Showing posts with label समाज. Show all posts
Showing posts with label समाज. Show all posts

23.1.12

सेलिब्रेशन ऑफ़ डर्टीनेस ..

धूम मची है, नायिका ने किरदार को जीवंत कर दिया है. इसे कहते हैं कला, और कला के प्रति समर्पण..यत्र तत्र सर्वत्र सेलेब्रेशन हो रहे हैं.मंच शुशोभित गुंजायमान हैं..मंच पर नायिका के अश्लील इशारों,कामुक अदाओं और उघडे देह पर लोग तालियाँ सीटियाँ लुटा हाँफते, बेहोश से हुए जा रहे हैं.कला कई कई सीढियाँ एक साथ फांदता हुआ नयी ऊँचाइयाँ जो पा रहा है..सत्य यह स्थापित और रूढ़ होता जा रहा कि कला का वास नग्नता में है, इसलिए होड़ मची है कि कला को कौन कितना उत्कर्ष दे सकता है और दर्शकों के मुंह से ऊह!! आह!! आउच!! संग ऊ-- ला-- ला!! कौन कितना निकलवा सकता है..

एक फिल्म बनी-"डर्टी पिक्चर" , यह कह कि त्रासदी देखो !!!..पर चकाचौंध में नेपथ्य में जा लुप्त हो गया सन्देश, कि इस मार्ग पर चल, धन भले मिल जाए पर अंततः हताशा निराशा एकाकीपन और असह्य मानसिक संताप के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता ..

महेश बाबू कहते हैं "मुझे पसंद हैं वो लोग जो जिन्दगी अपनी शर्तों पर जीते हैं" . यानि कि अश्लीलता के कीर्तीमान स्थापित करते समय परिवार समाज, आत्मा परमात्मा पर थूकने में जो जितना बड़ा वीर (निर्लज्ज) , वही महान .."बोल्ड एंड ब्यूटीफुल" वही जो जितना बड़ा निर्लज्ज और जो जितना बड़ा निर्लज्ज, वह धन, मान, प्रसिद्धि ,प्रतिष्ठा सबसे उतना ही सफल और बड़ा..

मनोरंजन को जबतक रेडियो उपलब्ध था,लोग दृश्यों की कल्पना करते और सोचते कि काश यह सब दृश्यगत भी होता..यह हुआ और दूरदर्शन ने एक ही मंच पर ज्ञान विज्ञान खेल कूद और समाचार से लेकर मनोरंजन तक सब कुछ उपलब्ध कराया. पर मनोरंजन का यह सिमित कोटा विस्तार पाए,लोग इसके लिए लालायित थे..हमारी सरकार ने जनभावनाओं को समझा, पर उसे आदर देने हेतु दूरदर्शन का विस्तार नहीं किया, अपितु अपने ह्रदय द्वार खोल दिए असंख्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए, कि आओ और मनोरंजन परोसो..इन कंपनियों की सहूलियत के लिए दूरदर्शन को इतना इतना उबाऊ बना दिया कि लोग इसे कूड़ा समझ इससे पूर्णतः किनारा कर लें.

और फिर अचानक ही हमारे देश की सुंदरियाँ विश्व स्तर पर सौन्दर्य प्रतियोगिताएं जीतने लगीं.देश का गौरव ,महान उपलब्धि ठहराया गया इसे.लोग गर्व से गदगद उभचुभ...आश्चर्य यह कि उन दो तीन वर्षों से पहले या बाद भारत में तथाकथित "ब्यूटी विथ ब्रेन" का पूर्ण अकाल पड़ गया..क्यों ?? प्रश्न -ग्लोबलाइजेशन, बाजारवाद का यह रहस्य सात पर्दों में कैद रह गया.

बहुत बड़ा बाज़ार है हमारा देश, जहाँ सौन्दर्य तथा मनोरंजन क्षेत्र एक विस्तृत हरा भरा चारागाह है..लेकिन समस्या यह है कि आत्मोन्नति, सादा जीवन उच्च विचार,भौतिकता से दूरी आदि भारतीय संस्कार विचार बाज़ार का सबसे बड़ा शत्रु है..संस्कारहीन किये बिना व्यक्ति को विलासी, भौतिकवादी नहीं बनाया जा सकता...और जबतक व्यक्ति भौतिकवादी नहीं होगा पूरे बाज़ार को समेट अपने घर में बसा लेने के रोग से ग्रसित कैसे होगा...

पहलेसिनेमा से लेकर बुद्धू बक्से(टी वी)द्वारा महलनुमा घर, बहुमूल्य कपडे व साजो सामान की चकाचौंध में व्यक्ति की बुद्धि को चुंधिया उसे भोग के उन वस्तुओं लिए लालायित करना और फिर लुभावने विज्ञापन द्वारा उपभोक्ता का प्रोडक्ट के प्रति ज्ञानवर्धन कर उसे पा लेने को प्रतिबद्ध करना आठो याम अबाध जारी रहता है.दर्शक/उपभोक्ता इन सब से निर्लिप्त रहे भी तो कैसे..

इस विराट बाज़ार में अन्य समस्त भौतिक वस्तुओं के साथ स्त्री भी एक वस्तु है "पारस" सी अनमोल. एक ऐसी वस्तु, जिसे किसी भी वस्तु के साथ खड़ा कर दो, उस वस्तु को चमका दे, उसे मूल्यवान बना दे.. कार से सेविंग ब्लेड तक और दियासलाई से हवाई यात्रा तक, फ्रंट में सुंदरियों को चिपकाया नहीं कि ग्राहक हँसते हँसते अक्ल और जेब लुटा देता है ...और अब तो हसीनाएं दिखा, पुरुष ग्राहकों को पटाने की प्रथा अपार विस्तार पा, "हैंडसम" दिखा, महिला ग्राहकों को लुभाने का भी आ गया है..

सुन्दर सुगठित मोहक शरीर और अदाओं वाले युवक युवतियों की मार्केट में भारी डिमांड है..पहले जो यह विभेद था कि ए ग्रेड की हसीनाएं इतना ही उघड़ेंगी, बी ग्रेड वाली इससे अधिक और सी ग्रेड वाली इससे काफी आगे बढ़कर, बाज़ार यह फर्क मिटा देने पर आमदा है..उसे कोई सीमा नहीं चाहिए,सब असीम चाहिए... तो, इसमें स्पेशल ग्रेड(पोर्न स्टार) को उतरा गया..अब इस स्पेशल ग्रेड को इतना अधिक महिमामंडित किया जाएगा, इसपर धन प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा की ऐसी वर्षा की जायेगी, कि ए- बी- सी में होड़ मच जायेगी इस ग्रेड में शामिल होने के लिए.."बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा" विश्वास अपार सुदृढ़ता पा सिद्ध अकाट्य हो जायेगा..

संचार के समस्त दृश्य श्रव्य माध्यमो द्वारा व्यक्ति के मन में अहर्निश अश्लीलता, कुसंस्कार, भौतिकवादिता के प्रति प्रेम उतार मनुष्य को केवल और केवल एक उपभोक्ता बनाने का अभियान चल रहा है.. एक वह समाज जिसे पीढ़ियों से यह सिखा पोषित किया गया है कि भोग तुच्छ और अधोगामी है , उन मूल्यों से विलग कर विलासप्रिय भोगवादी बनाये बिना बाज़ार का प्रयोजन कैसे सिद्ध होगा..व्यक्ति जबतक यह न माने कि जीवन और शरीर इन्द्रिय भोग के लिए ही मिला है,भोग की और उन्मुख कैसे होगा..? और सांसारिक समस्त भोगों के साधनों को जुटाने का एकमात्र साधन तो "धन" ही है, तो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित कर, निकृष्ट प्रतिस्पर्धा(जिसमे कोई किसी का संगी नहीं,प्रतियोगी है जिसके हाथ से अवसर लूट अपने कब्जे में करना ही सक्सेसफुल मैनेजर होने की शर्त है) में लगा ,उप्भोग्तावादी संस्कृति को मजबूती देता बाज़ार फलता फूलता जा रहा है,

क्या विडंबना है, एक समय था जब शिक्षा , समाजिक सरोकारों से पूर्णतः काट स्त्री को संपत्ति और केवल उपभोग की वस्तु बना छोड़ा गया था..पिता भाई पति या पुत्र के अधीन जीवन भर उसे हाड मांस के एक पुतले सा चलना पड़ता था..किसीके भी सही गलत का प्रतिवाद करना, उनके सम्मुख ऊंची आवाज में बात करना,बिना उनकी आज्ञा या परामर्श के निर्णय लेना, स्त्री की स्वेच्छाचारिता मानी जाती थी.परिवार के पुरुष सदस्यों से अधिक महिला सदस्य इसके लिए सजग रहती थी कि किसी भी भांति किसी भी स्त्री में स्वविवेक व स्वनिर्णय का विध्वंसक गुण न आ जाये.इसके लिए जो कुछ भी किया जा सकता था, किया गया. शिक्षा से दूर रख उनके व्यक्तित्व को इतना कुंठित किया गया कि दब्बूपना उनके स्वभाव में स्थायी रूप से स्थिर हो गया और सबसे मजे की बात कि इस दब्बूपना को शील, लज्जा,संस्कार,सच्चरित्रता कह पर्याप्त महिमामंडित किया गया. अज्ञान के अंध कूप में पड़ी स्त्रियों ने हथियार डाल दिए और स्वयं को असहाय निर्बल मानते हुए पिता भाई पति तक को ही नहीं पुत्र को भी अपना स्वामी मान लिया..कभी गर्वोन्नत हो यह माना कि वह अमूल्य संपत्ति है जिसकी रक्षा पुरुष सदस्यों(सबल) द्वारा होनी आवश्यक है, तो कभी मान लिया कि वह तो सचमुच एक उपयोग उपभोग की वस्तु मात्र है..

पर समय ने समाज को जब यह सिखाया कि उसका निर्बल पड़ा पूरा आधा भाग परिवार समाज के विकास में सहभागिता नहीं निभा पा रहा, तो जागृति फ़ैली और इस वर्ग सबल करने पर पूरा ध्यान दिया जाने लगा..और आज जब शारीरिक,मानसिक व बौद्धिक विकास का अवसर नारी पुरुष को सामान रूप प्राप्त है, स्त्रियों ने दिखा दिया है कि शारीरिक बल में भले वे पुरुषों से कभी कभार उन्नीस पड़ जाती हों पर मानसिक और बौद्धिक बल में वे सरलता से उन्हें पछाड़ सकती हैं..लेकिन यह अपार सामर्थ्य संपन्न नवजागृत समूह जिस प्रकार दिग्भ्रमित हो रहा है, असह्य दुखदायी है यह..इतने लम्बे संघर्ष के उपरांत प्राप्त अवसर को एक बार पुनः स्वयं को उत्पाद और वस्तु रूप में स्थापित कर स्त्री कैसे नष्ट कर रही है.. इस पेंच को वह नहीं समझ पा रही कि बोल्डनेस कह जिस नग्नता को महिमामंडित किया जा रहा है,वह पूरा उपक्रम उसे मनुष्य से पुनः उपभोग की एक सुन्दर वस्तु बना छोड़ने की है.. व्यभिचार को आचार ठहरा उसका मानसिक विकास का आधार नहीं तैयार हो रहा बल्कि उसके शारीरिक शोषण का बाज़ार तैयार हो रहा है...

आवश्यकता साक्षर भर होने की नहीं बल्कि सही मायने में शिक्षित होने की है, विवेक को जगाने और आत्मोत्थान की है.स्त्री स्वयं जबतक अपने आप को केवल शरीर.. और शरीर को, धनार्जन का साधन नहीं मानेगी , मजाल नहीं कि कोई पुरुष उसे इसके लिए बाध्य कर सकेगा..



___________________

22.10.10

अँधा प्रेम !!!

प्रेम,एक ऐसी दिव्य अनुभूति, जिससे सुन्दर,जिससे अलौकिक संसार में और कोई अनुभूति नहीं.जब यह ह्रदय में उमड़े तो फिर सम्पूर्ण सृष्टि रसमय सारयुक्त लगने लगती है.ह्रदय विस्तृत हो ब्रह्माण्ड में और ब्रह्माण्ड ह्रदय में समाहित हो जाता है. मन और कल्पनाएँ अगरु के सुवास से सुवासित और उस जैसी ही हल्की हो व्योम में धवल मेघों के परों पर सवार हो चहुँ ओर विचरने लगता है. मन तन से और तन मन से बेखबर हो जाता है. यह बेसुधी ही आनंद का आगार बन जाती है.पवन मादक सुगंध से मदमाने लगता है और मौन में संगीत भर जाता है. जीवन सार्थकता पाया लगता है..

मनुष्य ही क्या संसार में जीवित ऐसा कोई प्राणी नहीं, जो प्रेम की भाषा न समझता हो और इस दिव्य अनुभूति का अभिलाषी न हो . आज तक न जाने कितने पन्ने इस विषय पर रंगे गए परन्तु इसका आकर्षण ऐसा, इसमें रस ऐसा, कि न तो आज तक कोई इसे शब्दों में पूर्ण रूपेण बाँध पाया है और न असंख्यों बार विवेचित होने पर भी यह विषय पुराना पड़ा है.आज ही क्या, सृष्टि के आरम्भ से इसके अंतिम क्षण तक यह भाव,यह विषय, अपना शौष्ठव,अपना आकर्षण नहीं खोएगा, क्योंकि कहीं न कहीं यही तो इस श्रृष्टि का आधार है..

माना जाता है प्रेम सीमाएं नहीं मानता. यह तो अनंत आकाश सा असीम होता है और जो यह मन को अपने रंग में रंग जाए तो ह्रदय को नभ सा ही विस्तार दे जाता है.प्रेम का सर्वोच्च रूप ईश्वर और ईश्वर का दृश्य रूप प्रेम है..और ईश्वर क्या है ?? करुणा,प्रेम, परोपकार इत्यादि समस्त सद्गुणों का संघीभूत रूप. तो तात्पर्य हुआ जो हृहय प्रेम से परिपूर्ण होगा वहां क्रोध , लोभ , इर्ष्या, असहिष्णुता, हिंसा इत्यादि भावों के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा. प्रेमी के ह्रदय में केवल ईश्वर स्वरुप सत का वास होगा और जहाँ सत हो, असत के लिए कोई स्थान ही कहाँ बचता है..

पर वास्तविकता के धरातल पर देखें, ऐसा सदैव होता है क्या ?? प्रेम पूर्णतया दैवीय गुण है,परन्तु इसके रहते भी व्यक्ति अपने उसी प्रेमाधार के प्रति शंकालु , ईर्ष्यालु , प्रतिस्पर्धी, स्वार्थी, कपटी,क्रोधी,अधीर होता ही है. तो क्या कहें ?? प्रेम का स्वरुप क्या माने ?? हम दिनानुदिन तो देखते हैं, प्रेम यदि ह्रदय को नभ सा विस्तार देता है तो छुद्रतम रूप से संकुचित भी कर देता है और कभी तो दुर्दांत अपराध तक करवा देता है. फिर क्या निश्चित करें ? क्या यह मानें कि प्रेम व्यक्ति की एक ऐसी मानसिक आवश्यकता है,जो अपने आधार से केवल सुख लेने में ही विश्वास रखता है, प्रेम के प्रतिदान का ही आकांक्षी होता है? प्रेमी उसकी प्रशंशा करे, उसपर तन मन धन न्योछावर कर दे, उसके अहम् और रुचियों को सर्वोपरि रखे, उसे अपना स्वत्व समर्पित कर दे,तब प्रेमी को लगे कि उसने सच्चे रूप से प्रेम पाया...क्या यह प्रेम है?

क्या इस भाव को जिसे अलंकृत और महिमामंडित कर इतना आकर्षक बना दिया गया है, वैयक्तिक स्वार्थ का पर्यायवाची नहीं ठहराया जा सकता ? एक प्रेमी चाहता क्या है? अपने प्रेमाधार का सम्पूर्ण समर्पण ,उसकी एकनिष्ठता,उसका पूरा ध्यान ,उसपर एकाधिकार, उसपर वर्चस्व या स्वामित्व, कुल मिलाकर उसका सर्वस्व. एक सतत सजग व्यापारी बन जाता है प्रेमी,जो व्यक्तिगत लाभ का लोभ कभी नहीं त्याग पाता. लेन देन के हिसाब में एक प्रेमी सा कुशल और कृपण तो एक बनिक भी नहीं हो पाता.हार और हानि कभी नहीं सह सकता और जहाँ यह स्थिति पहुंची नहीं कि तलवारें म्यान से बाहर निकल आतीं हैं..

प्रेम पाश में आबद्ध प्रेमी युगल प्रेम के प्रथम चरण में परस्पर एक दूसरे में सब कुछ आलौकिक देखता है.जो वास्तव में सामने वाले में रंचमात्र भी नहीं,वह भी परिकल्पित कर लेता है. सामने वाले में उसे रहस्य और सद्गुणों का अक्षय भण्डार दीखता है..युगल परस्पर एक दूसरे के गहन मन का एक एक कोना देख लेने,जान लेने और उसे आत्मसात कर लेने की सुखद यात्रा पर निकल पड़ते हैं. आरंभिक अवस्था में युगल एक दूसरे के लिए अत्यधिक उदार रहते हैं, प्रतिदान की प्रतिस्पर्धा लगी रहती है,जिसमे दोनों अपनी विजय पताका उन्नत रखना चाहते हैं, पर जैसे जैसे ह्रदय कोष्ठक की यह यात्रा संपन्न होती जाती है,कल्पनाओं का मुल्लम्मा उतरने लगता है,यथार्थ उतना सुन्दर ,उतना आकर्षक नहीं लगता फिर. रहस्य जैसे जैसे संक्षिप्तता पाता है,कल्पना के नील गगन में विचारने वाला मन यथार्थ के ठोस धरातल पर उतरने को बाध्य हो जाता है,जहाँ कंकड़ पत्थर कील कांटे सब हैं..इसे सहजता से स्वीकार करने को मन प्रस्तुत नहीं होता और तब आरम्भ होता है हिसाब किताब,कृपणता का दौर.

जो युगल एक दूसरे के लिए प्राण न्योछावर करने को आठों याम प्रस्तुत रहते थे, अपने इस प्रेम को जीवन की सबसे बड़ी भूल मानने लगते हैं,इस परिताप की आंच में जलते प्रेमी क्षोभ मिटाने को सामने वाले को अतिनिष्ठुर होकर दंडित करने लगते हैं और एक समय के बाद इस प्रेम पाश से मुक्ति को छटपटाने लगते हैं या फिर एक बार फिर से एक सच्चे प्रेम की खोज में निकल पड़ते हैं. कहाँ है प्रेम,किसे कहें प्रेम ?? इस युगल ने भी तो बादलों की सैर की थी तथा प्रेम के समस्त लक्ष्ण जिए थे और मान लिया था कि उनका यह प्रेम आलौकिक है.

अब एक और पक्ष -

प्रेम स्वतःस्फूर्त घटना है,जो किसे कब कहाँ किससे और कैसे हो जायेगा ,कोई नहीं कह सकता..इसपर किसी का जोर नहीं चलता और न ही यह कोई नियम बंधन मानता है.

अस्तु,

पचहत्तर हजार आबादी वाला एक गाँव, जिसमे पांच महीने में चौदह वर्ष से लेकर पचपन वर्ष तक के छः प्रेमी जोड़े अपना स्वप्निल संसार बसाने समाज के समस्त नियमों के जंजीर खंडित करते घर से भाग गए.यह आंकडा उक्त गाँव के स्थानीय पुलिस थाने में दर्ज हुए जिसे लोगों ने जाना. ऐसे कितने प्रकरण और हुए जिसे परिवार वालों ने लोक लाज के बहाने दबाने छिपाने का प्रयास किया,कहा नहीं जा सकता. इन छः जोड़ों में से तीन जोड़ा था ममेरे चचेरे भाई बहनों का,एक जोड़ा मामा भगिनी का, एक जोड़ा गुरु शिष्या का और एक जोड़ा जीजा साली का. निश्चित रूप से उसी अलौकिक प्रेम ने ही इन्हें कुछ भी सोचने समझने योग्य नहीं छोड़ा.यह केवल स्थान विशेष की घटना नहीं,विकट प्रेम की यह आंधी सब ओर बही हुई है जो अपने वेग से समस्त नैतिक मूल्यों को ध्वस्त करने को प्रतिबद्ध है...

तो फिर प्रेम तो प्रेम होता है,इसमें सही गलत कुछ नहीं होता,मान कर इन घटनाओं को सामाजिक स्वीकृति/मान्यता मिल जानी चाहिए क्या ?? यह यदि आज गंभीरता पूर्वक न विचारा गया तो संभवतः मनुष्य और पशु समाज में भेद करना कठिन हो जायेगा. शहरों महानगरों में गाँवों की तरह सख्त बंदिश नहीं होती और वहां परिवार तथा आस पड़ोस में ही प्रेम के आधार ढूंढ लेने की बाध्यता भी नहीं होती ,इसलिए वहां चचेरे ममेरे भाई बहनों में ही यह आधार नहीं तलाशा जाता..पर एक बार अपने आस पास दृष्टिपात किया जाय..आज जो कुछ यहाँ भी हो रहा है,सहज ही स्वीकार लेना चाहिए??

परंपरा आज की ही नहीं ,बहुत पुरातन है, पर आज बहुचर्चित है..यह है "आनर किलिंग". इसके समर्थक और विरोधी दोनों ही अपना अपना पक्ष लेकर मैदान में जोर शोर से कूद पड़े हैं.पर "आनर किलिंग" के नाम पर न तो डेंगू मच्छरों की तरह पकड़ पकड़ कर प्रेमियों का सफाया करने से समस्या का समाधान मिलेगा और न ही प्रेम को इस प्रकार अँधा मान कर बैठने से सामाजिक मूल्यों के विघटन को रोका जा सकेगा . आज आवश्यकता है व्यक्तिमात्र द्वारा व्यक्तिगत नैतिकता,सामाजिक मूल्यों की सीमा रेखाओं को सुदृढ़ करने की और प्रेम के सच्चे स्वरुप को पहचानने और समझने की.

समग्र रूप में जो प्रेम व्यक्ति के ह्रदय को नभ सा विस्तृत न बनाये,फलदायी सघन उस वृक्ष सा न बनाये जो अपने आस पास सबको फल और शीतल छांह देती है,जो व्यक्ति को सात्विक और उदार न बनाये,उसका नैतिक उत्थान न करे , वह प्रेम नहीं, प्रेम का भ्रम भर है. प्रेम अँधा नहीं होता,बल्कि उसकी तो हज़ार आँखें होती हैं जिनसे वह असंख्य हृदयों का दुःख देख सकता है और उनके सुख के उद्योग में अपना जीवन समर्पित कर सकता है..

------------

9.6.10

शिक्षा और आत्मविकास

कथा कहानियों से मेरा लगाव संभवतः जन्मगत ही था ,जो स्वतः ही मुझे इसके विभिन्न श्रोतों से सदैव ही जोड़ता रहा..कथा संसार में तन्मयता से विचरण कर नित नवीन अनुभव प्राप्त करना और उसे जीवन सन्दर्भ में देखना गुनना मुझे अतिशय प्रिय था. बचपन में नयी कक्षा में जाने के बाद जैसे ही नयी पुस्तकें मुझे मिलती , कक्षा में पढाये जाने की प्रतीक्षा किये बिना मैं उन्हें चाटने बैठ जाया करती. सबसे पहले हिंदी की पुस्तक फिर इतिहास की और जब सब चाट चुकती तो भूगोल आदि की पुस्तकें मैं घोंट जाया करती..इनके साथ पाए रोमांचक अनुभव मुझे असीम तृप्ति दिया करते..

आगे कॉलेज शिक्षा क्रम में भी मैंने साहित्य, इतिहास,समाज शास्त्र तथा राजनीति शास्त्र ही मुख्य विषय रूप में लिया,जो अंतत स्नातकोत्तर में साहित्य के साथ संपन्न हुआ..परन्तु एक बड़ी भारी समस्या थी..इतिहास की पूरी पुस्तक कहानी या उपन्यास की तरह तो मुझे कंटस्थ रहती , पर घटनाक्रमों की तिथियाँ और उलटे पुल्टे नाम मेरे मस्तिष्क से कभी चिपक न पाते.. इसी तरह राजनीति शास्त्र में भी सिद्धान्तकारों की उक्तियों/सिद्धांतों को जो कि लगभग एक से ही हुआ करते थे, उन्हें रटना और शब्द प्रतिशब्द परीक्षा में लिख पाना मुझसे कभी न हो पाया...मुझे लगता, सबने लगभग एक ही बात तो कही,फिर क्या फर्क पड़ता है कि वाक्य में किस शब्द का प्रयोग किया गया...

जहाँ एक ओर सैद्धांतिक (किताबी) तथा व्यावहारिक राजनीति (व्यवहार में राजनीति जिस रूप में है) में मुझे कोई साम्य न दीखता और फलतः इसकी उपयोगिता संदिग्ध दीखती थी वहीँ इतिहास भी मुझे रटने नहीं सीखने की बात लगती थी..मुझे लगता था,हजारों हजारों वर्ष का इतिहास हमें सिर्फ यही तो सिखाता है कि हमें अपने आज को कैसे सुखद बनाना है,क्या करने से बचना है और क्या अवश्य ही करना है..घटनाक्रमों की तिथियों में मगजमारी कर उन्हें रटने से अधिक आवश्यक है दुर्घटनाओं से सीख ले आगे के लिए सतर्क सजग रह जीवन और जगत में खुशहाली के लिए सचेष्ट रहना .वस्तुतः व्यापक रूप में शिक्षा का उद्देश्य मुझे आत्मविकास के अतिरिक्त और कुछ नहीं लगता...

दिनानुदिन शिक्षा का संकुचित होता उद्देश्य मुझे बड़ा ही विछुब्ध करता रहा है और यही समस्त विसंगतियों का भी कारण लगता है. हम चाहे कोई भी विषय ,कितना भी पढ़ जाएँ और विषय पर लाख विशारद्ता हासिल कर लें, नए नए अविष्कार कर लें,एक से बढ़कर एक नवीन कीर्तिमान स्थापित कर लें ,जब तक हम अपना नैतिक विकास नहीं कर लेते,एक सच्चा और अच्छा मनुष्य नहीं बन जाते , क्या हम सुशिक्षित होने का दंभ भर सकते है और सच्चे अर्थों में जीवन में सुख पा सकते हैं ?? आज शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य धनोपार्जन रह गया है और ऐसे में हम कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि व्यक्ति परिवार समाज और देश सुसंस्कृत, सुगठित और शांत रहेगा..

देखिये न, रोज तो नए नए अविष्कार हुए जा रहे हैं, भौतिक सुख सुविधाओं के उपकरणों से घर और बाज़ार अटे पटे पड़े हैं, पर मनुष्य रोज थोडा और अशांत ,थोडा और अकेला, थोडा और भयभीत होता चला जा रहा है. अशांत छटपटाता दिग्भ्रमित मनुष्य कुछ और साधन जुटा उसमे सुख ढूँढने बैठ जाता है.उसे लगता है,फलां सामान यदि वह खरीद ले तो पूरा संतुष्ट हो जायेगा और फिर उस सामान को जुटाने के लिए धन कमाने की होड़ में जुट जाता है..

वय का एक हिस्सा डिग्रियां जुटाने में, दूसरा हिस्सा डिग्रियां भंजा उपकरण जुटाने में और तीसरा हिस्सा भौतिक विलासिता में डूब अबतक क्षरित रोगयुक्त काया को रोगमुक्त करने के प्रयासों में जुट मनुष्य संपन्न करता है ..जीवन जो इस उद्देश्य और महत्वाकांक्षा संग आरम्भ हुआ कि येन केन प्रकारेण अधिकाधिक धन जुटाना है,विलासिता के साधन जुटाना है अंततः अशांति और व्याकुलता ही पाता है. जिसके पास जितना धन वह उतना ही अधिक व्याकुल. संसार का एक मनुष्य नहीं जो यह कहे,नहीं बस इतना ही मुझे चाहिए,इससे अधिक अब एक पैसा नहीं...

ऐसा नहीं है कि आज निचली कक्षा से लेकर ऊपरी कक्षाओं के पाठ्यक्रमो तक में चरित्र निर्माण या नैतिक उत्थान के पाठ्य सामग्री नहीं हैं. सत्य बोलना,आचरण को शुद्ध व्यवस्थित अनुशाषित तथा उद्दात्त रखने वाले पाठ नहीं हैं, पर समस्या यह है कि उन अच्छी बातों को भी इस तरह पढाया जाता है,जिसे बच्चे केवल रटने और परीक्षा में अंक लाने भर की उपयोगिता योग्य समझते हैं.व्यावहारिक रूप में न ही परिवार में अभिभावक अपने बच्चों में यह बैठा पाते हैं कि वे उन्हें शिक्षा इसलिए दिलवा रहे हैं ताकि उनके संस्कार परिष्कृत हों, उनका आत्मोत्थान हो और न ही शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा व्यावहारिक रूप से यह प्रयास किया जाता है. आज व्यक्तित्व निर्माण अर्थोपार्जन के सम्मुख पूर्णतः गौण हो चुका है.मुझे तो सदैव ही यही लगता है कि आज जो शिक्षा व्यवस्था है वह मनुष्य नहीं भेड़ों की भीड़ तैयार कर रही है,जिसमे प्राण तो हैं पर चिंतन योग्यता नहीं..

ऐसे समय में मुझे रामायण ,महाभारत भगवतगीता आदि की उपयोगिता, प्रासंगिकता जो कि तेजी से हमारे घरेलू परिवेश आचरण और विश्वास से त्यज्य हुए जा रहे हैं, कुछ अधिक ही लगती है. इन के कथाओं में उल्लिखित पात्र,उनके जीवन चरित्र और परिस्थितियां वस्तुतः कोरे सैद्धांतिक नहीं,बल्कि पूर्णतः व्यवहारिक हैं,जो कि मनुष्यमात्र के विवेक और संस्कार का परिष्करण पुष्टिकरण और मार्गदर्शन करने की क्षमता रखते हैं..जबतक परिवार समाज का आस्तित्व इस धरती पर है,किसी भी धर्म पंथ के अनुयायी समाज के लिए यह प्रासंगिक रहेगा. इनकी शिक्षाओं में आज भी वह शक्ति है जो समाज को दिशा दिखा मनुष्यमात्र का नैतिक उत्थान कर सकती है. यह अलग बात है कि पूर्वाग्रह ग्रस्त हमारी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकार इन से सम्बंधित पुस्तकों को पूर्णतः एक धर्म विशेष की पूजा पाठ संबंधी पुस्तकें ठहरा इन्हें पाठ्यक्रम से बाहर रखना ही श्र्येकर मानती है...

इन परिस्थितियों में गंभीरता से हमें विचार करना होगा कि हमें अपने और अपने संतान के सुख के लिए आत्मोत्थान के इन माध्यमो से जुड़ना ही होगा ,जीवन दृष्टिकोण को वृह्हत्तर करना ही होगा. संतोष और शांति साधन में नही होता बल्कि यह तो मनुष्य के ह्रदय में ही अवस्थित होता है,बस शाश्वत चिंतन द्वारा इस शक्ति को जागृत कर पाया जा सकता है..



----------------------------------------------

2.2.10

लोकधर्म (अंतिम भाग )

आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की अनुपम कृति "गोस्वामी तुलसीदास" से साभार :-



भक्त कहलानेवाले एक विशेष समुदाय के भीतर जिस समय यह उन्माद कुछ बढ़ रहा था , उस समय भक्तिमार्ग के भीतर ही एक ऐसी सात्त्विक ज्योति का उदय हुआ जिसके प्रकाश में लोकधर्म के छिन्नभिन्न होते हुए अंग भक्ति सूत्र के द्वारा ही फिर से जुड़े | चैतन्य महाप्रभु के भाव के प्रभाव के द्वारा बंगदेश ,अष्टछाप के कवियों के संगीत श्रोत के द्वारा उत्तर भारत में प्रेम की जो धारा बही ,उसने पंथवालो की परुष बचनावाली से सुखते हुए हृदयों को आर्द्र तो किया , पर वह आर्य शास्त्रानुमोदित लोकधर्म के माधुर्य की ओर आकर्षित न कर सकी | यह काम गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया | हिन्दू समाज में फैलाया हुआ विष उनके प्रभाव से चढ़ने न पाया | हिन्दू जनता अपने गौरवपूर्ण इतिहास को भुलाने , कई सहस्त्र वर्षो के संचित ज्ञानभंडार से वंचित रहने , अपने प्रातःस्मरणीय आदर्श पुरुषों के आलोक से दूर पड़ने से बच गयी | उसमें यह संस्कार न जमने पाया कि श्रद्धा और भक्ति के पात्र केवल सांसारिक कर्तव्यों से विमुख ,कर्ममार्ग से च्युत कोरे उपदेश देनेवाले ही हैं | उसके सामने यह फिर से अच्छी तरह झलका दिया गया कि संसार में चलते व्यापारों में मग्न ,अन्याय के दमन के अर्थ रणक्षेत्रों में अद्भुत पराक्रम दिखानेवाले , अत्याचार पर क्रोध से तिलमिलानेवाले , प्रभूत शक्तिसंपन्न होकर भी क्षमा करनेवाले अपने रूप ,गुण और शील से लोक का अनुरंजन करनेवाले ,मैत्री का निर्वाह करनेवाले , प्रजा का पुत्रवत पालन करनेवाले ,बड़ों की आज्ञा का आदर करनेवाले ,संपत्ति में नम्र रहनेवाले ,विपत्ति में धैर्य रखनेवाले प्रिय या अच्छे ही लगते हैं , यह बात नहीं है | वे भक्ति और श्रद्धा के प्रकृत आलंबन हैं , धर्म के दृढ प्रतीक हैं |

सूरदास आदि अष्टछाप के कवियों ने श्रीकृष्ण के श्रृंगारिक रूप के प्रत्यक्षीकरण द्वारा ' टेढ़ी सीधी निर्गुण वाणी ' की खिन्नता और शुष्कता को हटाकर जीवन की प्रफुल्लता का आभास तो दिया , भागवान के लोक -संग्रहकारी रूप का प्रकाश करके धर्म के सौंदर्य का साक्षात्कार नहीं कराया | कृष्णोपासक भक्तों के सामने राधाकृष्ण की प्रेमलीला ही रखी गयी , भगवान की लोकधर्म स्थापना का मनोहर चित्रण नहीं किया गया अधर्म और अन्याय से संलग्न वैभव और समृद्धि का जो विच्छेद उन्होंने कौरवों के विनाश द्वारा कराया , लोकधर्म से च्युत होते हुए अर्जुन को जिस प्रकार उन्होंने सँभाला ,शिशुपाल के प्रसंग में क्षमा और दंड की जो मर्यादा उन्होंने दिखाई , किसी प्रकार ध्वस्त न होनेवाले प्रबल अत्याचारी निराकरण की जिस नीति के अवलंबन की व्यवस्था उन्होंने जरासंध वध द्वारा की , उसका सौन्दर्य जनता के ह्रदय में अंकित नहीं किया गया | इससे असंस्कृत हृदयों में जाकर कृष्ण की श्रृंगारिक भावना ने विलासप्रियता का रूप धारण किया और समाज केवल नाच-कूद कर जी बहलाने के योग्य हुआ |

जहाँ लोकधर्म और व्यक्तिधर्म का विरोध हो वहाँ कर्ममार्गी गृहस्थी के लिए लोकधर्म का ही अवलंबन श्रेष्ठ है | यदि किसी अत्याचारी का दमन सीधे न्यायसंगत उपायों से नहीं हो सकता तो कुटिल नीति का अवलंबन लोकधर्म की दृष्टि से उचित है | किसी अत्याचारी द्वारा समाज को जो हानि पहुँच रही है ,उसके सामने वह हानि कुछ नहीं है जो किसी एक व्यक्ति के बुरे दृष्टान्त से होगी | लक्ष्य यदि व्यापक और श्रेष्ट है तो साधन का अनिवार्य अनौचित्य उतना खल नहीं सकता | भारतीय जनसमाज में लोकधर्म का यह आदर्श यदि पूर्ण रूप से प्रतिष्टित रहने पाता तो विदेशियों के आक्रमण को व्यर्थ करने में देश अधिक समर्थ होता |

रामचरित के सौन्दर्य द्वारा तुलसीदासजी ने जनता को लोकधर्म की ओर जो फिर से आकर्षित किया ,वह निष्फल नहीं हुआ | वैरागियों का सुधार चाहे उससे उतना न हुआ हो ,पर परोक्ष रूप में साधारण गृहस्थ जनता की प्रवृति का बहुत कुछ संस्कार हुआ | दक्षिण में रामदास स्वामी ने इसी लोकधर्माश्रित भक्ति का संचार करके महाराष्ट्र शक्ति का अभ्युदय किया | पीछे से सिखों ने भी लोकधर्म का आश्रय लिया ओर सिख शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ | हिन्दू जनता शिवाजी और गुरु गोविन्दसिंह को राम - कृष्ण के रूप में और औरंगजेब को रावण और कंस के रूप में देखने लगी | जहाँ लोक ने किसी को रावण और कंस के रूप में देखा कि भगवान के अवतार की संभावना हुई |

गोस्वामीजी ने यधपि भक्ति के साहचर्य से ज्ञान ,वैराग्य का भी निरूपण किया है और पूर्ण रूप से किया है , पर उनका सबसे अधिक उपकार गृहस्थों के उपर है जो अपनी प्रत्येक स्थिति में उन्हें पुकारकर कुछ कहते हुए पाते हैं और वह ' कुछ ' भी लोकव्यवहार के अंतर्गत है ,उसके बाहर नहीं | मान-अपमान से परे रहनेवाले संतों के लिए तो वे ' खल के वचन संत सह जैसे ' कहते हैं पर साधारण गृहस्थों के लिए सहिष्णुता के मर्यादा बाँधते हुए कहते हैं कि ' कतहूँ सुधाइहु तें बड़ दोषू ' | साधक और संसारी दोनों के भागों की ओर वे संकेत करते हैं | व्यक्तिगत सफलता के लिए जिसे 'नीति ' कहते हैं , सामाजिक आदर्श की सफलता का साधक होकर वह ' धर्म ' हो जाता है |

सारांश यह कि गोस्वामीजी से पूर्व तीन प्रकार के साधु समाज के बीच रमते दिखाई देते थे |एक तो प्राचीन परंपरा के भक्त जो प्रेम में मग्न होकर संसार को भूल रहे थे ,दुसरे वे जो अनधिकार ज्ञानगोष्टी द्वारा समाज के प्रतिष्ठित आदर्शों के प्रति तिरस्कार बुद्धि उत्पन्न कर रहे थे , और तीसरे वे जो हठयोग , रसायन आदि द्वारा अलौकिक सिद्धियों की व्यर्थ आशा का प्रचार कर रहे थे | इन तीनों वर्गों के द्वारा साधारण जनता के लोकधर्म पर आरूढ़ होने की संभावना कितनी दूर थी , यह कहने की आवश्यकता नहीं | आज जो हम फिर झोपड़ों में बैठे किसानों को भरत के 'भायप भाव ' पर , लक्ष्मन के त्याग पर ,राम की पितृभक्ति पर पुलकित होते हुए पाते है , वह गोस्वामीजी के ही प्रसाद से | धन्य है ग्राहस्थ्य जीवन में धर्मालोकस्वरुप रामचरित और धन्य हैं उस आलोक को घर घर पहुँचनेवाले तुलसीदास ! व्यावहारिक जीवन धर्म की ज्योति से एक बार फिर जगमगा उठा - उसमें नई शक्ति का संचार हुआ | जो कुछ भी नहीं जनता , वह भी यह जनता है कि -

जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी | तिनहिं बिलोकत पातक भारी | |

स्त्रियाँ और कोई धर्म जानें , या न जानें , पर वे वह धर्म जानती हैं जिससे संसार चलता है | उन्हें इस बात का विश्वास रहता है कि -

वृद्ध ,रोग बस ,जड़ ,धनहीना | अंध बधिर क्रोधी अति दीना ||
ऐसेहु पति कर किए अपमाना | नारि पाव जमपुर दुःख नाना ||

जिसमें बाहुबल है उसे यह समझ भी पैदा हो गयी है कि दुष्ट और अत्याचारी 'पृथ्वी के भार' हैं ; उस भार को उतारनेवाले भगवान के सच्चे सेवक हैं | प्रत्येक देहाती लठैत 'बजरंगबली ' की जयजयकार मानता है - कुम्भकर्ण की नहीं | गोस्वामीजी ने ' रामचरित - चिंतामणि ' को छोटे -बड़े सबके बीच बाँट दिया जिसके प्रभाव से हिन्दू समाज यदि चाहे -सच्चे जी से चाहे - तो सब कुछ प्राप्त कर सकता है|

भक्ति और प्रेम के पुटपाक द्वारा धर्म को रागात्मिका वृत्ति के साथ सम्मिश्रित करके बाबाजी ने एक ऐसा रसायन तैयार किया जिसके सेवन से धर्म मार्ग में कष्ट और श्रांति न जान पड़े ,आनन्द और उत्साह के साथ लोग आप से आप उसकी ओर प्रवृत हों , धरपकड़ और जबरदस्ती से नहीं | जिस धर्ममार्ग में कोरे उपदेशों से कष्ट ही कष्ट दिखाई पड़ता है , वह चरित्र - सौंदर्य के साक्षात्कार से आन्नदमय हो जाता है | मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति और निवृत्ति की दिशा को लिए हुए धर्म की जो लीक निकलती है , लोंगों के चलते - चलते चौड़ी होकर वह सीधा राजमार्ग हो सकती है ; जिसके सम्बन्ध में गोस्वामीजी कहते है -

' गुरु कह्यो राम भजन नीको मोहि लगत राजडगरो सो |'

----------------------------------------------------

2.12.09

स्त्री विमर्श ......

एक स्त्री हूँ, आज तक उन समस्त विषम परिस्थितियों से गुजरी हूँ जिससे एक आम भारतीय स्त्री को गुजरना पड़ता है.अपने  आस पास असंख्य स्त्रियों को भी उन त्रासदियों से गुजरते उनसे जूझते देखा सुना है... परन्तु फिर भी बात जब समग्र रूप में स्त्री पुरुष की होती है तो पता नहीं क्यों लाख चाहकर भी इस विषय को मैं स्त्री पुरुष के हिसाब से नहीं देख पाती..मैं यह नहीं मान पाती कि एक पूरा स्त्री समाज ही पीडिता है और पुरुष समाज प्रताड़क..आज तक के अपने अनुभव में जितनी स्त्रियों को पुरुषों द्वारा प्रताड़ित देखा है उससे कम पुरुषों को स्त्रियों द्वारा प्रताड़ित नहीं देखा,चाहे वे किसी भी जाति धर्म भाषा या आय वर्ग से सम्बद्ध हों.या फिर एक नर में जो नारी की अपेक्षा श्रेष्ठता का दंभ होता है उसे पोषित और परिपुष्ट करते प्रमुख रूप से नारी को ही देखा है.


सृष्टि के प्रारंभ से ही मनाव समाज में अच्छे बुरे लोग रहें हैं और आगे भी रहेंगे...सदियों से समाज में न ही कुल समाज उद्धारक स्त्रियों की कमी रही है और न ही कुलनाशक विपत्ति श्रिजनी स्त्रियों की. एक ओर ऐसी स्त्रियाँ हैं , जो घर परिवार और समाज को अच्छाई और सच्चाई का मार्ग दिखाते हुए स्त्री गरिमा को परिपुष्ट करती हैं..स्त्री जाति को पूज्या और अनुकरणीय बना देती हैं तो दूसरी ओर दुष्टता के उच्चतम प्रतिमान स्थापित करती स्त्रियों की भी कोई कमी नहीं..बल्कि सहज ही देखा जा सकता है,स्त्रियों को जितनी प्रताड़ना एक स्त्री से मिलती है एक पुरुष से नहीं...एक स्त्री दूसरी स्त्री के लिए जितना कठोर हो सकती है,उस स्तर तक पुरुष कभी नहीं हो सकता..भय, इर्ष्या इत्यादि को स्त्रैण गुण यूँ ही नहीं माना गया है.कोई आवश्यक नहीं कि यह परिस्थितिजन्य ही हो..अधिकांशतः तो ये परिकलिप्त ही हुआ करते हैं.मैंने तो यही देखा है कि स्त्रियाँ जाने अनजाने स्वयं ही अपने मानसिक दौर्बल्य की परिपोषक होती हैं..


एक बड़ी साधारण सी घटना है,पर मैं इसे सहज ही विस्मृत नहीं कर पाती..एक बार एक मॉल में वहां के लेडीज टायलेट गयी...दरवाजे से अन्दर गयी तो वहां की स्थिति ने अचंभित कर दिया...करीब सात आठ महिलाएं एक कोने में दुबकी खड़ी थीं,एक बच्ची अपनी पैंटी पकडे खड़ी रोते हुए अपनी माँ से कह रही थी कि अगर जल्द से जल्द उसे टायलेट में न बैठाया गया तो पैंटी में ही उसकी शू शू निकल जायेगी. मामला यह था कि वहां तीन टायलेट में से एक का फ्लश खराब था,सो वह इस्तेमाल के लायक न था और बाकी बचे दो में से एक में कोई गयी थी और बाकी एक जो खाली था , उसमे ऊपर दीवार पर एक छिपकिली और जमीन पर कोने में एक तिलचट्टा अपनी मूंछे हिलाते दुबका हुआ था...बच्ची का डरना और चिल्लाना फिर भी समझा जा सकता था , पर उनकी माताजी तथा अन्य स्त्रियों को भयग्रस्त देख मेरा मन क्षुब्ध हो गया...छिपकिली और तिलचट्टे को भागकर मैंने उस बच्ची को समझाने की कोशिश की कि बेटा ये ऐसे जंतु नहीं कि मनुष्य का कुछ बिगाड़ सके,बल्कि ये तो स्वयं ही मनुष्यों से बहुत ही डरते हैं,इनसे डरना कैसा.....पर मैं आश्वस्त हूँ कि मेरे इस समझाने से किसी के भी सोच में कोई अंतर नहीं पड़ने वाला...पश्चिमी परिधान पहने और पुरुषों के दुर्गुणों को अंगीकार करने को उत्सुक , पुरुषों से बराबरी का दंभ भरने वाली स्त्री पीढी जब इतने निराधार तुच्छ भय को पोषित किये रहेंगी तो हम क्या खाकर इनके उत्थान का दंभ भर पाएंगी...


वस्तुतः स्त्री पुरुष का अबला सबला और प्रताड़क प्रताड़ित वाला यह विषय और द्वन्द स्त्री पुरुष का है ही नहीं. मनुष्य से लेकर पशु जगत तक में एक ही एक सिद्धांत अनंत काल से चलता आ रहा है और सदा चला करेगा..और वह है......" जिसकी लाठी उसकी भैंस "..पर मनुष्यों के मध्य यह "लाठी " शारीरिक बल वाली नहीं बल्कि बौद्धिक क्षमता वाली है..यहाँ बौद्धिक क्षमता से मेरा तात्पर्य विधिवत शिक्षा से उपार्जित बौधिकता से नहीं बल्कि सामान्य सोच समझ से है..स्त्री पुरुष दोनों में से जिसमे भी सूझ बूझ अधिक होगी,अपनी बात मनवाने की कला में भी वह अपेक्षाकृत अधिक कुशल होगा..अपने आस पास ही देखिये न,कई घरों में एक अनपढ़ स्त्री भी माँ बहन पत्नी या बेटी किसी भी रूप में यदि मानसिक रूप से अधिक सबल या समझदार होती है तो घर में उसीका सिक्का चलता है.अपने से कई गुना बली या पढ़े लिखे पर वह अति स्वाभाविक रूप से शासन करती है..यह सर्वसिद्ध है कि स्त्री हो या पुरुष ,व्यक्ति नियोजन में जो जितना कुशल/चतुर होगा, चाहे परिवार में हो या समाज में, अपना स्थान और स्थिति सुदृढ़ करने में वह उतना ही सक्षम होगा. बाकी रही चुनौतियों की बात तो,यदि नारी अपने जीवन में कंटकाकीर्ण पथ पर चलने को बाध्य है तो पुरुषों के जीवन में भी कम चुनौतियां नहीं हैं..


जहाँ तक क्षमताओं की बात करें,निश्चित रूप से प्रकृति/ईश्वर ने स्त्रियों को मानसिक रूप से पुरुषों की तुलना में अधिक सबल और सामर्थ्यवान बनाया है.श्रृष्टि रचना का श्रोत पुरुष अवश्य है परन्तु श्रृष्टि की क्षमता स्त्रियों को ही है..संभवतः इसी कारण ईश्वर ने स्त्रियों को शारीरिक बल में पुरुषों से कुछ पीछे कर दिया,क्योंकि यदि दोनों एक साथ स्त्रियों को ही मिल जाता तो इसकी प्रबल सम्भावना थी कि संसार में पुरुषों की स्थिति अत्यंत दयनीय होती..


हाँ यह अवश्य कहा जा सकता है कि स्त्री की इसी अपरिमित क्षमताओं से भयभीत होकर उसके समग्र विकास की प्रत्येक सम्भावना को बाधित और कुंठित करने का यथासंभव प्रयास पिछले कई शतकों से लेकर पिछले कुछ दशक तक पुरुष समाज द्वारा किया गया, जिसमे उसे स्त्रियों का भी यथेष्ट सहयोग मिला...परन्तु पिछले कुछ दशकों में स्त्री उत्थान की दिशा में जो भी महत प्रयास किये गए ये कम उत्साहजनक नहीं .ये समस्त सकारात्मक प्रयास उसे वस्तु और भोग्या से बाहर निकाल एक मनुष्य समझने और बनाने की ओर हो रहे हैं...वस्तुतः यही वह अनुकूल अवसर है जब स्त्रियाँ अपनी दुर्बलताओं को भली भांति चिन्हित कर उससे बाहर आ सच्चे अर्थों में सबलता प्राप्त करे...उसे यह कदापि नहीं विस्मृत करना चाहिए कि उसके शरीर और सुख दे पाने की क्षमता के कारण ही वर्षों तक पुरुषों द्वारा उसे वस्तु और भोग्या बनाकर रखने का यत्न किया गया. अपने उसी अपरिमित सामर्थ्य अपने शरीर अपने देय क्षमता को उसे सतत जागरूक होकर संरक्षित और मर्यादित रखना है..भोगवादी प्रवृत्ति पुरुषों में भी यदि है तो वह उनका मानसिक दौर्बल्य ही है,उसे यदि स्त्री भी बराबरी का अधिकार मानते हुए अंगीकार करेगी तो फिर तो परिवार समाज और संस्कृति का अस्तित्व ही नहीं बचेगा...


आवश्यकता है कि स्त्री हो या पुरुष अपने चारित्रिक दुर्बलताओं का शमन करना अपना परम लक्ष्य बना ले, अपना नैतिक विकास करे और करुणा ,क्षमा,स्नेह , सद्भावना ,सौहाद्र के भाव का विकाश करे.ह्रदय विशाल होगा और पर पीड़ा से जैसे ही व्यक्ति व्यथित होने लगेगा फिर संसार में कोई प्रताड़क और प्रताड़ित न बचेगा.ईश्वर ने श्रृष्टि के विस्तार के निमित्त ही भिन्न योग्यताओं से युक्त स्त्री और पुरुष की रचना की है. दोनों का योग ही संसार को पूर्ण बनाता है..एक अकेला अपने आप में कुछ भी नहीं.दोनों एक दूसरे के प्रति आदर का भाव रखें इसी में श्रृष्टि का सौंदर्य और संतुलन संरक्षित अक्षुण रहेगा.


मुझे लगता है यदि मैं परिवार समाज में आदर की अपेक्षा करती हूँ, अधिकार और बराबरी की अपेक्षा करती हूँ,तो इसके लिए सबसे पहले मुझे अपने आप को ही स्त्री पुरुष के इन विभेदों से ऊपर उठाना पडेगा,स्वयं को मनुष्य समझना पड़ेगा..तभी किसी और से मैं अपेक्षा कर सकती हूँ कि वह मेरे विषय में इन सबसे ऊपर उठकर सोचे..मुझे स्त्री पुरुष के भेद से न देखे.. और इसके बाद इस स्त्री शरीर के साथ एक स्त्री के प्रकृतिजन्य जो भी स्वाभाविक गुण और कर्तब्य (जैसे कि लज्जा ,शील ,करुणा, कोमलता,ममत्व आदि आदि जैसे स्त्रियोचित गुण और सेवा, आदर सम्मान आदि जैसे कर्तब्य) हैं, उनके प्रति सतत सजग रहूँ...मुझे लगता है संस्कार संस्कृति जो कि एक समाज को सुसंगठित रखती है,उसके रक्षा का प्रथम दायित्व स्त्री का ही है,क्योंकि इनका संरक्षण शारीरिक बल से नहीं बल्कि मानसिक बल से ही संभव है और यह मनोबल संपन्न स्त्री ही कर सकती है.स्त्री यदि एक नया शरीर उत्पन्न कर सकती है तो श्रृष्टि का संरक्षण भी कर सकती है...


एक स्त्री होकर यदि हम सचमुच स्त्री उत्थान का सोचती हैं तो सबसे पहले तो अपने जीवन में जितना हो सके अपने आस पास स्त्रियों को शिक्षित करें, स्वयं किसी स्त्री को मानसिक प्रताड़ना न दें और दूसरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करें.अपने आचरण में दृढ़ता लायें,स्वयं को दोषमुक्त करें तो नारी उत्थान के मार्ग को कोई अवरुद्ध न कर पायेगा....

8.9.09

समालोचना !!!

सम्पूर्ण श्रृष्टि में चर चराचर, प्रत्येक उद्यम सुख और आनंद प्राप्ति के निमित्त ही तो करते हैं. परन्तु समस्या यह है कि सुख आनंद विभिन्न श्रोतों द्वारा जितना अधिक हम लेने / जोड़ने में तत्पर रहा करते हैं, उतना किसी को देने में नहीं. जबकि यदि हम सचमुच ही शाश्वत सुख के अभिलाषी हैं, तो मन वचन और कर्म से सतत सजग रह कर हमें अपने आस पास अपने से जुड़े प्रकृति से लेकर प्राणिमात्र को सुख देना होगा...क्योंकि भौतिकी का यह सिद्धांत निर्विवादित सत्य है कि, हमारे द्वारा संपादित प्रत्येक क्रिया के सापेक्षिक समानुपातिक प्रतिक्रिया होती है..यदि हम सदैव यह ध्यान रखें कि अमुक कारक यदि मेरे सुख का कारण बनती है तो मैं भी दूसरे को यह सुख दूँ, तो संसार में दुःख का संभवतः कोई कारण ही नहीं बचेगा...

जैसे कि यही देख लें , सामान्य जीवन में हम प्रशंषित प्रोत्साहित होने में तो सुख पाते हैं,परन्तु सच्चे मन से प्रशंशा या प्रोत्साहन देने में संकोच कर जाते हैं. अधिकांशतः ऐसे अवसरों पर हमारा अहम् आड़े आ जाया करता है. यही नहीं, बहुधा जाने अनजाने अपने आत्मीय, अपने प्रिय तक से ऐसा कुछ कह जाया करते हैं, जो उनकी आत्मा को गहरे खरोंच जाया करती हैं. हमारे लिए साधारण लगने वाली बातों को भी मन में चुभ जाने पर हमारे अपने अति गंभीरता से ले लिया करते हैं और फिर ये बातें उनके जीवन की दिशा ही बदल दिया करती है. नकारात्मक बातें जीवन को अधोगामी बना बड़ा ही घातक परिणाम छोडा करती हैं...

मेरी एक प्रिय सखी है. उसके लेखन की मैं कायल हूँ..परन्तु इधर बहुत लम्बे समय से उसका मन लेखन से विरत हो गया था...पहले तो मुझे लगा उसकी अन्मयस्कता का कारण संभवतः पारिवारिक व्यस्तता है, पर वार्ता क्रम में जब उसे बड़ा ही निराश हतोत्साहित सा देखा तो मैं कारण जानने को बाध्य हो गयी.....बहुत खोंदने पर ज्ञात हुआ कि एक वरिष्ठ साहित्यकार , जिनपर उसकी अपार आस्था और श्रद्धा थी तथा जिनके मार्गदर्शन में चलना ही उसने अपना परम कर्तब्य माना था, ने न जाने क्या सोचकर उसके लेखन कला की तीव्र भर्त्सना कर दी...इस घटना से उसका संवेदनशील ह्रदय इतना आहत और हतोत्साहित हुआ कि उसने स्वयं ही अपने आप को अयोग्यता का प्रमाण पत्र देते हुए भविष्य में रचनाशीलता से किनारा करने का मन बना लिया.यह मेरे लिए असह्य था,क्योंकि अपनी श्रीजनात्मकता से वह साहित्य को समृद्धि प्रदान कर रही थी...

अपने जीवन में बहुधा ही इन परिस्थितियों से मैं स्वयं भी गुजरी हूँ तथा असंख्य लोगों को गुजरते देखा है,चाहे वह घर हो,कार्यालय हो, साहित्य/कला का क्षेत्र हो या जीवन से जुड़ा कोई भी अन्य क्षेत्र...और मुझे लगता है इस संसार का कोई मनुष्य नहीं जो इससे अछूता रहा होगा..जिससे हम नकारात्मकता की अपेक्षा किये होते हैं,जो हमारे आत्मीय नहीं होते , उनकी आलोचना से भले हम आहत न हो..परन्तु अपने आत्मीय जनों या जिनपर हमें आपर आस्था हो, अनपेक्षित रूप से यदि आलोचना मिले या प्रोत्साहन न मिले,तो हतोत्साहित हताश होना स्वाभाविक है.

ऐसी परिस्थतियों में हौसला हार कर शिथिल हो बैठा जाना, अपने कर्तब्य से विमुख होना, स्वाभाविक सही पर उतना ही अनुचित है, जितना कि किसी को हतोत्साहित करना. यदि हमने अपने कर्म का मार्ग परोपकार(मन वचन या कर्म से किसी को भी सुख देने का) का चुना है, तो ऐसे मार्ग पर कर्म विमुख कर्ताब्य्च्युत होकर बैठना निसंदेह पाप है. हाँ बात यह है कि संवेदनशील ह्रदय जब आहत व्यथित होगा यह नकारात्मक भाव हमारे रचनात्मक उर्जा का क्षय तो करेगा ही...ऐसे में इससे उबरने के साधनों पर यदि विचार कर लिया जाय तथा उसे सदैव ध्यान में रखा जाय तो नकारात्मक भाव से यथासंभव शीघ्रातिशीघ्र छुटकारा मिल सकता है..

सबसे पहले इसपर विचार करें कि क्या आलोचक की व्यक्तिगत योग्यता, अभिरुचि या कार्यक्षेत्र वह है कि वह हमारे विचारों और कार्यों का सही मूल्यांकन कर सकता है....

दुसरे, कि कहीं अधिकांश व्यक्तियों या उनके कृतित्वों का क्षिद्रान्वेशन आलोचक की स्वाभाविक प्रवृत्ति ही तो नहीं .....(क्योंकि कुछ वरिष्ठ और महत्वपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित तथा महत कार्य संपादित कर रहे व्यक्ति भी कुंठाग्रस्त नकारात्मक प्रवृत्ति के होते हैं और उनसे सकारात्मकता की आशा करना रेत से तेल निकलने सा है)

तीसरे ,यदि आलोचक में उपर्युक्त कोई भी दोष नहीं, तो कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने जब नकारात्मक प्रतिक्रिया दी उस कालावधि में वह तनावग्रस्त ,खीझा चिड़चिडाया हुआ था .

इन तथ्यों को ध्यान में रखकर ही निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए कि आलोचक की बातों को कितना वजन देना है और अंगीकार करना है. यूँ तो सर्वोत्तम यह होता है कि सौ पैसे अपनी भी न सुनी जाय.... सबकी सुन, अपनी तथा बाकियों की बातों को अपने विवेक की कसौटी पर भली प्रकार जांच परख कर,अभिमत स्थिर करना ही श्रेयकर हुआ करता है और तत्पश्चात उस मार्ग पर पूर्ण सकारात्मक उर्जा के साथ अग्रसर हों..सामान्यतया यदि व्यक्ति सकारात्मकता से गहरे जुड़ा होता है तो उसका विवेक भी उतना ही जागृत होता है और फिर छोटी छोटी बातों, दुर्घटनाओं की तो बात ही क्या, बड़ी से बड़ी दुर्घट्नाये बाधाएं उसका कर्मपथ अवरुद्ध बाधित नहीं कर पातीं.

कहते हैं न...... " खुदी को कर बुलंद इतना,कि खुदा भी बन्दे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है..." वस्तुतः सही मायने में जिसने भी अपने आत्मबल को सुदृढ़ कर लिया ,विवेक को सतत जागृत रखा, जीवन उसीने जिया...वही विजेता बना... क्योंकि अंततः जीवन में यदि कुछ माने रखता है तो स्वयं द्वारा निष्पादित सत्कर्म और उससे प्राप्त संतोष और शांति...

यह सतत स्मरणीय है कि समालोचना क्रम में सदैव सकारात्मक रहें,नहीं तो आपकी नकारात्मक उक्ति किसी की रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर सकती है...


***************************

27.2.09

द्वापर वहीँ ठहरा है........

जीवन में कई बार ऐसा होता है कि कोई स्थिति विशेष, प्रसंग, परिभाषाएं, शब्द, भाव वर्षों तक मन मष्तिष्क के सम्मुख उपस्थित रहते हुए भी अस्पष्ट औचित्यहीन होकर मनोभूमि पर विखण्डित से अवस्थित होते हैं और फिर किसी एक कालखंड में ऐसा कुछ घटित हो जाता है कि वे अपने दिव्य उद्दात्त रूप में नवीन अर्थ के साथ स्वयं को परिभाषित कर प्रतिष्ठित कर जाते हैं.


आस्तित्व का आविर्भाव जैसे ही धरती पर होता है, शरीर की आँखें खुलती नहीं कि जिज्ञासाओं की आँखें भी खुल जाती है. क्यों और कैसे, जैसे बोध और जिज्ञासा ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से इतर,विशिष्ठ करते हैं और यही जिज्ञासा ज्ञान विज्ञान का भी विस्तार करता है..


मेरा प्रबल विश्वास है कि किसी भी धर्म परंपरा में निहित व्रत त्योहारों के प्रावधान में सभ्यता संस्कृति और समाज के व्यापक मंगल के कारक निहित हैं. प्रबुद्ध ऋषियों मनीषियों ने वर्षों तक कठोर साधना और वैज्ञानिक अन्वेशानोपरांत इन्हें धर्म और परंपरा में नियोजित और प्रतिष्ठित किया है.......परन्तु बाल्यावस्था से ही रंगोत्सव (होली) का जो स्वरुप देखा था और इस परंपरा में निहित जितने कारणों/आख्यानों, भावों को जान पायी थी,इसकी प्रासंगिकता और अपरिहार्यता मुझे नितांत ही अनावश्यक लगती थी.उच्श्रीन्ख्लता को धार्मिक आधार देते इस पर्व की प्रासंगिकता मुझे समझ नहीं आती थी. अपितु यदि यह कहूँ कि मानस में इसकी छाप एक निकृष्ट, वीभत्स उत्सव के रूप में थी तो कोई अतिशियोक्ति न होगी......


यह ईश्वर की ही असीम अनुकम्पा थी कि गत वर्ष रंगोत्सव के अवसर पर वृन्दावन जाना हुआ.... सुसंयोग से बांकेबिहारी जी के मंदिर के अत्यंत निकट ठहरने की व्यवस्था भी हो गयी....वहां दो दिनों में जो भी देखा, उस समय की मनोदशा की तो क्या कहूँ, अभी भी उसका स्मरण मात्र ही रोमांचित और भावुक कर देता है और भावावेश शब्दों को कुंठित अवरुद्ध कर देता है....


इतने वर्षों की जिज्ञासा ऐसे शांत होगी,कभी परिकल्पित न किया था. कहाँ तो रंगोत्सव का पर्याय ही , उच्श्रीन्ख्लता, रासायनिक रंगों का दुरूपयोग, मांसाहार ,मादक पदार्थों का सेवन और होली के नाम पर शीलता का उल्लंघन इत्यादि ही देखा था.......और जो वहां देखा तो बस आत्मविस्मृत हो देखती ही रह गयी........


पूरे क्षेत्र में कहीं भी मद्य (नशीले पदार्थ) और मांसाहार का नामोनिशान नहीं था. बच्चों से लेकर बुजुर्ग स्त्री पुरुष, स्थानीय नागरिक या आगंतुक तक सभी संकरी गलियों या सडकों से निर्भीक गुजरते हुए बिना किसी परिचय तथा भेद भाव के, बिना किसी को स्पर्श किये रंग गुलाल से सराबोर किये जा रहे थे. कुछ लोगों का समूह वाद्य यंत्रों के साथ तो कुछ ऐसे ही तालियाँ बजाते हुए, भजन गाते हुए, झूमते नाचते गलिओं से गुजर रहे थे. कौन सधवा है,कौन विधवा न रंग डालने वाले इसका भान रख रहे थे और न ही रंगे जाने वालों को कोई रंज या क्षोभ था......जिस तरह से निर्भीक हो किशोरियां ,युवतियां , महिलाएं मार्गों पर चल रहीं थीं और जितनी शिष्टता से उनपर रंग डाले जा रहे थे ,यह तो अभिभूत ही कर गया....क्योंकि इसकी परिकल्पना हम अपने क्षेत्र में कतई नहीं कर सकते.


बाँकेबिहारी जी के मंदिर का पूरा प्रांगण रंग गुलाल से सराबोर था....जहाँ कहीं भी गयी,जहाँ तक दृष्टि गयी देखा , पूरा वृन्दावन ही भक्तिमय रंगमय हो विभोर हो झूम रहा है, गा रहा है..........इन दृश्यों ने मन ऐसे बाँधा कि ...लगा द्वापर बीता कहाँ है......यह तो यहीं ठहरा है, आज भी........तन मन आत्मा ऐसे रंग गया कि, यह पावन उत्सव - रंगोत्सव, अपने पूर्ण अर्थ और दिव्य स्वरुप में मनोभूमि पर अवतरित हो गया.........


मन बड़ा कचोट जाता है और लगता है कि जिस लोक कल्याणकारी सात्विक भाव के साथ परंपरा में पर्व त्योहारों का प्रावधान हुआ था,क्या हम उन्हें उनके उसी अर्थ और स्वरुप में नहीं मना सकते........समस्या है कि हम सुख तो पाना चाहते हैं, पर यह विस्मृत कर जाते हैं कि सात्विक सुख ही असली सुख है.यही चिरस्थायी होता है और यह सुख आत्मा तक पहुंचकर क्लांत मन को विश्राम तथा सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है.तन रंगने से अधिक आवश्यक मन को रंगना है.........चिर सुख हेतु एक बार सात्विक रंगों से रंगकर देखें इस मन को........देखें कितना आनद है इस रंग मे...........

**************************************************

17.12.08

चिंता नही, इरेजर है न.......

इस डिजिटल युग में ईरेजर . ...विज्ञान प्रदत्त मनुष्य को एक ऐसी सुविधा है जिसने मानव जीवन को अपार सुगमता दी है. स्याही से लिखी जाती थी और गलती/अशुद्धि होने पर लिखे कागज और मूड, दोनों का कचड़ा हो जाता था .पहले तो पेन्सिल से लिखे को मिटाने की सुविधा हुई और अब?


अब तो कागज पेंसिल सब बाय बाय.सीधे इलेक्ट्रानिक मिडिया में लिखो और वहां तो भई मिटाने की छोड़ो आपकी गलतियों को रेखांकित कर सही शब्द और वाक्य विन्यास के लिए भी पूर्ण प्रावधान उपलब्ध हैं.अब गलतियों से डरने या घबराने की कोई आवश्यकता नही.सुख में कहीं कोई अवरोध नही आ सकता.चाहे लिखते समय हो या गीत संगीत द्वारा मनोरंजन के समय.


पहले एक आधार था रेडियो....रेडियो जो बजा दे, सुनते रहिये ,पसंद आया तो ठीक नही तो कान या रेडियो मूँद कर प्राण बचाइए.लेकिन अब तो भई हमारे पास तरह तरह के छोटे से बड़े आकार में एक से बढ़कर एक इलेक्ट्रानिक उपकरण उपलब्ध हैं जिसमे एक साथ अपने पसंदीदा हजारों गीत एकत्रित कर रख सकते हैं. जब जिससे मन भर जाय और अप्रिय लगने लगे, झट ईरेज कीजिये.फोटो खींचना हो,कुछ गड़बड़ हो गई,पसंद की फोटो न खिंची,कोई दिक्कत नही.......ईरेज कीजिये.सब डिजिटल है भाई.
अब मनोरंजन हो या रोजमर्रा की सुविधाएँ,प्रत्येक क्षेत्र में जब 'ईरेजात्मक' सुविधा उपलब्ध है. ऐसे में चिकित्सा क्षेत्र क्यों पीछे रहे?


ई-रेजरों की इसी श्रृंखला में चिकित्सा जगत में क्रांति कारी उपलब्धि यह नवीन औषधि है "आई-पिल "। गलती हो गई, कोई बात नही.बहत्तर घंटें हैं आपके पास,अपनी गलती को ईरेज करने के लिए. सरकार ने इसे बिना किसी चिकित्सक के अनुज्ञा ( प्रिस्क्रिप्सन) के सभी औषधालयों में ग्राहकों को उपलब्ध कराने का आदेश दिया है.

वैसे तो यदि यह औषधि कारगर हुई तो भ्रूण हत्या रोकने के क्रम में यह एक अत्यन्त सार्थक सराहनीय वरदान सा होगा और इस परिपेक्ष्य में इसकी मुक्त कंठ से प्रशंशा होनी चाहिए.पर देखा जाए तो आज जितने गर्भपात होते हैं,उसमे से कितने गर्भपात दम्पतियों के बीच हुए तथाकथित गलती का परिणाम होते हैं?


आंकडों पर दृष्टिपात करें तो स्वैक्षिक गर्भपात में चालीस प्रतिशत कन्या भ्रूण की हत्या होती है और पचपन प्रतिशत गर्भपात अनैतिक शारीरिक सम्बन्ध से हुए गर्भधारण का परिणाम है।मुश्किल से पाँच प्रतिशत या उससे भी कम ही गर्भपात विवाहिता के अनैक्षिक गर्भधारण का परिणाम होती है॥यह आई-पिल बनाम ईरेजर पूर्ण संज्ञान में अच्छी खासी मात्रा में व्यय कर भ्रूण परिक्षनोपरांत कन्या भ्रूण हत्या में तो कतई अवरोधक या कारगर न होगा. ,हाँ अवांछित गर्भधारण और भ्रूण हत्या पर अवश्य कुछ रोक लगा सकता है.

समस्या इसके सदुपयोग में नही इसके दुरूपयोग में है. आज हमारा किशोर और युवा वर्ग नैतिक मूल्यों को धता बताते हुए जिज्ञासा और आनंदोप्भोग के लिए जिस तरह आँख मूंदकर भागा जा रहा है, यह उनके द्वारा सर्वाधिक उपयोग में लाया जाएगा और भ्रूण हत्या भले रुक जाय पर नैतिक पतन किस पराकाष्ठा पर पहुंचेगा ,पता नही......


समाज को सीमाओं में निबद्ध रखने में भय की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है.अभी कुछ दिनों पहले एक ख़बर टी वी में सुना कि पाँचवीं छठी वर्ग की क्षत्राएँ गर्भपात के लिए चिकित्सकों के पास जाने लगी हैं..ऐसा नही कि यह सिर्फ़ सुना भर ,अपने आस पास यह सब देखा भी है.


किशोर वय जो कि एक आंधी की तरह बहना चाहते हैं,नैतिकता की बातें उनके लिए प्रहसन है,किसी अवरोध को स्वीकारना उन के लिए उनके अधिकारों का हनन ही नही अभिभावकों का उनपर अत्याचार है... उनके बहकते कदम को रोकने के लिए इस भय का होना अत्यन्त आवश्यक है. एक समय था जब भय,शील, धर्म, मर्यादा, आत्मसम्मान इत्यादि इत्यादि बेडियाँ थीं,जिसमे बंधकर मन को बांधकर रखा जाता था.समय के साथ शील धर्म मर्यादा नैतिक मूल्य की बातें तो दरकिनार होती गयीं ,बस एक भय बचा था,कि अंततः सुखोपभोग की कीमत लडकी को ही तो चुकानी पड़ती है.


लोकोपवाद तथा सबकुछ भुगतना लडकी को ही पड़ता है ,यह भय उत्सुकता और आकांक्षा पर भारी पड़ता था और कुछ हद तक अवरोधक का काम करता था।भले यह आई-पिल भ्रूण हत्या रोकने में समर्थ होगा पर यह स्वच्छंद शारीरिक सम्बन्ध को और बढ़ाने में सहायक भी होगा.... अब तो यह दुस्साहसी निडर पीढ़ी, इस उपाय के सहारे निःसंकोच जिज्ञासा समाधान और आनादोप्भोग के लिए निकल पड़ेंगे.

पहले एड्स पश्चिम के उन्मुक्त समाज का रोग माना जाता था।पर आज भारत में भी समस्या दिन प्रतिदिन भयावह होती जा रही है.यह रोग उस उन्मुक्त यौनाचार का ही प्रतिफल है, यह तथ्य किसी से छुपा तो नही. वर्तमान में जितनी गंभीर समस्या अजन्मे शिशु की अमानवीय हत्या है उतना ही स्वछन्द यौनाचार भी है,जो बड़ी तेजी से पूरे संस्कृति और समाज को पतनोन्मुख किए जा रहा है॥


पश्चिम में जहाँ पूर्ण यौन स्वछंदता है,अधिकांशतः अल्पवयस्क बच्चे कच्ची उम्र में ही अनैतिक यौनाचार और नशीली दवाओं के सेवन में निमग्न हो जाते हैं और उनमे विवाह परिवार जैसी व्यवस्थाओं के प्रति अनास्था का भाव आ जाता है,जिससे समाज में एक तरह से उच्छ्रिन्खला और विघटन व्याप्त हो जाता है।आज जितनी मात्रा में मनोरोगी पश्चिमी सभ्यता या उसके अनुकरण करने वाले किसी भी देश में रह रहे उस के अनुयायियों में पाया जाता है वह संतुलित जीवन जीने वालों में नही.जैसे मिठाई पसंद करने वाला यदि अत्यधिक मात्रा में प्रतिदिन केवल मिष्टान्न का सेवन करने लगे तो स्वस्थ्य का तो जो होगा सो होगा,एक अवधि के बाद उसे मिठाई से वितृष्णा हो जायेगी. वैसा ही इसके साथ भी है.


इस पिल के द्वारा गर्भस्थ शिशु की हत्या रोकने का प्रयास तो हो चुका है पता नही पीढी को व्यभिचार से विमुख करने के लिए कोई उपाय मिलेगा या नही?

11.9.08

शक्ति पूजा


मातृ रूप में शक्ति पूजन, भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है और अनादि काल से अनवरत चली आ रही यह परम्परा में निहित है. हिंदू पुराणों आख्यानों की मानें तो केवल ब्रह्माण्ड की ही उत्पत्ति ही नही बल्कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य सभी देवी देवताओं की उत्पत्ति भी आदिशक्ति माँ दुर्गा ने ही की है.वे ही श्रृष्टि का आधार हैं.प्रकृति से लेकर चर अचर तक शक्ति रूप में जो कुछ भी श्रृष्टि में निहित उपस्थित है, वह माता का ही रूप है. इस महा शक्ति मातृशक्ति की साधना आराधना देवों तथा मानवो ने ही नही दानवों ने भी की है और जब भी कभी जिस किसी दानव ने शक्ति के मद में चूर हो मनुष्यों , देवों या प्रकृति का दमन किया है,भक्तों की आर्त पुकार पर माता ने उस दुष्ट का नाश कर भक्तों को उससे त्राण दिलाया है. श्रृष्टि के प्रत्येक कण में यह आदिशक्ति व्याप्त हैं.

बहुधा क्षत्रियों की कुलदेवी यही आदि शक्ति माँ दुर्गा ही हुआ करती हैं और इनके आशीष के बिना शक्ति प्रयोग तथा विजय की कल्पना भी नही की जा सकती.पुरातन काल में परंपरागत रूप में माँ शक्ति की पूजा अधिकांशतः घरों में ही की जाती थी.पर कालांतर में इसे उत्साव और त्यौहार के रूप में वर्ष में दो बार बसंत ऋतु तथा शरद ऋतु में नवरात्र में देवी की आराधना के साथ हर्षोल्लास से मनाया जाता है.

दुर्गा शप्तसी में में जो कथा वर्णित है,उसके अनुसार महिषासुर,चंड मुंड,शुम्भ निशुम्भ इत्यादि महादैत्यों ने जब देवताओं तथा मानव जाति को परास्त कर उन्हें त्राण दे त्रस्त कर दिया तो देवों ऋषियों के आर्त पुकार पर आदि शक्ति माता दुर्गा ने अपने विभूतियों के साथ इन असुरों का संहार किया और धर्म की प्रतिस्थापना की.सप्त्शी के अनुसार देवी की विभूतियों(उनके ही अन्य रूपों) तथा अन्य सभी देवताओं के शक्ति रूपों की तो चर्चा है परन्तु परम्परा और व्यवहार में पूजन काल में देवी के विग्रहों के साथ गणेश तथा विश्वकर्मा की जो पूजा की जाती है,इस से सम्बंधित मैंने आज तक जो कुछ भी पढ़ा जाना है, उसमे कहीं नही पाया और यह मेरे लिए बाल्यकाल से ही उत्सुकता का विषय रहा.दुर्गा पूजा में देवी दुर्गा की प्रतिमा के साथ साथ लक्ष्मी ,सरस्वती, विश्वकर्मा तथा गणेश इन सबके विग्रहों के भी स्थापना और आराधना होती है.सबने देखा होगा.परन्तु नवरात्र में जिस दुर्गा सप्त्शी के पाठ के बिना नवरात्र आराधना अपूर्ण मानी जाती है,उसमे कहीं भी गणेश और विश्वकर्मा के विग्रहों की चर्चा नही है.

परम्परा में यूँ ही तो नही कुछ आ जाता, सो इसके पीछे भी कोई तथ्य रहस्य अवश्य होगा ,यह मन कहता था पर कईयों से पूछने पर भी इस जिज्ञासा का समुचित समाधान मुझे आज तक नही मिला है.मेरा निवेदन सभी प्रबुद्ध जनों से है कि जो कोई भी मेरे इस जिज्ञासा को शांत करने में मेरी सहायता करेंगे ,मैं उनकी सदा आभारी रहूंगी.

कुछ वर्ष पहले अपने मन के इसी जिज्ञासा के साथ जब माता के सम्मुख बैठी हुई थी तो अचानक मन में एक बात कौंधी,यह सत्य के कितने निकट है नही जानती पर मुझे लगा कि ये विग्रह समूह कितनी बड़ी बात की ओर इंगित कर रहे हैं.एक ध्रुव सत्य जो सदा के लिए प्रासंगिक तथा विचारणीय है.किसी भी नवनिर्माण या विध्वंस के लिए ये इतने ही अवयव तो चाहिए.

माँ दुर्गा शक्ति की प्रतीक हैं, जो किसी भी कार्य के लिए सबसे पहली आवश्यकता है.

सरस्वती विद्या की प्रतीक हैं,शक्ति बिना विद्या/ज्ञान के कभी सफलता नही पा सकती.

लक्ष्मी धन की प्रतीक हैं,शक्ति और विद्या हों भी तो बिना धन के न तो सृष्टि / रचना / नवनिर्माण का कार्य हो सकता है न ही विध्वंश / युद्ध का.

गणेश बुद्दि,युक्ति और विवेक के स्वामी(प्रतीक) हैं.उपरोक्त तीनो चीजे हों भी और उसे विवेकपूर्ण ढंग से युक्तियुक्त प्रयुक्त न किया जाए तो सब व्यर्थ हो जाता है.

और विश्वकर्मा तकनीक और निर्माण के देवता माने जाते हैं. विध्वंश के लिए भी तकनीक चाहिए और भ्रष्ट व्यवस्था के विध्वन्सोपरांत नवनिर्माण के लिए भी बिना तकनीक और निर्माण की आवश्यकता है नही तो इसके बिना सम्पूर्ण प्रयास व्यर्थ और अर्थहीन हो जाता है.

सो कुल मिलकर मातृशक्ति को सर्वशक्तिसंपन्न होते हुए भी विजय तभी मिलती है जब अपने साथ वे इन शक्तियों को लेकर चलती हैं.सत्य ही है इन पंच्शक्तियों के बिना जर्जर व्यवस्था का विनाश और नवसृजन कर विजयश्री प्राप्त कर पाना असंभव है.सर्व शक्ति मान होते हुए भी विजयी वही हो सकता है जो विद्या ,विवेक ,धन और तकनीक के साथ विभूषित हो..

नवरात्र का वह पावन अवसर निकट ही है सो कुछ बात कर ली जाए वर्तमान समय में इस उत्सव को जिस प्रकार से मनाया जाता है उसके विषय में........

कुछ लोग माता के प्रति पेम और निष्ठा को ह्रदय में धारण किए, बिना कर्मकांड में लिप्त हुए मानसिक पूजन में विश्वास करते हैं तो कुछ लोग इसे बेहद सादगी पूर्ण ढंग से घर में ही कलश स्थापित कर इन नवो दिनों में कठोर साधना उपासना तथा व्रत उपवास के साथ संपन्न करते हैं.कुछ कलश स्थापना न भी करें तो यम् नियम पालन करते हुए विग्रहों के पूजा स्थल पर या मंदिरों में जाकर अर्चना करते हैं,परन्तु एक बहुत बड़ा समुदाय ऐसा है जिसके लिए यह एक ऐसा अवसर है जिसमे रात रात भर पंडालों में घूम घूम कर '' ऐश " करने का सर्वोत्तम सुयोग है.आस्था निष्ठा से इस वर्ग का दूर दूर तक कोई सरोकार नही रहता.दर्शनार्थियों को ताड़ना और छेड़ छाड़,इनके लिए आलौकिक आनंद प्रदायक होता है. .

सही है कि परम्परा में उत्सवों का प्रावधान धार्मिक भावनाओं के उद्दीपन के साथ साथ सामूहिक भावना को जाग्रत करने के लिए किया गया था.पर आज ये धार्मिक उत्साव जो रूप ले चुके हैं,उसमे धर्म तो लुप्त होता जा रहा है,हाँ फूहड़ ढंग से मनाया जाने वाला उत्सव बच गया है.जो दिनों दिन और बदतर होता जा रहा है.आस्था का स्थान आडम्बर ने ले लिया है.चाहे वह कडोडों रुपये मंहगे पंडालों के निर्माण के लिए हों या डांडिया और रास के रूप में आयोजित बड़े बड़े प्रायोजित कार्यक्रमों के माध्यम से हो.अब तो महानगरों में पेप्सी कोला जैसी कम्पनियाँ भी इन डांडिया कार्यक्रमों का आयोजन करवाने लगी हैं जहाँ भरी भरकम फीस देकर लोग सज धज कर डिस्को डांडिया करने पहुँचते हैं.आस्था और धर्म वहां गौण रहता है,उद्देश्य मात्र मनोरंजन भर रहता है...

पूजा पंडालों में भी चहुँ ओर पैसा ही चमकता है.एक प्रकार से होड़ सी रहती है इन पूजा मंडलियों के बीच.अधिकांशतः इन मंडलियों के कर्ता धर्ता संरक्षक समाज के तथाकथित भाई लोग ही हुआ करते हैं जिनके बीच यह शक्ति प्रदर्शन तथा वर्चस्व स्थापित करने का मामला होता है.वर्चस्व की इस लडाई में गोली बन्दूक चलना आम बात है.पूजा के नाम पर जमकर वसूली होती है और इस वसूली से एकत्रित धन का जो सदुपयोग होता है उसके बखान की आवश्यकता नही.सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है.पूजा पंडालों में मानक भव्यता और ताम-झाम भर होती है.

बड़ा ही अफ़सोस होता है,जितना धन पूजा के नाम पर इस तरह बहाया जाता है,जहाँ एक ओर निर्धन दाने दाने को मुहताज है , बिना इलाज के असमय दुनिया से विदा हो रहे हैं,कई मेधावी बालक हैं जो पैसे के अभाव में पढ़ नही पाते.जहाँ सड़कें टूटी हुई है या और भी न जाने कितने ही असंख्य समस्याएं हैं,जिसने जीवन को विषम बना दिया है.क्या इनसे निपटने की जिम्मेदारी सिर्फ़ सरकार की बनती है.सरकार और व्यवस्था को गलियां दे दे देने से समाज की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है? चार दिनों के लिए बनाये जा रहे भव्य से भव्यतम पंडालों के लिए जो धन पानी के लिए बहाया जाता है उसका उपयोग उसी माता के नाम पर सार्थक कार्यों में भी तो किया जा सकता है.यदि एक कोष बनाकर उन अभावग्रस्त लोगों की मदद करें, फैली हुई अव्यवस्था के लिए कुछ कदम उठायें तो क्या यह भगवान् के प्रति भक्ति से कमतर होगी?

स्थिति तो यह है कि पूजा के ये अवसर जिस प्रकार से शहर में अव्यवस्था फैलाते हैं, कि उन चार पाँच दिनों के स्थिति की स्मृति ही भयातुर कर देती है.जगह जगह सड़क जाम,शोर शराबा,शरारती तत्वों की हुल्लड़बाजी ,सारे काम काज ठप्प इतनी बेचैन करती है कि उत्सवों का आगमन उत्साहित नही आतंकित ओर क्षुब्ध कर देती है..

आस्था मन और आत्मा में बसने वाली,धर्म आचार और व्यवहार में समाहित होने वाली तथा उत्सव सामाजिक सौहाद्र बढ़ाने वाले अवयव हैं।कोई आवश्यक नही कि व्रत उपवास या अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में लिप्त होकर ही आस्तिकता का निष्पादन किया जाय या उसे प्रगाढ़ किया जा सकता है। आस्था और धर्म व्यक्ति के आत्मोन्नति के साथ साथ समाज को उन्नत और सुदृढ़ करने के लिए है।धर्म के नाम पर आडम्बर और धन का अपव्यय सर्वथा अनुचित है और यदि इसे अधर्म कहा जाए तो कोई अतिशियोक्ति न होगी॥

माता सबको सद्बुद्धि तथा मानव धर्म के मर्म को समझ पाने का विवेक दें यही उनसे प्रार्थना है..

" सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके,शरण्ये त्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते "

7.8.08

युवाओं में विवाह के प्रति बढ़ती अनास्था

धर्म में मनुष्य को जिन चार आश्रमों में रहने का प्रावधान बताया गया है ,उसमे जीवन के लिए विवाह को अति आवश्यक माना गया है.समाज को सुगठित और सुव्यवस्थित रहने के लिए तथा इसके द्वारा धर्म अर्थ काम का उपभोग अपने सहचर के साथ कर अंत में मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी इसी के माध्यम से गुजरकर ही माना गया है.क्योंकि जबतक व्यक्ति के तन मन और धन की बुभुक्षा शांत नही हो जाती निष्काम नही हो पाता और न ही धर्म कर्म में प्रवृत्त हो संसारिकता से विरत रह भगवत भक्ति में रत कर पाता है स्वयं को..

जबतक समाज सुगठित नही हुआ था,नियम निर्धारित न हुए थे,जर,जमीन,जोरू ही हिंसा द्वेष और मार काट के कारण हुआ करते थे.क्योंकि मन तो तब भी था,प्रेम तब भी हुआ करते थे और व्यक्ति इन तीनो से तब भी बंधा होता था मनुष्य . हाँ,व्यवस्था नही थी,जो कोई सीमा निर्धारित करती और लोगों को कर्तब्य बंधन में बांधती ,सो सबकुछ अस्त व्यस्त अराजक स्थिति में था ..

कालांतर में कई व्यवस्थाएं आयीं.कुछ सही भी कुछ ग़लत भी.पर एक बात जो शाश्वत थी और रहेगी कि विवाह जीवन और समाज के लिए सभ्यता के साथ ही आवश्यक थे और सभ्यता के अंत तक इसकी अपरिहार्यता निर्विवाद रहेगी,भले स्वरुप कितना भी बदले.

गृहस्थ आश्रम में अपने सहचर या सहचरी के साथ तन मन धन और धर्म इन चारों के उपभोग के साथ साथ पति पत्नी के लिए कुछ अधिकारों और कर्तब्यों की भी अवधारणा की गई है.परन्तु आज जैसे जैसे व्यक्ति(स्त्री पुरूष दोनों) वैयक्तिकता की दौड़ और होड़ में फंसे अपने अहम् को सर्वोपरि रख कर्तब्य से अधिक अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने लगे हैं,प्रेम को भी लेन देन की तराजू में तौलने लगे हैं और तन मन धन और धर्म अब एक साथ नही, व्यक्तिगत रूप में व्यक्तिगत इच्छा के अनुरूप इसे जीवन में स्थान देने और मानने में लगें हैं तो विवाह रूपी इस संस्था पर से लोगों का विशवास टूटना दरकना लाजिमी है.

पहले पुरूष के लिए...............

आज की काफी हद तक स्वेक्षचारी जीवन शैली ने पुरूष के लिए संभावनाओं के अपरिमित द्वार खोल दिए हैं.सब नही, पर बहुत से युवा युवावस्था की दहलीज पर कदम रखते तक में तन मन के सुख का एक गृहस्थ की भांति उपभोग कर चुके होते हैं.धन कमाना उनका परम ध्येय होता है और धर्म की चिंता करना समय व्यर्थ करना लगता है.अपने हर आज को बखूबी कैसे एन्जॉय करना है इसके हर नुस्खे आजमाने तो तत्पर रहते हैं और सुगमता से इन्हे सब उपलब्ध भी रहता है.महानगरों में तो इसकी असीम संभावनाएं हैं,जो सरलता से जब चाहे उपलब्ध है..बल्कि ऐसी सेवाएं उपलब्ध कराने वाली एजेंसियां भी उपलब्ध हैं जो ''मित्र बनाओ'' से लेकर अकेलेपन को दूर कराने और हर प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए २४ घंटे की सेवा खुलेआम इश्तेहार देकर प्रदान करते हैं.जब विवाह को तन के सुख के साथ बांधकर माना जाने लगे और जिंदगी की हर सुविधा और सुख टू मिनट मैगी या रेडी टू ईट स्टाइल में मिल रहा हो तो कौन फ़िर विवाह के बंधन में बाँध कर्तब्यों की बेडी में जकड़ना चाहेगा ख़ुद को. कर्तब्य निष्पादन में भी सुख है,कोई आपका नितांत अपना हर सुख दुःख में बिना किसी सेवा शुल्क के आपके लिए हर पल उपलब्ध है,जिसके साथ कर्तब्य निभाने में किसी को सुखी करने,खुशी देने में भी सुख है,और यह बोझ बंधन कतई नही है,जो पुरूष इसमे आस्था रखते हैं,वे तो सहज विवाह को मान्यता और सम्मान दे देते हैं पर इस से विमुख पुरूष जब प्रौढावस्था में होश में आता है और इसे मानने को प्रस्तुत होता है तबतक बहुत देर हो चुकी होती है और ये अपना बहुत कुछ खो चुके होते हैं.लाख पश्चिम का अनुकरण कर लें युवावस्था में, पर उम्र ढलने के बाद एक न एक दिन मानना ही पड़ता है कि हमारी भारतीय संस्कृति में जो भी प्रावधान हैं,अंततः सच्चा सुख उसी रास्ते चल मिल सकता है.

अब स्त्रियों की बात.........

कमोबेश जो मानसिकता पुरुषों की है पुरुषों की बराबरी में उतरी आज की तथाकथित माडर्न नारियां भी उसी बीमारी में स्वयं को स्वेक्षा से जकडे लिए जा रही हैं.आर्थिक आत्मनिर्भरता को स्त्रियों ने पति के विकल्प के रूप में मानना आरम्भ कर दिया है और घर गृहस्थी के कर्तब्य निष्पादन को मानसिक गुलामी मान, धन को ही पति परिवार सबका विकल्प मानना आरम्भ कर दिया है..धनाढ्य महिलाओं के लिए भी वो सारी सुविधाएँ उपलब्ध हैं जो एक पुरूष को तथाकथित सुख के लिए प्राप्य होते हैं.हालाँकि यह स्थिति पुरुषों में जितनी मात्रा में है उतनी स्त्रियों में नही आ पाई है.पर जब राह पर चल निकली हों तो चिंताजनक तो अवश्य ही है.

स्वेक्षाचारिता, वैयक्तिकता,भौतिकवादिता और कुछ हद तक पाश्चात्य संस्कृति के अन्धानुकरण ने आज के युवाओं चाहे स्त्री हो या पुरूष ,के मन में विवाह के प्रति वितृष्णा भरना शुरू कर दिया है.अब विवाह को बोझ और बंधन मानने की प्रवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ने लगी है.वर्तमान के भौतिक युग में आज का युवा भौतिक वस्तुओं की खरीद फरोख्त की तरह विवाह को भी नफा नुक्सान की तराजू पर तौलकर देखने लगा है और सिर्फ़ आज में जीने वाला युवा पहले मोल तोल कर ठोंक बजा कर देख लेना चाहता है कि किस चीज के लिए क्या कीमत चुका रहा है.किसी समय विवाह नाम की इस संस्था को जो सामाजिक मान्यता तथा साम्मानित स्थान समाज को सुव्यवस्थित सुगठित रखने के लिए समाज द्वारा दिया गया था,अब वह बहुत तेजी से तिरस्कृत होने लगा है.

समस्या के मूल में जाएँ तो सबसे बड़ा कारण वैयक्तिकता ही है.व्यक्ति इतना अधिक आत्मकेंद्रित होता जा रहा है संवेदनाएं इस तरह सुप्त होती जा रही हैं कि अपने से बहार निकल और आगे बढ़ व्यवहार में दूसरों के दुःख सुख के प्रति बहुत अधिक उदासीन होने लगा है.कितने लोग(स्त्री या पुरूष)हैं जो देश दुनिया समाज के दुःख सुख को अपने व्यक्तिगत सुख दुःख से अधिक महत्व दे पाते हैं?स्वयं को छोड़ हर व्यक्ति दूसरा हो गया है,चाहे वह पति पत्नी बच्चे माता पिता ही क्यों न हों.और यही वैयक्तिकता जब हमें दूसरों के प्रति निर्मम और असंवेदनशील बनाती हैं तब किसी भी संस्था,चाहे वह विवाह का ही क्यों न हो मूल्यहीन होना,अपनी महत्ता खोना स्वाभाविक ही है. आज जो लोग विवाह से बचना भागना चाहते हैं,उसके मूल में कहीं न कहीं वे ही कष्ट फोकस में होते हैं जो इस संस्था में बंधने के बाद स्वार्थवश और अहम् के टकराव की अवस्था में लोगों को भोगना पड़ता है.दो व्यक्तियों में एक यदि कर्तब्य पथ पर चलने वाला हो भी पर दूसरा यदि अधिकार को पकड़े दूसरे को प्रताडित करता रहे, तो भी सम्बन्ध का सुचारू रूप से चल पाना कठिन हो जाता है.अब जब तक स्त्रियाँ आर्थिक परतंत्रता की बेडियों में जकड़ी हुई थीं,तबतक तो रोते पीटते कष्ट सहते जीवन निकाल ही लेती थीं और विवाह नाम की इस संस्था की लाज बच जाती थी.पर जैसे जैसे स्त्रियाँ इस से निकलती जा रही हैं,विवाह के प्रति इस तरह अनास्था तथा विवाह का टूटना तेजी से बढ़ता जा रहा है.


सम्बन्ध विच्छेद या विवाह से वितृष्णा दोनों ही स्थिति,चिंताजनक है तथा किसी भी स्थिति में न तो यह कष्टों से बचने का उपाय है या समस्या का समाधान ही है.बात बस इतनी है कि यदि हम अपने इस ''मैं'' से ऊपर उठ जैसे ही ''हम'' में विशवास करने लगेंगे दांपत्य की गरिमा और मधुरता को भी पा लेंगे और तब ही जान पाएंगे कि सच्चा सुख कर्तब्य से बचने में नही बल्कि उसके निष्पादन में ही है.विवाह केवल आर्थिक सुरक्षा और संबल के ही लिए नही बल्कि मानसिक सुख और संबल के लिए भी आवश्यक है.दम्पति जब परस्पर एक दूसरे के लिए प्रेम,निष्ठा,सम्मान और समर्पण की भावना रखे ,अपने कर्तब्य तथा सहगामी के अधिकारों के प्रति सजग रहे तो सिर्फ़ अपने लिए ही स्वर्गिक सुख नही अर्जित करेगा बल्कि अपनी आगामी पीढी के सामने भी सुसंस्कारों का आदर्श प्रस्तुत करेगा और अगली पीढी अपनी पिछली पीढी के सुख को देख विवाह बंधन को दुःख का बंधन नही बल्कि सुख का द्वार समझ पवित्र बंधन में बंधने को न केवल तत्पर होंगे,बल्कि पूरे मन से इसका सम्मान भी करेंगे.............