कभी कहीं पढ़ी हुई ,सुनी हुई एक सामान्य प्रसंग ,एक साधारण वाक्य या घटना भी कभी कभी मर्म को स्पर्श कर मन एवं चिंतन को ऐसे आंदोलित कर दिया करती है कि सोच की दिशा बदल जीवन धारा ही बदल जाया करती है....
आज अपनी एक नितांत ही व्यक्तिगत और गोपनीय अनुभूति यह सोचकर सार्वजानिक कर रही हूँ कि क्या पता जैसे प्रसंग ने मेरे सोच को परिवर्तित कर मुझे अनिर्वचनीय सुख लाभ का सुअवसर दिया,संभव है किसी और के सोच की दिशा को भी प्रभावित करे और उसके सुख का निमित्त बने...
भीड़ भाड़ सदैव ही मुझे आतंकित भयग्रस्त किया करती रही है और इससे बचने में मैं अपना पूरा सामर्थ्य लगा दिया करती हूँ...बाकी भीड़ से तो बच भी जाती थी पर अपने धर्मभीरू माता पिता संग मंदिरों के भीड़ का सामना छुटपन से ही करना पड़ा. धार्मिक स्थलों की अपार अव्यवस्थित भीड़,गन्दगी,पंडों की लूट खसोट,चारों और फ़ैली अव्यवस्था मन में इतनी वितृष्णा भरती थी कि मेरे समझ में नहीं आता था,इन सब के मध्य लोग अपनी श्रद्धा भक्ति का निष्पादन और भक्ति भाव का संवरण कैसे कर पाते हैं.इसके साथ ही तथाकथित भक्तों का क्षद्म रूप भी मुझे बड़ा ही आहत किया करता था और एक तरह से मंदिरों, कर्मकांडों के प्रति मेरी अरुचि दृढ से दृढ़तर होती गयी...मेरे अभिभावक मुझसे बड़े ही क्षुब्ध रहा करते थे. उनकी दृष्टि में मैं घोर नास्तिक थी....
मेरे विवाह के पहले तक हमारे अभिभावक वर्ष में एक बार देवघर (वैद्यनाथ धाम) अवश्य जाते थे. वहां के विहंगम दृश्य के क्या कहने......लोटे का जल शायद ही शिवशम्भू के मस्तक तक पहुँच पाता था.....समस्त पुष्प पत्र जल इत्यादि भक्तों पर ही गिरते थे..गर्भ गृह की यह अवस्था होती थी कि अधिकांशतः भोलेनाथ ही भक्तों के चरण रज प्राप्त करते थे.. यदि कोई उनके स्पर्श का सुअवसर पा जाता तो लगता यदि भोलेनाथ धरती को इतने जकड़ कर न पकडे होते तो कबके भक्त उन्हें समूल उठा अपने जेब में रख चलते बनते...
इस धक्का मुक्की में भक्ति भाव कितना बचा रहता था पता नहीं,हर व्यक्ति दुसरे को अपने स्थान का अपहर्ता घोर शत्रु सम लगता था और वश चलता तो सामने वाले को खदेड़ कर वहां से भगा देता. इस भीड़ में चोरों,जेबकतरों और ठगों की चांदी कटती थी....
उत्तर भारत के प्रायः सभी धर्मस्थलों की कमोबेश यही स्थिति आज भी है .हाँ दक्षिण भारत के जितने भी धर्मस्थलों पर आज तक भ्रमण किया ,अपार भीड़ के बावजूद मंदिर प्रशासन तथा स्थानीय प्रशासन के हस्तक्षेप से क्रमबद्ध कतारों के कारण बहुत अधिक धक्का मुक्की की स्थिति कहीं नहीं देखी...
बचपन में तो अभिभावकों के साथ जब कभी भी इस भीड़ भाड़ में जाने की बाध्यता बनी,मेरा प्रयास होता था ,शीघ्रता से उस भीड़ से निपटकर मंदिर प्रांगन में कोई ऐसा स्थान खोजना और वहां शांति से समय गुजरना जहाँ कि पर्याप्त नीरवता हो.बाद में जब स्वयं निर्णायक बनी तब बहुधा यही प्रयास रहा कि देवस्थानों पर ऐसे समय में जाया जाय जब भीड़ की संभावना न्यूनतम हो.
वर्षो तक देवस्थानों की इस भीड़ और अव्यवस्था ने मन को बड़ा ही तिक्त और खिन्न किया ...परन्तु सुसंयोग से करीब सत्रह अठारह वर्ष पहले एक बार चैतन्य महाप्रभु की जीवनी पढ़ने का अवसर मिला. संभवतः हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की लिखी हुई थी वह.. सम्पूर्ण कथानक इतने हृदयस्पर्शी ढंग से उल्लिखित था कि उसने मन प्राणों को बाँध लिया .....उसी कथानक में विवरण था कि जब चैतन्य महाप्रभु यात्रा क्रम में पुरी के जगन्नाथ मंदिर पहुंचे तो मुख्यद्वार पर पहुँचते ही प्रिय के सानिध्य स्मरण ने उन्हें भावविभोर कर दिया,उनके शरीर में रोमांच भर आया, नयनो से अविरल अश्रुधार प्रवाहित होने लगी, भक्ति और प्रेम के आवेग में वे मूर्छित हो गए.....
जब मैंने यह अंश पढ़ा तो न जाने इस प्रसंग ने ह्रदय के किस तंतु को झकझोरा .... मेरे मन ने मुझे बड़ा दुत्कारा ...मुझे लगा जिस पुरी मंदिर में जाने पर मुझे आजतक भीड़ अव्यवस्था,पण्डे , गन्दगी इत्यादि ही दिखे थे,उसी मंदिर में तो चैतन्य महाप्रभु को श्याम सलोने के दर्शन हुए .....यह तो मेरा ही दृष्टिदोष है जो आज तक मेरी दृष्टि इन अवयवों पर ही केन्द्रित रही थी . मेरा ध्यान जिन वस्तुओं पर था,मुझे वही दिखाई दिया...चैतन्य महाप्रभु के दृष्टि वलय में जो था, उन्हें वह दिखाई दिया...
इस विचार ने मुझे इतने गहरे प्रभावित किया कि ,इसने मेरा दृष्टिकोण ही बदल दिया...और उस दिन के बाद जब भी किसी देवस्थान पर गयी हूँ और मन ध्यान से वहां की सकारात्मक उर्जा से जुड़ने का प्रयत्न किया है,शायद ही कभी असफलता मिली है और उसके उपरांत तो कोई भी कारण ध्यान क्रम को बाधित नहीं कर पाया है..प्रेम और भक्ति रस में आकंठ निमग्न होने पर तन मन की जो स्थिति होती है,जो परमानंद प्राप्त होता है उसके सम्मुख संसार की कोई भी वस्तु कोई भी असुविधा अर्थहीन लगती है.....
जो हम अपनी इस स्थूल शरीर की सीमित सामर्थ्यवान नयनो से दृष्टिगत नहीं कर पाते , उसका आस्तित्व ही नहीं है ,ऐसी धारणा नितांत ही भ्रामक और मूर्खता पूर्ण है. जो ईश्वरीय सत्ता को अस्वीकृत करते हैं ,उनके साथ मैं बहस में नहीं पड़ना चाहती. उन्हें यदि यह सोच शांति और सुख देता है तो,यह बहुत ही अच्छी बात है,वे ऐसे ही सुखी रहें......मैं उनके उन्मुख हूँ जो ईश्वरीय सत्ता को तो मानते हैं ,परन्तु बाह्य अवयवों में फंस उस अपरिमित सुख प्राप्ति से वंचित रह जाते हैं..उन्हें एक बार इस दृष्टिकोण के प्रति सजग करना मुझे अपना कर्तब्य लगा....
धर्म में दिखावे और आडम्बर युक्त कोरे कर्मकांडों की धुर विरोधी मैं भी हूँ..कर्म कांडों की उपयोगिता और आवश्यकता मैं इतने भर के लिए मानती हूँ कि कहीं न कहीं ये मुझे वैज्ञानिक तथा भक्ति प्रेम के उद्दीपक लगते हैं. जैसे अपने किसी प्रिय श्रेष्ठ का सानिध्य हमें सुखद लगता है,उसके सम्मान और प्रेम प्रदर्शन हेतु हम भांति भांति की चेष्टाएँ करते हैं और अंततोगत्वा अपार सुख प्राप्त करते हैं,वैसे ही उस सर्वेश्वर के प्रति स्नेह प्रदर्शन सेवा सम्मान भी भक्ति उद्दीपक तथा सुख के साधन ही हैं.
धार्मिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों को सिरे से नकारना भी पूर्णतः उचित नहीं है क्योंकि इसके रूप को विकृत मनुष्यों और पण्डे पुजारियों ने ही किया है नहीं तो इनमे निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण पूर्ण रूपेण जीवनोपयोगी हैं.यह सत्य है की मानवमात्र का धर्म बह्याडम्बरों की अपेक्षा ईश्वर को मन कर्म व्यवहार में धारण करना है,परन्तु जो भी उपाय ईश्वर के प्रति श्रद्धा निष्ठां भक्ति और प्रेम को सुदृढ़ करने में सहायक हों,जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान करता हो,मेरी दृष्टि में वह ग्रहणीय एवं वन्दनीय है.
यह पूर्ण और अकाट्य सत्य है कि ईश्वर का वास मन आत्मा में होता है,हमारी भावनाओं में होता है,सकारात्मक सोच और कर्म में होता है.परन्तु ईश्वर का वास उस पत्थर और स्थान में भी होता है जो अनंत काल से असंख्य श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है.. यह निश्चित जानिए कि यदि हमारी अनुभूति क्षमता प्रखर है तो हम भी उसी प्रकार पत्थर की मूरत में श्याम को देख सकते हैं जैसे मीरा और सूर ने देखा था..रामकृष्ण ने माँ काली को देखा था....और ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं......तो क्यों न एक बार हम भी प्रयास कर देखें. उस अनिर्वचनीय सुख और आनंदलाभ का प्रयास करें....अधिक कहाँ कुछ करना है,एक दृष्टिकोण भर तो बदलना है इसके लिए.....
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20.5.09
3.7.08
रामायण के आलोच्य प्रसंगों के निहितार्थ........(व्यक्तिगत दृष्टिकोण)
पूर्व जन्म के संचित पुण्य कर्म रहे होंगे कि जिस घर में जन्म पाया,माहौल अत्यन्त धार्मिक था.धर्म ग्रंथों,धार्मिक पुस्तक पत्र पत्रिकाओं,कथा प्रवचनों तथा धर्म चर्चाओं के बीच ही बचपन पला बढ़ा.छोटी उम्र में ही बहुत कुछ पढने जानने का अवसर मिला परन्तु रामचरित मानस ने जहाँ उस बालमन को बहुत गहरे बांध प्रभावित किया , वहीँ कुछ प्रश्न भी मन पर उकेर गया जो कई वर्षों तक अनुत्तरित रहा .उत्तर पाने की व्यग्रता लगातार बनी रही और बहुत कुछ पढने आख्यान सुनने के बाद भी यथोचित उत्तर न पा सकी.
मन यह मानता था कि चाहे किसी भी धर्म के ग्रन्थ हों,ये व्यक्ति समाज को दिशा दे सुगठित करने के निमित होतें हैं जो पूर्णरूपेण दोषमुक्त न भी हों तो भी ऐसा कुछ भी प्रतिपादित नही करते जिसमे किसी के भी अहित के निमित्त कोई प्रावधान या संभावना हो .फ़िर हिंदू धर्म और इसके धर्मग्रन्थ तो प्रत्येक धर्म और पंथ का पथप्रदर्शक रहा है.इसमे ऐसी गुंजाईश नही कि सम्पूर्ण मानव हित की बात न हो.इसमे भी तुलसीकृत रामायण तो सबका सिरमौर है.जिस प्रकार से यह व्यक्ति,समाज के चरित्र गठन का प्रयास है वह अद्भुत और अन्यतम है.प्रेम भक्ति और धर्म कर्तब्य का जो सर्वोच्च सुगठित रूप प्रस्तुत करता है वह किसी भी देश काल के लिए अनुकरणीय तथा सर्वथा निर्दोष आख्यान बन पड़ा है.जो समुदाय तुलसी पर नारी और शूद्रों की उपेक्षा का आरोप लगाता रहा है,संभवतः उनकी "ढोल गंवार शूद्र पशु नारी,सकल ताड़ना के अधिकारी " कथन के आधार पर, उक्ति उधृत करते समय वह यह स्मरण नही रख पाता कि इसी नारी की,शूद्रों की मान सम्मान प्रतिष्ठित करने हेतु उन्होंने कितने घटनाक्रम एवं पात्र चित्रित कर भक्ति,प्रेम, कर्तब्य,निष्ठा आदि के अनगिनत उद्धरण रचित किए हैं...चाहे वे शबरी हों,निषाद हों या वानर भालू. आज अगर तुलसीदास जी होते तो एक बार अवश्य माथा पीटकर कहते कि भइया इतनी बड़ी पुस्तक लिख डाली उसमे आपको बस यही एक दोहा मिला????
मुझे लगता है सीधे सीधे लोगों ने इस "ताड़ना" को "मारना" अर्थ में ले लिया है और जैसे ही ध्यान में मारना ,ताड़ना प्रताड़ना आता है तो लोग बिफर उठते हैं.जबकि एक बड़ी ही सीधी सरल बात उन्होंने कही जो कहीं से भी अनुचित नही है यदि वर्तमान सन्दर्भ में भी इसे देखें तो.. इस ''ताड़ना" को 'नियंत्रण' के अर्थ में लेना चाहिए.यथा ढोल से यदि सही लय ताल निकालनी हो तो उसे पीटना तो पड़ेगा ही और वह भी नियंत्रित रूप से अन्यथा सुर ताल सामंजस्य बनने से रहा."गंवार और शूद्र" भी उन्होंने "मूर्ख" के अर्थ में ही प्रयुक्त किया.अब देखिये न मूर्ख यदि शक्ति संपन्न हो जाए और साथ में यह शक्ति अनियंत्रित हो तो अवस्था की परिकल्पना की जा सकती है. उदहारण हेतु कहीं अन्यत्र नही जाना होगा अपने जनप्रतिनिधियों और भाई(गुंडे)लोगों को हम देख सकते हैं.अब कमोबेश यही सब हिंसक पशुओं तथा अविवेकी स्त्रियों के लिए भी कहा गया. दृष्टान्तों की कमी नही कि दुष्ट हृदय स्त्री यदि नियंत्रित न हो तो अपनी असीमित शक्तियों का दुरूपयोग कर वह इतिहास बदल सकती है.
अब बात उन शंशयों की,जो मेरे मानसपटल पर वर्षों तक आच्छादित रह अनुत्तरित रहे थे.राम के चरित्र वर्णन क्रम में तुलसीदास जैसे युगद्रष्टा,आदर्श चरित्र के स्थापना की चाह रखने वाले विद्वान् से यह चूक कैसे हुई कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कर्म का सर्वोच्च निष्पादन कर धर्म और आदर्श की स्थापना करने वाले राम ने एक पति रूप में अपनी प्रिय भामिनी सीता के साथ जो कठोरता बरती उसका प्रतिवाद उन्होंने नही किया इसके लिए राम को दोषी नही माना,मेरे लिए बड़ी ही कचोटने वाली बात थी..वह कर्म व्यवहार जो मर्यादा पुरुसोत्तम ने एक पति रूप में निष्पादित किए थे क्या वे उचित थे,सर्वसाधारण द्वारा पूर्णरूपेण ग्राह्य होने चाहिए? क्या इस से सचमुच ही एक स्त्री एक पत्नी के अधिकारों की उपेक्षा अवमानना नही होती?राम को पूज्य ठहरा उनके इस व्यवहार की निंदा भर्त्सना तुलसीदासजी ने कैसे नही की,यह मुझे बड़ा ही अखरा करता था.जिस भार्या ने जीवन के हर पग पर राम का साथ दिया,अपने पत्नी धर्म का सर्वदा पूर्णरूपेण निर्वहन किया,उसे बार बार इस तरह अपमान का गरल क्यों पीना पड़ा,कभी सारे समाज के सामने अग्निपरीक्षा देकर तो कभी गर्भावस्था में पतिद्वारा परित्यक्ता होकर. .राम फ़िर भी भगवान् बने रहे और एक कुलवधू,पत्नी और माता को प्रताडित करने वाले का प्रतिवाद करने वाला, उस से प्रश्न पूछने वाला,उन्हें दोषी मानने वाला कोई न रहा.....सीता कब कहाँ अपने पत्नी धर्म से रंचमात्र भी च्युत हुईं.वनवास तो राम को मिला था पर कठिन समय में पति का साथ निभाने को सीता ने सुख वैभव का परित्याग किया.एक राजरानी साधारण स्त्री की भांति वन में पति और देवर के सुख सुविधा में जुटी बन बन भटकती रही. रावण को भिक्षा दान के समय भी रेखा का उल्लंघन उन्होंने एक साधू के श्राप से घर परिवार को निष्कंटक रखने हेतु ही किया था.रावण की कैद में अपमान का प्रतिपल गरल पीते हुए भी इस हेतु देह को धरे रखा कि वह जानती थीं कि वही प्रियतम के प्रेम और मनोबल का आधार थीं जिसे किसी कीमत पर आघात पहुँचने नही दे सकती थीं वो पतिव्रता.और वही प्रियतम लोकापवाद से भय ग्रस्त हो कैसे अपनी कोमलांगी कामिनी प्राणप्रिया को अग्नि के सुपुर्द करने को प्रस्तुत हो गए,इसकी वेदना सीता को उस वेदना से निःसंदेह अधिक बड़ी और भारी पड़ी होगी जो उन्हें रावण द्वारा हरण और प्रताड़ना के कष्ट से मिली होगी.क्यों नही राम ने बिना परीक्षा के ही यह मान लिया की सीता के सतीत्व पर प्रश्न उठाना ही सबसे बड़ा पाप है.चाहे राम ने एक पुत्र,भाई,शिष्य,राजा या पिता हर रूप में कर्तब्य परायणता की मिसाल दी हो पर यह मानना ही पड़ेगा कि एक पति रूप में पतिधर्म निर्वहन को उन्होंने कभी प्राथमिकता नही दी.इस कलंक से मुक्त सचमुच ही राम का व्यक्तित्व नही हो सकता.भले जीवन पर्यंत सीता ने राम पर दोषारोपण नही किया हो.समस्त समाज के सम्मुख अग्निशिखा से गुजर यदि एक पटरानी को अपना सतीत्व साबित करना पड़े तो इस से अधिक दुर्भाग्य जनक और क्या बात हो सकती थी.पर सवाल यह उठता है कि वहां उपस्थित वह पूरा समाज जो इस तथ्य से पूर्णतया भिज्ञ था कि सीता राम के लिए क्या महत्व रखती है या सीता के सतीत्व पर प्रश्न चिन्ह लगना इन दोनों के ही मान और प्रेम का अपमान करना है,तो फ़िर वह एक पूरा समाज राम के प्रस्ताव को सिरे से खारिज क्यों न कर सका,इस घटना को रोक क्यों नही सका?यदि राम स्वामी और पिता तुल्य थे सबके लिए तो सीता भी तो माता थीं ,माता का यह अपमान किसी भी अवस्था में सह्या होना सर्वथा अनुचित था. यह घटना उस पूरे समाज की कायरता और संवेदनहीनता का प्रतीक है.
. अयोध्या पहुंचकर सीता ने अपनी गृहस्थी सम्हाली और वंश के नवांकुरों को अपने गर्भ में धारण किया.अब प्रश्न यह उठता है कि राम यदि राजा थे तो सीता भी तो राजमहिषी थीं.राम के अधिकार यदि असीमित थे तो सीता के भी तो कुछ अधिकार होने चाहिए.थे .एक पटरानी के रूप में न भी सही तो राम के राज्य की एक नागरिक ,एक गर्भवती स्त्री, कुलवधू के क्या इतने भी अधिकार नही थे कि जिस राज्य में एक धोबी की भी सुनी जाती हो,उसका न्याय किया जाता हो,उसे संतुष्ट किया जाता हो वहां एक अबला को किसी के दोषारोपण पर परित्यक्त कर वन में निसहाय भटकने हेतु छोड़ दिया जाए.और इस कुकृत्य को रोकने वाला भी कोई नही हो.एक राजा का कर्तब्य तो स्थापित हो गया,सुकीर्ति पताका चहुँ और फहरा गया ,पर एक पति के कर्तब्य का क्या हुआ और जनमानस के सम्मुख कौन सा आदर्श उपस्थित हुआ?
वर्षों तक यह बात मुझे पीड़ित करती रही और तुलसी और राम के आदर्श को मानने को सहज ही मन प्रस्तुत नही होता था. पर अनायास ही जीवन में अपने आस पास कुछ ऐसा घटित होते देखा कि एक दिन यह अनुत्तरित प्रश्न अपनी पूर्ण समीक्षा के साथ मनोभूमि पर अवतरित हो गया.लगा कैसे इतने दिन दिग्भ्रमित रही,सबकुछ तो पूर्ण रूपेण स्पष्ट वर्णित ही है रामचरित में,सम्पूर्ण घटनाक्रम अपने परिणाम और आदर्श के साथ सबको करणीय अकरणीय का भेद बताता हुआ.
जब अश्वमेघ यज्ञ के दिगंत विजय को छोड हुए अश्वों को नन्हे रामपुत्रों लव कुश ने खेल खेल में सहज ही पकड़ कर बाँध लिया,राजा राम की विश्व विजयी अजेय सैन्य बल का लक्षमण ,हनुमान समेत उन बालकों ने दर्प दमन किया.उस समय वे दोनों बालक राम के नही सीता के शक्ति थे.सीता के तप और सतीत्व के बल थे,जिसके सम्मुख प्रत्येक बल परास्त हो गया. जब राम ने सीता को साथ लौट चलने का प्रस्ताव दिया तो सीता ने एकमुश्त अपने समस्त अपमान का प्रतिकार लेते हुए अपनी पवित्रता और आत्मसम्मान का महत्व बताते हुए राम के साथ साथ उस पूरे समाज से वह प्रतिदान लिया जिसने सबको रिक्तहस्त हतप्रभ कर रख छोडा.राम पिता पुत्र भाई शाशक आदि आदि सबकुछ तो रह गए पर पति न रह सके.राम के जीवन की वह जीवनी शक्ति जिसके बल पर राम बलि थे एक पत्नी ने अपने देह को धरित्री के खोख में समाहित कर सीता ने उस बल को होम कर दिया.देखिये न,चाहे किसी भी भाषा में लिखी हो,पर सीता प्रयाण के बाद रामचरित्र किस तरह निस्तेज सा हो विराम पा जाता है जबकि उसके बाद भी वर्षों तक राम इस धरती पर विद्यमान रहे थे.
तुलसीदास ने कितनी स्पष्टता से यह सिद्ध कर समाज के सामने सत्य रख दिया कि जिस समाज में स्त्री का समुचित सम्मान न हो तो उस समाज का विकास सम्भव ही नही.पति चाहे वह राम जैसे सर्वसमर्थ व्यक्ति ही क्यों न हो,यदि उन्होंने पत्नी के मान सम्मान और अधिकार के संरक्षण का यथोचित उपक्रम नही किया तो कभी सुखी दांपत्य जीवन का उपभोग नही कर पाएंगे. स्त्री त्याग,करुना,क्षमा,प्रेम की प्रतिमूर्ति सही,कई बार अपमान की पीड़ा सह क्षमा दान दे उसकी गृहस्थी संचालित करने में अपना सबकुछ अर्पित कर सकती है. पर यदि पुरूष इसे उसकी शक्तिहीनता माने और बार बार यह प्रयास दुहराने लगे तो स्त्री यदि प्रतिकार ले ले तो उसके हाथ क्या लगेगा.यदि वह उसका सम्मान नही कर पायेगा,उसके स्नेह को नही समझ पायेगा,उसे प्रताडित करना,उपेक्षित करना अधिकार मानने लगेगा, तो राजा हो या रंक जीवन पर्यंत स्नेह और सुख से वंचित ही रहना पड़ेगा........ .
मन यह मानता था कि चाहे किसी भी धर्म के ग्रन्थ हों,ये व्यक्ति समाज को दिशा दे सुगठित करने के निमित होतें हैं जो पूर्णरूपेण दोषमुक्त न भी हों तो भी ऐसा कुछ भी प्रतिपादित नही करते जिसमे किसी के भी अहित के निमित्त कोई प्रावधान या संभावना हो .फ़िर हिंदू धर्म और इसके धर्मग्रन्थ तो प्रत्येक धर्म और पंथ का पथप्रदर्शक रहा है.इसमे ऐसी गुंजाईश नही कि सम्पूर्ण मानव हित की बात न हो.इसमे भी तुलसीकृत रामायण तो सबका सिरमौर है.जिस प्रकार से यह व्यक्ति,समाज के चरित्र गठन का प्रयास है वह अद्भुत और अन्यतम है.प्रेम भक्ति और धर्म कर्तब्य का जो सर्वोच्च सुगठित रूप प्रस्तुत करता है वह किसी भी देश काल के लिए अनुकरणीय तथा सर्वथा निर्दोष आख्यान बन पड़ा है.जो समुदाय तुलसी पर नारी और शूद्रों की उपेक्षा का आरोप लगाता रहा है,संभवतः उनकी "ढोल गंवार शूद्र पशु नारी,सकल ताड़ना के अधिकारी " कथन के आधार पर, उक्ति उधृत करते समय वह यह स्मरण नही रख पाता कि इसी नारी की,शूद्रों की मान सम्मान प्रतिष्ठित करने हेतु उन्होंने कितने घटनाक्रम एवं पात्र चित्रित कर भक्ति,प्रेम, कर्तब्य,निष्ठा आदि के अनगिनत उद्धरण रचित किए हैं...चाहे वे शबरी हों,निषाद हों या वानर भालू. आज अगर तुलसीदास जी होते तो एक बार अवश्य माथा पीटकर कहते कि भइया इतनी बड़ी पुस्तक लिख डाली उसमे आपको बस यही एक दोहा मिला????
मुझे लगता है सीधे सीधे लोगों ने इस "ताड़ना" को "मारना" अर्थ में ले लिया है और जैसे ही ध्यान में मारना ,ताड़ना प्रताड़ना आता है तो लोग बिफर उठते हैं.जबकि एक बड़ी ही सीधी सरल बात उन्होंने कही जो कहीं से भी अनुचित नही है यदि वर्तमान सन्दर्भ में भी इसे देखें तो.. इस ''ताड़ना" को 'नियंत्रण' के अर्थ में लेना चाहिए.यथा ढोल से यदि सही लय ताल निकालनी हो तो उसे पीटना तो पड़ेगा ही और वह भी नियंत्रित रूप से अन्यथा सुर ताल सामंजस्य बनने से रहा."गंवार और शूद्र" भी उन्होंने "मूर्ख" के अर्थ में ही प्रयुक्त किया.अब देखिये न मूर्ख यदि शक्ति संपन्न हो जाए और साथ में यह शक्ति अनियंत्रित हो तो अवस्था की परिकल्पना की जा सकती है. उदहारण हेतु कहीं अन्यत्र नही जाना होगा अपने जनप्रतिनिधियों और भाई(गुंडे)लोगों को हम देख सकते हैं.अब कमोबेश यही सब हिंसक पशुओं तथा अविवेकी स्त्रियों के लिए भी कहा गया. दृष्टान्तों की कमी नही कि दुष्ट हृदय स्त्री यदि नियंत्रित न हो तो अपनी असीमित शक्तियों का दुरूपयोग कर वह इतिहास बदल सकती है.
अब बात उन शंशयों की,जो मेरे मानसपटल पर वर्षों तक आच्छादित रह अनुत्तरित रहे थे.राम के चरित्र वर्णन क्रम में तुलसीदास जैसे युगद्रष्टा,आदर्श चरित्र के स्थापना की चाह रखने वाले विद्वान् से यह चूक कैसे हुई कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कर्म का सर्वोच्च निष्पादन कर धर्म और आदर्श की स्थापना करने वाले राम ने एक पति रूप में अपनी प्रिय भामिनी सीता के साथ जो कठोरता बरती उसका प्रतिवाद उन्होंने नही किया इसके लिए राम को दोषी नही माना,मेरे लिए बड़ी ही कचोटने वाली बात थी..वह कर्म व्यवहार जो मर्यादा पुरुसोत्तम ने एक पति रूप में निष्पादित किए थे क्या वे उचित थे,सर्वसाधारण द्वारा पूर्णरूपेण ग्राह्य होने चाहिए? क्या इस से सचमुच ही एक स्त्री एक पत्नी के अधिकारों की उपेक्षा अवमानना नही होती?राम को पूज्य ठहरा उनके इस व्यवहार की निंदा भर्त्सना तुलसीदासजी ने कैसे नही की,यह मुझे बड़ा ही अखरा करता था.जिस भार्या ने जीवन के हर पग पर राम का साथ दिया,अपने पत्नी धर्म का सर्वदा पूर्णरूपेण निर्वहन किया,उसे बार बार इस तरह अपमान का गरल क्यों पीना पड़ा,कभी सारे समाज के सामने अग्निपरीक्षा देकर तो कभी गर्भावस्था में पतिद्वारा परित्यक्ता होकर. .राम फ़िर भी भगवान् बने रहे और एक कुलवधू,पत्नी और माता को प्रताडित करने वाले का प्रतिवाद करने वाला, उस से प्रश्न पूछने वाला,उन्हें दोषी मानने वाला कोई न रहा.....सीता कब कहाँ अपने पत्नी धर्म से रंचमात्र भी च्युत हुईं.वनवास तो राम को मिला था पर कठिन समय में पति का साथ निभाने को सीता ने सुख वैभव का परित्याग किया.एक राजरानी साधारण स्त्री की भांति वन में पति और देवर के सुख सुविधा में जुटी बन बन भटकती रही. रावण को भिक्षा दान के समय भी रेखा का उल्लंघन उन्होंने एक साधू के श्राप से घर परिवार को निष्कंटक रखने हेतु ही किया था.रावण की कैद में अपमान का प्रतिपल गरल पीते हुए भी इस हेतु देह को धरे रखा कि वह जानती थीं कि वही प्रियतम के प्रेम और मनोबल का आधार थीं जिसे किसी कीमत पर आघात पहुँचने नही दे सकती थीं वो पतिव्रता.और वही प्रियतम लोकापवाद से भय ग्रस्त हो कैसे अपनी कोमलांगी कामिनी प्राणप्रिया को अग्नि के सुपुर्द करने को प्रस्तुत हो गए,इसकी वेदना सीता को उस वेदना से निःसंदेह अधिक बड़ी और भारी पड़ी होगी जो उन्हें रावण द्वारा हरण और प्रताड़ना के कष्ट से मिली होगी.क्यों नही राम ने बिना परीक्षा के ही यह मान लिया की सीता के सतीत्व पर प्रश्न उठाना ही सबसे बड़ा पाप है.चाहे राम ने एक पुत्र,भाई,शिष्य,राजा या पिता हर रूप में कर्तब्य परायणता की मिसाल दी हो पर यह मानना ही पड़ेगा कि एक पति रूप में पतिधर्म निर्वहन को उन्होंने कभी प्राथमिकता नही दी.इस कलंक से मुक्त सचमुच ही राम का व्यक्तित्व नही हो सकता.भले जीवन पर्यंत सीता ने राम पर दोषारोपण नही किया हो.समस्त समाज के सम्मुख अग्निशिखा से गुजर यदि एक पटरानी को अपना सतीत्व साबित करना पड़े तो इस से अधिक दुर्भाग्य जनक और क्या बात हो सकती थी.पर सवाल यह उठता है कि वहां उपस्थित वह पूरा समाज जो इस तथ्य से पूर्णतया भिज्ञ था कि सीता राम के लिए क्या महत्व रखती है या सीता के सतीत्व पर प्रश्न चिन्ह लगना इन दोनों के ही मान और प्रेम का अपमान करना है,तो फ़िर वह एक पूरा समाज राम के प्रस्ताव को सिरे से खारिज क्यों न कर सका,इस घटना को रोक क्यों नही सका?यदि राम स्वामी और पिता तुल्य थे सबके लिए तो सीता भी तो माता थीं ,माता का यह अपमान किसी भी अवस्था में सह्या होना सर्वथा अनुचित था. यह घटना उस पूरे समाज की कायरता और संवेदनहीनता का प्रतीक है.
. अयोध्या पहुंचकर सीता ने अपनी गृहस्थी सम्हाली और वंश के नवांकुरों को अपने गर्भ में धारण किया.अब प्रश्न यह उठता है कि राम यदि राजा थे तो सीता भी तो राजमहिषी थीं.राम के अधिकार यदि असीमित थे तो सीता के भी तो कुछ अधिकार होने चाहिए.थे .एक पटरानी के रूप में न भी सही तो राम के राज्य की एक नागरिक ,एक गर्भवती स्त्री, कुलवधू के क्या इतने भी अधिकार नही थे कि जिस राज्य में एक धोबी की भी सुनी जाती हो,उसका न्याय किया जाता हो,उसे संतुष्ट किया जाता हो वहां एक अबला को किसी के दोषारोपण पर परित्यक्त कर वन में निसहाय भटकने हेतु छोड़ दिया जाए.और इस कुकृत्य को रोकने वाला भी कोई नही हो.एक राजा का कर्तब्य तो स्थापित हो गया,सुकीर्ति पताका चहुँ और फहरा गया ,पर एक पति के कर्तब्य का क्या हुआ और जनमानस के सम्मुख कौन सा आदर्श उपस्थित हुआ?
वर्षों तक यह बात मुझे पीड़ित करती रही और तुलसी और राम के आदर्श को मानने को सहज ही मन प्रस्तुत नही होता था. पर अनायास ही जीवन में अपने आस पास कुछ ऐसा घटित होते देखा कि एक दिन यह अनुत्तरित प्रश्न अपनी पूर्ण समीक्षा के साथ मनोभूमि पर अवतरित हो गया.लगा कैसे इतने दिन दिग्भ्रमित रही,सबकुछ तो पूर्ण रूपेण स्पष्ट वर्णित ही है रामचरित में,सम्पूर्ण घटनाक्रम अपने परिणाम और आदर्श के साथ सबको करणीय अकरणीय का भेद बताता हुआ.
जब अश्वमेघ यज्ञ के दिगंत विजय को छोड हुए अश्वों को नन्हे रामपुत्रों लव कुश ने खेल खेल में सहज ही पकड़ कर बाँध लिया,राजा राम की विश्व विजयी अजेय सैन्य बल का लक्षमण ,हनुमान समेत उन बालकों ने दर्प दमन किया.उस समय वे दोनों बालक राम के नही सीता के शक्ति थे.सीता के तप और सतीत्व के बल थे,जिसके सम्मुख प्रत्येक बल परास्त हो गया. जब राम ने सीता को साथ लौट चलने का प्रस्ताव दिया तो सीता ने एकमुश्त अपने समस्त अपमान का प्रतिकार लेते हुए अपनी पवित्रता और आत्मसम्मान का महत्व बताते हुए राम के साथ साथ उस पूरे समाज से वह प्रतिदान लिया जिसने सबको रिक्तहस्त हतप्रभ कर रख छोडा.राम पिता पुत्र भाई शाशक आदि आदि सबकुछ तो रह गए पर पति न रह सके.राम के जीवन की वह जीवनी शक्ति जिसके बल पर राम बलि थे एक पत्नी ने अपने देह को धरित्री के खोख में समाहित कर सीता ने उस बल को होम कर दिया.देखिये न,चाहे किसी भी भाषा में लिखी हो,पर सीता प्रयाण के बाद रामचरित्र किस तरह निस्तेज सा हो विराम पा जाता है जबकि उसके बाद भी वर्षों तक राम इस धरती पर विद्यमान रहे थे.
तुलसीदास ने कितनी स्पष्टता से यह सिद्ध कर समाज के सामने सत्य रख दिया कि जिस समाज में स्त्री का समुचित सम्मान न हो तो उस समाज का विकास सम्भव ही नही.पति चाहे वह राम जैसे सर्वसमर्थ व्यक्ति ही क्यों न हो,यदि उन्होंने पत्नी के मान सम्मान और अधिकार के संरक्षण का यथोचित उपक्रम नही किया तो कभी सुखी दांपत्य जीवन का उपभोग नही कर पाएंगे. स्त्री त्याग,करुना,क्षमा,प्रेम की प्रतिमूर्ति सही,कई बार अपमान की पीड़ा सह क्षमा दान दे उसकी गृहस्थी संचालित करने में अपना सबकुछ अर्पित कर सकती है. पर यदि पुरूष इसे उसकी शक्तिहीनता माने और बार बार यह प्रयास दुहराने लगे तो स्त्री यदि प्रतिकार ले ले तो उसके हाथ क्या लगेगा.यदि वह उसका सम्मान नही कर पायेगा,उसके स्नेह को नही समझ पायेगा,उसे प्रताडित करना,उपेक्षित करना अधिकार मानने लगेगा, तो राजा हो या रंक जीवन पर्यंत स्नेह और सुख से वंचित ही रहना पड़ेगा........ .
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