स्वयं को बहुत पहले से ही मैंने चेता रखा था कि, अपनी तथा अपने संवेदनशीलता की रक्षा के लिए कभी भी कुछ खाते पीते समय समाचार पठन या दर्शन न किया करूँ...परन्तु दुर्भाग्यवश आज उसे विस्मृत कर दोपहर के भोजन काल में टी वी पर समाचार देखने बैठ गयी ..सामने कल तक जीवित परन्तु आज मृत सी आई डी के पदाधिकारी फ्रांसिस हेम्ब्रम का वह चेहरा आया जिसे नक्सलियों ने अपने तीन शीर्ष नेताओं कोबर्ट गांधी ,छत्रधर महतो और भूषन को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाने के बाद ,उन्हें मुक्त कराने हेतु अपहरण के बाद धमकी स्वरुप अपनी गंभीरता तथा प्रतिबद्धता दिखाते हुए मार डाला था...
मन अत्यंत खिन्न और विचलित हो गया और सच कहूँ तो लगा कि अभी जाकर पुलिस की गिरफ्त में उन तथाकथित महान नेताओं की हत्या कर इन्हें भी सबक सिखाऊँ. यह हमारे देश की कैसी न्याय प्रणाली है,जिसमे दुर्दांत अपराधियों के मानवाधिकारों के लिए भी इतनी चिंता की जाती है कि न्यायिक प्रक्रिया में उसमे और सामान्य अपराधी में कोई भेद नहीं किया जाता और दूसरी ओर कमजोर मासूम आदमी की रक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं....
सामर्थ्यवान द्वारा शक्तिहीन को शोषित पीड़ित होते देख सुन कर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का ह्रदय प्रतिकार को उत्कंठित हो उठता है और आक्रोश की यह मात्रा ज्यों ज्यों बढ़ती जाती है,एक सामान्य शक्तिहीन मनुष्य में भी शोषक को समाप्त करने की प्रतिबद्धता प्रगढ़तम होती जाती है.. और फिर प्रतिकार का सबसे पहला मार्ग जो उसे दीखता है वह उग्रता और हिंसा का ही हुआ करता है...आवेग व्यक्ति में उस सीमा तक धैर्य का स्थान नहीं छोड़ती, कि व्यक्ति सत्याग्रह एवं अहिंसक मार्ग अपना सके और उसपर अडिग रह सके.रक्षक को ही भक्षक बने देख स्वाभाविक ही किसी भी संवेदनशील का खून खौलना और आवेश में उसके द्वारा अस्त्र उठा लेना,एक सामान्य बात है...
विश्व इतिहास साक्षी है ऐसे अनेकानेक विद्रोहों विप्लवों का जब अन्याय के प्रतिकार में व्यक्ति या समूह ने अस्त्र उठाये,आत्मबलिदान दिया और शोषकों के प्राण हरे.हत्या चाहे शोषक करे या शोषित,हत्या तो हत्या ही होती है,लेकिन अपने उद्देश्य के कारण एक पाप है तो दूसरा पुण्य.एक ही कार्य उद्देश्य भिन्न होने पर विपरीत अर्थ और परिणामदाई हो जाते है.परन्तु दोनों के मध्य अदृश्य अतिशूक्ष्म वह अंतर है जो पता ही नहीं चलने देता कि कब शोषित शोषक बन गया....
साठ की दशक में नक्सल आन्दोलन की नींव जिस विचारभूमि पर पड़ी थी, अन्याय और शोषण के विरुद्ध सशश्त्र प्रतिकार को उपस्थित हुआ वह समूह एक तरह से निंदनीय नहीं, वन्दनीय ही था.मुझे लगता है तब यदि मैं वयस्क रही होती तो मैं भी इसकी प्रबल समर्थक और प्रमुख कार्यकर्त्ता रही होती. इसके महत उद्देश्य ने ही देश के युवा वर्ग को सम्मोहित कर एकजुट किया था. देश को चलाने वाले बहुत छोटे से पदाधिकारी से लेकर शीर्षस्थ पदाधिकारी तक,राजनेता ,पूंजीपति आदि आदि यदि पथभ्रष्ट हो जायं और पोषक के बदले शोषक बन आमजन का जीवन दुरूह कर दें,न्याय पालिका तक अपनी प्रासंगिकता खो चुकी हो , तो उनके विरुद्ध आवाज़ बुलंद करना, उन्हें चेताना और दण्डित करना किसी भी लिहाज से अनैतिक नहीं.बल्कि मैं तो कहूँगी आज भी ऐसे ही समूह और शक्ति की आवश्यकता है जो पथविमुख को सही मार्ग पर रखने के लिए सदैव ही प्राणोत्सर्ग को तत्पर रहे...
परन्तु यही रक्षक शक्तियां जनकल्याण मार्ग से विमुख हो यदि शोषक और हिंसक बन जाय तो इन्हें कुचलना भी उतना ही आवश्यक है.कैसी विडंबना है,सरकार द्वारा विकास न किये जाने,पूंजीपतियों द्वारा शोषित होने और समस्त सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के त्रासद स्थिति पर , जिस जनांदोलन की नींव रखी गयी ,आज महज तीन चार दशकों में ही इसका रूप विद्रूप हो आन्दोलन ठीक इसके विपरीत मार्ग पर चल अधोगामी हो चुका है . विकास का मार्ग पूर्ण रूपेण अवरुद्ध कर,उन्ही देशी विदेशी पूंजीपतियों ,विध्वंसक शक्तियों से सांठ गाँठ कर उनके आर्थिक मदद से तथा व्यापारी वर्ग को आतंकित कर उनसे धन उगाह अपना और भ्रष्ट राजनेताओं का स्वार्थ साधना , जब उस उग्रवादी समूह का सिद्धांत और स्वभाव बन जाय तो ऐसे समूह को डाकुओं हत्यारों का एक सुसंगठित गिरोह ही कहना होगा न ,जिसका उद्देश्य ही आतंक के सहारे धन लूटना, आतंक का धंधा चलाना और अपने ही देश को कमजोर करना है .
कहा जाता है कि दलित शोषित गरीब लोग हथियार उठा नक्सली बन रहे हैं.यदि यह समूह दलित शोषित उन गरीब लोगों का है,जिनके पास अन्न,वस्त्र,छत,जमीन और रोजी रोजगार नहीं हैं, तो भला इनके पास बेशकीमती अत्याधुनिक हथियार कहाँ से आ जाते हैं ?? यह सोचने और हंसने वाली बात है..यह किसी से छुपा नहीं अब कि, इस समूह के आय के श्रोत क्या हैं और इनके उद्देश्य क्या हैं...
समूह तो पथभ्रष्ट हो ही चुका है,पर सबसे दुखद यह है कि हमारे देश के कर्ताधर्ताओं को अभी भी यह कोई बड़ी समस्या नहीं लगती.हमारे यहाँ एक विचित्र व्यवस्था है,व्यक्ति का अपराध ही दंड प्रक्रिया से गुजरता है,समूह का अपराध जघन्य नहीं माना जाता और उसमे भी जितना बड़ा समूह, वह उतना ही उच्छश्रृंखल उतना ही मुक्त होता है... जानकार जानते हैं कि अपने ही देश में कई समूहों ने इसे अपना रोजगार बना लिया है..कहीं उल्फा ,कहीं नक्सल कहीं किसी और नाम से एक समूह संगठित होता है और ये सरकार को शांति और सुव्यवस्था बनाये रखने देने में सहयोग के नाम पर लेवी वसूल करते हैं.और इस तरह चलता है इनका पूरा व्यापार..
सरकार और ये आतंकी संगठन दोनों के ही उद्देश्य लोगों को अशिक्षित रख,उन्हें दुनिया और विकास से पूरी तरह काट भली भांति पूरे होते हैं.कौन नहीं जानता कि इनके ही इशारे पर मतदान भी हुआ करते हैं.इन आतंकवादियों से प्रभावित इलाकों में पूर्ण रूपेण इनका ही साम्राज्य चलता है और ये ही फौरी तौर पर राजनेताओं तथा राजनीति की दिशा दशा निर्धारित करते हैं....
इसके विकल्प रूप में तो यही दीखता है कि जब प्रशासन आँख कान मुंह ढांपे पड़ा है तो क्यों न लोहा से लोहे को काटने की तर्ज पर एक ऐसा ही सशश्त्र समूह संगठित किया जाय और इन आततायी शक्तियों को सबक सिखाई जाय...पर फिर यही लगता है कि इसकी क्या गारंटी है कि यह नया समूह भी कभी स्वार्थी नेताओं के नेतृत्व में स्वार्थी तथा विघटनकारी न बनेगा..
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6.10.09
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