समाचार पत्र के साथ भी बड़ी विचित्र विडंबना है...सुबह के पहली किरण के साथ जितनी उत्सुकता और स्नेह से इसका स्वागत होता है,पाठोपरांत उतनी ही निर्ममता से इसका तिरस्कार भी होता है..परन्तु इन समाचार पत्रों में बहुत कुछ कभी न पुराने पड़ने तथा सहेजने योग्य सामग्री होती हैं,जो चाहे कितनी भी तिथियाँ बदल जायं अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता नहीं खोती...
ऐसे ही सफाई के क्रम रद्दी में पड़े पुराने समाचार पत्र के एक आलेख ने मन और आँखों को बाँध लिया..
समाचार था - तीन विवाहित पुत्रियों और नाती नतिनियों वाली सड़सठ वर्षीय नंदिता विश्वास ने बी.ए. आनर्स की परीक्षा दी.नंदिता पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के खड़गपुर शहर के वार्ड नंबर अठारह के मलिंचा में रहती हैं.माध्यमिक व जूनियर बेसिक की ट्रेनिंग के बाद नंदिता ने एक सरकारी विद्यालय में अध्यापन कार्य आरम्भ किया.१९८३ से २००३ तक उन्होंने अध्यापन कार्य किया और सेवानिवृति उपरांत उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अपने उस अधूरे स्वप्न को जो कि पारिवारिक एवं शैक्षणिक दायित्वों के व्यस्तता क्रम में अपूर्ण रह गया था,उसे पूर्णता प्रदान करने का संकल्प लिया...
पहले तो जिसने भी सुना, सबने उनका उपहास उड़ाया और पर्याप्त हतोत्साहित किया.परन्तु उनके दृढ संकल्प को देखकर परिवार वालों ने इन्हें सहयोग दिया .बाईस फरवरी २००९ से नेताजी ओपन यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित परीक्षा में उन्होंने बी ए आनर्स में समाज शास्त्र विषय से परीक्षा दी.नंदिता न केवल अपने सफलता के प्रति आश्वस्त हैं बल्कि उतीर्ण होकर आगे भी पढाई जारी रखने को दृढ संकल्प भी हैं...
हो सकता है बहुत लोगों को यह मूर्खता पूर्ण और व्यर्थ लगे,क्योंकि अधिकांशतः शिक्षा को लोग आत्मकल्याण आत्मोत्थान का नहीं धनार्जन का ही साधन मानते हैं.परन्तु नंदिता जैसे लोग परिवार समाज को प्रेरणा देते हैं,नयी राह दिखाते हैं और सही मायने में ऐसे ही लोग जीवन को सच्चा आदर देकर उसे सार्थकता देते हैं.
जीवन जीने और उसमे भी सुखपूर्वक जीने के लिए जितना महत्वपूर्ण स्वस्थ शरीर और धन की आवश्यकता है, आत्मसंतोष और अपने होने की सार्थकता अनुभूत करना,उससे भी अधि़क आवश्यक है.. यूँ तो किसी भी उम्र में जीवन को सुखद आत्मसंतोष ही बनाता है, परन्तु जीवन के उतरार्ध में जिजीविषा के लिए सार्थक सकारात्मक लक्ष्य निर्धारण एवं आत्मसंतुष्टि परम आवश्यक है..
दो ढाई वर्ष की अवस्था में ही शिक्षण में संलिप्त हुआ बालपन समय के साथ उत्तरोत्तर व्यस्त से व्यस्ततम होता चला जाता है.वय के साथ उत्तरदायित्व बढ़ता ही जाता है और कहीं न कहीं उसीमे व्यक्ति अपने होने की सार्थकता ढूंढ लेता है.गृहस्थी के प्रारंभ से लेकर अगली पीढी के तैयार होने और उनकी गृहस्थी बसने तक स्त्री पुरुष परिवार के केंद्र में होते हैं.समस्त परिवार घटनाक्रम और हित अनहित के निर्णय व्यक्ति की मुठ्ठी में होते हैं और एक तरह से परिवार रुपी साम्राज्य के वे स्वामी/स्वामिनी हुआ करते हैं...
परन्तु अगली पीढी के परिवार विस्तार के साथ ही जैसे जैसे इनका उत्तरदायित्व संक्षिप्त होने लगता है, इनके पास रिक्त समय की बहुलता रहने लगती है और अगली पीढी द्वारा स्वविवेक से लिए जाने वाले निर्णय के क्रम में ये स्वयं को निर्णायक भूमिका में नहीं पाते, घोर उपेक्षित अनुपयोगी अनुभूत करने लगते हैं. अनजाने ही इनके मनोभाव कुछ इस प्रकार होने लगते हैं जैसे, इनके इर्द गिर्द दूसरे राज्य पनपने लेगे हैं,जिनपर इनका कोई वश नहीं.अबतक परिवार पर एकक्षत्र शासन का अभ्यास क्रम जैसे ही बाधित होता है,व्यक्ति सहजता से स्वयं को सम्हाल नहीं पाता और विचलित होता हुआ अवसादग्रस्त हो जाता है.भाग दौड़ में फंसे युवा वर्ग के पास न तो इनके मन की सुनने जानने का समय होता है न धैर्य. व्यक्ति अपने ही परिवार के बीच स्वयं को अवांछित अनुपयोगी पाता है,तो तिलमिला जाता है.यदि पहले से इसके लिए मानसिक रूप से तैयार न हो और जबरन सत्तासीन होने का प्रयत्न करने लगता है तो घर की शांति पूर्णतया बाधित होती है.
स्त्रियों की तो इस मामले में और भी दयनीय स्थिति होती है.क्योंकि आम तौर पर पुरुष अपनी संलिप्तता घर के बाहर भी ढूंढ लेते हैं,परन्तु स्त्रियाँ घर संसार के बाहर स्वयं को निकाल ढाल नहीं पातीं.लक्ष्यहीनता और संसारिकता का मोह इन्हें पुराने अभ्यास को बदलने का न तो नया कारण ढूँढने देता है और न ही अपने अवसाद और उग्रता पर इनका वश होता है.फलतः बहुधा ही नयी पीढी के काम में मीन मेख निकाल उन्हें नीचा दिखा ये स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर आत्मसंतोष पाने में जुट जाती हैं.
सहज ही अनुमानित किया जा सकता है कि स्वयं को उपेक्षित अनुभूत करते व्यक्ति के पास लक्ष्य रूप में जब मृत्यु की प्रतीक्षा ही रह जाय तो मनोस्थिति कितनी त्रासद होगी।आज पारिवारिक सामाजिक ढांचा जिस प्रकार बदलता जा रहा है, पूरे विश्व में यह त्रासद स्थिति और भी चिंताजनक होती जा रही है. वय का अवसादग्रस्त चौथपन जीवन को भार सा बना देता है और फिर अवसादग्रस्त व्यक्ति आत्मकेंद्रित हो अपने ही सहेजे संजोये उस परिवार की सुख शांति को भी छिन्न भिन्न करने लगता है.
व्यक्ति ,परिवार और समाज को सुव्यवस्थित रखने हेतु इन्ही कारणों से प्रबुद्ध मनीषियों ने वय के उत्तरार्ध के लिए संन्यास तथा वानप्रस्थ आश्रम की व्यवस्था की थी।अपने अगली पीढी को उतरदायित्व सौंपने के बाद संन्यास ले लिया जाता था.परन्तु संन्यास का तात्पर्य यह नहीं था कि गृह त्याग कर दिया जाय.संन्यास का तात्पर्य था उत्तरदायित्व सौंपने के उपरांत गृहस्थी में ही रहकर संसारिकता के प्रति निर्लिप्त भाव रखना.उत्तराधिकारियों को उनके अग्रहनुसार अपेक्षित मार्गदर्शन देना और अपने आत्मोत्थान के मार्ग पर जीवन को अग्रसर करना.वानप्रस्थ का तात्पर्य था,परिवार से आगे बढ़ समाज तथा अन्य जीव जंतुओं के संरक्षण ,उनकी सेवा में प्रवृत्त होना॥
मन और मष्तिष्क का वय शरीर से बंधा नहीं होता.इसी कारण शरीर की अवस्था से यह किंचित भी अक्षम या बाधित नहीं होता.परन्तु मन मष्तिष्क को यदि निश्चेष्ट रखने का प्रयास किया जायेगा,बलपूर्वक उसे निर्लिप्त रखने का प्रयास किया जायेगा तो वह विद्रोह करेगा ही.इसलिए आवश्यक है कि उसे सकारात्मक कारणों में संलिप्तता दी जाय.एक बार जब उत्तरदायित्व पूर्ण हो गया तो फिर अपने पुराने अधूरे पड़े संकल्पों रुचियों जिसमे आत्मिक आनंद मिलता हो,उसमे संलिप्त हुआ जाय..संगीत ,साहित्य,बागबानी,भ्रमण,सीना पिरोना,पाक कला,इत्यादि इत्यादि न जाने कितने ही कार्य हैं जिसमे व्यक्ति स्वयं को संलिप्त कर सकता है तथा जिन्हें साध व्यक्ति आत्मसंतोष भी पा सकता है और दूसरों को भी ज्ञान और प्रेरणा दे सकते हैं..परोपकार के कार्यों में अपना समय लगा परम संतोष पा सकता है.. ऐसे उपाय .जिजीविषा को कभी क्षीण नहीं पड़ने देते.
मनुष्य चाहे तो अंतिम सांस तक अपने आस पास को बहुत कुछ दे सकता है...और कुछ नहीं तो दो मीठे बोल देकर किसी को भी सुख तो दे ही सकता है और बदले में अकूत संतोष रुपी धन अर्जित कर सकता है.लेकिन यह तभी संभव है जब व्यक्ति स्वयं प्रसन्न और संतुष्ट हो.स्वयं को सुखी करने का साधन कहीं बाहर नहीं हमारी अपनी मुट्ठी में ही है,बस खुले हाथों को बांधकर भींच लेना है..अपने अहम् को दरकिनार कर ,ह्रदय को थोडा बड़ा कर उसमे स्नेह का सागर भरना है,फिर चहुँ और स्नेह ही तो बिखेरेगा मनुष्य.
जिसने आज जन्म लिया उसे भी और जिसने चालीस पचास वर्ष पहले जन्म लिया उसे भी,जीवित बचा तो उसी मोड़ पर पहुंचना है और आगे जाना है,जिसे बुढापा कहते हैं..यदि उम्र के दूसरे तीसरे पड़ाव से ही चौथेपन की तैयारी कर ले , तो सहजता से व्यक्ति उस कष्टदायक अवांछित स्थिति से बच सकता है.
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14.5.09
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