राजा बलि विष्णु के अनन्य उपासक भक्तप्रवर प्रहलाद के पौत्र थे. थे तो राक्षस कुल के , परन्तु परम सात्विक तथा भगवान् विष्णु के परम भक्त थे. सदाचारी राजा सत्कार्य में लीन रह प्रजा का पुत्रवत पालन करते. इनकी दानशीलता जगद्विख्यात थी. इनके द्वार से कोई याचक रिक्तकर कभी न लौटा था. परन्तु कालांतर में इसी बात का राजा बलि को अभिमान हो गया. सर्वविदित है, भक्त का अभिमान प्रभु का भोजन हुआ करता है.तो जैसे भगवान् ने महर्षि नारद का मोह और अहंकार भंग किया था, वैसे ही अपने इस भक्त के चरित्रमार्जन को भी प्रस्तुत हो गए..
एक दिन जब राजा बलि पूजनोपरांत याचकों को दान देने हेतु द्वार से बाहर आये तो उन्होंने क्षत्र तथा कमण्डलु धारण किये बावन उंगली के बाल याचक को देखा. राजन ने सबसे पहले उन्ही से उनके अभीष्ट की जिज्ञासा की और वामन ने उनसे तीन पग भूमि दान में माँगा. राजन आश्चर्यचकित हो गए उन्हें याचक के बुद्धि विवेक पर अपार शंका हुई और उन्होंने सोचा कि हो सकता है याचक अपनी क्षमता से अनभिज्ञ है.अब यह छोटा बालक कितने भी प्रयास से भूमि पर डग भरेगा तो भी कितनी भूमि घेर पायेगा. अतः उसकी सहायतार्थ उन्होंने उनसे आग्रह किया कि इतनी तुच्छ वस्तु मांग वे उन्हें लज्जित न करें.वे चाहें तो कुछ गाँव अथवा राज्य ही मांग लें अन्यथा कुछ बहुमूल्य ऐसा मांगे जिसे देने में भी उन्हें प्रसन्नता हो.पर वामन भी थे कि अड़ गए कि उन्हें चाहिए तो तीन पग भूमि या नहीं तो कुछ नहीं.
हार कर राजन ने उनका प्रस्ताव स्वीकार लिया . पर वामन भी कम न थे..उन्होंने राजन से कहा कि ऐसे ही न लूँगा, पहले आप संकल्प कीजिये और वचन दीजिये कि बाद में आप न मुकरेंगे तभी मैं अपनी इच्छित लूँगा. मामला उलझा देख राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य ने जब अपनी दिव्य दृष्टि से देखा तो याचक और उसकी उसकी मंशा सब उनके सम्मुख प्रकट हो गयी..उन्होंने राजा को समझाना प्रारंभ किया कि वे इस वामन की बातों में न आयें ,यह छलिया है उन्हें कहीं का न छोड़ेगा.परन्तु वचनबद्ध राजन कब पीछे हटने वाले थे.
राजन दानी और वामन यजमान बन कुश के आसन पर विराजे और वामन ने अपने कमण्डलु का जल संकल्प के लिए कुश पकडे राजन के कर में डालने का उपक्रम किया.इधर जब शुक्राचार्य ने बात बनती न देखी तो अपने योग बल से वे अतिशूक्ष्म रूप धर कर कमण्डलु की टोंटी में जाकर बैठ गए और जलधार को ही अवरुद्ध कर दिया. उन्हें भय हुआ कि राजन का सब कुछ दान में जब यह वामन ही ले लेगा तो मेरे लिए क्या बचेगा.अतः इस कार्य को बाधित करना अतिआवश्यक था..इधर जल धार अवरुद्ध देख वामन ने अपने कुषाशन से एक कुषा खींचकर टोंटी में डाल कर खरोंच दिया जिससे कि अवरोध दूर हो जाय. कुषा जाकर सीधे शुक्राचार्य की आँख में लगी और रुधिर प्रवाह होने लगा.छटपटाकर शुक्राचार्य जी बाहर निकले और एक आँख वाले काने बनकर रह गए. तभी से यह कहावत चल पड़ी कि दान में जो विघ्न डाले,नजर लगाये, वह काना हो जाता है..
संकल्प पूरा हुआ और राजन ने वामन से कहा कि अब इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जहाँ की भी भूमि लेना चाहें निःसंकोच ले लें.वामन, अबतक जो बावन उंगली के थे, ने अपना विराट रूप प्रकट किया और एक पग पाताल पर रख धरती होते हुए दूसरे पग से सारा आकाश नाप लिया और तीसरा पग धरने को राजन से स्थान माँगा. राजन सोच में पड़ गए,परन्तु त्वरित गति से उनकी पत्नी ने जो कि परम विदुषी ही नहीं विष्णुभक्त भी थी,ने स्थिति सम्हाली. उसने प्रभु का आशय समझ लिया और राजन को समझाया कि अभी तक तो आपने भौतिक भूमि दान किया है, पंचतत्वों से निर्मित आपका यह शरीर भी तो भूमि सामान ही है जो अभी बच ही रहा है,अब इसे प्रभु को अर्पित कर दें..राजन ने झट अपना शीश प्रभु के सम्मुख नत कर स्वयं को प्रभु को अर्पित कर दिया..
राजन परम भक्त थे ,परन्तु मोह ने उन्हें विभ्रम में डाल दिया था.वे जानते थे कि इस ब्रह्माण्ड के एकाधिकारी प्रभु ही हैं ,पर इस बात को वे व्यवहार और स्मरण में नहीं रख पाए थे.तभी तो वे किसी को भी कुछ यह सोचकर देते थे कि अपनी वस्तु वे दान कर रहे हैं.प्रभु पर उनकी श्रद्धा थी,पर उन्होंने अबतक स्वयं को पूर्ण रूपेण प्रभु को समर्पित नहीं किया था, तभी तो सहज ही अहंकार ने उन्हें ग्रस लिया था. और प्रभु उन्हें पूर्णतः दुर्गुणों से मुक्त कर पवित्र कर देना चाहते थे. प्रभु अपने सच्चे भक्तों की देख भाल ठीक ऐसे ही करते हैं जैसे एक वैद्य अपने रोगी की करता है.प्रभु ने भी अपने इस परम स्नेही भक्त के इस रोग से त्राण के लिए यह स्वांग रचा था.
राजन ने जब स्वयं को निश्छल भाव से प्रभु को समर्पित कर दिया तो भगवान् अति प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा बलि से पुरुष्कार स्वरुप इच्छित वर मांगने को कहा. बलि अबतक समझ चुके थे कि प्रभु पर आस्था होते हुए भी चूँकि आजतक उन्होंने उन्हें अपने चित्त का प्रहरी न बनाया था तो सहज ही दुर्गुणों ने उनपर अपना आधिपत्य जमा लिया .तो जबतक इस चित्त के प्रहरी स्वयं विष्णु न होंगे माया से बचे रहना संभव नहीं है. सो उन्होंने प्रभु से आर्त प्रार्थना की कि अब से प्रभु सदैव उनके नयनों के सम्मुख रहें और किसी भी प्रकार के दुर्गुण दोष से उनकी रक्षा ठीक ऐसे ही करें जैसे एक स्वामिभक्त द्वारपाल सतत सजग रह द्वार पर डटे अपने राजा की करता है..
भगवान् तो ऐसे ही सत्पुरुष भक्त से बंध जाते हैं,तो यहाँ तो वे वचन से भी बंधे हुए थे. उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक यह अधिभार लिया और पातालपुरी में राजा बलि के राज्य में आठों प्रहर राजा के सम्मुख सशरीर उपस्थित रह उनकी रक्षा करने लगे . इधर वैकुण्ठ से बाहर रहे जब बहुत दिन हो गए तो सभी देवी देवता समेत लक्ष्मी जी अत्यंत चिंतित हो गयीं...सब सोच में पड़े थे कि ऐसा कबतक चलेगा.जैसी स्थिति थी इसमें न भगवान् भक्त को छोड़ सकते थे और भक्त द्वारा स्वेच्छा से उन्हें मुक्त करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था..तब इस कठिन काल में नारद जी ने माता लक्ष्मी को एक युक्ति बताई. उन्होंने कहा कि एक रक्षा सूत्र लेकर वे राजा बलि के पास अपरिचित रूप में दीन हीन दुखियारी बनकर जाएँ और राजा बलि को भाई बनाकर दान में प्रभु को मांग लायें..
लक्ष्मी जी राजा बलि की दरबार में उपस्थित हुईं और उन्होंने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें भाई बनना चाहती हैं.राजन ने उनका प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया और उनसे रक्षासूत्र बंधवा लिया. रक्षासूत्र बंधवाने के उपरान्त राजन ने लक्ष्मी जी से आग्रह किया कि वे अपनी इच्छित कुछ भी उनसे मांग लें,जबतक वे कुछ उपहार न लेंगी,उन्हें संतोष न मिलेगा..लक्ष्मी जी इसी हेतु तो वहां आयीं थीं. उन्होंने राजन से कहा कि आप मुझे अपनी सबसे प्रिय वस्तु दे दें.. राजन घबडा गए. उन्होंने कहा मेरा सर्वाधिक प्रिय तो मेरा यह प्रहरी है,परन्तु इसे देने से पूर्व तो मैं प्राण त्यागना अधिक पसंद करूँगा.
तब लक्ष्मी जी ने अपना परिचय उन्हें दिया और बताया कि मैं आपके उसी प्रहरी की पत्नी हूँ,जिन्हें आपने इतने दिनों से अपने यहाँ टिका रखा है. अब तो राजा पेशोपेश में पड़ गए..बात हो गई थी कि जिन्हें उन्होंने बहन माना था, उसके सुख सौभाग्य और गृहस्थी की रक्षा करना भी उन्ही का दायित्व था और यदि बहन की देखते तो उन्हें अपने प्राणों से भी प्रिय अपने इष्ट का साथ छोड़ना पड़ता.. पर राजन भक्त संत और दानवीर यूँ ही तो न थे.. उन्होंने अपने स्वार्थ से बहुत ऊपर भगिनी के सुख को माना और प्रभु को मुक्त कर उनके साथ वैकुण्ठ वास की सहमति दे दी ..परन्तु इसके साथ ही उन्होंने लक्ष्मी जी से आग्रह किया कि जब बहन बहनोई उनके घर आ ही गए हैं तो कुछ मास और वहीँ ठहर जाएँ और उन्हें आतिथ्य का सुअवसर दें..
लक्ष्मी जी ने उनका आग्रह मान लिया और श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) से कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि (धनतेरस ) तक विष्णु और लक्ष्मी जी वहीँ पाताल लोक में रजा बलि के यहाँ रहे . धनतेरस के बाद प्रभु जब लौटकर वैकुण्ठ को गए तो अगले दिन पूरे लोक में दीप पर्व मनाया गया. माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष रक्षा बंधन से धनतेरस तक विष्णु लक्ष्मी संग राजा बलि के यहाँ रहते हैं और दीपोत्सव का अन्य कई कारणों संग एक कारण यह भी है..
आज भी जब किसी को रक्षा सूत्र बंधा जाता है तो यह मंत्र उच्चारित किया जाता है -
" ॐ एन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः
तेन त्वा मनुबधनानि रक्षे माचल माचल "
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9.9.10
2.2.10
लोकधर्म (अंतिम भाग )
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की अनुपम कृति "गोस्वामी तुलसीदास" से साभार :-
भक्त कहलानेवाले एक विशेष समुदाय के भीतर जिस समय यह उन्माद कुछ बढ़ रहा था , उस समय भक्तिमार्ग के भीतर ही एक ऐसी सात्त्विक ज्योति का उदय हुआ जिसके प्रकाश में लोकधर्म के छिन्नभिन्न होते हुए अंग भक्ति सूत्र के द्वारा ही फिर से जुड़े | चैतन्य महाप्रभु के भाव के प्रभाव के द्वारा बंगदेश ,अष्टछाप के कवियों के संगीत श्रोत के द्वारा उत्तर भारत में प्रेम की जो धारा बही ,उसने पंथवालो की परुष बचनावाली से सुखते हुए हृदयों को आर्द्र तो किया , पर वह आर्य शास्त्रानुमोदित लोकधर्म के माधुर्य की ओर आकर्षित न कर सकी | यह काम गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया | हिन्दू समाज में फैलाया हुआ विष उनके प्रभाव से चढ़ने न पाया | हिन्दू जनता अपने गौरवपूर्ण इतिहास को भुलाने , कई सहस्त्र वर्षो के संचित ज्ञानभंडार से वंचित रहने , अपने प्रातःस्मरणीय आदर्श पुरुषों के आलोक से दूर पड़ने से बच गयी | उसमें यह संस्कार न जमने पाया कि श्रद्धा और भक्ति के पात्र केवल सांसारिक कर्तव्यों से विमुख ,कर्ममार्ग से च्युत कोरे उपदेश देनेवाले ही हैं | उसके सामने यह फिर से अच्छी तरह झलका दिया गया कि संसार में चलते व्यापारों में मग्न ,अन्याय के दमन के अर्थ रणक्षेत्रों में अद्भुत पराक्रम दिखानेवाले , अत्याचार पर क्रोध से तिलमिलानेवाले , प्रभूत शक्तिसंपन्न होकर भी क्षमा करनेवाले अपने रूप ,गुण और शील से लोक का अनुरंजन करनेवाले ,मैत्री का निर्वाह करनेवाले , प्रजा का पुत्रवत पालन करनेवाले ,बड़ों की आज्ञा का आदर करनेवाले ,संपत्ति में नम्र रहनेवाले ,विपत्ति में धैर्य रखनेवाले प्रिय या अच्छे ही लगते हैं , यह बात नहीं है | वे भक्ति और श्रद्धा के प्रकृत आलंबन हैं , धर्म के दृढ प्रतीक हैं |
सूरदास आदि अष्टछाप के कवियों ने श्रीकृष्ण के श्रृंगारिक रूप के प्रत्यक्षीकरण द्वारा ' टेढ़ी सीधी निर्गुण वाणी ' की खिन्नता और शुष्कता को हटाकर जीवन की प्रफुल्लता का आभास तो दिया , भागवान के लोक -संग्रहकारी रूप का प्रकाश करके धर्म के सौंदर्य का साक्षात्कार नहीं कराया | कृष्णोपासक भक्तों के सामने राधाकृष्ण की प्रेमलीला ही रखी गयी , भगवान की लोकधर्म स्थापना का मनोहर चित्रण नहीं किया गया अधर्म और अन्याय से संलग्न वैभव और समृद्धि का जो विच्छेद उन्होंने कौरवों के विनाश द्वारा कराया , लोकधर्म से च्युत होते हुए अर्जुन को जिस प्रकार उन्होंने सँभाला ,शिशुपाल के प्रसंग में क्षमा और दंड की जो मर्यादा उन्होंने दिखाई , किसी प्रकार ध्वस्त न होनेवाले प्रबल अत्याचारी निराकरण की जिस नीति के अवलंबन की व्यवस्था उन्होंने जरासंध वध द्वारा की , उसका सौन्दर्य जनता के ह्रदय में अंकित नहीं किया गया | इससे असंस्कृत हृदयों में जाकर कृष्ण की श्रृंगारिक भावना ने विलासप्रियता का रूप धारण किया और समाज केवल नाच-कूद कर जी बहलाने के योग्य हुआ |
जहाँ लोकधर्म और व्यक्तिधर्म का विरोध हो वहाँ कर्ममार्गी गृहस्थी के लिए लोकधर्म का ही अवलंबन श्रेष्ठ है | यदि किसी अत्याचारी का दमन सीधे न्यायसंगत उपायों से नहीं हो सकता तो कुटिल नीति का अवलंबन लोकधर्म की दृष्टि से उचित है | किसी अत्याचारी द्वारा समाज को जो हानि पहुँच रही है ,उसके सामने वह हानि कुछ नहीं है जो किसी एक व्यक्ति के बुरे दृष्टान्त से होगी | लक्ष्य यदि व्यापक और श्रेष्ट है तो साधन का अनिवार्य अनौचित्य उतना खल नहीं सकता | भारतीय जनसमाज में लोकधर्म का यह आदर्श यदि पूर्ण रूप से प्रतिष्टित रहने पाता तो विदेशियों के आक्रमण को व्यर्थ करने में देश अधिक समर्थ होता |
रामचरित के सौन्दर्य द्वारा तुलसीदासजी ने जनता को लोकधर्म की ओर जो फिर से आकर्षित किया ,वह निष्फल नहीं हुआ | वैरागियों का सुधार चाहे उससे उतना न हुआ हो ,पर परोक्ष रूप में साधारण गृहस्थ जनता की प्रवृति का बहुत कुछ संस्कार हुआ | दक्षिण में रामदास स्वामी ने इसी लोकधर्माश्रित भक्ति का संचार करके महाराष्ट्र शक्ति का अभ्युदय किया | पीछे से सिखों ने भी लोकधर्म का आश्रय लिया ओर सिख शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ | हिन्दू जनता शिवाजी और गुरु गोविन्दसिंह को राम - कृष्ण के रूप में और औरंगजेब को रावण और कंस के रूप में देखने लगी | जहाँ लोक ने किसी को रावण और कंस के रूप में देखा कि भगवान के अवतार की संभावना हुई |
गोस्वामीजी ने यधपि भक्ति के साहचर्य से ज्ञान ,वैराग्य का भी निरूपण किया है और पूर्ण रूप से किया है , पर उनका सबसे अधिक उपकार गृहस्थों के उपर है जो अपनी प्रत्येक स्थिति में उन्हें पुकारकर कुछ कहते हुए पाते हैं और वह ' कुछ ' भी लोकव्यवहार के अंतर्गत है ,उसके बाहर नहीं | मान-अपमान से परे रहनेवाले संतों के लिए तो वे ' खल के वचन संत सह जैसे ' कहते हैं पर साधारण गृहस्थों के लिए सहिष्णुता के मर्यादा बाँधते हुए कहते हैं कि ' कतहूँ सुधाइहु तें बड़ दोषू ' | साधक और संसारी दोनों के भागों की ओर वे संकेत करते हैं | व्यक्तिगत सफलता के लिए जिसे 'नीति ' कहते हैं , सामाजिक आदर्श की सफलता का साधक होकर वह ' धर्म ' हो जाता है |
सारांश यह कि गोस्वामीजी से पूर्व तीन प्रकार के साधु समाज के बीच रमते दिखाई देते थे |एक तो प्राचीन परंपरा के भक्त जो प्रेम में मग्न होकर संसार को भूल रहे थे ,दुसरे वे जो अनधिकार ज्ञानगोष्टी द्वारा समाज के प्रतिष्ठित आदर्शों के प्रति तिरस्कार बुद्धि उत्पन्न कर रहे थे , और तीसरे वे जो हठयोग , रसायन आदि द्वारा अलौकिक सिद्धियों की व्यर्थ आशा का प्रचार कर रहे थे | इन तीनों वर्गों के द्वारा साधारण जनता के लोकधर्म पर आरूढ़ होने की संभावना कितनी दूर थी , यह कहने की आवश्यकता नहीं | आज जो हम फिर झोपड़ों में बैठे किसानों को भरत के 'भायप भाव ' पर , लक्ष्मन के त्याग पर ,राम की पितृभक्ति पर पुलकित होते हुए पाते है , वह गोस्वामीजी के ही प्रसाद से | धन्य है ग्राहस्थ्य जीवन में धर्मालोकस्वरुप रामचरित और धन्य हैं उस आलोक को घर घर पहुँचनेवाले तुलसीदास ! व्यावहारिक जीवन धर्म की ज्योति से एक बार फिर जगमगा उठा - उसमें नई शक्ति का संचार हुआ | जो कुछ भी नहीं जनता , वह भी यह जनता है कि -
जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी | तिनहिं बिलोकत पातक भारी | |
स्त्रियाँ और कोई धर्म जानें , या न जानें , पर वे वह धर्म जानती हैं जिससे संसार चलता है | उन्हें इस बात का विश्वास रहता है कि -
वृद्ध ,रोग बस ,जड़ ,धनहीना | अंध बधिर क्रोधी अति दीना ||
ऐसेहु पति कर किए अपमाना | नारि पाव जमपुर दुःख नाना ||
जिसमें बाहुबल है उसे यह समझ भी पैदा हो गयी है कि दुष्ट और अत्याचारी 'पृथ्वी के भार' हैं ; उस भार को उतारनेवाले भगवान के सच्चे सेवक हैं | प्रत्येक देहाती लठैत 'बजरंगबली ' की जयजयकार मानता है - कुम्भकर्ण की नहीं | गोस्वामीजी ने ' रामचरित - चिंतामणि ' को छोटे -बड़े सबके बीच बाँट दिया जिसके प्रभाव से हिन्दू समाज यदि चाहे -सच्चे जी से चाहे - तो सब कुछ प्राप्त कर सकता है|
भक्ति और प्रेम के पुटपाक द्वारा धर्म को रागात्मिका वृत्ति के साथ सम्मिश्रित करके बाबाजी ने एक ऐसा रसायन तैयार किया जिसके सेवन से धर्म मार्ग में कष्ट और श्रांति न जान पड़े ,आनन्द और उत्साह के साथ लोग आप से आप उसकी ओर प्रवृत हों , धरपकड़ और जबरदस्ती से नहीं | जिस धर्ममार्ग में कोरे उपदेशों से कष्ट ही कष्ट दिखाई पड़ता है , वह चरित्र - सौंदर्य के साक्षात्कार से आन्नदमय हो जाता है | मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति और निवृत्ति की दिशा को लिए हुए धर्म की जो लीक निकलती है , लोंगों के चलते - चलते चौड़ी होकर वह सीधा राजमार्ग हो सकती है ; जिसके सम्बन्ध में गोस्वामीजी कहते है -
' गुरु कह्यो राम भजन नीको मोहि लगत राजडगरो सो |'
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भक्त कहलानेवाले एक विशेष समुदाय के भीतर जिस समय यह उन्माद कुछ बढ़ रहा था , उस समय भक्तिमार्ग के भीतर ही एक ऐसी सात्त्विक ज्योति का उदय हुआ जिसके प्रकाश में लोकधर्म के छिन्नभिन्न होते हुए अंग भक्ति सूत्र के द्वारा ही फिर से जुड़े | चैतन्य महाप्रभु के भाव के प्रभाव के द्वारा बंगदेश ,अष्टछाप के कवियों के संगीत श्रोत के द्वारा उत्तर भारत में प्रेम की जो धारा बही ,उसने पंथवालो की परुष बचनावाली से सुखते हुए हृदयों को आर्द्र तो किया , पर वह आर्य शास्त्रानुमोदित लोकधर्म के माधुर्य की ओर आकर्षित न कर सकी | यह काम गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया | हिन्दू समाज में फैलाया हुआ विष उनके प्रभाव से चढ़ने न पाया | हिन्दू जनता अपने गौरवपूर्ण इतिहास को भुलाने , कई सहस्त्र वर्षो के संचित ज्ञानभंडार से वंचित रहने , अपने प्रातःस्मरणीय आदर्श पुरुषों के आलोक से दूर पड़ने से बच गयी | उसमें यह संस्कार न जमने पाया कि श्रद्धा और भक्ति के पात्र केवल सांसारिक कर्तव्यों से विमुख ,कर्ममार्ग से च्युत कोरे उपदेश देनेवाले ही हैं | उसके सामने यह फिर से अच्छी तरह झलका दिया गया कि संसार में चलते व्यापारों में मग्न ,अन्याय के दमन के अर्थ रणक्षेत्रों में अद्भुत पराक्रम दिखानेवाले , अत्याचार पर क्रोध से तिलमिलानेवाले , प्रभूत शक्तिसंपन्न होकर भी क्षमा करनेवाले अपने रूप ,गुण और शील से लोक का अनुरंजन करनेवाले ,मैत्री का निर्वाह करनेवाले , प्रजा का पुत्रवत पालन करनेवाले ,बड़ों की आज्ञा का आदर करनेवाले ,संपत्ति में नम्र रहनेवाले ,विपत्ति में धैर्य रखनेवाले प्रिय या अच्छे ही लगते हैं , यह बात नहीं है | वे भक्ति और श्रद्धा के प्रकृत आलंबन हैं , धर्म के दृढ प्रतीक हैं |
सूरदास आदि अष्टछाप के कवियों ने श्रीकृष्ण के श्रृंगारिक रूप के प्रत्यक्षीकरण द्वारा ' टेढ़ी सीधी निर्गुण वाणी ' की खिन्नता और शुष्कता को हटाकर जीवन की प्रफुल्लता का आभास तो दिया , भागवान के लोक -संग्रहकारी रूप का प्रकाश करके धर्म के सौंदर्य का साक्षात्कार नहीं कराया | कृष्णोपासक भक्तों के सामने राधाकृष्ण की प्रेमलीला ही रखी गयी , भगवान की लोकधर्म स्थापना का मनोहर चित्रण नहीं किया गया अधर्म और अन्याय से संलग्न वैभव और समृद्धि का जो विच्छेद उन्होंने कौरवों के विनाश द्वारा कराया , लोकधर्म से च्युत होते हुए अर्जुन को जिस प्रकार उन्होंने सँभाला ,शिशुपाल के प्रसंग में क्षमा और दंड की जो मर्यादा उन्होंने दिखाई , किसी प्रकार ध्वस्त न होनेवाले प्रबल अत्याचारी निराकरण की जिस नीति के अवलंबन की व्यवस्था उन्होंने जरासंध वध द्वारा की , उसका सौन्दर्य जनता के ह्रदय में अंकित नहीं किया गया | इससे असंस्कृत हृदयों में जाकर कृष्ण की श्रृंगारिक भावना ने विलासप्रियता का रूप धारण किया और समाज केवल नाच-कूद कर जी बहलाने के योग्य हुआ |
जहाँ लोकधर्म और व्यक्तिधर्म का विरोध हो वहाँ कर्ममार्गी गृहस्थी के लिए लोकधर्म का ही अवलंबन श्रेष्ठ है | यदि किसी अत्याचारी का दमन सीधे न्यायसंगत उपायों से नहीं हो सकता तो कुटिल नीति का अवलंबन लोकधर्म की दृष्टि से उचित है | किसी अत्याचारी द्वारा समाज को जो हानि पहुँच रही है ,उसके सामने वह हानि कुछ नहीं है जो किसी एक व्यक्ति के बुरे दृष्टान्त से होगी | लक्ष्य यदि व्यापक और श्रेष्ट है तो साधन का अनिवार्य अनौचित्य उतना खल नहीं सकता | भारतीय जनसमाज में लोकधर्म का यह आदर्श यदि पूर्ण रूप से प्रतिष्टित रहने पाता तो विदेशियों के आक्रमण को व्यर्थ करने में देश अधिक समर्थ होता |
रामचरित के सौन्दर्य द्वारा तुलसीदासजी ने जनता को लोकधर्म की ओर जो फिर से आकर्षित किया ,वह निष्फल नहीं हुआ | वैरागियों का सुधार चाहे उससे उतना न हुआ हो ,पर परोक्ष रूप में साधारण गृहस्थ जनता की प्रवृति का बहुत कुछ संस्कार हुआ | दक्षिण में रामदास स्वामी ने इसी लोकधर्माश्रित भक्ति का संचार करके महाराष्ट्र शक्ति का अभ्युदय किया | पीछे से सिखों ने भी लोकधर्म का आश्रय लिया ओर सिख शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ | हिन्दू जनता शिवाजी और गुरु गोविन्दसिंह को राम - कृष्ण के रूप में और औरंगजेब को रावण और कंस के रूप में देखने लगी | जहाँ लोक ने किसी को रावण और कंस के रूप में देखा कि भगवान के अवतार की संभावना हुई |
गोस्वामीजी ने यधपि भक्ति के साहचर्य से ज्ञान ,वैराग्य का भी निरूपण किया है और पूर्ण रूप से किया है , पर उनका सबसे अधिक उपकार गृहस्थों के उपर है जो अपनी प्रत्येक स्थिति में उन्हें पुकारकर कुछ कहते हुए पाते हैं और वह ' कुछ ' भी लोकव्यवहार के अंतर्गत है ,उसके बाहर नहीं | मान-अपमान से परे रहनेवाले संतों के लिए तो वे ' खल के वचन संत सह जैसे ' कहते हैं पर साधारण गृहस्थों के लिए सहिष्णुता के मर्यादा बाँधते हुए कहते हैं कि ' कतहूँ सुधाइहु तें बड़ दोषू ' | साधक और संसारी दोनों के भागों की ओर वे संकेत करते हैं | व्यक्तिगत सफलता के लिए जिसे 'नीति ' कहते हैं , सामाजिक आदर्श की सफलता का साधक होकर वह ' धर्म ' हो जाता है |
सारांश यह कि गोस्वामीजी से पूर्व तीन प्रकार के साधु समाज के बीच रमते दिखाई देते थे |एक तो प्राचीन परंपरा के भक्त जो प्रेम में मग्न होकर संसार को भूल रहे थे ,दुसरे वे जो अनधिकार ज्ञानगोष्टी द्वारा समाज के प्रतिष्ठित आदर्शों के प्रति तिरस्कार बुद्धि उत्पन्न कर रहे थे , और तीसरे वे जो हठयोग , रसायन आदि द्वारा अलौकिक सिद्धियों की व्यर्थ आशा का प्रचार कर रहे थे | इन तीनों वर्गों के द्वारा साधारण जनता के लोकधर्म पर आरूढ़ होने की संभावना कितनी दूर थी , यह कहने की आवश्यकता नहीं | आज जो हम फिर झोपड़ों में बैठे किसानों को भरत के 'भायप भाव ' पर , लक्ष्मन के त्याग पर ,राम की पितृभक्ति पर पुलकित होते हुए पाते है , वह गोस्वामीजी के ही प्रसाद से | धन्य है ग्राहस्थ्य जीवन में धर्मालोकस्वरुप रामचरित और धन्य हैं उस आलोक को घर घर पहुँचनेवाले तुलसीदास ! व्यावहारिक जीवन धर्म की ज्योति से एक बार फिर जगमगा उठा - उसमें नई शक्ति का संचार हुआ | जो कुछ भी नहीं जनता , वह भी यह जनता है कि -
जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी | तिनहिं बिलोकत पातक भारी | |
स्त्रियाँ और कोई धर्म जानें , या न जानें , पर वे वह धर्म जानती हैं जिससे संसार चलता है | उन्हें इस बात का विश्वास रहता है कि -
वृद्ध ,रोग बस ,जड़ ,धनहीना | अंध बधिर क्रोधी अति दीना ||
ऐसेहु पति कर किए अपमाना | नारि पाव जमपुर दुःख नाना ||
जिसमें बाहुबल है उसे यह समझ भी पैदा हो गयी है कि दुष्ट और अत्याचारी 'पृथ्वी के भार' हैं ; उस भार को उतारनेवाले भगवान के सच्चे सेवक हैं | प्रत्येक देहाती लठैत 'बजरंगबली ' की जयजयकार मानता है - कुम्भकर्ण की नहीं | गोस्वामीजी ने ' रामचरित - चिंतामणि ' को छोटे -बड़े सबके बीच बाँट दिया जिसके प्रभाव से हिन्दू समाज यदि चाहे -सच्चे जी से चाहे - तो सब कुछ प्राप्त कर सकता है|
भक्ति और प्रेम के पुटपाक द्वारा धर्म को रागात्मिका वृत्ति के साथ सम्मिश्रित करके बाबाजी ने एक ऐसा रसायन तैयार किया जिसके सेवन से धर्म मार्ग में कष्ट और श्रांति न जान पड़े ,आनन्द और उत्साह के साथ लोग आप से आप उसकी ओर प्रवृत हों , धरपकड़ और जबरदस्ती से नहीं | जिस धर्ममार्ग में कोरे उपदेशों से कष्ट ही कष्ट दिखाई पड़ता है , वह चरित्र - सौंदर्य के साक्षात्कार से आन्नदमय हो जाता है | मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति और निवृत्ति की दिशा को लिए हुए धर्म की जो लीक निकलती है , लोंगों के चलते - चलते चौड़ी होकर वह सीधा राजमार्ग हो सकती है ; जिसके सम्बन्ध में गोस्वामीजी कहते है -
' गुरु कह्यो राम भजन नीको मोहि लगत राजडगरो सो |'
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28.1.10
लोकधर्म (भाग - ३)
(आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की कृति "गोस्वामी तुलसीदास" से साभार)
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भक्ति के तत्व को हृदयंगम करने के लिए उसके विकास पर ध्यान देना आवश्यक है | अपने ज्ञान की परमिति के अनुभव के साथ साथ मनुष्य जाति आदिम काल से ही आत्मरक्षा के लिए परोक्ष शक्तियों की उपासना करती आई है |इन शक्तियों की भावना वह अपनी परिस्थिति के अनुरूप करती रही | दुखों से बचने का प्रयत्न जीवन का प्रथम प्रयत्न है | इन दुखों का आना न आना बिलकुल अपने हाथ में नहीं है, यह देखते ही मनुष्य ने उनको कुछ परोक्ष शक्तियों द्वारा प्रेरित समझा | अतः बलिदान आदि द्वारा उन्हें शांत और तुष्ट रखना उसे आवाश्यक दिखाई पडा | इस आदिम उपासना का मूल था, ' भय ' | जिन देवताओं की उपासना असभ्य दशा में प्रचलित हुई , वे "अनिष्टदेव " थे | आगे चलकर जब परिस्थिति ने दुःख निवारण मात्र से कुछ अधिक सुख की आकांक्षा का अवकाश दिया,तब साथ ही देवों के सुख समृद्धि विधायक रूप की प्रतिष्ठा हुई | यह 'इष्टा-निष्ट ' भावना बहुत काल तक रही | वैदिक देवताओं को हम इसी रूप में पाते हैं | वे पूजा पाने से प्रसन्न होकर धन धान्य , ऐश्वर्य, विजय सब कुछ देते थे, पूजा न पाने पर कोप करते थे और घोर अनिष्ट करते थे | ब्रज में गोपों ने जब इन्द्र की पूजा बंद कर दी थी, तब इन्द्र ने ऐसा ही कोप किया था | उसी काल से 'इष्टा-निष्ट' काल की समाप्ति माननी चाहिए |
समाज के पूर्ण रूप से सुव्यवस्थित हो जाने के साथ ही मनुष्य के कुछ आचरण लोक रक्षा के अनुकूल और कुछ प्रतिकूल दिखाई पड़ गए थे | 'इष्टानिष्ट' काल के पूर्व ही लोकधर्म और शील की प्रतिष्ठा समाज में हो चुकी थी,पर उनका सम्बन्ध प्रचलित देवताओं के साथ नहीं स्थापित हुआ था | देव गण धर्म और शील से प्रसन्न होने वाले, अधर्म और दुह्शीलता पर कोप करने वाले नहीं हुए थे, वे अपनी पूजा से प्रसन्न होने वाले और उस पूजा में त्रुटि से ही अप्रसन्न बने थे | ज्ञान मार्ग की ओर ब्रह्म का निरूपण बहुत पाले से ही हो चुका था,पर वह ब्रह्म लोकव्यवहार में तटस्थ था | लौकिक उपासना के योग्य वह नहीं था | धीरे धीरे उसके व्यवहारिक रूप ,सगुन रूप, की तीन रूपों में प्रतिष्ठित हुई - श्रष्टा , पालक और संहारक | उधर स्थितिरक्षा का विधान करने वाले धर्म और शील के नाना रूपों की अभिव्यक्ति पर जनता पूर्ण रूप से मुग्ध हो चुकी थी | उसने चट दया, दाक्षिन्य , क्षमा, उदारता, वत्सलता ,सुशीलता आदि उद्दात्त वृत्तियों का आरोप ब्रह्म के लोकपालक सगुन रूप में किया | लोक में ' इष्टदेव ' की प्रतिष्ठा हो गयी | नारायण वासुदेव के मंगलमय रूप का साक्षात्कार हुआ | जनसमाज आशा और आनंद से नाच उठा | भागवत धर्म का उदय हुआ | भगवान पृथ्वी का भार उतारने और धर्म की स्थापना करने लिए बार बार आते हुए साक्षात दिखाई पड़े | जिन गुणों से लोक की रक्षा होती है, जिन गुणों को देख हमारा ह्रदय प्रफुल्ल हो जाता है, उन गुणों को हम जिसमे देखें वही 'इष्टदेव' हैं - हमारे लिए वही सबसे बड़ा है-
तुलसी जप तप नेम व्रत सब सबहीं ते होई |
लहेइ बड़ाई देवता 'इष्टदेव' जब होई ||
इष्टदेव भगवान के स्वरुप के अंतर्गत केवल उनका दया - दाक्षिन्य ही नहीं असाध्य दुष्टों के संहार की उनकी अपरिमित शक्ति और लोकमर्यादा पालन भी है |
भक्ति का यह मार्ग बहुत प्राचीन है | जिसे रूखे ढंग से 'उपासना 'कहते हैं, उसी ने व्यक्ति की रागात्मक सत्ता के भीतर प्रेमपरिपुष्ट होकर 'भक्ति' का रूप धारण किया है | व्यष्टिरूप में प्रत्येक मनुष्य के और समशिष्टरूप में मनुष्य जाति के सारे प्रयत्नों का लक्ष्य स्थितिरक्षा है | अतः इश्वरत्व के तीन रूपों में स्थिति -विधायक रूप ही भक्ति का आलंबन हुआ | विष्णु या वासुदेव की उपासना ही मनुष्य के रितिभाव को अपने साथ लगाकर भक्ति की परम अवस्था को पहुँच सकी | या यों कहिए की भक्ति की ज्योति का पूर्ण प्रकाश वैष्णवों में ही हुआ|
तुलसीदास के समय में दो प्रकार के भक्त पाए जाते थे | एक तो प्राचीन परंपरा के रामकृष्णोपासक जो वेदशास्त्रज्ञ तत्वदर्शी आचार्यों द्वारा प्रवर्तित सम्प्रदायों के अनुयायी थे ; जो अपने उपदेशों में दर्शन ,इतिहास ,पुराण आदि के प्रसंग लाते थे | दुसरे वे जो समाजव्यवस्था की निंदा और पूज्य तथा सम्मानित व्यक्तियों के उपहास द्वारा लोंगों को आकर्षित करते थे | समाज की व्यवस्था में कुछ विकार आ जाने से ऐसे लोगों के लिए अच्छा मैंदान हो जाता है | समाज के बीच शासकों ,कुलीनों ,श्रीमानों , विद्वानों ,शूरवीरों ,आचार्यों इत्यादि को आवश्यक अधिकार और सम्मान कुछ अधिक प्राप्त रहता है ; अतः ऐसे लोगों को भी कुछ संख्या सदा रहती है जो उन्हें अकारण ईर्ष्या और द्वेष की दृष्टि से देखते हैं और उन्हें नीचा दिखाकर अपने अहंकार को तुष्ट करने की ताक में रहते हैं |अतः उक्त शिष्ट वर्गों में कोई दोष न रहने पर भी उनमें दोषोद्भावना करके कोई चलतेपुरजे का आदमी ऐसे लोगों को संग में लगाकर 'प्रवर्तक ' 'अगुआ ' महात्मा ' आदि होने का डंका पीट सकता है| यदि दोष सचमुच हुआ तो फिर क्या कहना | सुधार की सच्ची इच्छा रखनेवाले दो चार होगें, तो ऐसे लोक पच्चीस | किसी समुदाय के मद , मत्सर ,ईर्ष्या , द्वेष और अहंकार को काम में लाकर "अगुआ ' प्रवर्तक ' बनने का हौसला रखनेवाला समाज के शत्रु हैं |
योरप में जो सामाजिक अशांति चली आ रही है , वह बहुत कुछ ऐसे ही लोगों के कारण | पूर्वीय देशों की अपेक्षा संघनिर्माण में अधिक कुशल होने के कारण वे अपने व्यवसाय में बहुत जल्दी सफलता प्राप्त कर लेते हैं | योरप में जितने लोक -विप्लव हुए हैं , जितनी राजहत्या ,नरहत्या हुई है , सबमें जनता के वास्तविक दुःख और क्लेश का भाग यदि १/३ था तो विशेष जनसमुदाय की नीच ''प्रवृत्तियों का भाग २/३ | 'क्रांतिकारक ' 'प्रवर्तक ' आदि कहलाने का उन्माद योरप में बहुत अधिक है ,इन्हीं उन्मादियों के हाथ में पड़कर वहाँ का समाज छिन्नभिन्न हो रहा है | अभी थोड़े दिन हुए ; एक मेम साहब पति -पत्नी के साथ के सम्बन्ध पर व्याख्यान देती फिरती थीं की कोई आवश्यकता नहीं है स्त्री पति के घर में ही रहे |
क्रमशः :-
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भक्ति के तत्व को हृदयंगम करने के लिए उसके विकास पर ध्यान देना आवश्यक है | अपने ज्ञान की परमिति के अनुभव के साथ साथ मनुष्य जाति आदिम काल से ही आत्मरक्षा के लिए परोक्ष शक्तियों की उपासना करती आई है |इन शक्तियों की भावना वह अपनी परिस्थिति के अनुरूप करती रही | दुखों से बचने का प्रयत्न जीवन का प्रथम प्रयत्न है | इन दुखों का आना न आना बिलकुल अपने हाथ में नहीं है, यह देखते ही मनुष्य ने उनको कुछ परोक्ष शक्तियों द्वारा प्रेरित समझा | अतः बलिदान आदि द्वारा उन्हें शांत और तुष्ट रखना उसे आवाश्यक दिखाई पडा | इस आदिम उपासना का मूल था, ' भय ' | जिन देवताओं की उपासना असभ्य दशा में प्रचलित हुई , वे "अनिष्टदेव " थे | आगे चलकर जब परिस्थिति ने दुःख निवारण मात्र से कुछ अधिक सुख की आकांक्षा का अवकाश दिया,तब साथ ही देवों के सुख समृद्धि विधायक रूप की प्रतिष्ठा हुई | यह 'इष्टा-निष्ट ' भावना बहुत काल तक रही | वैदिक देवताओं को हम इसी रूप में पाते हैं | वे पूजा पाने से प्रसन्न होकर धन धान्य , ऐश्वर्य, विजय सब कुछ देते थे, पूजा न पाने पर कोप करते थे और घोर अनिष्ट करते थे | ब्रज में गोपों ने जब इन्द्र की पूजा बंद कर दी थी, तब इन्द्र ने ऐसा ही कोप किया था | उसी काल से 'इष्टा-निष्ट' काल की समाप्ति माननी चाहिए |
समाज के पूर्ण रूप से सुव्यवस्थित हो जाने के साथ ही मनुष्य के कुछ आचरण लोक रक्षा के अनुकूल और कुछ प्रतिकूल दिखाई पड़ गए थे | 'इष्टानिष्ट' काल के पूर्व ही लोकधर्म और शील की प्रतिष्ठा समाज में हो चुकी थी,पर उनका सम्बन्ध प्रचलित देवताओं के साथ नहीं स्थापित हुआ था | देव गण धर्म और शील से प्रसन्न होने वाले, अधर्म और दुह्शीलता पर कोप करने वाले नहीं हुए थे, वे अपनी पूजा से प्रसन्न होने वाले और उस पूजा में त्रुटि से ही अप्रसन्न बने थे | ज्ञान मार्ग की ओर ब्रह्म का निरूपण बहुत पाले से ही हो चुका था,पर वह ब्रह्म लोकव्यवहार में तटस्थ था | लौकिक उपासना के योग्य वह नहीं था | धीरे धीरे उसके व्यवहारिक रूप ,सगुन रूप, की तीन रूपों में प्रतिष्ठित हुई - श्रष्टा , पालक और संहारक | उधर स्थितिरक्षा का विधान करने वाले धर्म और शील के नाना रूपों की अभिव्यक्ति पर जनता पूर्ण रूप से मुग्ध हो चुकी थी | उसने चट दया, दाक्षिन्य , क्षमा, उदारता, वत्सलता ,सुशीलता आदि उद्दात्त वृत्तियों का आरोप ब्रह्म के लोकपालक सगुन रूप में किया | लोक में ' इष्टदेव ' की प्रतिष्ठा हो गयी | नारायण वासुदेव के मंगलमय रूप का साक्षात्कार हुआ | जनसमाज आशा और आनंद से नाच उठा | भागवत धर्म का उदय हुआ | भगवान पृथ्वी का भार उतारने और धर्म की स्थापना करने लिए बार बार आते हुए साक्षात दिखाई पड़े | जिन गुणों से लोक की रक्षा होती है, जिन गुणों को देख हमारा ह्रदय प्रफुल्ल हो जाता है, उन गुणों को हम जिसमे देखें वही 'इष्टदेव' हैं - हमारे लिए वही सबसे बड़ा है-
तुलसी जप तप नेम व्रत सब सबहीं ते होई |
लहेइ बड़ाई देवता 'इष्टदेव' जब होई ||
इष्टदेव भगवान के स्वरुप के अंतर्गत केवल उनका दया - दाक्षिन्य ही नहीं असाध्य दुष्टों के संहार की उनकी अपरिमित शक्ति और लोकमर्यादा पालन भी है |
भक्ति का यह मार्ग बहुत प्राचीन है | जिसे रूखे ढंग से 'उपासना 'कहते हैं, उसी ने व्यक्ति की रागात्मक सत्ता के भीतर प्रेमपरिपुष्ट होकर 'भक्ति' का रूप धारण किया है | व्यष्टिरूप में प्रत्येक मनुष्य के और समशिष्टरूप में मनुष्य जाति के सारे प्रयत्नों का लक्ष्य स्थितिरक्षा है | अतः इश्वरत्व के तीन रूपों में स्थिति -विधायक रूप ही भक्ति का आलंबन हुआ | विष्णु या वासुदेव की उपासना ही मनुष्य के रितिभाव को अपने साथ लगाकर भक्ति की परम अवस्था को पहुँच सकी | या यों कहिए की भक्ति की ज्योति का पूर्ण प्रकाश वैष्णवों में ही हुआ|
तुलसीदास के समय में दो प्रकार के भक्त पाए जाते थे | एक तो प्राचीन परंपरा के रामकृष्णोपासक जो वेदशास्त्रज्ञ तत्वदर्शी आचार्यों द्वारा प्रवर्तित सम्प्रदायों के अनुयायी थे ; जो अपने उपदेशों में दर्शन ,इतिहास ,पुराण आदि के प्रसंग लाते थे | दुसरे वे जो समाजव्यवस्था की निंदा और पूज्य तथा सम्मानित व्यक्तियों के उपहास द्वारा लोंगों को आकर्षित करते थे | समाज की व्यवस्था में कुछ विकार आ जाने से ऐसे लोगों के लिए अच्छा मैंदान हो जाता है | समाज के बीच शासकों ,कुलीनों ,श्रीमानों , विद्वानों ,शूरवीरों ,आचार्यों इत्यादि को आवश्यक अधिकार और सम्मान कुछ अधिक प्राप्त रहता है ; अतः ऐसे लोगों को भी कुछ संख्या सदा रहती है जो उन्हें अकारण ईर्ष्या और द्वेष की दृष्टि से देखते हैं और उन्हें नीचा दिखाकर अपने अहंकार को तुष्ट करने की ताक में रहते हैं |अतः उक्त शिष्ट वर्गों में कोई दोष न रहने पर भी उनमें दोषोद्भावना करके कोई चलतेपुरजे का आदमी ऐसे लोगों को संग में लगाकर 'प्रवर्तक ' 'अगुआ ' महात्मा ' आदि होने का डंका पीट सकता है| यदि दोष सचमुच हुआ तो फिर क्या कहना | सुधार की सच्ची इच्छा रखनेवाले दो चार होगें, तो ऐसे लोक पच्चीस | किसी समुदाय के मद , मत्सर ,ईर्ष्या , द्वेष और अहंकार को काम में लाकर "अगुआ ' प्रवर्तक ' बनने का हौसला रखनेवाला समाज के शत्रु हैं |
योरप में जो सामाजिक अशांति चली आ रही है , वह बहुत कुछ ऐसे ही लोगों के कारण | पूर्वीय देशों की अपेक्षा संघनिर्माण में अधिक कुशल होने के कारण वे अपने व्यवसाय में बहुत जल्दी सफलता प्राप्त कर लेते हैं | योरप में जितने लोक -विप्लव हुए हैं , जितनी राजहत्या ,नरहत्या हुई है , सबमें जनता के वास्तविक दुःख और क्लेश का भाग यदि १/३ था तो विशेष जनसमुदाय की नीच ''प्रवृत्तियों का भाग २/३ | 'क्रांतिकारक ' 'प्रवर्तक ' आदि कहलाने का उन्माद योरप में बहुत अधिक है ,इन्हीं उन्मादियों के हाथ में पड़कर वहाँ का समाज छिन्नभिन्न हो रहा है | अभी थोड़े दिन हुए ; एक मेम साहब पति -पत्नी के साथ के सम्बन्ध पर व्याख्यान देती फिरती थीं की कोई आवश्यकता नहीं है स्त्री पति के घर में ही रहे |
क्रमशः :-
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24.9.09
सिंदूरदान (एक पौराणिक आख्यान) भाग - 2
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गतांक से आगे...
परन्तु क्या यह सब इतना ही सहज था..एक ओर तो क्षोभग्रस्त महारानी लज्जा शोक और पापबोध से घुली जा रही थीं, तो दूसरी ओर कणाद भी मोह और विवेक के मध्य छिड़े गहन द्वंद में घिरा अपना मत और करनीय स्थिर करने में स्वयं को सर्वथा असमर्थ पा रहा था.सरोवर सुन्दरी के आलौकिक सौन्दर्य को विस्मृत कर पाना उसके लिए असंभव हो रहा था.स्मृतिपटल पर अवस्थित वह दृश्य उसे उदिग्न कर दिया करता... सदैव ही उसे आभास होता जैसे वह निष्कलुष सौन्दर्य उसे अपने भुजपाश में आबद्ध होने को प्रतिपल प्रणय निवेदन भेज रहा है.
मोहग्रस्त कणाद कभी तो दर्पण के सम्मुख बैठ विभिन्न प्रकार से अपना श्रृंगार करता, अपनी ही छवि पर मुग्ध होता परन्तु जैसे ही विवेक उसे झकझोर उस पर अट्टहास करता ,वह स्वयं को दण्डित करने लगता. विछिप्त सी हो गयी थी उसकी स्थिति..आर्या गांधारी समस्त उपक्रम देख समझ रही थी,परन्तु कुछ भी कर पाने में वह असमर्थ थी. न तो वे महारानी का सत्य उद्घाटित कर सकतीं थीं न ही शिष्य की भ्रमित बुद्धि पर उनकी धर्मदेशना का किंचित भी प्रभाव पड़ रहा था...दुश्चिंताओं में घिरी आर्या के सम्मुख आचार्यवर के पुनरागमन के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प न रह गया था.महारानी को तो उन्होंने समझा लिया था परन्तु कणाद के सम्पूर्ण गतिविधियों पर दृष्टि रखने के अतिरिक्त उनके पास अन्य कोई साधन न था...
असह्य प्रतीक्षा का वह दीर्घ अन्तराल अंततः समाप्त हुआ और आचार्य के आगमन के साथ ही आर्या गांधारी के व्याकुल मन ने कई दिनों उपरांत अवलंबन पाया . अधीरता से वे रात्रि के एकान्तवेला की प्रतीक्षा करने लगी , जबकि वे आचार्यवर को समस्त वृतांत बता पातीं और इस घोर संकट से मुक्ति का मार्ग संधान वे कर पाते ...
उधर अपने सहपाठियों का संग पा कणाद पुनः प्रफ्फुलित हो गया था.समस्त शिष्य अतिउत्साहित हो यात्रा वृतांत कणाद को सुना रहे थे. परन्तु जो वृतांत कणाद के पास था वह तो अकल्पनीय ही था सबके लिए.. कणाद ने अनुमानित किया था कि ऋषिप्रसाद में गोपनीय ढंग से निवास करने वाली वह अप्सरा कोई ऋषि कन्या ही थी. अंत्यंत उत्साहित हो उसने अपने सहपाठियों को समस्त वृतांत तथा अनुमानित ऋषि कन्या के अनिर्वचनीय अनिद्य सौन्दर्य की विरुदावली सुनाई...
फिर क्या था, कणाद का मोह ऐसे विस्तृत हुआ कि उसके चुम्बकीय प्रभाव में अन्यान्य छात्र भी आ गए और उनके मध्य वाक् युद्ध प्रारंभ हो गया. सभी स्वयं को श्रेष्ठ घोषित कर पाणिग्रहण हेतु स्वयं को उस कन्या का अधिकारी ठहरा रहे थे.ज्येष्ठ शिष्य ने अपने ज्येष्ठता का कारण दिया तो कणाद ने अपने सर्वप्रथम दर्शन और प्रेम का. इसके साथ ही रमणी पर अधिकार हेतु किसी ने अपने बल का तो किसी ने अपने सौन्दर्य का और किसी ने धन का आधार स्थापित किया. आपसी सद्भाव सौहाद्र भाव तिरोहित हो मोह और इर्ष्या ने परस्पर सबको एक दूसरे का प्रबल प्रतिद्वंदी तथा शत्रु बना दिया था...
इस तथ्य से सभी भली भांति परिचित थे कि आचार्य विद्याध्यन के मध्य ब्रह्मचर्य व्रत खण्डित कर गृहस्थ स्थापना की आज्ञां कदापि न देंगे. सो गुरुवर संग किसी प्रकार की मंत्रणा किये या उनकी आज्ञा बिना ही समस्त शिष्य अपने अभिभावकों से विवाह का अनुज्ञान पाने आचार्यवर के नाम एक पत्र छोड़ कर स्वगृह को प्रस्थान कर गए. प्रातःकाल रिक्त संघाराम ने पूर्व से ही दुर्घटना से मर्माहत आचार्य और देवी गांधारी के ह्रदय पर मानों तुषारपात सा कर उन्हें दुःख के सागर में आकंठ निमग्न कर दिया. शोक संतप्त आर्या अपने पुत्रवत शिष्यों के मोह-ग्रस्त अवस्था का ध्यान कर उनका पतन लक्ष्य कर आहत हो विलाप करने लगी.
आचार्य खालित आहत अवश्य थे परन्तु निराश न थे..उन्हें अपनी दी हुई शिक्षा और शिष्यों के सुसंस्कार पर पूर्ण विश्वास था. भग्नहृदया भगिनी को उन्होंने आश्वस्त किया कि कुलीन शिष्यगणों की वर्तमान मनोदशा वयजनित विभ्रम है जो कि नितांत ही क्षणिक है,जैसे ही उनका विवेक जागृत होगा, पश्चात्ताप की अग्नि में शुद्ध हो वे पुनः अपने सुसंस्कार और कर्तब्य का सर्वोत्कृष्ट रूप से वहन करेंगे.... क्षात्रावास में उनका विद्याध्यन हेतु पुनरागमन अवश्यम्भावी है.वस्तुतः विधाता रचित इस घटना के पीछे भी छुपा हुआ उनका कल्याणकारी महत उद्देश्य ही है..दिव्य द्रष्टा आचार्यवर के धीर गंभीर आशापूर्ण वचनों ने आर्या के दग्ध ह्रदय को अनिर्वचनीय शीतलता प्रदान की..
इधर महारानी के गृहत्याग उपरांत क्रोध शांत होने पर जब कोशल नरेश को अपने अकरणीय का आभास हुआ तो वे विह्वल हो उठे और उन्होंने राज्य में चहुँ ओर महारानी का संधान आरम्भ कर दिया..परन्तु सब ओर से उन्हें निराशा ही मिली..निराशा पश्चात्ताप और वियोग महाराजा के दग्ध ह्रदय में हविष्याग्नि बन विरह ज्वाला को और भी उग्र कर दिया करते थे....अंततः चहुँ ओर से निराशा प्राप्ति उपरांत अब नृप के सम्मुख महारानी के संधान हेतु आचार्य के दिव्य ज्ञान का सहयोग लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प न था..
शोक क्षोभ से विह्वल नरेश आश्रम में उपस्थित हो आचार्यवर के सम्मुख व्याकुल भाव से रुदन करने लगे...परन्तु उन्हें कहाँ आभास था कि जिस अभिलाषा से वे आश्रम में उपस्थित हुए हैं, उनका अभीष्ट तो वहीँ सुरक्षित है.जैसे ही उनके सम्मुख यह रहस्योद्घाटन हुआ कोशल नरेश आभारनत हो आचार्यद्वय के चरणों में नतमस्तक हो गए....
दंपत्ति का पुनर्मिलन आह्लाद को भी आह्लादित करने वाला हुआ.परन्तु आचार्यवर ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए नरेश से कहा कि उन्हें उनकी भार्या तभी प्राप्त होगी जब कि वे अग्नि के सम्मुख पवित्र वैदिक मंत्रों के साथ सप्त वचन लेंगे और अग्निदेव को साक्षी मान महारानी की मांग में सिन्दूर भरेंगे...
पवित्र वैदिक मंत्रों संग महारानी का सिंदूरदान संपन्न हुआ.पतिपत्नी ने गृहस्थ धर्म की मर्यादा और अक्षुणता हेतु समस्त देवी देवताओं को साक्षी रख मृत्युपर्यंत एक दूसरे के प्रति प्रेम ,निष्ठां , मर्यादा, आदर और सेवा का शपथ लिया और तभी से परंपरा में सिंदूरदान नाम की इस पावन परंपरा का श्रीगणेश हुआ. सौभाग्य सिन्दूर विवाहित तथा अविवाहित स्त्री के मध्य अंतर स्थापित करने वाला सुगम साधन ही नहीं, स्त्री की मान रक्षा तथा पति के कर्तब्यबोध का सफल वाहक भी बन गया.
पुत्रीवत महारानी को पतिगृह विदा करते आचार्य वर तथा आर्या गांधारी का ह्रदय विह्वल हो उठा,परन्तु उसके सुखी जीवन के आभास और अभिलाषा ने उन्हें परम संतुष्टि और अनिर्वचनीय आनंद भी दिया..
महरानी के गमनोपरांत जब शिष्यगण अपने अभिभावकों से पाणिग्रहण हेतु सहमति ले आश्रम में उपस्थित हुए तो वहां की साज-सज्जा और विवाह वेदी देख अनिष्ट की आशंका से उनका मन विचलित होने लगा. सशंकित ह्रदय वे सभी आर्या तथा आचार्य के सम्मुख उपस्थित हुए तथा अपनी धृष्टता के लिए क्षमायाचना करते हुए अपना प्रयोजन स्पष्ट किया..अपना-अपना पक्ष रखते हुए सबने उस ऋषिकन्या पर अपना अधिकार स्थापित किया तथा पाणिग्रहण की अनुमति मांगी .
आचार्य कुछ पल को तो शांत भाव से समस्त अघटित देखते रहे,यकायक भीषण चीत्कार के साथ उठ खड़े हुए..उस भीषण वज्र ध्वनि ने सभी शिष्यों को स्तब्ध कर दिया.सभी निष्पलक निर्मिमेष दृष्टि से आचार्यवर को देखने लगे...और जैसे ही आचार्यवर ने महारानी का सत्य उनके सम्मुख उद्घाटित किया, लज्जा ग्लानि और पापबोध ने उन्हें विक्षिप्त सा कर दिया...जिन्हें वे अबतक एक कुंवारी ऋषिकन्या मान रहे थे ,वह तो परम वन्दनीय महारानी थीं. क्षणमात्र में मोह तिरोहित हो गया और आत्मग्लानि की भीषण ज्वाला में उनका कोमल ह्रदय दग्ध होने लगा..आचार्यवर के चरणों में भूलुंठित शिष्य अपने इस निकृष्ट कुकृत्य हेतु प्राणदंड की याचना करने लगे.
आचार्यवर ने कठोर शब्दों में उन्हें सावधान किया कि इस घोरतम पाप के लिए उन्हें दंड तो अवश्य मिलेगा परन्तु दंड की उद्घोषणा अगले दिन प्रातः काल की जायेगी इस अवधि-मध्य यदि कोई क्षात्र दंडमुक्ति की अभिलाषा रखता हो तो बिना आज्ञा, आश्रम छोड़कर जा सकता है..
कठोरतम दंड का आश्वासन पा शिष्यों ने मानों नूतन जीवन का आधार पाया था..अत्यंत अधीरतापूर्वक वे उषा काल की प्रतीक्षा करने लगे.अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत पहले ही नित्यक्रिया से निवृत हो वे आचार्यवर के कक्ष के सम्मुख उपस्थित हो गए.
शिष्यों की प्रतिबद्धता ने आचार्यवर को परम सुख और संतोष दिया. पश्चात्ताप की जिस अग्नि में इतने काल तक वे जले थे, उसमे से उनका ह्रदय विशुद्ध कंचन बन बाहर आ गया था.अब इससे बड़ा दंड और क्या हो सकता था कि जीवन भर वे अपने इस अकरणीय से शिक्षा ले मोह बंधन से मुक्त रहते. आचार्यवर ने उन्हें दंडमुक्त कर परम ज्ञान का वह उपदेश दिया जो उनके शिक्षण समाप्ति के पूर्व उन्हें प्राप्त होता. इसके साथ ही आचार्यवर ने अपने इन परमज्ञानी शिष्यों को विश्व कल्याण हेतु ज्ञान प्रसार की आज्ञा दे समाज के बीच भेज दिया..
सर्वविदित है कि महर्षि गौतम, कपिल, जैमिनी, पतंजलि, व्यास और कणाद ने ज्ञान रूपी वह धरोहर विश्व को सौंपी है जो सृष्टि के अंत तक संसार का मार्गदर्शन करती रहेंगी....
(हिंदी साहित्य के सिद्ध हस्ताक्षर, परम आदरणीय श्री रामेश्वर प्रसाद सिंह की ह्रदय से आभारी हूँ,जिनके पुराणों,जैन तथा बौद्ध ग्रंथों के गहन अध्ययन अन्वेश्नोपरांत लिखित महान आध्यात्मिक ऐतिहासिक उपन्यास " पाटलीपुत्र की राजनर्तकी " के अध्ययन क्रम में इस प्रसंग से अवगत होने का सौभाग्य मिला...
उक्त पुस्तक में तो यह प्रसंग अत्यंत विस्तृत रूप में उल्लिखित है,मैंने उसके साररूप को अपने शब्दों में ढाल यहाँ प्रेषित करने का प्रयास किया है.चूँकि यह प्रसंग मेरे लिए सर्वथा नवीन एवं रोमांचक था,सो मैंने सार्वजानिक स्थल पर इसे सर्वसुलभ करने का निर्णय लिया. )
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गतांक से आगे...
परन्तु क्या यह सब इतना ही सहज था..एक ओर तो क्षोभग्रस्त महारानी लज्जा शोक और पापबोध से घुली जा रही थीं, तो दूसरी ओर कणाद भी मोह और विवेक के मध्य छिड़े गहन द्वंद में घिरा अपना मत और करनीय स्थिर करने में स्वयं को सर्वथा असमर्थ पा रहा था.सरोवर सुन्दरी के आलौकिक सौन्दर्य को विस्मृत कर पाना उसके लिए असंभव हो रहा था.स्मृतिपटल पर अवस्थित वह दृश्य उसे उदिग्न कर दिया करता... सदैव ही उसे आभास होता जैसे वह निष्कलुष सौन्दर्य उसे अपने भुजपाश में आबद्ध होने को प्रतिपल प्रणय निवेदन भेज रहा है.
मोहग्रस्त कणाद कभी तो दर्पण के सम्मुख बैठ विभिन्न प्रकार से अपना श्रृंगार करता, अपनी ही छवि पर मुग्ध होता परन्तु जैसे ही विवेक उसे झकझोर उस पर अट्टहास करता ,वह स्वयं को दण्डित करने लगता. विछिप्त सी हो गयी थी उसकी स्थिति..आर्या गांधारी समस्त उपक्रम देख समझ रही थी,परन्तु कुछ भी कर पाने में वह असमर्थ थी. न तो वे महारानी का सत्य उद्घाटित कर सकतीं थीं न ही शिष्य की भ्रमित बुद्धि पर उनकी धर्मदेशना का किंचित भी प्रभाव पड़ रहा था...दुश्चिंताओं में घिरी आर्या के सम्मुख आचार्यवर के पुनरागमन के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प न रह गया था.महारानी को तो उन्होंने समझा लिया था परन्तु कणाद के सम्पूर्ण गतिविधियों पर दृष्टि रखने के अतिरिक्त उनके पास अन्य कोई साधन न था...
असह्य प्रतीक्षा का वह दीर्घ अन्तराल अंततः समाप्त हुआ और आचार्य के आगमन के साथ ही आर्या गांधारी के व्याकुल मन ने कई दिनों उपरांत अवलंबन पाया . अधीरता से वे रात्रि के एकान्तवेला की प्रतीक्षा करने लगी , जबकि वे आचार्यवर को समस्त वृतांत बता पातीं और इस घोर संकट से मुक्ति का मार्ग संधान वे कर पाते ...
उधर अपने सहपाठियों का संग पा कणाद पुनः प्रफ्फुलित हो गया था.समस्त शिष्य अतिउत्साहित हो यात्रा वृतांत कणाद को सुना रहे थे. परन्तु जो वृतांत कणाद के पास था वह तो अकल्पनीय ही था सबके लिए.. कणाद ने अनुमानित किया था कि ऋषिप्रसाद में गोपनीय ढंग से निवास करने वाली वह अप्सरा कोई ऋषि कन्या ही थी. अंत्यंत उत्साहित हो उसने अपने सहपाठियों को समस्त वृतांत तथा अनुमानित ऋषि कन्या के अनिर्वचनीय अनिद्य सौन्दर्य की विरुदावली सुनाई...
फिर क्या था, कणाद का मोह ऐसे विस्तृत हुआ कि उसके चुम्बकीय प्रभाव में अन्यान्य छात्र भी आ गए और उनके मध्य वाक् युद्ध प्रारंभ हो गया. सभी स्वयं को श्रेष्ठ घोषित कर पाणिग्रहण हेतु स्वयं को उस कन्या का अधिकारी ठहरा रहे थे.ज्येष्ठ शिष्य ने अपने ज्येष्ठता का कारण दिया तो कणाद ने अपने सर्वप्रथम दर्शन और प्रेम का. इसके साथ ही रमणी पर अधिकार हेतु किसी ने अपने बल का तो किसी ने अपने सौन्दर्य का और किसी ने धन का आधार स्थापित किया. आपसी सद्भाव सौहाद्र भाव तिरोहित हो मोह और इर्ष्या ने परस्पर सबको एक दूसरे का प्रबल प्रतिद्वंदी तथा शत्रु बना दिया था...
इस तथ्य से सभी भली भांति परिचित थे कि आचार्य विद्याध्यन के मध्य ब्रह्मचर्य व्रत खण्डित कर गृहस्थ स्थापना की आज्ञां कदापि न देंगे. सो गुरुवर संग किसी प्रकार की मंत्रणा किये या उनकी आज्ञा बिना ही समस्त शिष्य अपने अभिभावकों से विवाह का अनुज्ञान पाने आचार्यवर के नाम एक पत्र छोड़ कर स्वगृह को प्रस्थान कर गए. प्रातःकाल रिक्त संघाराम ने पूर्व से ही दुर्घटना से मर्माहत आचार्य और देवी गांधारी के ह्रदय पर मानों तुषारपात सा कर उन्हें दुःख के सागर में आकंठ निमग्न कर दिया. शोक संतप्त आर्या अपने पुत्रवत शिष्यों के मोह-ग्रस्त अवस्था का ध्यान कर उनका पतन लक्ष्य कर आहत हो विलाप करने लगी.
आचार्य खालित आहत अवश्य थे परन्तु निराश न थे..उन्हें अपनी दी हुई शिक्षा और शिष्यों के सुसंस्कार पर पूर्ण विश्वास था. भग्नहृदया भगिनी को उन्होंने आश्वस्त किया कि कुलीन शिष्यगणों की वर्तमान मनोदशा वयजनित विभ्रम है जो कि नितांत ही क्षणिक है,जैसे ही उनका विवेक जागृत होगा, पश्चात्ताप की अग्नि में शुद्ध हो वे पुनः अपने सुसंस्कार और कर्तब्य का सर्वोत्कृष्ट रूप से वहन करेंगे.... क्षात्रावास में उनका विद्याध्यन हेतु पुनरागमन अवश्यम्भावी है.वस्तुतः विधाता रचित इस घटना के पीछे भी छुपा हुआ उनका कल्याणकारी महत उद्देश्य ही है..दिव्य द्रष्टा आचार्यवर के धीर गंभीर आशापूर्ण वचनों ने आर्या के दग्ध ह्रदय को अनिर्वचनीय शीतलता प्रदान की..
इधर महारानी के गृहत्याग उपरांत क्रोध शांत होने पर जब कोशल नरेश को अपने अकरणीय का आभास हुआ तो वे विह्वल हो उठे और उन्होंने राज्य में चहुँ ओर महारानी का संधान आरम्भ कर दिया..परन्तु सब ओर से उन्हें निराशा ही मिली..निराशा पश्चात्ताप और वियोग महाराजा के दग्ध ह्रदय में हविष्याग्नि बन विरह ज्वाला को और भी उग्र कर दिया करते थे....अंततः चहुँ ओर से निराशा प्राप्ति उपरांत अब नृप के सम्मुख महारानी के संधान हेतु आचार्य के दिव्य ज्ञान का सहयोग लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प न था..
शोक क्षोभ से विह्वल नरेश आश्रम में उपस्थित हो आचार्यवर के सम्मुख व्याकुल भाव से रुदन करने लगे...परन्तु उन्हें कहाँ आभास था कि जिस अभिलाषा से वे आश्रम में उपस्थित हुए हैं, उनका अभीष्ट तो वहीँ सुरक्षित है.जैसे ही उनके सम्मुख यह रहस्योद्घाटन हुआ कोशल नरेश आभारनत हो आचार्यद्वय के चरणों में नतमस्तक हो गए....
दंपत्ति का पुनर्मिलन आह्लाद को भी आह्लादित करने वाला हुआ.परन्तु आचार्यवर ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए नरेश से कहा कि उन्हें उनकी भार्या तभी प्राप्त होगी जब कि वे अग्नि के सम्मुख पवित्र वैदिक मंत्रों के साथ सप्त वचन लेंगे और अग्निदेव को साक्षी मान महारानी की मांग में सिन्दूर भरेंगे...
पवित्र वैदिक मंत्रों संग महारानी का सिंदूरदान संपन्न हुआ.पतिपत्नी ने गृहस्थ धर्म की मर्यादा और अक्षुणता हेतु समस्त देवी देवताओं को साक्षी रख मृत्युपर्यंत एक दूसरे के प्रति प्रेम ,निष्ठां , मर्यादा, आदर और सेवा का शपथ लिया और तभी से परंपरा में सिंदूरदान नाम की इस पावन परंपरा का श्रीगणेश हुआ. सौभाग्य सिन्दूर विवाहित तथा अविवाहित स्त्री के मध्य अंतर स्थापित करने वाला सुगम साधन ही नहीं, स्त्री की मान रक्षा तथा पति के कर्तब्यबोध का सफल वाहक भी बन गया.
पुत्रीवत महारानी को पतिगृह विदा करते आचार्य वर तथा आर्या गांधारी का ह्रदय विह्वल हो उठा,परन्तु उसके सुखी जीवन के आभास और अभिलाषा ने उन्हें परम संतुष्टि और अनिर्वचनीय आनंद भी दिया..
महरानी के गमनोपरांत जब शिष्यगण अपने अभिभावकों से पाणिग्रहण हेतु सहमति ले आश्रम में उपस्थित हुए तो वहां की साज-सज्जा और विवाह वेदी देख अनिष्ट की आशंका से उनका मन विचलित होने लगा. सशंकित ह्रदय वे सभी आर्या तथा आचार्य के सम्मुख उपस्थित हुए तथा अपनी धृष्टता के लिए क्षमायाचना करते हुए अपना प्रयोजन स्पष्ट किया..अपना-अपना पक्ष रखते हुए सबने उस ऋषिकन्या पर अपना अधिकार स्थापित किया तथा पाणिग्रहण की अनुमति मांगी .
आचार्य कुछ पल को तो शांत भाव से समस्त अघटित देखते रहे,यकायक भीषण चीत्कार के साथ उठ खड़े हुए..उस भीषण वज्र ध्वनि ने सभी शिष्यों को स्तब्ध कर दिया.सभी निष्पलक निर्मिमेष दृष्टि से आचार्यवर को देखने लगे...और जैसे ही आचार्यवर ने महारानी का सत्य उनके सम्मुख उद्घाटित किया, लज्जा ग्लानि और पापबोध ने उन्हें विक्षिप्त सा कर दिया...जिन्हें वे अबतक एक कुंवारी ऋषिकन्या मान रहे थे ,वह तो परम वन्दनीय महारानी थीं. क्षणमात्र में मोह तिरोहित हो गया और आत्मग्लानि की भीषण ज्वाला में उनका कोमल ह्रदय दग्ध होने लगा..आचार्यवर के चरणों में भूलुंठित शिष्य अपने इस निकृष्ट कुकृत्य हेतु प्राणदंड की याचना करने लगे.
आचार्यवर ने कठोर शब्दों में उन्हें सावधान किया कि इस घोरतम पाप के लिए उन्हें दंड तो अवश्य मिलेगा परन्तु दंड की उद्घोषणा अगले दिन प्रातः काल की जायेगी इस अवधि-मध्य यदि कोई क्षात्र दंडमुक्ति की अभिलाषा रखता हो तो बिना आज्ञा, आश्रम छोड़कर जा सकता है..
कठोरतम दंड का आश्वासन पा शिष्यों ने मानों नूतन जीवन का आधार पाया था..अत्यंत अधीरतापूर्वक वे उषा काल की प्रतीक्षा करने लगे.अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत पहले ही नित्यक्रिया से निवृत हो वे आचार्यवर के कक्ष के सम्मुख उपस्थित हो गए.
शिष्यों की प्रतिबद्धता ने आचार्यवर को परम सुख और संतोष दिया. पश्चात्ताप की जिस अग्नि में इतने काल तक वे जले थे, उसमे से उनका ह्रदय विशुद्ध कंचन बन बाहर आ गया था.अब इससे बड़ा दंड और क्या हो सकता था कि जीवन भर वे अपने इस अकरणीय से शिक्षा ले मोह बंधन से मुक्त रहते. आचार्यवर ने उन्हें दंडमुक्त कर परम ज्ञान का वह उपदेश दिया जो उनके शिक्षण समाप्ति के पूर्व उन्हें प्राप्त होता. इसके साथ ही आचार्यवर ने अपने इन परमज्ञानी शिष्यों को विश्व कल्याण हेतु ज्ञान प्रसार की आज्ञा दे समाज के बीच भेज दिया..
सर्वविदित है कि महर्षि गौतम, कपिल, जैमिनी, पतंजलि, व्यास और कणाद ने ज्ञान रूपी वह धरोहर विश्व को सौंपी है जो सृष्टि के अंत तक संसार का मार्गदर्शन करती रहेंगी....
(हिंदी साहित्य के सिद्ध हस्ताक्षर, परम आदरणीय श्री रामेश्वर प्रसाद सिंह की ह्रदय से आभारी हूँ,जिनके पुराणों,जैन तथा बौद्ध ग्रंथों के गहन अध्ययन अन्वेश्नोपरांत लिखित महान आध्यात्मिक ऐतिहासिक उपन्यास " पाटलीपुत्र की राजनर्तकी " के अध्ययन क्रम में इस प्रसंग से अवगत होने का सौभाग्य मिला...
उक्त पुस्तक में तो यह प्रसंग अत्यंत विस्तृत रूप में उल्लिखित है,मैंने उसके साररूप को अपने शब्दों में ढाल यहाँ प्रेषित करने का प्रयास किया है.चूँकि यह प्रसंग मेरे लिए सर्वथा नवीन एवं रोमांचक था,सो मैंने सार्वजानिक स्थल पर इसे सर्वसुलभ करने का निर्णय लिया. )
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27.2.09
द्वापर वहीँ ठहरा है........
जीवन में कई बार ऐसा होता है कि कोई स्थिति विशेष, प्रसंग, परिभाषाएं, शब्द, भाव वर्षों तक मन मष्तिष्क के सम्मुख उपस्थित रहते हुए भी अस्पष्ट औचित्यहीन होकर मनोभूमि पर विखण्डित से अवस्थित होते हैं और फिर किसी एक कालखंड में ऐसा कुछ घटित हो जाता है कि वे अपने दिव्य उद्दात्त रूप में नवीन अर्थ के साथ स्वयं को परिभाषित कर प्रतिष्ठित कर जाते हैं.
आस्तित्व का आविर्भाव जैसे ही धरती पर होता है, शरीर की आँखें खुलती नहीं कि जिज्ञासाओं की आँखें भी खुल जाती है. क्यों और कैसे, जैसे बोध और जिज्ञासा ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से इतर,विशिष्ठ करते हैं और यही जिज्ञासा ज्ञान विज्ञान का भी विस्तार करता है..
मेरा प्रबल विश्वास है कि किसी भी धर्म परंपरा में निहित व्रत त्योहारों के प्रावधान में सभ्यता संस्कृति और समाज के व्यापक मंगल के कारक निहित हैं. प्रबुद्ध ऋषियों मनीषियों ने वर्षों तक कठोर साधना और वैज्ञानिक अन्वेशानोपरांत इन्हें धर्म और परंपरा में नियोजित और प्रतिष्ठित किया है.......परन्तु बाल्यावस्था से ही रंगोत्सव (होली) का जो स्वरुप देखा था और इस परंपरा में निहित जितने कारणों/आख्यानों, भावों को जान पायी थी,इसकी प्रासंगिकता और अपरिहार्यता मुझे नितांत ही अनावश्यक लगती थी.उच्श्रीन्ख्लता को धार्मिक आधार देते इस पर्व की प्रासंगिकता मुझे समझ नहीं आती थी. अपितु यदि यह कहूँ कि मानस में इसकी छाप एक निकृष्ट, वीभत्स उत्सव के रूप में थी तो कोई अतिशियोक्ति न होगी......
यह ईश्वर की ही असीम अनुकम्पा थी कि गत वर्ष रंगोत्सव के अवसर पर वृन्दावन जाना हुआ.... सुसंयोग से बांकेबिहारी जी के मंदिर के अत्यंत निकट ठहरने की व्यवस्था भी हो गयी....वहां दो दिनों में जो भी देखा, उस समय की मनोदशा की तो क्या कहूँ, अभी भी उसका स्मरण मात्र ही रोमांचित और भावुक कर देता है और भावावेश शब्दों को कुंठित अवरुद्ध कर देता है....
इतने वर्षों की जिज्ञासा ऐसे शांत होगी,कभी परिकल्पित न किया था. कहाँ तो रंगोत्सव का पर्याय ही , उच्श्रीन्ख्लता, रासायनिक रंगों का दुरूपयोग, मांसाहार ,मादक पदार्थों का सेवन और होली के नाम पर शीलता का उल्लंघन इत्यादि ही देखा था.......और जो वहां देखा तो बस आत्मविस्मृत हो देखती ही रह गयी........
पूरे क्षेत्र में कहीं भी मद्य (नशीले पदार्थ) और मांसाहार का नामोनिशान नहीं था. बच्चों से लेकर बुजुर्ग स्त्री पुरुष, स्थानीय नागरिक या आगंतुक तक सभी संकरी गलियों या सडकों से निर्भीक गुजरते हुए बिना किसी परिचय तथा भेद भाव के, बिना किसी को स्पर्श किये रंग गुलाल से सराबोर किये जा रहे थे. कुछ लोगों का समूह वाद्य यंत्रों के साथ तो कुछ ऐसे ही तालियाँ बजाते हुए, भजन गाते हुए, झूमते नाचते गलिओं से गुजर रहे थे. कौन सधवा है,कौन विधवा न रंग डालने वाले इसका भान रख रहे थे और न ही रंगे जाने वालों को कोई रंज या क्षोभ था......जिस तरह से निर्भीक हो किशोरियां ,युवतियां , महिलाएं मार्गों पर चल रहीं थीं और जितनी शिष्टता से उनपर रंग डाले जा रहे थे ,यह तो अभिभूत ही कर गया....क्योंकि इसकी परिकल्पना हम अपने क्षेत्र में कतई नहीं कर सकते.
बाँकेबिहारी जी के मंदिर का पूरा प्रांगण रंग गुलाल से सराबोर था....जहाँ कहीं भी गयी,जहाँ तक दृष्टि गयी देखा , पूरा वृन्दावन ही भक्तिमय रंगमय हो विभोर हो झूम रहा है, गा रहा है..........इन दृश्यों ने मन ऐसे बाँधा कि ...लगा द्वापर बीता कहाँ है......यह तो यहीं ठहरा है, आज भी........तन मन आत्मा ऐसे रंग गया कि, यह पावन उत्सव - रंगोत्सव, अपने पूर्ण अर्थ और दिव्य स्वरुप में मनोभूमि पर अवतरित हो गया.........
मन बड़ा कचोट जाता है और लगता है कि जिस लोक कल्याणकारी सात्विक भाव के साथ परंपरा में पर्व त्योहारों का प्रावधान हुआ था,क्या हम उन्हें उनके उसी अर्थ और स्वरुप में नहीं मना सकते........समस्या है कि हम सुख तो पाना चाहते हैं, पर यह विस्मृत कर जाते हैं कि सात्विक सुख ही असली सुख है.यही चिरस्थायी होता है और यह सुख आत्मा तक पहुंचकर क्लांत मन को विश्राम तथा सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है.तन रंगने से अधिक आवश्यक मन को रंगना है.........चिर सुख हेतु एक बार सात्विक रंगों से रंगकर देखें इस मन को........देखें कितना आनद है इस रंग मे...........
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आस्तित्व का आविर्भाव जैसे ही धरती पर होता है, शरीर की आँखें खुलती नहीं कि जिज्ञासाओं की आँखें भी खुल जाती है. क्यों और कैसे, जैसे बोध और जिज्ञासा ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से इतर,विशिष्ठ करते हैं और यही जिज्ञासा ज्ञान विज्ञान का भी विस्तार करता है..
मेरा प्रबल विश्वास है कि किसी भी धर्म परंपरा में निहित व्रत त्योहारों के प्रावधान में सभ्यता संस्कृति और समाज के व्यापक मंगल के कारक निहित हैं. प्रबुद्ध ऋषियों मनीषियों ने वर्षों तक कठोर साधना और वैज्ञानिक अन्वेशानोपरांत इन्हें धर्म और परंपरा में नियोजित और प्रतिष्ठित किया है.......परन्तु बाल्यावस्था से ही रंगोत्सव (होली) का जो स्वरुप देखा था और इस परंपरा में निहित जितने कारणों/आख्यानों, भावों को जान पायी थी,इसकी प्रासंगिकता और अपरिहार्यता मुझे नितांत ही अनावश्यक लगती थी.उच्श्रीन्ख्लता को धार्मिक आधार देते इस पर्व की प्रासंगिकता मुझे समझ नहीं आती थी. अपितु यदि यह कहूँ कि मानस में इसकी छाप एक निकृष्ट, वीभत्स उत्सव के रूप में थी तो कोई अतिशियोक्ति न होगी......
यह ईश्वर की ही असीम अनुकम्पा थी कि गत वर्ष रंगोत्सव के अवसर पर वृन्दावन जाना हुआ.... सुसंयोग से बांकेबिहारी जी के मंदिर के अत्यंत निकट ठहरने की व्यवस्था भी हो गयी....वहां दो दिनों में जो भी देखा, उस समय की मनोदशा की तो क्या कहूँ, अभी भी उसका स्मरण मात्र ही रोमांचित और भावुक कर देता है और भावावेश शब्दों को कुंठित अवरुद्ध कर देता है....
इतने वर्षों की जिज्ञासा ऐसे शांत होगी,कभी परिकल्पित न किया था. कहाँ तो रंगोत्सव का पर्याय ही , उच्श्रीन्ख्लता, रासायनिक रंगों का दुरूपयोग, मांसाहार ,मादक पदार्थों का सेवन और होली के नाम पर शीलता का उल्लंघन इत्यादि ही देखा था.......और जो वहां देखा तो बस आत्मविस्मृत हो देखती ही रह गयी........
पूरे क्षेत्र में कहीं भी मद्य (नशीले पदार्थ) और मांसाहार का नामोनिशान नहीं था. बच्चों से लेकर बुजुर्ग स्त्री पुरुष, स्थानीय नागरिक या आगंतुक तक सभी संकरी गलियों या सडकों से निर्भीक गुजरते हुए बिना किसी परिचय तथा भेद भाव के, बिना किसी को स्पर्श किये रंग गुलाल से सराबोर किये जा रहे थे. कुछ लोगों का समूह वाद्य यंत्रों के साथ तो कुछ ऐसे ही तालियाँ बजाते हुए, भजन गाते हुए, झूमते नाचते गलिओं से गुजर रहे थे. कौन सधवा है,कौन विधवा न रंग डालने वाले इसका भान रख रहे थे और न ही रंगे जाने वालों को कोई रंज या क्षोभ था......जिस तरह से निर्भीक हो किशोरियां ,युवतियां , महिलाएं मार्गों पर चल रहीं थीं और जितनी शिष्टता से उनपर रंग डाले जा रहे थे ,यह तो अभिभूत ही कर गया....क्योंकि इसकी परिकल्पना हम अपने क्षेत्र में कतई नहीं कर सकते.
बाँकेबिहारी जी के मंदिर का पूरा प्रांगण रंग गुलाल से सराबोर था....जहाँ कहीं भी गयी,जहाँ तक दृष्टि गयी देखा , पूरा वृन्दावन ही भक्तिमय रंगमय हो विभोर हो झूम रहा है, गा रहा है..........इन दृश्यों ने मन ऐसे बाँधा कि ...लगा द्वापर बीता कहाँ है......यह तो यहीं ठहरा है, आज भी........तन मन आत्मा ऐसे रंग गया कि, यह पावन उत्सव - रंगोत्सव, अपने पूर्ण अर्थ और दिव्य स्वरुप में मनोभूमि पर अवतरित हो गया.........
मन बड़ा कचोट जाता है और लगता है कि जिस लोक कल्याणकारी सात्विक भाव के साथ परंपरा में पर्व त्योहारों का प्रावधान हुआ था,क्या हम उन्हें उनके उसी अर्थ और स्वरुप में नहीं मना सकते........समस्या है कि हम सुख तो पाना चाहते हैं, पर यह विस्मृत कर जाते हैं कि सात्विक सुख ही असली सुख है.यही चिरस्थायी होता है और यह सुख आत्मा तक पहुंचकर क्लांत मन को विश्राम तथा सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है.तन रंगने से अधिक आवश्यक मन को रंगना है.........चिर सुख हेतु एक बार सात्विक रंगों से रंगकर देखें इस मन को........देखें कितना आनद है इस रंग मे...........
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20.10.08
स्थूलकाय गजानन का शूक्षम्काय वाहन....
यह सर्व विदित है कि, हिंदू धर्म में किसी भी पूजा के परायण में सर्वप्रथम गणेश की ही पूजा का विधान है.वस्तुतः गणेश बुद्धि विवेक के स्वामी माने जाते हैं.उन्हें गणनायक कहा जाता है.गण का तात्पर्य मनुष्य से भी है और देव से भी.अर्थात जो जनों/देवताओं में श्रेष्ठ हो वही गणनायक/जननायक है.फलस्वरूप बुद्धि विवेक के अधिनायक,देवों के अधिनायक की वंदना के उपरांत ही अन्य किसी भी देवी देवता की पूजा होती है.सफलता पूर्वक आयोजन के अनुष्ठान हेतु,उसने निर्विघ्न समापन हेतु विघ्नहर्ता का अनुष्ठान अनिवार्य है.
सहज ही हम देखते हैं कि जिस देवता के साथ उनके कर्म प्रवृत्ति अनुसार जो अवधारणा जुड़ी होती है,उस देव विशेष के मूर्त रूप की परिकल्पना भी उसी रूप में होती है.जैसे माँ काली को विकराल रूप में दिखाया जाता है,तो नीलकंठ भगवान शंकर को नागाहर भष्म विभूषित रूप में. इसी तरह चूँकि मानव जीवन में बुद्धि विवेक को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है , सो इसके प्रतीक रूप में गजानन को भारी भरकम रूप में दिखाया जाता है.यूँ गणेश को लम्बोदर (बड़े पेट वाला) भी कहा जाता है,जिसका तात्पर्य है,बड़ी से बड़ी बात को पचाने वाला गंभीर विवेकवान तथा धैर्यशाली पुरूष.धीर गंभीर विवेकवान पुरूष ही नायक और पूज्य होता है..
अब बात यह है कि इतने भारी भरकम देवता का वाहन इतना छोटा सा मूषक क्यों माना गया है ? बात कुछ अटपटी सी लगती है.वस्तुतः वेद पुराण,आख्यान इत्यादि में जो भी कुछ लिखा दर्शाया गया है,उसके स्थूल रूप में बहुत ही गूढ़ तथ्य छिपे हुए हैं,तीक्ष्ण बुद्धि और शोध द्वारा ही रहस्य प्रकट किया जा सकता है.देवताओं के जो वाहन बताये गएँ हैं,वस्तुतः वे उनके गुण स्वरुप ही प्रतीक रूप में प्रयुक्त हुए हैं.जैसे गाय सत्व गुण की प्रतीक हैं और सिंह आदि रजोगुण के वैसे ही चूहा तर्क का प्रतीक माना जाता है.अहर्निश कांट छांट करना,अच्छी बुरी हर चीज को कुतर जाना - यह मूषक का स्वभाव है.असल में मनुष्य के मस्तिष्क में सदा स्वतंत्र विचारने वाला तर्क एकदम इसी तरह कार्य करता है.जहाँ बुद्धि होगी वहां जिज्ञासा होगी ही और जिज्ञासा तर्क की जन्मदात्री है.परन्तु तर्क पर भारी भरकम बुद्धि और विवेक की उपस्थिति तथा उसका अंकुश न हो तो यह जीवन के लिए कल्याणकारी नही होता. इसलिए तर्करूपी मूषक पर भारी भरकम बुद्धि विवेक के स्वामी विराजमान रहते हैं.
दीर्घ और लघु काया का यह सम्पूर्ण समन्वय बड़ा ही महत संदेश देता है और हमें दिखाता सिखाता है कि जीवन में बुद्धि तर्क और विवेक की मात्रा इसी अनुपात में होनी चाहिए. यही संतुलन जब अव्यवस्थित होता है तो संस्कार,संस्कृति का विनाश कर अपने साथ साथ समुदाय का जीवन भी दुखदायी बना देता है.
हमारी कामना है कि श्री गणेश सबके ह्रदय में विराजें और सबका जीवन सुखमय हो.
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चलते चलते एक बात और कहना चाहूंगी कि दीपावली पर जिस गणेश और लक्ष्मी की आराधना होती है,उसे सच्चे अर्थ में लोग ग्रहण करें.लक्ष्मी श्री विष्णु की अर्धांगिनी हैं पर उनकी पूजा सदा गणेश के साथ इसलिए होती है कि लक्ष्मी वहां कभी वास नही करतीं जहाँ गणेश न हों.धन वहीँ अपना स्थायी निवास बनाती है जहाँ बुद्धि विवेक के साथ सन्मार्ग पर चल इसका अर्जन हो, भोग विलास में न व्यय कर अपने सद्कर्म तथा परहित निमित्त व्यय हो.सदयुक्ति से धनोपार्जन तथा सद्प्रयोजन में व्यय ही मनाव धर्म है. " शुभ" के साथ ही सदा "लाभ" होता है.एक से बढ़कर एक धनी मानी,राजा राजवाडे हुए और जिस किसी ने भी इसे समुचित श्रद्धा सम्मान न दिया वह नष्ट हो गया.
कभी कभी देखने में लगता है कि अमुक तो इतना पापी है फ़िर भी दोनों हाथों धन बटोरे जा रहा है.परन्तु तनिक निकट जाकर उनके जीवन में देखेंगे तो पाएंगे कि ऐसे लोगों का जीवन कितना अधिक अशांत है. अन्हक का धन जैसे ही चौखट लांघती है अपने साथ कुसंस्कार और दुर्बुद्धि लेकर आती है और हजारों करोड़ भी वह व्यक्ति क्यों न जमा कर ले उसके कुमार्गगामी पीढी उसे शीघ्र ही नष्ट कर देती है.
सच्ची दीपावली वही होगी जब हम न तो वातावरण को ध्वनि तथा दूषित धूम्र द्वारा प्रदूषित करें और न ही जुआ शराब में उडाएं.जितना धन हमें इसमे व्यय करना है उसका आधा भी यदि उन व्यक्तियों में बाँट दें, जिसने कई दिनी से पेटभर अन्न नही खाया हो,जिसके तन पर आने वाली सर्दी से बचने के लिए वस्त्र न हों,तो माता लक्ष्मी और विघ्नहर्ता उसके घर में ,उसके ह्रदय में सदा निवास करेंगे,इसमे कोई संदेह नही. लक्ष्मी धन के रूप में यदि न भी बरसें तो संतोष और शान्ति रूप में जरूर बरसेंगी.और विघ्नहर्ता किसी भी कष्ट के क्षणों में किसी न किसी रूप में आकर हाथ पकड़ उबार जायेंगे.
सबको दीपावली की अनंत शुभकामनाये.............
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सहज ही हम देखते हैं कि जिस देवता के साथ उनके कर्म प्रवृत्ति अनुसार जो अवधारणा जुड़ी होती है,उस देव विशेष के मूर्त रूप की परिकल्पना भी उसी रूप में होती है.जैसे माँ काली को विकराल रूप में दिखाया जाता है,तो नीलकंठ भगवान शंकर को नागाहर भष्म विभूषित रूप में. इसी तरह चूँकि मानव जीवन में बुद्धि विवेक को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है , सो इसके प्रतीक रूप में गजानन को भारी भरकम रूप में दिखाया जाता है.यूँ गणेश को लम्बोदर (बड़े पेट वाला) भी कहा जाता है,जिसका तात्पर्य है,बड़ी से बड़ी बात को पचाने वाला गंभीर विवेकवान तथा धैर्यशाली पुरूष.धीर गंभीर विवेकवान पुरूष ही नायक और पूज्य होता है..
अब बात यह है कि इतने भारी भरकम देवता का वाहन इतना छोटा सा मूषक क्यों माना गया है ? बात कुछ अटपटी सी लगती है.वस्तुतः वेद पुराण,आख्यान इत्यादि में जो भी कुछ लिखा दर्शाया गया है,उसके स्थूल रूप में बहुत ही गूढ़ तथ्य छिपे हुए हैं,तीक्ष्ण बुद्धि और शोध द्वारा ही रहस्य प्रकट किया जा सकता है.देवताओं के जो वाहन बताये गएँ हैं,वस्तुतः वे उनके गुण स्वरुप ही प्रतीक रूप में प्रयुक्त हुए हैं.जैसे गाय सत्व गुण की प्रतीक हैं और सिंह आदि रजोगुण के वैसे ही चूहा तर्क का प्रतीक माना जाता है.अहर्निश कांट छांट करना,अच्छी बुरी हर चीज को कुतर जाना - यह मूषक का स्वभाव है.असल में मनुष्य के मस्तिष्क में सदा स्वतंत्र विचारने वाला तर्क एकदम इसी तरह कार्य करता है.जहाँ बुद्धि होगी वहां जिज्ञासा होगी ही और जिज्ञासा तर्क की जन्मदात्री है.परन्तु तर्क पर भारी भरकम बुद्धि और विवेक की उपस्थिति तथा उसका अंकुश न हो तो यह जीवन के लिए कल्याणकारी नही होता. इसलिए तर्करूपी मूषक पर भारी भरकम बुद्धि विवेक के स्वामी विराजमान रहते हैं.
दीर्घ और लघु काया का यह सम्पूर्ण समन्वय बड़ा ही महत संदेश देता है और हमें दिखाता सिखाता है कि जीवन में बुद्धि तर्क और विवेक की मात्रा इसी अनुपात में होनी चाहिए. यही संतुलन जब अव्यवस्थित होता है तो संस्कार,संस्कृति का विनाश कर अपने साथ साथ समुदाय का जीवन भी दुखदायी बना देता है.
हमारी कामना है कि श्री गणेश सबके ह्रदय में विराजें और सबका जीवन सुखमय हो.
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चलते चलते एक बात और कहना चाहूंगी कि दीपावली पर जिस गणेश और लक्ष्मी की आराधना होती है,उसे सच्चे अर्थ में लोग ग्रहण करें.लक्ष्मी श्री विष्णु की अर्धांगिनी हैं पर उनकी पूजा सदा गणेश के साथ इसलिए होती है कि लक्ष्मी वहां कभी वास नही करतीं जहाँ गणेश न हों.धन वहीँ अपना स्थायी निवास बनाती है जहाँ बुद्धि विवेक के साथ सन्मार्ग पर चल इसका अर्जन हो, भोग विलास में न व्यय कर अपने सद्कर्म तथा परहित निमित्त व्यय हो.सदयुक्ति से धनोपार्जन तथा सद्प्रयोजन में व्यय ही मनाव धर्म है. " शुभ" के साथ ही सदा "लाभ" होता है.एक से बढ़कर एक धनी मानी,राजा राजवाडे हुए और जिस किसी ने भी इसे समुचित श्रद्धा सम्मान न दिया वह नष्ट हो गया.
कभी कभी देखने में लगता है कि अमुक तो इतना पापी है फ़िर भी दोनों हाथों धन बटोरे जा रहा है.परन्तु तनिक निकट जाकर उनके जीवन में देखेंगे तो पाएंगे कि ऐसे लोगों का जीवन कितना अधिक अशांत है. अन्हक का धन जैसे ही चौखट लांघती है अपने साथ कुसंस्कार और दुर्बुद्धि लेकर आती है और हजारों करोड़ भी वह व्यक्ति क्यों न जमा कर ले उसके कुमार्गगामी पीढी उसे शीघ्र ही नष्ट कर देती है.
सच्ची दीपावली वही होगी जब हम न तो वातावरण को ध्वनि तथा दूषित धूम्र द्वारा प्रदूषित करें और न ही जुआ शराब में उडाएं.जितना धन हमें इसमे व्यय करना है उसका आधा भी यदि उन व्यक्तियों में बाँट दें, जिसने कई दिनी से पेटभर अन्न नही खाया हो,जिसके तन पर आने वाली सर्दी से बचने के लिए वस्त्र न हों,तो माता लक्ष्मी और विघ्नहर्ता उसके घर में ,उसके ह्रदय में सदा निवास करेंगे,इसमे कोई संदेह नही. लक्ष्मी धन के रूप में यदि न भी बरसें तो संतोष और शान्ति रूप में जरूर बरसेंगी.और विघ्नहर्ता किसी भी कष्ट के क्षणों में किसी न किसी रूप में आकर हाथ पकड़ उबार जायेंगे.
सबको दीपावली की अनंत शुभकामनाये.............
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11.9.08
शक्ति पूजा

मातृ रूप में शक्ति पूजन, भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है और अनादि काल से अनवरत चली आ रही यह परम्परा में निहित है. हिंदू पुराणों आख्यानों की मानें तो केवल ब्रह्माण्ड की ही उत्पत्ति ही नही बल्कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य सभी देवी देवताओं की उत्पत्ति भी आदिशक्ति माँ दुर्गा ने ही की है.वे ही श्रृष्टि का आधार हैं.प्रकृति से लेकर चर अचर तक शक्ति रूप में जो कुछ भी श्रृष्टि में निहित उपस्थित है, वह माता का ही रूप है. इस महा शक्ति मातृशक्ति की साधना आराधना देवों तथा मानवो ने ही नही दानवों ने भी की है और जब भी कभी जिस किसी दानव ने शक्ति के मद में चूर हो मनुष्यों , देवों या प्रकृति का दमन किया है,भक्तों की आर्त पुकार पर माता ने उस दुष्ट का नाश कर भक्तों को उससे त्राण दिलाया है. श्रृष्टि के प्रत्येक कण में यह आदिशक्ति व्याप्त हैं.
बहुधा क्षत्रियों की कुलदेवी यही आदि शक्ति माँ दुर्गा ही हुआ करती हैं और इनके आशीष के बिना शक्ति प्रयोग तथा विजय की कल्पना भी नही की जा सकती.पुरातन काल में परंपरागत रूप में माँ शक्ति की पूजा अधिकांशतः घरों में ही की जाती थी.पर कालांतर में इसे उत्साव और त्यौहार के रूप में वर्ष में दो बार बसंत ऋतु तथा शरद ऋतु में नवरात्र में देवी की आराधना के साथ हर्षोल्लास से मनाया जाता है.
दुर्गा शप्तसी में में जो कथा वर्णित है,उसके अनुसार महिषासुर,चंड मुंड,शुम्भ निशुम्भ इत्यादि महादैत्यों ने जब देवताओं तथा मानव जाति को परास्त कर उन्हें त्राण दे त्रस्त कर दिया तो देवों ऋषियों के आर्त पुकार पर आदि शक्ति माता दुर्गा ने अपने विभूतियों के साथ इन असुरों का संहार किया और धर्म की प्रतिस्थापना की.सप्त्शी के अनुसार देवी की विभूतियों(उनके ही अन्य रूपों) तथा अन्य सभी देवताओं के शक्ति रूपों की तो चर्चा है परन्तु परम्परा और व्यवहार में पूजन काल में देवी के विग्रहों के साथ गणेश तथा विश्वकर्मा की जो पूजा की जाती है,इस से सम्बंधित मैंने आज तक जो कुछ भी पढ़ा जाना है, उसमे कहीं नही पाया और यह मेरे लिए बाल्यकाल से ही उत्सुकता का विषय रहा.दुर्गा पूजा में देवी दुर्गा की प्रतिमा के साथ साथ लक्ष्मी ,सरस्वती, विश्वकर्मा तथा गणेश इन सबके विग्रहों के भी स्थापना और आराधना होती है.सबने देखा होगा.परन्तु नवरात्र में जिस दुर्गा सप्त्शी के पाठ के बिना नवरात्र आराधना अपूर्ण मानी जाती है,उसमे कहीं भी गणेश और विश्वकर्मा के विग्रहों की चर्चा नही है.
परम्परा में यूँ ही तो नही कुछ आ जाता, सो इसके पीछे भी कोई तथ्य रहस्य अवश्य होगा ,यह मन कहता था पर कईयों से पूछने पर भी इस जिज्ञासा का समुचित समाधान मुझे आज तक नही मिला है.मेरा निवेदन सभी प्रबुद्ध जनों से है कि जो कोई भी मेरे इस जिज्ञासा को शांत करने में मेरी सहायता करेंगे ,मैं उनकी सदा आभारी रहूंगी.
कुछ वर्ष पहले अपने मन के इसी जिज्ञासा के साथ जब माता के सम्मुख बैठी हुई थी तो अचानक मन में एक बात कौंधी,यह सत्य के कितने निकट है नही जानती पर मुझे लगा कि ये विग्रह समूह कितनी बड़ी बात की ओर इंगित कर रहे हैं.एक ध्रुव सत्य जो सदा के लिए प्रासंगिक तथा विचारणीय है.किसी भी नवनिर्माण या विध्वंस के लिए ये इतने ही अवयव तो चाहिए.
माँ दुर्गा शक्ति की प्रतीक हैं, जो किसी भी कार्य के लिए सबसे पहली आवश्यकता है.
सरस्वती विद्या की प्रतीक हैं,शक्ति बिना विद्या/ज्ञान के कभी सफलता नही पा सकती.
लक्ष्मी धन की प्रतीक हैं,शक्ति और विद्या हों भी तो बिना धन के न तो सृष्टि / रचना / नवनिर्माण का कार्य हो सकता है न ही विध्वंश / युद्ध का.
गणेश बुद्दि,युक्ति और विवेक के स्वामी(प्रतीक) हैं.उपरोक्त तीनो चीजे हों भी और उसे विवेकपूर्ण ढंग से युक्तियुक्त प्रयुक्त न किया जाए तो सब व्यर्थ हो जाता है.
और विश्वकर्मा तकनीक और निर्माण के देवता माने जाते हैं. विध्वंश के लिए भी तकनीक चाहिए और भ्रष्ट व्यवस्था के विध्वन्सोपरांत नवनिर्माण के लिए भी बिना तकनीक और निर्माण की आवश्यकता है नही तो इसके बिना सम्पूर्ण प्रयास व्यर्थ और अर्थहीन हो जाता है.
सो कुल मिलकर मातृशक्ति को सर्वशक्तिसंपन्न होते हुए भी विजय तभी मिलती है जब अपने साथ वे इन शक्तियों को लेकर चलती हैं.सत्य ही है इन पंच्शक्तियों के बिना जर्जर व्यवस्था का विनाश और नवसृजन कर विजयश्री प्राप्त कर पाना असंभव है.सर्व शक्ति मान होते हुए भी विजयी वही हो सकता है जो विद्या ,विवेक ,धन और तकनीक के साथ विभूषित हो..
नवरात्र का वह पावन अवसर निकट ही है सो कुछ बात कर ली जाए वर्तमान समय में इस उत्सव को जिस प्रकार से मनाया जाता है उसके विषय में........
कुछ लोग माता के प्रति पेम और निष्ठा को ह्रदय में धारण किए, बिना कर्मकांड में लिप्त हुए मानसिक पूजन में विश्वास करते हैं तो कुछ लोग इसे बेहद सादगी पूर्ण ढंग से घर में ही कलश स्थापित कर इन नवो दिनों में कठोर साधना उपासना तथा व्रत उपवास के साथ संपन्न करते हैं.कुछ कलश स्थापना न भी करें तो यम् नियम पालन करते हुए विग्रहों के पूजा स्थल पर या मंदिरों में जाकर अर्चना करते हैं,परन्तु एक बहुत बड़ा समुदाय ऐसा है जिसके लिए यह एक ऐसा अवसर है जिसमे रात रात भर पंडालों में घूम घूम कर '' ऐश " करने का सर्वोत्तम सुयोग है.आस्था निष्ठा से इस वर्ग का दूर दूर तक कोई सरोकार नही रहता.दर्शनार्थियों को ताड़ना और छेड़ छाड़,इनके लिए आलौकिक आनंद प्रदायक होता है. .
सही है कि परम्परा में उत्सवों का प्रावधान धार्मिक भावनाओं के उद्दीपन के साथ साथ सामूहिक भावना को जाग्रत करने के लिए किया गया था.पर आज ये धार्मिक उत्साव जो रूप ले चुके हैं,उसमे धर्म तो लुप्त होता जा रहा है,हाँ फूहड़ ढंग से मनाया जाने वाला उत्सव बच गया है.जो दिनों दिन और बदतर होता जा रहा है.आस्था का स्थान आडम्बर ने ले लिया है.चाहे वह कडोडों रुपये मंहगे पंडालों के निर्माण के लिए हों या डांडिया और रास के रूप में आयोजित बड़े बड़े प्रायोजित कार्यक्रमों के माध्यम से हो.अब तो महानगरों में पेप्सी कोला जैसी कम्पनियाँ भी इन डांडिया कार्यक्रमों का आयोजन करवाने लगी हैं जहाँ भरी भरकम फीस देकर लोग सज धज कर डिस्को डांडिया करने पहुँचते हैं.आस्था और धर्म वहां गौण रहता है,उद्देश्य मात्र मनोरंजन भर रहता है...
पूजा पंडालों में भी चहुँ ओर पैसा ही चमकता है.एक प्रकार से होड़ सी रहती है इन पूजा मंडलियों के बीच.अधिकांशतः इन मंडलियों के कर्ता धर्ता संरक्षक समाज के तथाकथित भाई लोग ही हुआ करते हैं जिनके बीच यह शक्ति प्रदर्शन तथा वर्चस्व स्थापित करने का मामला होता है.वर्चस्व की इस लडाई में गोली बन्दूक चलना आम बात है.पूजा के नाम पर जमकर वसूली होती है और इस वसूली से एकत्रित धन का जो सदुपयोग होता है उसके बखान की आवश्यकता नही.सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है.पूजा पंडालों में मानक भव्यता और ताम-झाम भर होती है.
बड़ा ही अफ़सोस होता है,जितना धन पूजा के नाम पर इस तरह बहाया जाता है,जहाँ एक ओर निर्धन दाने दाने को मुहताज है , बिना इलाज के असमय दुनिया से विदा हो रहे हैं,कई मेधावी बालक हैं जो पैसे के अभाव में पढ़ नही पाते.जहाँ सड़कें टूटी हुई है या और भी न जाने कितने ही असंख्य समस्याएं हैं,जिसने जीवन को विषम बना दिया है.क्या इनसे निपटने की जिम्मेदारी सिर्फ़ सरकार की बनती है.सरकार और व्यवस्था को गलियां दे दे देने से समाज की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है? चार दिनों के लिए बनाये जा रहे भव्य से भव्यतम पंडालों के लिए जो धन पानी के लिए बहाया जाता है उसका उपयोग उसी माता के नाम पर सार्थक कार्यों में भी तो किया जा सकता है.यदि एक कोष बनाकर उन अभावग्रस्त लोगों की मदद करें, फैली हुई अव्यवस्था के लिए कुछ कदम उठायें तो क्या यह भगवान् के प्रति भक्ति से कमतर होगी?
स्थिति तो यह है कि पूजा के ये अवसर जिस प्रकार से शहर में अव्यवस्था फैलाते हैं, कि उन चार पाँच दिनों के स्थिति की स्मृति ही भयातुर कर देती है.जगह जगह सड़क जाम,शोर शराबा,शरारती तत्वों की हुल्लड़बाजी ,सारे काम काज ठप्प इतनी बेचैन करती है कि उत्सवों का आगमन उत्साहित नही आतंकित ओर क्षुब्ध कर देती है..
आस्था मन और आत्मा में बसने वाली,धर्म आचार और व्यवहार में समाहित होने वाली तथा उत्सव सामाजिक सौहाद्र बढ़ाने वाले अवयव हैं।कोई आवश्यक नही कि व्रत उपवास या अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में लिप्त होकर ही आस्तिकता का निष्पादन किया जाय या उसे प्रगाढ़ किया जा सकता है। आस्था और धर्म व्यक्ति के आत्मोन्नति के साथ साथ समाज को उन्नत और सुदृढ़ करने के लिए है।धर्म के नाम पर आडम्बर और धन का अपव्यय सर्वथा अनुचित है और यदि इसे अधर्म कहा जाए तो कोई अतिशियोक्ति न होगी॥
माता सबको सद्बुद्धि तथा मानव धर्म के मर्म को समझ पाने का विवेक दें यही उनसे प्रार्थना है..
" सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके,शरण्ये त्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते "
बहुधा क्षत्रियों की कुलदेवी यही आदि शक्ति माँ दुर्गा ही हुआ करती हैं और इनके आशीष के बिना शक्ति प्रयोग तथा विजय की कल्पना भी नही की जा सकती.पुरातन काल में परंपरागत रूप में माँ शक्ति की पूजा अधिकांशतः घरों में ही की जाती थी.पर कालांतर में इसे उत्साव और त्यौहार के रूप में वर्ष में दो बार बसंत ऋतु तथा शरद ऋतु में नवरात्र में देवी की आराधना के साथ हर्षोल्लास से मनाया जाता है.
दुर्गा शप्तसी में में जो कथा वर्णित है,उसके अनुसार महिषासुर,चंड मुंड,शुम्भ निशुम्भ इत्यादि महादैत्यों ने जब देवताओं तथा मानव जाति को परास्त कर उन्हें त्राण दे त्रस्त कर दिया तो देवों ऋषियों के आर्त पुकार पर आदि शक्ति माता दुर्गा ने अपने विभूतियों के साथ इन असुरों का संहार किया और धर्म की प्रतिस्थापना की.सप्त्शी के अनुसार देवी की विभूतियों(उनके ही अन्य रूपों) तथा अन्य सभी देवताओं के शक्ति रूपों की तो चर्चा है परन्तु परम्परा और व्यवहार में पूजन काल में देवी के विग्रहों के साथ गणेश तथा विश्वकर्मा की जो पूजा की जाती है,इस से सम्बंधित मैंने आज तक जो कुछ भी पढ़ा जाना है, उसमे कहीं नही पाया और यह मेरे लिए बाल्यकाल से ही उत्सुकता का विषय रहा.दुर्गा पूजा में देवी दुर्गा की प्रतिमा के साथ साथ लक्ष्मी ,सरस्वती, विश्वकर्मा तथा गणेश इन सबके विग्रहों के भी स्थापना और आराधना होती है.सबने देखा होगा.परन्तु नवरात्र में जिस दुर्गा सप्त्शी के पाठ के बिना नवरात्र आराधना अपूर्ण मानी जाती है,उसमे कहीं भी गणेश और विश्वकर्मा के विग्रहों की चर्चा नही है.
परम्परा में यूँ ही तो नही कुछ आ जाता, सो इसके पीछे भी कोई तथ्य रहस्य अवश्य होगा ,यह मन कहता था पर कईयों से पूछने पर भी इस जिज्ञासा का समुचित समाधान मुझे आज तक नही मिला है.मेरा निवेदन सभी प्रबुद्ध जनों से है कि जो कोई भी मेरे इस जिज्ञासा को शांत करने में मेरी सहायता करेंगे ,मैं उनकी सदा आभारी रहूंगी.
कुछ वर्ष पहले अपने मन के इसी जिज्ञासा के साथ जब माता के सम्मुख बैठी हुई थी तो अचानक मन में एक बात कौंधी,यह सत्य के कितने निकट है नही जानती पर मुझे लगा कि ये विग्रह समूह कितनी बड़ी बात की ओर इंगित कर रहे हैं.एक ध्रुव सत्य जो सदा के लिए प्रासंगिक तथा विचारणीय है.किसी भी नवनिर्माण या विध्वंस के लिए ये इतने ही अवयव तो चाहिए.
माँ दुर्गा शक्ति की प्रतीक हैं, जो किसी भी कार्य के लिए सबसे पहली आवश्यकता है.
सरस्वती विद्या की प्रतीक हैं,शक्ति बिना विद्या/ज्ञान के कभी सफलता नही पा सकती.
लक्ष्मी धन की प्रतीक हैं,शक्ति और विद्या हों भी तो बिना धन के न तो सृष्टि / रचना / नवनिर्माण का कार्य हो सकता है न ही विध्वंश / युद्ध का.
गणेश बुद्दि,युक्ति और विवेक के स्वामी(प्रतीक) हैं.उपरोक्त तीनो चीजे हों भी और उसे विवेकपूर्ण ढंग से युक्तियुक्त प्रयुक्त न किया जाए तो सब व्यर्थ हो जाता है.
और विश्वकर्मा तकनीक और निर्माण के देवता माने जाते हैं. विध्वंश के लिए भी तकनीक चाहिए और भ्रष्ट व्यवस्था के विध्वन्सोपरांत नवनिर्माण के लिए भी बिना तकनीक और निर्माण की आवश्यकता है नही तो इसके बिना सम्पूर्ण प्रयास व्यर्थ और अर्थहीन हो जाता है.
सो कुल मिलकर मातृशक्ति को सर्वशक्तिसंपन्न होते हुए भी विजय तभी मिलती है जब अपने साथ वे इन शक्तियों को लेकर चलती हैं.सत्य ही है इन पंच्शक्तियों के बिना जर्जर व्यवस्था का विनाश और नवसृजन कर विजयश्री प्राप्त कर पाना असंभव है.सर्व शक्ति मान होते हुए भी विजयी वही हो सकता है जो विद्या ,विवेक ,धन और तकनीक के साथ विभूषित हो..
नवरात्र का वह पावन अवसर निकट ही है सो कुछ बात कर ली जाए वर्तमान समय में इस उत्सव को जिस प्रकार से मनाया जाता है उसके विषय में........
कुछ लोग माता के प्रति पेम और निष्ठा को ह्रदय में धारण किए, बिना कर्मकांड में लिप्त हुए मानसिक पूजन में विश्वास करते हैं तो कुछ लोग इसे बेहद सादगी पूर्ण ढंग से घर में ही कलश स्थापित कर इन नवो दिनों में कठोर साधना उपासना तथा व्रत उपवास के साथ संपन्न करते हैं.कुछ कलश स्थापना न भी करें तो यम् नियम पालन करते हुए विग्रहों के पूजा स्थल पर या मंदिरों में जाकर अर्चना करते हैं,परन्तु एक बहुत बड़ा समुदाय ऐसा है जिसके लिए यह एक ऐसा अवसर है जिसमे रात रात भर पंडालों में घूम घूम कर '' ऐश " करने का सर्वोत्तम सुयोग है.आस्था निष्ठा से इस वर्ग का दूर दूर तक कोई सरोकार नही रहता.दर्शनार्थियों को ताड़ना और छेड़ छाड़,इनके लिए आलौकिक आनंद प्रदायक होता है. .
सही है कि परम्परा में उत्सवों का प्रावधान धार्मिक भावनाओं के उद्दीपन के साथ साथ सामूहिक भावना को जाग्रत करने के लिए किया गया था.पर आज ये धार्मिक उत्साव जो रूप ले चुके हैं,उसमे धर्म तो लुप्त होता जा रहा है,हाँ फूहड़ ढंग से मनाया जाने वाला उत्सव बच गया है.जो दिनों दिन और बदतर होता जा रहा है.आस्था का स्थान आडम्बर ने ले लिया है.चाहे वह कडोडों रुपये मंहगे पंडालों के निर्माण के लिए हों या डांडिया और रास के रूप में आयोजित बड़े बड़े प्रायोजित कार्यक्रमों के माध्यम से हो.अब तो महानगरों में पेप्सी कोला जैसी कम्पनियाँ भी इन डांडिया कार्यक्रमों का आयोजन करवाने लगी हैं जहाँ भरी भरकम फीस देकर लोग सज धज कर डिस्को डांडिया करने पहुँचते हैं.आस्था और धर्म वहां गौण रहता है,उद्देश्य मात्र मनोरंजन भर रहता है...
पूजा पंडालों में भी चहुँ ओर पैसा ही चमकता है.एक प्रकार से होड़ सी रहती है इन पूजा मंडलियों के बीच.अधिकांशतः इन मंडलियों के कर्ता धर्ता संरक्षक समाज के तथाकथित भाई लोग ही हुआ करते हैं जिनके बीच यह शक्ति प्रदर्शन तथा वर्चस्व स्थापित करने का मामला होता है.वर्चस्व की इस लडाई में गोली बन्दूक चलना आम बात है.पूजा के नाम पर जमकर वसूली होती है और इस वसूली से एकत्रित धन का जो सदुपयोग होता है उसके बखान की आवश्यकता नही.सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है.पूजा पंडालों में मानक भव्यता और ताम-झाम भर होती है.
बड़ा ही अफ़सोस होता है,जितना धन पूजा के नाम पर इस तरह बहाया जाता है,जहाँ एक ओर निर्धन दाने दाने को मुहताज है , बिना इलाज के असमय दुनिया से विदा हो रहे हैं,कई मेधावी बालक हैं जो पैसे के अभाव में पढ़ नही पाते.जहाँ सड़कें टूटी हुई है या और भी न जाने कितने ही असंख्य समस्याएं हैं,जिसने जीवन को विषम बना दिया है.क्या इनसे निपटने की जिम्मेदारी सिर्फ़ सरकार की बनती है.सरकार और व्यवस्था को गलियां दे दे देने से समाज की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है? चार दिनों के लिए बनाये जा रहे भव्य से भव्यतम पंडालों के लिए जो धन पानी के लिए बहाया जाता है उसका उपयोग उसी माता के नाम पर सार्थक कार्यों में भी तो किया जा सकता है.यदि एक कोष बनाकर उन अभावग्रस्त लोगों की मदद करें, फैली हुई अव्यवस्था के लिए कुछ कदम उठायें तो क्या यह भगवान् के प्रति भक्ति से कमतर होगी?
स्थिति तो यह है कि पूजा के ये अवसर जिस प्रकार से शहर में अव्यवस्था फैलाते हैं, कि उन चार पाँच दिनों के स्थिति की स्मृति ही भयातुर कर देती है.जगह जगह सड़क जाम,शोर शराबा,शरारती तत्वों की हुल्लड़बाजी ,सारे काम काज ठप्प इतनी बेचैन करती है कि उत्सवों का आगमन उत्साहित नही आतंकित ओर क्षुब्ध कर देती है..
आस्था मन और आत्मा में बसने वाली,धर्म आचार और व्यवहार में समाहित होने वाली तथा उत्सव सामाजिक सौहाद्र बढ़ाने वाले अवयव हैं।कोई आवश्यक नही कि व्रत उपवास या अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में लिप्त होकर ही आस्तिकता का निष्पादन किया जाय या उसे प्रगाढ़ किया जा सकता है। आस्था और धर्म व्यक्ति के आत्मोन्नति के साथ साथ समाज को उन्नत और सुदृढ़ करने के लिए है।धर्म के नाम पर आडम्बर और धन का अपव्यय सर्वथा अनुचित है और यदि इसे अधर्म कहा जाए तो कोई अतिशियोक्ति न होगी॥
माता सबको सद्बुद्धि तथा मानव धर्म के मर्म को समझ पाने का विवेक दें यही उनसे प्रार्थना है..
" सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके,शरण्ये त्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते "
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