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9.2.10

भक्ति शक्ति युक्ति आगार...

किसी घनघोर मजबूरी में, घटाटोप भुच्च अनहरिया रात में, सुनसान सड़क पर एकदम अकेले, कहीं चले जाय रहे हों,सन्नाटे का साँय साँय कान सुन्न कर रहा हो, झींगुर और टिटही अपना तान राग छेडे ईस्पेसल इफ्फेक्ट दे रहा हो और ऐसे में अचानक से सामने एक ऐसा जीव परकट हो जाय ,जो न आज तलक कहीं देखे, न सुने...हाँ, भूत परेत का खिस्सा कहानी में ऐसा विराट वर्णन खूबे सुने रहै और जमकर ओका ठट्ठा भी उडाये रहै ...तब ऊ सिचुएसन मा सबसे पाहिले मुँह औ दिमाग पर का आएगा?? बड़का से बड़का तोप नास्तिक भी आपै आप बड़बडावे लगैगा ...

" भूत परेत निकट नहीं आवै ,महावीर जब नाम सुनावै "
उस समय जदि भुतवा कहे ... " का रे ससुर, तू तो ढेर विज्ञान बतियाता रहा,अब काहे को बजरंगबली को बुला रहा है बे...हिम्मत है तो चल, हमरे संग सवाल जवाब का हु तू तू खेल के दिखा...."
तब भैया, जरा कलेजा पर हाथ धर के ईमान से कहिये....लेंगे चैलेन्ज,कहेंगे उससे,न भूत वूत होता है,न हनुमान वनुमान ??

अच्छा चलिए, छोड़िये ये काल्पनिक सिचुएशन ,,, फरज कीजिये, हवाई जहजवा में बइठे, ऊपर दूर अकास में सुखी-सुखी औ खुसी-खुसी उड़े जा रहे हैं...आ ठीक बिच्चेइ असमान में डरैवर साहेब उदघोषणा कर दें..." परम आदरनीय भइया औ बहिनी लोग, हमको बहुतै खेद संग कहना पड़ रहा है कि, बिमनवा में आई तकनीकी खराबी का चलते, अब हम ईका आगे नहीं उड़ा ले जा सकते हैं....सो, भाई बंधू लोग,अब अपना लोटा डंडी समेटो औ छतरिया पहिन के कूद लो हमरे पिच्छे पिच्छे ..हमरी पूरी सुभकमना आप सभौं के साथ है.."
अब बताइए,पलेनवा में चढ़े वाला सब लोग असमान से कूदे का टिरेनिंग लेके तब जहजवा में तो बैठते नहीं न... बडका से बडका चुस्त कुदाक के हाथ भी छतरी धरा , जब एतना ऊपर से धकियाया जाएगा त छतरी धर हावा में लटकते अइसन भयंकर सिचुएसन में भाई बहिनी लोग किसको गुहारेंगे ?? जो हनुमान जी का नाम भर भी सुने होंगे, झट बुदबुदाये लगेंगे....

"संकट ते हनुमान छुड़ावै, मन क्रम वचन ध्यान जो लावे..."
"जन के काज विलम्ब न कीजै ,आतुर दौरि महासुख दीजै"
"बिलम्ब केहि कारन स्वामी, कृपा करहु उर अंतरयामी "

चलिए आज उन्हीं बजरंग बली जी की बिना किसी कारण या संकट के भी एक बार सरधा पूरवक याद करते उनके चरित की परिचर्चा उनका जयकारा लगाते करें...
" लाल देह लाली लसै ,अरु धर लाल लंगूर | बज्र देह दानव दलन,जय जय जय कपि सूर || "

अपने ईष्ट श्रीरामजी की ऐसी भक्ति किये बजरंगबली कि भक्त के शिरोमणि बन गए...उनके जइसा भक्त बहुतै कम हुए हैं ई धरती पर.....भगति की  पराकाष्ठा देखिये, कि उ तो यहाँ तक प्रण ले लिए हैं कि, इस संसार में जा तलक एक ठो भी मनुस के मन ध्यान में श्री सीता राम जी बसेंगे , तब तक उ ओके रक्षा का वास्ते इहै संसार में डटे रहेंगे....बजरंगबली जी की एही एकनिष्ठ सरधा देखकर सीतामैया ने भी उनको वरदान दिया था ...

"अजर अमर गुननिधि सुत होहु, करहु सदा रघुनायक छोहू.."

ऐसे संकट मोचन हैं बजरंगी, कि अपने भगतों का ही नहीं बल्कि अपने परभू का भी संकट हरण करते हैं... जब भी प्रभु श्रीराम संकट में पड़े ऊ उपस्थित हो गए उनकी सेबा में...हर संकट में जदि कोई एक नाम प्रभु श्रीराम के मुख पर सबसे पाहिले आया तो उ था ...हनुमानजी का ही ...चाहे सीता मैया को सात समुद्दर लांघ के खोजने का काम हो या कदम कदम पर श्री राम लछमन या जानकी जी सहित धर्म की रच्छा करने का काम...और उनका शील और विनय तो देखिये कि कभी भी किसी भी काम का क्रेडिट अपने नहीं लिए,सब श्री राम की कृपा को दिए..... शक्ति , भक्ति और युक्ति के चरम का जहाँ कहीं भी जिकर होगा, सबसे पहिला नाम बजरंगबलि का ही आएगा...

वानर सेना जब सीता मैया को खोजते हुए समुद्र किनारे पहुँचे और विराट अथाह उस समुद्र को देख कपारे हाथ धरे सब हिम्मत हार बैठ गए, तो ऐसे समय में भी सर्व समर्थ हनुमान जी तबतक आगे बढ़के उद्धत नहीं हुए जबतक कि जाम्बवंत जी उनको आज्ञा और उत्साह नहीं दिए..शिष्टता यही है कि सेनापति या अग्रज जबतक आदेश न दे,ढेर नहीं कूदना चाहिए,समूह के अनुसासन का एही कायदा होता है..चूँकि सेना में वरिष्ट अग्रज जाम्बवंत जी मौजूद थे, सो हनुमान जी उनका मान रखते हुए तब तक चुप हो बैठे रहे जबतक कि जाम्बवंत जी खुदै आगे बढ़के उनको आदेश न दिए..जो सचमुच में सर्व समर्थ होता है,वह विनयशील अवश्ये होता है,यह हनुमान जी हर समय जताए बताये..
लालुआये पन्जुआये हनुमान जी एकै बार उठे औ हुंकार लेकर जब लंका का ओर छलांग लगाये त - " जेहि गिरी चरण देई हनुमंता,चलेहिगा सो पाताल तुरंता" ...उनका चाप से पहार रसातल में धंस गया...आज जदि किसी के पास एतना ताकत/सामर्थ्य रहे,तो दू मिनट में पूरा दुनिया को मचोड़ मचाड़ के सौस लगाके खा जाएगा.. सामर्थ्य बिना शील और संस्कार के विनाशकारी होता है,यह सास्वत सत्य है...

बजरंग बली खाली बलसालिये नहीं रहे,बडका विद्वान् और चतुर भी रहे..ई बात का परमान जगह जगह पर रामायण में मिलता है...जब लंका के रास्ते बीच सम्मुद्दर में सुरसा उनको खाने वास्ते छेकी, त कैसे उको चकमा देके बजरंगबली अपना चतुरता का परदरसन किये, सबे जानते हैं..जब गुप्त रहकर काम बनाना था,गुप्त रह कर बनाये और जब विसाल भूधराकार सरीर परगट कर काम बनाना था,तब वैसा ही किये..सीता मैया को चुप्पे चुप्पे खोज निकालना था,तो मच्छर एतना साइज बनाकर घूम लिए औ जब सतरुअन को प्रभु राम का परभाव देखाना था तो असोक वाटिका को उजार पूरा लंका को जलाकर राख कर दिए...


कल्पना कीजिये ..एकदम अनजान जगह,कोइयो जात जेवार का नहीं, बोली भासा वाला नहीं, चारों तरफ से बिसाल विकराल सर्वभक्षी निसाचर चारों पहर घूम रहे हैं,कब उठाकर मुंह में गड़प जाएँ औ डकारों न लें,कौनो भरोसा नहीं.....ऊपर से दस मुडिया वाला विकराल राच्छस घड़ी घड़ी कहे कि चलो हमसे बियाह करो नहीं तो तुम्हारा चटनी पीस के ई राच्छस लोग खा जायेगा,तुम्हरा पति खोजते रह जायेगा कि कहाँ बिला गयी..नैहर सासुर वाला बोलेगा राम के संग गयी रही जंगल में ,जंगल का दुःख नहीं सहाया होगा, तो भाग भूग गयी होगी कहीं, साथ में फुसफुसाते हुए कहेंगे " सुने हैं कि लंका का राजा, उसको बियाह करने को उठा ले गया, का जाने बियाह उआह करके ओकरे संग घर बसा ली होगी..." तुम तो बचोगी नहीं जवाब देवे का वास्ते ,जेकरे मुंह में जो आएगा उ कहेगा..हम तुमको उठा लाये,जात तो तुम्हरा ऐसे भी चला ही गया..ई से अच्छा है कि हमरे संग बियाह कर लो,हम तुमका सब रानियन का हेडरानी बना के रखेंगे...बतवा मान लो,परेम से समझा रहे हैं, कहीं दिमाग घूम घुमा गया तो फिर सोच लो,अब और हमरा सबर को न हिलाओ..."

मैया सीता ...बेचारी के हिरदय पर का बीतता रहा होगा ई सब सुन सुन कर ,पतिवरता राजरानी का जी केतना पिराता रहा होगा..तबै तो उ खिसिया कर बोली...

" सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा, कबहूँ कि नलिनी कराइ विकासा ||
अस मन समुझु कहती जानकी,खल सुधि नहीं रघुवीर बानकी ||
सठ सूने हरि आनेहि मोही,अधम निल्लज लाज नहीं तोही ||"

लेकिन सीता मैया को भीतरे भीतरे तो लगिए रहा होगा कि ई लम्पट मुंहझौंसा पतित का का ठिकाना, दूसरे की मेहरारू को छल से उठा लाने में एगो घड़ी लाज नहीं आया, का जाने आगे का करेगा...बेचारी बेकल हो गयीं होंगी, एतना दिन हो गया था कि ई संसय होना भी वजिबे था कि का जाने प्रभु राम इहाँ तक पहुँच पायेंगे कि नहीं,कहीं उनके आने से पाहिले रावनवा खा पका गया या जोर जबरदस्ती किया तो अबला अकेली उका सामना कैसे करेगी.....बेचारी कलपते हुए अपन ऊ काया का, जाके कारन सब झोर झमेला रहा,ओकरे अंत करने को कभी राच्छसी त्रिजटा से तो कभी वृच्छ असोक से अग्नी मांग रही हैं कि...उहेई समय धप्प से गाछ पर से कुदुक हनुमानजी परगट हो गए प्रभुराम के संदेस के साथ....

धरमहीनों का ऊ नगरी में मैया सीता को कोई पहली बार इतने दिन बाद सनमान सरधा के साथ 'माता' कहा होगा....कोई अंदाजा लगा सकता है,उस समय मैया सीता के हिरदय में हर्ष और ममता का कैसा अद्भुद हिलोर उछाह उठा होगा...उसमे भी जब पवनसुत अपना विसाल रूप परगट कर के माता को देखाए होंगे तो निरासा का समुद्दर में डूबे उनके कैसा सम्बल मिला होगा...माता का अपमान का बदला लेने का लिए जब कोई पुत्र उसका अपमान करने वाला का पूरा राज पाट महल अटारी जलाकर ख़ाक कर दे,तो उस हिरदय में गर्व संतोस और ममता का जो उफान उठा होगा और उस हिरदय से जो आशीर्वाद निकलेगा,ऊ कैसे खाली जा सकता है...अरे, माता का आशीर्वाद जब दुर्योधन जैसे पापी को भी बज्र जैसा बना सकता है तो ई तो परम पुन्यवान हनुमान जी थे...
माता ने अपने इस सुपुत्र को - " अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता,अस बर दीन जानकी माता"
" माता जानकी की किरपा से पवनसुत को जो वरदान मिला, उससे पवनसुत किसी को भी आठों सिद्धि और नवों निधि दे सकते हैं "
और ये आठों सिद्धि और नौ निधि हैं....

सिद्धि-

१) अणिमा - जिससे साधक किसी को दिखाई नहीं पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ में परवेस कर सकता है..

२) महिमा - जिसमे योगी अपने को कितना भी विशाल आकार का बना सकता है.

३) गरिमा - जिसमे साधक अपने को चाहे कितना भी भारी बना सकता है.

४) लघिमा - जिसमे साधक जितना चाहे उतना हल्का बन सकता है.

५) प्राप्ति - जिसमे इच्छित वस्तु की प्राप्ति संभव है.

६) प्रकामी - जिसमे इच्छा करने पर वह पृथ्वी में समा सकता है, आकाश में उड़ सकता है.

७) ईशित्व - जिससे सब पर शासन का सामर्थ्य पाता है.

८) वशित्व - जिससे दूसरों को वश में किया जा सकता है.

नौ निधि .....

पद्म , महापद्म, शंख, मकर, कछप, मुकुंद, कुंद, नील, बर्च्च ...

माता पिता या अग्रजों का सरधा और सम्मान पूरवक सच्चे हिरदय से सेवा करने से जो फल मिलता है,उसका इससे परतच्छ उदाहरण औ का हो सकता है...

हो सकता है हनुमान जी,राम जी,कृष्ण भगवान्, आदि आदि ई सब के सब कोरे काल्पनिक पात्र हों, इनका कोई आस्तित्व या वास्तविक आधार न हो...पर किसी ऐसे अवधारणा से ,ऐसे आधार से, जिससे घोरतम संकट में भी उबरने का आस विस्वास मिले, इनके चरित्र से अपने चरित्र को ऊपर उठाने संवारने का प्रेरणा मिले...तो इन चरित्रों को नकारना, उचित होगा क्या ???
सुख ही तो पाने के समस्त यत्न विज्ञान भी कर रहा है,पर इसके कतिपय पुरोधा संगे संग नारा दिए जा रहे हैं कि भूत परेत लछमी दुर्गा राम किसन ई सब अंधविश्वास है...तो अँधा ही सही,यह विश्वास बेहतर नहीं जो व्यक्ति को उद्दात्त चरित्र वाला बनने का प्रेरणा दे ???

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18.1.10

लोकधर्म (भाग -१)

ईश्वर की अपार अनुकम्पा से कुछ दिनों पूर्व आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखित अप्रतिम कृति " गोस्वामी तुलसीदास " पढने का सौभाग्य मिला.पुस्तक की प्रस्तावना में डाक्टर हरिवंश तरुण ने लिखा है -
"आचार्य शुक्ल ने इस शिखर कृति में तुलसी की भक्ति-पद्धति,प्रकृति और स्वभाव,लोकधर्म,धर्म और जातीयता का समन्वय ,मंगलाशा, लोकनीति और मर्यदावाद, लोकसाधना और भक्ति , ज्ञान और भक्ति, काव्य पद्धति, भावुकता, शील निरूपण और चरित्र चित्रण, बाह्य दृश्य चित्रण, अलंकार विधान, उक्तिवैचित्र्य , भाषाधिकार, मानस की धर्मभूमि आदि पर जो सांगोपांग एवं अंतर्दर्शी प्रकाश डाला है, लगता है, गोस्वामी तुलसीदास के बहु फलकीय व्यक्तित्व एवं अप्रतिम काव्यसाधना के परत दर परत खुलते जा रहे हों और उनके अध्येता उनसे प्रक्षेपित होनेवाली प्रकाश किरणों से आलोकित हो अनिर्वचनीय आह्लाद की अनुभूति कर रहे हों....."

पुस्तक के पठनोपरांत ये वाक्यांश तो शब्दशः सत्य लगे ही,यह विशेष रूप से अभिभूत कर गया कि आचार्यवर ने कितनी शूक्ष्म अंतर्दृष्टि से भारतीय जनमानस की वृत्तियों और रुचियों को समझा परखा है...और जो भी स्थापनाएं उन्होंने की हैं,वे सदा के लिए भारतीय परिवेश में समीचीन व प्रासंगिक रहेंगी..

हो सकता है कई साहित्य प्रेमियों ने यह पुस्तक पढी हो.परन्तु मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि जन्होने भी यह पढ़ी होगी और इसमें डूब कर इसके अलौकिक रस का आनंद लिया होगा,उनके लिए इसका पुनर्पठन पूर्वत ही आह्लादकारी होगा.इस अप्रतिम पुस्तक से "लोक धर्म" शीर्षकान्तर्गत आलेख का एक अंश मैं अपने ब्लॉग पर सगर्व सहर्ष साहित्यप्रेमियों के लिए प्रेषित कर रही हूँ...

लोकधर्म -(ले.श्री आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक " गोस्वामी तुलसीदास " से-)
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कर्म ,ज्ञान और उपासना, लोकधर्म के ये तीन अवयव जनसमाज की स्थिति लिए बहुत प्राचीन काल से भारत में प्रतिष्ठित है | मानव जीवन की पूर्णता इन तीनो के मेल के बिना नहीं हो सकती | पर देश - काल के अनुसार कभी किसी अवयव की प्रधानता रही, कभी किसी की | यह प्रधानता लोक में जब इतनी प्रबल हो जाती है कि दुसरे अवयवों की ओर लोक की प्रवृति का अभाव सा होने लगता है ,तब साम्य स्थापित करने के लिए ,शेष अवयवों की ओर जनता को आकर्षित करने के लिए कोई न कोई महात्मा उठ खड़ा होता है | एक बार जब कर्मकांड की प्रबलता हुई तब याज्ञवल्क्य के द्वारा उपनिषदों के ज्ञानकाण्ड की ओर लोग प्रवृत्त किये गए |कुछ दिनों में फिर कर्मकांड प्रबल पड़ा और यज्ञों में पशुओ का बलिदान धूमधाम से होने लगा | उस समय भगवान् बुद्धदेव का अवतार हुआ, जिन्होंने भारतीय जनता को एक बार कर्मकांड से बिलकुल हटाकर अपने ज्ञानवैराग्यमिश्रित धर्म की ओर लगाया | पर उनके धर्म में 'उपासना ' का भाव नहीं था, इससे साधारण जनता की तृप्ति उस से न हुई और उपासना -प्रधान धर्म की स्थापना फिर से हुई |

पर किसी एक अवयव की अत्यंत वृद्धि से उत्पन्न विषमता को हटाने के लिए जो मत प्रवर्तित हुए ,उनमे उनके स्थान पर दूसरे अवयव का हद से बढ़ना स्वाभाविक था | किसी बात की एक हद पर पहुँच कर जनता फिर पीछे पलटती है और क्रमशः बढती हुई दूसरी हद पर जा पहुचती है | धर्म और राजनीति दोनों में यह उलटफेर ,चक्रगति के रूप में ,होता चला आ रहा है |जब जनसमाज नई उमंग से भरे हुए किसी शक्तिशाली व्यक्ति के हाथ पड़कर किसी एक हद से दूसरी हद पर पंहुचा दिया जाता है , तब काल का संग पाकर उसे फिर किसी दुसरे के सहारे किसी दूसरे हद तक जाना पड़ता है | जिन मत प्रवर्तक महात्माओं को आजकल की बोली में हम 'सुधारक 'कहते है वे भी मनुष्य थे| किसी वस्तु को अत्यधिक परिमाण में देख जो विरक्ति या द्वेष होता है वह उस परिमाण के ही प्रति नहीं रह जाता , किन्तु उस वस्तु तक पहुचता है | चिढ़नेवाला उस वस्तु की अत्यधिक मात्रा से चिढने के स्थान पर उस वस्तु से ही चिढने लगता है और उससे भिन्न वस्तु की ओर अग्रसर होने और अग्रसर करने में परिमिति या मर्यादा का धयान नहीं रखता |इस से नए-नए मत प्रवर्तकों या 'सुधारकों ' से लोक में शांति स्थापित होने के स्थान पर अब तक अशांति ही होती आई है | धर्म के सब पक्षों का ऐसा सामंजस्य जिससे समाज की भिन्न-भिन्न व्यक्ति अपनी प्रकृति और विद्या-बुद्धि के अनुसार धर्म का स्वरुप ग्रहण कर सकें ,यदि पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित हो जाये तो धर्म का रास्ता अधिक चलता हो जाये |

उपर्युक्त सामंजस्य का भाव लेकर गोस्वामी तुलसीदासजी की आत्मा ने उस समय भारतीय जनसमाज के बीच अपनी ज्योति जगाई जिस समय नए-नए सम्प्रदायों की खीचतान के कारण आर्यधर्म का व्यापक स्वरुप आँखों से ओझल हो रहा था, एकांगदर्शिता बढ़ रही थी | जो एक कोना देख पाता था, वह दूसरे कोने पर दृष्टि रखनेवालो को बुरा भला कहता था | शैवों , वैष्णों , शाक्तों और कर्मठो की तू तू -मैं मैं तो थी ही, बीच में मुसलमानों से अविरोध प्रदर्शन करने के लिए भी अपढ़ जनता को साथ लगाने वाले कई नए-नए पंथ निकल चुके थे जिनमें एकेश्वरवाद का कट्टर स्वरुप ,उपासना का आशिकी रंगढंग ,ज्ञानविज्ञान की निंदा ,विद्वानों का उपहास ,वेदांत के चार प्रसिद्द शब्दों का अनाधिकार प्रयोग आदि सब कुछ था; पर लोक को व्यवस्थित करने वाली वह मर्यादा न थी जो भारतीय आर्येधर्म का प्रधान लक्षण है | जिस उपासनाप्रधान धर्म का जोर बुद्ध के पीछे बढ़ने लगा, वह उस मुसलमानी राजत्वकाल में आकर -जिसमे जनता की बुद्धि भी पुरुषार्थ के हास के साथ-साथ शिथिल पड गयी थी - कर्म और ज्ञान दोनों की उपेक्षा करने लगा था | ऐसे समय में इन नए पंथों का निकलना कुछ आश्चर्ये की बात नहीं| उधर शास्त्रों का पठन पाठन कम लोगो में रह गया , इधर ज्ञानी कहलाने की इच्छा रखनेवाले मूर्ख बढ़ रहे थे जो किसी 'सतगुरु के प्रसाद ' मात्र से ही अपने को सर्वज्ञ मानने के लिए तैयार बैठे थे | अतः 'सतगुरु ' भी उन्हीं मे निकल पड़ते थे जो धर्म का कोई एक अंग नोचकर एक ओर भाग खड़े होते थे , और कुछ लोग झाँज-खँजरी लेकर उनके पीछे हो लेते थे |दंभ बढ रहा था | 'ब्रह्मज्ञान बिन नारि नर कहहिं न दूसरि बात ' - ऐसे लोगो ने भक्ति को बदनाम कर रखा था | 'भक्ति ' के नाम पर ही वे वेदशास्त्रों की निंदा करते थे,पंडितों को गालियाँ देते थे और आर्यधर्म के सामाजिक तत्व को न समझकर लोगो में वर्णाश्रम के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न कर रहे थे | यह उपेक्षा लोक के लिए कल्याणकर नहीं | जिस समज से बडों का आदर, विद्वानों का सम्मान, अत्याचार का दलन करनेवाले शूरवीरों के प्रति श्रद्धा इत्यादि भाव उठ जायें,वह कदापि फलफूल नहीं सकता ; उसमें अशांति सदा बनी रहेगी |

'भक्ति ' का यह विकृत रूप जिस समय उतर भारत में अपना स्थान जमा रहा था ,उसी समय भक्तवर गोस्वामीजी का अवतार हुआ जिन्होनें वर्णधर्म , आश्रमधर्म ,कुलाचार , वेदविहित कर्म, शास्त्रप्रतिपादित ज्ञान इत्यादि सबके साथ भक्ति का पुनः सामंजस्य स्थापित करने आर्यधर्म को छिन्नभिन्न होने से बचाया | ऐसे सर्वांगदर्शी लोक्व्यव्स्थापक महात्मा के लिए मर्यादापुरुषोत्तम भागवान रामचंन्द्र के चरित्र से बढकर अवलम्ब और क्या मिल सकता था ! उसी आदर्श चरित्र के भीतर अपनी आलौकिक प्रतिभा के बल से उन्होंने धर्म के सब रूपों को दिखाकर , भक्ति का प्रकृत आधार खड़ा किया | जनता ने लोक की रक्षा करनेवाले प्राकृतिक धर्म का मनोहर रूप देखा| उसने धर्म को दया , दाक्षिन्य , नम्रता ,सुशीलता , पितृभक्ति, सत्यव्रत ,उदारता ,प्रजापालन , क्षमा आदि में ही नहीं देखा बल्कि अत्याचारियों पर जो क्रोध प्रकट किया जाता है , असाध्य दुर्जनों के प्रति जो घृणा प्रकट की जाती है , दीनदुखियों को सतानेवालों का जो संहार किया जाता है ,कठिन कर्तव्यों के पालन में जो वीरता प्रकट की जाती है, उसमें भी धर्म अपना मनोहर रूप दिखता है | जिस धर्म की रक्षा से लोक की रक्षा होती है- जिससे समाज चलता है - वह यही व्यापक धर्म है | सत् और असत , भले और बुरे दोनों के मेल का नाम संसार है |पापी और पुण्यात्मा ,परोपकारी और अत्याचारी , सज्जन और दुर्जन सदा से संसार में रहते आये है और सदा रहेंगे -

सुगुण छीर अवगुण जल , ताता | मिलई रचई परपंच विधाता ||

किसी एक सर्प को उपदेश द्वारा चाहे कोई अहिंसा में तत्पर कर दे, किसी डाकू को साधू बना दे,क्रूर को सज्जन कर दे, पर सर्प ,दुर्जन और क्रूर संसार में रहेंगे और अधिक रहेंगे | यदि ये उभय पक्ष न होंगे, तो सारे धर्म और कर्तव्य की ,सारे जीवनप्रयत्न की इतिश्री हो जाएगी | यदि एक गाल में चपत मारनेवाला ही न रहेगा तो दूसरा गाल फेरने का महत्व कैसे दिखाया जायगा ? प्रकृति के तीनों गुणों की अभिव्यक्ति जबतक अलग अलग है.तभी तक उसका नाम जगत या संसार है | अतः एसी दुष्टता सदा रहेगी जो सज्जनता के द्वारा कभी नहीं दबाई जा सकती, ऐसा अत्याचार सदा रहेगा जिसका दमन उपदेशों के द्वारा कभी नहीं हो सकता| संसार जैसा है वैसा मानकर उसके बीच से एक कोने को स्पर्श करता हुआ, जो धर्म निकलेगा वही धर्म लोकधर्म होगा | जीवन के किसी एक अंग मात्र को स्पर्श करनेवाला धर्म लोकधर्म नहीं |जो धर्म उपदेश द्वारा न सुधरनेवाले दुष्टों और अत्याचारियों को दुष्टता के लिए छोड़ दे , उनके लिए कोई व्यवस्था न करे , वह लोकधर्म नहीं ,व्यक्तिगत साधना है |यह साधना मनुष्य की वृति को ऊँचे से ऊँचे ले जा सकती है जहाँ वह लोकधर्म से परे हो जाती है |पर सारा समाज इसका अधिकारी नहीं | जनता की प्रवृतियों का औसत निकालने पर धर्म का जो मान निर्धारित होता है ,वही लोकधर्म होता है |

क्रमशः -
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