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11.9.08

शक्ति पूजा


मातृ रूप में शक्ति पूजन, भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है और अनादि काल से अनवरत चली आ रही यह परम्परा में निहित है. हिंदू पुराणों आख्यानों की मानें तो केवल ब्रह्माण्ड की ही उत्पत्ति ही नही बल्कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य सभी देवी देवताओं की उत्पत्ति भी आदिशक्ति माँ दुर्गा ने ही की है.वे ही श्रृष्टि का आधार हैं.प्रकृति से लेकर चर अचर तक शक्ति रूप में जो कुछ भी श्रृष्टि में निहित उपस्थित है, वह माता का ही रूप है. इस महा शक्ति मातृशक्ति की साधना आराधना देवों तथा मानवो ने ही नही दानवों ने भी की है और जब भी कभी जिस किसी दानव ने शक्ति के मद में चूर हो मनुष्यों , देवों या प्रकृति का दमन किया है,भक्तों की आर्त पुकार पर माता ने उस दुष्ट का नाश कर भक्तों को उससे त्राण दिलाया है. श्रृष्टि के प्रत्येक कण में यह आदिशक्ति व्याप्त हैं.

बहुधा क्षत्रियों की कुलदेवी यही आदि शक्ति माँ दुर्गा ही हुआ करती हैं और इनके आशीष के बिना शक्ति प्रयोग तथा विजय की कल्पना भी नही की जा सकती.पुरातन काल में परंपरागत रूप में माँ शक्ति की पूजा अधिकांशतः घरों में ही की जाती थी.पर कालांतर में इसे उत्साव और त्यौहार के रूप में वर्ष में दो बार बसंत ऋतु तथा शरद ऋतु में नवरात्र में देवी की आराधना के साथ हर्षोल्लास से मनाया जाता है.

दुर्गा शप्तसी में में जो कथा वर्णित है,उसके अनुसार महिषासुर,चंड मुंड,शुम्भ निशुम्भ इत्यादि महादैत्यों ने जब देवताओं तथा मानव जाति को परास्त कर उन्हें त्राण दे त्रस्त कर दिया तो देवों ऋषियों के आर्त पुकार पर आदि शक्ति माता दुर्गा ने अपने विभूतियों के साथ इन असुरों का संहार किया और धर्म की प्रतिस्थापना की.सप्त्शी के अनुसार देवी की विभूतियों(उनके ही अन्य रूपों) तथा अन्य सभी देवताओं के शक्ति रूपों की तो चर्चा है परन्तु परम्परा और व्यवहार में पूजन काल में देवी के विग्रहों के साथ गणेश तथा विश्वकर्मा की जो पूजा की जाती है,इस से सम्बंधित मैंने आज तक जो कुछ भी पढ़ा जाना है, उसमे कहीं नही पाया और यह मेरे लिए बाल्यकाल से ही उत्सुकता का विषय रहा.दुर्गा पूजा में देवी दुर्गा की प्रतिमा के साथ साथ लक्ष्मी ,सरस्वती, विश्वकर्मा तथा गणेश इन सबके विग्रहों के भी स्थापना और आराधना होती है.सबने देखा होगा.परन्तु नवरात्र में जिस दुर्गा सप्त्शी के पाठ के बिना नवरात्र आराधना अपूर्ण मानी जाती है,उसमे कहीं भी गणेश और विश्वकर्मा के विग्रहों की चर्चा नही है.

परम्परा में यूँ ही तो नही कुछ आ जाता, सो इसके पीछे भी कोई तथ्य रहस्य अवश्य होगा ,यह मन कहता था पर कईयों से पूछने पर भी इस जिज्ञासा का समुचित समाधान मुझे आज तक नही मिला है.मेरा निवेदन सभी प्रबुद्ध जनों से है कि जो कोई भी मेरे इस जिज्ञासा को शांत करने में मेरी सहायता करेंगे ,मैं उनकी सदा आभारी रहूंगी.

कुछ वर्ष पहले अपने मन के इसी जिज्ञासा के साथ जब माता के सम्मुख बैठी हुई थी तो अचानक मन में एक बात कौंधी,यह सत्य के कितने निकट है नही जानती पर मुझे लगा कि ये विग्रह समूह कितनी बड़ी बात की ओर इंगित कर रहे हैं.एक ध्रुव सत्य जो सदा के लिए प्रासंगिक तथा विचारणीय है.किसी भी नवनिर्माण या विध्वंस के लिए ये इतने ही अवयव तो चाहिए.

माँ दुर्गा शक्ति की प्रतीक हैं, जो किसी भी कार्य के लिए सबसे पहली आवश्यकता है.

सरस्वती विद्या की प्रतीक हैं,शक्ति बिना विद्या/ज्ञान के कभी सफलता नही पा सकती.

लक्ष्मी धन की प्रतीक हैं,शक्ति और विद्या हों भी तो बिना धन के न तो सृष्टि / रचना / नवनिर्माण का कार्य हो सकता है न ही विध्वंश / युद्ध का.

गणेश बुद्दि,युक्ति और विवेक के स्वामी(प्रतीक) हैं.उपरोक्त तीनो चीजे हों भी और उसे विवेकपूर्ण ढंग से युक्तियुक्त प्रयुक्त न किया जाए तो सब व्यर्थ हो जाता है.

और विश्वकर्मा तकनीक और निर्माण के देवता माने जाते हैं. विध्वंश के लिए भी तकनीक चाहिए और भ्रष्ट व्यवस्था के विध्वन्सोपरांत नवनिर्माण के लिए भी बिना तकनीक और निर्माण की आवश्यकता है नही तो इसके बिना सम्पूर्ण प्रयास व्यर्थ और अर्थहीन हो जाता है.

सो कुल मिलकर मातृशक्ति को सर्वशक्तिसंपन्न होते हुए भी विजय तभी मिलती है जब अपने साथ वे इन शक्तियों को लेकर चलती हैं.सत्य ही है इन पंच्शक्तियों के बिना जर्जर व्यवस्था का विनाश और नवसृजन कर विजयश्री प्राप्त कर पाना असंभव है.सर्व शक्ति मान होते हुए भी विजयी वही हो सकता है जो विद्या ,विवेक ,धन और तकनीक के साथ विभूषित हो..

नवरात्र का वह पावन अवसर निकट ही है सो कुछ बात कर ली जाए वर्तमान समय में इस उत्सव को जिस प्रकार से मनाया जाता है उसके विषय में........

कुछ लोग माता के प्रति पेम और निष्ठा को ह्रदय में धारण किए, बिना कर्मकांड में लिप्त हुए मानसिक पूजन में विश्वास करते हैं तो कुछ लोग इसे बेहद सादगी पूर्ण ढंग से घर में ही कलश स्थापित कर इन नवो दिनों में कठोर साधना उपासना तथा व्रत उपवास के साथ संपन्न करते हैं.कुछ कलश स्थापना न भी करें तो यम् नियम पालन करते हुए विग्रहों के पूजा स्थल पर या मंदिरों में जाकर अर्चना करते हैं,परन्तु एक बहुत बड़ा समुदाय ऐसा है जिसके लिए यह एक ऐसा अवसर है जिसमे रात रात भर पंडालों में घूम घूम कर '' ऐश " करने का सर्वोत्तम सुयोग है.आस्था निष्ठा से इस वर्ग का दूर दूर तक कोई सरोकार नही रहता.दर्शनार्थियों को ताड़ना और छेड़ छाड़,इनके लिए आलौकिक आनंद प्रदायक होता है. .

सही है कि परम्परा में उत्सवों का प्रावधान धार्मिक भावनाओं के उद्दीपन के साथ साथ सामूहिक भावना को जाग्रत करने के लिए किया गया था.पर आज ये धार्मिक उत्साव जो रूप ले चुके हैं,उसमे धर्म तो लुप्त होता जा रहा है,हाँ फूहड़ ढंग से मनाया जाने वाला उत्सव बच गया है.जो दिनों दिन और बदतर होता जा रहा है.आस्था का स्थान आडम्बर ने ले लिया है.चाहे वह कडोडों रुपये मंहगे पंडालों के निर्माण के लिए हों या डांडिया और रास के रूप में आयोजित बड़े बड़े प्रायोजित कार्यक्रमों के माध्यम से हो.अब तो महानगरों में पेप्सी कोला जैसी कम्पनियाँ भी इन डांडिया कार्यक्रमों का आयोजन करवाने लगी हैं जहाँ भरी भरकम फीस देकर लोग सज धज कर डिस्को डांडिया करने पहुँचते हैं.आस्था और धर्म वहां गौण रहता है,उद्देश्य मात्र मनोरंजन भर रहता है...

पूजा पंडालों में भी चहुँ ओर पैसा ही चमकता है.एक प्रकार से होड़ सी रहती है इन पूजा मंडलियों के बीच.अधिकांशतः इन मंडलियों के कर्ता धर्ता संरक्षक समाज के तथाकथित भाई लोग ही हुआ करते हैं जिनके बीच यह शक्ति प्रदर्शन तथा वर्चस्व स्थापित करने का मामला होता है.वर्चस्व की इस लडाई में गोली बन्दूक चलना आम बात है.पूजा के नाम पर जमकर वसूली होती है और इस वसूली से एकत्रित धन का जो सदुपयोग होता है उसके बखान की आवश्यकता नही.सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है.पूजा पंडालों में मानक भव्यता और ताम-झाम भर होती है.

बड़ा ही अफ़सोस होता है,जितना धन पूजा के नाम पर इस तरह बहाया जाता है,जहाँ एक ओर निर्धन दाने दाने को मुहताज है , बिना इलाज के असमय दुनिया से विदा हो रहे हैं,कई मेधावी बालक हैं जो पैसे के अभाव में पढ़ नही पाते.जहाँ सड़कें टूटी हुई है या और भी न जाने कितने ही असंख्य समस्याएं हैं,जिसने जीवन को विषम बना दिया है.क्या इनसे निपटने की जिम्मेदारी सिर्फ़ सरकार की बनती है.सरकार और व्यवस्था को गलियां दे दे देने से समाज की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है? चार दिनों के लिए बनाये जा रहे भव्य से भव्यतम पंडालों के लिए जो धन पानी के लिए बहाया जाता है उसका उपयोग उसी माता के नाम पर सार्थक कार्यों में भी तो किया जा सकता है.यदि एक कोष बनाकर उन अभावग्रस्त लोगों की मदद करें, फैली हुई अव्यवस्था के लिए कुछ कदम उठायें तो क्या यह भगवान् के प्रति भक्ति से कमतर होगी?

स्थिति तो यह है कि पूजा के ये अवसर जिस प्रकार से शहर में अव्यवस्था फैलाते हैं, कि उन चार पाँच दिनों के स्थिति की स्मृति ही भयातुर कर देती है.जगह जगह सड़क जाम,शोर शराबा,शरारती तत्वों की हुल्लड़बाजी ,सारे काम काज ठप्प इतनी बेचैन करती है कि उत्सवों का आगमन उत्साहित नही आतंकित ओर क्षुब्ध कर देती है..

आस्था मन और आत्मा में बसने वाली,धर्म आचार और व्यवहार में समाहित होने वाली तथा उत्सव सामाजिक सौहाद्र बढ़ाने वाले अवयव हैं।कोई आवश्यक नही कि व्रत उपवास या अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में लिप्त होकर ही आस्तिकता का निष्पादन किया जाय या उसे प्रगाढ़ किया जा सकता है। आस्था और धर्म व्यक्ति के आत्मोन्नति के साथ साथ समाज को उन्नत और सुदृढ़ करने के लिए है।धर्म के नाम पर आडम्बर और धन का अपव्यय सर्वथा अनुचित है और यदि इसे अधर्म कहा जाए तो कोई अतिशियोक्ति न होगी॥

माता सबको सद्बुद्धि तथा मानव धर्म के मर्म को समझ पाने का विवेक दें यही उनसे प्रार्थना है..

" सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके,शरण्ये त्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते "

30.7.08

आज के खबरी चैनल...........

आज जबकि टी वी के समस्त राष्ट्रीय हिन्दी समाचार चैनल(दूरदर्शन को छोड़) दिग्भ्रमित हो समाचार धर्मिता से भटक खालिस बाजारवाद की अंधी दौड़ में आँखें मूंदे दौडे चले जा रहे हैं.ख़बरों के नाम पर ये लोग जो परोसते हैं,देखकर अफ़सोस भी होता है,हँसी भी आती है और कभी कभी दया भी आ जाती है कि आख़िर ये किस ओर जा रहे हैं,एक बार भी रुक कर ठहरकर आत्म मंथन की प्रक्रिया से गुजर अपने करनीय और ध्येय की जांच परख करते हैं ?.इतनी बड़ी इनकी टीम होती है,क्या कोई इन्हे सचेत करने वाला नही कि किस तरह ये हँसी के पात्र बन रहे हैं??चौअन्नी छाप वो तारिकाएँ जो सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए किसी भी हद तक गिरने में कोई गुरेज नही करती ,उनमे और इनमे कितना और क्या फर्क रह गया है? ऐसे में आज भी तथाकथित दोयम दर्जे रखने वाले प्रांतीय खबरी चैनलों का स्तर इन राष्ट्रीय चैनलों से बहुत बहुत अच्छा है.या यूँ कहें कि १ से १० के ग्रेड रेटिंग में राष्ट्रीय खबरी चैनल यदि २ पर हैं तो इन्हे ८ - ९ पर माना जाना चाहिए. यह एक सुखद अनुभूति देता है.सभी राज्यों के बारे में नही कह सकती,पर हमारे यहाँ 'ई टी वी बिहार झारखण्ड' तथा सहारा का 'बिहार झारखण्ड न्यूज चैनल' ये दो प्रांतीय चैनल हम देख पाते हैं और इसी के आधार पर मैं अपनी प्रतिक्रिया दे रही हूँ..
रात दस बजे के बाद जिस समय सारे राष्ट्रीय चैनल भूत प्रेत,हत्या बलात्कार की सनसनी फैलाने के होड़ में लिप्त रहते हैं, उस समय यदि शहर से लेकर राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खबर जानने की उत्सुकता हो तो ये प्रांतीय चैनल ही सहारा देते हैं.ख़बरों के प्रबंधन,नियोजन के साथ साथ समसामयिक प्रेरक प्रसंगों(खबरों), गंभीर विषयों पर चर्चा परिचर्चा से लेकर मनोरंजन तथा कुकरी शो सब कुछ इस तरह से नियोजित रहता है कि कभी भी कुछ उबाऊ नही लगता.
अभी करीब तीन दिन पहले देखा कि गया (बिहार)शहर जो कि बिना पानी के नदी(गया में बहने वाली फल्गू नदी में आजतक कभी भी भरी बरसात के मौसम में भी घुटने से ज्यादा पानी नही होता) और बिना पेड़ के पहाड़(गया शहर ही नही उसके आस पास के इलाके में भी असंख्य छोटी छोटी पहाडियां हैं जिनपर कोई पेड़ नही) के रूप में प्रख्यात है, एक व्यक्ति पिछले चौबीस वर्षों से अकेले एक साधक के भांति अपने सम्पूर्ण तन मन धन लगा जुटा हुआ है साधना में और उसका उद्देश्य समस्त बंजर पहाडियों को पेड़ों से आच्छादित कर हरा भरा वन प्रान्त बना देने की है. अबतक कई पहाडियों को पेड़ों से आच्छादित कर चुका है,जिसकी जानकारी प्रशाशन को भी नही है.. ऐसे में चैनल वालों का प्रयास और ख़बर देखकर इतना अच्छा लगा कि सबके लिए दुआएं निकली और लगा यह सराहनीय प्रयास निश्चय ही मुक्त कंठ से प्रशंशनीय है. .जब निम्स्तरीय की हम भर्त्सना कर सकते हैं तो अच्छे प्रयासों की सराहना भी अपरिहार्य है..
कल एक और समाचार देखा कि महाराष्ट्र में "पञ्चशील" नाम के एक स्वयंसेवी महिला संगठन ने जिसके सदस्य ग्रामीण निर्धन महिलाएं हैं , ने वह साहसिक जिम्मेवारी उठा रखी है जो आजतक केवल पुरूष द्वारा ही निष्पादित किए जाते थे. स्त्रियों की यह संस्था शहर तथा आसपास के इलाकों के निर्धन तथा लावारिश ऐसे मृतकों की जिनका अन्तिम संस्कार करने वाला कोई न हो,उनका पूर्ण सम्मान और विधि विधान के साथ अन्तिम संस्कार संपन्न करती हैं(अंत्येष्टि कर्मकांड किसी भी धर्म में पुरुषों द्वारा ही संपन्न होते हैं,जैसा कि आजतक मैंने देखा सुना है).हिंदू हुआ हुआ तो दाह संस्कार और मुस्लिम हुआ तो दफ़नाने की क्रिया.इस क्रम में हर कार्य संश्ता सदस्यों द्वारा ही संपादित होता है.मदद के रूप में नगरनिगम द्वारा प्रति मृतक ३ हजार रूपये इन्हे सहायता राशि रूप में दी जाती है. ख़बर ने मन को हर्ष और गर्व से भर दिया और संस्थान तथा इस ख़बर को हमतक पहुँचने वाले के प्रति मन नतमस्तक हो गया..

समाचार जिन माध्यमो से जनमानस तक पहुँचता है,इलेक्ट्रोनिक मिडिया इसमे सबसे अधिक सशक्त और प्रभावशाली मध्यम है.जाहिर है जो सशक्त होता है वह अच्छा और बुरा दोनों प्रचारित प्रसारित कर और दूरगामी प्रभाव स्थापित करने में सक्षम भी होता है.ऐसे में इनमे कर्तब्य बोध का अभाव निश्चित ही अनिष्टकारी है .अब क्या किया जाए.नाम क्या गिनवाऊँ, जितने भी प्राइवेट न्यूज चैनल हैं,किसी न किसी व्यावसायिक घरानों के ही हैं जिनका उद्देश्य केवल प्रोफिट मेकिंग भर है.तो ऐसे लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है कि ये पत्रकारिता के नैतिक कर्तब्य को समझेंगे और मूल्यों से समझौता किसी कीमत पर नही करेंगे. ये तो बस एक अंतहीन अंधी दौड़ और होड़ में निमग्न हैं.ईश्वर करें समय रहते ये सचेत हो जायें नही तो एक बार यदि जनमानस में साख गिर समाप्त हो गई तो वर्षों लग जायेंगे फ़िर से बनने में.दूर दर्शन जिस तरह राजनितिक पेंचों में फंस अपनी दुर्गति करवा चुका है और आज तक पुरानी साख नही लौटा पाया है,इन्हे कुछ तो सबक लेनी चाहिये उस से .मुझे भय इस बात का भी है कि कहीं ये प्रांतीय न्यूज चैनल भी इनके पीछे इनकी देखा देखी न हो लें.ईश्वर इन सबको सद्बुद्धि और कर्तब्यबोध दें.