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13.8.09

क्षय हो .....

भारतीय संस्कृति की महान संरक्षिका एवं संवाहिका, प्रातः स्मरणीया परम आदरणीया सुश्री राखी सावंत जी का अति रोमांचक प्रेरणादायी औत्सुक्यप्रद स्वयंवर, जनक नंदिनी मैया सीता, द्रुपद दुहिता द्रौपदी तथा ऐसे ही अन्यान्य असंख्य स्वयंवरों को लघुता देता, नवीन मानदंड स्थापित करता हुआ, सबकी आँखों को चुन्धियाता अंततः सफलतापूर्वक संपन्न हुआ. आशा है, इसकी आशातीत सफलता से अति उत्साहित हुए दृश्य जगत के दिग्दर्शक निकट भविष्य में इनसे भी उत्कृष्ट , महत्तम प्रतिमान स्थापित करने हेतु इस कोटि के प्रस्तुतियों की झड़ी लगा देंगे,जिनसे भारतीय जनमानस अपने गौरवशाली अतीत के दिग्दर्शन करने के साथ साथ भविष्य के लिए इनसे महत प्रेरणा प्राप्त कर अपने जीवन को कृतार्थ करेंगे...

सत्यम शिवम् सुन्दरम को सिद्ध पुनरप्रतिष्ठित करता, सत्यानुयाई महान राजा हरिश्चंद्र के वंशजों का साक्षात्कार अभी चल ही रहा है.यह और बात है कि निरीह राजा जी को सत्य की रक्षा क्रम में सर्वस्व गवाना पड़ा था. परन्तु उसी दुर्घटना से सचेत हो उनके अनुयायियों ने सत्य उद्घाटन क्रम में " अर्थार्जन " को ही सर्वोपरि मानते हुए इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी है. यूँ भी अर्थ के सम्मुख इस कलिकाल में सब अर्थहीन है. जैसे ही ये सत्यवादी " उष्ण पीठिका " (हॉट सीट) पर विराजित होते हैं, वीभत्स सत्य उद्घाटन/ उत्सर्जन को अपना परम कर्तब्य मान लेते हैं . बधाई हो !!! अब सत्यध्वज निश्चिंत निर्बाध हो, उतंग फहराएगा.....इसमें कोई शंशय नहीं......

इन सब के साथ संवेदनाओं से उभ चुभ महान कथानकों वाले धारावाहिक भारतीय जनमानस के ह्रदय को द्रवित करती धाराप्रवाह प्रवाहमान है..इनमे से अधिकाँश द्वारा परम्पराओं संबंधों के नित नवीन कीर्तिमान उपस्थित किये जा रहे हैं. ये भारतीय समाज को प्रगति के पथ पर पाँव पैदल नहीं अपितु द्रुतगामी वायुयान यात्रा करा रहें हैं.....इतना ही नहीं नए उत्पादों के लुभावने विज्ञापन ,जिनमे से अधिकाँश अपने अति सीमित पलों के प्रसारण क्रम में भी एक पूरे तीन घंटे के " ए" श्रेणी ( वयस्क श्रेणी) के चलचित्र का रोमांच देते हुए हमारे ज्ञान कोष को अभूत पूर्व समृद्धि दे रहे हैं.. .हमारी प्रजावत्सल सरकार की अपार अनुकम्पा से चौबीसों घंटे तीन सौ पैंसठ दिन के लिए वभिन्न चैनलों पर अनवरत बालक वृद्ध नर नारी उभयचारी ,सबके लिए सबकुछ सहजसुलभ हैं.....

और तो और, अति कर्मठ समाचार वाचक, आठों याम, नगर नगर,डगर डगर ,पानी की धार में, बरखा की फुहार में, आंधी में रेत में, रेल में खेल में ,गली गली कूचे कूचे, स्नानघर से लेकर शयनकक्ष तक, धरती अम्बर पाताल, डोल डोल, टटोल टटोल कर हमें एकदम गरमागरम खट्टे मीठे करारे सनसनीदार समाचार (??) दे निहाल किये रहते हैं...

डेढ़ दो दशक से भी कम समय में सूचना और संचार क्रांति ने हमें कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया...देखा, इसे कहते हैं प्रगति की पराकाष्ठा... हमारा देश कितना प्रगति कर गया है,नहीं ???

क्या कहा, आपको इसमें से अधिकांश नहीं सुहाता, तो लो भाई, इसमें कुलबुलाने और भड़कने वाली कौन सी बात है, रिमोट है न आपके पास ?? बस पुट से बटन दबाइए,चुट से चैनल बदल गया.......इतने सारे चैनल हैं...कोई बाध्यता थोड़े न है कि न पसंद आये तो भी देखते रहो.......चालक, संचालक,दिग्दर्शक ,प्रबुद्ध वर्ग सबकी यही सीख और सुझाव है आम दर्शकों के लिए.....

चलिए हमने मान लिया.... हम जैसे पुरातनपंथी,प्रगति के विरोधी लोग वर्तमान में प्रसारित अधिकाँश कार्यक्रमों से क्षुब्ध होकर रिमोट तो क्या टी वी तक का उपयोग नहीं करेंगे या फिर यदि करेंगे भी तो पूर्ण सजग रह अपने हाथों विवेक रुपी रिमोट का सतत प्रयोग करेंगे ......पर समस्या है कि देश की कितनी प्रतिशत आबादी विवेक रूपी रिमोट को सजग हो व्यवहृत कर पायेगी और आत्मरक्षा में सफल हो पायेगी ??

आज टेलीविजन तथा असंख्य चैनलों की पहुँच समाज के उस हिस्से तक है जो दिहाडी कमाता है..और उनके लिए दारू ताडी के बाद यही एकमात्र मनोरंजन का सबसे सुगम और सस्ता साधन है.निम्न ,माध्यम वर्ग से लेकर हिंदी देखने सुनने वाले उच्च आय वर्ग तक ने अपना परम मित्र इन्हें ही बना लिया है . इन दृश्य मध्यमो से अहर्निश मनोमस्तिष्क तक जो कुछ पहुँच रहा है,वहां अनजाने जो छप रहा है, वह पूरे समाज को कहाँ लिए जा रहा है,क्या यह विचारणीय नहीं ???

कैसी विडंबना है कि चार पांच या इससे अधिक सदस्यों वाला एक निम्न/ मध्यमवर्गीय परिवार डेढ़ दो सौ रुपये में चार दिन का राशन भले नहीं खरीद सकता पर इतने रुपयों में महीने भर के लिए आँखों को चुन्धियाता चमचमाता वैभवशाली मनोरंजन अवश्य खरीद सकता है,जिसके आगे अपने परिवार को बैठा वह सुनहरे सपने दिखा सकता है,तंगहाली के क्षोभ को बहला सकता है ..

मुझे बहुधा ही उन राजकुमारों की कथा का स्मरण हो आता है,जिनको पठन पाठन से घोर वितृष्णा थी और फिर उनके गुरु ने रोचक कथाओं में उलझा खेल खेल में उनकी सम्पूर्ण शिक्षा सफलतापूर्वक संपन्न कराई थी.कोई भी बात या सन्देश जितनी सफलतापूर्वक कथानकों के माध्यम से व्यक्ति के ह्रदय में आरोपित की जा सकती है,उतनी किसी भी अन्य माध्यम से नहीं. उसमे भी कथानकों का दृश्य रूप तो कभी निष्फल हो ही नहीं सकता..यह तो रामबाण सा कार्य करता है...

कहा जाता है, आसपास जो घट रहा है, उसीको तो टी वी, सिनेमा या विज्ञापन में दिखाया जाता है.......क्या सचमुच ?? चलिए मान लेते हैं कि यह कथन सत्य है...तो भी ऐसे सत्य का क्या करना जो व्यक्ति की संवेदनाओं को पुष्ट नहीं बल्कि नष्ट करे,उसे सुन्न करे ....क्या हम नहीं जानते कि विभत्सता की पुनरावृत्ति व्यक्ति की विषय विशेष के प्रति उदासीनता को ही प्रखर करती है...

विभत्सता,व्यभिचार, अश्लीलता, अनैतिक सबंध, अनाचार, धन वैभव का भव्य फूहड़ प्रदर्शन, षडयंत्र इत्यादि के अहर्निश बौछारों के बीच सफलतापूर्वक स्वयं को अप्रभावित या निर्लिप्त रख पाना कितनो के लिए संभव है ???? यह जो एक प्रकार का नियमित विषपान प्रतिदिन नियत मात्रा में इन दृश्य माध्यमों द्वारा आम भारतीय जनमानस के मष्तिष्क को कराया जा रहा है, देसी विदेसी चैनल के दिग्दर्शकों द्वारा हमारे देश पर एक सुनियोजित सांस्कृतिक आक्रमण नहीं है?

बहुत पहले की तो बात नहीं,यही कोई एक डेढ़ दशक पूर्व की बात है...किसी स्त्री को यदि "सेक्सी" कह दिया जाता, तो तलवारें खिंच जाती थीं...आज यह महिलाओं को उपाधि, गर्व की बात लगती है. धन्यवाद कह वे प्रफ्फुलित हो लिया करती हैं...विचारों में यह इतना व्यापक परिवर्तन यूँ ही तो नहीं हो गया... क्या प्रगति का मार्ग नग्नता और नैतिक पतन के मार्ग से ही निकलता है??? क्या नैतिक मूल्यों की सचमुच कोई प्रासंगिकता नहीं बची ???

करीब पांच छः वर्ष पहले की बात है,एक दिन मेरा बेटा बिसुरने लगा,कि माँ आप भगवान् जी से हमेशा मुझे सद्बुद्दि देने और मुझे अच्छा आदमी बनाने की प्रार्थना करती हैं ,यह बहुत गलत बात है ...आप उन्हें यह क्यों नहीं कहतीं कि मेरा बेटा खूब बड़ा आदमी बने, खूब पैसा और नाम कमाए......उसका मानना था कि अच्छा आदमी हमेशा दुखी , लाचार और अभावग्रस्त रहता है और एक अच्छा आदमी कभी बड़ा आदमी नहीं बन सकता...

बड़े आदमी की उसकी परिभाषा यह थी कि बड़ा आदमी वह होता है,जिसके पास बहुत सारा पैसा हो,जो हवाई सफ़र कर सकता हो,बल्कि उसके अपने कई हवाई जहाज हो,मंहगी गाडियां हो,महल जैसा घर हो, ढेर सारे नौकर चाकर हों, ऐशो आराम का सारा सामान हो,पूरी दुनिया में नाम और पहचान हो.........और यह सब सच्चा और अच्छा आदमी बनकर तो पाया नहीं जा सकता न.

यह केवल एक बालमन की बात नहीं थी, बल्कि यह तो एक आम धारणा बन गयी है आज की. सफलता का मतलब तो बस यही रह गया है न....और उस लक्ष्य को पाने के लिए ये ही रास्ते रह गए हैं...

-> कुछ भी दांव पर लगाकर अभिनेता अभिनेत्री बन जाओ...

-> सही गलत को भूल कर किसी भी तरह कुछ भी करके टाटा बिडला अम्बानी मित्तल जैसा बनो ....

-> सारे पेंच आजमा राजनीति में घुस जाओ ....

-> दाउद शकील या गवली का अनुकरण कर भाईगिरी के धंधे में नाम पैसा और पद प्रतिष्ठा भी कमाओ ....

-> और कुछ नहीं कर सकते तो " बाबा " बन जाओ ....

" रिच एंड फेमस " बनना, बस यही है जीवन का लक्ष्य....नैतिक मूल्य की बात इसके सामने प्रलाप और व्यंग्य बन कर रह गया है.......

कहते हैं कि जब जनमानस दिग्भ्रमित हो,पतनोन्मुख हो तो राजा उन्हें दिशा देता है,जब राजा दिग्भ्रमित कर्तब्य विमुख हो जाता है तो राज्य के ज्ञानी विचारक (मंत्री/अधिकारी) उनका मार्गदर्शन करते हैं,परन्तु जब ज्ञानी विचारक ही दिग्भ्रमित और पतित हो जायं तो उस राज्य को ईश्वर भी नहीं बचा सकते...

सत्ता तथा शक्ति यदि सत्पुरुष के हाथ हो तो और तो और ऋतुएं भी धर्मपरायण उस शासक की चेरी हो अपने धर्मानुसार अनुगमन करती हैं ( क्योंकि तब शासक अपनी प्रजा की ही नहीं अपने धरती/प्रकृति तथा पशु पक्षी आदि समस्त प्राणि मात्र की रक्षा करना अपना परम धर्म बना लेता है और तदनुसार ये सभी भी स्वधर्म में तत्पर होतें हैं).परन्तु यदि यही सत्ता और शक्ति दुराचारी के हाथों लग जाय तो सभ्यता संस्कृति के भ्रष्ट और नष्ट होने में अधिक समय नहीं लगता...

किसी समय सेंसर नाम का कुछ हुआ करता था, जिसका काम यह देखना था कि मनोरंजन के विभिन्न दृश्य मध्यमो द्वारा समाज के सम्मुख अहितकर कुछ तो नहीं रखा जा रहा है........संभवतः अब वह आस्तित्व में नहीं है या फिर है भी तो इन सत्ताधीशों ने उसे बाज़ार के हाथों ऊंची बोली लगा बेच दी है...

क्या केवल प्रत्यक्ष सैन्य आक्रमणों से देश की रक्षा करना ही प्रशासक का कर्तब्य होता है?? सामाजिक, सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों की रक्षा करना प्रशासनन का कर्तब्य नहीं होता? आज मिडिया ने जो स्थिति बना रखी है,ऐसा तो नहीं कि प्रशासन इससे पूर्ण रूपेण अनभिज्ञ हैं....और यदि ये अनभिज्ञ हैं, तो ऐसे चक्षुविहीन प्रशासकों को क्या राज्य करने का अधिकार होना चाहिए ?? क्या समय नहीं आ गया,हमारा कर्तब्य नहीं बनता, कि ऐसे ध्रितराष्ट्र को जो अपनी छत्रछाया में पाप को संरक्षण दे रहा हो, जो शासन में सर्वथा अयोग्य हो, को सत्ताहीन कर हम अपने राष्ट्र की रक्षा करें ....

रोटी नहीं दे सकती, शिक्षा नहीं दे सकती, सुरक्षा नहीं दे सकती, संस्कार और संस्कृति का संरक्षण नहीं कर सकती,फिर भी क्या हम इनकी " जय हो " ही कहेंगे ?? माना कि ऐसा सोचने वाले हम संख्या में अतिअल्प हैं तो क्या हुआ,चलिए प्रण करें और अपने पूर्ण सामर्थ्य के साथ इस ओर प्रस्तुत हों कि ऐसे प्रशासक का " क्षय हो " ....

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