अस्त्र सश्त्रों के विषय में मेरी अल्पज्ञता ठीक वैसी ही है ,जैसी मंत्री पद पर आसीन किसी जनसेवक की अपने क्षेत्र की जनसमस्याओं के विषय में हुआ करती है..सो पूर्णतः अनभिज्ञ हूँ कि एक इंसास रायफल का क्रय या विक्रय (चोर बाजार में)मूल्य क्या होता है, परन्तु इतना मैं जानती हूँ कि यदि इंसास रायफल बेचकर साढ़े तीन लाख रुपये मिले और उस पैसे से एक आटा चक्की लगवाई जाय, एक स्कूटी,एक टी वी तथा कुछ अन्य घरेलू उपकरण खरीदने के उपरान्त भी इसमें से एक लाख रुपये बचाकर भविष्य कोष में संरक्षित रख लिया जाय, तो इससे अच्छा निवेश, इससे अच्छी दूरंदेसी तथा इससे अच्छा धन का सदुपयोग और कुछ नहीं हो सकता..
प्रसंग स्पष्ट न हुआ ?? अरे, स्पष्ट होगा भी कैसे ,राहुल डिम्पी में व्यस्त हमारे राष्ट्रीय चैनलों को यह अवकाश कहाँ कि अपना कैमरा इन उल्लेखनीय समाचारों पर भी घुमाएं. प्रकरण यह है कि, विगत कुछ दिनों से थानों से अस्त्र लुप्त होने की घटनाएं हमारे प्रादेशिक समाचार पत्र को शोभायमान कर रहे थे ,जिसमे कि इसके संरक्षकों (पुलिसकर्मियों) की ही संलिप्तता थी.कई दिनों तक अखबार के पांचवें छट्ठे पन्ने पर स्थान पाता हुआ यह समाचार अंततः मुख्यपृष्ठ को प्राप्त हुआ ,जिसमे प्रमाण सहित उधृत था कि अमुक पुलिसकर्मी के नाम आवंटित, अमुक इंसास को, अमुक व्यक्ति ने कोलकाता के, अमुक व्यक्ति को साढ़े तीन लाख में बेचा और प्राप्त उस धन को, अमुक अमुक मद में व्यय किया...
मेरी दृष्टि में महत्वपूर्ण व उल्लेखनीय यह चौरकर्म नहीं , अपितु वह निवेश है, जिसे इतनी दूरदर्शिता व कुशलता से निष्पादित दिया गया है..यह प्राणिमात्र के लिए प्रेरक और अनुकरणीय है...यह, यह भी सिखाता है कि अपने जीवन यापन हेतु केवल सरकार या किसी संस्था विशेष पर आश्रित न रहा जाय बल्कि व्यक्ति अपने पुरुषार्थ के बल पर अपने तथा अपने परिवार का भविष्य निर्मित करे ..और सबसे महवपूर्ण बात यह कि धन चाहे ईमानदारी से कमाया हुआ हो या चोरी चकारी घूसखोरी,बेईमानी से ,अर्जित धन को ऐश मौज ,हँड़िया - दारू में व्यर्थ न गंवाते हुए व्यक्ति भविष्य संवारने में लगाये ...
असाधारण यह प्रसंग यूँ ही ठठ्ठा में उड़ा दिया जाने योग्य नहीं, बहुआयामी चिंतन योग्य भी है...समाचार पत्र ने उक्त व्यक्ति द्वारा क्रयित उपकरणों की जो तालिका प्रस्तुत की है,यह चतुर्थ वर्ग के सरकारी कर्मचारी की करुण आर्थिक स्थिति की बेमिसाल झांकी है...अवकाश प्राप्ति के निकट पहुंचा एक पुलिसकर्मी , इतने वर्षों की चाकरी के उपरान्त भी अपने लिए एक नंबर के पैसे से स्कूटी, टी वी जैसे सामान्य उपकरण भी न खरीद पाए ,तो इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है...और ऐसे में इस नीरीह जीव से यदि हम अपेक्षा करें कि अपना सर्वस्व न्योछावर करने में तो वह एक पल न लगाये ,पर अपने और अपने संतान के भविष्य के लिए वह किंचित भी चिंतित न हो ,तो यह इनके प्रति अन्याय नहीं तो और क्या है ???
मुझे तो यह नहीं समझ आ रहा कि यह भलामानुष चोर या अपराधी कैसे हुआ..इतने वर्षों में जहाँ झारखण्ड के दिग्गज लालों ने कई कई हज़ार करोड़ की राशि यूँ ही डकार,पचा, अपने तथा अपने पीढ़ियों के लिए स्विस बैंक में संरक्षित रख रखा है, तो उसके सामने सागर जल में से एक बूँद यदि इस झारखंडी लाल ने अपने लिए निकाल लिया तो इसमें हाय तौबा लायक क्या है..इन दिग्गजों के सम्मुख इन निरीहों को चोर कहना इस शब्द तथा कृत्य की घोर अवमानना है . इस महान व्यक्ति को तो गद्दार नहीं ,देशभक्त कहना होगा, जिसने धन से किसी और का घर नहीं भरा बल्कि पूरा का पूरा धन यहीं अपने ही क्षेत्र में,घर के एकदम बगल में ऐसे स्थान में निवेश किया जहाँ आटा,मसाला आदि पिसवाने की भी सुविधा नहीं है..इस तरह एक साथ अपना और अपने आस पास का भला सोचने वाले आज कितने राजनेता हैं...
वैसे भी तो ये अस्त्र शस्त्र नक्सली लूट ही ले जाते और फिर इन्ही के अस्त्रों से इन्हें निपटा डालते...तो अच्छा ही हुआ न कि इन्होने अपने प्राण भी बचाए और इन अस्त्रों को सदगति भी दे दी..अब इन बेचारों को अपराधियों नक्सलियों से भिड़ने, उन्हें मारने की आज्ञा तो है नहीं, क्योंकि उनमे से अधिकाँश या तो सीधे स्वयं ही नेता हैं और बाकी बचे उन नेताओं के सगे संबंधी या लगुए भगुए , तो यूँ ही वर्षों से व्यर्थ पड़े जंग लग रहे अस्त्रों को उपयुक्त हाथों बेच इन्होने पुण्य का काम ही किया है...
रात दिन अपनी तथा इन अस्त्रों की रक्षा करते करते बेचारे पुलिसकर्मियों के प्राण यूँ ही सांसत में फंसे रहते हैं ,ऐसे में स्वयं को तनाव मुक्त रखने का इससे उपयुक्त उपाय और कुछ हो सकता है भला ?? मुझे तो लगता है इस अनुकरणीय कृत्य को प्रत्येक थाने में, प्रत्येक पुलिस कर्मी द्वारा अपनाना चाहिए...बल्कि यही क्यों, अपने पुलिस कर्मियों को समय पर वेतन भत्ते सुविधाएँ दे पाने में अक्षम झारखण्ड सरकार को चाहिए कि अस्त्र शस्त्र सहित पूरा पुलिस बल ही नक्सलियों को इस अनुबंध के साथ आउटसोर्स (हस्तांतरित) कर दे कि सुव्यवस्थित व सुसंगठित ढंग से व्यवस्था चलाने में सिद्धहस्त ये संगठन राज्य तथा पुलिस बल की सुरक्षा करें..अपरोक्ष रूप से नहीं, बल्कि सीधे सीधे प्रत्यक्षतः राज्य व्यवस्था का सञ्चालन करें..
कहने की आवश्यकता नहीं कि पिछले एक दशक से भी कम समय में, जिस प्रकार से इन संगठनों ने अपने आप को सुसंगठित ,सुदृढ़ तथा प्रभावशाली बनाया है,यह इनकी कुशल प्रबंधन क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण है.इनके हाथों राज्य की बागडोर आते ही निश्चित ही राज्य का बहुमुखी विकाश होगा..राज्य व्यवस्था प्रत्यक्ष इनके हाथों होगी तो , न तो इनके द्वारा न आमजन द्वारा हड़ताल, बंदी या अन्य अव्यवस्था की स्थिति बनेगी. तो ऐसे में निश्चित है कि राज्य का आय बढेगा ही बढेगा.इसमें समग्र रूप से नेता ,जनता तथा संगठन सबका हित होगा...
देखिये कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि दस बीस दर्जन पुलिस कर्मी एक साथ मर जाएँ तो भी सरकार कहती है कि ,इन्हें तो रखा ही गया है भिड़ने मरने के लिए..लेकिन एक नक्सली मारा जाये तो पांच पांच राज्यों की सांस एक साथ इनके एक आवाज पर बंद हो जाती है..संगठन में भरती के लिए न शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता ,न जात पात या आरक्षण की किचकिच, बस दिल में जज्बा हो और हथियार चलाने का हुनर,फिर जीवन और भविष्य सुरक्षित..मरने पर परिवार वालों को कम्पंशेशन पाने का कोई चक्कर नहीं.ऐसे में बस एक इस पार से उसपार जाते ही पुलिसकर्मी कितने सुखी और सुरक्षित हो जायेंगे...
खैर, ये सब बड़ी बड़ी बाते हैं, झारखण्ड सरकार पूरे पुलिस तथा शासन तंत्र को नक्सलियों के हवाले करे न करे या जब करे तब करे, अभी मैं सरकार से निवेदन करना चाहती हूँ कि, इस महत घटना में लिप्त पुलिसकर्मियों को अवश्य ही पुरस्कृत करे दे.. क्योंकि यदि यह न किया गया तो जनमानस को कभी न समझाया जा सकेगा कि धन चाहे इमानदारी का हो या बेईमानी का सदा उसका सदुपयोग ही करना चाहिए...
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6.8.10
6.10.09
नक्सलवाद का वाद (???)
स्वयं को बहुत पहले से ही मैंने चेता रखा था कि, अपनी तथा अपने संवेदनशीलता की रक्षा के लिए कभी भी कुछ खाते पीते समय समाचार पठन या दर्शन न किया करूँ...परन्तु दुर्भाग्यवश आज उसे विस्मृत कर दोपहर के भोजन काल में टी वी पर समाचार देखने बैठ गयी ..सामने कल तक जीवित परन्तु आज मृत सी आई डी के पदाधिकारी फ्रांसिस हेम्ब्रम का वह चेहरा आया जिसे नक्सलियों ने अपने तीन शीर्ष नेताओं कोबर्ट गांधी ,छत्रधर महतो और भूषन को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाने के बाद ,उन्हें मुक्त कराने हेतु अपहरण के बाद धमकी स्वरुप अपनी गंभीरता तथा प्रतिबद्धता दिखाते हुए मार डाला था...
मन अत्यंत खिन्न और विचलित हो गया और सच कहूँ तो लगा कि अभी जाकर पुलिस की गिरफ्त में उन तथाकथित महान नेताओं की हत्या कर इन्हें भी सबक सिखाऊँ. यह हमारे देश की कैसी न्याय प्रणाली है,जिसमे दुर्दांत अपराधियों के मानवाधिकारों के लिए भी इतनी चिंता की जाती है कि न्यायिक प्रक्रिया में उसमे और सामान्य अपराधी में कोई भेद नहीं किया जाता और दूसरी ओर कमजोर मासूम आदमी की रक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं....
सामर्थ्यवान द्वारा शक्तिहीन को शोषित पीड़ित होते देख सुन कर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का ह्रदय प्रतिकार को उत्कंठित हो उठता है और आक्रोश की यह मात्रा ज्यों ज्यों बढ़ती जाती है,एक सामान्य शक्तिहीन मनुष्य में भी शोषक को समाप्त करने की प्रतिबद्धता प्रगढ़तम होती जाती है.. और फिर प्रतिकार का सबसे पहला मार्ग जो उसे दीखता है वह उग्रता और हिंसा का ही हुआ करता है...आवेग व्यक्ति में उस सीमा तक धैर्य का स्थान नहीं छोड़ती, कि व्यक्ति सत्याग्रह एवं अहिंसक मार्ग अपना सके और उसपर अडिग रह सके.रक्षक को ही भक्षक बने देख स्वाभाविक ही किसी भी संवेदनशील का खून खौलना और आवेश में उसके द्वारा अस्त्र उठा लेना,एक सामान्य बात है...
विश्व इतिहास साक्षी है ऐसे अनेकानेक विद्रोहों विप्लवों का जब अन्याय के प्रतिकार में व्यक्ति या समूह ने अस्त्र उठाये,आत्मबलिदान दिया और शोषकों के प्राण हरे.हत्या चाहे शोषक करे या शोषित,हत्या तो हत्या ही होती है,लेकिन अपने उद्देश्य के कारण एक पाप है तो दूसरा पुण्य.एक ही कार्य उद्देश्य भिन्न होने पर विपरीत अर्थ और परिणामदाई हो जाते है.परन्तु दोनों के मध्य अदृश्य अतिशूक्ष्म वह अंतर है जो पता ही नहीं चलने देता कि कब शोषित शोषक बन गया....
साठ की दशक में नक्सल आन्दोलन की नींव जिस विचारभूमि पर पड़ी थी, अन्याय और शोषण के विरुद्ध सशश्त्र प्रतिकार को उपस्थित हुआ वह समूह एक तरह से निंदनीय नहीं, वन्दनीय ही था.मुझे लगता है तब यदि मैं वयस्क रही होती तो मैं भी इसकी प्रबल समर्थक और प्रमुख कार्यकर्त्ता रही होती. इसके महत उद्देश्य ने ही देश के युवा वर्ग को सम्मोहित कर एकजुट किया था. देश को चलाने वाले बहुत छोटे से पदाधिकारी से लेकर शीर्षस्थ पदाधिकारी तक,राजनेता ,पूंजीपति आदि आदि यदि पथभ्रष्ट हो जायं और पोषक के बदले शोषक बन आमजन का जीवन दुरूह कर दें,न्याय पालिका तक अपनी प्रासंगिकता खो चुकी हो , तो उनके विरुद्ध आवाज़ बुलंद करना, उन्हें चेताना और दण्डित करना किसी भी लिहाज से अनैतिक नहीं.बल्कि मैं तो कहूँगी आज भी ऐसे ही समूह और शक्ति की आवश्यकता है जो पथविमुख को सही मार्ग पर रखने के लिए सदैव ही प्राणोत्सर्ग को तत्पर रहे...
परन्तु यही रक्षक शक्तियां जनकल्याण मार्ग से विमुख हो यदि शोषक और हिंसक बन जाय तो इन्हें कुचलना भी उतना ही आवश्यक है.कैसी विडंबना है,सरकार द्वारा विकास न किये जाने,पूंजीपतियों द्वारा शोषित होने और समस्त सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के त्रासद स्थिति पर , जिस जनांदोलन की नींव रखी गयी ,आज महज तीन चार दशकों में ही इसका रूप विद्रूप हो आन्दोलन ठीक इसके विपरीत मार्ग पर चल अधोगामी हो चुका है . विकास का मार्ग पूर्ण रूपेण अवरुद्ध कर,उन्ही देशी विदेशी पूंजीपतियों ,विध्वंसक शक्तियों से सांठ गाँठ कर उनके आर्थिक मदद से तथा व्यापारी वर्ग को आतंकित कर उनसे धन उगाह अपना और भ्रष्ट राजनेताओं का स्वार्थ साधना , जब उस उग्रवादी समूह का सिद्धांत और स्वभाव बन जाय तो ऐसे समूह को डाकुओं हत्यारों का एक सुसंगठित गिरोह ही कहना होगा न ,जिसका उद्देश्य ही आतंक के सहारे धन लूटना, आतंक का धंधा चलाना और अपने ही देश को कमजोर करना है .
कहा जाता है कि दलित शोषित गरीब लोग हथियार उठा नक्सली बन रहे हैं.यदि यह समूह दलित शोषित उन गरीब लोगों का है,जिनके पास अन्न,वस्त्र,छत,जमीन और रोजी रोजगार नहीं हैं, तो भला इनके पास बेशकीमती अत्याधुनिक हथियार कहाँ से आ जाते हैं ?? यह सोचने और हंसने वाली बात है..यह किसी से छुपा नहीं अब कि, इस समूह के आय के श्रोत क्या हैं और इनके उद्देश्य क्या हैं...
समूह तो पथभ्रष्ट हो ही चुका है,पर सबसे दुखद यह है कि हमारे देश के कर्ताधर्ताओं को अभी भी यह कोई बड़ी समस्या नहीं लगती.हमारे यहाँ एक विचित्र व्यवस्था है,व्यक्ति का अपराध ही दंड प्रक्रिया से गुजरता है,समूह का अपराध जघन्य नहीं माना जाता और उसमे भी जितना बड़ा समूह, वह उतना ही उच्छश्रृंखल उतना ही मुक्त होता है... जानकार जानते हैं कि अपने ही देश में कई समूहों ने इसे अपना रोजगार बना लिया है..कहीं उल्फा ,कहीं नक्सल कहीं किसी और नाम से एक समूह संगठित होता है और ये सरकार को शांति और सुव्यवस्था बनाये रखने देने में सहयोग के नाम पर लेवी वसूल करते हैं.और इस तरह चलता है इनका पूरा व्यापार..
सरकार और ये आतंकी संगठन दोनों के ही उद्देश्य लोगों को अशिक्षित रख,उन्हें दुनिया और विकास से पूरी तरह काट भली भांति पूरे होते हैं.कौन नहीं जानता कि इनके ही इशारे पर मतदान भी हुआ करते हैं.इन आतंकवादियों से प्रभावित इलाकों में पूर्ण रूपेण इनका ही साम्राज्य चलता है और ये ही फौरी तौर पर राजनेताओं तथा राजनीति की दिशा दशा निर्धारित करते हैं....
इसके विकल्प रूप में तो यही दीखता है कि जब प्रशासन आँख कान मुंह ढांपे पड़ा है तो क्यों न लोहा से लोहे को काटने की तर्ज पर एक ऐसा ही सशश्त्र समूह संगठित किया जाय और इन आततायी शक्तियों को सबक सिखाई जाय...पर फिर यही लगता है कि इसकी क्या गारंटी है कि यह नया समूह भी कभी स्वार्थी नेताओं के नेतृत्व में स्वार्थी तथा विघटनकारी न बनेगा..
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मन अत्यंत खिन्न और विचलित हो गया और सच कहूँ तो लगा कि अभी जाकर पुलिस की गिरफ्त में उन तथाकथित महान नेताओं की हत्या कर इन्हें भी सबक सिखाऊँ. यह हमारे देश की कैसी न्याय प्रणाली है,जिसमे दुर्दांत अपराधियों के मानवाधिकारों के लिए भी इतनी चिंता की जाती है कि न्यायिक प्रक्रिया में उसमे और सामान्य अपराधी में कोई भेद नहीं किया जाता और दूसरी ओर कमजोर मासूम आदमी की रक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं....
सामर्थ्यवान द्वारा शक्तिहीन को शोषित पीड़ित होते देख सुन कर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का ह्रदय प्रतिकार को उत्कंठित हो उठता है और आक्रोश की यह मात्रा ज्यों ज्यों बढ़ती जाती है,एक सामान्य शक्तिहीन मनुष्य में भी शोषक को समाप्त करने की प्रतिबद्धता प्रगढ़तम होती जाती है.. और फिर प्रतिकार का सबसे पहला मार्ग जो उसे दीखता है वह उग्रता और हिंसा का ही हुआ करता है...आवेग व्यक्ति में उस सीमा तक धैर्य का स्थान नहीं छोड़ती, कि व्यक्ति सत्याग्रह एवं अहिंसक मार्ग अपना सके और उसपर अडिग रह सके.रक्षक को ही भक्षक बने देख स्वाभाविक ही किसी भी संवेदनशील का खून खौलना और आवेश में उसके द्वारा अस्त्र उठा लेना,एक सामान्य बात है...
विश्व इतिहास साक्षी है ऐसे अनेकानेक विद्रोहों विप्लवों का जब अन्याय के प्रतिकार में व्यक्ति या समूह ने अस्त्र उठाये,आत्मबलिदान दिया और शोषकों के प्राण हरे.हत्या चाहे शोषक करे या शोषित,हत्या तो हत्या ही होती है,लेकिन अपने उद्देश्य के कारण एक पाप है तो दूसरा पुण्य.एक ही कार्य उद्देश्य भिन्न होने पर विपरीत अर्थ और परिणामदाई हो जाते है.परन्तु दोनों के मध्य अदृश्य अतिशूक्ष्म वह अंतर है जो पता ही नहीं चलने देता कि कब शोषित शोषक बन गया....
साठ की दशक में नक्सल आन्दोलन की नींव जिस विचारभूमि पर पड़ी थी, अन्याय और शोषण के विरुद्ध सशश्त्र प्रतिकार को उपस्थित हुआ वह समूह एक तरह से निंदनीय नहीं, वन्दनीय ही था.मुझे लगता है तब यदि मैं वयस्क रही होती तो मैं भी इसकी प्रबल समर्थक और प्रमुख कार्यकर्त्ता रही होती. इसके महत उद्देश्य ने ही देश के युवा वर्ग को सम्मोहित कर एकजुट किया था. देश को चलाने वाले बहुत छोटे से पदाधिकारी से लेकर शीर्षस्थ पदाधिकारी तक,राजनेता ,पूंजीपति आदि आदि यदि पथभ्रष्ट हो जायं और पोषक के बदले शोषक बन आमजन का जीवन दुरूह कर दें,न्याय पालिका तक अपनी प्रासंगिकता खो चुकी हो , तो उनके विरुद्ध आवाज़ बुलंद करना, उन्हें चेताना और दण्डित करना किसी भी लिहाज से अनैतिक नहीं.बल्कि मैं तो कहूँगी आज भी ऐसे ही समूह और शक्ति की आवश्यकता है जो पथविमुख को सही मार्ग पर रखने के लिए सदैव ही प्राणोत्सर्ग को तत्पर रहे...
परन्तु यही रक्षक शक्तियां जनकल्याण मार्ग से विमुख हो यदि शोषक और हिंसक बन जाय तो इन्हें कुचलना भी उतना ही आवश्यक है.कैसी विडंबना है,सरकार द्वारा विकास न किये जाने,पूंजीपतियों द्वारा शोषित होने और समस्त सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के त्रासद स्थिति पर , जिस जनांदोलन की नींव रखी गयी ,आज महज तीन चार दशकों में ही इसका रूप विद्रूप हो आन्दोलन ठीक इसके विपरीत मार्ग पर चल अधोगामी हो चुका है . विकास का मार्ग पूर्ण रूपेण अवरुद्ध कर,उन्ही देशी विदेशी पूंजीपतियों ,विध्वंसक शक्तियों से सांठ गाँठ कर उनके आर्थिक मदद से तथा व्यापारी वर्ग को आतंकित कर उनसे धन उगाह अपना और भ्रष्ट राजनेताओं का स्वार्थ साधना , जब उस उग्रवादी समूह का सिद्धांत और स्वभाव बन जाय तो ऐसे समूह को डाकुओं हत्यारों का एक सुसंगठित गिरोह ही कहना होगा न ,जिसका उद्देश्य ही आतंक के सहारे धन लूटना, आतंक का धंधा चलाना और अपने ही देश को कमजोर करना है .
कहा जाता है कि दलित शोषित गरीब लोग हथियार उठा नक्सली बन रहे हैं.यदि यह समूह दलित शोषित उन गरीब लोगों का है,जिनके पास अन्न,वस्त्र,छत,जमीन और रोजी रोजगार नहीं हैं, तो भला इनके पास बेशकीमती अत्याधुनिक हथियार कहाँ से आ जाते हैं ?? यह सोचने और हंसने वाली बात है..यह किसी से छुपा नहीं अब कि, इस समूह के आय के श्रोत क्या हैं और इनके उद्देश्य क्या हैं...
समूह तो पथभ्रष्ट हो ही चुका है,पर सबसे दुखद यह है कि हमारे देश के कर्ताधर्ताओं को अभी भी यह कोई बड़ी समस्या नहीं लगती.हमारे यहाँ एक विचित्र व्यवस्था है,व्यक्ति का अपराध ही दंड प्रक्रिया से गुजरता है,समूह का अपराध जघन्य नहीं माना जाता और उसमे भी जितना बड़ा समूह, वह उतना ही उच्छश्रृंखल उतना ही मुक्त होता है... जानकार जानते हैं कि अपने ही देश में कई समूहों ने इसे अपना रोजगार बना लिया है..कहीं उल्फा ,कहीं नक्सल कहीं किसी और नाम से एक समूह संगठित होता है और ये सरकार को शांति और सुव्यवस्था बनाये रखने देने में सहयोग के नाम पर लेवी वसूल करते हैं.और इस तरह चलता है इनका पूरा व्यापार..
सरकार और ये आतंकी संगठन दोनों के ही उद्देश्य लोगों को अशिक्षित रख,उन्हें दुनिया और विकास से पूरी तरह काट भली भांति पूरे होते हैं.कौन नहीं जानता कि इनके ही इशारे पर मतदान भी हुआ करते हैं.इन आतंकवादियों से प्रभावित इलाकों में पूर्ण रूपेण इनका ही साम्राज्य चलता है और ये ही फौरी तौर पर राजनेताओं तथा राजनीति की दिशा दशा निर्धारित करते हैं....
इसके विकल्प रूप में तो यही दीखता है कि जब प्रशासन आँख कान मुंह ढांपे पड़ा है तो क्यों न लोहा से लोहे को काटने की तर्ज पर एक ऐसा ही सशश्त्र समूह संगठित किया जाय और इन आततायी शक्तियों को सबक सिखाई जाय...पर फिर यही लगता है कि इसकी क्या गारंटी है कि यह नया समूह भी कभी स्वार्थी नेताओं के नेतृत्व में स्वार्थी तथा विघटनकारी न बनेगा..
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