करीब सोलह सत्रह वर्ष पहले की बात है. छोटा भाई इंजीनियरिंग इंट्रेंस के लिए पटना में रहकर कोचिंग कर रहा था.एक आवश्यक कार्य के सिलसिले में तीन दिनों के लिए मेरा पटना जाना हुआ तो भाई के पास ही रह गई. भाई जिस फ्लैट में रहता था तीन और लड़के उसके साथ रहते थे. सुबह तडके ही भाई उठकर तैयार हो गया और अपने अन्य रूम मेटों के साथ घर से जाने लगा.पूछने पर उसने बताया कि शुशील (उसका रूम मेट) के लिए जगह छेकने कॉलेज जा रहे हैं. बात मेरी समझ में नही आई......मैंने उससे विस्तार में बताने को कहा तो वह यह कहकर चला गया कि ,अभी बहुत हड़बड़ी में हूँ तुझे शार्ट कट में समझा नही सकता, वापस आकर बताऊंगा.
करीब दो बजे जब वह वापस आया तो उसकी और उसके रूम मेटों की अस्त वयस्त हालत देखर मैं परेशान हो गई.लग रहा था जैसे कहीं से लड़ भिड कर आ रहे हैं.घबराकर पूछने लगी तो कहने लगा जरा खा तो लेने दे फ़िर बताता हूँ.उनके खाने भर का समय मुझ पर बड़ा भरी गुजरा.मारे उत्सुकता और आशंका के मेरा बुरा हाल था.
और फ़िर जब उन्होंने विवरण बताया तो मैं बस सन्न हो सुनती रह गई। मेरा यह पहला और अनोखा अनुभव था. भाई के साथ जो अन्य तीन और लड़के रहते थे वे तीनो भाई थे और शुशील उनका सबसे छोटा भाई था जो उस समय आई.एस. सी. की परीक्षा दे रहा था. कॉलेज ने परीक्षा व्यवस्था के नाम पर जो कुछ किया जाता था वह इतना भर था कि जितने विद्यार्थियों को एडमिट कार्ड बांटा जाता था उसके अनुरूप ही प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका की व्यवस्था की जाती थी. परीक्षा शुरू होने से घंटे भर पहले मेन गेट खुलता था और फ़िर हो जाती थी जगह की लूट पाट. सीटिंग अरेंजमेंट नाम की कोई व्यवस्था नही होती थी. प्रत्येक विद्यार्थी के साथ कम से कम चार से पाँच लोग साथ जाते थे जिनमे देह और बुद्धि दोनों से बलिष्ठ अलग अलग सहायक होते थे .देह से बलिष्ठ अपने कैंडिडेट के लिए जगह,प्रश्नपत्र तथा उत्तर पुस्तिका लूटने में लग जाते थे और दिमाग वाले प्रश्न पत्रों के उत्तर के इंतजाम में लगने वाले होते थे.
शर्ट, रूमाल,तौलिया,ईंट या पत्थर इत्यादि रखकर जगह छेका जाता था और धक्का मुक्की में घुसकर एडमिट कार्ड दिखाकर प्रश्न और उत्तर पुस्तिका लिया जाता था. भुसकोल (कमजोर) विद्यार्थी के लिए उनके बदले लिखने वाले सहायक भी साथ होते थे और बाकी लोग भाग दौड़ कर सवालों के जवाब उगाहते थे. क्योंकि मेन गेट बंद होने के कारण कैम्पस से बाहर जाकर सवालों को हल करा पाना मुश्किल होता था. आज की तरह उन दिनों मोबाईल या फोन की व्यवस्था तो थी नही,नही तो मुन्ना भाई स्टाइल में सब बैठे बैठे हो जाता. बंद गेट के बाहर से यह व्यवस्था दिखती थी कि पूर्ण व्यवस्थित और शांतिपूर्ण माहौल में परीक्षा संपन्न करायी जा रही है.
हाँ, इतना था कि महाविद्यालय द्वारा परीक्षा के नियत समय पर ही प्रश्न और उत्तरपुस्तिकाओं का वितरण होता था और नियत समय पर यदि प्रोफेसर साहब के पास जाकर उत्तरपुस्तिका जमा नही कर दी जाती थी तो बाद में किसी तरह का कंसीडेरेसन नही होता था.यह अलग बात थी कि आम बच्चो और अभिभावकों में इस बात का बड़ा क्षोभ और रोष था कि रसूख वाले,लग्गी (जुगाडू ) वाले, मंत्री या उच्चअधिकारियों के सगे सम्बन्धियों को महाविद्यालय जाकर इस धक्का मुक्की में नही फँसना पड़ता था.उन्हें एक दिन पहले घर पर ही प्रश्न और उत्तर पुस्तिका उपलब्ध हो जाती थी और वे अपनी सुविधानुसार लिखवाकर उसे महाविद्यालय के दफ्तर भिजवा देते थे.जबकि यह व्यवस्था सबके लिए होनी चाहिए.
यह सब लालू जी के पन्द्रह वर्षीय शुशासन में पूर्ण साक्षरता अभियान का व्यावहारिक रूप था.... उनका सपना था कि बिहार का भिखारी भी ग्रेजुएट हो.हालाँकि नितीश जी ने लालू जी के उस सपने पर झाडू फेर दिया है.पर पता नही लालू/राबड़ी के लंबे राज्यकाल में इस प्रकार की सुविधाओं का सुख भोग चुकी बिहार की जनता कहीं फ़िर से उन सुविधाओं के लिए लालायित हो नितीश जी का पत्ता न साफ कर दे.
वैसे लालू जी के संरक्षण में संरक्षित और संचालित झारखण्ड ने लालू जी के उस सपने को पूरा करने का पूरा मन बना लिया है. गुरु गुड़ रहा गया और चेला चीनी बन चहुँ ओर छा गया .जो हाल लालू जी ने पन्द्रह वर्षों में बिहार का किया वह तमाम झारखण्ड के लालों ने उसके तिहाई समय में वर्षों तक दंगा फसाद सेंदरा कर पुरूस्कार स्वरुप पाए इस झारखंड राज्य का कर दिया.
यूँ ऊपर से देखने पर सरकार की कल्याणकारी नीतियाँ मुग्ध और नतमस्तक कर देती हैं.पर मध्यान्ह भोजन, पुस्तक वितरण,कंप्यूटर प्रशिक्षण ,क्षात्रवृत्ति या साइकिल वितारण से लेकर कोई भी योजना ऐसी नही कि जिसमे सिर्फ़ घोटाले ही घोटाले न हों. कहीं कहीं तो ऐसी हास्यास्पद स्थिति होती है,बस सोचते रह जाना पड़ता है कि इस योजना का प्रयोजन क्या है.मध्यान्ह भोजन में भोजन की व्यवस्था तो है (खद्यान्न के स्तर और घोटाले को जाने दें) ,पर उस भोजन को पकायेगा, खिलायेगा कौन, इसकी कोई योजना/व्यवस्था नही.स्कूल के समय पर पढाने के बदले शिक्षक शिक्षिकाएं भोजन पकाने में व्यस्त रहते हैं और विद्यार्थी भी खेलते कूदते भोजन मिलने की प्रतीक्षा में रहते हैं. भोजन पकाया , खाया गया और हो गई छुट्टी..
और जहाँ तक बात रही परीक्षाओं की तो पहली कक्षा से ग्रेजुएट होने तक तो रेवड़ियों की तरह परीक्षा फल बाँट तन्त्र में यह दिखाना है कि राज्य ने पूर्ण साक्षरता अभियान के लक्ष्य को पा लिया है. भ्रष्टाचार में आकंठ निमग्न सरकार को तो सिर्फ़ इससे मतलब है कि जितनी सरकारी योजनायें होंगी उतने ही कमाई के अवसर होंगे........फ़िर कौन सोचता है कि आरक्षण के तहत यदि इन स्नातकों को रोजगार /नौकरी मिल भी गया तो ये क्या और कैसे करेंगे या अयोग्यता के कारण काम न मिला तो ये ग्रेजुएट (अनपढ़) सचमुच गेजुएट भिखारी बने रह जायेंगे.
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12.1.09
5.1.09
शुभ की कामना !
शादी ब्याह ,पूजा पाठ ,पर्व त्यौहार इत्यादि पर भले लोग अपने अपने धर्म समुदाय में प्रचलित पंचांगों का अनुसरण करें,पर इस वैश्वीकरण के युग ने इतना तो किया है कि विश्व के विभिन्न मत मतान्तर के अनुयायियों द्वारा वर्षभर के बारहों महीनो में अलग अलग समय में नव वर्ष का प्रारम्भ मानने वाला विश्व समुदाय अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से एक जनवरी को ही नए वर्ष के पहले दिन के आरंभिक दिन रूप में उत्सव सहित मानते हैं। सही ग़लत की बात छोड़ दें, तो इस बात पर उत्साहित हुआ ही जा सकता है और हर्ष मनाया जा सकता है कोई एक तो मौका और कारण ऐसा है जो विश्व समुदाय को एकजुट करता है. नही तो एक कैलेंडर बदलने से अधिक नए वर्ष के नाम पर और क्या बदलता है.भूख, गरीबी, हिंसा, विध्वंश, दुराचार ,अत्याचार ........सब अपनी जगह पर यथावत या कुछ और ही अधोमुख.
इतने सारे वर्ष निकल गए शुभकामनाओं के आदान प्रदान और शुभ की अपेक्षा में।पर चहुँओर घटित दुर्घटनाओ,विध्वंश, अधर्म और अनाचार के फैलते पसरते साम्राज्य को देख मन कभी कभी इतना हतोत्साहित हो जाता है कि लगता है इतने हृदयों से निकली शुभ की कामना क्यों विलुप्त हो जाती है.......क्यों नही यह फलित होती......और तब इच्छा ही नही होती औपचारिकताओं (शुभकामनाओ के आदान प्रदान) को निभाने की या शुभ के लिए बहुत अधिक आशान्वित रहने की.
शुभ की कामना अवश्य रखनी चाहिए । नए वर्ष या किसी अवसर विशेष पर ही क्यों , सदैव रखनी चाहिए.पर यह भी स्मरण रखना होगा कि वर्षों से शुभ की कामना मन में रखे और उद्गारों के आदान प्रदान के बाद भी यदि दिनानुदिन धार्मिक ,सामाजिक ,सांस्कृतिक , राजनितिक ,आर्थिक इत्यादि प्रत्येक क्षेत्र से धर्म बहिष्कृत होती जा रही है,धर्माचरण हास्यास्पद और मूर्खता का पर्याय ठहराया जाने लगा है, तो अब ऐसे में केवल शुभकामनाओं के आदान प्रदान और शुभ घटित होने की अपेक्षा रखने भर से काम न चलेगा.आवश्यकता है कि अपने आचरण में दृढ़ता से शुभ (सदाचार) को प्रश्रय देने की और अपने व्यग्तिगत स्वार्थ से उपार उठते हुए अपने सरोकारों को विस्तृत करते हुए समाज देश और विशव के सरोकारों से जुड़ने की. जहाँ कहीं भी अशुभ आचरण का अनुगमन हो रहा हो,उसके विरुद्ध मोर्चा खोले बिना किसी भी मोर्चे पर पतन को रोक पाना असंभव है॥
अपने अन्दर और बहार दोनों जगहों से अशुभ (अनाचार) को ध्वस्त कर ही हम शुभ की आशा रख सकते हैं और अपनी अगली पीढी को वह अवसर और परिवेश थाती में दे सकते हैं,जिसमे वह पूर्ण हर्षोल्लास के साथ उत्साहित हो शुभ की कामना करे और उसे फलित होता हुआ पाये...
कामना !!
पल पल छिन छिन चुकती जाए यह साँसों की पूंजी,
विधि ने जो है नियत किया वह अभी भी है अनबूझी.
बूँद बूँद कर रीती जाती घट जीवन जल वाली ,
संचित कर्म को गुनु तो पाऊं हाथ अभी भी खाली.
हे दाता दे हमको अपनी करुणा का अवलंबन,
सत्पथ पर चलने हेतु सद्बुद्धि धैर्य समर्पण.
काम क्रोध मद मोह लोभ से रक्षा करो हमारी,
भोग रोग न ग्रसित करे मति दृढ़ता भरो हमारी.
रोग शोक भय क्षोभ मुक्त हो प्रयाण की पावन बेला,
अंजुरी भर संतोष संग ले संपन्न हो जीवन लीला.
इतने सारे वर्ष निकल गए शुभकामनाओं के आदान प्रदान और शुभ की अपेक्षा में।पर चहुँओर घटित दुर्घटनाओ,विध्वंश, अधर्म और अनाचार के फैलते पसरते साम्राज्य को देख मन कभी कभी इतना हतोत्साहित हो जाता है कि लगता है इतने हृदयों से निकली शुभ की कामना क्यों विलुप्त हो जाती है.......क्यों नही यह फलित होती......और तब इच्छा ही नही होती औपचारिकताओं (शुभकामनाओ के आदान प्रदान) को निभाने की या शुभ के लिए बहुत अधिक आशान्वित रहने की.
शुभ की कामना अवश्य रखनी चाहिए । नए वर्ष या किसी अवसर विशेष पर ही क्यों , सदैव रखनी चाहिए.पर यह भी स्मरण रखना होगा कि वर्षों से शुभ की कामना मन में रखे और उद्गारों के आदान प्रदान के बाद भी यदि दिनानुदिन धार्मिक ,सामाजिक ,सांस्कृतिक , राजनितिक ,आर्थिक इत्यादि प्रत्येक क्षेत्र से धर्म बहिष्कृत होती जा रही है,धर्माचरण हास्यास्पद और मूर्खता का पर्याय ठहराया जाने लगा है, तो अब ऐसे में केवल शुभकामनाओं के आदान प्रदान और शुभ घटित होने की अपेक्षा रखने भर से काम न चलेगा.आवश्यकता है कि अपने आचरण में दृढ़ता से शुभ (सदाचार) को प्रश्रय देने की और अपने व्यग्तिगत स्वार्थ से उपार उठते हुए अपने सरोकारों को विस्तृत करते हुए समाज देश और विशव के सरोकारों से जुड़ने की. जहाँ कहीं भी अशुभ आचरण का अनुगमन हो रहा हो,उसके विरुद्ध मोर्चा खोले बिना किसी भी मोर्चे पर पतन को रोक पाना असंभव है॥
अपने अन्दर और बहार दोनों जगहों से अशुभ (अनाचार) को ध्वस्त कर ही हम शुभ की आशा रख सकते हैं और अपनी अगली पीढी को वह अवसर और परिवेश थाती में दे सकते हैं,जिसमे वह पूर्ण हर्षोल्लास के साथ उत्साहित हो शुभ की कामना करे और उसे फलित होता हुआ पाये...
कामना !!
पल पल छिन छिन चुकती जाए यह साँसों की पूंजी,
विधि ने जो है नियत किया वह अभी भी है अनबूझी.
बूँद बूँद कर रीती जाती घट जीवन जल वाली ,
संचित कर्म को गुनु तो पाऊं हाथ अभी भी खाली.
हे दाता दे हमको अपनी करुणा का अवलंबन,
सत्पथ पर चलने हेतु सद्बुद्धि धैर्य समर्पण.
काम क्रोध मद मोह लोभ से रक्षा करो हमारी,
भोग रोग न ग्रसित करे मति दृढ़ता भरो हमारी.
रोग शोक भय क्षोभ मुक्त हो प्रयाण की पावन बेला,
अंजुरी भर संतोष संग ले संपन्न हो जीवन लीला.
17.12.08
चिंता नही, इरेजर है न.......
इस डिजिटल युग में ईरेजर . ...विज्ञान प्रदत्त मनुष्य को एक ऐसी सुविधा है जिसने मानव जीवन को अपार सुगमता दी है. स्याही से लिखी जाती थी और गलती/अशुद्धि होने पर लिखे कागज और मूड, दोनों का कचड़ा हो जाता था .पहले तो पेन्सिल से लिखे को मिटाने की सुविधा हुई और अब?
अब तो कागज पेंसिल सब बाय बाय.सीधे इलेक्ट्रानिक मिडिया में लिखो और वहां तो भई मिटाने की छोड़ो आपकी गलतियों को रेखांकित कर सही शब्द और वाक्य विन्यास के लिए भी पूर्ण प्रावधान उपलब्ध हैं.अब गलतियों से डरने या घबराने की कोई आवश्यकता नही.सुख में कहीं कोई अवरोध नही आ सकता.चाहे लिखते समय हो या गीत संगीत द्वारा मनोरंजन के समय.
पहले एक आधार था रेडियो....रेडियो जो बजा दे, सुनते रहिये ,पसंद आया तो ठीक नही तो कान या रेडियो मूँद कर प्राण बचाइए.लेकिन अब तो भई हमारे पास तरह तरह के छोटे से बड़े आकार में एक से बढ़कर एक इलेक्ट्रानिक उपकरण उपलब्ध हैं जिसमे एक साथ अपने पसंदीदा हजारों गीत एकत्रित कर रख सकते हैं. जब जिससे मन भर जाय और अप्रिय लगने लगे, झट ईरेज कीजिये.फोटो खींचना हो,कुछ गड़बड़ हो गई,पसंद की फोटो न खिंची,कोई दिक्कत नही.......ईरेज कीजिये.सब डिजिटल है भाई.
अब मनोरंजन हो या रोजमर्रा की सुविधाएँ,प्रत्येक क्षेत्र में जब 'ईरेजात्मक' सुविधा उपलब्ध है. ऐसे में चिकित्सा क्षेत्र क्यों पीछे रहे?
ई-रेजरों की इसी श्रृंखला में चिकित्सा जगत में क्रांति कारी उपलब्धि यह नवीन औषधि है "आई-पिल "। गलती हो गई, कोई बात नही.बहत्तर घंटें हैं आपके पास,अपनी गलती को ईरेज करने के लिए. सरकार ने इसे बिना किसी चिकित्सक के अनुज्ञा ( प्रिस्क्रिप्सन) के सभी औषधालयों में ग्राहकों को उपलब्ध कराने का आदेश दिया है.
वैसे तो यदि यह औषधि कारगर हुई तो भ्रूण हत्या रोकने के क्रम में यह एक अत्यन्त सार्थक सराहनीय वरदान सा होगा और इस परिपेक्ष्य में इसकी मुक्त कंठ से प्रशंशा होनी चाहिए.पर देखा जाए तो आज जितने गर्भपात होते हैं,उसमे से कितने गर्भपात दम्पतियों के बीच हुए तथाकथित गलती का परिणाम होते हैं?
आंकडों पर दृष्टिपात करें तो स्वैक्षिक गर्भपात में चालीस प्रतिशत कन्या भ्रूण की हत्या होती है और पचपन प्रतिशत गर्भपात अनैतिक शारीरिक सम्बन्ध से हुए गर्भधारण का परिणाम है।मुश्किल से पाँच प्रतिशत या उससे भी कम ही गर्भपात विवाहिता के अनैक्षिक गर्भधारण का परिणाम होती है॥यह आई-पिल बनाम ईरेजर पूर्ण संज्ञान में अच्छी खासी मात्रा में व्यय कर भ्रूण परिक्षनोपरांत कन्या भ्रूण हत्या में तो कतई अवरोधक या कारगर न होगा. ,हाँ अवांछित गर्भधारण और भ्रूण हत्या पर अवश्य कुछ रोक लगा सकता है.
समस्या इसके सदुपयोग में नही इसके दुरूपयोग में है. आज हमारा किशोर और युवा वर्ग नैतिक मूल्यों को धता बताते हुए जिज्ञासा और आनंदोप्भोग के लिए जिस तरह आँख मूंदकर भागा जा रहा है, यह उनके द्वारा सर्वाधिक उपयोग में लाया जाएगा और भ्रूण हत्या भले रुक जाय पर नैतिक पतन किस पराकाष्ठा पर पहुंचेगा ,पता नही......
समाज को सीमाओं में निबद्ध रखने में भय की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है.अभी कुछ दिनों पहले एक ख़बर टी वी में सुना कि पाँचवीं छठी वर्ग की क्षत्राएँ गर्भपात के लिए चिकित्सकों के पास जाने लगी हैं..ऐसा नही कि यह सिर्फ़ सुना भर ,अपने आस पास यह सब देखा भी है.
किशोर वय जो कि एक आंधी की तरह बहना चाहते हैं,नैतिकता की बातें उनके लिए प्रहसन है,किसी अवरोध को स्वीकारना उन के लिए उनके अधिकारों का हनन ही नही अभिभावकों का उनपर अत्याचार है... उनके बहकते कदम को रोकने के लिए इस भय का होना अत्यन्त आवश्यक है. एक समय था जब भय,शील, धर्म, मर्यादा, आत्मसम्मान इत्यादि इत्यादि बेडियाँ थीं,जिसमे बंधकर मन को बांधकर रखा जाता था.समय के साथ शील धर्म मर्यादा नैतिक मूल्य की बातें तो दरकिनार होती गयीं ,बस एक भय बचा था,कि अंततः सुखोपभोग की कीमत लडकी को ही तो चुकानी पड़ती है.
लोकोपवाद तथा सबकुछ भुगतना लडकी को ही पड़ता है ,यह भय उत्सुकता और आकांक्षा पर भारी पड़ता था और कुछ हद तक अवरोधक का काम करता था।भले यह आई-पिल भ्रूण हत्या रोकने में समर्थ होगा पर यह स्वच्छंद शारीरिक सम्बन्ध को और बढ़ाने में सहायक भी होगा.... अब तो यह दुस्साहसी निडर पीढ़ी, इस उपाय के सहारे निःसंकोच जिज्ञासा समाधान और आनादोप्भोग के लिए निकल पड़ेंगे.
पहले एड्स पश्चिम के उन्मुक्त समाज का रोग माना जाता था।पर आज भारत में भी समस्या दिन प्रतिदिन भयावह होती जा रही है.यह रोग उस उन्मुक्त यौनाचार का ही प्रतिफल है, यह तथ्य किसी से छुपा तो नही. वर्तमान में जितनी गंभीर समस्या अजन्मे शिशु की अमानवीय हत्या है उतना ही स्वछन्द यौनाचार भी है,जो बड़ी तेजी से पूरे संस्कृति और समाज को पतनोन्मुख किए जा रहा है॥
पश्चिम में जहाँ पूर्ण यौन स्वछंदता है,अधिकांशतः अल्पवयस्क बच्चे कच्ची उम्र में ही अनैतिक यौनाचार और नशीली दवाओं के सेवन में निमग्न हो जाते हैं और उनमे विवाह परिवार जैसी व्यवस्थाओं के प्रति अनास्था का भाव आ जाता है,जिससे समाज में एक तरह से उच्छ्रिन्खला और विघटन व्याप्त हो जाता है।आज जितनी मात्रा में मनोरोगी पश्चिमी सभ्यता या उसके अनुकरण करने वाले किसी भी देश में रह रहे उस के अनुयायियों में पाया जाता है वह संतुलित जीवन जीने वालों में नही.जैसे मिठाई पसंद करने वाला यदि अत्यधिक मात्रा में प्रतिदिन केवल मिष्टान्न का सेवन करने लगे तो स्वस्थ्य का तो जो होगा सो होगा,एक अवधि के बाद उसे मिठाई से वितृष्णा हो जायेगी. वैसा ही इसके साथ भी है.
इस पिल के द्वारा गर्भस्थ शिशु की हत्या रोकने का प्रयास तो हो चुका है पता नही पीढी को व्यभिचार से विमुख करने के लिए कोई उपाय मिलेगा या नही?
अब तो कागज पेंसिल सब बाय बाय.सीधे इलेक्ट्रानिक मिडिया में लिखो और वहां तो भई मिटाने की छोड़ो आपकी गलतियों को रेखांकित कर सही शब्द और वाक्य विन्यास के लिए भी पूर्ण प्रावधान उपलब्ध हैं.अब गलतियों से डरने या घबराने की कोई आवश्यकता नही.सुख में कहीं कोई अवरोध नही आ सकता.चाहे लिखते समय हो या गीत संगीत द्वारा मनोरंजन के समय.
पहले एक आधार था रेडियो....रेडियो जो बजा दे, सुनते रहिये ,पसंद आया तो ठीक नही तो कान या रेडियो मूँद कर प्राण बचाइए.लेकिन अब तो भई हमारे पास तरह तरह के छोटे से बड़े आकार में एक से बढ़कर एक इलेक्ट्रानिक उपकरण उपलब्ध हैं जिसमे एक साथ अपने पसंदीदा हजारों गीत एकत्रित कर रख सकते हैं. जब जिससे मन भर जाय और अप्रिय लगने लगे, झट ईरेज कीजिये.फोटो खींचना हो,कुछ गड़बड़ हो गई,पसंद की फोटो न खिंची,कोई दिक्कत नही.......ईरेज कीजिये.सब डिजिटल है भाई.
अब मनोरंजन हो या रोजमर्रा की सुविधाएँ,प्रत्येक क्षेत्र में जब 'ईरेजात्मक' सुविधा उपलब्ध है. ऐसे में चिकित्सा क्षेत्र क्यों पीछे रहे?
ई-रेजरों की इसी श्रृंखला में चिकित्सा जगत में क्रांति कारी उपलब्धि यह नवीन औषधि है "आई-पिल "। गलती हो गई, कोई बात नही.बहत्तर घंटें हैं आपके पास,अपनी गलती को ईरेज करने के लिए. सरकार ने इसे बिना किसी चिकित्सक के अनुज्ञा ( प्रिस्क्रिप्सन) के सभी औषधालयों में ग्राहकों को उपलब्ध कराने का आदेश दिया है.
वैसे तो यदि यह औषधि कारगर हुई तो भ्रूण हत्या रोकने के क्रम में यह एक अत्यन्त सार्थक सराहनीय वरदान सा होगा और इस परिपेक्ष्य में इसकी मुक्त कंठ से प्रशंशा होनी चाहिए.पर देखा जाए तो आज जितने गर्भपात होते हैं,उसमे से कितने गर्भपात दम्पतियों के बीच हुए तथाकथित गलती का परिणाम होते हैं?
आंकडों पर दृष्टिपात करें तो स्वैक्षिक गर्भपात में चालीस प्रतिशत कन्या भ्रूण की हत्या होती है और पचपन प्रतिशत गर्भपात अनैतिक शारीरिक सम्बन्ध से हुए गर्भधारण का परिणाम है।मुश्किल से पाँच प्रतिशत या उससे भी कम ही गर्भपात विवाहिता के अनैक्षिक गर्भधारण का परिणाम होती है॥यह आई-पिल बनाम ईरेजर पूर्ण संज्ञान में अच्छी खासी मात्रा में व्यय कर भ्रूण परिक्षनोपरांत कन्या भ्रूण हत्या में तो कतई अवरोधक या कारगर न होगा. ,हाँ अवांछित गर्भधारण और भ्रूण हत्या पर अवश्य कुछ रोक लगा सकता है.
समस्या इसके सदुपयोग में नही इसके दुरूपयोग में है. आज हमारा किशोर और युवा वर्ग नैतिक मूल्यों को धता बताते हुए जिज्ञासा और आनंदोप्भोग के लिए जिस तरह आँख मूंदकर भागा जा रहा है, यह उनके द्वारा सर्वाधिक उपयोग में लाया जाएगा और भ्रूण हत्या भले रुक जाय पर नैतिक पतन किस पराकाष्ठा पर पहुंचेगा ,पता नही......
समाज को सीमाओं में निबद्ध रखने में भय की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है.अभी कुछ दिनों पहले एक ख़बर टी वी में सुना कि पाँचवीं छठी वर्ग की क्षत्राएँ गर्भपात के लिए चिकित्सकों के पास जाने लगी हैं..ऐसा नही कि यह सिर्फ़ सुना भर ,अपने आस पास यह सब देखा भी है.
किशोर वय जो कि एक आंधी की तरह बहना चाहते हैं,नैतिकता की बातें उनके लिए प्रहसन है,किसी अवरोध को स्वीकारना उन के लिए उनके अधिकारों का हनन ही नही अभिभावकों का उनपर अत्याचार है... उनके बहकते कदम को रोकने के लिए इस भय का होना अत्यन्त आवश्यक है. एक समय था जब भय,शील, धर्म, मर्यादा, आत्मसम्मान इत्यादि इत्यादि बेडियाँ थीं,जिसमे बंधकर मन को बांधकर रखा जाता था.समय के साथ शील धर्म मर्यादा नैतिक मूल्य की बातें तो दरकिनार होती गयीं ,बस एक भय बचा था,कि अंततः सुखोपभोग की कीमत लडकी को ही तो चुकानी पड़ती है.
लोकोपवाद तथा सबकुछ भुगतना लडकी को ही पड़ता है ,यह भय उत्सुकता और आकांक्षा पर भारी पड़ता था और कुछ हद तक अवरोधक का काम करता था।भले यह आई-पिल भ्रूण हत्या रोकने में समर्थ होगा पर यह स्वच्छंद शारीरिक सम्बन्ध को और बढ़ाने में सहायक भी होगा.... अब तो यह दुस्साहसी निडर पीढ़ी, इस उपाय के सहारे निःसंकोच जिज्ञासा समाधान और आनादोप्भोग के लिए निकल पड़ेंगे.
पहले एड्स पश्चिम के उन्मुक्त समाज का रोग माना जाता था।पर आज भारत में भी समस्या दिन प्रतिदिन भयावह होती जा रही है.यह रोग उस उन्मुक्त यौनाचार का ही प्रतिफल है, यह तथ्य किसी से छुपा तो नही. वर्तमान में जितनी गंभीर समस्या अजन्मे शिशु की अमानवीय हत्या है उतना ही स्वछन्द यौनाचार भी है,जो बड़ी तेजी से पूरे संस्कृति और समाज को पतनोन्मुख किए जा रहा है॥
पश्चिम में जहाँ पूर्ण यौन स्वछंदता है,अधिकांशतः अल्पवयस्क बच्चे कच्ची उम्र में ही अनैतिक यौनाचार और नशीली दवाओं के सेवन में निमग्न हो जाते हैं और उनमे विवाह परिवार जैसी व्यवस्थाओं के प्रति अनास्था का भाव आ जाता है,जिससे समाज में एक तरह से उच्छ्रिन्खला और विघटन व्याप्त हो जाता है।आज जितनी मात्रा में मनोरोगी पश्चिमी सभ्यता या उसके अनुकरण करने वाले किसी भी देश में रह रहे उस के अनुयायियों में पाया जाता है वह संतुलित जीवन जीने वालों में नही.जैसे मिठाई पसंद करने वाला यदि अत्यधिक मात्रा में प्रतिदिन केवल मिष्टान्न का सेवन करने लगे तो स्वस्थ्य का तो जो होगा सो होगा,एक अवधि के बाद उसे मिठाई से वितृष्णा हो जायेगी. वैसा ही इसके साथ भी है.
इस पिल के द्वारा गर्भस्थ शिशु की हत्या रोकने का प्रयास तो हो चुका है पता नही पीढी को व्यभिचार से विमुख करने के लिए कोई उपाय मिलेगा या नही?
20.10.08
स्थूलकाय गजानन का शूक्षम्काय वाहन....
यह सर्व विदित है कि, हिंदू धर्म में किसी भी पूजा के परायण में सर्वप्रथम गणेश की ही पूजा का विधान है.वस्तुतः गणेश बुद्धि विवेक के स्वामी माने जाते हैं.उन्हें गणनायक कहा जाता है.गण का तात्पर्य मनुष्य से भी है और देव से भी.अर्थात जो जनों/देवताओं में श्रेष्ठ हो वही गणनायक/जननायक है.फलस्वरूप बुद्धि विवेक के अधिनायक,देवों के अधिनायक की वंदना के उपरांत ही अन्य किसी भी देवी देवता की पूजा होती है.सफलता पूर्वक आयोजन के अनुष्ठान हेतु,उसने निर्विघ्न समापन हेतु विघ्नहर्ता का अनुष्ठान अनिवार्य है.
सहज ही हम देखते हैं कि जिस देवता के साथ उनके कर्म प्रवृत्ति अनुसार जो अवधारणा जुड़ी होती है,उस देव विशेष के मूर्त रूप की परिकल्पना भी उसी रूप में होती है.जैसे माँ काली को विकराल रूप में दिखाया जाता है,तो नीलकंठ भगवान शंकर को नागाहर भष्म विभूषित रूप में. इसी तरह चूँकि मानव जीवन में बुद्धि विवेक को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है , सो इसके प्रतीक रूप में गजानन को भारी भरकम रूप में दिखाया जाता है.यूँ गणेश को लम्बोदर (बड़े पेट वाला) भी कहा जाता है,जिसका तात्पर्य है,बड़ी से बड़ी बात को पचाने वाला गंभीर विवेकवान तथा धैर्यशाली पुरूष.धीर गंभीर विवेकवान पुरूष ही नायक और पूज्य होता है..
अब बात यह है कि इतने भारी भरकम देवता का वाहन इतना छोटा सा मूषक क्यों माना गया है ? बात कुछ अटपटी सी लगती है.वस्तुतः वेद पुराण,आख्यान इत्यादि में जो भी कुछ लिखा दर्शाया गया है,उसके स्थूल रूप में बहुत ही गूढ़ तथ्य छिपे हुए हैं,तीक्ष्ण बुद्धि और शोध द्वारा ही रहस्य प्रकट किया जा सकता है.देवताओं के जो वाहन बताये गएँ हैं,वस्तुतः वे उनके गुण स्वरुप ही प्रतीक रूप में प्रयुक्त हुए हैं.जैसे गाय सत्व गुण की प्रतीक हैं और सिंह आदि रजोगुण के वैसे ही चूहा तर्क का प्रतीक माना जाता है.अहर्निश कांट छांट करना,अच्छी बुरी हर चीज को कुतर जाना - यह मूषक का स्वभाव है.असल में मनुष्य के मस्तिष्क में सदा स्वतंत्र विचारने वाला तर्क एकदम इसी तरह कार्य करता है.जहाँ बुद्धि होगी वहां जिज्ञासा होगी ही और जिज्ञासा तर्क की जन्मदात्री है.परन्तु तर्क पर भारी भरकम बुद्धि और विवेक की उपस्थिति तथा उसका अंकुश न हो तो यह जीवन के लिए कल्याणकारी नही होता. इसलिए तर्करूपी मूषक पर भारी भरकम बुद्धि विवेक के स्वामी विराजमान रहते हैं.
दीर्घ और लघु काया का यह सम्पूर्ण समन्वय बड़ा ही महत संदेश देता है और हमें दिखाता सिखाता है कि जीवन में बुद्धि तर्क और विवेक की मात्रा इसी अनुपात में होनी चाहिए. यही संतुलन जब अव्यवस्थित होता है तो संस्कार,संस्कृति का विनाश कर अपने साथ साथ समुदाय का जीवन भी दुखदायी बना देता है.
हमारी कामना है कि श्री गणेश सबके ह्रदय में विराजें और सबका जीवन सुखमय हो.
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चलते चलते एक बात और कहना चाहूंगी कि दीपावली पर जिस गणेश और लक्ष्मी की आराधना होती है,उसे सच्चे अर्थ में लोग ग्रहण करें.लक्ष्मी श्री विष्णु की अर्धांगिनी हैं पर उनकी पूजा सदा गणेश के साथ इसलिए होती है कि लक्ष्मी वहां कभी वास नही करतीं जहाँ गणेश न हों.धन वहीँ अपना स्थायी निवास बनाती है जहाँ बुद्धि विवेक के साथ सन्मार्ग पर चल इसका अर्जन हो, भोग विलास में न व्यय कर अपने सद्कर्म तथा परहित निमित्त व्यय हो.सदयुक्ति से धनोपार्जन तथा सद्प्रयोजन में व्यय ही मनाव धर्म है. " शुभ" के साथ ही सदा "लाभ" होता है.एक से बढ़कर एक धनी मानी,राजा राजवाडे हुए और जिस किसी ने भी इसे समुचित श्रद्धा सम्मान न दिया वह नष्ट हो गया.
कभी कभी देखने में लगता है कि अमुक तो इतना पापी है फ़िर भी दोनों हाथों धन बटोरे जा रहा है.परन्तु तनिक निकट जाकर उनके जीवन में देखेंगे तो पाएंगे कि ऐसे लोगों का जीवन कितना अधिक अशांत है. अन्हक का धन जैसे ही चौखट लांघती है अपने साथ कुसंस्कार और दुर्बुद्धि लेकर आती है और हजारों करोड़ भी वह व्यक्ति क्यों न जमा कर ले उसके कुमार्गगामी पीढी उसे शीघ्र ही नष्ट कर देती है.
सच्ची दीपावली वही होगी जब हम न तो वातावरण को ध्वनि तथा दूषित धूम्र द्वारा प्रदूषित करें और न ही जुआ शराब में उडाएं.जितना धन हमें इसमे व्यय करना है उसका आधा भी यदि उन व्यक्तियों में बाँट दें, जिसने कई दिनी से पेटभर अन्न नही खाया हो,जिसके तन पर आने वाली सर्दी से बचने के लिए वस्त्र न हों,तो माता लक्ष्मी और विघ्नहर्ता उसके घर में ,उसके ह्रदय में सदा निवास करेंगे,इसमे कोई संदेह नही. लक्ष्मी धन के रूप में यदि न भी बरसें तो संतोष और शान्ति रूप में जरूर बरसेंगी.और विघ्नहर्ता किसी भी कष्ट के क्षणों में किसी न किसी रूप में आकर हाथ पकड़ उबार जायेंगे.
सबको दीपावली की अनंत शुभकामनाये.............
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सहज ही हम देखते हैं कि जिस देवता के साथ उनके कर्म प्रवृत्ति अनुसार जो अवधारणा जुड़ी होती है,उस देव विशेष के मूर्त रूप की परिकल्पना भी उसी रूप में होती है.जैसे माँ काली को विकराल रूप में दिखाया जाता है,तो नीलकंठ भगवान शंकर को नागाहर भष्म विभूषित रूप में. इसी तरह चूँकि मानव जीवन में बुद्धि विवेक को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है , सो इसके प्रतीक रूप में गजानन को भारी भरकम रूप में दिखाया जाता है.यूँ गणेश को लम्बोदर (बड़े पेट वाला) भी कहा जाता है,जिसका तात्पर्य है,बड़ी से बड़ी बात को पचाने वाला गंभीर विवेकवान तथा धैर्यशाली पुरूष.धीर गंभीर विवेकवान पुरूष ही नायक और पूज्य होता है..
अब बात यह है कि इतने भारी भरकम देवता का वाहन इतना छोटा सा मूषक क्यों माना गया है ? बात कुछ अटपटी सी लगती है.वस्तुतः वेद पुराण,आख्यान इत्यादि में जो भी कुछ लिखा दर्शाया गया है,उसके स्थूल रूप में बहुत ही गूढ़ तथ्य छिपे हुए हैं,तीक्ष्ण बुद्धि और शोध द्वारा ही रहस्य प्रकट किया जा सकता है.देवताओं के जो वाहन बताये गएँ हैं,वस्तुतः वे उनके गुण स्वरुप ही प्रतीक रूप में प्रयुक्त हुए हैं.जैसे गाय सत्व गुण की प्रतीक हैं और सिंह आदि रजोगुण के वैसे ही चूहा तर्क का प्रतीक माना जाता है.अहर्निश कांट छांट करना,अच्छी बुरी हर चीज को कुतर जाना - यह मूषक का स्वभाव है.असल में मनुष्य के मस्तिष्क में सदा स्वतंत्र विचारने वाला तर्क एकदम इसी तरह कार्य करता है.जहाँ बुद्धि होगी वहां जिज्ञासा होगी ही और जिज्ञासा तर्क की जन्मदात्री है.परन्तु तर्क पर भारी भरकम बुद्धि और विवेक की उपस्थिति तथा उसका अंकुश न हो तो यह जीवन के लिए कल्याणकारी नही होता. इसलिए तर्करूपी मूषक पर भारी भरकम बुद्धि विवेक के स्वामी विराजमान रहते हैं.
दीर्घ और लघु काया का यह सम्पूर्ण समन्वय बड़ा ही महत संदेश देता है और हमें दिखाता सिखाता है कि जीवन में बुद्धि तर्क और विवेक की मात्रा इसी अनुपात में होनी चाहिए. यही संतुलन जब अव्यवस्थित होता है तो संस्कार,संस्कृति का विनाश कर अपने साथ साथ समुदाय का जीवन भी दुखदायी बना देता है.
हमारी कामना है कि श्री गणेश सबके ह्रदय में विराजें और सबका जीवन सुखमय हो.
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चलते चलते एक बात और कहना चाहूंगी कि दीपावली पर जिस गणेश और लक्ष्मी की आराधना होती है,उसे सच्चे अर्थ में लोग ग्रहण करें.लक्ष्मी श्री विष्णु की अर्धांगिनी हैं पर उनकी पूजा सदा गणेश के साथ इसलिए होती है कि लक्ष्मी वहां कभी वास नही करतीं जहाँ गणेश न हों.धन वहीँ अपना स्थायी निवास बनाती है जहाँ बुद्धि विवेक के साथ सन्मार्ग पर चल इसका अर्जन हो, भोग विलास में न व्यय कर अपने सद्कर्म तथा परहित निमित्त व्यय हो.सदयुक्ति से धनोपार्जन तथा सद्प्रयोजन में व्यय ही मनाव धर्म है. " शुभ" के साथ ही सदा "लाभ" होता है.एक से बढ़कर एक धनी मानी,राजा राजवाडे हुए और जिस किसी ने भी इसे समुचित श्रद्धा सम्मान न दिया वह नष्ट हो गया.
कभी कभी देखने में लगता है कि अमुक तो इतना पापी है फ़िर भी दोनों हाथों धन बटोरे जा रहा है.परन्तु तनिक निकट जाकर उनके जीवन में देखेंगे तो पाएंगे कि ऐसे लोगों का जीवन कितना अधिक अशांत है. अन्हक का धन जैसे ही चौखट लांघती है अपने साथ कुसंस्कार और दुर्बुद्धि लेकर आती है और हजारों करोड़ भी वह व्यक्ति क्यों न जमा कर ले उसके कुमार्गगामी पीढी उसे शीघ्र ही नष्ट कर देती है.
सच्ची दीपावली वही होगी जब हम न तो वातावरण को ध्वनि तथा दूषित धूम्र द्वारा प्रदूषित करें और न ही जुआ शराब में उडाएं.जितना धन हमें इसमे व्यय करना है उसका आधा भी यदि उन व्यक्तियों में बाँट दें, जिसने कई दिनी से पेटभर अन्न नही खाया हो,जिसके तन पर आने वाली सर्दी से बचने के लिए वस्त्र न हों,तो माता लक्ष्मी और विघ्नहर्ता उसके घर में ,उसके ह्रदय में सदा निवास करेंगे,इसमे कोई संदेह नही. लक्ष्मी धन के रूप में यदि न भी बरसें तो संतोष और शान्ति रूप में जरूर बरसेंगी.और विघ्नहर्ता किसी भी कष्ट के क्षणों में किसी न किसी रूप में आकर हाथ पकड़ उबार जायेंगे.
सबको दीपावली की अनंत शुभकामनाये.............
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24.9.08
व्रत उपवास
किसी भी धर्म में, परम्परा में निहित कर्मकांडों में कालक्रमानुसार भले बहुत से ऐसे नियम विधान जुड़ गए जो पूर्णरूपेण उसी विधि के साथ ग्राह्य अथवा अनुकरनीय न हों, पर उसकी पड़ताल उसके सूक्षम और व्यापक उद्देश्यों की धरातल पर करेंगे तो पाएंगे कि उसमे कितना गहन अर्थ छुपा पड़ा है। धार्मिक आस्था को दृढ़ करने के साथ साथ आचरण को व्यवस्थित करते हुए मानव संबंधों को प्रगाढ़ कर सभ्यता संस्कृति के पोषण संरक्षण की कैसी अद्भुद क्षमता इसमे निहित है.लंबे समय से चले आ रहे इन कर्मकांडों को वाहियात और बकवास कह नकारे जाने के पूर्व इनके पीछे छिपे तथ्यों और उद्देश्यों की पड़ताल अत्यन्त आवश्यक है.
व्रत उपवासों का आध्यात्मिक ही नही कल्याणकारी शारीरिक,मानसिक और सामाजिक पहलू भी है।समग्र रूप में व्रत अपने आप से किया हुआ एक संकल्प है, जिसकी पूर्णता आत्मबल बढ़ाने में परम सहायक होता है और उपवास सांकेतिक रूप में इन्द्रियों के नियामक का साधन है। शरीर की सबसे मौलिक आवश्यकता 'भूख' पर नियंत्रण पाने का प्रयास ,हठ साधना द्वारा मौलिक आवश्यकता पर विजय प्राप्त कर आत्मबल की संपुष्टि है.मनुष्य इन्द्रियों को जितना अधिक वश में रखने में क्षमतावान होगा उसका आत्मबल,क्षमता उतनी ही उन्नत होगी और विवेक जागृत होगा.सकारात्मक शक्ति ही मनुष्य को सकारात्मक कार्य के लिए भी उत्प्रेरित करती है. लेकिन इसका यह अर्थ नही कि सिर्फ़ भोजन भर त्याग देना व्रत या उपवास कहलायेगा और यह उतना ही सिद्धिदायी होगा.उपवास वस्तुतः मन, कर्म, वचन तथा व्यवहार में शुचिता लाने का व्रत/संकल्प लेते हुए अटलता से उस पर कायम रहते हुए सत्य पथ पर चलने के प्रयास का नाम है. भोजन भर छोड़ देना और अवधि समाप्ति तक मन ध्यान भोजन पर केंद्रित रखते हुए व्यंजनों के ध्यान में झुंझलाहट के साथ समय निकलना,व्रत उपवास नही है. ईश्वर ने मानव शरीर को जिन पचेंद्रियों से विभूषित किया है,जिनकी सहायता से हम सुख प्राप्त करते हैं,सुख प्रदान करने वाले ये इन्द्रियां यदि मनुष्य के विवेक की सीमा में न रहें तो बहुधा अत्यधिक सुख की अभिलाषा व्यक्ति को अनुचित कार्य करने को उकसाती ही नही कभी कभी विवश भी कर देती है और मनुष्य का अधोपतन हो जाता है.इसलिए इन व्रत उपवासों का प्रावधान सभी धर्मो में एक तरह से इन्द्रियों के नियमन के निमित्त किया गया है. किसी भी देवी देवता चाहे उसे अल्लाह कहें,जीसस क्राइष्ट या राम कृष्ण शंकर दुर्गा हनुमान या इसी तरह के अन्य देवी देवता(हिंदू धर्म में देवी देवताओं की जो संख्या तैंतीस कडोड़ मानी गई है,वह भी अपने आप में अद्भुद इसलिए है कि इस ब्रह्माण्ड में ऐसा कुछ भी नही जिसे श्रद्धा का पात्र नही माना गया है,चाहे वह चल हो या अचल.और उसके प्रतिनिधि विशेष के रूप में उसे देव या देवी के रूप में पूजनीय माना गया है ), सबसे पहले तो धार्मिक दृष्टि से यदि देखें तो,जिस किसी देवी देवता के नाम पर यह व्रत अनुष्ठान किया जाता है,मनुष्य जब इसका परायण करता है तो सहज ही उस से जुड़ जाता है और ध्यान में जब इष्ट हों,उसके प्रति प्रेम श्रद्धा और निष्ठा हो, तो सहज ही उसके स्मृति से जुड़कर मन उस इष्ट विशेष के गुणों से अभिभूत हो उसका अनुकरण करने को प्रेरित होता है.ईश्वर जो सकारात्मकता का पुंज है,सद्गुणों का भण्डार है,व्यक्ति जितना उसकी भक्ति में डूबता है उतना अधिक सद्गुणों से विभूषित होता है.यूँ भी तो हम देखते हैं न कि जिस किसी मनुष्य से मानसिक रूप से हम जितने गहरे जुड़े होते हैं अनजाने ही उस व्यक्तिविशेष के कई गुण हममे ऐसे आ मिलते हैं कि लंबे समय तक के प्रगाढ़ मानसिक सम्बन्ध दो व्यक्तियों के बीच सोच विचार और आचरण में आश्चर्यजनक साम्यता ला व्यक्तित्व को एक दूसरे का प्रतिबिम्ब सा बना देता है.यही कारण है कि अपने मन में ईश्वर की प्रीति धारण कर मन कर्म वचन से सदाचार पर चलने वाले मनुष्य भी देवतुल्य पूज्य हो जाते हैं.इसका एक पहलू यह भी है कि चूँकि प्रत्येक व्यक्ति में इतनी मात्रा में करनीय अकरणीय में विभेद कर अनुशाषित जीवन जीने की विवेक क्षमता तो होती नही है,सो यदि कर्मकांडों से जोड़कर उसे ईश्वर के प्रति आस्था रखने को विवश कर दिया जाता है तो व्रत विशेष के कालखंड में अनिष्ट के भय से ही सही जुड़कर कुछ पल को उस सर्वशक्तिमान से जुड़ता तो है और उस उपास्य विशेष से जुड़ना और उसके सद्गुणों की स्मृति भी व्यक्ति को सन्मार्ग के अनुसरण को प्रेरित करती है.
मानव समुदाय को परस्पर सुदृढ़ बंधन में आबद्ध रखने में धर्म सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और धर्म से मनुष्य को जोड़े रखने में धार्मिक अनुष्ठान और कर्मकांड पोषक की भूमिका निभाते हैं।क्योंकि समुदाय विशेष जब एक साथ किसी कालखंड विशेष में किसी अनुष्ठान को संपन्न करते हैं तो स्वाभाविक हो उनमे भाईचारे की भावना का संचार होता है.उदहारण के लिए हम देख सकते हैं, रमजान के महीने में एक साथ विश्व के सभी मुस्लिम धर्मानुयायी महीने भर का व्रत रख सूर्योदय से सूर्यास्त तक उपवास रखते हैं.निश्चित रूप से यह पूरे समुदाय को एकजुटता के सूत्र में आबद्ध करने में प्रभावकारी भूमिका निभाता है.
शारीरिक रूप से देखें तो भी उपवास का शरीर पर बड़ा ही महत्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। प्रतिदिन जो हम आहार ग्रहण करते हैं लाख चाहकर भी वे पूर्णरूपेण पोषक संतुलित और ऋतु अनुकूल नही होते.असंतुलित आहार शरीर में रक्त,वायु या पित्त दोष उत्पन्न करते हैं तथा लगातार भोजन के पाचन क्रिया में संलग्न तंत्र शिथिलता को प्राप्त होने लगते हैं.ऐसे में सप्ताह,पखवाडे या मास में एक बार नियमित रूप से यदि फलाहार ,निराहार,एकसंझा या बिना नमक के भोजन किया जाए तो पाचन तंत्र बहुत हद तक व्यवस्थित हो जाता है.किंतु उपर्युक्त किसी भी उपवास में जल के पर्याप्त सेवन से शरीर में संचित दूषित अवयव ( टाक्सिन) शरीर से निकल जाता है. कुछ लोग भोजन को दैनिक आवश्यकता मानते हैं और उपवास करना अपने शरीर को कष्ट पहुँचाना मानते हैं.लेकिन यह निःसंदेह एक भ्रम से अधिक कुछ भी नही.उपवास शरीर के हानिकारक अवयवों से शुद्धिकरण का सर्वथा कारगर उपाय है.
हम कहते हैं,विश्व ने,विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है और मनुष्य का जीवन स्तर चमत्कारी रूप से उन्नत हुआ है।तथ्य को नाकारा नही जा सकता,परन्तु विश्व स्तर पर तरक्की लाख उचाईयां पा चुका हो अन्नाभाव में मरने वालों की संख्या में कमी करने की दिशा में बहुत कम कर पाया है.आज भी जनसँख्या वृद्धि का जो दर है, अन्न उत्पादन के दर की तुलना में वह कई गुना अधिक है,जो दिनोदिन मांग और पूर्ती के संतुलन को ध्वस्त करती जा रही है.पेट्रोल डीजल की बढ़ती दरों को महंगाई का प्रमुख कारण मानने वाले बहुत जल्दी ही यह मानना शुरू करेंगे कि जनसँख्या वृद्धि के सामने अन्न की कमी का दिनोदिन बढ़ता असंतुलन,इस संकट का बहुत बड़ा कारण है. भारत तथा इस जैसे बहुत से देशों में आज खेती करना निम्न दर्जे का काम माना जाता है और न तो पढ़े लिखे लोग कृषि कार्य में दिलचस्पी रखते हैं और न ही कृषि कार्य को बेहतर रोजगार का विकल्प मानते हैं.कृषि कार्य में जो लोग संलग्न हैं अधिकाँश संसाधनहीन ही हैं तथा कृषिकार्य उनका शौक नही मजबूरी है.बहुत तेज गति से पारंपरिक कृषकों का अन्य वैकल्पिक रोजगार क्षेत्र में पलायन हो रहा है.आज यह स्थिति तो आ ही गई न, कि विश्व भर में पेयजल समस्या बहुत बड़े रूप में उपस्थित हो गया है और "पानी बचाओ" मुहिम आन्दोलन का रूप लेता जा रहा है.हाल की ही बात है न दस रुपये किलो दूध पीने वाला समाज शुद्ध पेय जल के लिए न्यूनतम दस रुपये लीटर पानी खरीद कर पी रहा है. कारखाने उद्योग तो खूब लग रहे हैं.रोजगार के साधनों में निरंतर वृद्धि हो रही है,परन्तु खाने के लिए तो अन्न ही चाहिए.बहुत कुछ करना सर्वसाधारण के वश में नही पर इतना तो किया ही जा सकता है कि हम अपनी खुराक को उतनी ही रखें जितने की आवश्यकता इस शरीर को सुचारू रूप से स्वस्थ रखने के लिए है.धर्म के लिए न सही,सम्पूर्ण मानव समुदाय के हित के लिए और साथ ही अपने शरीर के लिए भी हितकारी नियमित निराहार का संकल्प लें तो किसी न किसी रूप में अन्न संकट से जूझने की दिशा में अपना योगदान दे सकते हैं.लोहे और कंक्रीट के फलते फैलते जंगल और सिकुड़ते कृषि भूमि के बीच मनुष्य मात्र का यह नैतिक कर्तब्य बनता है. धर्म में निहित कर्मकांड और व्रत उपवास के प्रावधान का यह महत सर्वमंगलकारी सामाजिक पहलू है,जिसकी उपयोगिता किसी भी काल में सन्दर्भहीन नही होगा.
धर्म व्यक्ति के ह्रदय के सबसे निकट होता है और धर्म के नाम पर आचरण की शुचिता का कार्य सर्वाधिक प्रभावकारी ढंग से कराया जा सकता है.धर्म के साथ इसलिए अनिष्ट के भय को जोड़ा गया कि यदि इसे स्वेच्छा पर नैतिक दायित्व रूप में छोड़ दिया जाता तो बहुत कम लोग ही इसका अनुसरण करते. धर्म से मजबूती से जोड़े रखने के महत उद्देश्य से ही कर्मकांडों की व्यवस्था की गई. कर्मकांड एक ओर जहाँ उत्सव रूप में व्यक्ति के मनोरंजन का सुगम साधन हैं वहीँ समाज को एकजुट रखने में सहायक भी.धार्मिक सामाजिक और शारीरिक रूप से मानव समुदाय के लाभ हेतु ही मनीषियों ने व्रत उपवास का प्रावधान कर रखा है..अतः इन प्रावधानों का अनुसरण कर हम निःसंदेह सुखी होंगे...
व्रत उपवासों का आध्यात्मिक ही नही कल्याणकारी शारीरिक,मानसिक और सामाजिक पहलू भी है।समग्र रूप में व्रत अपने आप से किया हुआ एक संकल्प है, जिसकी पूर्णता आत्मबल बढ़ाने में परम सहायक होता है और उपवास सांकेतिक रूप में इन्द्रियों के नियामक का साधन है। शरीर की सबसे मौलिक आवश्यकता 'भूख' पर नियंत्रण पाने का प्रयास ,हठ साधना द्वारा मौलिक आवश्यकता पर विजय प्राप्त कर आत्मबल की संपुष्टि है.मनुष्य इन्द्रियों को जितना अधिक वश में रखने में क्षमतावान होगा उसका आत्मबल,क्षमता उतनी ही उन्नत होगी और विवेक जागृत होगा.सकारात्मक शक्ति ही मनुष्य को सकारात्मक कार्य के लिए भी उत्प्रेरित करती है. लेकिन इसका यह अर्थ नही कि सिर्फ़ भोजन भर त्याग देना व्रत या उपवास कहलायेगा और यह उतना ही सिद्धिदायी होगा.उपवास वस्तुतः मन, कर्म, वचन तथा व्यवहार में शुचिता लाने का व्रत/संकल्प लेते हुए अटलता से उस पर कायम रहते हुए सत्य पथ पर चलने के प्रयास का नाम है. भोजन भर छोड़ देना और अवधि समाप्ति तक मन ध्यान भोजन पर केंद्रित रखते हुए व्यंजनों के ध्यान में झुंझलाहट के साथ समय निकलना,व्रत उपवास नही है. ईश्वर ने मानव शरीर को जिन पचेंद्रियों से विभूषित किया है,जिनकी सहायता से हम सुख प्राप्त करते हैं,सुख प्रदान करने वाले ये इन्द्रियां यदि मनुष्य के विवेक की सीमा में न रहें तो बहुधा अत्यधिक सुख की अभिलाषा व्यक्ति को अनुचित कार्य करने को उकसाती ही नही कभी कभी विवश भी कर देती है और मनुष्य का अधोपतन हो जाता है.इसलिए इन व्रत उपवासों का प्रावधान सभी धर्मो में एक तरह से इन्द्रियों के नियमन के निमित्त किया गया है. किसी भी देवी देवता चाहे उसे अल्लाह कहें,जीसस क्राइष्ट या राम कृष्ण शंकर दुर्गा हनुमान या इसी तरह के अन्य देवी देवता(हिंदू धर्म में देवी देवताओं की जो संख्या तैंतीस कडोड़ मानी गई है,वह भी अपने आप में अद्भुद इसलिए है कि इस ब्रह्माण्ड में ऐसा कुछ भी नही जिसे श्रद्धा का पात्र नही माना गया है,चाहे वह चल हो या अचल.और उसके प्रतिनिधि विशेष के रूप में उसे देव या देवी के रूप में पूजनीय माना गया है ), सबसे पहले तो धार्मिक दृष्टि से यदि देखें तो,जिस किसी देवी देवता के नाम पर यह व्रत अनुष्ठान किया जाता है,मनुष्य जब इसका परायण करता है तो सहज ही उस से जुड़ जाता है और ध्यान में जब इष्ट हों,उसके प्रति प्रेम श्रद्धा और निष्ठा हो, तो सहज ही उसके स्मृति से जुड़कर मन उस इष्ट विशेष के गुणों से अभिभूत हो उसका अनुकरण करने को प्रेरित होता है.ईश्वर जो सकारात्मकता का पुंज है,सद्गुणों का भण्डार है,व्यक्ति जितना उसकी भक्ति में डूबता है उतना अधिक सद्गुणों से विभूषित होता है.यूँ भी तो हम देखते हैं न कि जिस किसी मनुष्य से मानसिक रूप से हम जितने गहरे जुड़े होते हैं अनजाने ही उस व्यक्तिविशेष के कई गुण हममे ऐसे आ मिलते हैं कि लंबे समय तक के प्रगाढ़ मानसिक सम्बन्ध दो व्यक्तियों के बीच सोच विचार और आचरण में आश्चर्यजनक साम्यता ला व्यक्तित्व को एक दूसरे का प्रतिबिम्ब सा बना देता है.यही कारण है कि अपने मन में ईश्वर की प्रीति धारण कर मन कर्म वचन से सदाचार पर चलने वाले मनुष्य भी देवतुल्य पूज्य हो जाते हैं.इसका एक पहलू यह भी है कि चूँकि प्रत्येक व्यक्ति में इतनी मात्रा में करनीय अकरणीय में विभेद कर अनुशाषित जीवन जीने की विवेक क्षमता तो होती नही है,सो यदि कर्मकांडों से जोड़कर उसे ईश्वर के प्रति आस्था रखने को विवश कर दिया जाता है तो व्रत विशेष के कालखंड में अनिष्ट के भय से ही सही जुड़कर कुछ पल को उस सर्वशक्तिमान से जुड़ता तो है और उस उपास्य विशेष से जुड़ना और उसके सद्गुणों की स्मृति भी व्यक्ति को सन्मार्ग के अनुसरण को प्रेरित करती है.
मानव समुदाय को परस्पर सुदृढ़ बंधन में आबद्ध रखने में धर्म सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और धर्म से मनुष्य को जोड़े रखने में धार्मिक अनुष्ठान और कर्मकांड पोषक की भूमिका निभाते हैं।क्योंकि समुदाय विशेष जब एक साथ किसी कालखंड विशेष में किसी अनुष्ठान को संपन्न करते हैं तो स्वाभाविक हो उनमे भाईचारे की भावना का संचार होता है.उदहारण के लिए हम देख सकते हैं, रमजान के महीने में एक साथ विश्व के सभी मुस्लिम धर्मानुयायी महीने भर का व्रत रख सूर्योदय से सूर्यास्त तक उपवास रखते हैं.निश्चित रूप से यह पूरे समुदाय को एकजुटता के सूत्र में आबद्ध करने में प्रभावकारी भूमिका निभाता है.
शारीरिक रूप से देखें तो भी उपवास का शरीर पर बड़ा ही महत्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। प्रतिदिन जो हम आहार ग्रहण करते हैं लाख चाहकर भी वे पूर्णरूपेण पोषक संतुलित और ऋतु अनुकूल नही होते.असंतुलित आहार शरीर में रक्त,वायु या पित्त दोष उत्पन्न करते हैं तथा लगातार भोजन के पाचन क्रिया में संलग्न तंत्र शिथिलता को प्राप्त होने लगते हैं.ऐसे में सप्ताह,पखवाडे या मास में एक बार नियमित रूप से यदि फलाहार ,निराहार,एकसंझा या बिना नमक के भोजन किया जाए तो पाचन तंत्र बहुत हद तक व्यवस्थित हो जाता है.किंतु उपर्युक्त किसी भी उपवास में जल के पर्याप्त सेवन से शरीर में संचित दूषित अवयव ( टाक्सिन) शरीर से निकल जाता है. कुछ लोग भोजन को दैनिक आवश्यकता मानते हैं और उपवास करना अपने शरीर को कष्ट पहुँचाना मानते हैं.लेकिन यह निःसंदेह एक भ्रम से अधिक कुछ भी नही.उपवास शरीर के हानिकारक अवयवों से शुद्धिकरण का सर्वथा कारगर उपाय है.
हम कहते हैं,विश्व ने,विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है और मनुष्य का जीवन स्तर चमत्कारी रूप से उन्नत हुआ है।तथ्य को नाकारा नही जा सकता,परन्तु विश्व स्तर पर तरक्की लाख उचाईयां पा चुका हो अन्नाभाव में मरने वालों की संख्या में कमी करने की दिशा में बहुत कम कर पाया है.आज भी जनसँख्या वृद्धि का जो दर है, अन्न उत्पादन के दर की तुलना में वह कई गुना अधिक है,जो दिनोदिन मांग और पूर्ती के संतुलन को ध्वस्त करती जा रही है.पेट्रोल डीजल की बढ़ती दरों को महंगाई का प्रमुख कारण मानने वाले बहुत जल्दी ही यह मानना शुरू करेंगे कि जनसँख्या वृद्धि के सामने अन्न की कमी का दिनोदिन बढ़ता असंतुलन,इस संकट का बहुत बड़ा कारण है. भारत तथा इस जैसे बहुत से देशों में आज खेती करना निम्न दर्जे का काम माना जाता है और न तो पढ़े लिखे लोग कृषि कार्य में दिलचस्पी रखते हैं और न ही कृषि कार्य को बेहतर रोजगार का विकल्प मानते हैं.कृषि कार्य में जो लोग संलग्न हैं अधिकाँश संसाधनहीन ही हैं तथा कृषिकार्य उनका शौक नही मजबूरी है.बहुत तेज गति से पारंपरिक कृषकों का अन्य वैकल्पिक रोजगार क्षेत्र में पलायन हो रहा है.आज यह स्थिति तो आ ही गई न, कि विश्व भर में पेयजल समस्या बहुत बड़े रूप में उपस्थित हो गया है और "पानी बचाओ" मुहिम आन्दोलन का रूप लेता जा रहा है.हाल की ही बात है न दस रुपये किलो दूध पीने वाला समाज शुद्ध पेय जल के लिए न्यूनतम दस रुपये लीटर पानी खरीद कर पी रहा है. कारखाने उद्योग तो खूब लग रहे हैं.रोजगार के साधनों में निरंतर वृद्धि हो रही है,परन्तु खाने के लिए तो अन्न ही चाहिए.बहुत कुछ करना सर्वसाधारण के वश में नही पर इतना तो किया ही जा सकता है कि हम अपनी खुराक को उतनी ही रखें जितने की आवश्यकता इस शरीर को सुचारू रूप से स्वस्थ रखने के लिए है.धर्म के लिए न सही,सम्पूर्ण मानव समुदाय के हित के लिए और साथ ही अपने शरीर के लिए भी हितकारी नियमित निराहार का संकल्प लें तो किसी न किसी रूप में अन्न संकट से जूझने की दिशा में अपना योगदान दे सकते हैं.लोहे और कंक्रीट के फलते फैलते जंगल और सिकुड़ते कृषि भूमि के बीच मनुष्य मात्र का यह नैतिक कर्तब्य बनता है. धर्म में निहित कर्मकांड और व्रत उपवास के प्रावधान का यह महत सर्वमंगलकारी सामाजिक पहलू है,जिसकी उपयोगिता किसी भी काल में सन्दर्भहीन नही होगा.
धर्म व्यक्ति के ह्रदय के सबसे निकट होता है और धर्म के नाम पर आचरण की शुचिता का कार्य सर्वाधिक प्रभावकारी ढंग से कराया जा सकता है.धर्म के साथ इसलिए अनिष्ट के भय को जोड़ा गया कि यदि इसे स्वेच्छा पर नैतिक दायित्व रूप में छोड़ दिया जाता तो बहुत कम लोग ही इसका अनुसरण करते. धर्म से मजबूती से जोड़े रखने के महत उद्देश्य से ही कर्मकांडों की व्यवस्था की गई. कर्मकांड एक ओर जहाँ उत्सव रूप में व्यक्ति के मनोरंजन का सुगम साधन हैं वहीँ समाज को एकजुट रखने में सहायक भी.धार्मिक सामाजिक और शारीरिक रूप से मानव समुदाय के लाभ हेतु ही मनीषियों ने व्रत उपवास का प्रावधान कर रखा है..अतः इन प्रावधानों का अनुसरण कर हम निःसंदेह सुखी होंगे...
27.8.08
“ माँ आप मेरी आयडल थीं.”
“माँ आप मेरी आयडल थीं,पर जिस दिन मैंने आपको ऑफिस में झूठ बोलते देखा सुना("आप ऑफिस में मौजूद थीं पर जब आपके लिए फ़ोन आया तो आपने स्टाफ को कह दिया कि कह दो मैं ऑफिस में नही हूँ") ,माँ मुझे इतना बड़ा धक्का लगा कि बता नही सकता.आपने हमेशा हमलोगों को सच बोलने और अच्छा इंसान बनने,सच्चाई इमानदारी के रस्ते पर चलने की सीख दी.इस से पहले आपको कभी इस तरह झूठ बोलते सुना भी नही था और यही वजह था कि आपकी कही हर बात हमें सही लगती थी,लेकिन जब आपको ही झूठ में लिप्त होते देखा तो इतना बड़ा झटका लगा, समझ नही आया कि अबतक जो आपको देखता आ रहा था आपका वह रूप सही था या उस समय जो देखा वह सही था....मुझे लगा जब आप झूठ बोल सकती हैं तो सच्चाई की कीमत क्या है.मैं बहुत रोया था माँ.आपकी जो छवि मेरे मन में थी वह जैसे टूटने लगी थी.इसलिए उसके बाद से जब भी आप बड़ी बड़ी बातें करती हैं तो वो मुझे झूठी और छलावा लगती हैं.लगता है आपने दो चेहरे लगा रखे हैं एक दूसरों के सामने और एक हमारे सामने."
यह बात मेरे 13 वर्षीया पुत्र ने जिस दिन मुझे कहा,बहुत दिनों तक तो एक सन्न की अवस्था में रही और आज भी ये वाक्य मेरे अन्तःकरण को झकझोर कर ऐसे क्षुब्ध अवस्था में पहुँचा देते हैं कि मन एकदम अशांत हो जाता है.उस दिन कुछ भी न कह पाई थी,अपने बच्चे को.न ही अपनी सफाई में और न ही उसे सांत्वना में और न ही यह समझ में आया कि अपने को क्या सज़ा दूँ...
मुझे याद आया ,ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी बचपन में घटित हुआ था,जब मैं करीब ७-८ वर्ष की थी.माता पिता या पुस्तक सत्य के मार्ग पर चलने को प्रतिपल प्रेरित करते थे.पर व्यावहारिक रूप में अपने अभिभावकों को जब छोटी छोटी बातों के लिए दूसरो से झूठ बोलते सुनती थी तो बड़ी भ्रामक स्थिति हो जाया करती थी और अक्सर ही अपने इन अभिभावकों या शिक्षकों से वितृष्णा सी होने लगती थी.एक बार ऐसा हुआ कि मेरे पिताजी के एक मित्र ने पिताजी से फोटोग्राफी के लिए कैमरा माँगा.पिताजी ने मुझे निर्देश दिया कि उक्त अंकल के आने पर उन्हें वह कैमरा दे दूँ,पर रोल न दूँ.जब वो सज्जन (पिताजी के अनुपस्थिति में)आए और मैंने उन्हें कैमरा दे दिया तो उन्होंने मुझसे पुचकारकर पुछा कि रोल है क्या? मैंने हामी भर दी.उन्होंने झट मुझसे उसकी मांग कर डाली और मैंने सरलता से उन्हें कह दिया कि पिताजी ने देने को मना किया है.पर वो भी पूरे ढीठ थे. उन्होंने मुझसे कहा कि पिताजी ने ही उन्हें वो दे देने को कहा है.मुझे लगा ये झूठ थोड़े न कह रहे होंगे,सो मैंने उन्हें वह लाकर दे दिया.और मजे की बात यह हुई कि पिताजी को उन्होंने जाकर यह कह दिया कि मैंने उन्हें जबरदस्ती दौडा कर वह रोल दिया है और कहा है कि पिताजी ने रोल लेने को कहा है.जब पिताजी घर आए और माताजी को सारी कहानी सुनाकर मुझे जबरदस्त झाड़ के साथ साथ कनैठी दी तो मेरी अजीब सी स्थिति हो रही थी.जितना दुःख मुझे डांट सुनने और कान मडोडे जाने का नही हुआ उस से सौ गुना अधिक इस बात का हुआ कि सारे के सारे झूठे और प्रपंची हैं.मुझे इस बात में कोई शंशय नही था कि झूठ बोलना ग़लत और अधर्म है.
समय के साथ साथ ये भाव गहरे ही बैठते गए और मन ही मन यह प्रण दृढ़ करती गई कि व्यावहारिकता और दुनियादारी के नाम पर जो बहुत सारे ग़लत को लोग करते चले जाते हैं और कहते हैं कि क्या करें इसके बिना काम थोड़े ही न चल सकता है,इस धारा के विरुद्ध चलकर इसे एक चुनौती के तरह निभाउंगी.कभी हारूंगी थकुंगी नही ,कभी इस सत्य पथ से विचलित नही होउंगी. अपने पूरे विद्यार्थी जीवन में अपने सिद्धांतों आदर्शों नैतिकता को पालित पोषित कर जीवित रखा और आंखों में बड़े बड़े सपने बुनती बसाती रही, विलक्षण कार्य और सकारात्मक परिवर्तन के.पर पता भी नही चल पाया व्यावहारिक जीवन पथ पर चलते हुए अधिकाँश प्रण कहाँ चुक गए. आज कमोबेश वही स्थिति है,जिसमे कभी अपने अभिभावकों को देखा था और जिस से कभी इतनी वितृष्णा रहा करती थी.इसे क्या कहूँ....आत्मा की आवाज को नकारना या अपनी कायरता या फ़िर अपनी कातरता ? क्यों इतने विवश हैं हम ?एक आदर्श व्यक्तित्व,माँ,नागरिक बने रहने के संकल्प की कसौटी पर स्वयं को परख पाने भर की हिम्मत भी कहाँ बची है?आज कितनी सारी बातों के लिए कितने आराम से हम यूँ ही माफ़ कर दिया करते हैं अपने आप को, यह कहते हुए कि क्या करते और कोई रास्ता भी तो नही बचा है. अपने सुविधानुसार जब चाहे तब सही ग़लत के बीच की विभाजन रेखा को परिभाषित कर लिया करते हैं हम और जब कभी आत्मा कि चीत्कार उठी भी तो उसे ठोक कर फुसलाकर सुलाने के उपक्रम करने लगते हैं. लेकिन समस्या यह है कि अपने बच्चों या वो सारे लोग जो हमें अपना अनुकरणीय मानते हैं, जिनकी श्रद्धा और विश्वास की दीवार की नींव हमपर टिकी होती है,अपना जो करते हैं वो तो करते ही हैं,उन्हें दिग्भ्रमित करने के पाप के भागी भी हमही बनते हैं.जो बच्चा धरती पर आता है,एक साफ़ सुथरे स्लेट की तरह उसका मन मस्तिष्क होता है पर उसपर हमारे कथन से अधिक हमारे कार्य व्यवहार अंकित होते हैं.सदैव से प्रत्येक माता पिता अपने संतान को विलक्षण गुण संपन्न देखना पाना चाहते हैं .परन्तु इसके लिए अपेक्षित कार्यकलाप और व्यवहार को सुगठित और नियंत्रित नही रख पाते. जिस बालक और बालिका को अपने घर में अपना प्रेरक माता पिता के रूप में नही मिल पाता उसका सहज ही दिग्भ्रमित होना स्वाभाविक है.
मुझमे हिम्मत नही कि मैं अपने बच्चे से पूछ पाऊं कि उसकी मेरे बारे में क्या राय है.पर ईश्वर से प्रार्थना है कि उसे एक आयडल ऐसा मिले जो उसके सत्य पथ पर चलने को सदैव प्रेरित करता रहे अपने जीवन मार्ग पर दृढ़ता से 'सही' के साथ चले और उसके समस्त सदगुण सुरक्षित रहें. ऐसा नही है की मेरा बेटा मुझसे प्रेम नही करता,पर मुझे असह्य कष्ट है कि मैं एक अच्छी माँ और अपने बच्चे कि पथप्रदर्शिका न बन पाई. यदि एक भी अभिभावक मेरे इस प्रसंग से सचेत हो सके तो लगेगा थोड़ा सा प्रयाश्चित मैंने कर लिया.
यह बात मेरे 13 वर्षीया पुत्र ने जिस दिन मुझे कहा,बहुत दिनों तक तो एक सन्न की अवस्था में रही और आज भी ये वाक्य मेरे अन्तःकरण को झकझोर कर ऐसे क्षुब्ध अवस्था में पहुँचा देते हैं कि मन एकदम अशांत हो जाता है.उस दिन कुछ भी न कह पाई थी,अपने बच्चे को.न ही अपनी सफाई में और न ही उसे सांत्वना में और न ही यह समझ में आया कि अपने को क्या सज़ा दूँ...
मुझे याद आया ,ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी बचपन में घटित हुआ था,जब मैं करीब ७-८ वर्ष की थी.माता पिता या पुस्तक सत्य के मार्ग पर चलने को प्रतिपल प्रेरित करते थे.पर व्यावहारिक रूप में अपने अभिभावकों को जब छोटी छोटी बातों के लिए दूसरो से झूठ बोलते सुनती थी तो बड़ी भ्रामक स्थिति हो जाया करती थी और अक्सर ही अपने इन अभिभावकों या शिक्षकों से वितृष्णा सी होने लगती थी.एक बार ऐसा हुआ कि मेरे पिताजी के एक मित्र ने पिताजी से फोटोग्राफी के लिए कैमरा माँगा.पिताजी ने मुझे निर्देश दिया कि उक्त अंकल के आने पर उन्हें वह कैमरा दे दूँ,पर रोल न दूँ.जब वो सज्जन (पिताजी के अनुपस्थिति में)आए और मैंने उन्हें कैमरा दे दिया तो उन्होंने मुझसे पुचकारकर पुछा कि रोल है क्या? मैंने हामी भर दी.उन्होंने झट मुझसे उसकी मांग कर डाली और मैंने सरलता से उन्हें कह दिया कि पिताजी ने देने को मना किया है.पर वो भी पूरे ढीठ थे. उन्होंने मुझसे कहा कि पिताजी ने ही उन्हें वो दे देने को कहा है.मुझे लगा ये झूठ थोड़े न कह रहे होंगे,सो मैंने उन्हें वह लाकर दे दिया.और मजे की बात यह हुई कि पिताजी को उन्होंने जाकर यह कह दिया कि मैंने उन्हें जबरदस्ती दौडा कर वह रोल दिया है और कहा है कि पिताजी ने रोल लेने को कहा है.जब पिताजी घर आए और माताजी को सारी कहानी सुनाकर मुझे जबरदस्त झाड़ के साथ साथ कनैठी दी तो मेरी अजीब सी स्थिति हो रही थी.जितना दुःख मुझे डांट सुनने और कान मडोडे जाने का नही हुआ उस से सौ गुना अधिक इस बात का हुआ कि सारे के सारे झूठे और प्रपंची हैं.मुझे इस बात में कोई शंशय नही था कि झूठ बोलना ग़लत और अधर्म है.
समय के साथ साथ ये भाव गहरे ही बैठते गए और मन ही मन यह प्रण दृढ़ करती गई कि व्यावहारिकता और दुनियादारी के नाम पर जो बहुत सारे ग़लत को लोग करते चले जाते हैं और कहते हैं कि क्या करें इसके बिना काम थोड़े ही न चल सकता है,इस धारा के विरुद्ध चलकर इसे एक चुनौती के तरह निभाउंगी.कभी हारूंगी थकुंगी नही ,कभी इस सत्य पथ से विचलित नही होउंगी. अपने पूरे विद्यार्थी जीवन में अपने सिद्धांतों आदर्शों नैतिकता को पालित पोषित कर जीवित रखा और आंखों में बड़े बड़े सपने बुनती बसाती रही, विलक्षण कार्य और सकारात्मक परिवर्तन के.पर पता भी नही चल पाया व्यावहारिक जीवन पथ पर चलते हुए अधिकाँश प्रण कहाँ चुक गए. आज कमोबेश वही स्थिति है,जिसमे कभी अपने अभिभावकों को देखा था और जिस से कभी इतनी वितृष्णा रहा करती थी.इसे क्या कहूँ....आत्मा की आवाज को नकारना या अपनी कायरता या फ़िर अपनी कातरता ? क्यों इतने विवश हैं हम ?एक आदर्श व्यक्तित्व,माँ,नागरिक बने रहने के संकल्प की कसौटी पर स्वयं को परख पाने भर की हिम्मत भी कहाँ बची है?आज कितनी सारी बातों के लिए कितने आराम से हम यूँ ही माफ़ कर दिया करते हैं अपने आप को, यह कहते हुए कि क्या करते और कोई रास्ता भी तो नही बचा है. अपने सुविधानुसार जब चाहे तब सही ग़लत के बीच की विभाजन रेखा को परिभाषित कर लिया करते हैं हम और जब कभी आत्मा कि चीत्कार उठी भी तो उसे ठोक कर फुसलाकर सुलाने के उपक्रम करने लगते हैं. लेकिन समस्या यह है कि अपने बच्चों या वो सारे लोग जो हमें अपना अनुकरणीय मानते हैं, जिनकी श्रद्धा और विश्वास की दीवार की नींव हमपर टिकी होती है,अपना जो करते हैं वो तो करते ही हैं,उन्हें दिग्भ्रमित करने के पाप के भागी भी हमही बनते हैं.जो बच्चा धरती पर आता है,एक साफ़ सुथरे स्लेट की तरह उसका मन मस्तिष्क होता है पर उसपर हमारे कथन से अधिक हमारे कार्य व्यवहार अंकित होते हैं.सदैव से प्रत्येक माता पिता अपने संतान को विलक्षण गुण संपन्न देखना पाना चाहते हैं .परन्तु इसके लिए अपेक्षित कार्यकलाप और व्यवहार को सुगठित और नियंत्रित नही रख पाते. जिस बालक और बालिका को अपने घर में अपना प्रेरक माता पिता के रूप में नही मिल पाता उसका सहज ही दिग्भ्रमित होना स्वाभाविक है.
मुझमे हिम्मत नही कि मैं अपने बच्चे से पूछ पाऊं कि उसकी मेरे बारे में क्या राय है.पर ईश्वर से प्रार्थना है कि उसे एक आयडल ऐसा मिले जो उसके सत्य पथ पर चलने को सदैव प्रेरित करता रहे अपने जीवन मार्ग पर दृढ़ता से 'सही' के साथ चले और उसके समस्त सदगुण सुरक्षित रहें. ऐसा नही है की मेरा बेटा मुझसे प्रेम नही करता,पर मुझे असह्य कष्ट है कि मैं एक अच्छी माँ और अपने बच्चे कि पथप्रदर्शिका न बन पाई. यदि एक भी अभिभावक मेरे इस प्रसंग से सचेत हो सके तो लगेगा थोड़ा सा प्रयाश्चित मैंने कर लिया.
12.8.08
लेखन : एक प्रभावी उपचार
सर्वविदित है कि पठन- पाठन,मनन-चिंतन व्यक्ति को बौद्धिक स्तर पर समृद्ध बनाता है.पुस्तकें या ज्ञान चाहे धर्म अर्थ से सम्बंधित हो या किसी भी विषय विशेष से सम्बंधित,व्यक्ति को जहाँ एक ओर आनंदानुभूति कराते हैं, वहीँ ज्ञानवर्धन भी करते हैं. यूँ खेल कूद,बागवानी,भ्रमण,कला के विभिन्न मध्यम से जुड़ना, इत्यादि भी व्यक्ति के आनंद का श्रोत बन उसे संतोष और मानसिक शान्ति प्रदान करने,विषाद मुक्त रखने में बहुत प्रभावी होते हैं, पर इसमे ज्ञानवर्धन का तत्त्व उतनी मात्रा में नही होता जो पठन पाठन में होता है.
आनंद के इन अजश्र श्रोतों से जुड़ा एक संतुष्ट और परसन्नमना व्यक्ति अपने आस पास अपने से जुड़े लोगों में भी निरंतर उत्साह उर्जा और प्रसन्नता ही संचारित करता है,पर समय की बात है,मनुष्य का कोमल मन कितना भी धैर्य क्यों न पकड़े रहे, कभी न कभी ऐसे दुर्घटनाओं तथा प्रसंगों से गुजरता ही है जहाँ विषाद से घिरे बिना नही रह पाता और मानसिक कष्ट के क्षणों में वे सारे अवयव जो सामान्य अवस्था में आनन्द के श्रोत हुआ करते थे व्यक्ति के लिए अपने मायने खो चुके होते हैं या फ़िर यदि मन बहलाव के लिए जबरन अपने को खींच कर उनसे जुड़ शान्ति पाने का प्रयास किया भी जाए तो यह मन को पूरी तरह बाँध नही पाता.यदि इनमे लिप्त कर भी लिया जाए किसी तरह अपने आप को तो अधिकांशतः यह एक दैहिक क्रिया बनकर रह जाती है.कष्टों से गुजर रहा व्यक्ति यदि दीर्घ काल तक उस मानसिक अवसाद की स्थिति में रहता है तो पीड़ा घनी भूत हो मानसिक विकृति,पागलपन या आत्महत्या तक ले जाती है.मानसिक कष्ट की यह अवस्था व्यक्तिगत कष्ट के कारण या संवेदनशील मनुष्यों द्वारा अन्य के कष्ट के कारण भी हो सकती है.पर सामान्यतया जब दुख या सुख के अतिरेक को या भावनाओं के अतिरेक को अभिव्यक्ति नही मिलती तो मन मस्तिष्क पर आच्छादित मनोभाव घनीभूत हो कष्ट का कारण बन जाते हैं.
कहते हैं न कि दुःख बांटने पर सौ गुना घटते और सुख बांटने पर सौ गुना बढ़ते हैं.यह वस्तुतः मनोभावों को अभिव्यक्ति मिल जाने के कारण ही होता है.यूँ तो रोना भी स्वस्थ्य के लिए बड़ा ही उपयोगी माना गया है,क्योंकि रो लेने पर कुछ समय के लिए लगभग वैसी ही स्थिति होती है जैसे घनीभूत हो चुके बादलों के बरस जाने पर आसमान साफ़ हो जाता है.पर रोना मन को हल्का करने का कोई स्थायी उपाय नही है.कई कष्ट ऐसे होते हैं,जिनका न तो कोई समाधान होता है या जिन्हें व्यक्ति सहज ही सबके सामने अभिव्यक्त कर मन हल्का कर सकता है.सिर्फ़ कष्ट ही नही कई बार ऐसे विचार चिंतन भी मन मंथन का कारण बन जाते हैं और लंबे समय तक यदि इन्हे अभिव्यक्ति न मिले तो मन को बोझिल कर देते हैं.अब अभिव्यक्ति के लिए व्यक्ति रूप में मनोनुरूप पात्र का मिलना भी एक समस्या है.बहुत कम लोगों को यह सौभाग्य मिलता है कि मित्र रूप में उसके जीवन में कोई ऐसा उपलब्ध हो जो उसकी बातों भावनाओ को पूर्ण रूपेण समझे और जब वह चाहे व्यक्ति के आवश्यकतानुरूप समय से उपलब्ध भी हो.
ऐसे समय में लेखन अभिव्यक्ति का वह माध्यम है जिसमे निश्चित रूप से व्यक्ति को समाधान न सही पर शान्ति अवश्य ही मिल जाती है.गद्य ,पद्य,लेख ,संस्मरण,डायरी इत्यादि किसी भी विधा में संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर व्यक्ति दुखों को घटा और सुख संतोष पा सकता है.आवश्यक नही कि ये सब प्रकाशन हेतु ही हो या जब तक किसी लेखन शैली या विधा में पारंगतता न हो लेखन कार्य न किया जाए.वस्तुतः जब व्यक्ति लेखन कार्य में संलग्न होता है,विषय वस्तु में इस प्रकार निमग्न हो उसमे स्थित हो एकाग्रचित्त जाता है और भाव में डूबने के साथ साथ शब्द चयन तथा वाक्य विन्यास के प्रति सजग हो इस तरह पूरे कार्य में तल्लीन हो जाता है कि यह अवस्था " ध्यान"(मेडिटेशन) की अवस्था होती है.देखा जाए तो किसी मंत्र का जाप या इष्ट का ध्यान,पूजा पाठ जो मन को एकाग्रचित्त कर ध्यान की अवस्था द्वारा चित्त वृत्ति को सुदृढ़ स्वस्थ करने की प्रक्रिया मानी जाती है, कई बार मन स्थिर रख पाने में उतनी कारगर नही होती पर लेखन चूँकि समग्र रूप से एक प्रयास है व्यक्ति को एक केन्द्र में अवस्थित रखने में सहायक होता है, तो यह ध्यान के बाकी अन्य उपायों की तुलना में अधिक कारगर ठहरता है..और यह तो सर्व विदित है की ध्यान किस प्रकार मानसिक स्वस्थ्य प्रदान करने में सहायक है.
इतना ही नही,लेखन के विभिन्न माध्यमो से कथ्य में काल्पनिक रंगों का समावेश कर मन मस्तिष्क को आघात पहुँचा रही उन स्मृति दंशो से जिन्हें कि प्रकट कर पाना कठिन होता है किन्ही अपरिहार्य कारणों से,नए कलेवर में ढाल व्यक्ति सहजता से प्रकट कर उनसे मुक्ति पा सकता है.
कई लोग डायरी को अपना आत्मीय और मित्र बना,उसके साथ अपने अनुभूतियों और घटनाओं को बाँट लेते हैं.मन भी हल्का हो जाता है और इसके साथ ही जब चाहें तब उन संगृहीत पन्नो में जाकर बीत चुके घटनाओं और मनोभावों की गलियों में विचर आनंदानुभूति कर आते हैं.कुछ लोगों में यह वृत्ति होती है कि जहाँ कहीं कोई अच्छी पंक्ति उधृत देखी,झट उसे संगृहीत कर रख लिया.देखते देखते कुछ समय में विचारों का एक विशाल संग्रह बन जाता है और जब चाहे व्यक्ति उनके बीच ऐसे घूम फ़िर आ सकता है जैसे भूले बिसरे किसी मित्र से मिल आए हों.
मनोचिकित्सकों द्वारा भी लेखन को कारगर उपाय रूप में चिकित्सा हेतु अपनाया जाता है.रोगी को हिप्नोटायिज कर अर्ध चेतना की अवस्था में ले जाकर मन में गहरे गुंथे पड़े पीडादायक क्षणों से गुजारकर रोग के तह तक पहुँचने का प्रयास किया जाता है.इसके साथ ही रोगी द्वारा लेखन कार्य भी कराया जाता है और रोगी को अपने सभी प्रकार के मनोभावों को लिख कर अभिव्यक्त करने को प्रोत्साहित किया जाता है.इससे एक साथ दोनों कार्य हो जाते हैं,एक तो अनजाने ही रोगी लेखन क्रम में ध्यानावस्था को पाकर मानसिक स्वास्थलाभ करता है,और दूसरे चिकित्सक को भी रोग के जड़ तक पहुँच उसके अनुरूप चिकित्सा विधि तय करने में सहूलियत मिलती है.
जो लेखन कला में प्रवीण हैं,उनके लिए निरंतर लेखन अति आवश्यक है।क्योंकि लेखन कार्य में संलिप्तता लगभग वैसा ही कार्य करती है जैसे जमे हुए पानी को यदि बहाव दे दिया जाए तो पानी सड़ता ख़राब नही होता है.निरंतन चिंतन और अभिव्यक्ति विचारों को सदैव नूतनता प्रदान कर व्यक्ति को समृद्धि बनाती है.इसके साथ ही यह वह संतोष और उर्जा देती है जो जिजीविषा को पालित पोषित रखते हुए व्यक्ति को सदैव रचनात्मकता प्रदान करती है,जिसके सहारे वह अपना ही नही कईयों का भला कर सकता है॥ कहते हैं न कि जो काम तलवार नही कर सकती वह कलम कर सकती है........
आनंद के इन अजश्र श्रोतों से जुड़ा एक संतुष्ट और परसन्नमना व्यक्ति अपने आस पास अपने से जुड़े लोगों में भी निरंतर उत्साह उर्जा और प्रसन्नता ही संचारित करता है,पर समय की बात है,मनुष्य का कोमल मन कितना भी धैर्य क्यों न पकड़े रहे, कभी न कभी ऐसे दुर्घटनाओं तथा प्रसंगों से गुजरता ही है जहाँ विषाद से घिरे बिना नही रह पाता और मानसिक कष्ट के क्षणों में वे सारे अवयव जो सामान्य अवस्था में आनन्द के श्रोत हुआ करते थे व्यक्ति के लिए अपने मायने खो चुके होते हैं या फ़िर यदि मन बहलाव के लिए जबरन अपने को खींच कर उनसे जुड़ शान्ति पाने का प्रयास किया भी जाए तो यह मन को पूरी तरह बाँध नही पाता.यदि इनमे लिप्त कर भी लिया जाए किसी तरह अपने आप को तो अधिकांशतः यह एक दैहिक क्रिया बनकर रह जाती है.कष्टों से गुजर रहा व्यक्ति यदि दीर्घ काल तक उस मानसिक अवसाद की स्थिति में रहता है तो पीड़ा घनी भूत हो मानसिक विकृति,पागलपन या आत्महत्या तक ले जाती है.मानसिक कष्ट की यह अवस्था व्यक्तिगत कष्ट के कारण या संवेदनशील मनुष्यों द्वारा अन्य के कष्ट के कारण भी हो सकती है.पर सामान्यतया जब दुख या सुख के अतिरेक को या भावनाओं के अतिरेक को अभिव्यक्ति नही मिलती तो मन मस्तिष्क पर आच्छादित मनोभाव घनीभूत हो कष्ट का कारण बन जाते हैं.
कहते हैं न कि दुःख बांटने पर सौ गुना घटते और सुख बांटने पर सौ गुना बढ़ते हैं.यह वस्तुतः मनोभावों को अभिव्यक्ति मिल जाने के कारण ही होता है.यूँ तो रोना भी स्वस्थ्य के लिए बड़ा ही उपयोगी माना गया है,क्योंकि रो लेने पर कुछ समय के लिए लगभग वैसी ही स्थिति होती है जैसे घनीभूत हो चुके बादलों के बरस जाने पर आसमान साफ़ हो जाता है.पर रोना मन को हल्का करने का कोई स्थायी उपाय नही है.कई कष्ट ऐसे होते हैं,जिनका न तो कोई समाधान होता है या जिन्हें व्यक्ति सहज ही सबके सामने अभिव्यक्त कर मन हल्का कर सकता है.सिर्फ़ कष्ट ही नही कई बार ऐसे विचार चिंतन भी मन मंथन का कारण बन जाते हैं और लंबे समय तक यदि इन्हे अभिव्यक्ति न मिले तो मन को बोझिल कर देते हैं.अब अभिव्यक्ति के लिए व्यक्ति रूप में मनोनुरूप पात्र का मिलना भी एक समस्या है.बहुत कम लोगों को यह सौभाग्य मिलता है कि मित्र रूप में उसके जीवन में कोई ऐसा उपलब्ध हो जो उसकी बातों भावनाओ को पूर्ण रूपेण समझे और जब वह चाहे व्यक्ति के आवश्यकतानुरूप समय से उपलब्ध भी हो.
ऐसे समय में लेखन अभिव्यक्ति का वह माध्यम है जिसमे निश्चित रूप से व्यक्ति को समाधान न सही पर शान्ति अवश्य ही मिल जाती है.गद्य ,पद्य,लेख ,संस्मरण,डायरी इत्यादि किसी भी विधा में संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर व्यक्ति दुखों को घटा और सुख संतोष पा सकता है.आवश्यक नही कि ये सब प्रकाशन हेतु ही हो या जब तक किसी लेखन शैली या विधा में पारंगतता न हो लेखन कार्य न किया जाए.वस्तुतः जब व्यक्ति लेखन कार्य में संलग्न होता है,विषय वस्तु में इस प्रकार निमग्न हो उसमे स्थित हो एकाग्रचित्त जाता है और भाव में डूबने के साथ साथ शब्द चयन तथा वाक्य विन्यास के प्रति सजग हो इस तरह पूरे कार्य में तल्लीन हो जाता है कि यह अवस्था " ध्यान"(मेडिटेशन) की अवस्था होती है.देखा जाए तो किसी मंत्र का जाप या इष्ट का ध्यान,पूजा पाठ जो मन को एकाग्रचित्त कर ध्यान की अवस्था द्वारा चित्त वृत्ति को सुदृढ़ स्वस्थ करने की प्रक्रिया मानी जाती है, कई बार मन स्थिर रख पाने में उतनी कारगर नही होती पर लेखन चूँकि समग्र रूप से एक प्रयास है व्यक्ति को एक केन्द्र में अवस्थित रखने में सहायक होता है, तो यह ध्यान के बाकी अन्य उपायों की तुलना में अधिक कारगर ठहरता है..और यह तो सर्व विदित है की ध्यान किस प्रकार मानसिक स्वस्थ्य प्रदान करने में सहायक है.
इतना ही नही,लेखन के विभिन्न माध्यमो से कथ्य में काल्पनिक रंगों का समावेश कर मन मस्तिष्क को आघात पहुँचा रही उन स्मृति दंशो से जिन्हें कि प्रकट कर पाना कठिन होता है किन्ही अपरिहार्य कारणों से,नए कलेवर में ढाल व्यक्ति सहजता से प्रकट कर उनसे मुक्ति पा सकता है.
कई लोग डायरी को अपना आत्मीय और मित्र बना,उसके साथ अपने अनुभूतियों और घटनाओं को बाँट लेते हैं.मन भी हल्का हो जाता है और इसके साथ ही जब चाहें तब उन संगृहीत पन्नो में जाकर बीत चुके घटनाओं और मनोभावों की गलियों में विचर आनंदानुभूति कर आते हैं.कुछ लोगों में यह वृत्ति होती है कि जहाँ कहीं कोई अच्छी पंक्ति उधृत देखी,झट उसे संगृहीत कर रख लिया.देखते देखते कुछ समय में विचारों का एक विशाल संग्रह बन जाता है और जब चाहे व्यक्ति उनके बीच ऐसे घूम फ़िर आ सकता है जैसे भूले बिसरे किसी मित्र से मिल आए हों.
मनोचिकित्सकों द्वारा भी लेखन को कारगर उपाय रूप में चिकित्सा हेतु अपनाया जाता है.रोगी को हिप्नोटायिज कर अर्ध चेतना की अवस्था में ले जाकर मन में गहरे गुंथे पड़े पीडादायक क्षणों से गुजारकर रोग के तह तक पहुँचने का प्रयास किया जाता है.इसके साथ ही रोगी द्वारा लेखन कार्य भी कराया जाता है और रोगी को अपने सभी प्रकार के मनोभावों को लिख कर अभिव्यक्त करने को प्रोत्साहित किया जाता है.इससे एक साथ दोनों कार्य हो जाते हैं,एक तो अनजाने ही रोगी लेखन क्रम में ध्यानावस्था को पाकर मानसिक स्वास्थलाभ करता है,और दूसरे चिकित्सक को भी रोग के जड़ तक पहुँच उसके अनुरूप चिकित्सा विधि तय करने में सहूलियत मिलती है.
जो लेखन कला में प्रवीण हैं,उनके लिए निरंतर लेखन अति आवश्यक है।क्योंकि लेखन कार्य में संलिप्तता लगभग वैसा ही कार्य करती है जैसे जमे हुए पानी को यदि बहाव दे दिया जाए तो पानी सड़ता ख़राब नही होता है.निरंतन चिंतन और अभिव्यक्ति विचारों को सदैव नूतनता प्रदान कर व्यक्ति को समृद्धि बनाती है.इसके साथ ही यह वह संतोष और उर्जा देती है जो जिजीविषा को पालित पोषित रखते हुए व्यक्ति को सदैव रचनात्मकता प्रदान करती है,जिसके सहारे वह अपना ही नही कईयों का भला कर सकता है॥ कहते हैं न कि जो काम तलवार नही कर सकती वह कलम कर सकती है........
7.8.08
युवाओं में विवाह के प्रति बढ़ती अनास्था
धर्म में मनुष्य को जिन चार आश्रमों में रहने का प्रावधान बताया गया है ,उसमे जीवन के लिए विवाह को अति आवश्यक माना गया है.समाज को सुगठित और सुव्यवस्थित रहने के लिए तथा इसके द्वारा धर्म अर्थ काम का उपभोग अपने सहचर के साथ कर अंत में मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी इसी के माध्यम से गुजरकर ही माना गया है.क्योंकि जबतक व्यक्ति के तन मन और धन की बुभुक्षा शांत नही हो जाती निष्काम नही हो पाता और न ही धर्म कर्म में प्रवृत्त हो संसारिकता से विरत रह भगवत भक्ति में रत कर पाता है स्वयं को..
जबतक समाज सुगठित नही हुआ था,नियम निर्धारित न हुए थे,जर,जमीन,जोरू ही हिंसा द्वेष और मार काट के कारण हुआ करते थे.क्योंकि मन तो तब भी था,प्रेम तब भी हुआ करते थे और व्यक्ति इन तीनो से तब भी बंधा होता था मनुष्य . हाँ,व्यवस्था नही थी,जो कोई सीमा निर्धारित करती और लोगों को कर्तब्य बंधन में बांधती ,सो सबकुछ अस्त व्यस्त अराजक स्थिति में था ..
कालांतर में कई व्यवस्थाएं आयीं.कुछ सही भी कुछ ग़लत भी.पर एक बात जो शाश्वत थी और रहेगी कि विवाह जीवन और समाज के लिए सभ्यता के साथ ही आवश्यक थे और सभ्यता के अंत तक इसकी अपरिहार्यता निर्विवाद रहेगी,भले स्वरुप कितना भी बदले.
गृहस्थ आश्रम में अपने सहचर या सहचरी के साथ तन मन धन और धर्म इन चारों के उपभोग के साथ साथ पति पत्नी के लिए कुछ अधिकारों और कर्तब्यों की भी अवधारणा की गई है.परन्तु आज जैसे जैसे व्यक्ति(स्त्री पुरूष दोनों) वैयक्तिकता की दौड़ और होड़ में फंसे अपने अहम् को सर्वोपरि रख कर्तब्य से अधिक अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने लगे हैं,प्रेम को भी लेन देन की तराजू में तौलने लगे हैं और तन मन धन और धर्म अब एक साथ नही, व्यक्तिगत रूप में व्यक्तिगत इच्छा के अनुरूप इसे जीवन में स्थान देने और मानने में लगें हैं तो विवाह रूपी इस संस्था पर से लोगों का विशवास टूटना दरकना लाजिमी है.
पहले पुरूष के लिए...............
आज की काफी हद तक स्वेक्षचारी जीवन शैली ने पुरूष के लिए संभावनाओं के अपरिमित द्वार खोल दिए हैं.सब नही, पर बहुत से युवा युवावस्था की दहलीज पर कदम रखते तक में तन मन के सुख का एक गृहस्थ की भांति उपभोग कर चुके होते हैं.धन कमाना उनका परम ध्येय होता है और धर्म की चिंता करना समय व्यर्थ करना लगता है.अपने हर आज को बखूबी कैसे एन्जॉय करना है इसके हर नुस्खे आजमाने तो तत्पर रहते हैं और सुगमता से इन्हे सब उपलब्ध भी रहता है.महानगरों में तो इसकी असीम संभावनाएं हैं,जो सरलता से जब चाहे उपलब्ध है..बल्कि ऐसी सेवाएं उपलब्ध कराने वाली एजेंसियां भी उपलब्ध हैं जो ''मित्र बनाओ'' से लेकर अकेलेपन को दूर कराने और हर प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए २४ घंटे की सेवा खुलेआम इश्तेहार देकर प्रदान करते हैं.जब विवाह को तन के सुख के साथ बांधकर माना जाने लगे और जिंदगी की हर सुविधा और सुख टू मिनट मैगी या रेडी टू ईट स्टाइल में मिल रहा हो तो कौन फ़िर विवाह के बंधन में बाँध कर्तब्यों की बेडी में जकड़ना चाहेगा ख़ुद को. कर्तब्य निष्पादन में भी सुख है,कोई आपका नितांत अपना हर सुख दुःख में बिना किसी सेवा शुल्क के आपके लिए हर पल उपलब्ध है,जिसके साथ कर्तब्य निभाने में किसी को सुखी करने,खुशी देने में भी सुख है,और यह बोझ बंधन कतई नही है,जो पुरूष इसमे आस्था रखते हैं,वे तो सहज विवाह को मान्यता और सम्मान दे देते हैं पर इस से विमुख पुरूष जब प्रौढावस्था में होश में आता है और इसे मानने को प्रस्तुत होता है तबतक बहुत देर हो चुकी होती है और ये अपना बहुत कुछ खो चुके होते हैं.लाख पश्चिम का अनुकरण कर लें युवावस्था में, पर उम्र ढलने के बाद एक न एक दिन मानना ही पड़ता है कि हमारी भारतीय संस्कृति में जो भी प्रावधान हैं,अंततः सच्चा सुख उसी रास्ते चल मिल सकता है.
अब स्त्रियों की बात.........
कमोबेश जो मानसिकता पुरुषों की है पुरुषों की बराबरी में उतरी आज की तथाकथित माडर्न नारियां भी उसी बीमारी में स्वयं को स्वेक्षा से जकडे लिए जा रही हैं.आर्थिक आत्मनिर्भरता को स्त्रियों ने पति के विकल्प के रूप में मानना आरम्भ कर दिया है और घर गृहस्थी के कर्तब्य निष्पादन को मानसिक गुलामी मान, धन को ही पति परिवार सबका विकल्प मानना आरम्भ कर दिया है..धनाढ्य महिलाओं के लिए भी वो सारी सुविधाएँ उपलब्ध हैं जो एक पुरूष को तथाकथित सुख के लिए प्राप्य होते हैं.हालाँकि यह स्थिति पुरुषों में जितनी मात्रा में है उतनी स्त्रियों में नही आ पाई है.पर जब राह पर चल निकली हों तो चिंताजनक तो अवश्य ही है.
स्वेक्षाचारिता, वैयक्तिकता,भौतिकवादिता और कुछ हद तक पाश्चात्य संस्कृति के अन्धानुकरण ने आज के युवाओं चाहे स्त्री हो या पुरूष ,के मन में विवाह के प्रति वितृष्णा भरना शुरू कर दिया है.अब विवाह को बोझ और बंधन मानने की प्रवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ने लगी है.वर्तमान के भौतिक युग में आज का युवा भौतिक वस्तुओं की खरीद फरोख्त की तरह विवाह को भी नफा नुक्सान की तराजू पर तौलकर देखने लगा है और सिर्फ़ आज में जीने वाला युवा पहले मोल तोल कर ठोंक बजा कर देख लेना चाहता है कि किस चीज के लिए क्या कीमत चुका रहा है.किसी समय विवाह नाम की इस संस्था को जो सामाजिक मान्यता तथा साम्मानित स्थान समाज को सुव्यवस्थित सुगठित रखने के लिए समाज द्वारा दिया गया था,अब वह बहुत तेजी से तिरस्कृत होने लगा है.
समस्या के मूल में जाएँ तो सबसे बड़ा कारण वैयक्तिकता ही है.व्यक्ति इतना अधिक आत्मकेंद्रित होता जा रहा है संवेदनाएं इस तरह सुप्त होती जा रही हैं कि अपने से बहार निकल और आगे बढ़ व्यवहार में दूसरों के दुःख सुख के प्रति बहुत अधिक उदासीन होने लगा है.कितने लोग(स्त्री या पुरूष)हैं जो देश दुनिया समाज के दुःख सुख को अपने व्यक्तिगत सुख दुःख से अधिक महत्व दे पाते हैं?स्वयं को छोड़ हर व्यक्ति दूसरा हो गया है,चाहे वह पति पत्नी बच्चे माता पिता ही क्यों न हों.और यही वैयक्तिकता जब हमें दूसरों के प्रति निर्मम और असंवेदनशील बनाती हैं तब किसी भी संस्था,चाहे वह विवाह का ही क्यों न हो मूल्यहीन होना,अपनी महत्ता खोना स्वाभाविक ही है. आज जो लोग विवाह से बचना भागना चाहते हैं,उसके मूल में कहीं न कहीं वे ही कष्ट फोकस में होते हैं जो इस संस्था में बंधने के बाद स्वार्थवश और अहम् के टकराव की अवस्था में लोगों को भोगना पड़ता है.दो व्यक्तियों में एक यदि कर्तब्य पथ पर चलने वाला हो भी पर दूसरा यदि अधिकार को पकड़े दूसरे को प्रताडित करता रहे, तो भी सम्बन्ध का सुचारू रूप से चल पाना कठिन हो जाता है.अब जब तक स्त्रियाँ आर्थिक परतंत्रता की बेडियों में जकड़ी हुई थीं,तबतक तो रोते पीटते कष्ट सहते जीवन निकाल ही लेती थीं और विवाह नाम की इस संस्था की लाज बच जाती थी.पर जैसे जैसे स्त्रियाँ इस से निकलती जा रही हैं,विवाह के प्रति इस तरह अनास्था तथा विवाह का टूटना तेजी से बढ़ता जा रहा है.
सम्बन्ध विच्छेद या विवाह से वितृष्णा दोनों ही स्थिति,चिंताजनक है तथा किसी भी स्थिति में न तो यह कष्टों से बचने का उपाय है या समस्या का समाधान ही है.बात बस इतनी है कि यदि हम अपने इस ''मैं'' से ऊपर उठ जैसे ही ''हम'' में विशवास करने लगेंगे दांपत्य की गरिमा और मधुरता को भी पा लेंगे और तब ही जान पाएंगे कि सच्चा सुख कर्तब्य से बचने में नही बल्कि उसके निष्पादन में ही है.विवाह केवल आर्थिक सुरक्षा और संबल के ही लिए नही बल्कि मानसिक सुख और संबल के लिए भी आवश्यक है.दम्पति जब परस्पर एक दूसरे के लिए प्रेम,निष्ठा,सम्मान और समर्पण की भावना रखे ,अपने कर्तब्य तथा सहगामी के अधिकारों के प्रति सजग रहे तो सिर्फ़ अपने लिए ही स्वर्गिक सुख नही अर्जित करेगा बल्कि अपनी आगामी पीढी के सामने भी सुसंस्कारों का आदर्श प्रस्तुत करेगा और अगली पीढी अपनी पिछली पीढी के सुख को देख विवाह बंधन को दुःख का बंधन नही बल्कि सुख का द्वार समझ पवित्र बंधन में बंधने को न केवल तत्पर होंगे,बल्कि पूरे मन से इसका सम्मान भी करेंगे.............
जबतक समाज सुगठित नही हुआ था,नियम निर्धारित न हुए थे,जर,जमीन,जोरू ही हिंसा द्वेष और मार काट के कारण हुआ करते थे.क्योंकि मन तो तब भी था,प्रेम तब भी हुआ करते थे और व्यक्ति इन तीनो से तब भी बंधा होता था मनुष्य . हाँ,व्यवस्था नही थी,जो कोई सीमा निर्धारित करती और लोगों को कर्तब्य बंधन में बांधती ,सो सबकुछ अस्त व्यस्त अराजक स्थिति में था ..
कालांतर में कई व्यवस्थाएं आयीं.कुछ सही भी कुछ ग़लत भी.पर एक बात जो शाश्वत थी और रहेगी कि विवाह जीवन और समाज के लिए सभ्यता के साथ ही आवश्यक थे और सभ्यता के अंत तक इसकी अपरिहार्यता निर्विवाद रहेगी,भले स्वरुप कितना भी बदले.
गृहस्थ आश्रम में अपने सहचर या सहचरी के साथ तन मन धन और धर्म इन चारों के उपभोग के साथ साथ पति पत्नी के लिए कुछ अधिकारों और कर्तब्यों की भी अवधारणा की गई है.परन्तु आज जैसे जैसे व्यक्ति(स्त्री पुरूष दोनों) वैयक्तिकता की दौड़ और होड़ में फंसे अपने अहम् को सर्वोपरि रख कर्तब्य से अधिक अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने लगे हैं,प्रेम को भी लेन देन की तराजू में तौलने लगे हैं और तन मन धन और धर्म अब एक साथ नही, व्यक्तिगत रूप में व्यक्तिगत इच्छा के अनुरूप इसे जीवन में स्थान देने और मानने में लगें हैं तो विवाह रूपी इस संस्था पर से लोगों का विशवास टूटना दरकना लाजिमी है.
पहले पुरूष के लिए...............
आज की काफी हद तक स्वेक्षचारी जीवन शैली ने पुरूष के लिए संभावनाओं के अपरिमित द्वार खोल दिए हैं.सब नही, पर बहुत से युवा युवावस्था की दहलीज पर कदम रखते तक में तन मन के सुख का एक गृहस्थ की भांति उपभोग कर चुके होते हैं.धन कमाना उनका परम ध्येय होता है और धर्म की चिंता करना समय व्यर्थ करना लगता है.अपने हर आज को बखूबी कैसे एन्जॉय करना है इसके हर नुस्खे आजमाने तो तत्पर रहते हैं और सुगमता से इन्हे सब उपलब्ध भी रहता है.महानगरों में तो इसकी असीम संभावनाएं हैं,जो सरलता से जब चाहे उपलब्ध है..बल्कि ऐसी सेवाएं उपलब्ध कराने वाली एजेंसियां भी उपलब्ध हैं जो ''मित्र बनाओ'' से लेकर अकेलेपन को दूर कराने और हर प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए २४ घंटे की सेवा खुलेआम इश्तेहार देकर प्रदान करते हैं.जब विवाह को तन के सुख के साथ बांधकर माना जाने लगे और जिंदगी की हर सुविधा और सुख टू मिनट मैगी या रेडी टू ईट स्टाइल में मिल रहा हो तो कौन फ़िर विवाह के बंधन में बाँध कर्तब्यों की बेडी में जकड़ना चाहेगा ख़ुद को. कर्तब्य निष्पादन में भी सुख है,कोई आपका नितांत अपना हर सुख दुःख में बिना किसी सेवा शुल्क के आपके लिए हर पल उपलब्ध है,जिसके साथ कर्तब्य निभाने में किसी को सुखी करने,खुशी देने में भी सुख है,और यह बोझ बंधन कतई नही है,जो पुरूष इसमे आस्था रखते हैं,वे तो सहज विवाह को मान्यता और सम्मान दे देते हैं पर इस से विमुख पुरूष जब प्रौढावस्था में होश में आता है और इसे मानने को प्रस्तुत होता है तबतक बहुत देर हो चुकी होती है और ये अपना बहुत कुछ खो चुके होते हैं.लाख पश्चिम का अनुकरण कर लें युवावस्था में, पर उम्र ढलने के बाद एक न एक दिन मानना ही पड़ता है कि हमारी भारतीय संस्कृति में जो भी प्रावधान हैं,अंततः सच्चा सुख उसी रास्ते चल मिल सकता है.
अब स्त्रियों की बात.........
कमोबेश जो मानसिकता पुरुषों की है पुरुषों की बराबरी में उतरी आज की तथाकथित माडर्न नारियां भी उसी बीमारी में स्वयं को स्वेक्षा से जकडे लिए जा रही हैं.आर्थिक आत्मनिर्भरता को स्त्रियों ने पति के विकल्प के रूप में मानना आरम्भ कर दिया है और घर गृहस्थी के कर्तब्य निष्पादन को मानसिक गुलामी मान, धन को ही पति परिवार सबका विकल्प मानना आरम्भ कर दिया है..धनाढ्य महिलाओं के लिए भी वो सारी सुविधाएँ उपलब्ध हैं जो एक पुरूष को तथाकथित सुख के लिए प्राप्य होते हैं.हालाँकि यह स्थिति पुरुषों में जितनी मात्रा में है उतनी स्त्रियों में नही आ पाई है.पर जब राह पर चल निकली हों तो चिंताजनक तो अवश्य ही है.
स्वेक्षाचारिता, वैयक्तिकता,भौतिकवादिता और कुछ हद तक पाश्चात्य संस्कृति के अन्धानुकरण ने आज के युवाओं चाहे स्त्री हो या पुरूष ,के मन में विवाह के प्रति वितृष्णा भरना शुरू कर दिया है.अब विवाह को बोझ और बंधन मानने की प्रवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ने लगी है.वर्तमान के भौतिक युग में आज का युवा भौतिक वस्तुओं की खरीद फरोख्त की तरह विवाह को भी नफा नुक्सान की तराजू पर तौलकर देखने लगा है और सिर्फ़ आज में जीने वाला युवा पहले मोल तोल कर ठोंक बजा कर देख लेना चाहता है कि किस चीज के लिए क्या कीमत चुका रहा है.किसी समय विवाह नाम की इस संस्था को जो सामाजिक मान्यता तथा साम्मानित स्थान समाज को सुव्यवस्थित सुगठित रखने के लिए समाज द्वारा दिया गया था,अब वह बहुत तेजी से तिरस्कृत होने लगा है.
समस्या के मूल में जाएँ तो सबसे बड़ा कारण वैयक्तिकता ही है.व्यक्ति इतना अधिक आत्मकेंद्रित होता जा रहा है संवेदनाएं इस तरह सुप्त होती जा रही हैं कि अपने से बहार निकल और आगे बढ़ व्यवहार में दूसरों के दुःख सुख के प्रति बहुत अधिक उदासीन होने लगा है.कितने लोग(स्त्री या पुरूष)हैं जो देश दुनिया समाज के दुःख सुख को अपने व्यक्तिगत सुख दुःख से अधिक महत्व दे पाते हैं?स्वयं को छोड़ हर व्यक्ति दूसरा हो गया है,चाहे वह पति पत्नी बच्चे माता पिता ही क्यों न हों.और यही वैयक्तिकता जब हमें दूसरों के प्रति निर्मम और असंवेदनशील बनाती हैं तब किसी भी संस्था,चाहे वह विवाह का ही क्यों न हो मूल्यहीन होना,अपनी महत्ता खोना स्वाभाविक ही है. आज जो लोग विवाह से बचना भागना चाहते हैं,उसके मूल में कहीं न कहीं वे ही कष्ट फोकस में होते हैं जो इस संस्था में बंधने के बाद स्वार्थवश और अहम् के टकराव की अवस्था में लोगों को भोगना पड़ता है.दो व्यक्तियों में एक यदि कर्तब्य पथ पर चलने वाला हो भी पर दूसरा यदि अधिकार को पकड़े दूसरे को प्रताडित करता रहे, तो भी सम्बन्ध का सुचारू रूप से चल पाना कठिन हो जाता है.अब जब तक स्त्रियाँ आर्थिक परतंत्रता की बेडियों में जकड़ी हुई थीं,तबतक तो रोते पीटते कष्ट सहते जीवन निकाल ही लेती थीं और विवाह नाम की इस संस्था की लाज बच जाती थी.पर जैसे जैसे स्त्रियाँ इस से निकलती जा रही हैं,विवाह के प्रति इस तरह अनास्था तथा विवाह का टूटना तेजी से बढ़ता जा रहा है.
सम्बन्ध विच्छेद या विवाह से वितृष्णा दोनों ही स्थिति,चिंताजनक है तथा किसी भी स्थिति में न तो यह कष्टों से बचने का उपाय है या समस्या का समाधान ही है.बात बस इतनी है कि यदि हम अपने इस ''मैं'' से ऊपर उठ जैसे ही ''हम'' में विशवास करने लगेंगे दांपत्य की गरिमा और मधुरता को भी पा लेंगे और तब ही जान पाएंगे कि सच्चा सुख कर्तब्य से बचने में नही बल्कि उसके निष्पादन में ही है.विवाह केवल आर्थिक सुरक्षा और संबल के ही लिए नही बल्कि मानसिक सुख और संबल के लिए भी आवश्यक है.दम्पति जब परस्पर एक दूसरे के लिए प्रेम,निष्ठा,सम्मान और समर्पण की भावना रखे ,अपने कर्तब्य तथा सहगामी के अधिकारों के प्रति सजग रहे तो सिर्फ़ अपने लिए ही स्वर्गिक सुख नही अर्जित करेगा बल्कि अपनी आगामी पीढी के सामने भी सुसंस्कारों का आदर्श प्रस्तुत करेगा और अगली पीढी अपनी पिछली पीढी के सुख को देख विवाह बंधन को दुःख का बंधन नही बल्कि सुख का द्वार समझ पवित्र बंधन में बंधने को न केवल तत्पर होंगे,बल्कि पूरे मन से इसका सम्मान भी करेंगे.............
20.6.08
आप साहित्यकार किसे कहते हैं????????
बहुत स्थानों/ संचार माध्यमो में बड़े जोर की बहस छिडी हुई है ''ब्लागर बनाम साहित्यकार''.या ''क्या ब्लाग्स में जो इन दिनों लिखा जा रहा है वे यूँ ही फालतू की भडास है या इसमे कुछ स्तरीय भी है,.इन्हे साहित्य कहना साहित्य की तौहीनी है,वगैरह वगैरह...........विषय ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि जरा सत्य तथ्य को एक बार अपनी नजरों से भी खंगाल कर देखा जाए. ब्लाग्स वर्त्तमान संचार क्रांति का वह अनुपन वरदान है,जहाँ हम अपनी बात सहज ही कईयों तक पहुँचा सकते हैं और दूसरों की राय जान सकते हैं.जहाँ एक ओर पठन पाठन से जुड़े लोगों के लिए यह टानिक बन उपयुक्त मानसिक तुष्टता उपलब्ध कराने का जरिया है वहीँ मनोरंजन का सुगम माध्यम भी. कुछ वर्षों पहले तक यह महज कल्पना करने वाली बात थी कि एक दिन ऐसा आएगा जब अपनी मातृभाषा का उपयोग इतनी सहजता से इस माध्यम के द्वारा हम कर पाएंगे.पर कहते हैं न कोई भी वरदान हो वह उसके उपयोगकर्ता के उपयोग पर ही अच्छा या बुरा प्रभाव देती है.शक्ति सामर्थ्य यदि सही हाथों में जाए तो वह वरदान बन जाती है नही तो वह किसी अभिशाप से कम नही.वही हाल हिन्दी ब्लागिंग का भी है.कुछ सचमुच ही केवल भडास केन्द्र हैं,कुछ मध्यम कोटि के अभिव्यक्ति का माध्यम जहाँ कुछ क्षण को ठहरा जा सकता है,और कुछ, जो कुछ भी रच रहे हैं वह किसी भी लिहाज से उच्चकोटि के साहित्य से किसी भी मामले में कमतर नही.हमने साहित्य की जो परिभाषा ,अवधारणा पढ़ी सुनी थी उसके अनुसार गद्य,पद्य,कथा उपन्यास,जीवनी चाहे किसी भी भी विधा का अनुसरण कर रचित वह रचना जो मन को सहज ही छू लेने वाली हो,बोधगम्य और ग्राह्य हो तथा किसी न किसी रूप में सकारात्मक रूप से जीवन को प्रभावित कर पाने का सामर्थ्य रखती हो साहित्य है.और यह जितना ही गहन और व्यापक रूप में प्रभावशाली होगा उतना ही दीर्घजीवी या कालजयी होगा.इस कसौटी पर कसकर यदि हम समकालीन हिन्दी ब्लोगिंग को देखेंगे तो परिणाम काफ़ी उत्साहजनक हैं.अब प्रतिक्रिया सांख्यिकी पर न जायें,अधिकाँश लोग हैं जो केवल पढने में अभिरुचि रखते हैं,टिप्पणियां देने में नही.इस से रचना या रचनाकार विशेष का महत्व कम नही हो जाता.और पाठक बेवकूफ भी नही होता उसे ठीक पता है कि रचना और रचनाकार का बौद्धिक/साहित्यिक स्तर क्या है.और उसी अनुसार अपना पाठ्य चयन कर लेता है.कुछ ब्लाग/विषय सनसनीखेज सामग्रियां परोस उबलते पानी के बुलबुले से क्षणिक प्रसिद्धि भले पा जायें पर इससे सम्मानजनक स्तर नही पा सकते. दीर्घजीवी नही हो सकते.एक समय था जब रचना प्रकाशन का माध्यम केवल प्रिंट मिडिया ही हुआ करता था,जिसे साहित्य कहा जाता था.पर हम सब जानते हैं कि उन उच्चस्तरीय रचनाकारों को भी रचना प्रकाशन के लिए प्रकाशकों के आगे पीछे घूम कितने पापड़ बेलने पड़ते थे.और कई बार रोजी रोटी के जुगाड़ का चक्कर उन्हें प्रकाशकों की बिकाऊ सामग्रियों के लेखन को मजबूर करती थीं.उस दौर में भी असंख्य कामोत्तेजक सामग्रियां साहित्य के नाम पर लिखी छापी जातीं थीं और खूब बिकती भी थीं,तो इसीसे वह कालजयी साहित्य की श्रेणी में तो नही आ गयीं. इसलिए मेरा मत है की लेखन को सर्वोच्च दायित्व मानकर व्यक्ति समाज देश और दुनिया के लिए जो लिखेगा या लिखा जाता है,लेखन निसंदेह नैसर्गिक साहित्य ही है और रचनाकार साहित्यकार.बिना विवाद में फंसे अपने धर्म का सतत पालन ही हमारा कर्तब्य होना चाहिए,तभी हम आंशिक रूप से अपनी मातृभाषा के क़र्ज़ का एकांश मोल चुका पाएंगे.
14.6.08
संवेदनशीलता
यूं तो संवेदना,जड़ प्रानधारी पेड़ पौधों मे भी होती है,पर यह जिस प्रखर रूप मे प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना, मनुष्य मे विद्यमान होती है और अपने असीमित सामर्थ्य के बल पर इन संवेदनाओं का संवहन,निर्वहन और प्रतिपादन जितना मनुष्य द्वारा सम्भव हो पाता है,श्रीष्टि का अन्य कोई प्राणी उतना सामर्थ्य नही रखता. यह मनुष्य मे प्रकृति प्रद्दत्त वह गुण है जो श्रीष्टि को सुंदर से सुन्दरतम बनाता है.यह तो हुई जो सहज स्वाभाविक रूप से हुआ करती है और जिसे पाने और धारण करने के लिए कोई द्रव्य नही खर्चना पड़ता उसकी बात.पर वर्तमान मे जो वस्तुस्थिति है,जितनी तेजी से द्रव्य / भौतिक वस्तुओं की अहमियत दिन दूनी रात चौगुनी वेग से विस्तार पाती जा रही है,उतनी ही तेजी से मानव मूल्यों ,संस्कारों के साथ साथ संवेदनशीलता भी त्याज्य होती जा रही है.स्थिति यह है की बहुधा संवेदनशील मनुष्य बेवकूफ या पागल की श्रेणी मे गिना जाने लगा है. यहाँ संवेदनशीलता से मेरा तात्पर्य पर सुख दुःख के प्रति संवेदनशीलता से है.वैसे ऐसा नही की मनुष्य संवेदनहीन होता जा रहा है,उसकी संवेदनशीलता का महज दायरा बड़ा तंग होता जा रहा है.अब उसमे अपर से सिमट स्व का घेरा दिनानुदिन बढ़ता ही जा रहा है.निज के सुख दुःख इच्छा अनिच्छा के प्रति मनुष्य जितना सतत सजग और सचेष्ट रहने लगा है कि उसके लिए अपने आस पास किसी को भी कष्ट देने के प्रति झिझक तेजी से समाप्ति की ओर उन्मुख है और प्रतिफल मे जो व्यवस्था सामने है वह परिवार समाज देश को विघटन की ही ओर अग्रसर कर रहा है.
जन्म लेने के साथ ही एक बच्चे को एक उसी पूरी व्यवस्था के साथ दो चार होना पड़ता है जिसमे बिना धन/पैसे के जन्म तक ले पाना सम्भव नही.एक जमाना था जब बच्चे का जन्म घर मे ही हुआ करता था,पर अब निर्धन भी जच्चा अस्पताल मे ही संपन्न करवाता है.उसके बाद से तो परिवार संमाज और शिक्षण संस्थान तक की सारी व्यवस्था इसी पैसे की नींव पर रखी हुई है.हर चीज की गुणवत्ता पूर्णतः इसी धन की मात्रा पर ही निर्भर करती है.अपने आस पास सब जगह देख सुन समझ कर बच्चा जो एक बात सीख पाता है वह यही कि 'बिन पैसा सब सून'.सो फ़िर सारी दौड़ सारा प्रयास ही एक मार्गी इस ओर उन्मुख हो जाता है.व्यवस्था उस बाल मन को भौतिक वस्तुओं की महत्ता समझाने और उसे प्राप्त कर पाने के क्रम मे श्रेष्ठतम योग्यता पाने की दौड़ मे झोंक देती है. आज की पीढ़ी का आदर्श शायद ही वे महापुरुष हैं जिन्होंने धन को केवल जीवन जीने का माध्यम माना और मात्र उसके संचय को ही ध्येय नही माना. जो पीढी हम तैयार कर रहे हैं ,जब वह तैयार होगी और आगे चलकर वह जो पीढी बनाएगी,उसकी परिकल्पना कर पाना बड़ा ही त्रासद लगता है.मानव मूल्यों का वरण कर उसे जीवन मे सर्वोच्च स्थान दे चारित्रिक निर्माण का प्रयास न ही अभिभावकों द्वारा हो रहा है न ही शिक्षण संस्थानों द्वारा संपादित किया जा रहा है,जो कि बड़ी ही सोचनीय स्थिति है.किसी भी क्षेत्र मे अव्वल आ उसके द्वारा धनोपार्जन ही एकमात्र विकल्प बच्चों के लिए छोडा जा रहा है,जहाँ हर कोई एक दूसरे से भाईचारे के भाव से नही अपितु एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी के रूप मे खड़ा ओर जुडा है और उसे अपने आस पास सबको पछाड़ सबसे आगे निकल जाना है भले इसमे साम दाम दंड भेद निति कोई भी उपक्रम क्यों न अपनाना पड़े
वर्तमान संचार क्रांति ने दुनिया का जो हित किया है ,उससे कम अहित भी नही किया.इन माध्यमो ने जो एक्सपोजर उपलब्ध कराये हैं वह निश्चय ही बच्चों की संवेदनशीलता पर कुठाराघात किया है. प्रति दिन घटित आस पास की दुर्घटनाएं जब एक वयस्क मन को सुन्न करने लगा है तो बालमन पर इसके प्रभाव की परिकल्पना की जा सकती है.अब बड़ी से बड़ी घटनाएँ बड़े ही सरलता से सामान्य भाव से लिया जाने लगा है.सामान्य ज्ञान का जो स्तर कभी बीस बाईस की उम्र मे हुआ करता था,बमुश्किल वह आज के बच्चों मे दस बारह की उम्र मे हो जाया करती है.पर समस्या यह है की हर नई चीज को आजमाकर देख लेने की अदम्य लालसा रखने वाला यह उम्र उतनी ही दृढ़ता से विवेक तथा करनीय अकरनिया मे भेद कर उस पर अमल कर पाने मे समर्थ तो होता नही, तो फ़िर दिग्भ्रमित हो बड़े ही सुगमता से अनैतिक यौनाचार और अनाचार की ओर अग्रसर हो जाता है.
जब जीवन का मूलमंत्र ही धनोपार्जन रह जाए तो उसके अर्जन के लिए अख्तियार किए जाने वाले नैतिक अनैतिक उपायों मे भी कितना विभेद रह जाता है.संवेदनशीलता और सर्वजन हिताय,सर्वजन सुखाय की बातें कोरी किताबी बातें बन रह जाती हैं. संवेदनशील होना दृढ़ चारित्रिक बल का प्रतीक नही बल्कि दुर्बलता और कामयाबी के मार्ग का बाधक माना जाने लगा है.आज के किशोरों से जब बात कर उनके जीवन के लक्ष्य जानने की कोशिश की तो देखा उनमे गहरे बैठा एक ही विश्वाश है कि ,सफलता का मानक ही अधिक से अधिक भौतिक साधन संपन्न होना हैं. और इनका सारा प्रयास इस ओर एकमुखी है.दुखद यह है कि भविष्य के प्रति आशंकित या उज्जवल भविष्य के लिए लालायित अभिभावक भी बच्चों को इस भ्रामक स्थिति से निकलने के लिए किंचित भी जागरूक और प्रयासरत नही बल्कि उसे और अधिक संपुष्ट करने मे लगे हुए हैं. वर्तमान मे गिने चुने अभिभावक ही अपने भर बाल मन मे यह भरने का प्रयास करते हैं कि सच्चरित्रता ,मानवीय मूल्य, त्याग,दया,क्षमा,अहिंसा,कर्मठता,संतोष इत्यादि यदि व्यक्तिव का अंग न हो तो लाख संचित धन भी सही मायने मे सुखी और संतुष्ट नही कर सकता.
अब बात यह है की चाहे शिक्षण संस्थान हो या सामाजिक व्यवस्था ,इन्हे जादू की छड़ी घुमा आमूल बदला तो नही जा सकता ,पर यदि इसी समाज की इकाई अपने आस पास के नन्हें कोमल बालमन मे मूल्यों और संवेदनशीलता की परत बालपन मे ही डाल उसके विकास की ओर प्रयत्नशील हुआ जाए तो कम से कम यह आशा तो रखी जा सकती है की किसी एक सुह्रिदय मे भी यह अंकुर फल निकला तो वृक्ष बन कई वृक्षों का प्रणेता बन सकता है और श्रीष्टि की सुन्दरता बरकरार रह सकती है.
जन्म लेने के साथ ही एक बच्चे को एक उसी पूरी व्यवस्था के साथ दो चार होना पड़ता है जिसमे बिना धन/पैसे के जन्म तक ले पाना सम्भव नही.एक जमाना था जब बच्चे का जन्म घर मे ही हुआ करता था,पर अब निर्धन भी जच्चा अस्पताल मे ही संपन्न करवाता है.उसके बाद से तो परिवार संमाज और शिक्षण संस्थान तक की सारी व्यवस्था इसी पैसे की नींव पर रखी हुई है.हर चीज की गुणवत्ता पूर्णतः इसी धन की मात्रा पर ही निर्भर करती है.अपने आस पास सब जगह देख सुन समझ कर बच्चा जो एक बात सीख पाता है वह यही कि 'बिन पैसा सब सून'.सो फ़िर सारी दौड़ सारा प्रयास ही एक मार्गी इस ओर उन्मुख हो जाता है.व्यवस्था उस बाल मन को भौतिक वस्तुओं की महत्ता समझाने और उसे प्राप्त कर पाने के क्रम मे श्रेष्ठतम योग्यता पाने की दौड़ मे झोंक देती है. आज की पीढ़ी का आदर्श शायद ही वे महापुरुष हैं जिन्होंने धन को केवल जीवन जीने का माध्यम माना और मात्र उसके संचय को ही ध्येय नही माना. जो पीढी हम तैयार कर रहे हैं ,जब वह तैयार होगी और आगे चलकर वह जो पीढी बनाएगी,उसकी परिकल्पना कर पाना बड़ा ही त्रासद लगता है.मानव मूल्यों का वरण कर उसे जीवन मे सर्वोच्च स्थान दे चारित्रिक निर्माण का प्रयास न ही अभिभावकों द्वारा हो रहा है न ही शिक्षण संस्थानों द्वारा संपादित किया जा रहा है,जो कि बड़ी ही सोचनीय स्थिति है.किसी भी क्षेत्र मे अव्वल आ उसके द्वारा धनोपार्जन ही एकमात्र विकल्प बच्चों के लिए छोडा जा रहा है,जहाँ हर कोई एक दूसरे से भाईचारे के भाव से नही अपितु एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी के रूप मे खड़ा ओर जुडा है और उसे अपने आस पास सबको पछाड़ सबसे आगे निकल जाना है भले इसमे साम दाम दंड भेद निति कोई भी उपक्रम क्यों न अपनाना पड़े
वर्तमान संचार क्रांति ने दुनिया का जो हित किया है ,उससे कम अहित भी नही किया.इन माध्यमो ने जो एक्सपोजर उपलब्ध कराये हैं वह निश्चय ही बच्चों की संवेदनशीलता पर कुठाराघात किया है. प्रति दिन घटित आस पास की दुर्घटनाएं जब एक वयस्क मन को सुन्न करने लगा है तो बालमन पर इसके प्रभाव की परिकल्पना की जा सकती है.अब बड़ी से बड़ी घटनाएँ बड़े ही सरलता से सामान्य भाव से लिया जाने लगा है.सामान्य ज्ञान का जो स्तर कभी बीस बाईस की उम्र मे हुआ करता था,बमुश्किल वह आज के बच्चों मे दस बारह की उम्र मे हो जाया करती है.पर समस्या यह है की हर नई चीज को आजमाकर देख लेने की अदम्य लालसा रखने वाला यह उम्र उतनी ही दृढ़ता से विवेक तथा करनीय अकरनिया मे भेद कर उस पर अमल कर पाने मे समर्थ तो होता नही, तो फ़िर दिग्भ्रमित हो बड़े ही सुगमता से अनैतिक यौनाचार और अनाचार की ओर अग्रसर हो जाता है.
जब जीवन का मूलमंत्र ही धनोपार्जन रह जाए तो उसके अर्जन के लिए अख्तियार किए जाने वाले नैतिक अनैतिक उपायों मे भी कितना विभेद रह जाता है.संवेदनशीलता और सर्वजन हिताय,सर्वजन सुखाय की बातें कोरी किताबी बातें बन रह जाती हैं. संवेदनशील होना दृढ़ चारित्रिक बल का प्रतीक नही बल्कि दुर्बलता और कामयाबी के मार्ग का बाधक माना जाने लगा है.आज के किशोरों से जब बात कर उनके जीवन के लक्ष्य जानने की कोशिश की तो देखा उनमे गहरे बैठा एक ही विश्वाश है कि ,सफलता का मानक ही अधिक से अधिक भौतिक साधन संपन्न होना हैं. और इनका सारा प्रयास इस ओर एकमुखी है.दुखद यह है कि भविष्य के प्रति आशंकित या उज्जवल भविष्य के लिए लालायित अभिभावक भी बच्चों को इस भ्रामक स्थिति से निकलने के लिए किंचित भी जागरूक और प्रयासरत नही बल्कि उसे और अधिक संपुष्ट करने मे लगे हुए हैं. वर्तमान मे गिने चुने अभिभावक ही अपने भर बाल मन मे यह भरने का प्रयास करते हैं कि सच्चरित्रता ,मानवीय मूल्य, त्याग,दया,क्षमा,अहिंसा,कर्मठता,संतोष इत्यादि यदि व्यक्तिव का अंग न हो तो लाख संचित धन भी सही मायने मे सुखी और संतुष्ट नही कर सकता.
अब बात यह है की चाहे शिक्षण संस्थान हो या सामाजिक व्यवस्था ,इन्हे जादू की छड़ी घुमा आमूल बदला तो नही जा सकता ,पर यदि इसी समाज की इकाई अपने आस पास के नन्हें कोमल बालमन मे मूल्यों और संवेदनशीलता की परत बालपन मे ही डाल उसके विकास की ओर प्रयत्नशील हुआ जाए तो कम से कम यह आशा तो रखी जा सकती है की किसी एक सुह्रिदय मे भी यह अंकुर फल निकला तो वृक्ष बन कई वृक्षों का प्रणेता बन सकता है और श्रीष्टि की सुन्दरता बरकरार रह सकती है.
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