बहुधा ही सहज रूप में एक प्रश्न मन में आया करता है.....कि जब परमात्मा इस सम्पूर्ण श्रृष्टि में कण कण में व्याप्त है, उसके कृपा के बिना पत्ता भी नही हिलता तो फ़िर इसी जगत में इतना कुछ विभत्स/अनाचार/ग़लत कैसे घटित हो रहा है ? नास्तिकों की छोडें ,बहुधा घोर आस्तिकों के मन को भी यह सोच ऊहापोह और शंशय में डाल व्यथित और विचलित किया करता है.
आस्था मानती है कि ईश्वर तो प्रेम और करुणा के स्वरुप हैं,उस करूणानिधि के अखंड साम्राज्य में विभत्सता का स्थान कैसे हो सकता है.........परन्तु फ़िर भी हम देखते आ रहे हैं कि युगों से संसार दुष्ट शक्तियों द्वारा आक्रांत रहा है.ऐसे में सहज ही मन पूछ बैठता है कि जब सम्पूर्ण जगत ही उनसे संचालित है और जब उसके सहमति के बिना एक पत्ता भी नही हिलता ,तो फ़िर क्या इस ग़लत घटित होने में भी उनकी सहमति है??? यदि इस ग़लत पर उनका नियंत्रण नही तो फ़िर वे कैसे सर्वसमर्थ हैं ?
..पर जब भी सच्चे ह्रदय से उस परमपिता से कोई जिज्ञासा की जाती है,वह सहज ही किसी न किसी मध्यम से हमारे उन जिज्ञासाओं का समाधान दे दिया करते हैं..तनिक गहनता से अनुभूत करेंके तो बड़ा ही स्पष्ट अनुभूत होगा कि ईश्वर प्रतिपल किसी न किसी माद्यम से हमसे बात करते रहते हैं और जब भी मन व्यग्र हो शंकाओं का निवारण चाहता हो तो तो उनके समाधान भी भेज दिया करते हैं.वही परम पिता जीवन में सुख के रूप में आनादोप्भोग के अवसर देते हैं तो दुख के रूप में अनमोल शिक्षा प्रदान किया करते हैं....
......... श्रृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने जलचर ,नभचर,स्थलचर, कोटि कोटि भिन्न भिन्न प्रजातियों की रचना की.परन्तु इतना कुछ बना चुकने के बाद भी उन्हें संतोष न हुआ और तब उन्होंने अपरिमित सामर्थ्य संपन्न जीव 'मनुष्य' की सर्जना की. अन्य जीवों की भांति समस्त अंग प्रत्यंग देने के साथ साथ बुद्धि रूप में मनुष्य को सामर्थ्य की वह पूंजी सौंपी जिससे मनुष्य केवल आहार विहार और संतानोत्पत्ति ही नही वरन उस ईश्वर की श्रृष्टि में बहुत कुछ फेर बदल सकने का सामर्थ्य भी रखता था.अपने इस रचना पर वे स्वयं ही इतने अभिभूत और मुग्ध हुए कि उसके ह्रदय में अपना निवास बनाने का निश्चय किया और वहां विवेक रूप में अवस्थित हो गए.अपरिमित सामर्थ्य और विवेकरूपी अपना अंश समाहित कर उस महत कृति मनुष्य को पृथ्वी पर उनमुक्त भाव से कर्म करने और उनके रचे समस्त प्रकृति के आनंदोप्भोग के लिए छोड़ दिया.
हमारे सामने समस्त उद्धरण हैं...जिस मनुष्य ने आत्मा/विवेक/ईश्वर को अनुभूत करते हुए सन्मार्ग पर चल सत्कर्म किए,वे देवतुल्य पूज्य हुए और जिस मनुष्य ने अपने अंतरात्मा की आवाज को अनसुना कर कुमार्ग पर अपनी गति रखी वह उतनी ही दुर्गति को प्राप्त हुआ.सामर्थ्य और विवेक देने के बाद ईश्वर प्रत्यक्ष रूप में कर्म करने के क्रम में किसी का हाथ पकड़कर रोकने नही आते.यह तो व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि ईश्वर ने विवेकरूप में जब उसे कुमार्ग गमन पर चेताया तो उसने अपने आत्मा की आवाज सुनी या नही. वैसे जो समग्र रूप में अपने कर्मो को उस परमपिता को समर्पित कर सच्चे ह्रदय से उससे सन्मार्ग पर चलने की शक्ति की याचना करता है,ईश्वर सचमुच किसी न किसी माध्यम से हाथ पकड़कर उसे ग़लत करने से रोकने चले आते हैं,इसके उदाहरणों की कमी नही है.व्यावहारिक रूप में हम भी इसे आजमा कर देख सकते हैं..
बहुत से लोग ईश्वर की प्रमाणिकता पर ही प्रश्न उठा बैठते हैं.तो यही कहा जा सकता है कि अनुभूतियों को केवल अनुभूत ही किया जा सकता है प्रकट रूप में उसे प्रमाणित या ठोस अवयव रूप में दृष्टिगत कराना कठिन है.हम देख सकते हैं कि कोसों दूर रहकर भी यदि हम अपने प्रियजनों के सुख दुःख, मनोभावों को बिना किसी सूचना के भी अनुभूत कर लेते हैं तो निश्चय ही एक कोई ऐसी परम शक्ति है ,जो प्रकट रूप में न भी दिखे तो भी इतने प्रखर रूप में अनुभूत होता है कि उसकी उपस्थिति अस्वीकृत नही की जा सकती.
अब बात रही कि कई बार यह देखा जाता है कि कोई अत्याचारी,व्यभिचारी,कुमार्गगामी भी बड़ा ही सुखी है और चाहे जितने भी पाप कर्म करे उन्मुक्त विचरण करता है और धन के बल पर दण्डित होने से बचा रहता है.ऐसे अवसरों पर पीडित होने पर बड़े बड़े आस्तिकों की आस्था डोल जाती है और ईश्वर के न्याय पर ही संदेह करने लगता है.परन्तु भौतिकी का यह सिद्धांत है कि ......... " हर क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है....." यह शाश्वत और अकाट्य सत्य है . इस श्रृष्टि में कोई भी क्रिया निष्क्रिय या नष्ट नही होती.हम चलते बोलते खाते पीते यहाँ तक कि सोचते हुए जो कुछ भी क्रिया कर्म संपादित करते हैं, वह अदृश्य तरंग रूप में इस ब्रह्माण्ड में सुरक्षित रहता है और उस क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है.
जैसे ही मनुष्य जन्म लेता है उसके कर्मो का एक व्यक्तिगत खाता खुल जाता है और उसके द्वारा प्रतिपादित प्रत्येक कर्म का लेखा जोखा जमा होने लगता है.हमारे शाश्त्रों में इसकी बड़ी सुंदर व्याख्या की गई है.कर्मफल को '' प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण " इन तीन श्रेणियों में विभक्त किया गया है.कर्म प्रतिपादन का माध्यम भले यह शरीर हो ,परन्तु समस्त कर्म संचालित मन और चेतना द्वारा ही होते हैं,जो कि कभी नष्ट नही होती ,केवल माध्यम (शरीर) ही निश्चित अवधि के बाद नष्ट होती है. तो इस चेतना/आत्मा को कई जन्मो तक संचित सुकर्म अथवा दुष्कर्म का फल भोगना पड़ता है.हमारे द्वारा मन वचन और कर्म द्वारा सुकर्म या दुष्कर्म जो प्रतिपादित होते हैं,वह हमारे लिए संचित हो जाता है और इसी के परिणामस्वरूप कोई पापी भी अपने संचित पुण्य भाग को भोगता हुआ पापकर्मों में लिप्त रहते हुए भी निष्कंटक विचरता है और कोई पुनीत कार्य कर भी कष्टों को भोगता है.परन्तु दोनों ही स्थितियां स्थायी नही हैं. जैसे ही कुकर्म अथवा सुकर्म के संचित फलों का भण्डार चुक जाता है,परिस्थितियां बदल जाती हैं.कर्मानुसार फलभोग निश्चित है,चाहे इसके लिए कई जन्म क्यों न लेना पड़े..
अतः यह कहना कि वह सर्वसमर्थ ईश्वर पापाचार अनाचार क्यों नही रोकता, मूढ़ता है। ईश्वर के दिए सामर्थ्य का यदि कोई दुरूपयोग करे और दोष ईश्वर को दे,यह कहाँ तक न्यायसंगत है.यह सब तो अपने हाथ ही है, इस सामर्थ्य का सदुपयोग कर मानव भी ईश्वर तुल्य पूज्य हो जाता है और इसी का दुरूपयोग कर महान विध्वंसक भी होता है. परन्तु किसी भी अवस्था में पूज्य धर्म के मार्ग पर चलने वाला ही होता है ,भले अल्पकाल के लिए दुराचारी अपने विध्वंशक शक्ति के बल पर लोगों को भयभीत कर दे.
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23.12.08
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