होम पहुंचा....


प्रारंभिक जांच के बाद कहा गया की अभी दस मिनट के अन्दर अगर ओपरेशन न किया गया तो जच्चा बच्चा दोनों में से किसी का भी बचना नामुमकिन था...और ओप्रेशन के लिए तुंरत ही पच्चीस हजार रुपये जमा करना था.....


मैं पेशोपेश में पड़ गया....मेरे पास पचीस हजार क्या ढाई सौ रुपये भी न थे और इतनी बड़ी रकम इनके पास होने की कोई सम्भावना मुझे नहीं दिख रही थी...मेरे माथे की शिकन को देख अम्मा ने मानो सब ताड़ लिया....कहने लगी, पैसे की कोई चिंता नहीं बाबू, मैं तीस हज़ार रुपये साथ लेकर आई हूँ ...और जरूरत पड़ी तो भी दिक्कत नहीं सब इंतजाम हो जायेगा,बस आप माई बाप लोग मेरी बच्ची को बचा लीजिये......


सीनियर डाक्टर से रिक्वेस्ट कर मैं भी आपरेशन थियेटर में गया....दो दिनों तक दाई ने जो युक्तियाँ लगायी थी,इससे केस बड़ा ही कॉम्प्लीकेटेड हो गया था...बच्ची के गले में नाड़ इस कदर फंसी हुई थी कि वह बच्ची का दम घोंट रही थी....लग रहा था जैसे गर्भ में ही उसे फांसी की सजा मिल गयी थी..बड़ी मुश्किल से बेजान पड़ी उस बच्ची में जान लायी गयी.....


सबकुछ कुशल मंगल देख मैंने रहत की साँस ली.....डॉक्टर जबतक स्टिचिंग तथा सफाई में लगे हुए थे,मैंने सोचा बाहर जाकर इनके अपनों को यह खबर दे आऊँ....जैसे ही बाहर निकला सबने आकर मुझे घेर लिया...मैं थोडी दुविधा में था,कि बेचारों का इतना पैसा लग भी गया और तीसरे संतान के रूप में फिर से लडकी होने की खबर इन्हें मायूसी ही देगी.......मैंने धीमे से कहा.....चिंता की कोई बात नहीं,सब कुशल मंगल है,राधा को लडकी हुई है.......


मैं अचंभित रह गया.......सब लोग खुशी से झूम उठे थे,एक दुसरे के गले लग रहे थे....अम्मा की आँखों में खुशी के आँसू झड़ी बने हुए थे.....खुशी से कांपती हाथों से मेरा हाथ पकड़ बोली.. ...बचवा तुम्हारे मुंह में घी शक्कर.......हमारे घर तो लछमी आई हैं....तुम हमारे लिए भगवान् हो....सदा सुखी रहो बेटा...खूब बड़े डाक्टर बनो....


सब निपटते निपटते सुबह हो गयी थी....घर पहुंचकर हाथ मुंह धो, मैं कॉलेज होस्टल की ओर निकल पड़ा...वहां अपने सहपाठी अशोक के साथ अगले पेपर की तैयारी और विषय चर्चा करते करते समय का ध्यान ही न रहा.....जब पेट में भूख के मडोड़े पड़ने लगे तो समय का ध्यान आया...रात के दस बज चुके थे...वहीँ पर खाना खा मैं करीब साढ़े ग्यारह बजे अपने घर पहुंचा....


दरवाजे के बाहर अम्मा बैठी थी..पढाई के चक्कर में यह बात दिमाग से निकल ही चुकी थी...मुझे लगा कहीं कुछ और असुविधा तो नहीं हो गयी,जो अम्मा इतनी रात गए दरवाजे के बाहर बैठी है...

मैंने चिंतित होकर पूछा ...क्या अम्मा फिर से कोई परेशानी हो गयी क्या...उसे हमेशा इसी नाम से पुकारा जाते सुना था, सो यही संबोधन दिया.


अम्मा बोली....अरे नहीं बचवा ,कोई परेशानी नहीं...तुम तनिक किवाडी तो खोलो, फिर बताती हूँ...थोडा तो मैं झिझका ,पर फिर भी उस आवाज में जो आग्रह, अपनापन और हर्ष था ,मैं कुछ कह न सका...


दरवाजा खोलते ही वह अन्दर आई और उसने मेरे हाथ पकड़ एक घडी मेरे हाथों में पहना दी और मिठाई का एक डब्बा मेरे मेज पर रख दिया.....मैं अचकचा गया....यह क्या है अम्मा?????


अम्मा बोली, बचवा हम गरीब का यह भेंट तो तुम्हे स्वीकारना ही पड़ेगा,नहीं तो हमें किसी कल भी चैन नहीं पड़ेगा...अगर तुम न होते तो हमारी रधिया निश्चित ही मर जाती और उसके साथ वह लछमी भी मर जाती....अब हम लोगों को कोई डाक्टर बैद अपने यहाँ घुसने थोड़े ही न देता....तो बोलो तुम भगवान् हुए की नहीं....


मैं संकोच में गडा जा रहा था....मैंने कहा...अरे नहीं अम्मा डाक्टर के लिए सब मरीज मरीज ही होता है....उसे भेद करना नहीं सिखाया जाता....यह तो हम सब का फर्ज है,इसके लिए इतना महंगा तोहफा मैं नहीं ले सकता....तुम लोग ऐसे ही जिस नर्क में रह रहे हो,मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा हूँ...इसपर यह तो मैं नहीं ही ले सकता...मुझे तो खेद इस बात का है कि मैं आर्थिक रूप से तुमलोगों की कोई मदद न कर पाया.....


हम दोनों ही भावुक हो गए थे...हालाँकि इस घटना से पहले हम दोनों में कभी कोई बात नहीं हुई थी,जब कभी कोई बीमार पड़ता तो झुमरू मेरे पास आकर दवाई लिखवा जाता था,इसके आगे हमारा कोई परिचय न था, पर नितांत अपरिचित होते हुए भी जैसे हम एक दूसरे की भावनाओ और स्थिति से पूर्णतः भिज्ञ थे...वे लोग जानते थे कि किस मजबूरी में मैं इस गंदी बस्ती में रह रहा हूँ और मैं भी जनता था कि वे लोग कैसी जिन्दगी जी रहे हैं....


मैंने अपने जीवन का लक्ष्य ही यह बना लिया था कि पढाई ख़तम कर जब मैं डॉक्टर बन जाऊंगा तो इन जैसे उपेक्षित लोगों की सेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता दूंगा.... पता नहीं कैसे बिना बताये ही मेरी यह भावना उन तक पहुँच गयी थी....मेरे लिए उनके मन में क्या था ,यह मैं उनकी आँखों में सहज ही दूर से आते जाते पढ़ पाता था...


उस क्षण भावुकता में मेरी बुद्धि ऐसे सठिया गयी थी कि बिना कुछ सोचे समझे मैं पूछ बैठा.....

लेकिन अम्मा, तुंरत के तुंरत इतने रुपये का इंतजाम तुमने कैसे कर लिया,मैं तो घबरा ही गया था कि पैसों का इंतजाम कैसे होगा.........


अम्मा ने कहा...बेटा जब ऊपर वाला जीवन देता है तो उसे चलाने के रस्ते भी दे देता है....अब देखो न,एक रधिया ही तो है जिसे भगवान् ने इतनी खूबसूरती दी है कि दो बच्चे बियाने के बाद भी सबसे ज्यादा कमाई वही करती है..एक तरफ सातों लड़कियों की कमाई है और दुसरे तरफ अकेले रधिया की कमाई है....उसने बच्चे भी ऐसे खूबसूरत दिए हैं ,जिनसे हमारा घराना रौशन है.


हमारे घर की कमाऊ पूत तो वही है....उसे ऐसे कैसे मर जाने देते...और ये पैसे भी तो उसी के भाग के हैं,जो उसके इलाज में लगे....चार दिन पहले ही उसकी बड़ी लडकी निशा की नथ उतराई में पच्चीस हजार रुपये मिले थे,जो इस उल्टे समय में काम आ गए....


मेरे दिमाग की नसें फटी जा रही थीं, मेरी आँखों के सामने उन बच्चियों का चेहरा घूम गया,जिन्हें आते जाते गली में खेलते हुए देखा करता था....मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया.........लेकिन अम्मा वो तो अभी इतनी छोटी सी मासूम बच्ची है....


अम्मा बोली....बच्ची काहे की बाबूजी,बारह बसंत देख लिए हैं उसने....

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12.6.09

गुनाहगार

भगवान् ने अपनी पसंद से माँ बाप संतान या रिश्तेदार चुनने का हक किसी को नहीं दिया है,यदि दिया होता तो ऐसे असंख्य लोग होते जिन्होंने अपने से जुड़े लोग बदल लिए होते....

अपनी मेहनत और काबिलियत के बल पर गुरबत में भी इंजीनियरिंग और एम् बी ए की डिग्रियां हासिल कर गुप्ता अंकल ने ऊंचा ओहदा हासिल किया और इसी ऊंचे ओहदे के बल पर आंटी जैसी स्मार्ट मेधावी लड़की पत्नी रूप में पाया यहाँ तक तो सब उनके बस में था पर आगे की जिन्दगी में बहुत कुछ ऐसा घटा जिनपर उनका कोई वश नहीं चला॥

गुप्ता आंटी अपने समय में बड़ी ही मेधावी और महत्वकांक्षी थीं लेकिन हाथ आये इतने अच्छे रिश्ते को उनके अभिभावक छोड़ना नहीं चाहते थे,सो उन्होंने आंटी के आगे पढने और बढ़ने के सारे सपनो को विराम दे उनके हाथों बड़े साहब की पत्नी बनने का सौभाग्य और मिसेज गुप्ता नाम की डिग्री पकडा दी।

गुप्ता आंटी भी कम जीवट न थी। जबतक गुप्ता अंकल कलकत्ते में रहे, शादी और बेटे राजीव के जन्म के बाद भी आंटी ने हार नही मानी और बेटे को स्कूल भेजने के बाद उन्होंने अपनी पढाई का सिलसिला जो कि इन्टरमीडियेट के बाद रुक गया था फिर से चलाया और एक बच्चे को लेकर भी उन्होंने ग्रेजुएसन और ला की पढाई पूरी की.एक अच्छे फार्म में उन्होंने प्रैक्टिस भी शुरू कर दी थी.लेकिन इसी बीच अंकल को एक नए आ रहे फैक्टरी में बहुत ही ऊंचे पोस्ट का आफर मिला और अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए उन्होंने उस कम्पनी को ज्वाइन कर लिया॥

यह नयी फैक्टरी ऐसे उजाड़ बियावान में बसाया जा रहा था जिसके सबसे नजदीक के शहर से दूरी डेढ़ सौ किलोमीटर थी...अंकल के सितारे तो बुलंद हो गए पर आंटी का अपने पैरों पर खड़े होने,अपनी पहचान बनाने के सपनों पर फिर से धूल पड़ गया। राजीव को होस्टल में डाल दिया गया था. आंटी के पास अब कोई इंगेजमेंट नहीं बचा था॥वे बुरी तरह डिप्रेस रहने लगीं.अंकल को और कोई उपाय न सूझा तो उन्होंने आंटी को फिर से मातृत्व रूपी इंगेजमेंट दे दिया...

यहीं रागिनी का जन्म हुआ था।अंकल और हमलोग पडोसी थे.उनके बड़े से बंगले के बगल में हमारा छोटा बंगला.मेरे पापा अंकल से दो पोस्ट नीचे थे.इस अंतर को ऑफिस से लेकर घर तक पूरी तरह मेंटेन किया जाता था.न ही हम दोनों परिवार में बहुत अधिक घनिष्टता थी और न ही दूरी.

रागिनी मुझसे तीन साल छोटी और मेरी छोटी बहन बबली से साल भर बड़ी थी।दूध सी गोरी चिट्टी बड़ी बड़ी आँखों वाली रागिनी किसी की भी आँखें बांध लेती थी पर उम्र के साथ साथ स्पष्ट अनुभव किया जाने लगा कि उसका मेंटल और फिजिकल ग्रोथ एक सामान नहीं हो रहा था. उनके सामने हमारी बबली थी जो इतनी तेज थी कि जैसे लगता था मानसिक परिपक्वता में वह रागिनी से न जाने कितने साल बड़ी है॥

आंटी ने न कभी अपना हारना बर्दाश्त किया था और न ही वो अपने बच्चों का किसी भी बात में किसी से भी कम होना बर्दाश्त कर सकती थीं।रागिनी की कमजोरी भी वह बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर पाती थीं॥जब उन्होंने डाक्टरों को दिखाना शुरू किया और उन्होंने भी इस बात से सहमति जताई कि रागिनी पूर्णतः मंदबुद्धि तो नहीं पर उसका दिमागी विकास सामान्य बच्चों से कुछ धीमा जरूर है..तो भी आंटी यह मानने को तैयार न थी कि उनकी बेटी में इस तरह की कोई कमी हो सकती थी.

वो बहुत ही फ़्रसटेटेड रहने लगीं।उनका सारा गुस्सा अंकल और रागिनी पर निकलता था.जैसे जैसे रागिनी बड़ी हो रही थी अंकल आंटी की बढती चिंताओं के साथ डाक्टरों के पास उनका भाग दौड़ भी बढ़ रहा था.पर कोई बहुत अधिक सुधार होता नहीं दिख रहा था॥दस बारह वर्ष की उम्र में भी उसकी बुद्धि पांच छः वर्ष के बच्चे से अधिक न थी.बहुत ही सरल और भोली थी वह.बल्कि कहा जाय कि न ही यह दुनिया इस सरल भोली लडकी के लायक थी और न ही इस समझदारों की दुनिया में इसकी सच्ची क़द्र थी..

भोलेपन में की गयी उसकी हरकतें बड़ी अजीब हुआ करती थीं। वह करीब ग्यारह साल की थी.एक दिन वह मेरे साथ कहीं जा रही थी. उसने मुझसे कहानी सुनाने की जिद की तो मैं उसे एक कहानी सुनाने लगी.आंटी के यहाँ एक बड़ा सा कुत्ता था जो कि रागिनी का बेस्ट फ्रेंड था॥रागिनी को कुत्ते बहुत पसंद थे सो मैं उसे कुत्तों की ही कहानी सुनाने लगी......अचानक उसे क्या हुआ कि उसने मुझे कहा...दी, पता है डॉगी कैसे शूशू करता है और जबतक मैं उसे पकड़ती सम्हालती,सड़क किनारे पैंटी खोलकर लैंप पोस्ट के ऊपर पैर उठाकर उसने शू शू कर दिया..आते जाते लोग हंसते हुए खड़े हो गए.मैंने झपटकर उसे पकडा और लगभग घसीटते हुए घर ले कर आई और घर पहुंचकर उसे एक चांटा लगाया.बेचारी गाल सहलाती रह गयी कि इसमें बुरा क्या किया उसने....

दुनियादारी से पूरी तरह अनजान ,इतनी भोली और मासूम थी वह कि बहुत सी सामान्य बातें वह समझ ही नहीं पाती थी।पढाई की बातें भी उसे समझ नहीं आती थी.अब चूँकि कंपनी का ही स्कूल था तो हरेक क्लास में किसी में साल भर किसी में दो साल तक फेल होने पर अंकल का लिहाज कर उसे प्रोमोशन दे दिया जाता था.पर अंकल आंटी बहुत ही चिंतित थे रागिनी के भविष्य को लेकर...

संयोग से एक बार कंपनी ने अपने कर्मचारियों के मेंटल फिटनेस के लिए सात दिवसीय योग साधना शिविर आयोजित कराया..आयोजन इतना सफल रहा कि अगले महीने इसे कर्मचारियों के परिवार वालों के लिए भी आयोजित कराया गया.माँ पापा के कहने रागिनी को भी आंटी शिविर में ले गयीं...
आश्चर्यजनक परिणाम मिले...आजतक वर्षों से खिलाई जा रही सारी दवाईयां जो न कर सकी इस सात दिन के शिविर ने वह चमत्कार कर दिखाया॥

योग गुरु ने दावा किया कि अधिकतम साल डेढ़ साल में वे रागिनी को पूरी तरह ठीक कर देंगे...अंकल आंटी के खुशी का पारावार न रहा था।लेकिन समस्या यह थी कि तो अस्थायी शिविर था.योग आश्रम में अकेले रागिनी को लम्बे समय तक छोड़ना भी मुश्किल था॥

अंकल ने हाइयर मैनेजमेंट से बात कर यह व्यवस्था करवा दी कि योग आश्रम का एक योग प्रशिक्षक वहीँ कम्पनी के पे रोल पर बहाल कर दिया जायेगा जो रेगुलर बेसिस पर स्कूल में योगा क्लासेस लिया करेगा और कम्पनी के कर्मचारियों तथा उनके परिवारवालों के लिए भी नियमित कार्यशालाएं आयोजित करवाया करेगा।

जब से रागिनी इस योग क्लास को रेगुलर अटेंड करने लगी थी,उसमे अप्रत्यासित सुधार होने लगा था।पढाई में भी अब उसे बहुत दिक्कत नहीं रही थी॥योगा टीचर तो अंकल आंटी के लिए भगवान् बन गए थे.अंकल आंटी उन्हें अपने सर माथे पर बिठाते थे.वे जब चाहें उनके घर आ जा सकते थे..एक तरह से रागिनी के गार्जियन वही हो गए थे. बीच बीच में रागिनी को उनके साथ विशेष प्रशिक्षण के लिए आश्रम भी भेज दिया जाता था.

रागिनी का ऐसा काया पलट हो रहा था की उसका एक नया ही रूप सब देख रहे थे। दो साल पहले मैं तो शहर के कालेज होस्टल में रहने लगी थी पर बबली से रागिनी के बारे में बहुत कुछ सुनती रहती थी.बबली की खूब बनती थी उसके साथ.

उन्ही दिनों जब मैं होस्टल में थी,एक दिन अप्रत्यासित रूप से माँ ने फोन पर ऐसी खबर दी कि मैं अन्दर तक हिल गयी।

रागिनी ने आत्महत्या कर ली थी।अपने कानो पर मुझे बिलकुल भी भरोसा न हुआ॥माँ ने बताया कि सुबह करीब दस बजे गुप्ता आंटी ने फोन कर बबली को बताया कि रागिनी उसे बुला रही है॥बबली जब उनके घर पहुँची तो आंटी ने कहा कि रागिनी नहाने गयी है और उसे इन्तजार करने को कहा है..आधे घंटे इन्तजार करने के बाद भी जब रागिनी बाहर नहीं आई तो आंटी ने बबली से कहा कि जाओ उसे आवाज दो..बबली ने बाथरूम के दरवाजे के बाहर से उसे तीन चार आवाजें लगायी पर अन्दर केवल पानी गिरने की आवाज आती रही रागिनी ने कोई जवाब नहीं दिया...

बबली चिढ़कर आंटी के पास जाकर बोली कि आंटी वह पता नहीं और कितने देर नहायेगी,मैं जा रही हूँ निकलने पर उसे कह दीजियेगा वही मेरे पास आ जाय।आंटी ने बबली को साथ लेकर यह कहते हुए कि चलो उसे डांटती हूँ बाथरूम तक ले गयी और कई आवाजें लगायी.जब अन्दर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्होंने दरवाजा ठेला और अन्दर देखा कि रागिनी के गले में चुन्नी बंधी हुई थी जिसका छोर वेंटिलेटर में बंधा हुआ था.

केस पुलिस तक पहुँची। कालोनी क्या आस पास के पूरे इलाके में खबर तूफ़ान सा फ़ैल गया॥केस के गवाह में बबली का नाम भी फंसा और उसके दोस्तों के फेरहिस्त में मेरा नाम भी आया था.पूरी सम्भावना थी कि पुलिस मुझसे भी पूछताछ करती.माँ ने इसी वजह से मुझे फोन किया था कि अगर पुलिस आकर मुझसे होस्टल में या घर आने पर पूछती है तो उन्हें बस इतना ही बताना था कि रागिनी अपने पढाई में पिछड़ने को लेकर बहुत ही हतास और फ़्रसटेटेड रहा करती थी और हमेशा सुसाईट की बातें किया करती थी,हो सकता है इसी वजह से उसने ऐसा किया हो....

यह सरासर गलत था ...मैं जितना जानती थी रागिनी को कभी उसे हतास परेशान नहीं देखा था या ऐसा कोई भी कारण नहीं महसूस किया था जो उसे आत्महत्या करने को मजबूर करता...फोन पर माँ से बहुत पूछा कि इस अनहोनी की वजह क्या हो सकती है,पर माँ ने कुछ नहीं बताया।

मेरे दिमाग में सवालों ने भूचाल मचा दिया था।किसी तरह विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस रागिनी को बात बात पर इतना डर लगता था,जो पिछले कुछ सालों से अपने सफलता से इतनी खुश रहने लगी थी, जिसे आंटी के फ्रस्टेशन और गुस्से को सहने की आदत पड़ी हुई थी और ये कभी भी उसे विचलित नहीं करते थे... वह आत्महत्या जैसा कदम कैसे उठा सकती थी......

जिस वेंटिलेटर से लटकने की बात हो रही थी,वह वेंटिलेटर तो पांच ही फिट ऊपर था,उसपर कैसे लटका जा सकता था....माँ ने कहा फंदा गले में लगा था और वह बाथरूम में बैठी हुई थी...ऐसे मरना कैसे संभव था...मेरा सर फटा जा रहा था इन सवालों के जवाब पाने को....

भागी हुई मैं घर पहुँची थी।बबली इस हादसे से इतनी डर गयी थी कि उसे कम्पोज का इंजेक्सन देकर कई दिन तक सुलाए रखा गया था।माँ पापा तथा डाक्टरों की सख्त हिदायत थी कि बबली के सामने उस हादसे का कोई जिक्र न किया जाय. मैं तो अपने सवालों के जवाब पाने के लिए बस छटपटा कर रह गयी थी, उससे कुछ पूछने का रास्ता ही बंद हो गया था....

केस को तो किसी तरह पुलिस के साथ गंठजोड़ कर निपटा दिया गया था...पर जो सवाल उठे थे उन्हें कैसे खामोश किया जा सकता था।सालों तक वह हवाओं में तैरता रहा॥

घटना के सात महीने बाद गुप्ता अंकल ने यह कंपनी छोड़ एक विदेशी कम्पनी ज्वाइन कर लिया और सपरिवार भारत को अलविदा कह वहीँ जा बसे।

कई महीनो बाद एक दिन अचानक माँ पापा और राजन अंकल जो कि गुप्ता अंकल के सहयोगी थे और जिन्होंने गुप्ता अंकल के केस के निपटारे में बड़ा ही महत्वपूर्ण रोल निभाया था,उनकी फुसफुसाती आवाजें मेरे कानो में पड़ गयी और उन कुछ वाक्यों ने मेरे सारे सवालों के जवाब मुझे दे दिए...

पोस्ट मार्टम में खुलासा हुआ था कि रागिनी तीन महीने की गर्भवती थी और उसकी शरीर की कई हड्डियाँ टूटी हुई थी।शरीर पर गहरे घावों के निशान पाए गए थे.... पर जो पोस्ट मार्टम रिपोर्ट दर्ज हुई उसमे से ये सारी बातें लाखों रुपये के झाडू से साफ़ कर दिए गए थे॥फाइनल रिपोर्ट में इस केस को सिंपल आत्महत्या का केस करार दिया गया था...

एक मासूम जान चली गयी ..........असली गुनाहगार कौन था ........

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29.5.09

भोज !!!!

कहाँ नहीं मनौती मानी गयी।अंगरेजी डाक्टर, बैद हकीम, गंडा ताबीज क्या क्या न किया गया॥आखिर शादी के बारहवें बरस में भाग बना और देवकी बाबू के घर चिराग जला था...सरोज के विकल ममत्व को स्नेह अवलंबन मिला....नन्हा सोनू दोनों के जीवन का सार था.दोनों पति पत्नी की आँखे आठों पहर उसी पर लगी रहती थी..

और लड़का था भी ऐसा कि देखने वालों की आँखें बाँध लेता था...ऐसा कोई दिन न होता जब सरोज उसकी दीठ न उतारती हो।उसका बस चलता तो उसे आँचल तले ही छुपाये रखती. पर हाथ पैर वाले बच्चे को आँचल तले कितने दिन रखा जा सकता था,बच्चा भाग दौड़ में लग जाता और आशंकित सरोज कभी भी निश्चिंत होकर उसके बाल क्रियाओं का मन भर सुख न ले पाती......

चार साल तक तो सरोज ने उसे घर खलिहान और आँगन तक में सीमित रखा,पर आखिर ऐसे ही सारी उम्र घर में घुसाए तो न रखा जा सकता था॥शिक्षा की बात आई तो सरोज ने जिद ठान दी कि सोनू स्कूल नहीं जायेगा,बल्कि उसके शिक्षा की व्यवस्था घर पर ही कर दी जाय। बड़ी मशक्कत से देवकी बाबू ने सरोज को समझा बुझाकर बच्चे का दाखिला स्कूल में करवाया.

देवकी बाबू नहीं चाहते थे कि उनका बच्चा भी उनकी तरह जमींदारी की इस डूबती नैया के भरोसे अनपढ़ बैठा रहे॥अपने लाल के लिए उनकी आँखों में बहुत बड़े बड़े सपने थे..उन्होंने सोच रखा था कि किसी भी तरह हाई स्कूल की शिक्षा के लिए वे उसे शहर के सबसे बड़े स्कूल में डाल देंगे और अपना पूरा सामर्थ्य इस बच्चे के उज्जवल भविष्य निर्माण में लगा देंगे..

ज्यों ज्यों दिन बीतते गए उनका सोनू अपनी प्रतिभा से उनके सपने को और भी पुख्ता करता गया।उसके प्रतिभा से स्कूल से मास्टर भी अचंभित रहा करते थे. छठी कक्षा तक पहुँचते पहुँचते सोनू स्कूल की शान बन गया था.

लेकिन विधाता भी कैसे खेल खेला करता है, कि कभी कभी उससे निष्ठुर संसार में कोई नहीं लगता। स्कूल के आहते में ही आम का एक विशाल पेड़ था. उस साल वह फल से लद सा गया था.नीचे के सभी फल तो बच्चों ने चढ़कर या डंडे पत्थर मारकर बतिया में ही झाड़ लिए थे,पर ऊपर की टहनियों पर जो कुछ फल बच गए थे,बच्चों को हमेशा चुनौती दे चिढाया करते थे.... रोज ही बच्चों में दावं लगाया जाता कि जो भी बच्चा ऊपर वाली टहनियों से बीस फल तोड़ लाएगा वही स्कूल का लीडर ,सबसे बहादुर माना जाएगा.

फिर क्या था,इसी होड़ में एक दिन सोनू चढ़ गया ऊपर वाली टहनियों पर॥नीचे से सारे बच्चे ललकार रहे थे और सोनू फुनगियों की तरफ बढा चला जा रहा था।हरेक आम के साथ उसका उत्साह बढा ही चला जा रहा था.पंद्रह आम तोड़ लिए थे उसने .लेकिन जैसे ही सोलहवें की ओर बढा, एक कमजोर टहनी ऐसे टूटी कि वह सोनू के लिए यमराज बन गयी.सर में इतनी भारी चोट आई कि जमीन पर गिरने के बाद उसके मुंह से आवाज तक नहीं फूटी....एक पल में देवकी बाबू और सरोज का वह सुन्दर संसार लुट गया.

देवकी बाबू के घर में पूरा गाँव उमड़ आया था।देवकी बाबू के कुछेक गोतिया लोगों को छोड़ शायद ही कोई ऐसा था जिसकी आँखें नहीं बह रही थी.सरोज की नजर जैसे ही अपने बच्चे के लहूलुहान शरीर पर पडी बदहवास भागती उसे गोद में झपट लिया...लेकिन उसके ठंढे पड़े शरीर ने जैसे ही उसे यथार्थ बोध कराया तो वह अपने होशो हवाश खो बैठी.उसके बाद तो किसी तरह जैसे ही उसे होश में लाया जाता,एक चित्कार के साथ फिर से वह अपने होश गवां बैठती.देवकी बाबू बेहोश भले न हुए थे,पर बेटे के मृत शरीर के आगे जो पत्थर होकर बैठे,तो लग ही नहीं रहा था कि उनके काठ बने शरीर में प्राण बचा हुआ है.

दोपहर को घटना घटी थी और सूरज डूबने को आया था...सबके समझाने बुझाने पर किसी तरह अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हुई।देवकी बाबू का माथा तो सुन्न पड़ा था,गोतिया दियाद तथा ग्रामीणों ने ही मिलकर सारी तैयारियां कीं.अंतिम विदाई के ह्रदय विदारक दृश्य ने सबके कलेजे दहला दिए थे॥

दाह संस्कार के अगले दिन सभी सम्बन्धियों पुरोहितों तथा गणमान्य ग्रामीणों की देवकी बाबू के घर बैठकी हुई। आगे के कार्यक्रम की रूपरेखा पर विचार शुरू हुआ. कुछ भलेमानसों ने जैसे ही राय दी कि दुःख की इस घड़ी में क्रिया कर्म में कोई ताम झाम न किया जाय,बाकियों ने उन्हें इतना दुरदुराया कि उन्होंने चुप रहने में ही भलाई समझी.लोगों का तर्क था कि अब चूँकि सोनू का जनेऊ हो चुका था, इसलिए उसका सारा कर्म एक वयस्क सा ही होना चाहिए. इन विरोधी स्वरों में देवकी बाबू के अलग हो चुके भाइयों का स्वर सबसे मुखर था.

यह तो उनके लिए एक सुनहरा अवसर था,जिसके द्वारा वे अपना सारा गुप्त वैर निकाल मन ठंढा कर सकते थे।एकसाथ मानसिक और आर्थिक आघात दे वे अपना अगला पिछला सब हिसाब चुकता कर सकते थे,जो जमीन विभाजन के समय से उनके मन में पल रहे थे॥इस सुनहरे अवसर को वे भला क्योंकर गवांते.

क्रिया कर्म दान इत्यादि की लम्बी फेरहिस्त बनी।लगभग दो घंटे तक इस बात पर विचार या कहें वाद विवाद चलता रहा कि चार दिनों के भोज में किस दिन कौन सा व्यंजन रखा जायेगा, कितने किस्म की कौन कौन सी मिठाई का प्रावधान रखा उचित होगा॥ पूरी परिचर्चा ऐसे हो रही थी जैसे वह सोनू के विवाहोत्सव का अवसर हो.मिठाइयों के स्वाद ने सबकी बुद्धि और जीभ को ऐसे मोहित किया कि उनका हर्ष परिचर्चा में परिहास ले आया.हंसी ठठा से पूरा माहौल गमगमा गया.

उसी समय देवकी बाबू की आँखों के आगे दृश्य घूम गया कि उनका सोनू पेड़ से गिर रहा है और जबतक वे उसे अपने हाथों में थामते कि वह जमीन पर गिरकर लहूलुहान हो गया है। देवकी बाबू चिंघाड़ मारकर बिलख पड़े और संज्ञाशून्य हो कर जमीन पर गिर पड़े.माहौल अचानक ही बदल गया.पानी के छींटे और हवा कर किसी तरह उन्हें होश में लाया गया. लोगों ने दबी जुबान से एक दुसरे को परिचर्चा को विराम देने को खबरदार किया॥अभी इसे आगे बढ़ाने का उचित माहौल नहीं रह गया था.. अगले दिन बैठक के निर्धारण के साथ उस दिन की सभा बीच में ही स्थगित हो गयी..

दो पुस्त पहले तक बड़ी भारी जमींदारी थी उनकी। जहाँ तक नजर दौडाओ उनके ही खेत नजर आते थे...खलिहान में फसल के अम्बार लगे रहते थे...कमला नदी का आर्शीवाद था.साल में तीन फसल हुआ करते थे.उनके ज्यादातर जमीन कमला जी के किनारे ही थे॥लेकिन समय के साथ सब तहस नहस होता चला गया.नालायक निकम्मी पीढी ने केस मुक़दमे तथा अय्यासी में सारा धन कमला जी के सतत प्रवाहित धार सा पानी कर बहा दिया...

आज बस सब ऊपरी दिखावा भर रह गया था॥अन्दर से सभी खोखले थे। यह भी जो आज बचा था देवकी बाबू के पिताजी रामनारायण बाबू सूझ बूझ के कारण ही बचा था.उन्होंने अपनी जिन्दगी में ही अपने बेटियों को निपटाकर सातों बेटों को फरिया दिया था.. पर बाँट बखरा के बाद सातों भाइयों के हिस्से जो जमीन आई थी,वह इतनी न थी कि उसके भरोसे ठीक से पहना ओढा या शान बघारा जा सकता था.

जब हैसियत थी तब इन्होने मरनी जीनी शादी ब्याह सबमे बेहिसाब पैसे लुटाये थे, कुत्ते बिल्लियों के भी धूम धाम से ब्याह रचाए थे॥पर आज वह सब करना नामुमकिन था।आज हैसियत के हिसाब से काम क्रिया का मतलब था,कम से कम छः सात लाख की चोट.देवकी बाबू अपने हिस्से की लगभग सारी जमीन बेच देते तो ही इतनी रकम का इंतजाम हो सकता था.

लेकिन जमीन बेचना भी क्या इतना आसान था।लोग इसी ताक में तो रहते थे.सख्त जरूरत के ऐसे मौकों पर खरीदार के हजार नखरे होते थे.मजबूरी में औने पौने दाम पर लोगों को जमीन बेचना पड़ता था या फिर सूदखोरों के पास चक्रवृद्धि ब्याज पर जमीन गिरवी रखना पड़ता था,जिसके मूल और सूद चुकाने में पीढियों के तेल निकल जाते थे.

एक तो बेटे के मौत का गम ऊपर से इतना बड़ा खर्चा....देवकी बाबू विक्षिप्त से हुए जा रहे थे।अपने मुंह से अपने आर्थिक स्थिति की पोल तो खोल नहीं सकते थे...सो उन्होंने सोचा कि मानसिक स्थिति का हवाला देकर किसी तरह पंचों को मानाने का प्रयत्न करेंगे॥

अगले दिन की बैठक में उन्होंने पंचों के सामने जैसे ही अपना अनुनय रखा कि वर्तमान मानसिक अवस्था में उनका मन जरा भी गवाही नहीं दे रहा इस आयोजन को वृहत रूप में करने का॥कि सारे लोग इस बात पर उखड गए।पीढियों से चली आ रही परंपरा, रीत रिवाज के ये ही तो रक्षक थे.माना कि दुःख बहुत बड़ा था,लेकिन इसका यह तो मतलब नहीं था कि लोकाचार से मुंह मोड़ लिया जाय..एक से एक किस्से निकलने लगे कि कैसे फलाने ने अपने फलाने के आकस्मिक निधन पर क्रिया कर्म में कितने शान से खर्च किया ,फलाने ने नहीं किया तो उसके खानदान पर कितनी विपदा आई.आखिर इस आसमयिक मौत से आत्मा अतृप्त होकर जो भटकेगी,उसके शांति का रास्ता इन्ही कर्मो से होकर तो निकलेगा.जितने अच्छे ढंग से कर्म होगा आत्मा उतनी ही तृप्त होगी.

आखिर इनके तर्क और क्षोभ के सामने देवकी बाबू ने अपने हथियार डाल दिए और अंततः उन्हें कूबूलना ही पड़ा कि अभी इस समय इस रूप में यह सब करने में वे आर्थिक रूप से पूर्णतः अक्षम हैं। अब अगर पञ्च सहारा दें,इस विषम समय में हाथ पकडें,तभी वे यह सब संपन्न कर सकते हैं.

बस क्या था,सांत्वना और सहानुभूति का दौर सा चल निकला॥वाणी में मधु घोलते हुए सबने समवेत स्वर में अपने विशाल ह्रदय और अपनापन का भरोसा दिया..देवकी बाबू को लताड़ भी लगायी कि उनके रहते वे अपने आप को ऐसा असहाय कैसे समझ सकते हैं...

पुराहितों और पंचों ने पूरी सहृदयता से आयोजन की विस्तृत रूपरेखा बनाई ।खर्च का हिसाब लगाया गया और सबने अपना अपना भाग तय कर दिया॥कुछ ही पलों में पूरे पैसों का इंतजाम हो गया था..सबकी राय थी कि कहीं किसी बात की कोई कमी उनके रहते न रखी जाय..

सब कुछ तय कर तृप्त ह्रदय से चाय नाश्ते के साथ सभा संपन्न हुई.एक एक कर लोग उठ उठ कर जाने लगे.जाते समय व्यक्तिगत आश्वासन देने के बहाने सब एकांत में देवकी बाबू से मिलते गए और फुसफुसाते हुए उनके कान में अपने पसंदीदा जमीन के कागजात निश्चित रूप से लेकर आने की ताकीद करते गए...

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18.3.09

प्रतिष्ठा !! (कहानी) भाग - 2

रामेश्वर अपनी ही बेटी के खून से अपने हाथ रंग आये थे...तेरह बरस में शादी और गौने से पहले ही साल भर के अन्दर विधवा हुई बेटी का दुःख उनसे देखा नहीं गया और उसके मोह में पड़कर घर परिवार सबकी बात काटते हुए उन्होंने अपनी अपार सहृदयता दिखाते हुए उसे पढाई में लगा दिया था.लडकी पढने में बहुत तेज़ थी.हर साल अपने कक्षा में अव्वल आती रही और बारहवीं के बाद उसने आगे पढ़नी चाही.रामेश्वर बाबू ने शहर में कालेज में उसका दाखिला करवा दिया.पर यहीं उनसे भारी चूक हो गयी.

लडकी को शहर की हवा लग गयी..परंपरा संस्कार और परिवार के इज्ज़त को ताक पर रखकर उसने अपने ही कालेज के प्रोफेसर से प्रेम की पींगें बढा ली, जो एक नीच जात का लड़का था.और तो और उस कमजात के साथ मुंह काला कर, खुलेआम उससे प्रेम का एलान कर रही थी और उससे ब्याह करने की जिद ठानी हुई थी.

रामेश्वर बाबू ने ममता और सहृदयता दिखाते हुए उसके जिंदगी सवारने के लिए आगे पढने की पूरी सहूलियत और छूट जरूर दी थी....लेकिन इसका यह मतलब न था कि उसे परंपरा और परिवार की प्रतिष्ठा को भी छिन्न भिन्न करने देते....लड़की ने जो अपनी सफ़ेद साडी के साथ साथ उनके परिवार के आबरू को दागदार करने की कोशिश की थी और वह भी एक नीच जात के लड़के के साथ..यह असह्य और अक्षम्य था.....

पत्नी के माध्यम से जब उन्हें इस बात की खबर लगी तो वे गुस्से से एकदम बौरा गए..... दहाड़ते हुए, बन्दूक लेकर घर से निकल पड़े लड़के को मारने....लेकिन किसी तरह बाँध छेककर परिवार वालों ने उन्हें रोका......

कितनी मुश्किल से तो रामेश्वर की पत्नी का अपने पति को मुखिया बनने, दोनों भाइयों और परिवार के बीच कभी न पाटी जा सकने वाली खाई बनाने का सपना साकार होने जा रहा था, इसे किसी कीमत पर वह खोना नहीं चाहती थी.. रामेश्वर के हाथ पैर धरकर किसी तरह उनसे हथियार छीना गया.उन्हें समझाया गया कि इस नाजुक समय में दिमाग से काम लेना चाहिए.सबका मत यही बना कि अभी अपनी लडकी को ही किसी तरह समझा बुझा या धमकाकर चुप करा दिया जाय,लड़की का पेट धुलवा दिया जाय और चुनाव निपटते ही लड़के को ठिकाना लगा दिया जायेगा...फिर न रहेगा बांस ,न बजेगी बंसी.

नाजायज बच्चा गिराना, विधवाओं के नाजायज सम्बन्ध या उम्रदराजों की भी लम्पटता, कोई अजूबी घटना न थी गाँव के लिए. लेकिन, खुलेआम चुनौती देकर ऐसा कुछ भी करने की हिमाकत धनाढ्य सवर्ण पुरुषों को छोड़ किसीमे न थी. विधवा का पुनर्विवाह या अंतरजातीय विवाह आज भी घोर कुकर्म था गाँव वालों के लिए...इस नाजुक मौके पर अगर विरोधी के हाथों यह मुद्दा लग जाता तो परिवार की प्रतिष्ठा और चुनाव,दोनों का बंटाधार हो जाता...

अब समझाते तो क्या, जैसे ही उन्होंने बेटी को धमकाना शुरू किया,वह भी थी तो आखिर उनका ही खून और साथ ही उच्च शिक्षा ने उसे कूपमंडूकता से बाहर निकाल अपने जीवन और अधिकारों के प्रति पर्याप्त सजग कर दिया था.लडकी मौके की नजाकत को न समझ पायी और भिड गयी बाप के साथ...

फिर तो बात बढ़ते बढ़ते इतनी बढ़ गयी कि रामेश्वर बाबू ने जो हाथ में आया उसीसे पीट पीट कर उसका कचूमर निकाल दिया और उसे मौत के मुंह में पहुंचाकर अपने क्रोध की प्यास बुझाई.....शरीर और विद्रोह के उस स्वर को टुकड़े टुकड़े कर परंपरा और प्रतिष्ठा बचा लिया था उन्होंने...

घर में कोहराम मच गया... बात ऐसी न हुई थी जो चाहरदीवारी के अन्दर ही छुपी रह जाती..क्रोध का ज्वार शांत हुआ तो परिणाम के भय ने आतंकित कर दिया....भयाक्रांत, क्षुब्ध और उदिग्न ह्रदय को अपने रक्षक और तारनहार रूप में केवल बड़ा भाई ही दिखा...आज भी वे मानते थे कि भाई के प्रभाव और औकात के आगे उनका अपना व्यक्तिव कितना बौना है.सो वे भाग चले आसरे की ओर.उस घड़ी दुर्घटना से अचंभित आतंकित किन्कर्तब्यविमूढ़ बाकी सदस्यों को भी तारनहार बिन्देश्वर बाबू ही दिखे थे...

मुसीबत की इस घड़ी ने पारस्परिक वैमनस्यता को अप्रासंगिक कर दिया था. आंसुओं में मन के सारे मैल बह गए थे. दोनों भाइयों के ह्रदय अभी एक से धड़क रहे थे,अंतर केवल इतना था कि जहाँ रामेश्वर अपनी सुध बुध खोये हुए थे वही बिन्देश्वर तेजी से अगले कदम के बारे में सोच रहे थे.....समय ठीक न था,जो भूल हो चुकी थी,उसके बाद एक भी चूक महाविनाशक हो सकती थी....

राजनीति बिन्देश्वर बाबू के खून में बसी थी...हवाओं का रुख मोड़ना उन्हें अच्छी तरह आता था. अविलम्ब घर के सभी सदस्यों को इकठ्ठा किया और दुर्घटना की जानकारी देते हुए परिस्थिति की गंभीरता और विकटता से अवगत कराया.परिस्थिति से निपटने के लिए जो योजना उन्होंने बनायीं थी,उसके अनुसार उन्होंने सबको जिम्मेदारियां सौंपी और सबके साथ रामेश्वर को संग ले उसके घर पहुंचे...

वहां भी सबको समझा बुझाकर स्थिति की कमान उन्होंने अपने हाथ ले लिया....घंटे भर के अन्दर बिरादरी के सभी गणमान्य प्रतिष्ठित लोगों का जुटान कर लिया गया और मामले को ऐसे परोसा गया,जिसके तहत यह बात सामने आई कि किसी दूसरे इलाके वाले ने उनके गाँव की प्रतिष्ठा को जो मैला किया,उसे अपने ही संतान के रक्त से धोकर इस महान परिवार ने समूची बिरादरी का उद्धार किया था...

बिन्देश्वर बाबू ने मामले को ऐसा घुमाया कि बिरादरी वालों के नजर में वे दोनों ही भाई पूज्य बन गए....बिन्देश्वर बाबू ने इसी बहाने बिरादरी वालों को जमकर लताडा जिनके आपसी फूट के वजह से छोटी जाति वाले आज इतने मजबूत हो गए थे....इन लोगों को सेट कर आश्वस्त हो जाने के बाद उन्होंने चुनाव के अन्य उम्मीदवारों जगदेव पासवान,हबीब मियां तथा गाँव के अन्य सभी रसूखदार लोगों को बुलवा पंचायत बैठाई.

पूरी घटना को वहां इस तरह रखा गया कि सभी लोग एक मत से दोनों भाइयों के इस कृत्य की सराहना करने लगे और लगे हाथ फैसला हुआ कि, शहर के उस कमजात छोकरे ने, जिसने कि एक विधवा की आबरू पर हाथ डाला, उसे उसके इस कुकृत्य की सजा मृत्युदंड के रूप में अविलम्ब दी जाय और पूरे समाज को सीख देने के लिए दोनों की चिता एक साथ जलाई जाय.....

जब तक यह पागल और बौराई हथियारों से लैस भीड़ उस दुस्साहसी आशिक को पकड़ने उसके घर पहुँचती,रामेश्वर बाबू की छोटी बेटी के मार्फ़त उसतक यह खबर पहुँच चुकी थी और वह वहां से जिला एस पी से मदद की गुहार लगाने निकल चुका था...

दोपहर होने को आया था पर युवक पकड़ में न आया था.तो बिन्देश्वर बाबू की राय पर सर्व सम्मति से फैसला हुआ कि अब शव का अंतिम संस्कार कर दिया जाय.लड़के को बाद में देख लिया जायेगा...

उस अभागन की अर्थी रसूखदार सवर्ण पिता के कन्धों पर भार नहीं बल्कि उनके प्रतिष्ठा को चार चाँद लगा गयी थी.समाज की परंपरा और परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए अपनी ही बेटी का बलिदान देना, कोई छोटी उपलब्धि तो नहीं थी.

चिता जलनी शुरू ही हुई थी कि किसी ने आकर खबर दी कि युवक पुलिस दल सहित एस पी साहब को लेकर वहां आ रहा है और किसी भी समय वहां पहुँच सकता है...

उस समय वहां की एकता देखते ही बनती थी. उत्साही उन युवकों ने, जो अबतक उस विधवा के नाम पर लार टपकाया करते थे,गाँव की प्रतिष्ठा बचाने के लिए अनान फनान में सभी जीपों मोटरसायकिलों तथा आस पास के घरों से पेट्रोल तथा मिट्टी के तेल इक्कट्ठे कर चिता के मद्धिम आग को लपटों में बदल दिया और सभी ने एक स्वर से दोनों भाइयों का जयकारा लगते हुए आश्वस्त किया कि एस पी साहब आयेंगे तो क्या,उन्हें पूरे गाँव से एक गवाह नहीं मिलेगा...किसी प्रकार की चिंता न करें वे....

और यही हुआ......एस पी उन रसूखदारों द्वारा सेट कर लिए गए.......महीने भर के अन्दर बेचारा युवक गायब कर दिया गया...बिन्देश्वर और रामेश्वाए बाबू के घर एक हो गए थे और सबसे बड़ी बात बिन्देश्वर बाबू भारी मतों से चुनाव जीत गए थे......



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16.3.09

प्रतिष्ठा !! (कहानी) भाग- 1

गिनती के पच्चीस दिन ही तो बचे थे चुनाव के.दिन भर की दौड़ धूप गोष्ठी और मगजमारी के बाद थक कर चूर हो चुके थे बिन्देश्वर बाबू. हवा का जो रुख अभी दिखाई पड़ रहा था,वह बहुत अधिक उत्साह जनक नहीं था.कुछ भी अनुमान लगाना मुश्किल था. अब पहले वाली बात न रही थी.उनकी धाक और दबंगता के आगे खुलकर भले कोई सामने आने की हिम्मत अब भी न रखता था ,पर भीतर ही भीतर सुलगती आग कभी भी भड़क कर विकराल विनाशक बन सकती थी. राजपूतों,सवर्णों के आपसी मतभेद तथा अंहकार और छोटी जातिवाले में अधिकार के प्रति सजगता और उनके संगठित हो रहे शक्ति ने परिदृश्य बहुत बदल दिया था।

जगदेव पासवान और हबीब मिया, जिन्हें उन्होंने ही अपोजिसन में खडा किया था, उन्हें विरोधी ताकतों ने उकसाकर भितरघात करने को बहुत हद तक राजी कर लिया था. इन सबने भी अन्दर ही अन्दर अपने लिए अच्छी खासी जमीन तैयार कर ली थी....कुछ घर राजपूत ,ब्रह्मण और यादव से तो वो निश्चिंत थे, पर बाकी सभी के साथ दुसाध,भुइंयाँ,कुर्मी कहार,चमार, मुसलमान आदि वोटर किसके सर जीत का सेहरा बंधेंगे, अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा था..मुंह पर सभी सबको आश्वासन दे रहे थे,पर अंततः करेंगे क्या,यह कोई नहीं जानता था.

पिछले तीन टर्म से बिन्देश्वर बाबू निर्विरोध चुनाव जीत रहे थे. इतना ही नहीं अपने अपोजिसन के केंडीडेट भी वे ही तय किया करते थे और उनकी जप्त जमानत की भरपाई भी वही किया करते थे.इस इलाके में सदियों से उनके पुरखों ने ही राज किया था और परम्परानुसार घर का बड़ा बेटा ही राज के लिए उत्तराधिकारी हुआ करता था,भले जमींदारी समाप्त हो प्रजातंत्र का यह पंचायती चुनाव ही क्यों न हो. हमेशा से इसी परिवार का मुखिया उत्तराधिकारी नियत करता आ रहा था. लेकिन सदियों की यह परंपरा इसबार ध्वस्त हो गयी थी.पत्नी साले और इनसे डाह रखने वाले कुचाक्रियों के बहकावे में आकर रामेश्वर बाबू अपने बड़े भाई बिन्देश्वर बाबू के खिलाफ खड़े हो गए थे।

बिन्देश्वर बाबू समय पहचान रहे थे और आज भाई को छोड़ कोई और अगर खिलाफत में इस तरह सामने आता और मोर्चा खोलता तो उन्हें इतना असह्य कष्ट न होता,पर आज जो अपना भाई ही परम्परा को छिन्न भिन्न कर दुश्मनी पर उतर आया था और उन सारे लोगों को जो वर्षों से इनकी एकता को खंडित कर इनके ताकत और प्रभाव को समाप्त करना चाहते थे,उन्हें सुनहरा मौका दे रहा था,यह बात उन्हें तिल तिल कर तोड़ रही थी..आज तक इस इलाके में उनके परिवार का एकछत्र शासन रहा था.लोग इतने भयाक्रांत रहा करते थे कि चाहकर भी कोई सामने आकर इनका अहित करने की नहीं सोच पाता था. पर आज तो सबको खुला अवसर मिल गया था,हंसने का भी और काटने का भी.

जनानियों के चिख चिख से तंग आकर दोनों भाइयों के सम्मिलित सहमति से जो चूल्हे अलग हुए,वह अलगौझा आज यहाँ तक आ पहुंचा था..पहले चूल्हे अलग हुए,फिर आँगन और अब दिल भी अलग हो गए थे. दोनों तरफ आग लगाने वालों को सुनहरा मौका मिल गया था. बिन्देश्वर बाबू कान के कच्चे न थे,पर कमअक्ल रामेश्वर बाबू को लोग आसानी से फुसला लिया करते थे..हालाँकि बिन्देश्वर बाबू अपने भाई की कमजोरी जानते थे और उन्हें पाता था कि उसके अधिकाँश हरकतों के पीछे उनसे वैर रखने वालों का ही हाथ हुआ करता था,पर इस तरह रामेश्वर को लोगों के हाथों कठपुतली बने इस्तेमाल होते देखना, उन्हें बड़ा ही क्षुब्ध कर जाता था..

चुनाव के नोमिनेशन से पहले तक किसी तरह घर की इज्ज़त को बिन्देश्वर बाबू ढंके हुए थे.पर रामेश्वर ने उनके खिलाफ खड़े होकर चाहरदीवारी के अन्दर के विवाद को सड़क पर लाकर खडा कर दिया था.अब तो हितचिंतकों की नजरों में भी बिन्देश्वर बाबू को व्यंग्य दीखता था.जो घर आज तक दूसरों के झगडे सुलझाया करता था,उसीके किस्से अब सारे आम चटखारे लेकर बांचे जाते थे..

बिन्देश्वर बाबू ने सोचा खुद ही चुनाव से नाम वापस लेकर घर की इज्ज़त बचा लें,पर तबतक बात इतनी आगे बढ़ गयी थी कि उनके इस फैसले के विरोध में उनके अपने परिवार और हितचिन्तक ही अड़ गए थे. एक तरह से उनके वापस मुड़ते पैर को उनके पक्षधरों ने हथियार बनाकर आगे बढा उसे सामने जमीन पर ऐसे रोप दिया था दिया था कि चाहकर भी उसे हिलाने डुलाने में वे अक्षम हो गए थे.

रात दो पहर बीत चुका था. घर में कुत्ते और पहरेदारों को छोड़ लगभग सभी सो चुके थे.पर नींद बिन्देश्वर बाबू के आँखों से कोसों दूर थी.क्षोभ चिंता क्रोध आदि आदि ने उन्हें ऐसे घेर लिया था कि नीद उनकी आँखों से पलायन कर चुकी थी.उसी समय उनके दरवाजे की सांकल बजी.आशंकित स्वर में बिन्देश्वर बाबू ने पूछा....कौन????

बाहर से पहरेदार सुखदेव ने प्रत्युत्तर में अपना नाम बताते हुए दरवाज़ा खोलने का आग्रह किया....

सुखदेव के स्वर की व्यग्रता ने बिन्देश्वर बाबू को आशंकित कर दिया..लगभग भागकर उन्होंने दरवाज़ा खोला...सुखदेव ने खबर दी कि दरवाजे पर रामेश्वर बाबू खड़े हैं और अभी तुंरत मिलने की जिद कर रहे हैं....क्या किया जाय ???

घड़ी भर तो बिन्देश्वर बाबू ऊहापोह में रहे...फिर उन्होंने रामेश्वर को बैठक में लिवा लाने को कहा...आदेश पाकर भी सुखदेव ठिठका रहा, तो उन्होंने उसे आश्वस्त करते हुए कहा....."जो भी है,भाई है मेरा....कोई बहुत बड़ा अहित नहीं कर सकता...डर मत, जाकर लिवा ला.......देखते हैं, क्या बात है "

...यह बात उन्होंने सुखदेव से कही जरूर थी, पर यह दिलासा उन्होंने अपने आप को भी दिया था, क्योंकि आज कुछ लोग दबी जुबान बिन्देश्वर बाबू को रामेश्वर से सम्हल कर रहने की सलाह दे गए थे,जिसे उन्होंने उस समय तो उन्होंने झिड़क दिया था...पर मन से पूरी तरह न झिड़क पाए थे....

बिन्देश्वर बाबू के बैठक में पहुंचने के कुछ क्षणों बाद ही रामेश्वर सुखदेव के साथ पहुँच गए...आते ही वे बिन्देश्वर बाबू के कदमो पर लोट गए और ''भैया हम बर्बाद हो गए" कहकर पैर पकड़कर फूट फूट कर रोने लगे।
बिन्देश्वर बाबू इस अप्रत्याशित स्थिति के लिए बिलकुल तैयार न थे,बुरी तरह अकबका गए और रामेश्वर को किसी तरह पैरों से खींचकर उठाकर उन्होंने खडा किया.खींचतान में रामेश्वर बाबू की ओढी चादर हट गयी थी और जब वो खड़े हुए तो उनके खून से तर कपडों को देख बिन्देश्वर बाबू बुरी तरह आशंकित हो गए...समझा बुझाकर, पानी वगैरह पिलाकर उन्होंने किसी तरह रामेश्वर बाबू को शांत किया और सारा मामला पूछा .रामेश्वर बाबू ने जो बताया, सुनकर दो पल को उनका दिमाग भी एकदम से सन्न रह गया.....

4.10.08

बुल्कीवाली (भाग - २)

देखते देखते साढ़े चार महीना निकल गया. बुल्कीवाली ने काम में कोई ढिलाई नही की थी, पर हर दिन के साथ उसकी बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी. मन प्रान तो उसका वहीँ अटका पड़ा था न..मालिक जब आए थे तो उन्होंने सब कुसल छेम ही बताया था पर कल बड़का की चिठ्ठी आई कि पारी (भैंस की बच्ची) ने न जाने क्या खा लिया था कि उसका पेट फूल गया और दस्त करते करते वह मर गई.इससे भैंसी बगद गई है,ठीक से दूध नही देती.उसका घर द्वार सब बिलट (बरबाद) रहा है उसके बिना,जल्दी वापस आ जाए..जार जार रोई बुल्कीवाली.पर इससे क्या होता.अनुराधा के जाकर गोड़ छान लिया.गिड़गिडाकर अरज किया कि अब तो सब ठीक ठाक निपट गया है,उसे गाँव भेज दिया जाए.पहले भी कई बार इस प्रस्ताव को ठुकरा चुकी अनुराधा ने जब देखा कि अब कोई उपाय नही इसे रोकने का तो फ़िर एक दूसरा दांव फेंका. छोटका को अब तक बच्चों ने हिन्दी में अ आ से ज्ञ तक और ऐ बी सी डी ज़ेड, तक सिखा दिया था.उसे पढने में इतना मन लगता था कि एक बार बता देने पर ही झट से सीख लेता था.तो अनुराधा ने इसी का चारा फेंका और समझाने लगी कि यहाँ रहकर उसका बेटा किस तरह आदमी बन रहा है. गाँव जाकर फ़िर से रार मुसहर जैसा रहेगा.यहाँ रह पढ़ लिख लेगा तो जिंदगी बन जायेगी..बच्चों से भी तो इतना घुल मिल गया है कि बच्चे उसके बिना अब कैसे रह पाएंगे.सो यदि बुलकीवाली जाना चाहती है तो जाए, पर छोटका को यहीं छोड़ जाए.उसने जो उसके लिए एक सगी माँ से भी बढ़कर करतब किया है तो उसका इतना तो फर्ज बनता ही है कि वह भी उसके बेटे को आदमी बनाने में उसकी मदद करे.

छोटका के सुनहरे भविष्य का इतना सुंदर नक्सा अनुराधा ने खींचकर बुल्कीवाली को दिखाया कि उसे भी लगने लगा सचमुच यहाँ रहने में छोटका का कितना बड़ा हित है.पर ममता और कर्तब्य में जंग छिड़ गई. ममता इतने छोटे बच्चे को अपने से अलग करने को प्रस्तुत नही थी तो कर्तब्य कहता था कि बच्चे के भविष्य से बढ़कर और कुछ भी नही.लेकिन जब छोटका भी बम्बई में ही रहने को मचल उठा तो हारकर बुल्कीवाली ने भारी मन से उसे यहाँ छोड़ने का फ़ैसला कर लिया.अनुराधा ने यह वचन दिया कि छः महीने के भीतर ही वह छोटका को लेकर गाँव आएगी और उसकी खैर ख़बर बराबर भेजती रहेगी .

जोश में छोटका ने यहाँ रहने की हाँ तो कर दी थी पर, माई के जाने के बाद से हर बात पर उसकी रोवाई छूटने लगी..आज तक कभी अपनी माई के बिना वह रहा न था.बिना माई की छाती में चिपटे उसे नींद ही नही आती थी.उसपर भी जब यहाँ बच्चों को अपनी माँ से चिपटे देखता तो उसका करेजा फटने लगता था..दो तीन दिन तक तो रोने धोने पर अनुराधा ने उसे पुचकारा ,पर बाद में यह डांट और फ़िर मार में तब्दील हो गया.


यूँ तो बुल्कीवाली के वापस जाने के पहले ही एक बाई काम पर रख ली गई थी जो सुबह सात से शाम सात बजे तक डेढ़ हजार की पगार पर रहने को राजी हुई थी.पर कहाँ बुल्कीवाली का काम और कहाँ उसका काम.कहीं कोई तुलना ही न थी. एक गोद की बच्ची, दो छोटे स्कूल जाने वाले बच्चे और समय पर दफ्तर जाने वाले पति, इन सब की जिम्मेदारियों ने अनुराधा का हाल बेहाल कर रखा था.उसपर से सप्ताह दस दिन में बिना बताये बाई का नागा मारना , इन सब ने अनुराधा का जो हाल किया सो किया , छोटका का बुरा हाल जरूर कर दिया था. बाइयों के नखरों से ऊब कर अनुराधा ने चार महीने बाद बाई रखना ही बंद कर दिया और उस छोटे से बालक पर जिम्मेवारियों का पहाड़ लाद दिया .सुबह अंधेरे जो धकिया कर उसे उठा दिया जाता सो रात के एक डेढ़ बजे तक खटते खटते उसका कचूमर निकल जाता. तिसपर हड़बड़ी में अगर कुछ गड़बड़ हो जाता, काम पूरा न होता या कुछ टूट फूट जाता तो उसके लिए एक से बढ़कर एक कठोर दंड विधान थे.जितना काम उस छोटे से बालक पर लादा गया था, बम्बई की दो बाई भी मिलकर नही निपटा सकती थी.पर इस बात का विचार कौन रखता. ईश्वर भी शायद जानबूझकर गरीब के बच्चों में वह शारीरिक और मानसिक क्षमता भरते हैं कि वह बित्ते भर का भी हो तो अमीर के सुख सुविधाओं में पल रहे बच्चे से हजार गुना अधिक जीवट होता है, तभी तो इतना सहकर भी जीता रहता है.


थके हारे महेस बाबू जैसे ही दफ्तर से आते कि अनुराधा छोटका के तथाकथित निकम्मेपन और गलतियों की कहानियो का पिटारा लेकर बैठ जाती और अक्सर ही यह होता कि लगे हाथ छोटका की तगडी धुनाई हो जाती। घर के हर सदस्य के लिए अपनी किसी भी तनाव का भडास निकलने के लिए चौबीस घंटे के लिए यह बालक उबलब्ध था. घर में हो रही हर गडबडी का जिम्मेवार वही ठहराया जाता था. सजा देकर उसे सुधारने के लिए नित नए दंड विधान बनते थे, जिसमे मार पीट के अलावे खाना पीना बंद करना से लेकर चिलचिलाती धूप में नंगे बदन नंगे पाँव खड़ा करना , देह पर गरम या बर्फ का पानी डाल देना इत्यादि इत्यादि भांति भांति के दंड निर्धारित किए जाते थे. पढ़ना लिखा, टी वी देखना या अन्य मनोरंजन तो सपना हो गया था .गाँव में तो कम से कम इतना था कि पिटने पर माई के आँचल में या भाई के गोदी में उसको जगह मिल जाती थी,यहाँ ममता नाम का कुछ भी नही बचा था. सूखकर हड्डियों का ढांचा भर रह गया था वह. पर तीन बच्चों की माता अनुराधा के मन में वह बालक रंचमात्र ममत्व नही उपजा पाता था. इन सबके बीच उसके मन की स्थिति का वर्णन शब्दों में कर पाना असंभव है.

इधर चौबीसों घंटे में से शायद ही कोई पहर होता जब छोटका की आँखें सूखी होती और उधर बुल्कीवाली का करेजा दरकता रहता. बेटे की खोज ख़बर जानने का मालिक के अलावे और कोई साधन नही था.. छः महीने में आने की बात को दो बरस हो गया था. जब मालिक मलिकाइन से पूछती तो वो अगले महीने अनुराधा बिटिया के आने की बात कहते . उसका बेटा वहां कितने ठाठ से रह रहा है, इसके किस्से सुनाते.. इधर तो ज्यादा पूछताछ करने पर अक्सर ही गालियों की सौगात भी मिलने लगी थी उसे. पर इस से वह अपने बेटे के बारे में पूछना थोड़े ही न छोड़ देती. बीतते दिनों के साथ उसका मन चिंता और आशंका की गहरी खाई में धंसता जा रहा था. .


एक बार अधीर होकर मालिक मलिकाइन के सामने जिद लगाकर बैठ गई कि उसे अनुराधा बिटिया का बम्बई का पता दे दें ,वह बड़का के साथ पूछते पाछते वहां चली जायेगी और एक नजर अपने लाल को देख आएगी. जब उन्होंने देखा यह टस से मस नही हो रही तो हजार रुपये और जल्दी आने की तसल्ली देकर यह कहकर उसे निपटा दिया इतने बड़े सहर में वह भुला जायेगी,जिनगी भर भटकती रहेगी तो भी उसके घर नही पहुँच पायेगी.और इसबार एकदम पक्का है अगले महीने बीस तरीक को अनुराधा का सपरिवार मय छोटका, यहाँ आना तय है. टिकट तक कट चुका है.कल ही तार से इस बात की ख़बर आई है. इस तरह एक बार फ़िर उन्होंने उसे टाल दिया. .


यह सब हुए बीस बाईस दिन भी नही हुआ था कि एक दिन अधरतिया में किसी ने केवाड़ी(दरवाजा) का जिंजिर खटखटाया....केवाड़ी खोला तो एकदम से भौंचक्क रह गई.सामने छोटका था,जो दरवाजा खुलते ही माँ से लिपटकर फूटकर रोने लगा.उसकी आवाज के दर्द ने बुल्कीवाली का करेजा फाड़ दिया. बेटे के बिना कुछ कहे बताये ही एक पल में उसने बेटे की पूरी पीड़ा गाथा सुन गुन ली. बुल्कीवाली बाबू रे बाबू कह दहाडें मारकर विलाप करने लगी.शोरगुल सुन बडका भी उठकर आ गया था और हतप्रभ सा सबकुछ समझने की कोशिश करने लगा.जल्दी से ढिबरी बार लाया.तभी उस आदमी ने बड़का को घर के अन्दर घसीटते हुए ताकीद की कि जल्दी से अपनी माई और छोटका को चुप कराओ नही तो अनर्थ हो जाएगा.किसीके कानोकान ख़बर हो गई तो हम सबलोग जान से जायेंगे....छोटका हमरे साथ बम्बई से भागकर आया है. बड़का सारा माजरा समझ गया और माँ के मुंह पर हाथ रखकर मुंह दबाये छोटका को भी चुप रहने की हिदायत देता हुआ उन्दोनो को घर में अन्दर खींच जल्दी से जिंजिर लगा लिया. बड़का को बड़ी मेहनत करनी पड़ी माई और छोटका को चुप कराने में. थोड़ा चेत हुआ तो बुल्कीवाली ने देखा बड़का उस आदमी के साथ बैठा बतिया रहा है.अभीतक बुल्कीवाली को होश नही था कि वह ध्यान करे कि छोटका के साथ दूसरा आदमी कौन है.ध्यान से देखा तो पहचान गई,वह मुसहरटोली का रामरतन था,जो पाँच बरस पहले बम्बई चला गया था और वहीँ रिक्सा चलाता था. और बखत होता तो मुसहर को घर में देख घर अपवित्तर होने का ध्यान आता,पर आज उसे वह मुसहर साक्षात भगवान् नजर आ रहा था. उसके पैरों पर वह गिर गई. रामरतन एकदम घबरा गया.....हड़बड़ाकर खड़ा हो गया....अरे भौजी ई का कर रही हो कहकर पीछे हट गया. रामरतन भी भावुक हो गया,बोला....अरे भौजी जैसे यह तुमरा बेटवा वैसे ही हमरा भी है न......उ त कहो कि संजोग से एक दिन बाजार में हमरा ई भेट गया और जब एकर दुःख हम देखा तो हमरा कलेजा दरक गया.हम बीच बीच में एकरा से भेंट करते रहते थे और जब लगा कि बचवा मर जाएगा तो हम चुप्पेचाप एकरा लेकर इहाँ भाग आए....अब धीरज धरो, मुदा मालिक को पता चले ई से पहले जल्दी से एकरा इहाँ से कहीं बाहर भेज दो.हम भी निकलते हैं,नही तो मालिक के पता लग जाएगा तो हमरा खाल खिंचवा देंगे. भावना का उद्वेग कुछ शांत हुआ तो आतंक का अन्धकार माथा सुन्न करने लगा. हाथ पाँव फूलने लगा .सूझ नही रहा था कि क्या किया जाए.


रामरतन ने ही रास्ता सुझाया कि बड़का छोटका को लेकर कहीं किसी दूर के रिश्तेदार के यहाँ रख आए साल छः महीने के लिए....बड़का ख़ुद भी कुछ दिनों के लिए गाँव से बाहर रहे और यहाँ छोटका के बम्बई से भाग जाने की बात खुले भी तो बुल्कीवाली उन्ही लोगों पर चढ़ बैठे कि उनके जिम्मे पर जब उसने बेटे को छोड़ा था तो अब वे ही उसका बच्चा लाकर उसे वापस दें.समय बीत जाएगा,सब शांत हो जाएगा तो फ़िर छोटका को यहाँ बुलाकर कह दिया जाएगा कि रास्ता भटक कर कहीं चला गया था और अब इतने दिन बाद भटकते हुए वापस गाँव पहुँचा है.अब इतने दिन तक तो अनुराधा बिटिया बिना किसी नौकर के रहेंगी नही अपना कुछ इंतजाम का ही लेगी तो फ़िर छोटका को फ़िर से जाने का बावेला नही रहेगा.ई सारा बखेडा इसलिए है कि बम्बई में सस्ता घरेलू नौकर मिलना बड़ा ही मुश्किल होता है सो एक बार कोई अगर इनलोगों के चक्कर में फंस गया तो उसकी जान नही छोड़ते हैं.
रामरतन उस समय उनके लिए भगवान् बनकर आया था.उसकी सलाह के मुताबिक तुंरत अमल हुआ.वैसे बुल्कीवाली का बस चलता तो छोटका को अपने कलेजे में ही छुपाकर रख लेती.पर समय की नजाकत वो जानती थी और बेटे को एक बार फ़िर अपने से दूर भेजने में ही भलाई थी. उस समय बुल्कीवाली के मन में जितनी व्यथा थी उतना ही रोष भी था.जिस मालिक की रक्षा में उसके पति ने अपनी जान गंवाई,उसका घर उजाड़ गया,आजतक ऐसा कोई समय नही आया था जबकि वह तन मन से मालिक की सेवा में जान लगाने से पीछे ती थी और उन्ही लोगों ने उसके साथ इतना बड़ा छल किया,उसके फूल से बच्चे की जान लेने में कोई कसर न छोड़ी....बस चलता तो जिसने उसके बच्चे की यह हालत की , आज फ़िर से गंडासा ले उन सबका वही हाल करती जो उसने उस डाकू का किया था.पर आज वह विवश थी.वह जानती थी कल जिसके लिए उसने हथियार उठाया था उनकी शक्ती भी उसके साथ थी पर आज तो वही शक्ति उसके सामने खड़ी थी.


घटना के आठवें दिन बम्बई से छोटका के फरारी की ख़बर के साथ अनुराधा और महेश बाबू सपरिवार पहुँच गए.छोटका की फरारी की ख़बर देने नही बल्कि दूसरे नौकर का इंतजाम करने. फरारी की बात अनुराधा के लिए भले केवल क्षोभ का विषय था ,पर चौधरी साहब सपरिवार जरूर चिंतित हुए कि बुल्कीवाली का सामना वो कैसे करेंगे.उसे क्या जवाब देंगे.दो दिन तक सब चुप चाप रहा.बुल्कीवाली को अनुराधा के आने की ख़बर नही दी गई.तीसरे दिन सबने यह निर्णय लिया कि बुल्कीवाली को ख़बर कर ही दी जाए. चौधरी साहब ने भीमा को बुल्कीवाली को बुला लाने भेजा.पर भीमा ने आकर बताया कि परसों से ही बुलकी वाली घर में नही है उसकी गोतनी ने बताया कि अनुराधा बिटिया के आने की ख़बर उसे पता है.जब बिटिया दरवाजे पर उतर रही थी तो उसने देखा था और जाकर बुल्कीवाली को बताया था इस बारे में, पर बुलकी वाली उसके बाद घर बंद करके बिना किसी को कुछ कहे पाता नही कहाँ चली गई..


अब तक जो चौधरी साहब के मन पर जवाबदेही का बोझ था ,वहां संदेह ने आकर कब्जा जमा लिया.यह तो सहज बात न थी. बेटे के लिए जो अबतक रोज आकर जान खाती थी,वह अनुराधा के आने की सुनकर भी बेटे के लिए पूछने न आए बल्कि बिना मिले गाँव से बाहर चली जाए,इसमे जरूर दाल में कुछ काला था. बात चली नही कि माहौल ही बदल गया.तुरत फुरत लोगों को पता लगाने के काम पर लगा दिया गया.अगले ही दिन बात निकल कर आई कि किसी ने दस दिन पहले भोरहरवे बड़का छोटका दोनों को एक साथ बस में बैठे देखा था.उस दिन के बाद से बड़का भी गाँव वापस नही आया है.बात खुलनी थी कि सभा लग गई घर में. कोई कुछ कहता कोई कुछ. सर्व सम्मति से यही राय निकली कि, हो न हो छोटका को बम्बई से भगाने में तीनो माँ बेटा का मिली भगत है.राय करके ही सब किया गया है. जिस बुल्कीवाली का रोम रोम मालिक के दिए से संचालित है,उसी बुल्कीवाली ने मालिक के साथ कितनी बड़ी दगाबाजी की है.जिनती मुंह उतनी बातें...चौधरी साहब की क्रोधाग्नि को भड़काने से कोई पीछे नही रहना चाहता था. शुभचिंतकों में कम्पीटीसन लगा था.अनुराधा अलग रोये जा रही थी कि जिस लड़के को उसने अपने बच्चे से भी बढ़कर रखा वह कितना बड़ा हरामखोर निकला,उसके सर इतना बड़ा कलंक लगाकर भाग निकला.अब भला कोई विस्वास करेगा कि उसे वहां कोई दुःख नही था.रार और साँप को कितना भी दूध पिलाओ, वह पोसियाँ नही मानता..यह चौधरी साहब के मान रुतबा को सीधे चुनौती थी,उनका खून खौल रहा था..उन्होंने अपने लोगों को आदेश दिया कि फौरन तीनो को खोजकर अगर पाताल में भी छुपे हैं तो निकालकर लाया जाए


खोज बीन शुरू हुई तो सबसे पहले बड़का पकड़ाया भठ्ठा पर से.बड़का को रासा से बांधकर जीप पर लाद कर ले जाया गया..इधर लोग निकले और उधर बड़का के एक संगी ने जाकर बुल्कीवाली को यह ख़बर पहुंचाई. बुल्कीवाली का तो परान ही सूख गया. अपने जीते जी मालिक के कोप का परहार अकेले अपने उस कोखजाये को कैसे सहने देती. पति पहले ही जान से हाथ धो बैठा था..एक फूल सा बेटा ऐसे ही जुलुम सहकर मरने मरने को था और अब अपने इस निरदोस बेटे को कैसे आग में झोंक देने दे अपना जान..सो जैसे थी वैसे ही बदहवास भागी गाँव की ओर..


बेसुध सी जब मालिक के खलिहान में पहुँची तो एक छन को उसकी साँस ही रुक गई. खलिहान के बीच में धूल धूसरित उसका बेटा खूनमखून बेहोस पड़ा था. . एक पल को तो बुलकी वाली के माथा पर वैसी ही काली मैया सवार हुई जैसी पति को गोली खाकर तड़पते देख हुई थी...उसे लगा अभी इसी बखत गंडासे से उन सब कसाइयों को खूनमखून कर दे जिसने उसके बेटे का यह हाल किया था.पर हाय रे किस्मत... उस दिन तो एक डाकू था मुदा आज तो पूरा गाँव ही डाकू कसाई बनकर इनको घेरे खड़ा था..बेटे से लिपट कर दहाडें मार विलाप करने लगी. उसके रुदन ने चौधरी साहब के गुस्से को और भड़का दिया.एक तो चोरी ,ऊपर से सीनाजोरी. गालियों की बौछाड़ के साथ ताबड़तोड़ उसपर लात और बेंत से प्रहार करना शुरू कर दिया.कुछ लोग निरघिन गालियों के साथ चौधरी साहब के हौसला अफजाई में लगे थे तो कुछ इस कृत से दुखी भी थे..पर उनको रोकने की औकात किसमे थी.पीड़ा से बिलबिलाते हुए बुलकी वाली ने भी एक दो गलियां दे दी.फ़िर क्या था लात घूसों के साथ झोंटा पकड़कर ऐसे घसीटा गया कि उसके देह पर एक भी वस्त्र नही बचा.भीड़ में से किसीको न लज्जा आई न हिम्मत हुई कि उसके उघड़े देह को ढांक दे. इधर बड़का को जो चेत हुआ और उसने यह हाल देखा तो जिसने अपने पिटते समय बिना जुबान खोले चुपचाप सारा मार खा लिया था,चिंघाडे मारते हुए मालिक के पैरों को छान कर गिड़गिडाने लगा.....माँ भाई को बक्सने की कीमत पर कसम खाते हुए वचन दिया कि इन दोनों को बक्स दिया जाए, वह चला जाएगा छोटका के बदले बम्बई और मालिक का हर हुकुम मानेगा..


अनुराधा और उसके पति जो इस पूरे क्रम में रणविजय बाबू के क्रोधाग्नि के मुख्य संवाहक और पोषक रहे थे,ने जैसे ही यह प्रस्ताव सुना,उनकी तो बांछें खिल गई. मामला तो बहुत ही फायदे का रहा था. कहाँ वह मरियल छोटा सा छोटका और कहाँ यह हृष्ट पुष्ट किशोर .एक पल में सारा हिसाब लगा लिया कि अपने पुष्ट शरीर के साथ एक साथ ड्राइवर ,रसोइया , माली और न जाने कितने ही तरह का काम यह कर सकता है..बस फ़िर क्या था, तुंरत ही वहां का परिदृश्य बदल गया. अनुराधा दोनों पति पत्नी, माँ बेटे की रक्षा को आगे बढे. .महेश बाबू ने ससुर का हाथ पकड़ अलग किया और अनुराधा बुल्कीवाली को सम्हालने में लग गई..इन दोनों को बचाव में लगे देख वो लोग जो अन्दर ही अन्दर बुल्कीवाली की दुर्दशा से अपार आहत थे, सहायता को आगे बढे..


मार पीट के इस क्रम में बुल्कीवाली की वह बुलकी, जो कि जिस दिन से उसके नाक में चढी थी कभी उतरी न थी और सोने के नाम पर उसका एकमात्र गहना थी,वह भी कहीं गिरकर हेरा गया था.पर क्या यह एक बुलकी भर था ? यह जेवर नही उसका अहम्,उसकी पहचान थी,जो आज धूल में गुम हो चुकी थी... आज वह उस दिन से भी जादा आहत थी,बिखर गई थी, जिस दिन पहरुआ मरा था...............



( कथा के दीर्घ कलेवर और दुखांत के लिए पाठकों से क्षमाप्रार्थी हूँ. यदि यह मात्र कल्पित कथा होती,तो यह कथा ही न होने देती.)

3.10.08

बुल्कीवाली ( भाग १. )

बुल्कीवाली ,यह उसका वह नाम नही था जो उसे जन्म के बाद माँ बाप से मिला था,पर अपना असली नाम उसे ख़ुद भी कहाँ याद था ।छुटपन में ही माँ ने नाक कान छिदवाने के साथ साथ दोनों नाक के बीच भी बुलकी (नाक के दोनों छेद के बीच पहनी जाने वाली नथ) पहनने के लिए छेद करवाकर सोने की एक बुलकी पहना दी थी. ससुराल आने के बाद भी यही बुलकी उसकी पहचान बनी और लोग उसे बुल्कीवाली के ही नाम से पहचानने और पुकारने लगे थे .जहाँ गाँव में बड़े घर की बहुएं भी फलां गाँव वाली,फलाने की माँ या फलाने की कनिया(पत्नी) के नाम से जानी और पुकारी जातीं थीं, वहां बुल्कीवाली का बुलकी से ही सही अपनी एक विशिष्ठ नाम और पहचान थी यह कोई छोटी बात न थी...इतना ही नही पूरे गाँव में और ख़ास करके चौधरी रणवीर सिंह के यहाँ उसकी ख़ास इज्जत थी.जो कुछ उसने किया था,वह कितने लोग करने की हिम्मत रखते हैं भला.उसका पति पहरुआ मालिक का खासमखास था.भले जात का ग्वाला था पर बहादुर इतना था कि मालिक ने उसे अपना खासमखास बना लिया था जो एक अंगरक्षक की तरह मालिक के सोने भर के समय के अलावा हरवक्त मालिक के साथ बना रहता था.

मालिक के बेटी के ब्याह के दस दिन पहले एक दुर्घटना घट गई। शाम के वक्त डाकुओं ने हमला बोल दिया. उस वक्त बूढों और मालिक को छोड़ घर के सभी मर्द शहर खरीदारी को गए हुए थे.यूँ घर के दरवाजे तो अन्दर से बंद कर लिए गए थे पर उनका मुखिया घर के पिछवाडे से घर की छत पर चढ़ने में कामयाब हो गया था॥मालिक भी बन्दूक लिए छत पर पहुँच गए थे,पर उनकी गोली हवा में रह गई और डाकू की गोली मालिक के पैर में लगी.मालिक तड़पकर जमीनपर गिरे और डाकू ने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी.लेकिन मालिक की ढाल बनकर पहरुआ ने सारी गोलियां अपने देह पर खा ली.घर के सारे लोग जहाँ चीख पुकार और रोने धोने में लगे थे,बुलकी वाली चुपके से कुट्टीकट्टा गंडासा लेकर छत पर चली गई और पीछे से पूरा जोर लगाकर डाकू के सर पर ऐसा गंडासा मारा कि एक ही वार में डाकू धरासायी हो गया.बुल्कीवाली के इस करतब ने पूरा माहौल ही बदल दिया और फ़िर तो किसी ने मालिक की बन्दूक उठायी , किसी ने ईंटा पत्थर तो किसी ने लाठी भाला और सबलोग मिलकर डाकुओं पर ऐसे बरसे कि आठ डाकुओं में से दो जान से गए और बाकी घायल होकर भागने के उपक्रम में थे कि गांववालों ने चारों ओर से उन्हें घेरकर पकड़ लिया और सारे डाकू पुलिस के हवाले कर दिए गए. पहरुआ जान से गया था पर दोनों पति पत्नी नायक हो गए थे.पहरुआ ने मालिक के लिए प्राण उत्सर्ग किया और बुल्कीवाली ने मालिक की जान बचाते हुए अपने पति के मौत का भी बदला ले लिया था.पहरुआ का अन्तिम संस्कार मालिक ने एक शहीद की तरह ही पूरे शान से कराया था और बुलकी वाली को दो कट्ठा जमीन,एक भैंस तथा हजार रुपया नकद दिया था.

जिस समय की यह घटना थी,बुल्कीवाली का बड़ा बेटा बड़का आठ बरस का और छोटा बेटा छोटका दुधमुहाँ गोदी में था।परिवार में अपना कहनेवाला और कोई नही था.गोतिया लोग पहरुआ के जिंदगी में ही अलग हो गए थे.पर बुल्कीवाली भी कम हिमती न थी.पाँच छः साल के भीतर मालिक के दिए दो कट्ठे और अपने पास पहले से दो कट्ठे जमीन को ही उस कमासुत(मेहनती) औरत ने सोना बना लिया था और एक जून खाने लायक मडुआ मकई का बंदोबस्त कर ही लेती थी. स्वाभिमानी बुल्कीवाली ने अपने किसी जरूरत के लिए बेर कुबेर में मालिक को छोड़ कभी किसीके आगे हाथ नही पसारा था॥मालिक की दी हुई एक भैंस से आज तीन भैंस और हो गई थी उसके पास.एक भैंस का दूध मालिक के यहाँ सलामी में देने के बाद भी उसके पास इतना बच जाता था कि अपने बच्चों के लिए पाव भर दूध और छाछ मट्ठा बचा ही लेती थी और बाकी के दूध बेच उपरौला खर्चा का इंतजाम कर लेती थी.

दुपहरिया में बुल्कीवाली आँगन में गोइठा (गोबर के उपले) थाप रही थी तभी भीमा मालिक की ख़बर लेकर आया कि उन्होंने उसे फौरन बुलाया है।पास की बाल्टी में हाथ धोकर साड़ी से हाथ पोछते हुए बुल्कीवाली मालिक के घर की ओर तेज कदमो से चल दी.पीछे पीछे आठ बरस का छोटका जो हरदम अपनी माँ से चिपका सा रहता था और उस वक्त भी माँ का साथ देता हुआ गोबर गींज गींज कर छोटे छोटे गोइठे थापने में लीन था,माँ के पीछे हो लिया.समय समय की बात है,बुल्कीवाली भले आज भी अपने को विशिष्ठ माने हुए है,पर बाकी लोग उसकी करनी को लगभग भूल से गए हैं.हाँ दो बातें जो वे नही भूले हैं वो ये कि ,उन्होंने कितना कुछ बुल्कीवाली को दिया था और दूसरी ये कि बुल्कीवाली सी कमासुत उनकी तमाम आसामियों में एक भी आसामी(जिन्हें जमींदार अपनी जमीन पर झोंपडा डाल रहने की इजाजत देते हैं) नही. उन्होंने बुल्कीवाली को जो धन मान दिया था,उसके बदले उसपर अपना विशेष हक समझते हैं . इसलिए आज भी जब कभी बेगार का काम करने वालों की जरूरत पड़ती है तो सबसे पहले कमासुत( मेहनतकश) बुल्कीवाली को ही याद किया जाता है.ऐसा नही है कि बुल्कीवाली यह सब समझती नही, पर रणविजय मालिक आज भी जो इज्जत उसे देते हैं,उसके आगे वह इन बातों को नही लगाती. यह क्या कम फक्र की बात है कि पूरे गाँव में रारिन(छोटी जाति वाली) होते हुए भी वही एक ऐसी औरत है,जो सीधे सीधे मालिक के कमरे तक जाकर मुंह उठाकर मालिक से बात कर पाने की अधिकारिणी है.

मालिक के पास पहुंचकर दूर से ही धरती छूकर प्रणाम कर बुल्कीवाली खड़ी हो गई।रणविजय बाबू कुछ चिंतित से अपने विचारों में लीन थे,सो उनका ध्यान इस ओर नही गया.भीमा ने इंगित करते हुए मालिक को आगाह किया कि मालिक बुल्कीवाली आ गई है॥रणविजय बाबू ने औपचारिक हाल चाल पूछा और फ़िर गंभीर मुद्रा में भूमिका बांधते हुए उस से कहा कि .... " तनिक परेशानी में हैं,तुम्हारी जरूरत है.अनुराधा बिटिया को तीसरा संतान होने वाला है,तबियत ठीक नही रहती सो उसने ख़बर भेजाया है कि बुल्कीवाली अगर दो तीन महीना भी आ कर घर सम्हाल दे तो जिनगी भर गुन गाएगी. "

बुल्कीवाली अजीब पसोपेस में फंस गई.....अब क्या कहे........आजतक उसने इस घर के किसी भी काम के लिए ना नही कहा था।और उसमे भी जब मालिक ख़ुद कह रहे हों तब तो इनकार का सवाल ही नही उठता था.पर आज जो स्थिति है उसमे वह एकदम से किन्कर्तबविमूढ़ हो गई. हाँ करे भी तो कैसे...अब अनुराधा बिटिया कोई भीरू (नजदीक) तो रहती नही कि जाकर उनका भी काम कर दें और समय निकाल अपना भी सब सम्हाल ले.कहते हैं रेलगाडी से जाओ तो भी बम्बई जाने में चार दिन लग जाते हैं.एक बार जाने का मतलब है, पूरा घेरा जाना॥ ..हकलाती रिरियाती मालिक से बोली..."मालिक ई त बड़ा ही खुसी का बात है कि अनुराधा बिटिया की गोद हरी हो रही है,मुआ हम का करें,एकदम ससरफांस में फंसे हुए हैं,अभी दस दिन पाहिले एगो भैंस बियाई है और दूसरी भी बीस पच्चीस दिन में बियाने वाली है,खेत में तरकारी लगा हुआ है.इसी बार लगाये और बढ़िया लग गया.उसका देख रेख जतन तनिक जादा ही करना पड़ रहा है. कुछ काम था, सो बड़का को भी भठ्ठा (ईंट भठ्ठा) मालिक अपना घर बुला लिए हैं महीना भर के लिए. वह आ भी जाए तो इतना सब अकेले नही देख सम्हाल सकता.उसके बियाह के लिए बरतुहार भी आने लगे हैं,उस से तो बड़का बात नही करेगा, और सबसे बढ़कर यह छोटका छौंडा (लड़का) भी हमें छोड़ एक पल को नही रहता.इसको किसके आसरे छोड़ कर कहीं बहार निकलें....अब आप ही मालिक हैं,सोचकर जैसा आदेस करेंगे, हम करेंगे."

कहने को तो कह गई इतना कुछ पर भय से उसका पूरा देह हरहरा रहा था और अपनी बेबसी भी करेजा छीले जा रही थी॥चौधरी साहब के लिए भी पहली बार था कि बुल्कीवाली ने उनकी बात काटी थी।यूँ भी एक औरत और वो भी रारिन उनकी बात काटे,यह बहुत भारी बात थी.आस पास खड़े लोग भी दंग रह गए थे.मालिक बुरी तरह लहर उठे.पर न जाने कैसे उन्होंने धैर्य धर लिया .....पर चेहरा एकदम कठोर हो गया और कड़कती आवाज में उन्होंने फ़ैसला सुना दिया....उन्होंने कहा...."हम तुमसे तुम्हारा राय नही मांगे हैं, अनुराधा बिटिया को जरूरत है और तुझे वहां जाना है बस....बड़का को बुला कर सब जिम्मा कर दे ,उसको कोई जरूरत होगी तो हम यहाँ देख लेंगे.....हाँ,छोटका को तू अपने साथ ले जा सकती है.....ज्यादा बकथोथर(मुंह लगना) न कर ,तैयारी कर ले, चार दिन बाद भीमा तुझे लेकर निकल जाएगा.सब कुसल मंगल हो जाए तो लौट आना,कोई नही रोकेगा तुझे..जचगी नजदीक होगी तो मैं और मलिकाइन भी वहां आयेंगे."

अब कुछ कहने सुनने को कहाँ कुछ बचा था।मचल रहे आंसुओं को घोंटते हुए मालिक को प्रणाम कर चुपचाप घर की ओर चल दी.ज़माने में अमीर का दुःख अमीर का सुख सब बड़ा होता है,गरीब का कुछ भी अपना नही.जब अपना जीवन ही अपना नही तो फ़िर और क्या कहे.हर साँस पर मालिक का कब्जा है.किस के क्या कहे.कौन समझेगा कि दरिद्र है तो क्या हुआ, छोटी ही सही पर,उसकी भी तो अपनी गृहस्थी है.उसके खेत उसकी पूंजी जायदाद है॥इसबार कमर कसकर उसने पास के खेत में तरकारी लगायी..खाद ,पटवन और देख रेख में पौधे लहलहा उठे. फूल बतिया ( छोटे फल) से लद गए थे.उसे उम्मीद थी कि इसबार वह इतना कमा लेगी कि अपनी जार जार चूती फूस की छत को बदलवाते हुए अपनी पुतोहु (बहू) के किए एक कच्ची कोठरी और जरूर बना लेगी. नही तो सास पुतोहू बेटा सब एके कोठरी में सोयें ,यह थोड़े न अच्छा लगता है.किस्मत ने साथ दिया तो इतना कमा लेगी कि दो रोटी के लिए बड़का को घर से दूर भठ्ठा पर जाकर न मरना खपना पड़े.पर इस गरीब के सपनो की कौन फिकर करे..पर सबसे बड़ी दुःख की बात ये कि ये भैंसें उसकी अपनी सगी बेटी से भी बढ़कर हैं,हमेशा से.अपनी कोठरी की छत भले चूती रहे पर भैंसों का छप्पर चूने की हालत में कभी न पहुँचने देती थी वो. .वे जानवर नही उसका अपना परिवार थे.सारे बच्चे उसके हाथ ही जन्मे थे और उसके हाथ का स्पर्श पा वे भैंसे अपना जनने का दुःख भी भूल जाती थीं.आज उनको टूअर (बेसहारा)छोड़कर जाने की सोच उसका कलेजा फटा जा रहा था..उनका सुख दुःख छोटका बड़का के सुख दुःख से छोटा नही था उसके लिए.

बम्बई पहुंचकर अपनी आदत के मुताबिक बुल्कीवाली जुट गई अपने काम में।काम करने में तो भूत वह हमेशा से रही थी॥गाँव में ही जब तीन जनों का काम वह अकेले कर लेती थी तो फ़िर यह शहर का काम उसके लिए कुछ भी नही था.यूँ तो अनुराधा के पति महेश बाबू ऊँचे पद पर ऊँची तनखाह पाने वाले बड़े भारी अफसर थे, पर उस महानगर में मंहगाई और घरेलु नौकरों के अभाव के साथ साथ उनका जो रेट और उनके नखरे थे,बड़े बड़े अफसरों की अफसरी इसमे निकल जाती थी.किसीकी औकात नही थी कि गाँवों की तरह नौकरों की फौज रख सके. अनुराधा इस सब से हरदम ही क्षुब्ध रहती थी.एक साथ मेहनती ,इमानदार और सस्ता नौकर पाना यहाँ असंभव था.यहाँ तो घंटे और गिनती के हिसाब से कामवालियों का रेट था.एक एक दाइयां पाँच पाँच , छः छः घरों में काम करती थी और अगर दिन रात चौबीस घंटे के लिए काम पर रखना हो तो चार पाँच घरों का पैसा एकसाथ जोड़कर चुकाना पड़ता था.तिसपर भी पीछे लगे रहो तो काम करें नही तो फांकी मार दें. लेकिन बेगार में आई बुल्कीवाली ने अनुराधा को ऐसे निश्चिंत कर दिया था कि इस महानगर में भी अनुराधा महारानी बन गई थी.मुंह खोलने से पहले हर काम हो जाता और किसको किस समय क्या चाहिए इसके लिए दुबारा उसे बताना चरियाना नही पड़ता था.अनुराधा तो बिस्तर से उतरना ही भूलने लगी.चूल्हा चौका ,सफाई, बर्तन से लेकर बच्चों की देखभाल और अनुराधा तथा बच्चों का तेलकुर(मालिश),सब ऐसे निपट जाता कि लगता किसी जिन्न ने आकर सबकुछ निपटा दिया हो.

शुभ शुभ करके ,अनुराधा बेटी की जचगी हो गई।इस बार घर में लछमी आई थीं. परिवार पूरा हो गया था.दो बेटे पर से एक बेटी॥छठ्ठी का खूब बड़ा आयोजन हुआ.गाँव से मालिक लोग भी आए थे.बुल्कीवाली को एक जोड़ा नया झक झक सफ़ेद साड़ी मिला और छोटका को भी नया बुसट पैंट. वैसे यहाँ आते ही छोटका और बुल्कीवाली दोनों को अनुराधा ने अपने तथा बच्चों के उतरन (पुराने कपड़े) से मालामाल कर दिया था.

बुल्कीवाली का मन ध्यान भले अपने बेटे और गाँव में छोड़ आए गृहस्थी में अटका रहता था,पर छोटका का मन यहाँ खूब रम गया था। गाँव में जहाँ हर तरह का अभाव था,बड़े जात वालों के छोटे या बड़े सभी बच्चे उसे बिना बात मारना और राड़ (छोटी जाति वाला) कहकर गरियाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे तथा उसका रोना अपने मनोरंजन का साधन मानते थे,कभी अपने साथ खेलने नही देते थे,वहीँ यहाँ दोनों बच्चे स्कूल और पढ़ाई के बाद उसीके साथ तो खेलते थे.फ़िर जब वो घर पर न हों तो माँ के कहे कुछ टहल टिकोरा निपटा वह सारा समय उस अनोखे रेडियो को देखता रहता था,जिसमे गाने नाचने वाले साक्षात् दिखते भी थे.मालिक ने ठीक ही कहा था,यहाँ आकर उसका गदहा जनम छूट गया था.....वह हमेशा सोचा करता कि गाँव जाकर सबसे बताएगा कि यहाँ उसने क्या क्या देखा ,सब एक दम भौंचक रह जायेंगे.साफ़ सुथरा चम् चम् चमकता घर ,दिन भर भक भक जलता बिजली बत्ती,बस एक बार टीपा नही कि फट से लाईट जल जाए, पंखा चल जाए.पानी निकालने के लिए कुँआ या चापाकल की कोई कसरत नही,बस टोंटी घुमाई नही कि धार वाला पानी झमाझम गिरने लगे॥जो खाना बड़े बड़े भोज में कभी कभार मिलता था वह यहाँ रोज खाने को मिले.कितने सुंदर सुंदर खिलौने थे,सुंदर सुंदर चित्रों वाला किताब था.दोनों बच्चों ने उसे चित्रों वाली किताब देकर कहानियाँ भी बताई थीं.कितना आनंद था यहाँ. दोनों बच्चे भी छोटका का साथ पाकर बहुत ही खुश थे. उन्हें घर में ही साथी के साथ एक ऐसा टहलू मिल गया था,जिसे जब जो आदेश दो, खुशी खुशी फौरन पूरा कर देता था,चाहे खेलते समय या अपने किसी काम के लिए...

(शेष अगले अंक में...)

25.7.08

वह कुलवधू

आज बहुत दिनों बाद सुबह सुबह माँ का फोन आया.कुशलक्षेम के आदान प्रदान के दौरान ही मुझे लग रहा था कि कुछ ख़ास वो मुझसे कहना चाह थी , पर कहने के पूर्व भूमिका बाँध रही हैं.मैं कह ही पड़ी क्या बात है माँ कोई खास बात है क्या,कहो न....गला साफ़ करते हुए उन्होंने कहा " सुमी एक बुरी ख़बर है.विनय की तबियत बहुत ख़राब है,उसे लीवर कैंसर है और वो भी शायद अन्तिम स्टेज में."
दो मिनट मैं कुछ भी नही कह पाई और फ़िर एक ज्वालामुखी सी फटती हुई कह उठी " माँ ईश्वर को किसीने देखा नही है,पर यदि वह है और उसके हाथों में सचमुच कुछ कर पाने की क्षमता है तो मैं उसे चुनौती देती हूँ कि वो इस इंसान को कम से कम पॉँच वर्ष तक और जीवित रखे और घिसट घिसट कर तिल तिल कर इसकी मौत हो.......यदि यह व्यक्ति सहज ही आराम की मौत मरा तो ईश्वर के न्याय को मैं नही मानूंगी............" आवेग में मैं एकदम से हांफने लगी..माँ ने मुझे बीच में ही टोका....." न न बेटा ऐसा नही कहते.सबका हिसाब रखने वाला वह उपरवाला है,उसकी लाठी में आवाज नही होती पर वह सब देखता सुनता है,पर हमारा काम नही कि हम किसी को बद्दुआ दें."
मैं इतनी विचलित हो चुकी थी कि और कोई बात न कर पाई।अगले दस मिनट तक माँ मुझे समझाती और विषयांतर कर बहलाने की कोशिश करती रही पर मेरे दिमाग तक उनकी कोई बात नही पहुँच रही थी॥बाद में फोन करती हूँ कहकर मैंने फोन रख दिया.

अतीत की परछाइयों ने मुझे पूर्णतः आपने गिरफ्त में ले लिया था.अपने वर्तमान से अनभिज्ञ हो मैं उसमे खोयी हुई कब से कब तक रोती रही मुझे स्वयं भी इसका भान न रहा.महरी ने जब आकर मुझे झकझोरा और चिंतित स्वर में घबराकर मुझसे मेरे रोने का कारण पूछा ,अपने गीले गालों पर हाथ फेर तब मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे आंसुओं से मेरे गाल गला और पल्लू गीले हो रहे थे.बड़ी मुश्किल से महरी को समझा पाई कि मेरे एक चचेरे भाई की तबियत बहुत ख़राब है इसलिए मुझे रोना आ गया है.और कोई विशेष बात नही ,उनका इलाज चल रहा है ,जल्दी ही ठीक हो जायेंगे.
उस वक्त किसी से भी बात या जिरह करने की मनःस्थिति में मैं नही थी और महरी के साथ बात करने का मतलब था जबतक घंटा भर लगा उसके सभी सवालों का जवाब दे उसे पूरी तसल्ली न करा लो न ही अगले काम को हाथ लगायेगी और न ही आपको एकांत का मौका देगी.सो उसको जैसे तैसे निपटाकर मैं उसके अंतहीन प्रश्नों से बचने के लिए गुसलखाने में घुस गई.
बाहर निकलकर घड़ी पर नज़र डाला तो ग्यारह बज चुके थे। तैयार होकर दफ्तर पहुँचने में कम से कम बारह बज जाते जो कि किसी भी हाल में जायज न था. इसलिए बेहतर था कि छुट्टी ले ली जाती.सो दफ्तर में फोन कर तबियत ख़राब होना कारन बता उस दिन की छुट्टी ले ली.

सच कहूँ तो किसी से भी बात करने की इच्छा नही हो रही थी.ऐसे में बुझे हुए चेहरे को हरा करना या सहयोगियों को कारन बताना दोनों ही मुश्किल काम था.एक कप चाय पी कर यूँ ही कुछ देर अनमनी सी बैठी रही और फ़िर दिलो दिमाग को हल्का करने के लिए मनपसंद की एक ठुमरी की सी डी लगा कर बैठ गई.एक पुस्तक भी खोल लिया पढने हेतु ताकि ध्यान उसमे बंधकर अतीत की गलियों में भटकना छोड़ कर अन्यत्र रम जाए. पर न ही कानो से होकर मन तक धुन पहुँच पा रहे थे और न ही अक्षर आंखों को बाँध पा रहे थे..

भरा पूरा परिवार था हमारा गाँव में।दादाजी तीन भाई थे.हालाँकि तीनो दादाजी विधुर थे पर मझले निःसंतान भी थे. बड़े दादाजी को एक बेटा और चार बेटियाँ और चाचाजी को भी एक बेटा.और मेरे दादाजी को दो बेटे. विनय भइया मेरे चचेरे भाई थे.बड़े ही लाड प्यार में पले हुए चाचाजी के इकलौते संतान. मेरे पिताजी जुडिसिअल सर्विस में और एक चचेरे चाचा इंजिनयरिंग कर एक प्राइवेट संस्थान में नौकरी में संलग्न गाँव से सदा ही बाहर रहे बाकी परिवार के सभी सदस्य गाँव पर ही रह निजी व्यवसाय तथा जमींदारी के कार्य कलापों में संलग्न थे.

पिताजी के पोस्टिंग के अनुसार ही हमारा भी गाँव आना जाना छुट्टियों में या किसी पारिवारिक उत्सव के अवसर पर ही हो पाता था. पर गाँव में रहने का अवसर मिलना हमारे लिए लाटरी खुलने से कम नही होता था..बड़े बड़े कमरों और खूब बड़ा सा खुला आँगन वाला घर,फलों से लदे फदे पेड़,फूलों के पेड़ पौधे,दूर तक फैले हरे भरे खेत,बड़ा सा मैदाननुमा खलिहान,ढेर सारे गले में घंटियाँ टुन्तुनाते गाय बैल, और तो और भैंस की सवारी.तालाब में भैंस पर बैठ नहाने के आनंद को जिसने उठाया होगा वही समझ सकता है. घर के नौकर जब भैंसों को नहलाने तालाब लेकर जाते थे तो हम सभी भाई बहनों को उसकी सवारी करते थे और उनकी निगरानी में हम तालाब में भैंस की पीठ पर बैठ नौकाविहार का आनंद लिया करते थे.अद्भुत था वह भी सुख.चाचियों बुआओं दादाजी वगैरह के रहते हमलोग माताजी के अनुशाशन से बिल्कुल मुक्त रहते थे और पिटाई की तो नौबत आते ही इतनी जोर से बुक्का फाड़ रोते कि पीटने वाला (माँ या पिताजी) डांट सुन जाए.लाड में फूले और अनुशासनहीन ऐसी जिंदगी स्वर्ग से कमतर थोड़े न थी.

मैं करीब छः सात साल की रही हुंगी।मेरे जीवन का यह पहला मौका था जब घर में किसी की शादी में शामिल होने का मौका मिला था.शादी थी विनय भइया की.बाकि जो दो चचेरी भाभियाँ थी वे काफी बड़ी थीं .लगभग माताजी की उम्र की और उसमे भी एक भाभी कभी कभार छुट्टियों में ही गाँव आया करती थी.जो भाभी यहाँ गाँव में रहती थीं वो मुझे बिल्कुल भी अच्छी नही लगती थीं.निःसंतान थीं वे और अपना सारा समय सजने सवरने और गप्पबाजी में लगाती थीं और हम बच्चों तक से भद्दे भद्दे मजाक किया करती थीं.ऐसे में मन में एक आशा जगी थी कि ये नई वाली भाभी जरूर ही भली होंगी और उनके आते ही अपने सब भाई बहनों को पीछे छोड़ भाभी पर पूरा कब्जा जमा लूंगी और वो केवल मेरी भाभी होंगी.बाकी लोग लेकर सड़ते मरते रहें उस गन्दी वाली भाभी कों.

मेरी उत्सुकता अपनी चरम पर थी.ढेर सारे रस्मो रिवाज के बाद बारात रवाना हुई.सबकी चिरौरी कर थक चुकने के उपरांत अपने अन्तिम हथियार रोने धोने का सहारा लिया पर,हम रोते पीटते रह गए.गाजे बाजे के शोर में हमारा उच्च स्वर रुदन गौण होकर रह गया. हमारी एक न चली हमें साथ नही ले जाया गया.सिवाय बारात वापस आने के इन्तजार के और कोई चारा न रहा.....


तीसरे दिन बाजे गाजे के साथ शाम के धुन्धलुके में नई दुल्हन के साथ बरात वापस आई।जैसे ही ड्योढी में डोली उतरी महिलायों में द्वारचार को लेकर अफरा तफरी का जो माहौल बना उससे अधिक बुरा हाल हम बच्चों के नई भाभी को सबसे पहले देखने और उसपर कब्जा जता शान बघारने की धक्का मुक्की के माहौल से बना.मैं थोडी चतुर निकली धक्कामुक्की में शामिल न हो अपने कृशकाया का लाभ उठाते हुए सुट से डोली में जा घुसी और लम्बी सी घूंघट ताने भाभी के घूंघट के अन्दर घुस उनके चेहरे के ठीक सामने लगभग नाक से नाक सटा उन्हें निहारने लगी॥ यूँ तो भाभी काफ़ी डरी सहमी और घबरायी हुई सी थीं पर मेरे उतावलेपन ,उत्सुकता और विभोर सी मेरी नजरों ने पल भर को सिर्फ़ मेरी और केंद्रित कर सब कुछ विस्मृत करा दिया और उन्होंने स्नेह से मेरा मुंह चूम लिया. फ़िर क्या था,यही तो मुझे चाहिए था.खजाना मिल गया मुझे,गदगद हो खुशी से झूम उठी मैं.भाभी पूरी की पूरी मेरी थी और मैं अपने सभी भाई बहनों को पछाड़ जीत चुकी थी.यही खजाना तो मुझे चाहिए था.खजाना वो जो पूरी की पूरी मेरी थी.अपनी जीत की उद्घोषणा के लिए मन मचल गया पर मैंने अपने आप को इसके लिए रोक लिया क्योंकि यदि बाहर निकलती और कोई और मेरे खजाने तक पहुँच जाता तो मेरी जीत भी छोटी हो जाती और भाभी तक पहुँचने का रास्ता भी सुलभ हो जाता मेरे प्रतिद्वंदियों के लिए.सो मैंने वहीँ उस छोटी सी डोली में छिपकली सा दीवार से सटे बैठे रहना ही मुनासिब समझा.

पूजा द्वारचार के लिए जब भाभी को भी बाहर निकाला गया तो भी मैंने उनके साड़ी के पल्ले की कोर नही छोड़ी और कमरे में जहाँ उन्हें बैठाया गया वहां भी उनसे बिल्कुल चिपकी सी दुबककर बगल में बैठी अपलक उनका मुंह निहारती रही. .थोडी सावली सी जरूर थी वो पर उन जैसी सुंदर आकर्षक स्त्री बहुत कम देखी है मैंने आजतक के अपने जीवन में.बड़ी बड़ी पलकों वाली बड़ी सी आँखें,पतले पतले मुस्कुराते हुए ओंठ,लम्बी नुकीली नाक छरहरा बदन और सबसे बढ़कर व्यक्तिव में एक अजीब सी स्निग्धता और सौम्यता.
अजीब होता है गावों में सुन्दरता का मानदंड।जबतक रंग साफ़ और खूब दुधिया गोरा न हो तो सावंले रंग को तो सीधे सीधे काले की संज्ञा दे दी जाती है और बेझिझक कुरूपता का प्रमाणपत्र दे दिया जाता है.और सबसे बड़ी बात कि यदि ये अपनी प्रतिक्रिया चट मुह पर ही न दें मारें, तो लगता है इनके मुंहदिखाई के पावन पुनीत कर्तब्य का समुचित पालन ही नही किया इन्होने.माना जाता है कि गाँव के लोग बड़े ही सीधे सादे मासूम होते हैं.पर मेरा अनुभव रहा है कि तकनीकी ज्ञान में ये भले शहर वालों से उन्नीस पड़ते हों,व्यवहारिक ज्ञान चल प्रपंच में ये ऐसे निष्णात होते हैं कि खड़े खड़े शहर वालों को दो आने में बीच बाज़ार में बेच आयें और बिकने वाले को पता भी न चले.

औरतों का जो ताँता लगा मुन्हदिखाई का सो देर तक चलता रहा और मेरा हाल यह था कि जो कोई भी नकारत्मक प्रतिक्रिया देता लगता जाकर उसकी चोटी खींच उसे खूब गलियां दूँ.अपनी इस अनिद्य सुंदरी भाभी के ख़िलाफ़ एक लफ्ज भी सुन पाना दुष्कर हो रहा था मेरे लिए..मुझे लगता था किसी के भी पास वह नजर ही नही जो इस सुन्दरता को देख सराह पाए.हालाँकि सारे लोग ऐसे ही नही थे कुछ स्त्रियाँ बड़ाई भी कर रही थी और कुछ चुपचाप देख आशीर्वाद दे चली भी जा रही थीं पर मुझे लगता था दुनिया में एक भी ऐसा न हो जिसे मेरी भाभी प्यारी और सुंदर न दिखे.देर रात जब यह देखा देखी का सिलसिला थमा तो पहले तो खूब फुसलाया गया मुझे वहां से चलने के लिए और जब मैं न मानी तो जबरदस्ती खींचकर मुझे वहां से ऐसे ले जाया गया जैसे गाय के थन से बछडे का मुंह छुडाकर ले जाया जाता है.देर तक रोती रही,पहले बिछुड़ने के कष्ट से और फ़िर माँ से अपने इस जिद के प्रसादस्वरूप पिटाई खाने के वजह से पता नही कब रोती रोती सो गई.सुबह आँख खुलते ही दौडती हुई जा पहुँची अपनी अमूल्य निधि के पास और फ़िर यह जिम्मा भाभी को ही दिया गया कि मुझे मुंह हाथ धोने को राजी करे और नास्ता अपने साथ ही कराये. तब पहली बार भाभी की आवाज सुनी थी.जितनी गहराई से वह मीठी सी आवाज निकलती थी उतनी ही गहराई तक अंतर्मन को भिगो जाती थी अपने स्नेह से.

जबतक छुट्टियों में गाँव में रही,यूँ ही चिपकी रही भाभी से। सारे फुफेरे भाई बहन तो भाभी के आने के सप्ताह भर के बाद ही वापस जा चुके थे और बाकियों ने जब मुझे इस तरह से भाभी पर सर्वाधिकार जमाये उनके साथ इस तरह संलग्न देखा तो अपने पुराने खेल तमाशों में लग गए मुझे मेरे हाल पर छोड़.लेकिन मुझे जो मिला था उसके बाद अपने हमजोलियों के उस छूटे हुए साथ का कोई मलाल न रहा.रात को जब माँ खींचकर मुझे सोने को अपने साथ ले जाती थीं उसके सिवाय सुबह आँख खुलने के बाद से का मेरी सारी दिनचर्या भाभी के साथ ही व्यतीत होती थी.या यूँ कहें कि मेरी दिनचर्या सुव्यवस्थित रखने की जिम्मेदारी भाभी को ही दे दी गई थी.सुख केवल मेरा ही नही था.मेरे लिए हर छोटे बड़े काम को जितने हर्ष और खुशी से भाभी किया करती थीं,छोटी थी तो क्या हुआ मैं स्पष्ट अनुभव करती थी.वहीँ एक बड़ी भाभी थीं जो सबके सामने भले हंसकर बात कर लें अकेले में अक्सर ही दुत्कार दिया करती थी और एक भाभी यह थीं,जो एकांत पाते ही ऐसे प्यार लुटाती थीं मानो मेरी जन्मदात्री वही हों॥बाकी लोग बाग़ भी हमारे इस स्नेह का बड़ा फायदा उठाने लगे थे इनमे अग्रणी मेरी माता थीं जो मुझसे मेरे नापसंदगी की हर बात भाभी के मार्फ़त करवा लेती थी.वो सारी चीजें जिनसे मुझे सख्त नफरत थी भाभी के एक पुचकार पर मैं खा लिया करती थी.उस बार की सारी छुट्टी ऐसे ही इतने आनंद में बीता कि वो एक महीना मानो पलक मारते ही गुजर गया.रोते धोते भाभी से बिछुड़ मुझे अपने परिवार के साथ वापस अपने घर लौट जाना पड़ा.भाभी को अपने ख्यालों में बसाये अगली छुट्टी के इन्तजार में समय बीतने लगा.रोज सवेरे उठ माँ से पूछती कि अभी गाँव जाने में और कितने दिन बचे हैं.तंग आकर एक दिन माँ ने मुझे कैलेंडर में अगली छुट्टी वाले जगह में निशान लगाकर दिया और मुझे ताकीद की कि मैं रोज एक तारीख लाल कलम से काट दिया करुँगी तो दिन जल्दी से ख़तम हो जाएगा.इसी बहने मुझे दिन महीने तारीख भी सिखा रटा दिए माता ने.मुझे पढाकर वो भी खुश और तारीख पर लाल निशान लगा मैं भी खुश.दोनों के ही मतलब सध रहे थे. भाभी के प्यार का प्रालोभन दे माँ मुझे पढने लिखने से लेकर खाने पीने तक को नियमित करवा लेती थी.भाभी के प्रेमपात्र होने का प्रालोभन एक ऐसी उर्जा मुझमे भरती थी जो 'अच्छी लड़की' के खिताब पाने को मुझे हरदम प्रोत्साहित करती थी..

जिंदगी चलती रही,दिन निकलते रहे॥इन्तजार की घडियां अंततः ख़तम हुई जब दशहरे की छुट्टी में हम गाँव पहुंचे।मुझे भाभी की स्नेहिल गोद मिली और मुझसे भाभी के ममत्व को जैसे सहारा मिला.यूँ तो उस बार हम पन्द्रह दिन ही रहे वहां पर एक बात जो मैंने महसूस की वह यह थी की इन कुछ महीनो में ही भाभी का चेहरा बुझा बुझा मुरझा सा गया था.बोलती तो वे ऐसे भी बहुत कम थी ,जो अब और भी संक्षिप्त हो गई थी.ठीक ठाक सबकुछ तो समझ में नही आता था,पर जो देखती सुनती थी वह बड़ा ही अजीब सा लगता था.भाभी सारा दिन काम में लगी रहती थीं.खाना पकाने,खिलाने से लेकर परिवार के प्रत्येक सदस्यों के सेवा के लिए दिन रात एक किए रहती थी.चाचियों के तेल मालिश से लेकर कंघी चोटी करना,उनके हर छोटी बड़ी जरूरतों का ख़याल रखना उन्होंने अपना धर्म मान रखा था.तो भी चाची उन्हें हर वक्त मायके का ,उनके निक्कमेपन और कुरूपता का ताना दिया करती थी. चाची केवल महल्ले के औरतों के सामने ही नही बल्कि ,चाचाजी तथा भइया के सामने भी भाभी की इतनी बुराइयाँ करती थीं कि उन पन्द्रह दिनों के दरम्यान ही दो बार भइया कमरे में बंद कर भाभी को पीट चुके थे .हालाँकि जब मेरे पिताजी के कानो तक बात पहुँची तो उन्होंने भइया को इतना लताडा कि हमारे रहते कोई अप्रिय घटना नही घटी.लेकिन यही भइया थे जो बड़ी भाभी से इतना मधुर व्यवहार करते थे कि मेरी समझ में यह जरूर आता था कि भइया अपनी पत्नी को नही बडकी भाभी को प्यार करते हैं. जसे ही एकांत में भइया बडकी भाभी से मिलते थे दोनों अजीब से लिपटे चिपटे रहते थे और मुझे मौजूद देख जब कभी बडकी भाभी विनय भइया से कहती थी कि सुमी देख रही है,कहीं किसी से कुछ बोल न आए.तो भइया हंस दिया करते थे कि वो तो बच्ची है वो क्या सम्झेगी निश्चिंत रहो .पर जब एक दिन मैंने अपने ज्ञान का परिचय देते हुए भइया से निडर हो कह ही दिया कि आप मेरी भाभी से नही बडकी भाभी से प्यार करते हैं ,मैं सबको जाकर कह दूंगी तो उस समय उनकी डरी सहमी स्थिति देख मुझे एक अजीब से आनंद का आभास हुआ था..भइया को अपने पास देख जिस तरह का डर भाभी के आंखों में तैरा करता था कुछ ऐसा ही डर उस समय मैंने उनकी आंखों में देखा था.फ़िर तो उस दिन विनय भइया और बड़ी भाभी ने मेरी खूब मान मुनौअल की,खूब दुलारा और भइया ने किसी से कुछ न कहने की ताकीद के साथ मुझे तुरत फुरत बाज़ार ले जाकर नई फ्राक खरीदी और लड्डू खिलाया.पर इतना कुछ पाकर भी मेरा मन न बहल पाया और शाम को मैंने भाभी को रिपोर्ट दे ही दी.मेरी बातें सुन भाभी के चेहरे पर जो दर्द उभरा और जिस तरह आँखें बही वह मैं आज तक नही भूल पाई हूँ.लेकिन मुझे लगा भाभी को यह बात पहले से ही पता थी,वह तो मेरे प्रेम की उष्णता ने उनके मन को पिघला आँखें नम कर दी थी.भाभी ने मुझे दुलारा और मुझे अपनी कसम देते हुए कहा कि यह बात मैं किसी से भी कभी भी न कहूँ.कोई पूछे तो भी नही. पर मेरे कहने न कहने से क्या होता था,यह बात शायद घर का हर सदस्य जानता था.

विनय भइया भाभी को प्यार नही करते इसलिए हरदम डांटते पीटते हैं यह बात तो समझ में आती थी पर चाची को भाभी से इतनी नफरत क्यों थी यह बात पल्ले नही पड़ती थी जबकि भाभी तो उनकी हर बात बिना काटे,बिना सफाई दिए चुपचाप सर झुकाए मानती सुनती रहती थीं..यूँ घर में ऐसा कोई न था जिसे चाची पसंद करती थीं या जो चाची को पसंद करते थे.पूरे घर में एक मेरी माँ ही थीं जिनके पास दोपहर में चुपके से आकर भाभी बैठती थीं और अपने दुःख दर्द बांटा और रोया करती थीं..जब भी मैं भाभी को इस तरह रोते देखती तो लगता था जाकर अपना पूरा जोर लगाकर सबको पीट आऊं.एक दिन चाचा और विनय भइया से जाकर मैंने पूछ ही लिया कि वे भाभी को इतना क्यों डांटते हैं,उनसे प्यार क्यों नही करते उन्हें रुलाते क्यों हैं.आपलोग बहुत ही बुरे हैं.यह बात इतनी बढेगी और इसकी कीमत भाभी को चुकानी पड़ेगी यह मेरा बालमन बिल्कुल भी अंदाजा नही लगा पाया था.भाभी पर दोष लगा कि वे घर की बातें सबको जाकर बताती हैं और परिवार खानदान की नाक कटा इज्ज़त डुबा रही हैं. माँ ने तो मेरी क्लास ही लगानी शुरू की थी और मैं पिटने ही वाली थी कि भाभी ने आकर बचा लिया और मुझे पुचकार कर समझाया कि मैं जो भी कुछ देखा सुना करूँ वो किसी को न बताऊँ वरना उनकी रोने वाली बात सबको बहुत बुरी लगेगी और लोग दुखी हो जायेंगे..

समय के साथ सबकुछ बदलता रहा ,मैं बड़ी होती गई,भाभी की दुर्गति भी दिनोदिन बढती गई.पर एक चीज जो नही बदला बल्कि समय के साथ और दृढ़ होता गया वह था भाभी का मेरे लिए स्नेह और हमारा मानसिक जुडाव.मेरे लिए वो ममत्व की साक्षात् मूर्तरूपा देवी थीं.ऐसा नही था कि उनका यह स्नेह केवल मेरे ही लिए था.छोटे बच्चों को देखते ही जिस तरह उनके चेहरे पर खुशी झलकती थी,जिस तरह वो सबपर अपना प्यार लुटाती थी, वह अद्भुत था.हालाँकि मुझे थोड़ा जलन भी होता था पर भाभी के इस हर्ष और सुख के लिए यह मुझे सहज ही सह्य हो जाता था. मेरे लिए वह क्या थीं उनके व्यक्तिव के गरिमा से मन कैसे नतमस्तक रहता था यह बखान पाना बड़ा ही दुष्कर है..वो मुझे गुणों की खान दिखती थी,पर काश ईश्वर मेरी वह आँखें किसी और को भी देता.जब कभी भाभी का उदास चेहरा आंखों के सामने घूमता तो पूजाघर जाकर भगवानजी से विनती करती कि वे ऐसा कोई चमत्कार कर दें कि हर कोई भाभी को प्यार और सम्मान दे .

करीब दो साल बाद एक दिन जब स्कूल से घर लौटी तो माँ पिताजी को खूब गुस्से में चाचा चाची और विनय भइया के ख़िलाफ़ बोलते हुए सुना.जितना सुना उस से यही समझ में आया कि चाचा चाची विनय भइया कि दूसरी शादी करवाना चाहते हैं क्योंकि भाभी बाँझ हैं. माँ खूब रो रहीं थीं और उन तीनो को कोसे जा रही थीं कि इतनी लक्ष्मी सी औरत कि जो इन लोगों ने दुर्दशा कर राखी है,इन्हे ईश्वर से थोड़ा भी भय नही लगता.बाद में मैंने माँ से पुछा था कि माँ ये बाँझ माने क्या होता है?तो माँ ने मुझे उत्तर दिया बिना दूसरी बातों में बहला दिया था.पर मेरे मन में इसके उत्तर जानने की उत्सुकता बहुत समय तक बनी रही.पिताजी और माँ इस बार हम भाई बहन को नौकरों और पड़ोसियों के जिम्मे सौंप अकेले ही गाँव गए.हालाँकि मैंने अपने भर पूरजोर प्रयास किया कि मुझे भी वो साथ ले लें.पर परीक्षाएं नजदीक होने के कारण हमारी मांग पूर्णतः खारिज हो गयीं.

संयोग ऐसा रहा कि उसके बाद से करीब दो वर्ष तक हम गाँव नही नही जा पाए॥छुट्टियों में कहीं न कहीं अन्यत्र ही जाना होता रहा।इसी बीच एक दिन स्कूल से वापस आई तो माँ पिताजी को खूब खुश देखा.माँ ने बड़े प्यार से मिठाई खाने को दी और खुशखबरी सुनाया कि मेरी प्यारी भाभी को नन्हा मुन्ना बाबू होने वाला है.हालाँकि एक पल को मेरा मन आशंकित हो गया कि कहीं भाभी का बाबू मेरा प्यार तो नही बाँट लेगा पर फ़िर याद आया कि इतने सारे बच्चों से प्यार करते हुए भी तो भाभी सबसे ज्यादा मुझे ही मानती हैं,तो मेरी शंका निर्मूल है .मैं भाभी से मिलने जाने को मचल उठी.माँ ने बताया कि दशहरे की छुट्टियाँ होते ही हम गाँव निकल चलेंगे और तबतक भाभी का बाबू भी जन्म ले चुका होगा.

गहमा गहमी और तेज आवाजें सुनकर सुबह सुबह नींद टूटी तो देखा कि घर में अजीब तनाव और चिंता का माहौल था॥चाचा, चाची,बड़ी बुआ सब घर में थे बिकुल अस्त्व्यत अवस्था में और माँ रोये जा रही थी।किसी से कुछ पूछते भी नही बन रहा था और आशंका से दिल भी बैठा जा रहा था.अंततः हिम्मत करके बुआ से पूछ ही लिया तो पता चला कि भाभी का बाबू पेट में ही मर गया है जो अगले तीन महीने बाद जन्म लेने वाला था और भाभी की तबियत बहुत ही नाजुक है.इसलिए रातों रात उन्हें गाँव से लाकर सीधे बड़े अस्पताल में दाखिल कराया गया है. अगले सात दिनों तक लाख अनुनय विनय के बाद भी मुझे भाभी के पास नही ले जाया गया.पर इन सात दिनों में घर का माहौल इतना तनावपूर्ण रहा कि पिताजी को पहले कभी मैंने इतने गुस्से में नही देखा था.चाचा चाची से लगातार झगडे होते रहे.पिताजी ने विनय भइया को तो बस पीटा नही यही बहुत हुआ.उन्होंने उनसे कहा कि यदि बहू को कुछ भी हो जाता है तो अपने हाथों मैं तुझे पुलिस के हवाले कर दूंगा.इनलोगों के बहस से ही यह पता चला कि विनय भइया ने शराब के नशे में द्धुत्त होकर भाभी की ऐसी पिटाई की कि उन्हें मौत के कागार पर पहुँचा दिया.हालाँकि चाची ने सारा कुछ भइया के सर मढ़ दिया था पर मुझे अंदाजा लगते देर न हुई कि सारा खेल बडकी भाभी और चाची का ही है.उन्ही की लगायी आग में भाभी तिल तिल जलती रहती हैं.विनय भइया को तो यूँ भी मनुष्य मानते मुझे घिन आती थी.

जितने भी देवी देवताओं के प्रार्थना,स्तुति मैंने सुन जान रखे थे सबका पाठ किया करती थी और हमारे घर के पास वाले मन्दिर में घंटों बैठ भगवानजी से भाभी को जल्दी से ठीक करने की प्रार्थना करती थी.ईश्वर को अंततः मेरी प्रार्थना स्वीकार करनी ही पड़ी और पाँच दिन तक जिंदगी और मौत के बीच झूलती भाभी को डाक्टरों ने खतरे के बाहर बताया.
सातवें दिन जब मुझे भाभी के पास ले जाया गया तो मुझे अपने पास देखते ही भाभी ने सीने से चिपकाकर जो रोना शुरू किया और हम दोनों की ही ऐसी घिग्घी बंधी कि आस पास खड़े सभी लोग रो पड़े. भले मैं बिल्कुल ही नासमझ और बच्ची थी पर संवेदनाओं को समझने अनुभूत करने की कोई उम्र नही होती.भाभी की पीड़ा को मैं महसूस कर पा रही थी और भाभी को भी जैसे लगता था कि मैं उनके सुख दुःख पूर्णरूपेण अनुभूत कर सकती हूँ.

सब दिन एक समान नही रहता॥अगले साल दीपावली के बाद भाभी की गोद हरी हो गई और बच्चे के छठ्ठी के अवसर पर हमलोग गाँव गए तो भाभी के पीले पड़े मुरझाये चेहरे में जो संतोष और सुख का आब देखा तो मन जुडा गया। छोटे नन्हे मुन्ने ने तो मेरा मन ही बाँध लिया.इस बार अपने घर वापस जाते समय मुझे जितनी तकलीफ हुई उतनी कभी नही हुई थी.

साल गुजरते रहे और पढ़ाई के बोझ तले दबे हमारा गाँव जाने का क्रम बड़ा ही सिमित होता गया।कई बार ऐसा हुआ कि जब कभी हम जाते भी तो भाभी अपने मायके होती और उनसे मिले बिना अनमने दुखी हो मुझे वापस आ जाना पड़ता.फ़िर ऐसा हुआ कि अक्सर बीमार अवस्था में रहने वाली भाभी अपने मायके ही रहने लगी.जब कभी उनके भाई उन्हें यहाँ छोड़ भी जाते तो बीस पच्चीस दिन होते होते उन्हें फ़िर से मायके भेज दिया जाता था.भाभी के मुन्ने मोहित को चाची अपने पास ही रखती थी यह कहकर कि बीमार भाभी बच्चे कि देखभाल करने में पूर्णतया अक्षम हैं.घर गृहस्थी सम्हाल पाने में अयोग्य तो चाची ने बहुत पहले ही ठहरा दिया था.बहुत दिनों बाद पता चला कि भाभी को हार्ट की बीमारी थी और जब इनलोगों ने इनके इलाज का कोई प्रबंध नही किया तो हारकर भाभी के भाइयों ने इनका आपरेसन करवाया तथा अपने घर रख इनके इलाज का प्रबंध किया. जब वे फ़िर से स्वस्थ हो काम धाम करने लायक हुईं तभी जाकर भाभी को विनय भइया वापस गाँव लेकर आए.यूँ भी समाज में इनकी इतनी बदनामी होने लगी थी कि लोक लाज के अंतर्गत इन्हे ऐसा करना पड़ा.

मेरी नौवीं की परीक्षा संपन्न हो चुकी थी और इतने वर्षों जो कुछ भी ख़बर मुझे भाभी के बारे में मिलता रहा था उसने जहाँ एक ओर मेरा सारे परिवार के प्रति मन वितृष्णा से भर शादी ब्याह जैसे रिश्तों के प्रति भी मन में एक अजीब सी धारणा भर दी थी जो कहीं न कहीं इतने गहरे बैठ चुका था जिसके कारण कालांतर में मुझे विवाह के लिए राजी करने में माता पिता को बहुत ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था. जो भाभी ममत्व की साक्षात् मूर्ति थीं,जिन्होंने पराये बच्चों को भी सदा अपने स्नेह से आप्लावित रखा था,जब मुझे पता चला की टी बी से ग्रस्त होने पर साल भर तक उन्हें अपने बच्चे को छूने नही दिया गया था.शारीरिक बीमारी ने जो दुर्दशा की थी उससे सैकड़ों गुना अधिक कष्ट उनके अपनों ने उन्हें देकर क्या पाया ,यह मुझे झकझोर जाता था.उनसे मिलने बातें करने को मैं इतनी बेचैन हो गई थी की किसी तरह माँ को मनाकर गाँव जाने की जुगत लगायी मैंने.

वर्षों बाद जिस स्त्री से मैं मिल रही थी वह किसी तरह जीवित एक हड्डियों का ढांचा मात्र थी..उनकी हालत देख बिलख पड़ी मैं.जितना गुस्सा मुझे घरवालों के आ रहा था उतना ही भाभी पर भी आया, कि इतना सारा कुछ उन्होंने क्यों झेला चुपचाप.क्यों इनलोगों को इतना अत्याचार करने दिया, कभी खुलकर प्रतिवाद क्यों न किया.एक दिन बहस कर ही बैठी उनसे.कि उनको कमजोर मान और जान ही लोगों ने उन्हें सताना अपने रोजमर्रा के मनोरंजन का साधन मान लिया है और इसके माध्यम से बड़े ही सुगमता से वे अपने अपने अहम् की तुष्टि किया करते हैं.भाभी ने जो उस दिन मुझे कहा वह ताउम्र अविस्मरनीय रहेगा मेरे लिए.पहली बार इस तरह से खुलकर उन्होंने मेरे सामने जीवन की वह सच्चाई रखी जिससे मुकर नही पाई थी मैं.उन्होंने कहा था "बचुवा यदि औरत का पति उसे उसका हक दे उसका सम्मान करे ,उसकी पीड़ा समझे तो परिवार में चाहकर भी कोई उस स्त्री को कष्ट नही दे सकता. यूँ सताने की नही सोच सकता.पर वही यदि उसे पीड़ित करने में सबसे आगे हो तो बाकी लोगों के हाथ तो खुले होते हैं,उन्हें कौन रोक सकता है.मेरे लिए तो कहीं जगह नही.ससुराल रही तो ये लोग हैं और बिना माँ बाप के मायके में भी भाभियाँ चार बातें सुना कोसकर ही खाना कपड़ा देती थीं. वह तो भाइयों ने अपनी पत्नियों से लड़कर इलाज करवाया नही तो भाभियों का बस चलता तो भीख का कटोरा दे सड़क पर बैठा देती.नाम है कि बड़े घर कि बेटी बहू हूँ तो कहीं दाई नौकर का काम कर भी इज्ज़त की रोटी जुटाने नही निकल सकती.बिटिया मेरी जिंदगी से यह सीख जरूर लेना कि पढ़ लिखकर अपनी ऐसी हैसियत जरूर बना लेना कि दो रोटी और इज्ज़त भरी जिंदगी के लिए इस तरह कभी जिल्लत न उठानी पड़े. जो पति परिवार प्यार सम्मान दे, तो उसपर जी जान लुटा देना पर यदि वह जान लेने को उतारू हो जाए तो अपनी जान भी न ले लेने देना.मैं प्रतिकार करती भी तो किस बल के बेटा ,किसका सहारा है मुझे.मेरे तो पूर्व जन्म के संचित पाप के फल रहे होंगे जिन्हें भुगत कर मुझे पार पाना है.ये लोग जो हर वक्त मुझे प्रताडित करते हैं ,गलियां देते ,कोसते रहते हैं इनकी बराबरी में उतरकर यदि मैं भी वही सब करने लगूं तो ऐसे संस्कार लाऊं कहाँ से. मैं यह सब कर अपना धर्म क्यों ख़राब करूँ............"
उन्होंने अपने धर्म की चाहे लाख समझाई हो पर उन दिनों मुझे उनका इस तरह अन्याय सहना सरासर अधर्म ही लगता था।उन दिनों उनकी असहाय स्थिति पुर्नरुपेन मैं नही समझ पायी थी. प्रतिवाद के लिए भी सहारे की आवश्यकता होती है चाहे वह आर्थिक समर्थता ही क्यों न हो बाद के वर्षों में इसी ने मुझे शायद आत्मनिर्भर बनने की सबसे बड़ी प्रेरणा दी॥

माँ से भी कभी कभी मैं लड़ पड़ती थी जब वे भाभी कि यह स्थिति देख समझ रही हैं और उस से क्षुब्ध भी हैं तो भाभी को अपने पास ही लाकर हमारे घर क्यों नही रखतीं..अथाह पीड़ा के साथ माँ ने कहा था एक बार कि बेटा उसी अभागी की भलाई के लिए उसे अपने पास नही रखती बेटा ,नही तो कोई बड़ी बात नही की तेरे चाचा चाची और विनय भइया उस बेचारी का नाम तेरे पिताजी के साथ जोड़ दें. ऐसे ही उसके लिए हम जो सहानुभूति रखते हैं उसके कारण कम नही सुनना पड़ता उसे.यह सब सुनकर कैसे सह पायेगी वह.मैं निरुत्तर हो गई थी..

भाभी के ह्रदय के शल्य चिकित्सा के बाद डाक्टरों ने शक्त हिदायत दी थी कि इनके खान पान तथा आराम का पूरा ख़याल रखा जाए तथा किसी भी हालत में अगले तीन वर्ष तक इनका गर्भवती होना इनके लिए मौत को दावत देने के बराबर है. डाक्टरों के निर्देशों का ठीक उलट पालन हुआ और डेढ़ साल बाद छः महीने के गर्भ के साथ भाभी परलोक सिधार गयीं.
भाभी की बरषी के अगले ही महीने ढेर सारे दान दहेज़ और धूम धाम के साथ विनय भइया की दूसरी शादी हो गई.दूसरी शादी में मिले इस भरपूर दहेज़ का कारण था पैंतीस पार कर चुकी इस कन्या का कुरूपा और कर्कशा के रूप में प्रसिद्द होना.के यह इश्वर की ही कृपा थी कि उन्होंने चाचा चाची के आंखों पर लोभ की वह पट्टी बाँध दी कि पैसे के सामने न ही चाचा चाची को कुछ देखने सोचने की जरुरत महसूस हुई न ही विनय भइया को क्योंकि बुरी तरह से बदनाम हो चुकी बडकी भाभी ने भी अपना प्रेम सम्बन्ध का आधार खींच भइया को अकेला कर दिया था. पर इस नई नवेली प्रौढा दुल्हन ने जब अपना रूप गुन दिखाया तो चाची के पास सिवाय सर धुनने के और कोई रास्ता न बचा था और समय ने भी वह सारा हिसाब चुका लिया जो उस बेचारी के दुखों का मूक गवाह था.

पर वह एक जिंदगी तमाम अच्छाइयों के बावजूद भी क्यों अभिशप्त रही यह आज भी मेरे समक्ष निरुत्तर है.







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