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गतांक से आगे...
परन्तु क्या यह सब इतना ही सहज था..एक ओर तो क्षोभग्रस्त महारानी लज्जा शोक और पापबोध से घुली जा रही थीं, तो दूसरी ओर कणाद भी मोह और विवेक के मध्य छिड़े गहन द्वंद में घिरा अपना मत और करनीय स्थिर करने में स्वयं को सर्वथा असमर्थ पा रहा था.सरोवर सुन्दरी के आलौकिक सौन्दर्य को विस्मृत कर पाना उसके लिए असंभव हो रहा था.स्मृतिपटल पर अवस्थित वह दृश्य उसे उदिग्न कर दिया करता... सदैव ही उसे आभास होता जैसे वह निष्कलुष सौन्दर्य उसे अपने भुजपाश में आबद्ध होने को प्रतिपल प्रणय निवेदन भेज रहा है.
मोहग्रस्त कणाद कभी तो दर्पण के सम्मुख बैठ विभिन्न प्रकार से अपना श्रृंगार करता, अपनी ही छवि पर मुग्ध होता परन्तु जैसे ही विवेक उसे झकझोर उस पर अट्टहास करता ,वह स्वयं को दण्डित करने लगता. विछिप्त सी हो गयी थी उसकी स्थिति..आर्या गांधारी समस्त उपक्रम देख समझ रही थी,परन्तु कुछ भी कर पाने में वह असमर्थ थी. न तो वे महारानी का सत्य उद्घाटित कर सकतीं थीं न ही शिष्य की भ्रमित बुद्धि पर उनकी धर्मदेशना का किंचित भी प्रभाव पड़ रहा था...दुश्चिंताओं में घिरी आर्या के सम्मुख आचार्यवर के पुनरागमन के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प न रह गया था.महारानी को तो उन्होंने समझा लिया था परन्तु कणाद के सम्पूर्ण गतिविधियों पर दृष्टि रखने के अतिरिक्त उनके पास अन्य कोई साधन न था...
असह्य प्रतीक्षा का वह दीर्घ अन्तराल अंततः समाप्त हुआ और आचार्य के आगमन के साथ ही आर्या गांधारी के व्याकुल मन ने कई दिनों उपरांत अवलंबन पाया . अधीरता से वे रात्रि के एकान्तवेला की प्रतीक्षा करने लगी , जबकि वे आचार्यवर को समस्त वृतांत बता पातीं और इस घोर संकट से मुक्ति का मार्ग संधान वे कर पाते ...
उधर अपने सहपाठियों का संग पा कणाद पुनः प्रफ्फुलित हो गया था.समस्त शिष्य अतिउत्साहित हो यात्रा वृतांत कणाद को सुना रहे थे. परन्तु जो वृतांत कणाद के पास था वह तो अकल्पनीय ही था सबके लिए.. कणाद ने अनुमानित किया था कि ऋषिप्रसाद में गोपनीय ढंग से निवास करने वाली वह अप्सरा कोई ऋषि कन्या ही थी. अंत्यंत उत्साहित हो उसने अपने सहपाठियों को समस्त वृतांत तथा अनुमानित ऋषि कन्या के अनिर्वचनीय अनिद्य सौन्दर्य की विरुदावली सुनाई...
फिर क्या था, कणाद का मोह ऐसे विस्तृत हुआ कि उसके चुम्बकीय प्रभाव में अन्यान्य छात्र भी आ गए और उनके मध्य वाक् युद्ध प्रारंभ हो गया. सभी स्वयं को श्रेष्ठ घोषित कर पाणिग्रहण हेतु स्वयं को उस कन्या का अधिकारी ठहरा रहे थे.ज्येष्ठ शिष्य ने अपने ज्येष्ठता का कारण दिया तो कणाद ने अपने सर्वप्रथम दर्शन और प्रेम का. इसके साथ ही रमणी पर अधिकार हेतु किसी ने अपने बल का तो किसी ने अपने सौन्दर्य का और किसी ने धन का आधार स्थापित किया. आपसी सद्भाव सौहाद्र भाव तिरोहित हो मोह और इर्ष्या ने परस्पर सबको एक दूसरे का प्रबल प्रतिद्वंदी तथा शत्रु बना दिया था...
इस तथ्य से सभी भली भांति परिचित थे कि आचार्य विद्याध्यन के मध्य ब्रह्मचर्य व्रत खण्डित कर गृहस्थ स्थापना की आज्ञां कदापि न देंगे. सो गुरुवर संग किसी प्रकार की मंत्रणा किये या उनकी आज्ञा बिना ही समस्त शिष्य अपने अभिभावकों से विवाह का अनुज्ञान पाने आचार्यवर के नाम एक पत्र छोड़ कर स्वगृह को प्रस्थान कर गए. प्रातःकाल रिक्त संघाराम ने पूर्व से ही दुर्घटना से मर्माहत आचार्य और देवी गांधारी के ह्रदय पर मानों तुषारपात सा कर उन्हें दुःख के सागर में आकंठ निमग्न कर दिया. शोक संतप्त आर्या अपने पुत्रवत शिष्यों के मोह-ग्रस्त अवस्था का ध्यान कर उनका पतन लक्ष्य कर आहत हो विलाप करने लगी.
आचार्य खालित आहत अवश्य थे परन्तु निराश न थे..उन्हें अपनी दी हुई शिक्षा और शिष्यों के सुसंस्कार पर पूर्ण विश्वास था. भग्नहृदया भगिनी को उन्होंने आश्वस्त किया कि कुलीन शिष्यगणों की वर्तमान मनोदशा वयजनित विभ्रम है जो कि नितांत ही क्षणिक है,जैसे ही उनका विवेक जागृत होगा, पश्चात्ताप की अग्नि में शुद्ध हो वे पुनः अपने सुसंस्कार और कर्तब्य का सर्वोत्कृष्ट रूप से वहन करेंगे.... क्षात्रावास में उनका विद्याध्यन हेतु पुनरागमन अवश्यम्भावी है.वस्तुतः विधाता रचित इस घटना के पीछे भी छुपा हुआ उनका कल्याणकारी महत उद्देश्य ही है..दिव्य द्रष्टा आचार्यवर के धीर गंभीर आशापूर्ण वचनों ने आर्या के दग्ध ह्रदय को अनिर्वचनीय शीतलता प्रदान की..
इधर महारानी के गृहत्याग उपरांत क्रोध शांत होने पर जब कोशल नरेश को अपने अकरणीय का आभास हुआ तो वे विह्वल हो उठे और उन्होंने राज्य में चहुँ ओर महारानी का संधान आरम्भ कर दिया..परन्तु सब ओर से उन्हें निराशा ही मिली..निराशा पश्चात्ताप और वियोग महाराजा के दग्ध ह्रदय में हविष्याग्नि बन विरह ज्वाला को और भी उग्र कर दिया करते थे....अंततः चहुँ ओर से निराशा प्राप्ति उपरांत अब नृप के सम्मुख महारानी के संधान हेतु आचार्य के दिव्य ज्ञान का सहयोग लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प न था..
शोक क्षोभ से विह्वल नरेश आश्रम में उपस्थित हो आचार्यवर के सम्मुख व्याकुल भाव से रुदन करने लगे...परन्तु उन्हें कहाँ आभास था कि जिस अभिलाषा से वे आश्रम में उपस्थित हुए हैं, उनका अभीष्ट तो वहीँ सुरक्षित है.जैसे ही उनके सम्मुख यह रहस्योद्घाटन हुआ कोशल नरेश आभारनत हो आचार्यद्वय के चरणों में नतमस्तक हो गए....
दंपत्ति का पुनर्मिलन आह्लाद को भी आह्लादित करने वाला हुआ.परन्तु आचार्यवर ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए नरेश से कहा कि उन्हें उनकी भार्या तभी प्राप्त होगी जब कि वे अग्नि के सम्मुख पवित्र वैदिक मंत्रों के साथ सप्त वचन लेंगे और अग्निदेव को साक्षी मान महारानी की मांग में सिन्दूर भरेंगे...
पवित्र वैदिक मंत्रों संग महारानी का सिंदूरदान संपन्न हुआ.पतिपत्नी ने गृहस्थ धर्म की मर्यादा और अक्षुणता हेतु समस्त देवी देवताओं को साक्षी रख मृत्युपर्यंत एक दूसरे के प्रति प्रेम ,निष्ठां , मर्यादा, आदर और सेवा का शपथ लिया और तभी से परंपरा में सिंदूरदान नाम की इस पावन परंपरा का श्रीगणेश हुआ. सौभाग्य सिन्दूर विवाहित तथा अविवाहित स्त्री के मध्य अंतर स्थापित करने वाला सुगम साधन ही नहीं, स्त्री की मान रक्षा तथा पति के कर्तब्यबोध का सफल वाहक भी बन गया.
पुत्रीवत महारानी को पतिगृह विदा करते आचार्य वर तथा आर्या गांधारी का ह्रदय विह्वल हो उठा,परन्तु उसके सुखी जीवन के आभास और अभिलाषा ने उन्हें परम संतुष्टि और अनिर्वचनीय आनंद भी दिया..
महरानी के गमनोपरांत जब शिष्यगण अपने अभिभावकों से पाणिग्रहण हेतु सहमति ले आश्रम में उपस्थित हुए तो वहां की साज-सज्जा और विवाह वेदी देख अनिष्ट की आशंका से उनका मन विचलित होने लगा. सशंकित ह्रदय वे सभी आर्या तथा आचार्य के सम्मुख उपस्थित हुए तथा अपनी धृष्टता के लिए क्षमायाचना करते हुए अपना प्रयोजन स्पष्ट किया..अपना-अपना पक्ष रखते हुए सबने उस ऋषिकन्या पर अपना अधिकार स्थापित किया तथा पाणिग्रहण की अनुमति मांगी .
आचार्य कुछ पल को तो शांत भाव से समस्त अघटित देखते रहे,यकायक भीषण चीत्कार के साथ उठ खड़े हुए..उस भीषण वज्र ध्वनि ने सभी शिष्यों को स्तब्ध कर दिया.सभी निष्पलक निर्मिमेष दृष्टि से आचार्यवर को देखने लगे...और जैसे ही आचार्यवर ने महारानी का सत्य उनके सम्मुख उद्घाटित किया, लज्जा ग्लानि और पापबोध ने उन्हें विक्षिप्त सा कर दिया...जिन्हें वे अबतक एक कुंवारी ऋषिकन्या मान रहे थे ,वह तो परम वन्दनीय महारानी थीं. क्षणमात्र में मोह तिरोहित हो गया और आत्मग्लानि की भीषण ज्वाला में उनका कोमल ह्रदय दग्ध होने लगा..आचार्यवर के चरणों में भूलुंठित शिष्य अपने इस निकृष्ट कुकृत्य हेतु प्राणदंड की याचना करने लगे.
आचार्यवर ने कठोर शब्दों में उन्हें सावधान किया कि इस घोरतम पाप के लिए उन्हें दंड तो अवश्य मिलेगा परन्तु दंड की उद्घोषणा अगले दिन प्रातः काल की जायेगी इस अवधि-मध्य यदि कोई क्षात्र दंडमुक्ति की अभिलाषा रखता हो तो बिना आज्ञा, आश्रम छोड़कर जा सकता है..
कठोरतम दंड का आश्वासन पा शिष्यों ने मानों नूतन जीवन का आधार पाया था..अत्यंत अधीरतापूर्वक वे उषा काल की प्रतीक्षा करने लगे.अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत पहले ही नित्यक्रिया से निवृत हो वे आचार्यवर के कक्ष के सम्मुख उपस्थित हो गए.
शिष्यों की प्रतिबद्धता ने आचार्यवर को परम सुख और संतोष दिया. पश्चात्ताप की जिस अग्नि में इतने काल तक वे जले थे, उसमे से उनका ह्रदय विशुद्ध कंचन बन बाहर आ गया था.अब इससे बड़ा दंड और क्या हो सकता था कि जीवन भर वे अपने इस अकरणीय से शिक्षा ले मोह बंधन से मुक्त रहते. आचार्यवर ने उन्हें दंडमुक्त कर परम ज्ञान का वह उपदेश दिया जो उनके शिक्षण समाप्ति के पूर्व उन्हें प्राप्त होता. इसके साथ ही आचार्यवर ने अपने इन परमज्ञानी शिष्यों को विश्व कल्याण हेतु ज्ञान प्रसार की आज्ञा दे समाज के बीच भेज दिया..
सर्वविदित है कि महर्षि गौतम, कपिल, जैमिनी, पतंजलि, व्यास और कणाद ने ज्ञान रूपी वह धरोहर विश्व को सौंपी है जो सृष्टि के अंत तक संसार का मार्गदर्शन करती रहेंगी....
(हिंदी साहित्य के सिद्ध हस्ताक्षर, परम आदरणीय श्री रामेश्वर प्रसाद सिंह की ह्रदय से आभारी हूँ,जिनके पुराणों,जैन तथा बौद्ध ग्रंथों के गहन अध्ययन अन्वेश्नोपरांत लिखित महान आध्यात्मिक ऐतिहासिक उपन्यास " पाटलीपुत्र की राजनर्तकी " के अध्ययन क्रम में इस प्रसंग से अवगत होने का सौभाग्य मिला...
उक्त पुस्तक में तो यह प्रसंग अत्यंत विस्तृत रूप में उल्लिखित है,मैंने उसके साररूप को अपने शब्दों में ढाल यहाँ प्रेषित करने का प्रयास किया है.चूँकि यह प्रसंग मेरे लिए सर्वथा नवीन एवं रोमांचक था,सो मैंने सार्वजानिक स्थल पर इसे सर्वसुलभ करने का निर्णय लिया. )
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27.2.09
द्वापर वहीँ ठहरा है........
जीवन में कई बार ऐसा होता है कि कोई स्थिति विशेष, प्रसंग, परिभाषाएं, शब्द, भाव वर्षों तक मन मष्तिष्क के सम्मुख उपस्थित रहते हुए भी अस्पष्ट औचित्यहीन होकर मनोभूमि पर विखण्डित से अवस्थित होते हैं और फिर किसी एक कालखंड में ऐसा कुछ घटित हो जाता है कि वे अपने दिव्य उद्दात्त रूप में नवीन अर्थ के साथ स्वयं को परिभाषित कर प्रतिष्ठित कर जाते हैं.
आस्तित्व का आविर्भाव जैसे ही धरती पर होता है, शरीर की आँखें खुलती नहीं कि जिज्ञासाओं की आँखें भी खुल जाती है. क्यों और कैसे, जैसे बोध और जिज्ञासा ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से इतर,विशिष्ठ करते हैं और यही जिज्ञासा ज्ञान विज्ञान का भी विस्तार करता है..
मेरा प्रबल विश्वास है कि किसी भी धर्म परंपरा में निहित व्रत त्योहारों के प्रावधान में सभ्यता संस्कृति और समाज के व्यापक मंगल के कारक निहित हैं. प्रबुद्ध ऋषियों मनीषियों ने वर्षों तक कठोर साधना और वैज्ञानिक अन्वेशानोपरांत इन्हें धर्म और परंपरा में नियोजित और प्रतिष्ठित किया है.......परन्तु बाल्यावस्था से ही रंगोत्सव (होली) का जो स्वरुप देखा था और इस परंपरा में निहित जितने कारणों/आख्यानों, भावों को जान पायी थी,इसकी प्रासंगिकता और अपरिहार्यता मुझे नितांत ही अनावश्यक लगती थी.उच्श्रीन्ख्लता को धार्मिक आधार देते इस पर्व की प्रासंगिकता मुझे समझ नहीं आती थी. अपितु यदि यह कहूँ कि मानस में इसकी छाप एक निकृष्ट, वीभत्स उत्सव के रूप में थी तो कोई अतिशियोक्ति न होगी......
यह ईश्वर की ही असीम अनुकम्पा थी कि गत वर्ष रंगोत्सव के अवसर पर वृन्दावन जाना हुआ.... सुसंयोग से बांकेबिहारी जी के मंदिर के अत्यंत निकट ठहरने की व्यवस्था भी हो गयी....वहां दो दिनों में जो भी देखा, उस समय की मनोदशा की तो क्या कहूँ, अभी भी उसका स्मरण मात्र ही रोमांचित और भावुक कर देता है और भावावेश शब्दों को कुंठित अवरुद्ध कर देता है....
इतने वर्षों की जिज्ञासा ऐसे शांत होगी,कभी परिकल्पित न किया था. कहाँ तो रंगोत्सव का पर्याय ही , उच्श्रीन्ख्लता, रासायनिक रंगों का दुरूपयोग, मांसाहार ,मादक पदार्थों का सेवन और होली के नाम पर शीलता का उल्लंघन इत्यादि ही देखा था.......और जो वहां देखा तो बस आत्मविस्मृत हो देखती ही रह गयी........
पूरे क्षेत्र में कहीं भी मद्य (नशीले पदार्थ) और मांसाहार का नामोनिशान नहीं था. बच्चों से लेकर बुजुर्ग स्त्री पुरुष, स्थानीय नागरिक या आगंतुक तक सभी संकरी गलियों या सडकों से निर्भीक गुजरते हुए बिना किसी परिचय तथा भेद भाव के, बिना किसी को स्पर्श किये रंग गुलाल से सराबोर किये जा रहे थे. कुछ लोगों का समूह वाद्य यंत्रों के साथ तो कुछ ऐसे ही तालियाँ बजाते हुए, भजन गाते हुए, झूमते नाचते गलिओं से गुजर रहे थे. कौन सधवा है,कौन विधवा न रंग डालने वाले इसका भान रख रहे थे और न ही रंगे जाने वालों को कोई रंज या क्षोभ था......जिस तरह से निर्भीक हो किशोरियां ,युवतियां , महिलाएं मार्गों पर चल रहीं थीं और जितनी शिष्टता से उनपर रंग डाले जा रहे थे ,यह तो अभिभूत ही कर गया....क्योंकि इसकी परिकल्पना हम अपने क्षेत्र में कतई नहीं कर सकते.
बाँकेबिहारी जी के मंदिर का पूरा प्रांगण रंग गुलाल से सराबोर था....जहाँ कहीं भी गयी,जहाँ तक दृष्टि गयी देखा , पूरा वृन्दावन ही भक्तिमय रंगमय हो विभोर हो झूम रहा है, गा रहा है..........इन दृश्यों ने मन ऐसे बाँधा कि ...लगा द्वापर बीता कहाँ है......यह तो यहीं ठहरा है, आज भी........तन मन आत्मा ऐसे रंग गया कि, यह पावन उत्सव - रंगोत्सव, अपने पूर्ण अर्थ और दिव्य स्वरुप में मनोभूमि पर अवतरित हो गया.........
मन बड़ा कचोट जाता है और लगता है कि जिस लोक कल्याणकारी सात्विक भाव के साथ परंपरा में पर्व त्योहारों का प्रावधान हुआ था,क्या हम उन्हें उनके उसी अर्थ और स्वरुप में नहीं मना सकते........समस्या है कि हम सुख तो पाना चाहते हैं, पर यह विस्मृत कर जाते हैं कि सात्विक सुख ही असली सुख है.यही चिरस्थायी होता है और यह सुख आत्मा तक पहुंचकर क्लांत मन को विश्राम तथा सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है.तन रंगने से अधिक आवश्यक मन को रंगना है.........चिर सुख हेतु एक बार सात्विक रंगों से रंगकर देखें इस मन को........देखें कितना आनद है इस रंग मे...........
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आस्तित्व का आविर्भाव जैसे ही धरती पर होता है, शरीर की आँखें खुलती नहीं कि जिज्ञासाओं की आँखें भी खुल जाती है. क्यों और कैसे, जैसे बोध और जिज्ञासा ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से इतर,विशिष्ठ करते हैं और यही जिज्ञासा ज्ञान विज्ञान का भी विस्तार करता है..
मेरा प्रबल विश्वास है कि किसी भी धर्म परंपरा में निहित व्रत त्योहारों के प्रावधान में सभ्यता संस्कृति और समाज के व्यापक मंगल के कारक निहित हैं. प्रबुद्ध ऋषियों मनीषियों ने वर्षों तक कठोर साधना और वैज्ञानिक अन्वेशानोपरांत इन्हें धर्म और परंपरा में नियोजित और प्रतिष्ठित किया है.......परन्तु बाल्यावस्था से ही रंगोत्सव (होली) का जो स्वरुप देखा था और इस परंपरा में निहित जितने कारणों/आख्यानों, भावों को जान पायी थी,इसकी प्रासंगिकता और अपरिहार्यता मुझे नितांत ही अनावश्यक लगती थी.उच्श्रीन्ख्लता को धार्मिक आधार देते इस पर्व की प्रासंगिकता मुझे समझ नहीं आती थी. अपितु यदि यह कहूँ कि मानस में इसकी छाप एक निकृष्ट, वीभत्स उत्सव के रूप में थी तो कोई अतिशियोक्ति न होगी......
यह ईश्वर की ही असीम अनुकम्पा थी कि गत वर्ष रंगोत्सव के अवसर पर वृन्दावन जाना हुआ.... सुसंयोग से बांकेबिहारी जी के मंदिर के अत्यंत निकट ठहरने की व्यवस्था भी हो गयी....वहां दो दिनों में जो भी देखा, उस समय की मनोदशा की तो क्या कहूँ, अभी भी उसका स्मरण मात्र ही रोमांचित और भावुक कर देता है और भावावेश शब्दों को कुंठित अवरुद्ध कर देता है....
इतने वर्षों की जिज्ञासा ऐसे शांत होगी,कभी परिकल्पित न किया था. कहाँ तो रंगोत्सव का पर्याय ही , उच्श्रीन्ख्लता, रासायनिक रंगों का दुरूपयोग, मांसाहार ,मादक पदार्थों का सेवन और होली के नाम पर शीलता का उल्लंघन इत्यादि ही देखा था.......और जो वहां देखा तो बस आत्मविस्मृत हो देखती ही रह गयी........
पूरे क्षेत्र में कहीं भी मद्य (नशीले पदार्थ) और मांसाहार का नामोनिशान नहीं था. बच्चों से लेकर बुजुर्ग स्त्री पुरुष, स्थानीय नागरिक या आगंतुक तक सभी संकरी गलियों या सडकों से निर्भीक गुजरते हुए बिना किसी परिचय तथा भेद भाव के, बिना किसी को स्पर्श किये रंग गुलाल से सराबोर किये जा रहे थे. कुछ लोगों का समूह वाद्य यंत्रों के साथ तो कुछ ऐसे ही तालियाँ बजाते हुए, भजन गाते हुए, झूमते नाचते गलिओं से गुजर रहे थे. कौन सधवा है,कौन विधवा न रंग डालने वाले इसका भान रख रहे थे और न ही रंगे जाने वालों को कोई रंज या क्षोभ था......जिस तरह से निर्भीक हो किशोरियां ,युवतियां , महिलाएं मार्गों पर चल रहीं थीं और जितनी शिष्टता से उनपर रंग डाले जा रहे थे ,यह तो अभिभूत ही कर गया....क्योंकि इसकी परिकल्पना हम अपने क्षेत्र में कतई नहीं कर सकते.
बाँकेबिहारी जी के मंदिर का पूरा प्रांगण रंग गुलाल से सराबोर था....जहाँ कहीं भी गयी,जहाँ तक दृष्टि गयी देखा , पूरा वृन्दावन ही भक्तिमय रंगमय हो विभोर हो झूम रहा है, गा रहा है..........इन दृश्यों ने मन ऐसे बाँधा कि ...लगा द्वापर बीता कहाँ है......यह तो यहीं ठहरा है, आज भी........तन मन आत्मा ऐसे रंग गया कि, यह पावन उत्सव - रंगोत्सव, अपने पूर्ण अर्थ और दिव्य स्वरुप में मनोभूमि पर अवतरित हो गया.........
मन बड़ा कचोट जाता है और लगता है कि जिस लोक कल्याणकारी सात्विक भाव के साथ परंपरा में पर्व त्योहारों का प्रावधान हुआ था,क्या हम उन्हें उनके उसी अर्थ और स्वरुप में नहीं मना सकते........समस्या है कि हम सुख तो पाना चाहते हैं, पर यह विस्मृत कर जाते हैं कि सात्विक सुख ही असली सुख है.यही चिरस्थायी होता है और यह सुख आत्मा तक पहुंचकर क्लांत मन को विश्राम तथा सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है.तन रंगने से अधिक आवश्यक मन को रंगना है.........चिर सुख हेतु एक बार सात्विक रंगों से रंगकर देखें इस मन को........देखें कितना आनद है इस रंग मे...........
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12.2.09
!!! झूम बराबर झूम !!!
भक्त प्रहलाद जब प्रभु प्रेम सरिता में आकंठ निमग्न हो तन मन की सुधि बिसरा तन्मय हो प्रभु वंदन में लीन हो जाते और झूमकर गायन और नृत्य में मग्न हो जाते थे तो उस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए देवता भी विभोर हो इस विहंगम दृश्य का अवलोकन करने और इस दुर्लभ रस का पान करने लगते थे. .
लेकिन कहते हैं न अंहकार व्यक्ति को इतना अँधा कर देता है कि उसे मोह माया ममता हित अनहित किसी का भान नही रहता,सो मदांध हिरण्यकश्यप जो कि अपने बल के अंहकार में विवेकरहित हो चुका था, उसके लिए पुत्र पुत्र नही बल्कि एक प्रतिद्वंदी, एक चुनौती था, जो उसके ही घर में रह उसके शत्रु में आस्था रखता था,आठों प्रहार उसका का गुण गान किया करता था. अंहकार ने उसके ह्रदय से वात्सल्य भाव पूर्ण रूपेण तिरोहित कर उसके स्थान पर प्रतिद्वंदिता और शत्रुता का भाव प्रतिष्टित कर दिया था. अपने ही संतान और उत्तराधिकारी को नष्ट करने ,उसका वध करने को प्रतिपल सचेष्ट रहता और भांति भांति के कुचक्र रचा करता था.
बड़ी विचित्र स्थिति थी, एक ही कारक जो प्रहलाद के लिए सुख का श्रोत थी,हिरण्यकश्यप के लिए अपार कष्टदाई थी. घृणा और विद्वेष में निमग्न हिरण्यकश्यप नारायण के लिए जैसे ही विष वमन(दुर्वचन) करने लगता,पुत्र की भावनाओं को आहत करने को उद्धत होता ,नारायण नाम के श्रवण मात्र से प्रहलाद ऐसे आह्लादित और विभोर हो जाते कि वे भक्ति रस में निमग्न हो सुध बुध बिसरा उन्मत्त हो नृत्य करने लगते.एक ही कारण एक के लिए अपार सुख और दूसरे के लिए असह्य कष्ट का निमित्त थी.
एक दिन ऐसे ही भरी सभा में जैसे ही हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद के आराध्य के लिए दुर्वचन बोलना आरम्भ किया कि प्रहलाद की फ़िर से वही दशा हो गई. हिरण्यकश्यप के लिए यह सब असह्य था.उसने सैनिकों को आदेश दिया कि अविलम्ब प्रहलाद को पकड़ कर कारागार में डाल दिया जाय और जितनी बार वह नारायण का नाम ले प्रति नाम दस कोड़े मारा जाय. आज्ञानुसार सैनिक प्रहलाद को पकड़ने आगे बढे,पर यह क्या..... जैसे ही उन्होंने प्रहलाद का स्पर्श किया, वे भी वैसे ही उन्मत्त हो प्रहलाद के साथ झूम झूम कर नृत्य में मग्न हो गए.. यह दृश्य हिरण्यकश्यप की क्रोधाग्नि को और भी भड़का गया..उसने तुंरत कुछ और सैनिकों को इन लोगों को पकड़कर कालकोठरी पहुँचाने का आदेश दिया.परन्तु जैसे ही सैनिकों की यह टुकडी वहां पहुँच इन्हे पकड़ने को उद्धत हुई कि पिछली बार की भांति ये भी वैसे ही मग्न हो गए.इसके बाद तो बस पूरा परिदृश्य ही यही हो गया.जितने लोग जाते सभी उसी रंग में रंग जाते.पूरी सभा ही भक्तिमय हो गई थी.
हिरण्यकश्यप क्रोध से बावला हो गया.यूँ भी उसे प्रजा की अभिरुचि का आभास था.वह जानता था कि भयाक्रांत हो प्रजा भले उसका मुखर विरोध नही कर रही,परन्तु प्रजा के हृदयशीर्ष पर उसकी शत्रु का उपासक उसका पुत्र ही विराजता है.उसकी सत्ता और ईश्वरत्व को चुनौती उसका अपना ही पुत्र दे रहा है....इसलिए वह इसके मूल को ही समाप्त कर जनमानस के सम्मुख दृष्टांत रखना चाहता था कि उसके विरोधी के लिए तीनो लोकों में कहीं स्थान नही है.और आज तो उसके सामने भरी सभा में यह समुदाय उसके दर्प को सरेआम चुनौती दे रहा था. आहत, क्रोध से काँपता वह स्वयं ही उन्मत्त समूह को तितर बितर करने निकल पड़ा.कितनो को उसने मौत के घाट उतार दिया,कितनो को घायल कर दिया पर उस अवस्था में भी लोग पूर्ववत वैसे ही झूमते गाते रहे....
देवताओं का वह समूह,जो स्तब्ध हो यह सब वृत्तांत देख रहा था,उनके मन में तीव्र कौतूहल जगा . उन्होंने निकट खड़े नारदजी से प्रश्न किया कि आज जो कौतुक उन्होंने सभा मंडप में देखा ,आज तक उन्होंने जो सुन जान रखा था कि भक्ति में इतनी शक्ति होती है कि भक्त के प्रभामंडल के संपर्क भर से व्यक्ति के समस्त कलुष नष्ट हो जाते हैं और उसके ह्रदय में भी इसकी अजश्र धारा प्रवाहमान हो जाती है, यह दृश्य उसका साक्षात् प्रमाण है. जड़ संस्कार और क्रूर कर्म में लिप्त इतने बड़े समूह की जिस प्रहलाद के स्पर्शमात्र से यह गति हुई , परन्तु पिता होते हुए भी हिरण्यकश्यप पर प्रहलाद के सुसंस्कारों ,शीर्ष भक्ति का रंचमात्र भी प्रभाव क्यों नही पड़ा.....
तब नारदजी ने उनके शंकाओं का समाधान करते हुए कहा कि जैसे विद्युत् तरंग प्रवाहित होने के लिए वस्तु में रंचमात्र भी धातु तत्त्व की उपस्थिति आवश्यक है, वैसे ही सत्संगति में सकारात्मक भाव का ह्रदय में संचार तभी सम्भव है जब कि व्यक्ति के ह्रदय में सुप्त अवस्था में ही सही सुसंस्कार स्थित हो. ये जितने व्यक्ति प्रहलाद को पकड़ने गए,भले क्रूर कर्म में लिप्त होने के कारण इनके संस्कार शिथिल पड़ गए थे और निरपराध प्रहलाद को प्रताडित करने को ये सचेष्ट हुए थे,परन्तु भक्ति रस में निमग्न पूर्ण जागृत सुसंस्कारी बालक के स्पर्श ने विद्युत् धारा सा प्रवाहित होकर सैनिकों के सुसंस्कारों को भी पूर्ण रूपेण जागृत कर दिया और चूँकि हिरण्यकश्यप में उस संस्कार तत्त्व का पूर्णतः अभाव था, इस कारण उसके मनोमस्तिष्क पर इस तीव्र प्रेम तरंग, सुसंस्कारों का कोई प्रभाव नही पड़ा.....
विज्ञान कहता है कि व्यक्ति में गुण अधिकांशतः अनुवान्शकीय होते हैं, गुणसूत्रों द्वारा पीढियों से विरासत में मिलते हैं.धर्म कहता है, व्यक्ति जन्म और संस्कार अपने संचित कर्म और भाग्यानुसार पाता है. इसलिए घोर अधम व्यक्ति की संतान भी महान संस्कारी होते देखे गए हैं और महान धर्मात्मा की संतान भी दुराचारी कुसंस्कारी पाई गई है..संस्कार का जन्म वस्तुतः जन्म के साथ ही हो जाता है.यह अलग बात है कि यदि परिवेश या परवरिश सही न मिले तो सुसंस्कार सुप्तावस्था में पड़े रहते हैं.परन्तु जैसे ही इन्हे अनुकूल वातावरण उपलब्ध होता है,ये मनोभूमि पर प्रकट हो जाते हैं.वाल्मीकि वर्षों तक चौर कर्म में लिप्त रहे परन्तु जैसे ही उनके सुसंस्कार उदित हुए उन्होंने चिरंतन साहित्य का सृजन कर डाला.ऐसा नही था कि यह संस्कार परवर्ती समय में उनके ह्रदय पर आरोपित हुआ था,यह तो उस समय भी उनके ह्रदय में उपस्थित था जब वे अकरणीय में लिप्त थे.यदि सुंदर सकारात्मक बातों का किसी पर कोई प्रभाव नही पड़ रहा हो तो मान लेना चाहिए कि उसके ह्रदय में उन्हें धारण करने का सामर्थ्य ही नही है.
जिस तरह हजारों मील दूर से छोड़े गए रेडियो तरंगों को उपकरण/माध्यम पकड़ लेता है,ऐसे ही ह्रदय में सुसंस्कार या कुसंस्कार जो भी बीज रूप में उपस्थित होते हैं अपने अनुकूल परिवेश से तरंग(अभिरुचि के साधन) पकड़ लेते हैं......कोई पब/डिस्को में जाकर सुरा और शोर में मगन होने पर झूम पाता है ,तो कोई भक्ति रस में डूबकर ही झूम लेता है.
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लेकिन कहते हैं न अंहकार व्यक्ति को इतना अँधा कर देता है कि उसे मोह माया ममता हित अनहित किसी का भान नही रहता,सो मदांध हिरण्यकश्यप जो कि अपने बल के अंहकार में विवेकरहित हो चुका था, उसके लिए पुत्र पुत्र नही बल्कि एक प्रतिद्वंदी, एक चुनौती था, जो उसके ही घर में रह उसके शत्रु में आस्था रखता था,आठों प्रहार उसका का गुण गान किया करता था. अंहकार ने उसके ह्रदय से वात्सल्य भाव पूर्ण रूपेण तिरोहित कर उसके स्थान पर प्रतिद्वंदिता और शत्रुता का भाव प्रतिष्टित कर दिया था. अपने ही संतान और उत्तराधिकारी को नष्ट करने ,उसका वध करने को प्रतिपल सचेष्ट रहता और भांति भांति के कुचक्र रचा करता था.
बड़ी विचित्र स्थिति थी, एक ही कारक जो प्रहलाद के लिए सुख का श्रोत थी,हिरण्यकश्यप के लिए अपार कष्टदाई थी. घृणा और विद्वेष में निमग्न हिरण्यकश्यप नारायण के लिए जैसे ही विष वमन(दुर्वचन) करने लगता,पुत्र की भावनाओं को आहत करने को उद्धत होता ,नारायण नाम के श्रवण मात्र से प्रहलाद ऐसे आह्लादित और विभोर हो जाते कि वे भक्ति रस में निमग्न हो सुध बुध बिसरा उन्मत्त हो नृत्य करने लगते.एक ही कारण एक के लिए अपार सुख और दूसरे के लिए असह्य कष्ट का निमित्त थी.
एक दिन ऐसे ही भरी सभा में जैसे ही हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद के आराध्य के लिए दुर्वचन बोलना आरम्भ किया कि प्रहलाद की फ़िर से वही दशा हो गई. हिरण्यकश्यप के लिए यह सब असह्य था.उसने सैनिकों को आदेश दिया कि अविलम्ब प्रहलाद को पकड़ कर कारागार में डाल दिया जाय और जितनी बार वह नारायण का नाम ले प्रति नाम दस कोड़े मारा जाय. आज्ञानुसार सैनिक प्रहलाद को पकड़ने आगे बढे,पर यह क्या..... जैसे ही उन्होंने प्रहलाद का स्पर्श किया, वे भी वैसे ही उन्मत्त हो प्रहलाद के साथ झूम झूम कर नृत्य में मग्न हो गए.. यह दृश्य हिरण्यकश्यप की क्रोधाग्नि को और भी भड़का गया..उसने तुंरत कुछ और सैनिकों को इन लोगों को पकड़कर कालकोठरी पहुँचाने का आदेश दिया.परन्तु जैसे ही सैनिकों की यह टुकडी वहां पहुँच इन्हे पकड़ने को उद्धत हुई कि पिछली बार की भांति ये भी वैसे ही मग्न हो गए.इसके बाद तो बस पूरा परिदृश्य ही यही हो गया.जितने लोग जाते सभी उसी रंग में रंग जाते.पूरी सभा ही भक्तिमय हो गई थी.
हिरण्यकश्यप क्रोध से बावला हो गया.यूँ भी उसे प्रजा की अभिरुचि का आभास था.वह जानता था कि भयाक्रांत हो प्रजा भले उसका मुखर विरोध नही कर रही,परन्तु प्रजा के हृदयशीर्ष पर उसकी शत्रु का उपासक उसका पुत्र ही विराजता है.उसकी सत्ता और ईश्वरत्व को चुनौती उसका अपना ही पुत्र दे रहा है....इसलिए वह इसके मूल को ही समाप्त कर जनमानस के सम्मुख दृष्टांत रखना चाहता था कि उसके विरोधी के लिए तीनो लोकों में कहीं स्थान नही है.और आज तो उसके सामने भरी सभा में यह समुदाय उसके दर्प को सरेआम चुनौती दे रहा था. आहत, क्रोध से काँपता वह स्वयं ही उन्मत्त समूह को तितर बितर करने निकल पड़ा.कितनो को उसने मौत के घाट उतार दिया,कितनो को घायल कर दिया पर उस अवस्था में भी लोग पूर्ववत वैसे ही झूमते गाते रहे....
देवताओं का वह समूह,जो स्तब्ध हो यह सब वृत्तांत देख रहा था,उनके मन में तीव्र कौतूहल जगा . उन्होंने निकट खड़े नारदजी से प्रश्न किया कि आज जो कौतुक उन्होंने सभा मंडप में देखा ,आज तक उन्होंने जो सुन जान रखा था कि भक्ति में इतनी शक्ति होती है कि भक्त के प्रभामंडल के संपर्क भर से व्यक्ति के समस्त कलुष नष्ट हो जाते हैं और उसके ह्रदय में भी इसकी अजश्र धारा प्रवाहमान हो जाती है, यह दृश्य उसका साक्षात् प्रमाण है. जड़ संस्कार और क्रूर कर्म में लिप्त इतने बड़े समूह की जिस प्रहलाद के स्पर्शमात्र से यह गति हुई , परन्तु पिता होते हुए भी हिरण्यकश्यप पर प्रहलाद के सुसंस्कारों ,शीर्ष भक्ति का रंचमात्र भी प्रभाव क्यों नही पड़ा.....
तब नारदजी ने उनके शंकाओं का समाधान करते हुए कहा कि जैसे विद्युत् तरंग प्रवाहित होने के लिए वस्तु में रंचमात्र भी धातु तत्त्व की उपस्थिति आवश्यक है, वैसे ही सत्संगति में सकारात्मक भाव का ह्रदय में संचार तभी सम्भव है जब कि व्यक्ति के ह्रदय में सुप्त अवस्था में ही सही सुसंस्कार स्थित हो. ये जितने व्यक्ति प्रहलाद को पकड़ने गए,भले क्रूर कर्म में लिप्त होने के कारण इनके संस्कार शिथिल पड़ गए थे और निरपराध प्रहलाद को प्रताडित करने को ये सचेष्ट हुए थे,परन्तु भक्ति रस में निमग्न पूर्ण जागृत सुसंस्कारी बालक के स्पर्श ने विद्युत् धारा सा प्रवाहित होकर सैनिकों के सुसंस्कारों को भी पूर्ण रूपेण जागृत कर दिया और चूँकि हिरण्यकश्यप में उस संस्कार तत्त्व का पूर्णतः अभाव था, इस कारण उसके मनोमस्तिष्क पर इस तीव्र प्रेम तरंग, सुसंस्कारों का कोई प्रभाव नही पड़ा.....
विज्ञान कहता है कि व्यक्ति में गुण अधिकांशतः अनुवान्शकीय होते हैं, गुणसूत्रों द्वारा पीढियों से विरासत में मिलते हैं.धर्म कहता है, व्यक्ति जन्म और संस्कार अपने संचित कर्म और भाग्यानुसार पाता है. इसलिए घोर अधम व्यक्ति की संतान भी महान संस्कारी होते देखे गए हैं और महान धर्मात्मा की संतान भी दुराचारी कुसंस्कारी पाई गई है..संस्कार का जन्म वस्तुतः जन्म के साथ ही हो जाता है.यह अलग बात है कि यदि परिवेश या परवरिश सही न मिले तो सुसंस्कार सुप्तावस्था में पड़े रहते हैं.परन्तु जैसे ही इन्हे अनुकूल वातावरण उपलब्ध होता है,ये मनोभूमि पर प्रकट हो जाते हैं.वाल्मीकि वर्षों तक चौर कर्म में लिप्त रहे परन्तु जैसे ही उनके सुसंस्कार उदित हुए उन्होंने चिरंतन साहित्य का सृजन कर डाला.ऐसा नही था कि यह संस्कार परवर्ती समय में उनके ह्रदय पर आरोपित हुआ था,यह तो उस समय भी उनके ह्रदय में उपस्थित था जब वे अकरणीय में लिप्त थे.यदि सुंदर सकारात्मक बातों का किसी पर कोई प्रभाव नही पड़ रहा हो तो मान लेना चाहिए कि उसके ह्रदय में उन्हें धारण करने का सामर्थ्य ही नही है.
जिस तरह हजारों मील दूर से छोड़े गए रेडियो तरंगों को उपकरण/माध्यम पकड़ लेता है,ऐसे ही ह्रदय में सुसंस्कार या कुसंस्कार जो भी बीज रूप में उपस्थित होते हैं अपने अनुकूल परिवेश से तरंग(अभिरुचि के साधन) पकड़ लेते हैं......कोई पब/डिस्को में जाकर सुरा और शोर में मगन होने पर झूम पाता है ,तो कोई भक्ति रस में डूबकर ही झूम लेता है.
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5.2.09
आमदनी चौअन्नी ,खर्चा अढईया !
बहुत पुरानी नही, बस ढाई तीन दशक पहले तक परम्परा और प्रवृत्ति थी कि कर्ज लेने वाला मुंह छिपाकर चलता था,क्योंकि कर्ज का अर्थ होता था उसकी लाचारी, जिसका उजागर होना लोग प्रतिष्ठा हनन मानते थे ।जबतक कर्ज चुक न जाए,जवान कुंवारी बेटी सा ह्रदय पर पहाड़ बन वह पड़ा रहता था ,रातों की नीद और दिन का चैन मुहाल रहता था....पर कितने कम अन्तराल में पूरा परिदृश्य ही बदल गया... परम्परा और प्रवृति ने सीधे यू टर्न ले लिया...........
वैश्वीकरण क्या हुआ आमजन के चारों और बाज़ार ही बाज़ार फ़ैल गया....बाज़ार के इस दलदल में आम आदमी आकंठ निमग्न हो गया..... क़र्ज़ बोझ और ग्लानि नही,सुविधा और गर्व का विषय बन गया॥बैंकों और बाज़ार ने सहृदयता के नए प्रतिमान स्थापित किए...... उन्होंने अपने हृदयपट ऐसे खोले कि जिसमे प्रवेश करने से शायद ही कोई बच पाया.......बाज़ार दौडा दौडा कर उपभोक्ताओं को अपने उत्पाद पकड़ाने लगे.......बैंक पकड़ पकड़ कर लोगों के जेब में पैसे ठूंस उनके सपने साकार करने लगे.......घर चाहिए,गाडी चाहिए,टी वी,फ्रिज.....क्या चाहिए ????पैसे नही हैं,अरे चिंता काहे का...5 से 10% डाउन पेमेंट और 0% ब्याज (??) पर दुनिया में जहांतक नजर जाती है,किसी भी भौतिक वस्तु का नाम लीजिये,आपके सामने हाजिर है। और परिणाम, निम्न मध्यम आयवर्ग से लेकर ऊपर तक शायद ही कोई घर बचा जो कर्जमुक्त (लोनविहीन) हो.
इस बाज़ार को सरकार का भी वरदहस्त प्राप्त है। घर जमीन इत्यादि के लिए कर्ज लेने पर आमदनी पर कर राहत का प्रावधान है....तीस वर्ष पहले तक आमजनों की जीवन शैली में प्राथमिकतायें भिन्न हुआ करती थीं, विशेषकर वेतनभोगियों में प्रवृत्ति थी कि पहले बच्चों को पढाना लिखना शादी ब्याह कर के निश्चिंत हुआ जाय तब सबसे बड़े व्यय जमीन घर की व्यवस्था की जाय.आज नौकरी के दो से दस वर्ष के अन्दर सबसे पहले भविष्य के अनुमानित आय के आधार पर घर खरीदा जाता है,जिसकी मासिक किस्त उसके मासिक आय की लगभग तिहाई होती है॥
एक समय था,जब बचत के पैसों से ,जमा पूँजी से व्यक्ति वस्तु विनिमय करता था,व्यय तय करता था...आज बचत के पैसों से नही, भविष्य के अनुमानित/संभावित आय के आधार पर संभावित व्यय तय किए जाते हैं......सिर्फ़ अपनी आय ही नही बल्कि आज की सजग सतर्क दूरदर्शी युवा पीढी व्यय योजना अपनी भावी पत्नी (फलां काम करने वाली कन्या जिसकी मासिक आय लगभग इतनी होगी) के अनुमानित आय तक पर तय कर लेती है .......
और इस पूरे आय व्यय का आधार रह जाता है........"नौकरी" ! तय मासिक किस्त भरने को तय मासिक आय। हाँ, यह अलग बात है कि छोटे मोटे व्यापार में लिप्त लोगों पर लोन दाताओं की उतनी कृपादृष्टि नही रहती. पर सामान्यतः जनमानस में मासिक आय से बचत के धन से व्यय की प्रवृत्ति लगभग नही बची है.....और आज जब मंदी की मार में नौकरी पर वज्रपात हुआ...... तो भयावह परिणाम सबके सामने है.अपनी शान बघारने के लिए बेशकीमती गाडी, घर से लेकर घरेलु उपकरणों तक विभिन्न लोनों की किस्त जिस एक नौकरी के बैसाखी पट टिकी है,बैसाखी हटते ही औंधे मुंह गिरती है.यह गिरना केवल आर्थिक स्थिति का ही नही,जीवन की पूरी गाड़ी ही बेपटरी हो हिचकोले खाने लगती है.
मासिक किस्तों के मकड़जाल में फंसी , नौकरी गँवा चुकी तीस से पचास वर्ष तक के,भारत से लेकर विदेशों तक में बसे भारतीय नौकरीपेशाओं की आर्थिक और मानसिक स्थिति आज क्या है, बहुत जल्दी इसका भयावह रूप प्रकाश में आने लगेगा, जब समाचार पत्र जालसाजी,,हत्या, डकैती या आत्महत्या जैसे समाचारों से पटी रहने लगेगी...अभी तो फ़िर भी थोडी आस है कि यह बहुत लंबा न खिंचेगा......पर ईश्वर न करे यह लंबा खिंच गया, तो क्या होगा, यह भयभीत कर देता है.....
अपनी जमीन से कटकर, नौकरी को सुरक्षित भविष्य की गारंटी मानते हुए , पिछले चार दशकों में हमारे देश में पूरी जनसँख्या जिस तरह लघु कुटीर उद्योग और कृषि कर्म को नकारकर अंधी दौड़ में दौडी है, आज उसका करूप स्वरुप सबके सामने नग्न होकर खड़ा है.
विगत तीन चार दशकों में नौकरी को जिस तरह महिमामंडित(ग्लेमेराइज) किया गया है,कि पढ़े लिखे होने का अर्थ या कहें पढ़ाई की सार्थकता ही नौकरी में माने जाने लगी है...जबतक अम्बानी,बजाज या राजू जैसे उद्योगपति नही बनते,लघु कुटीर उद्योग में संलग्न उद्योगपतियों को नौकरी वालों की अपेक्षा समाज में दोयम दर्जा ही प्राप्त है और कृषि कार्य जिसे कभी सबसे उत्तम माना गया था,(उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी, भीख निदान)आज पूर्णतः उपेक्षित है......मनुष्य मात्र को अन्न उपलब्ध कराने का दायित्व अब भी उन कन्धों पर है,जो अनपढ़ और साधनहीन हैं....साक्षर या उच्च शिक्षा प्राप्त युवा पीढी खेती करना अपमानजनक और निषिद्ध मानती है.समय रहते न चेते तो, जिस तरह रिटेल चेन बनाकर बड़े औद्योगिक घरानों ने उपभोक्ता बाज़ार पर कब्जा जमाना आरभ किया है,जिस दिन वह उन्ही किसानो से जो आज अपनी जमीन बेच बच्चों को नौकरी करने लायक बनाते हैं,उनकी उसी धरती से सोना उगाने लगेगी तो यही भीड़ अपने ही जमीन पर नौकर बन नौकरी करने जायेगी.पूरी व्यवस्था फ़िर से एक बार पूंजीपतियों और गुलामो वाली होने जा रही है,पर बदहवाश भाग रही भीड़ को इसपर सोचने का अवकाश कहाँ?
आज की पढी लिखी पीढी यदि कृषि कार्य या लघु उद्योग में जुटेगी और मौजूदा सरकारी योजनाओं के साथ साथ आगे भी सुविधाएं मुहैय्या कराने के लिए सरकार को घेरेगी तो निश्चित ही सुखद परिणाम पायेगी।इस क्षेत्र का विकास संभावनाओं के नए द्वार खोलेगा और तभी सच्चे अर्थों में हम अपनी आजादी पाएंगे,आत्मनिर्भर बनेंगे.अब तो समय आ गया है कि वर्तमान की विभीषिका को देखकर लोग चेतें और नौकरी रुपी इस मृग मरीचिका से बाहर निकलने का प्रयास करें॥
इसके साथ ही इस बात का भी पूरा ध्यान रखना होगा कि उपभोक्ता बाज़ार पर हावी हो ,न कि बाज़ार उपभोक्ता पर .मितव्ययिता को हमें अपने स्वभाव का अभिन्न अंग बनाना पड़ेगा.छोटे दूकान के दो सौ पचास रुपये की सूती सर्ट के लिए बड़े ब्रांड को डेढ़ से ढाई हजार तक देना चाहिए कि नही,यह हमें ही तय करना होगा.......एक या दो व्यक्ति की सवारी के लिए प्रतिलीटर साठ सत्तर किलोमीटर चलने वाले वहां का उपयोग करना है या,प्रतिलीटर बारह पन्दरह किलोमीटर चलने वाले चार पहिये वाहन का उपयोग करना है,एक बार तो ठहरकर सोच ही लेना चाहिए.......यदि समय का अभाव या और कोई परेशानी न हो तो हवाई यात्रा न कर रेल यात्रा किया जाना चाहिए या नही,यह भी हमें ही तय करना है....किसी भी साधन का उपयोग या उपभोग आवश्यकता आधारित हो तो उचित है,वैभव प्रदर्शन हेतु हो, तो सर्वथा अनुचित है....
जिस दिन हम अपनी प्रवृत्ति में चौअन्नी कमाई में से पाँच पैसे बचत का लक्ष्य तय करेंगे और अपने बचत के पैसों के आधार पर ही व्यय की योजना बनायेंगे....बहुत सारी समस्याएं समूल नष्ट हो जाएँगी।
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वैश्वीकरण क्या हुआ आमजन के चारों और बाज़ार ही बाज़ार फ़ैल गया....बाज़ार के इस दलदल में आम आदमी आकंठ निमग्न हो गया..... क़र्ज़ बोझ और ग्लानि नही,सुविधा और गर्व का विषय बन गया॥बैंकों और बाज़ार ने सहृदयता के नए प्रतिमान स्थापित किए...... उन्होंने अपने हृदयपट ऐसे खोले कि जिसमे प्रवेश करने से शायद ही कोई बच पाया.......बाज़ार दौडा दौडा कर उपभोक्ताओं को अपने उत्पाद पकड़ाने लगे.......बैंक पकड़ पकड़ कर लोगों के जेब में पैसे ठूंस उनके सपने साकार करने लगे.......घर चाहिए,गाडी चाहिए,टी वी,फ्रिज.....क्या चाहिए ????पैसे नही हैं,अरे चिंता काहे का...5 से 10% डाउन पेमेंट और 0% ब्याज (??) पर दुनिया में जहांतक नजर जाती है,किसी भी भौतिक वस्तु का नाम लीजिये,आपके सामने हाजिर है। और परिणाम, निम्न मध्यम आयवर्ग से लेकर ऊपर तक शायद ही कोई घर बचा जो कर्जमुक्त (लोनविहीन) हो.
इस बाज़ार को सरकार का भी वरदहस्त प्राप्त है। घर जमीन इत्यादि के लिए कर्ज लेने पर आमदनी पर कर राहत का प्रावधान है....तीस वर्ष पहले तक आमजनों की जीवन शैली में प्राथमिकतायें भिन्न हुआ करती थीं, विशेषकर वेतनभोगियों में प्रवृत्ति थी कि पहले बच्चों को पढाना लिखना शादी ब्याह कर के निश्चिंत हुआ जाय तब सबसे बड़े व्यय जमीन घर की व्यवस्था की जाय.आज नौकरी के दो से दस वर्ष के अन्दर सबसे पहले भविष्य के अनुमानित आय के आधार पर घर खरीदा जाता है,जिसकी मासिक किस्त उसके मासिक आय की लगभग तिहाई होती है॥
एक समय था,जब बचत के पैसों से ,जमा पूँजी से व्यक्ति वस्तु विनिमय करता था,व्यय तय करता था...आज बचत के पैसों से नही, भविष्य के अनुमानित/संभावित आय के आधार पर संभावित व्यय तय किए जाते हैं......सिर्फ़ अपनी आय ही नही बल्कि आज की सजग सतर्क दूरदर्शी युवा पीढी व्यय योजना अपनी भावी पत्नी (फलां काम करने वाली कन्या जिसकी मासिक आय लगभग इतनी होगी) के अनुमानित आय तक पर तय कर लेती है .......
और इस पूरे आय व्यय का आधार रह जाता है........"नौकरी" ! तय मासिक किस्त भरने को तय मासिक आय। हाँ, यह अलग बात है कि छोटे मोटे व्यापार में लिप्त लोगों पर लोन दाताओं की उतनी कृपादृष्टि नही रहती. पर सामान्यतः जनमानस में मासिक आय से बचत के धन से व्यय की प्रवृत्ति लगभग नही बची है.....और आज जब मंदी की मार में नौकरी पर वज्रपात हुआ...... तो भयावह परिणाम सबके सामने है.अपनी शान बघारने के लिए बेशकीमती गाडी, घर से लेकर घरेलु उपकरणों तक विभिन्न लोनों की किस्त जिस एक नौकरी के बैसाखी पट टिकी है,बैसाखी हटते ही औंधे मुंह गिरती है.यह गिरना केवल आर्थिक स्थिति का ही नही,जीवन की पूरी गाड़ी ही बेपटरी हो हिचकोले खाने लगती है.
मासिक किस्तों के मकड़जाल में फंसी , नौकरी गँवा चुकी तीस से पचास वर्ष तक के,भारत से लेकर विदेशों तक में बसे भारतीय नौकरीपेशाओं की आर्थिक और मानसिक स्थिति आज क्या है, बहुत जल्दी इसका भयावह रूप प्रकाश में आने लगेगा, जब समाचार पत्र जालसाजी,,हत्या, डकैती या आत्महत्या जैसे समाचारों से पटी रहने लगेगी...अभी तो फ़िर भी थोडी आस है कि यह बहुत लंबा न खिंचेगा......पर ईश्वर न करे यह लंबा खिंच गया, तो क्या होगा, यह भयभीत कर देता है.....
अपनी जमीन से कटकर, नौकरी को सुरक्षित भविष्य की गारंटी मानते हुए , पिछले चार दशकों में हमारे देश में पूरी जनसँख्या जिस तरह लघु कुटीर उद्योग और कृषि कर्म को नकारकर अंधी दौड़ में दौडी है, आज उसका करूप स्वरुप सबके सामने नग्न होकर खड़ा है.
विगत तीन चार दशकों में नौकरी को जिस तरह महिमामंडित(ग्लेमेराइज) किया गया है,कि पढ़े लिखे होने का अर्थ या कहें पढ़ाई की सार्थकता ही नौकरी में माने जाने लगी है...जबतक अम्बानी,बजाज या राजू जैसे उद्योगपति नही बनते,लघु कुटीर उद्योग में संलग्न उद्योगपतियों को नौकरी वालों की अपेक्षा समाज में दोयम दर्जा ही प्राप्त है और कृषि कार्य जिसे कभी सबसे उत्तम माना गया था,(उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी, भीख निदान)आज पूर्णतः उपेक्षित है......मनुष्य मात्र को अन्न उपलब्ध कराने का दायित्व अब भी उन कन्धों पर है,जो अनपढ़ और साधनहीन हैं....साक्षर या उच्च शिक्षा प्राप्त युवा पीढी खेती करना अपमानजनक और निषिद्ध मानती है.समय रहते न चेते तो, जिस तरह रिटेल चेन बनाकर बड़े औद्योगिक घरानों ने उपभोक्ता बाज़ार पर कब्जा जमाना आरभ किया है,जिस दिन वह उन्ही किसानो से जो आज अपनी जमीन बेच बच्चों को नौकरी करने लायक बनाते हैं,उनकी उसी धरती से सोना उगाने लगेगी तो यही भीड़ अपने ही जमीन पर नौकर बन नौकरी करने जायेगी.पूरी व्यवस्था फ़िर से एक बार पूंजीपतियों और गुलामो वाली होने जा रही है,पर बदहवाश भाग रही भीड़ को इसपर सोचने का अवकाश कहाँ?
आज की पढी लिखी पीढी यदि कृषि कार्य या लघु उद्योग में जुटेगी और मौजूदा सरकारी योजनाओं के साथ साथ आगे भी सुविधाएं मुहैय्या कराने के लिए सरकार को घेरेगी तो निश्चित ही सुखद परिणाम पायेगी।इस क्षेत्र का विकास संभावनाओं के नए द्वार खोलेगा और तभी सच्चे अर्थों में हम अपनी आजादी पाएंगे,आत्मनिर्भर बनेंगे.अब तो समय आ गया है कि वर्तमान की विभीषिका को देखकर लोग चेतें और नौकरी रुपी इस मृग मरीचिका से बाहर निकलने का प्रयास करें॥
इसके साथ ही इस बात का भी पूरा ध्यान रखना होगा कि उपभोक्ता बाज़ार पर हावी हो ,न कि बाज़ार उपभोक्ता पर .मितव्ययिता को हमें अपने स्वभाव का अभिन्न अंग बनाना पड़ेगा.छोटे दूकान के दो सौ पचास रुपये की सूती सर्ट के लिए बड़े ब्रांड को डेढ़ से ढाई हजार तक देना चाहिए कि नही,यह हमें ही तय करना होगा.......एक या दो व्यक्ति की सवारी के लिए प्रतिलीटर साठ सत्तर किलोमीटर चलने वाले वहां का उपयोग करना है या,प्रतिलीटर बारह पन्दरह किलोमीटर चलने वाले चार पहिये वाहन का उपयोग करना है,एक बार तो ठहरकर सोच ही लेना चाहिए.......यदि समय का अभाव या और कोई परेशानी न हो तो हवाई यात्रा न कर रेल यात्रा किया जाना चाहिए या नही,यह भी हमें ही तय करना है....किसी भी साधन का उपयोग या उपभोग आवश्यकता आधारित हो तो उचित है,वैभव प्रदर्शन हेतु हो, तो सर्वथा अनुचित है....
जिस दिन हम अपनी प्रवृत्ति में चौअन्नी कमाई में से पाँच पैसे बचत का लक्ष्य तय करेंगे और अपने बचत के पैसों के आधार पर ही व्यय की योजना बनायेंगे....बहुत सारी समस्याएं समूल नष्ट हो जाएँगी।
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