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9.2.15

एकाकीपन


सन्नाटों  का कोलाहल,
नित चित को कर देता चंचल।
एकांत है चिंतन का साथी,
भावों के पाँख उगा जाती ।
शशि की शीतल कोमल किरणें
उर डूब उजास पाता जिसमें।
उस पल में कविता है किलके,
रस शब्द ओढ़ चल बह निकले।
माना आँखों से सब दीखता,
दृग मूंदे ही पर जग दीखता।
नीरवता के कुछ पल खोजो,
दुनियाँ के संग संग मन बूझो।
अन्तरचिंतन बिन सृजन कहाँ,
गहरे उतरो मिले मोती वहाँ। 

23.12.11

जीवन..

सांस सांस कर चुकती जाती, साँसों की यह पूंजी,
जीवन क्यों,जगत है क्या, है अभी तलक अनबूझी..

कभी लगे यह विषम पहेली, अनुपम कभी सहेली,
संगसाथ चलने का भ्रम दे, कर दे निपट अकेली.

कभी लगे है क्या कुछ ऐसा, जो मैं न कर पाऊं,
काल तरेरे भौं जब भी तो , दंभ पे अपनी लजाऊँ.

कभी लगे है बचा हुआ क्या, जो न अबतक देखा,
तभी रचयिता विहंस के पूछे, क्या है अबतक देखा.

कूड़ा कचड़ा ही तो समेटा, जन्म कर दिया जाया,
महत ज्ञानसागर का अबतक, बूँद भी कहाँ पाया.

सोचा था पावन जीवन को, सार्थक कर है जाना,
अर्थ ढूंढते समय चुका , वश है क्या गुजरा पाना.

जाने किस पल न्योता आये, क्षण में उठ जाए डेरा,
माया में भरमाया चित, किस विध समझे यह फेरा..



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30.12.10

बीत रहा .......

एक और वर्ष बीत रहा
बीत रहे पल छिन संग
हम भी तो बीत रहे
साँसों के जल से भरा,
घट भी तो रीत रहा.
यह वर्ष भी बीत रहा.


जश्न हम मनाएं क्या
गीत नया गायें क्या
संचित अभिलाषा की
कथा अब सुनाएँ क्या
देख दशा अग जग की
मन तो भयभीत खड़ा ,
हौसला है अस्त पस्त
पार कहाँ सूझ रहा.
यह वर्ष भी बीत रहा.


स्मृति की अट्टालिका मे
पल छिन जो ठहरे हैं
अगणित रंगों मे घुले
रंग बड़े गहरे हैं
उसमे गुमसुम से सभी
सपने सुनहरे हैं
पाँव तो हैं ठिठके  पर
समय प्रवाह जीत रहा.
यह वर्ष भी बीत रहा.


पर पास खड़ा नया साल
देखो मुस्काता  है
मद्धिम सी छेड़ तान  
हम को  बहलाता है
प्राणों मे फ़िर से वही
आस फ़िर जगाता है
बीता जो लम्हा वह
बीत गया बात गयी
आगे का हर पल तो
तेरा बस तेरा है
जाने दे उस पल को
जो बीत रहा बीत रहा.


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1.11.10

तरु और लता...

कहीं किसी एक कानन में, था सघन वृक्ष एक पला बढ़ा,

था उन्नत उसका अंग अंग, गर्वोन्नत भू पर अडिग अड़ा.


वहीँ पार्श्व में पनपी थी, कोमल तन सुन्दर एक लता.
नित निरख निरख तरु की दृढ़ता, हर्षित उसका चित था डोला.

तरुनाई कोमलता उसकी , तरुवर के मन को भी भायी,
निज शाख झुकाकर उसने भी, कोंपल की उंगली थाम ही ली.


प्रिय ने जो अंगीकार किया, तन मन अपना वह वार चली,
हर शाख शाख पत्ते पत्ते, लिपटी लिपटी वह खूब खिली.


था प्रेम प्रगाढ़ ही दोनों में,पर तरु का मन था अहम् भरा,
आश्रयदाता अवलम्बन वह ,यह भी मन में था बसा रहा.


लघु तुच्छ सदा उसे ठहरा कर, तरु तुष्टि बड़ा ही पाता था,
निज लाचारी को देख ,लता का ह्रिदय क्षुब्ध हो जाता था.


था आत्मविश्वास न रंचमात्र, जो प्रतिकार वह कर पाती,
अपमान गरल नित पी पीकर, भाग्य मान सब सह जाती.


आशंका से मन था कम्पित, कहीं तरु निज हाथ छुड़ा न ले,
कैसे उस बिन जी पायेगी, कहाँ जायेगी इस तन को ले.


तरु ने यदि त्याग दिया उसको,फिर कहाँ ठौर वह पायेगी,
जो भूमि पड़ी उसकी काया, नित पद से  कुचली जायेगी.


था पड़ा सुप्त उसका चेतन, उसको न किंचित भान रहा,
योगक्षेम वाहक जग का, अखिलेश्वर केवल एक हुआ.


जीवन दाता सब जीवों का, सुखकर्ता सबका दुःख हरता,
उसकी कृति ही हर एक प्राणी,नहीं कोई हीन न कोई बड़ा.


सत का सूरज उर में प्रकटा , निर्भय विभोर निश्चिन्त हुई,
मृदुस्वर से प्रिय को समझाकर, उस से हित की ये बात कही.


है सत्य मेरे आधार तुम्ही, तेरे प्रश्रय से विस्तार मेरा,
तुम सदा रहे रक्षक मेरे, तुमसे सुरभित संसार मेरा.


पर तुच्छ नहीं मैं भी इतनी, है व्यर्थ नहीं मेरा होना,
जिस सर्जक की तुम रचना हो,वह ही तो मेरा हेतु बना.


माना कि तुम सम बली नहीं,तुम सा मेरा सामर्थ्य नहीं,
पर कर्तब्य परायण मैं भी हूँ, कभी छोड़ा तेरा संग नहीं.


तुम मुझे सम्हाले रहते हो, तो मैं भी तो रक्षक तेरी,
हो धूप कि आंधी या वर्षा,तुझसे पहले मैं सह लेती .


विपदा जो तेरी ओर बढे ,मैं सदा ढाल बन अडती हूँ ,
मेरे होते कोई वार करे, यह कभी न मैं सह सकती हूँ.


चाहा तेरा है साथ सदा, चाहे जिस ओर गति तेरी,
यूँ ही जीवन भर संग रहूँ , नहीं दूजी कोई साध मेरी.


फिर क्या तुलना क्या रंज भेद, क्यों मन में कोई घाव भरें,
आ स्नेह से हिल मिल संग रहें,क्यों सुखमय जीवन नष्ट करें.


था सार छुपा इसमें सुख का, तरुवर के मन को भी भाया,
जो अहम् बना दुःख का कारण, तरुवर ने उसको त्याग दिया.


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5.1.09

शुभ की कामना !

शादी ब्याह ,पूजा पाठ ,पर्व त्यौहार इत्यादि पर भले लोग अपने अपने धर्म समुदाय में प्रचलित पंचांगों का अनुसरण करें,पर इस वैश्वीकरण के युग ने इतना तो किया है कि विश्व के विभिन्न मत मतान्तर के अनुयायियों द्वारा वर्षभर के बारहों महीनो में अलग अलग समय में नव वर्ष का प्रारम्भ मानने वाला विश्व समुदाय अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से एक जनवरी को ही नए वर्ष के पहले दिन के आरंभिक दिन रूप में उत्सव सहित मानते हैं। सही ग़लत की बात छोड़ दें, तो इस बात पर उत्साहित हुआ ही जा सकता है और हर्ष मनाया जा सकता है कोई एक तो मौका और कारण ऐसा है जो विश्व समुदाय को एकजुट करता है. नही तो एक कैलेंडर बदलने से अधिक नए वर्ष के नाम पर और क्या बदलता है.भूख, गरीबी, हिंसा, विध्वंश, दुराचार ,अत्याचार ........सब अपनी जगह पर यथावत या कुछ और ही अधोमुख.


इतने सारे वर्ष निकल गए शुभकामनाओं के आदान प्रदान और शुभ की अपेक्षा में।पर चहुँओर घटित दुर्घटनाओ,विध्वंश, अधर्म और अनाचार के फैलते पसरते साम्राज्य को देख मन कभी कभी इतना हतोत्साहित हो जाता है कि लगता है इतने हृदयों से निकली शुभ की कामना क्यों विलुप्त हो जाती है.......क्यों नही यह फलित होती......और तब इच्छा ही नही होती औपचारिकताओं (शुभकामनाओ के आदान प्रदान) को निभाने की या शुभ के लिए बहुत अधिक आशान्वित रहने की.



शुभ की कामना अवश्य रखनी चाहिए । नए वर्ष या किसी अवसर विशेष पर ही क्यों , सदैव रखनी चाहिए.पर यह भी स्मरण रखना होगा कि वर्षों से शुभ की कामना मन में रखे और उद्गारों के आदान प्रदान के बाद भी यदि दिनानुदिन धार्मिक ,सामाजिक ,सांस्कृतिक , राजनितिक ,आर्थिक इत्यादि प्रत्येक क्षेत्र से धर्म बहिष्कृत होती जा रही है,धर्माचरण हास्यास्पद और मूर्खता का पर्याय ठहराया जाने लगा है, तो अब ऐसे में केवल शुभकामनाओं के आदान प्रदान और शुभ घटित होने की अपेक्षा रखने भर से काम न चलेगा.आवश्यकता है कि अपने आचरण में दृढ़ता से शुभ (सदाचार) को प्रश्रय देने की और अपने व्यग्तिगत स्वार्थ से उपार उठते हुए अपने सरोकारों को विस्तृत करते हुए समाज देश और विशव के सरोकारों से जुड़ने की. जहाँ कहीं भी अशुभ आचरण का अनुगमन हो रहा हो,उसके विरुद्ध मोर्चा खोले बिना किसी भी मोर्चे पर पतन को रोक पाना असंभव है॥


अपने अन्दर और बहार दोनों जगहों से अशुभ (अनाचार) को ध्वस्त कर ही हम शुभ की आशा रख सकते हैं और अपनी अगली पीढी को वह अवसर और परिवेश थाती में दे सकते हैं,जिसमे वह पूर्ण हर्षोल्लास के साथ उत्साहित हो शुभ की कामना करे और उसे फलित होता हुआ पाये...




कामना !!

पल पल छिन छिन चुकती जाए यह साँसों की पूंजी,

विधि ने जो है नियत किया वह अभी भी है अनबूझी.

बूँद बूँद कर रीती जाती घट जीवन जल वाली ,

संचित कर्म को गुनु तो पाऊं हाथ अभी भी खाली.

हे दाता दे हमको अपनी करुणा का अवलंबन,

सत्पथ पर चलने हेतु सद्बुद्धि धैर्य समर्पण.

काम क्रोध मद मोह लोभ से रक्षा करो हमारी,

भोग रोग न ग्रसित करे मति दृढ़ता भरो हमारी.

रोग शोक भय क्षोभ मुक्त हो प्रयाण की पावन बेला,

अंजुरी भर संतोष संग ले संपन्न हो जीवन लीला.