कॉलेज में एक हमारे प्रोफ़ेसर थे.भारी विद्वान् .अपनी विद्वता के बल पर कई सारे गोल्ड मेडल जुटाए थे उन्होंने. उनके नाम के साथ सदा फलां फलां विषय में " एम् ए, पी एच डी, गोल्ड मेडलिस्ट " लिखा रहता था. हमने कभी पढ़ा तो नहीं पर सुन रखा था कि उन्होंने कई सारी किताबें लिख डाली हैं.. पर जब वे विद्वान् प्रोफ़ेसर साहब हमे पढ़ाने आते तो क्लास में बैठे उनकी ओर दीदे फाड़े हमें अपनी आँखों से नींद भागने के लिए ठीक उतनी ही मसक्कत करनी पड़ती थी, जितनी अमेरिका को बिन लादेन को ढूँढने में करनी पड़ रही है...हम भगवान् से एकदम कलपकर मनाते कि कभी उन्घाये दुपहरिया में उन महामहिम का क्लास न पड़े..हर क्लास के ख़तम होने पर हम जी भरकर उस अनजाने व्यक्ति को गरियाते, जिसने इन्हें गोल्ड मेडल पकडाया और जिसने प्रोफ़ेसर बनाया. अगर अटेंडेंस पूरा करने की बाध्यता न होती तो शायद ही कोई विद्यार्थी उनकी क्लास अटेंड करता.प्रोफ़ेसर साहब विद्वान् चाहे जितने रहे हों पर पढ़ाने की कला का 'क' भी उन्हें नहीं पता था. खुद विद्वान् होना और दूसरे को विद्वान् बना देने की कला में बड़ा भारी अंतर होता है.
आज जब अपने प्रधान मंत्री जी की स्थिति देखती हूँ तो बरबस मुझे वही प्रोफ़ेसर साहब याद आ जाते हैं.हमारे प्रोफ़ेसर साहब भी बड़े ही भले मानुस थे और पहुंचे हुए विद्वान् भी,पर अध्यापन के जिस कर्म में वे संलग्न थे,एक तरह से विद्यार्थियों का भविष्य ही न चौपट कर रहे थे. अपने वृहत ज्ञान को विद्यार्थीयों के मन में उतनी ही कुशलता पूर्वक यदि वे उतार पाते ,तभी तो उनके ज्ञान की सार्थकता होती. भला नहीं होता कि वे बैठकर किताबें ही लिखते और विद्यार्थियों को एक ऐसा शिक्षक मिलता जो उनकी समझ के हिसाब से उन्हें विषय समझाकर विद्वान् बना पाता..
लोकतंत्र का ऐसा विद्वान् मालिक/नायक /कर्णधार किस काम का, जिसे अपने लोक का ही पता न हो..मन अत्यंत खिन्न और क्षुब्ध हो जाता है इनकी प्रशासन क्षमता देखकर.आखिर ऐसी भी क्या विवशता है, कि न तो ये देश के भीतर देश को तोड़ रहे तत्वों से निपट पा रहे हैं और न ही बाहरी विध्वंसक शक्तियों को प्रभावी ढंग से हडका पा रहे हैं..इनके एन नाक के नीचे भ्रष्टाचार पराकाष्ठा को प्राप्त कर चुका है, कैसे विश्वास करें कि इन सबमे इनकी संलिप्तता सह्भागिका या सहमति नहीं है ?? कैसे मान लें, तमाम भ्रष्ट और बेईमानो के बीच ये दूध के धुले पाक साफ़ हैं ? माना कि ये बस रबर स्टाम्प ही हैं और दिखावे भर के लिए ही कुर्सी इन्हें मिली है, लेकिन क्या उस कुर्सी में कोई शक्ति नहीं ?? यह कुर्सी क्या महज किसी मैडम के ड्राइंग रूम की कुर्सी भर है,जिसपर मालिकाना हक ये नहीं जता सकते ?? अरे कुछ नहीं तो ये स्वामिभक्त इतना तो स्मरण रख सकते हैं न, कि इस कुर्सी में देश की सौ करोड़ जनता की शक्ति है और कागज पर इन्हें जो अपरिमित अधिकार मिले हैं,वह कागज यूँ ही हल्की फुल्की हवा में उड़ जाने वाला कागज नहीं बल्कि उसपर सौ करोड़ जनता के हस्ताक्षर ने उसे इतना कीमती और वजनदार बना दिया है कि यूँ ही फूंक मार कोई उसे उड़ा नहीं सकता.. जो सत्य न्याय के पथ पर दृढ़ता से चलेंगे, देश के हर छोटे बड़े हित के लिए कठोर निर्णय लेंगे, तो भले इनका सारा कुनबा इनके विरुद्ध खड़ा हो जाए,जनता इनके पक्ष में ही रहेगी..और चाहे सब कुछ छोड़ दिया जाए,तो व्यक्तिगत तौर पर इतना मान इस कुर्सी का तो रख ही लेना चाहिए न कि आज इसी के बदौलत इनका यह खान पान और मान है.माना कि सरलमना स्वभाव से ही स्वामिभक्त हैं, तो कुछ वफादारी/जवाबदेही इनका कुर्सी/देश की जनता के प्रति भी बनता है या नहीं ??
यह भारत का दुर्भाग्य ही है कि आज इसके पास कांग्रेस का एक भी मजबूत और साफ़ सुथरा दृढ नैतिकता वाला विकल्प मौजूद नहीं है,नहीं तो कितना समय लगता इनकी जड़ उखड जाने में... एक समय इनके इन्ही रवैयों से मजबूर होकर जनता ने वर्षों के लिए सत्ता इनके लिए सपना बना दिया था.इन्हें क्यों नहीं लगता कि इनके लुभावने विज्ञापन जनता की आँखों को अधिक समय तक चुन्धियाये नहीं रख सकते.इनका विकल्प कोई हो या न हो पर मंहगाई भ्रष्टाचार का जो नंगा नाच अपनी खुली आँखों से जनता रोज देख रही है और पिस रही है,इतनी सरलता से इसे बिसरा मटिया देगी ?? और जो अगली बार फिर से खंडित जनादेश हुआ तो ये और कमजोर ही होंगे न...
आश्चर्य लगता है, घोटालों के जिस सच्चाई को सारा देश जान चुका होता है,जब जमकर उसपर हंगामा होता है,तो शीर्ष सत्ता आहिस्ते से हिलते डुलते हुए मिमियाती सी आवाज़ में कहने के लिए उठती है कि "इसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा,जांच कराई जायेगी " और हल्ला अधिक बढा तो मांग लिया इस्तीफा और बिठा दिया सी बी आई जांच..हंसी आती है,कौन नहीं जानता सी बी आई की सच्चाई,कि यह किसके अधीन है.सी बी आई या एक्स वाय जेड आयोग जो दशकों दशकों में चार्ज फ़ाइल करेगी और दोषी तो तबतक दुनिया से भी आराम से खा पीकर उठ चुका होगा, ऐसी तो है अपने यहाँ दंड व्यवस्था. नाग नाथ को कुछ समय के लिए पुचकारकर पद से हटाया और सांपनाथ को बैठा दिया कुर्सी पर...हो गया न्याय !!! क्यों भला कोई डरेगा घोटाला करने से ?? ऐसी सुविधाजनक स्थिति तो इमानदार को भी बेईमान बना दे,फिर पहले से ही भ्रष्ट बेईमान की तो बात ही क्या..
क्या इतना भोला अंजान और लाचार है शीर्ष नेतृत्व ,कि इतने इतने पैसे निकल गए और इन्हें पता ही नहीं चला.कुछेक पदाधिकारी,इने गिने मंत्री ,बस इतनों की ही संलिप्तता है इन हजारों लाखों करोड़ों करोड़ के घोटालों में..बाकी सारे के सारे निरीह और भोले ?? हजारों करोड़ का घोटाला हो गया और धराये मधु कोड़ा..क्या अकेले मधु कोड़ा,ए राजा, रामालिंगम राजू,सुरेश कलमाडी आदि आदि ने ही गटक लिया सारा पैसा ?? इस पूरे क्रम में ये और इनके नीचे वालों की ही संलिप्तता थी ?? क्या हम विश्वास कर लें कि इन इकलौते जांबाजों का ही हाजमा इतना दुरुस्त है ??
मधु कोड़ा एक निर्दलीय, झारखण्ड के मुख्यमंत्री क्यों बनाये गए ?? क्योंकि उस पूरे समूह में वही एक सबसे फिट कैंडिडेट थे,जिसके मुंह में जुबान,मन में हिम्मत और माथा में तिड़कमी दिमाग नहीं था.यही आदमी रबर स्टाम्प की तरह काम कर सकता था,जिसे जब चाहा जुतिया दिया ,जब चाहा चुमिया दिया और जो चाहा करवा लिया.लालू जी को क्या राजद में कोई योग्य व्यक्ति नहीं मिला था जब वे जेल नशीन हुए थे ?? या कि राजद के सभी योग्य नेताओं को रबरी देवी ही सबसे कुशल,सबसे योग्य प्रशासक लगी थीं ?? कोड़ा से मनमोहन तक,इन अनेक उदाहरणो का क्यों कैसे का हिसाब आम जनता के लिए इतना भी अबूझ नहीं रह गया है अब...
बस यही लगता है, क्या कभी भारत की वह जनता जो अपने बच्चों को भरपेट रोटी भले न खिला पाए,तन न ढांक पाए,इलाज न करा पाए और अच्छी शिक्षा तो यूँ भी बड़ी मंहगी है,सो सवाल ही नहीं उठता... नमक खरीदने पर दिए टैक्स से लेकर प्रत्यक्ष परोक्ष कदम कदम पर टैक्स भरती है,कभी जान पायेगी कि उसके पैसों का क्या क्या हो रहा है या इसे अनैतिक ढंग से किस किस ने और कितना कितना खाया ?? यह जनता क्या यह आस संजो सकती है कि जो इने गिने मंत्री संतरी जगजाहिर हो पकडाए भी, उनसे वह अपार धन वसूला जाएगा और वह धन सरकारी खजाने में जमा कर जनता को टैक्स और मंहगाई से राहत मिल जायेगी ?? क्या आम जनता यह अपेक्षा कर सकती है कि कभी भी किसी सरकारी महकमे में छोटे से छोटे काम से लेकर बड़े काम तक करवाने में उसे रिश्वत नहीं देनी पड़ेगी ?? क्या आम जनता मन में यह विश्वास रख सकती है कि लोकतंत्र के तथाकथित रक्षक की आत्मा जग जायेगी और वह सचमुच ही उसके आर्थिक सामाजिक धार्मिक सांस्कृतिक हितों की निरपेक्ष भाव से रक्षा करेगी ??
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19.11.10
1.11.10
तरु और लता...
कहीं किसी एक कानन में, था सघन वृक्ष एक पला बढ़ा,
था उन्नत उसका अंग अंग, गर्वोन्नत भू पर अडिग अड़ा.
वहीँ पार्श्व में पनपी थी, कोमल तन सुन्दर एक लता.
नित निरख निरख तरु की दृढ़ता, हर्षित उसका चित था डोला.
तरुनाई कोमलता उसकी , तरुवर के मन को भी भायी,
निज शाख झुकाकर उसने भी, कोंपल की उंगली थाम ही ली.
प्रिय ने जो अंगीकार किया, तन मन अपना वह वार चली,
हर शाख शाख पत्ते पत्ते, लिपटी लिपटी वह खूब खिली.
था प्रेम प्रगाढ़ ही दोनों में,पर तरु का मन था अहम् भरा,
आश्रयदाता अवलम्बन वह ,यह भी मन में था बसा रहा.
लघु तुच्छ सदा उसे ठहरा कर, तरु तुष्टि बड़ा ही पाता था,
निज लाचारी को देख ,लता का ह्रिदय क्षुब्ध हो जाता था.
था आत्मविश्वास न रंचमात्र, जो प्रतिकार वह कर पाती,
अपमान गरल नित पी पीकर, भाग्य मान सब सह जाती.
आशंका से मन था कम्पित, कहीं तरु निज हाथ छुड़ा न ले,
कैसे उस बिन जी पायेगी, कहाँ जायेगी इस तन को ले.
तरु ने यदि त्याग दिया उसको,फिर कहाँ ठौर वह पायेगी,
जो भूमि पड़ी उसकी काया, नित पद से कुचली जायेगी.
था पड़ा सुप्त उसका चेतन, उसको न किंचित भान रहा,
योगक्षेम वाहक जग का, अखिलेश्वर केवल एक हुआ.
जीवन दाता सब जीवों का, सुखकर्ता सबका दुःख हरता,
उसकी कृति ही हर एक प्राणी,नहीं कोई हीन न कोई बड़ा.
सत का सूरज उर में प्रकटा , निर्भय विभोर निश्चिन्त हुई,
मृदुस्वर से प्रिय को समझाकर, उस से हित की ये बात कही.
है सत्य मेरे आधार तुम्ही, तेरे प्रश्रय से विस्तार मेरा,
तुम सदा रहे रक्षक मेरे, तुमसे सुरभित संसार मेरा.
पर तुच्छ नहीं मैं भी इतनी, है व्यर्थ नहीं मेरा होना,
जिस सर्जक की तुम रचना हो,वह ही तो मेरा हेतु बना.
माना कि तुम सम बली नहीं,तुम सा मेरा सामर्थ्य नहीं,
पर कर्तब्य परायण मैं भी हूँ, कभी छोड़ा तेरा संग नहीं.
तुम मुझे सम्हाले रहते हो, तो मैं भी तो रक्षक तेरी,
हो धूप कि आंधी या वर्षा,तुझसे पहले मैं सह लेती .
विपदा जो तेरी ओर बढे ,मैं सदा ढाल बन अडती हूँ ,
मेरे होते कोई वार करे, यह कभी न मैं सह सकती हूँ.
चाहा तेरा है साथ सदा, चाहे जिस ओर गति तेरी,
यूँ ही जीवन भर संग रहूँ , नहीं दूजी कोई साध मेरी.
फिर क्या तुलना क्या रंज भेद, क्यों मन में कोई घाव भरें,
आ स्नेह से हिल मिल संग रहें,क्यों सुखमय जीवन नष्ट करें.
था सार छुपा इसमें सुख का, तरुवर के मन को भी भाया,
जो अहम् बना दुःख का कारण, तरुवर ने उसको त्याग दिया.
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था उन्नत उसका अंग अंग, गर्वोन्नत भू पर अडिग अड़ा.
वहीँ पार्श्व में पनपी थी, कोमल तन सुन्दर एक लता.
नित निरख निरख तरु की दृढ़ता, हर्षित उसका चित था डोला.
तरुनाई कोमलता उसकी , तरुवर के मन को भी भायी,
निज शाख झुकाकर उसने भी, कोंपल की उंगली थाम ही ली.
प्रिय ने जो अंगीकार किया, तन मन अपना वह वार चली,
हर शाख शाख पत्ते पत्ते, लिपटी लिपटी वह खूब खिली.
था प्रेम प्रगाढ़ ही दोनों में,पर तरु का मन था अहम् भरा,
आश्रयदाता अवलम्बन वह ,यह भी मन में था बसा रहा.
लघु तुच्छ सदा उसे ठहरा कर, तरु तुष्टि बड़ा ही पाता था,
निज लाचारी को देख ,लता का ह्रिदय क्षुब्ध हो जाता था.
था आत्मविश्वास न रंचमात्र, जो प्रतिकार वह कर पाती,
अपमान गरल नित पी पीकर, भाग्य मान सब सह जाती.
आशंका से मन था कम्पित, कहीं तरु निज हाथ छुड़ा न ले,
कैसे उस बिन जी पायेगी, कहाँ जायेगी इस तन को ले.
तरु ने यदि त्याग दिया उसको,फिर कहाँ ठौर वह पायेगी,
जो भूमि पड़ी उसकी काया, नित पद से कुचली जायेगी.
था पड़ा सुप्त उसका चेतन, उसको न किंचित भान रहा,
योगक्षेम वाहक जग का, अखिलेश्वर केवल एक हुआ.
जीवन दाता सब जीवों का, सुखकर्ता सबका दुःख हरता,
उसकी कृति ही हर एक प्राणी,नहीं कोई हीन न कोई बड़ा.
सत का सूरज उर में प्रकटा , निर्भय विभोर निश्चिन्त हुई,
मृदुस्वर से प्रिय को समझाकर, उस से हित की ये बात कही.
है सत्य मेरे आधार तुम्ही, तेरे प्रश्रय से विस्तार मेरा,
तुम सदा रहे रक्षक मेरे, तुमसे सुरभित संसार मेरा.
पर तुच्छ नहीं मैं भी इतनी, है व्यर्थ नहीं मेरा होना,
जिस सर्जक की तुम रचना हो,वह ही तो मेरा हेतु बना.
माना कि तुम सम बली नहीं,तुम सा मेरा सामर्थ्य नहीं,
पर कर्तब्य परायण मैं भी हूँ, कभी छोड़ा तेरा संग नहीं.
तुम मुझे सम्हाले रहते हो, तो मैं भी तो रक्षक तेरी,
हो धूप कि आंधी या वर्षा,तुझसे पहले मैं सह लेती .
विपदा जो तेरी ओर बढे ,मैं सदा ढाल बन अडती हूँ ,
मेरे होते कोई वार करे, यह कभी न मैं सह सकती हूँ.
चाहा तेरा है साथ सदा, चाहे जिस ओर गति तेरी,
यूँ ही जीवन भर संग रहूँ , नहीं दूजी कोई साध मेरी.
फिर क्या तुलना क्या रंज भेद, क्यों मन में कोई घाव भरें,
आ स्नेह से हिल मिल संग रहें,क्यों सुखमय जीवन नष्ट करें.
था सार छुपा इसमें सुख का, तरुवर के मन को भी भाया,
जो अहम् बना दुःख का कारण, तरुवर ने उसको त्याग दिया.
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22.10.10
अँधा प्रेम !!!
प्रेम,एक ऐसी दिव्य अनुभूति, जिससे सुन्दर,जिससे अलौकिक संसार में और कोई अनुभूति नहीं.जब यह ह्रदय में उमड़े तो फिर सम्पूर्ण सृष्टि रसमय सारयुक्त लगने लगती है.ह्रदय विस्तृत हो ब्रह्माण्ड में और ब्रह्माण्ड ह्रदय में समाहित हो जाता है. मन और कल्पनाएँ अगरु के सुवास से सुवासित और उस जैसी ही हल्की हो व्योम में धवल मेघों के परों पर सवार हो चहुँ ओर विचरने लगता है. मन तन से और तन मन से बेखबर हो जाता है. यह बेसुधी ही आनंद का आगार बन जाती है.पवन मादक सुगंध से मदमाने लगता है और मौन में संगीत भर जाता है. जीवन सार्थकता पाया लगता है..
मनुष्य ही क्या संसार में जीवित ऐसा कोई प्राणी नहीं, जो प्रेम की भाषा न समझता हो और इस दिव्य अनुभूति का अभिलाषी न हो . आज तक न जाने कितने पन्ने इस विषय पर रंगे गए परन्तु इसका आकर्षण ऐसा, इसमें रस ऐसा, कि न तो आज तक कोई इसे शब्दों में पूर्ण रूपेण बाँध पाया है और न असंख्यों बार विवेचित होने पर भी यह विषय पुराना पड़ा है.आज ही क्या, सृष्टि के आरम्भ से इसके अंतिम क्षण तक यह भाव,यह विषय, अपना शौष्ठव,अपना आकर्षण नहीं खोएगा, क्योंकि कहीं न कहीं यही तो इस श्रृष्टि का आधार है..
माना जाता है प्रेम सीमाएं नहीं मानता. यह तो अनंत आकाश सा असीम होता है और जो यह मन को अपने रंग में रंग जाए तो ह्रदय को नभ सा ही विस्तार दे जाता है.प्रेम का सर्वोच्च रूप ईश्वर और ईश्वर का दृश्य रूप प्रेम है..और ईश्वर क्या है ?? करुणा,प्रेम, परोपकार इत्यादि समस्त सद्गुणों का संघीभूत रूप. तो तात्पर्य हुआ जो हृहय प्रेम से परिपूर्ण होगा वहां क्रोध , लोभ , इर्ष्या, असहिष्णुता, हिंसा इत्यादि भावों के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा. प्रेमी के ह्रदय में केवल ईश्वर स्वरुप सत का वास होगा और जहाँ सत हो, असत के लिए कोई स्थान ही कहाँ बचता है..
पर वास्तविकता के धरातल पर देखें, ऐसा सदैव होता है क्या ?? प्रेम पूर्णतया दैवीय गुण है,परन्तु इसके रहते भी व्यक्ति अपने उसी प्रेमाधार के प्रति शंकालु , ईर्ष्यालु , प्रतिस्पर्धी, स्वार्थी, कपटी,क्रोधी,अधीर होता ही है. तो क्या कहें ?? प्रेम का स्वरुप क्या माने ?? हम दिनानुदिन तो देखते हैं, प्रेम यदि ह्रदय को नभ सा विस्तार देता है तो छुद्रतम रूप से संकुचित भी कर देता है और कभी तो दुर्दांत अपराध तक करवा देता है. फिर क्या निश्चित करें ? क्या यह मानें कि प्रेम व्यक्ति की एक ऐसी मानसिक आवश्यकता है,जो अपने आधार से केवल सुख लेने में ही विश्वास रखता है, प्रेम के प्रतिदान का ही आकांक्षी होता है? प्रेमी उसकी प्रशंशा करे, उसपर तन मन धन न्योछावर कर दे, उसके अहम् और रुचियों को सर्वोपरि रखे, उसे अपना स्वत्व समर्पित कर दे,तब प्रेमी को लगे कि उसने सच्चे रूप से प्रेम पाया...क्या यह प्रेम है?
क्या इस भाव को जिसे अलंकृत और महिमामंडित कर इतना आकर्षक बना दिया गया है, वैयक्तिक स्वार्थ का पर्यायवाची नहीं ठहराया जा सकता ? एक प्रेमी चाहता क्या है? अपने प्रेमाधार का सम्पूर्ण समर्पण ,उसकी एकनिष्ठता,उसका पूरा ध्यान ,उसपर एकाधिकार, उसपर वर्चस्व या स्वामित्व, कुल मिलाकर उसका सर्वस्व. एक सतत सजग व्यापारी बन जाता है प्रेमी,जो व्यक्तिगत लाभ का लोभ कभी नहीं त्याग पाता. लेन देन के हिसाब में एक प्रेमी सा कुशल और कृपण तो एक बनिक भी नहीं हो पाता.हार और हानि कभी नहीं सह सकता और जहाँ यह स्थिति पहुंची नहीं कि तलवारें म्यान से बाहर निकल आतीं हैं..
प्रेम पाश में आबद्ध प्रेमी युगल प्रेम के प्रथम चरण में परस्पर एक दूसरे में सब कुछ आलौकिक देखता है.जो वास्तव में सामने वाले में रंचमात्र भी नहीं,वह भी परिकल्पित कर लेता है. सामने वाले में उसे रहस्य और सद्गुणों का अक्षय भण्डार दीखता है..युगल परस्पर एक दूसरे के गहन मन का एक एक कोना देख लेने,जान लेने और उसे आत्मसात कर लेने की सुखद यात्रा पर निकल पड़ते हैं. आरंभिक अवस्था में युगल एक दूसरे के लिए अत्यधिक उदार रहते हैं, प्रतिदान की प्रतिस्पर्धा लगी रहती है,जिसमे दोनों अपनी विजय पताका उन्नत रखना चाहते हैं, पर जैसे जैसे ह्रदय कोष्ठक की यह यात्रा संपन्न होती जाती है,कल्पनाओं का मुल्लम्मा उतरने लगता है,यथार्थ उतना सुन्दर ,उतना आकर्षक नहीं लगता फिर. रहस्य जैसे जैसे संक्षिप्तता पाता है,कल्पना के नील गगन में विचारने वाला मन यथार्थ के ठोस धरातल पर उतरने को बाध्य हो जाता है,जहाँ कंकड़ पत्थर कील कांटे सब हैं..इसे सहजता से स्वीकार करने को मन प्रस्तुत नहीं होता और तब आरम्भ होता है हिसाब किताब,कृपणता का दौर.
जो युगल एक दूसरे के लिए प्राण न्योछावर करने को आठों याम प्रस्तुत रहते थे, अपने इस प्रेम को जीवन की सबसे बड़ी भूल मानने लगते हैं,इस परिताप की आंच में जलते प्रेमी क्षोभ मिटाने को सामने वाले को अतिनिष्ठुर होकर दंडित करने लगते हैं और एक समय के बाद इस प्रेम पाश से मुक्ति को छटपटाने लगते हैं या फिर एक बार फिर से एक सच्चे प्रेम की खोज में निकल पड़ते हैं. कहाँ है प्रेम,किसे कहें प्रेम ?? इस युगल ने भी तो बादलों की सैर की थी तथा प्रेम के समस्त लक्ष्ण जिए थे और मान लिया था कि उनका यह प्रेम आलौकिक है.
अब एक और पक्ष -
प्रेम स्वतःस्फूर्त घटना है,जो किसे कब कहाँ किससे और कैसे हो जायेगा ,कोई नहीं कह सकता..इसपर किसी का जोर नहीं चलता और न ही यह कोई नियम बंधन मानता है.
अस्तु,
पचहत्तर हजार आबादी वाला एक गाँव, जिसमे पांच महीने में चौदह वर्ष से लेकर पचपन वर्ष तक के छः प्रेमी जोड़े अपना स्वप्निल संसार बसाने समाज के समस्त नियमों के जंजीर खंडित करते घर से भाग गए.यह आंकडा उक्त गाँव के स्थानीय पुलिस थाने में दर्ज हुए जिसे लोगों ने जाना. ऐसे कितने प्रकरण और हुए जिसे परिवार वालों ने लोक लाज के बहाने दबाने छिपाने का प्रयास किया,कहा नहीं जा सकता. इन छः जोड़ों में से तीन जोड़ा था ममेरे चचेरे भाई बहनों का,एक जोड़ा मामा भगिनी का, एक जोड़ा गुरु शिष्या का और एक जोड़ा जीजा साली का. निश्चित रूप से उसी अलौकिक प्रेम ने ही इन्हें कुछ भी सोचने समझने योग्य नहीं छोड़ा.यह केवल स्थान विशेष की घटना नहीं,विकट प्रेम की यह आंधी सब ओर बही हुई है जो अपने वेग से समस्त नैतिक मूल्यों को ध्वस्त करने को प्रतिबद्ध है...
तो फिर प्रेम तो प्रेम होता है,इसमें सही गलत कुछ नहीं होता,मान कर इन घटनाओं को सामाजिक स्वीकृति/मान्यता मिल जानी चाहिए क्या ?? यह यदि आज गंभीरता पूर्वक न विचारा गया तो संभवतः मनुष्य और पशु समाज में भेद करना कठिन हो जायेगा. शहरों महानगरों में गाँवों की तरह सख्त बंदिश नहीं होती और वहां परिवार तथा आस पड़ोस में ही प्रेम के आधार ढूंढ लेने की बाध्यता भी नहीं होती ,इसलिए वहां चचेरे ममेरे भाई बहनों में ही यह आधार नहीं तलाशा जाता..पर एक बार अपने आस पास दृष्टिपात किया जाय..आज जो कुछ यहाँ भी हो रहा है,सहज ही स्वीकार लेना चाहिए??
परंपरा आज की ही नहीं ,बहुत पुरातन है, पर आज बहुचर्चित है..यह है "आनर किलिंग". इसके समर्थक और विरोधी दोनों ही अपना अपना पक्ष लेकर मैदान में जोर शोर से कूद पड़े हैं.पर "आनर किलिंग" के नाम पर न तो डेंगू मच्छरों की तरह पकड़ पकड़ कर प्रेमियों का सफाया करने से समस्या का समाधान मिलेगा और न ही प्रेम को इस प्रकार अँधा मान कर बैठने से सामाजिक मूल्यों के विघटन को रोका जा सकेगा . आज आवश्यकता है व्यक्तिमात्र द्वारा व्यक्तिगत नैतिकता,सामाजिक मूल्यों की सीमा रेखाओं को सुदृढ़ करने की और प्रेम के सच्चे स्वरुप को पहचानने और समझने की.
समग्र रूप में जो प्रेम व्यक्ति के ह्रदय को नभ सा विस्तृत न बनाये,फलदायी सघन उस वृक्ष सा न बनाये जो अपने आस पास सबको फल और शीतल छांह देती है,जो व्यक्ति को सात्विक और उदार न बनाये,उसका नैतिक उत्थान न करे , वह प्रेम नहीं, प्रेम का भ्रम भर है. प्रेम अँधा नहीं होता,बल्कि उसकी तो हज़ार आँखें होती हैं जिनसे वह असंख्य हृदयों का दुःख देख सकता है और उनके सुख के उद्योग में अपना जीवन समर्पित कर सकता है..
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मनुष्य ही क्या संसार में जीवित ऐसा कोई प्राणी नहीं, जो प्रेम की भाषा न समझता हो और इस दिव्य अनुभूति का अभिलाषी न हो . आज तक न जाने कितने पन्ने इस विषय पर रंगे गए परन्तु इसका आकर्षण ऐसा, इसमें रस ऐसा, कि न तो आज तक कोई इसे शब्दों में पूर्ण रूपेण बाँध पाया है और न असंख्यों बार विवेचित होने पर भी यह विषय पुराना पड़ा है.आज ही क्या, सृष्टि के आरम्भ से इसके अंतिम क्षण तक यह भाव,यह विषय, अपना शौष्ठव,अपना आकर्षण नहीं खोएगा, क्योंकि कहीं न कहीं यही तो इस श्रृष्टि का आधार है..
माना जाता है प्रेम सीमाएं नहीं मानता. यह तो अनंत आकाश सा असीम होता है और जो यह मन को अपने रंग में रंग जाए तो ह्रदय को नभ सा ही विस्तार दे जाता है.प्रेम का सर्वोच्च रूप ईश्वर और ईश्वर का दृश्य रूप प्रेम है..और ईश्वर क्या है ?? करुणा,प्रेम, परोपकार इत्यादि समस्त सद्गुणों का संघीभूत रूप. तो तात्पर्य हुआ जो हृहय प्रेम से परिपूर्ण होगा वहां क्रोध , लोभ , इर्ष्या, असहिष्णुता, हिंसा इत्यादि भावों के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा. प्रेमी के ह्रदय में केवल ईश्वर स्वरुप सत का वास होगा और जहाँ सत हो, असत के लिए कोई स्थान ही कहाँ बचता है..
पर वास्तविकता के धरातल पर देखें, ऐसा सदैव होता है क्या ?? प्रेम पूर्णतया दैवीय गुण है,परन्तु इसके रहते भी व्यक्ति अपने उसी प्रेमाधार के प्रति शंकालु , ईर्ष्यालु , प्रतिस्पर्धी, स्वार्थी, कपटी,क्रोधी,अधीर होता ही है. तो क्या कहें ?? प्रेम का स्वरुप क्या माने ?? हम दिनानुदिन तो देखते हैं, प्रेम यदि ह्रदय को नभ सा विस्तार देता है तो छुद्रतम रूप से संकुचित भी कर देता है और कभी तो दुर्दांत अपराध तक करवा देता है. फिर क्या निश्चित करें ? क्या यह मानें कि प्रेम व्यक्ति की एक ऐसी मानसिक आवश्यकता है,जो अपने आधार से केवल सुख लेने में ही विश्वास रखता है, प्रेम के प्रतिदान का ही आकांक्षी होता है? प्रेमी उसकी प्रशंशा करे, उसपर तन मन धन न्योछावर कर दे, उसके अहम् और रुचियों को सर्वोपरि रखे, उसे अपना स्वत्व समर्पित कर दे,तब प्रेमी को लगे कि उसने सच्चे रूप से प्रेम पाया...क्या यह प्रेम है?
क्या इस भाव को जिसे अलंकृत और महिमामंडित कर इतना आकर्षक बना दिया गया है, वैयक्तिक स्वार्थ का पर्यायवाची नहीं ठहराया जा सकता ? एक प्रेमी चाहता क्या है? अपने प्रेमाधार का सम्पूर्ण समर्पण ,उसकी एकनिष्ठता,उसका पूरा ध्यान ,उसपर एकाधिकार, उसपर वर्चस्व या स्वामित्व, कुल मिलाकर उसका सर्वस्व. एक सतत सजग व्यापारी बन जाता है प्रेमी,जो व्यक्तिगत लाभ का लोभ कभी नहीं त्याग पाता. लेन देन के हिसाब में एक प्रेमी सा कुशल और कृपण तो एक बनिक भी नहीं हो पाता.हार और हानि कभी नहीं सह सकता और जहाँ यह स्थिति पहुंची नहीं कि तलवारें म्यान से बाहर निकल आतीं हैं..
प्रेम पाश में आबद्ध प्रेमी युगल प्रेम के प्रथम चरण में परस्पर एक दूसरे में सब कुछ आलौकिक देखता है.जो वास्तव में सामने वाले में रंचमात्र भी नहीं,वह भी परिकल्पित कर लेता है. सामने वाले में उसे रहस्य और सद्गुणों का अक्षय भण्डार दीखता है..युगल परस्पर एक दूसरे के गहन मन का एक एक कोना देख लेने,जान लेने और उसे आत्मसात कर लेने की सुखद यात्रा पर निकल पड़ते हैं. आरंभिक अवस्था में युगल एक दूसरे के लिए अत्यधिक उदार रहते हैं, प्रतिदान की प्रतिस्पर्धा लगी रहती है,जिसमे दोनों अपनी विजय पताका उन्नत रखना चाहते हैं, पर जैसे जैसे ह्रदय कोष्ठक की यह यात्रा संपन्न होती जाती है,कल्पनाओं का मुल्लम्मा उतरने लगता है,यथार्थ उतना सुन्दर ,उतना आकर्षक नहीं लगता फिर. रहस्य जैसे जैसे संक्षिप्तता पाता है,कल्पना के नील गगन में विचारने वाला मन यथार्थ के ठोस धरातल पर उतरने को बाध्य हो जाता है,जहाँ कंकड़ पत्थर कील कांटे सब हैं..इसे सहजता से स्वीकार करने को मन प्रस्तुत नहीं होता और तब आरम्भ होता है हिसाब किताब,कृपणता का दौर.
जो युगल एक दूसरे के लिए प्राण न्योछावर करने को आठों याम प्रस्तुत रहते थे, अपने इस प्रेम को जीवन की सबसे बड़ी भूल मानने लगते हैं,इस परिताप की आंच में जलते प्रेमी क्षोभ मिटाने को सामने वाले को अतिनिष्ठुर होकर दंडित करने लगते हैं और एक समय के बाद इस प्रेम पाश से मुक्ति को छटपटाने लगते हैं या फिर एक बार फिर से एक सच्चे प्रेम की खोज में निकल पड़ते हैं. कहाँ है प्रेम,किसे कहें प्रेम ?? इस युगल ने भी तो बादलों की सैर की थी तथा प्रेम के समस्त लक्ष्ण जिए थे और मान लिया था कि उनका यह प्रेम आलौकिक है.
अब एक और पक्ष -
प्रेम स्वतःस्फूर्त घटना है,जो किसे कब कहाँ किससे और कैसे हो जायेगा ,कोई नहीं कह सकता..इसपर किसी का जोर नहीं चलता और न ही यह कोई नियम बंधन मानता है.
अस्तु,
पचहत्तर हजार आबादी वाला एक गाँव, जिसमे पांच महीने में चौदह वर्ष से लेकर पचपन वर्ष तक के छः प्रेमी जोड़े अपना स्वप्निल संसार बसाने समाज के समस्त नियमों के जंजीर खंडित करते घर से भाग गए.यह आंकडा उक्त गाँव के स्थानीय पुलिस थाने में दर्ज हुए जिसे लोगों ने जाना. ऐसे कितने प्रकरण और हुए जिसे परिवार वालों ने लोक लाज के बहाने दबाने छिपाने का प्रयास किया,कहा नहीं जा सकता. इन छः जोड़ों में से तीन जोड़ा था ममेरे चचेरे भाई बहनों का,एक जोड़ा मामा भगिनी का, एक जोड़ा गुरु शिष्या का और एक जोड़ा जीजा साली का. निश्चित रूप से उसी अलौकिक प्रेम ने ही इन्हें कुछ भी सोचने समझने योग्य नहीं छोड़ा.यह केवल स्थान विशेष की घटना नहीं,विकट प्रेम की यह आंधी सब ओर बही हुई है जो अपने वेग से समस्त नैतिक मूल्यों को ध्वस्त करने को प्रतिबद्ध है...
तो फिर प्रेम तो प्रेम होता है,इसमें सही गलत कुछ नहीं होता,मान कर इन घटनाओं को सामाजिक स्वीकृति/मान्यता मिल जानी चाहिए क्या ?? यह यदि आज गंभीरता पूर्वक न विचारा गया तो संभवतः मनुष्य और पशु समाज में भेद करना कठिन हो जायेगा. शहरों महानगरों में गाँवों की तरह सख्त बंदिश नहीं होती और वहां परिवार तथा आस पड़ोस में ही प्रेम के आधार ढूंढ लेने की बाध्यता भी नहीं होती ,इसलिए वहां चचेरे ममेरे भाई बहनों में ही यह आधार नहीं तलाशा जाता..पर एक बार अपने आस पास दृष्टिपात किया जाय..आज जो कुछ यहाँ भी हो रहा है,सहज ही स्वीकार लेना चाहिए??
परंपरा आज की ही नहीं ,बहुत पुरातन है, पर आज बहुचर्चित है..यह है "आनर किलिंग". इसके समर्थक और विरोधी दोनों ही अपना अपना पक्ष लेकर मैदान में जोर शोर से कूद पड़े हैं.पर "आनर किलिंग" के नाम पर न तो डेंगू मच्छरों की तरह पकड़ पकड़ कर प्रेमियों का सफाया करने से समस्या का समाधान मिलेगा और न ही प्रेम को इस प्रकार अँधा मान कर बैठने से सामाजिक मूल्यों के विघटन को रोका जा सकेगा . आज आवश्यकता है व्यक्तिमात्र द्वारा व्यक्तिगत नैतिकता,सामाजिक मूल्यों की सीमा रेखाओं को सुदृढ़ करने की और प्रेम के सच्चे स्वरुप को पहचानने और समझने की.
समग्र रूप में जो प्रेम व्यक्ति के ह्रदय को नभ सा विस्तृत न बनाये,फलदायी सघन उस वृक्ष सा न बनाये जो अपने आस पास सबको फल और शीतल छांह देती है,जो व्यक्ति को सात्विक और उदार न बनाये,उसका नैतिक उत्थान न करे , वह प्रेम नहीं, प्रेम का भ्रम भर है. प्रेम अँधा नहीं होता,बल्कि उसकी तो हज़ार आँखें होती हैं जिनसे वह असंख्य हृदयों का दुःख देख सकता है और उनके सुख के उद्योग में अपना जीवन समर्पित कर सकता है..
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27.9.10
आन बसो हिय मेरे.....
प्रभुजी प्यारे ,
आन बसो हिय मेरे...
साँसों से मैं डगर बुहारूँ,
नैनन जल से पाँव पखारूँ,
चुन चुन भाव के मूंगे मोती,
हार तुझे पहनाऊं ...
हे स्वामी प्यारे,
आन बसो हिय मेरे...
लाख चौरासी योनि भटका,
मानुस तन को ये मन तरसा,
तब ही जीव पाए यह काया ,
जब तूने उसे परसा ...
ओ ठाकुर न्यारे,
ना छोडो कर मेरे....
प्रभुजी प्यारे,
आन बसो हिय मेरे...
तू न बसे जो ह्रदय हमारे,
मोह गर्त से कौन उबारे,
पञ्च व्याधि ले डोरी फंदा,
बैठा सांझ सकारे ...
ओ पालन हारे,
त्रिताप हरो हमारे ....
प्रभुजी प्यारे,
आन बसो हिय मेरे...
..........
आन बसो हिय मेरे...
साँसों से मैं डगर बुहारूँ,
नैनन जल से पाँव पखारूँ,
चुन चुन भाव के मूंगे मोती,
हार तुझे पहनाऊं ...
हे स्वामी प्यारे,
आन बसो हिय मेरे...
लाख चौरासी योनि भटका,
मानुस तन को ये मन तरसा,
तब ही जीव पाए यह काया ,
जब तूने उसे परसा ...
ओ ठाकुर न्यारे,
ना छोडो कर मेरे....
प्रभुजी प्यारे,
आन बसो हिय मेरे...
तू न बसे जो ह्रदय हमारे,
मोह गर्त से कौन उबारे,
पञ्च व्याधि ले डोरी फंदा,
बैठा सांझ सकारे ...
ओ पालन हारे,
त्रिताप हरो हमारे ....
प्रभुजी प्यारे,
आन बसो हिय मेरे...
..........
15.9.10
किला फतह
परीक्षा फल तीन महीने बाद निकलने वाला था,सो उसबार वहां गयी तो पूरे ढाई महीने रहने का अवसर मिल गया ... आनंद सर्वत्र पसरा पड़ा था वहां जिसमे हम दिन रात डूबते उतराते रहते थे..आनंद के अजस्र स्रोतों मध्य सर्वाधिक सुखकारी उसका वह साहचर्य सुख ही था जो मेरी ममेरी बहन की सहपाठी सातवीं कक्षा में अध्यनरत छात्रा थी.. प्रतिदिन सुबह विद्यालय जाने से पूर्व वह यहाँ अपनी सखी को संग लेने आया करती थी. पहली बार जब उसपर दृष्टि पड़ी थी तो ठिठक कर रह गयी थी..उसके भोलेपन और अनिद्य सौंदर्य ने ह्रदय को ऐसे बाँधा कि उसके सानिध्य को यह विकल रहने लगा था.. बहन को मैंने मना लिया कि विद्यालय से वापसी में प्रतिदिन उसे वह अपने साथ लेती आये.
दूध में गुलाब की पंखुडियां घोल शायद ईश्वर ने उसे रंग दिया था. हंसती तो रक्ताभ कपोल ह्रदय में उजास भर देते थे.. बड़ी बड़ी विस्तृत आँखें और सघन पलकें बिना काजल लगाये भी कजरारी लगतीं थीं और उसके अधर...उफ़ !!! बात बात पर उसका खिलखिलाना किसी भी मुरझाये मन को तरोताजा करने में समर्थ था. जान बूझ कर मैं उन दोनों को अपने पास बिठा लेती और कभी कहानियां सुना तो कभी चुटकुले उन्हें भरमाती..वे मुग्ध हो अपने मुख मंडल पर प्रसंगोनुकूल भाव बिखेरतीं और मैं विभोर होकर अपने हिस्से का रस लेती..कभी कहीं किसी पटचित्र में राधा रानी की मनोहारी छवि देखी थी, उस बाला में मुझे वही रूप साकार दीखता था.
मेरे उस पूरे प्रवास में यह क्रम कभी बाधित न हुआ था.. वहां से वापसी से हफ्ते भर पहले पता चला कि उसका विवाह सुनिश्चित हो गया है जो कि छठवें ही दिन होनेवाला है...बैठक में उसके दादाजी मेरे नानाजी को न्योतने आये थे..तिलमिलाती हुई मैं उनके सम्मुख पहुँची. हालाँकि तब मेरी भी अवस्था ऐसी न थी कि कोई मुझ किशोरी को गंभीरता से लेता. पर इससे मैं अपने प्रश्न पूछने की अर्हता थोड़े न खोने वाली थी..मैंने जाकर प्रश्न दाग ही दिया..
संभवतः वे स्वयं ही अपना पक्ष रख शान बघारने और मेरे नानाजी को सीख देने के लिए इस प्रश्न की आकांक्षा कर रहे थे, सो अतिउत्साहित हो उन्होंने अपना पक्ष रखा ..." हमारे मैथिल समाज में कन्यादान की परंपरा है..कन्या का अर्थ है ऐसी कन्या, जो सचमुच ही कन्या हो. यदि कन्या अपने मायके में ही बड़ी ही जाती है तो माता पिता नरकगामी होते हैं. समय भले कितना भी बदल गया हो,पर हमारे वंश में आजतक इस परंपरा का खंडन न हुआ है और न होगा...."
अगले छः दिन मैं तिलमिलाती रही और ठान लिया था कि जो हो जाए, किसी स्थिति में नहीं जाउंगी इस विवाह में..पर न जाने कौन सी डोर थी जिसमे आबद्ध सम्मोहित सी अन्य परिवार जनों संग मैं उनके घर की ओर बढ़ चली..जब हम पहुंचे,द्वार पूजा संपन्न हो चुकी थी और अगले रीति की प्रतीक्षा में वर अपने संगी साथियों संग पंडाल में ही विराज मान थे..माथे पर सुशोभित मौर के कारण वर का मुख मंडल तो न दिखा पर उनका पहलवान सा डील डौल मेरी पिंडलियों को कंपकपा गया...वहां हँसी हिलोड़ का माहौल था और गुजरते हुए मेरे कानों में वर के एक संगी का स्वर गया - "देखो, आज जदि किला फतह न किया न...तो फिर......, फिर जीवन भर गुलाम बने रहना ,सो ध्यान रहे......हा हा हा हा....."
पीली साड़ी और आभूषण से सुसज्जित उस गुडिया का मुग्धकारी रूप नैनों को ऐसे मोह गया कि पलकें, कई पल को अपना स्वाभाविक गुण ही भूल गयीं.एकटक स्थिर हो गयीं उसपर जाकर.पर यह अवस्था अधिक देर तक न रह पाई.जैसे ही परिस्थिति का ध्यान आया, आँखें धार बहाने लगीं.उनके घर के निकट ही हमारा घर था, छोटी बहन को नानी को बता देने को कह मैं घर वापस चली आई...
नानी मामी जब वापस आयीं तो वर और वर के घर के गुण बखाने नहीं अघा रही थीं..कई पीढ़ियों से लक्ष्मी जी ने झा जी के घर में स्थायी निवास बना रखा था.पर सरस्वती जी की कृपा दृष्टि उन्हें अबतक न मिली थी.. झा जी ने अपने जीवन में बड़ा प्रयास किया पर दो पीढ़ियों में न तो कोई बाल बच्चा उच्च शिक्षा पा सका न ही चाहकर भी अबतक वे कोई इंजीनियर डाक्टर दामाद दरवाजे पर उतार पाए थे. परन्तु इस बार ईश्वर ने उनकी साध पूरी कर दी थी.. वर के घर केवल लक्ष्मी जी ही नहीं सरस्वती जी भी बसती थीं.वर बिजली विभाग में कनीय अभियंता थे...
उसबार जो ननिहाल से वापस आई तो फिर दो वर्ष बाद ही ममेरे भाई के विवाह के अवसर पर पुनः जाने का सुयोग बना ..प्रणाम पाती, कुशल क्षेम ,भोजन इत्यादि का उद्योग संपन्न हुआ ही था कि छोटी बहन पूछ बैठी...दीदी आपको मेरी वो सखी याद है ?? मिलेंगी उससे ??? मेरा ह्रदय उस स्मृति गंध से आलोड़ित हो गया.तीव्र उत्कंठित हो मैंने उससे आग्रह किया कि बाकी सब बाद में होता रहेगा,पहले तू मुझे उससे मिलवा दे.
यह एक अच्छी परंपरा थी उनमे, कि विवाह भले बाल्यावस्था में हो जाए पर द्विरागमन(गौना) कम से कम तीन, पांच या सात वर्ष बाद ही हुआ करता था.दामाद भले अपने ससुराल आता जाता रहता था,पर कन्या गौने के बाद ही अपने ससुराल जाती थी. अभी उसका गौना नहीं हुआ था इसलिए वह यहीं रह रही थी..लम्बे डग भरते हम उसके घर पहुँच गए.बड़ा परिवार था उनका , कई महिलायें आँगन में विराजित थीं. शिष्टाचार निभाते पैर छूने का अभियान चल पड़ा और इसी क्रम में बच्चे को गोद में लिए मैंने जिसके पैर छुए ,अनायास वहां हंसी की फुहार फूट पडी .. वह भी लपक कर पीछे हट गई. सिर उठाकर देखा तो प्रथम दृष्टया पहचान न पाई..
बहन ने झकझोरा...अरे दी, नहीं पहचाना आपने...इसी से तो मिलने दौड़ी हुई आयीं थीं आप. ध्यान से देखा, तो कलेजा दरक गया. वह जो छवि मन में बसी थी,उसकी क्षीण सी रेखा बची थी वहां. पूरा चेहरा बरौनियों से भरा हुआ. रंग उतरकर गेहूंआ भी नहीं बच गया था. लम्बी अवश्य हो गई थी पर लावण्यता रंचमात्र भी न बची थी उसमे.. कहीं अनजाने में यदि देखती तो किसी हालत में उसे नहीं पहचान पाती मैं..एक और धमाका हुआ...बताया गया कि यह गोद का बालक उसी का कोखजाया है..
किला केवल फतह ही नहीं हुआ था, अपितु उसे पूर्णतः ध्वस्त भी कर दिया गया था.....
...............
दूध में गुलाब की पंखुडियां घोल शायद ईश्वर ने उसे रंग दिया था. हंसती तो रक्ताभ कपोल ह्रदय में उजास भर देते थे.. बड़ी बड़ी विस्तृत आँखें और सघन पलकें बिना काजल लगाये भी कजरारी लगतीं थीं और उसके अधर...उफ़ !!! बात बात पर उसका खिलखिलाना किसी भी मुरझाये मन को तरोताजा करने में समर्थ था. जान बूझ कर मैं उन दोनों को अपने पास बिठा लेती और कभी कहानियां सुना तो कभी चुटकुले उन्हें भरमाती..वे मुग्ध हो अपने मुख मंडल पर प्रसंगोनुकूल भाव बिखेरतीं और मैं विभोर होकर अपने हिस्से का रस लेती..कभी कहीं किसी पटचित्र में राधा रानी की मनोहारी छवि देखी थी, उस बाला में मुझे वही रूप साकार दीखता था.
मेरे उस पूरे प्रवास में यह क्रम कभी बाधित न हुआ था.. वहां से वापसी से हफ्ते भर पहले पता चला कि उसका विवाह सुनिश्चित हो गया है जो कि छठवें ही दिन होनेवाला है...बैठक में उसके दादाजी मेरे नानाजी को न्योतने आये थे..तिलमिलाती हुई मैं उनके सम्मुख पहुँची. हालाँकि तब मेरी भी अवस्था ऐसी न थी कि कोई मुझ किशोरी को गंभीरता से लेता. पर इससे मैं अपने प्रश्न पूछने की अर्हता थोड़े न खोने वाली थी..मैंने जाकर प्रश्न दाग ही दिया..
संभवतः वे स्वयं ही अपना पक्ष रख शान बघारने और मेरे नानाजी को सीख देने के लिए इस प्रश्न की आकांक्षा कर रहे थे, सो अतिउत्साहित हो उन्होंने अपना पक्ष रखा ..." हमारे मैथिल समाज में कन्यादान की परंपरा है..कन्या का अर्थ है ऐसी कन्या, जो सचमुच ही कन्या हो. यदि कन्या अपने मायके में ही बड़ी ही जाती है तो माता पिता नरकगामी होते हैं. समय भले कितना भी बदल गया हो,पर हमारे वंश में आजतक इस परंपरा का खंडन न हुआ है और न होगा...."
अगले छः दिन मैं तिलमिलाती रही और ठान लिया था कि जो हो जाए, किसी स्थिति में नहीं जाउंगी इस विवाह में..पर न जाने कौन सी डोर थी जिसमे आबद्ध सम्मोहित सी अन्य परिवार जनों संग मैं उनके घर की ओर बढ़ चली..जब हम पहुंचे,द्वार पूजा संपन्न हो चुकी थी और अगले रीति की प्रतीक्षा में वर अपने संगी साथियों संग पंडाल में ही विराज मान थे..माथे पर सुशोभित मौर के कारण वर का मुख मंडल तो न दिखा पर उनका पहलवान सा डील डौल मेरी पिंडलियों को कंपकपा गया...वहां हँसी हिलोड़ का माहौल था और गुजरते हुए मेरे कानों में वर के एक संगी का स्वर गया - "देखो, आज जदि किला फतह न किया न...तो फिर......, फिर जीवन भर गुलाम बने रहना ,सो ध्यान रहे......हा हा हा हा....."
पीली साड़ी और आभूषण से सुसज्जित उस गुडिया का मुग्धकारी रूप नैनों को ऐसे मोह गया कि पलकें, कई पल को अपना स्वाभाविक गुण ही भूल गयीं.एकटक स्थिर हो गयीं उसपर जाकर.पर यह अवस्था अधिक देर तक न रह पाई.जैसे ही परिस्थिति का ध्यान आया, आँखें धार बहाने लगीं.उनके घर के निकट ही हमारा घर था, छोटी बहन को नानी को बता देने को कह मैं घर वापस चली आई...
नानी मामी जब वापस आयीं तो वर और वर के घर के गुण बखाने नहीं अघा रही थीं..कई पीढ़ियों से लक्ष्मी जी ने झा जी के घर में स्थायी निवास बना रखा था.पर सरस्वती जी की कृपा दृष्टि उन्हें अबतक न मिली थी.. झा जी ने अपने जीवन में बड़ा प्रयास किया पर दो पीढ़ियों में न तो कोई बाल बच्चा उच्च शिक्षा पा सका न ही चाहकर भी अबतक वे कोई इंजीनियर डाक्टर दामाद दरवाजे पर उतार पाए थे. परन्तु इस बार ईश्वर ने उनकी साध पूरी कर दी थी.. वर के घर केवल लक्ष्मी जी ही नहीं सरस्वती जी भी बसती थीं.वर बिजली विभाग में कनीय अभियंता थे...
उसबार जो ननिहाल से वापस आई तो फिर दो वर्ष बाद ही ममेरे भाई के विवाह के अवसर पर पुनः जाने का सुयोग बना ..प्रणाम पाती, कुशल क्षेम ,भोजन इत्यादि का उद्योग संपन्न हुआ ही था कि छोटी बहन पूछ बैठी...दीदी आपको मेरी वो सखी याद है ?? मिलेंगी उससे ??? मेरा ह्रदय उस स्मृति गंध से आलोड़ित हो गया.तीव्र उत्कंठित हो मैंने उससे आग्रह किया कि बाकी सब बाद में होता रहेगा,पहले तू मुझे उससे मिलवा दे.
यह एक अच्छी परंपरा थी उनमे, कि विवाह भले बाल्यावस्था में हो जाए पर द्विरागमन(गौना) कम से कम तीन, पांच या सात वर्ष बाद ही हुआ करता था.दामाद भले अपने ससुराल आता जाता रहता था,पर कन्या गौने के बाद ही अपने ससुराल जाती थी. अभी उसका गौना नहीं हुआ था इसलिए वह यहीं रह रही थी..लम्बे डग भरते हम उसके घर पहुँच गए.बड़ा परिवार था उनका , कई महिलायें आँगन में विराजित थीं. शिष्टाचार निभाते पैर छूने का अभियान चल पड़ा और इसी क्रम में बच्चे को गोद में लिए मैंने जिसके पैर छुए ,अनायास वहां हंसी की फुहार फूट पडी .. वह भी लपक कर पीछे हट गई. सिर उठाकर देखा तो प्रथम दृष्टया पहचान न पाई..
बहन ने झकझोरा...अरे दी, नहीं पहचाना आपने...इसी से तो मिलने दौड़ी हुई आयीं थीं आप. ध्यान से देखा, तो कलेजा दरक गया. वह जो छवि मन में बसी थी,उसकी क्षीण सी रेखा बची थी वहां. पूरा चेहरा बरौनियों से भरा हुआ. रंग उतरकर गेहूंआ भी नहीं बच गया था. लम्बी अवश्य हो गई थी पर लावण्यता रंचमात्र भी न बची थी उसमे.. कहीं अनजाने में यदि देखती तो किसी हालत में उसे नहीं पहचान पाती मैं..एक और धमाका हुआ...बताया गया कि यह गोद का बालक उसी का कोखजाया है..
किला केवल फतह ही नहीं हुआ था, अपितु उसे पूर्णतः ध्वस्त भी कर दिया गया था.....
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9.9.10
दानवीर राजा बलि !!!
राजा बलि विष्णु के अनन्य उपासक भक्तप्रवर प्रहलाद के पौत्र थे. थे तो राक्षस कुल के , परन्तु परम सात्विक तथा भगवान् विष्णु के परम भक्त थे. सदाचारी राजा सत्कार्य में लीन रह प्रजा का पुत्रवत पालन करते. इनकी दानशीलता जगद्विख्यात थी. इनके द्वार से कोई याचक रिक्तकर कभी न लौटा था. परन्तु कालांतर में इसी बात का राजा बलि को अभिमान हो गया. सर्वविदित है, भक्त का अभिमान प्रभु का भोजन हुआ करता है.तो जैसे भगवान् ने महर्षि नारद का मोह और अहंकार भंग किया था, वैसे ही अपने इस भक्त के चरित्रमार्जन को भी प्रस्तुत हो गए..
एक दिन जब राजा बलि पूजनोपरांत याचकों को दान देने हेतु द्वार से बाहर आये तो उन्होंने क्षत्र तथा कमण्डलु धारण किये बावन उंगली के बाल याचक को देखा. राजन ने सबसे पहले उन्ही से उनके अभीष्ट की जिज्ञासा की और वामन ने उनसे तीन पग भूमि दान में माँगा. राजन आश्चर्यचकित हो गए उन्हें याचक के बुद्धि विवेक पर अपार शंका हुई और उन्होंने सोचा कि हो सकता है याचक अपनी क्षमता से अनभिज्ञ है.अब यह छोटा बालक कितने भी प्रयास से भूमि पर डग भरेगा तो भी कितनी भूमि घेर पायेगा. अतः उसकी सहायतार्थ उन्होंने उनसे आग्रह किया कि इतनी तुच्छ वस्तु मांग वे उन्हें लज्जित न करें.वे चाहें तो कुछ गाँव अथवा राज्य ही मांग लें अन्यथा कुछ बहुमूल्य ऐसा मांगे जिसे देने में भी उन्हें प्रसन्नता हो.पर वामन भी थे कि अड़ गए कि उन्हें चाहिए तो तीन पग भूमि या नहीं तो कुछ नहीं.
हार कर राजन ने उनका प्रस्ताव स्वीकार लिया . पर वामन भी कम न थे..उन्होंने राजन से कहा कि ऐसे ही न लूँगा, पहले आप संकल्प कीजिये और वचन दीजिये कि बाद में आप न मुकरेंगे तभी मैं अपनी इच्छित लूँगा. मामला उलझा देख राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य ने जब अपनी दिव्य दृष्टि से देखा तो याचक और उसकी उसकी मंशा सब उनके सम्मुख प्रकट हो गयी..उन्होंने राजा को समझाना प्रारंभ किया कि वे इस वामन की बातों में न आयें ,यह छलिया है उन्हें कहीं का न छोड़ेगा.परन्तु वचनबद्ध राजन कब पीछे हटने वाले थे.
राजन दानी और वामन यजमान बन कुश के आसन पर विराजे और वामन ने अपने कमण्डलु का जल संकल्प के लिए कुश पकडे राजन के कर में डालने का उपक्रम किया.इधर जब शुक्राचार्य ने बात बनती न देखी तो अपने योग बल से वे अतिशूक्ष्म रूप धर कर कमण्डलु की टोंटी में जाकर बैठ गए और जलधार को ही अवरुद्ध कर दिया. उन्हें भय हुआ कि राजन का सब कुछ दान में जब यह वामन ही ले लेगा तो मेरे लिए क्या बचेगा.अतः इस कार्य को बाधित करना अतिआवश्यक था..इधर जल धार अवरुद्ध देख वामन ने अपने कुषाशन से एक कुषा खींचकर टोंटी में डाल कर खरोंच दिया जिससे कि अवरोध दूर हो जाय. कुषा जाकर सीधे शुक्राचार्य की आँख में लगी और रुधिर प्रवाह होने लगा.छटपटाकर शुक्राचार्य जी बाहर निकले और एक आँख वाले काने बनकर रह गए. तभी से यह कहावत चल पड़ी कि दान में जो विघ्न डाले,नजर लगाये, वह काना हो जाता है..
संकल्प पूरा हुआ और राजन ने वामन से कहा कि अब इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जहाँ की भी भूमि लेना चाहें निःसंकोच ले लें.वामन, अबतक जो बावन उंगली के थे, ने अपना विराट रूप प्रकट किया और एक पग पाताल पर रख धरती होते हुए दूसरे पग से सारा आकाश नाप लिया और तीसरा पग धरने को राजन से स्थान माँगा. राजन सोच में पड़ गए,परन्तु त्वरित गति से उनकी पत्नी ने जो कि परम विदुषी ही नहीं विष्णुभक्त भी थी,ने स्थिति सम्हाली. उसने प्रभु का आशय समझ लिया और राजन को समझाया कि अभी तक तो आपने भौतिक भूमि दान किया है, पंचतत्वों से निर्मित आपका यह शरीर भी तो भूमि सामान ही है जो अभी बच ही रहा है,अब इसे प्रभु को अर्पित कर दें..राजन ने झट अपना शीश प्रभु के सम्मुख नत कर स्वयं को प्रभु को अर्पित कर दिया..
राजन परम भक्त थे ,परन्तु मोह ने उन्हें विभ्रम में डाल दिया था.वे जानते थे कि इस ब्रह्माण्ड के एकाधिकारी प्रभु ही हैं ,पर इस बात को वे व्यवहार और स्मरण में नहीं रख पाए थे.तभी तो वे किसी को भी कुछ यह सोचकर देते थे कि अपनी वस्तु वे दान कर रहे हैं.प्रभु पर उनकी श्रद्धा थी,पर उन्होंने अबतक स्वयं को पूर्ण रूपेण प्रभु को समर्पित नहीं किया था, तभी तो सहज ही अहंकार ने उन्हें ग्रस लिया था. और प्रभु उन्हें पूर्णतः दुर्गुणों से मुक्त कर पवित्र कर देना चाहते थे. प्रभु अपने सच्चे भक्तों की देख भाल ठीक ऐसे ही करते हैं जैसे एक वैद्य अपने रोगी की करता है.प्रभु ने भी अपने इस परम स्नेही भक्त के इस रोग से त्राण के लिए यह स्वांग रचा था.
राजन ने जब स्वयं को निश्छल भाव से प्रभु को समर्पित कर दिया तो भगवान् अति प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा बलि से पुरुष्कार स्वरुप इच्छित वर मांगने को कहा. बलि अबतक समझ चुके थे कि प्रभु पर आस्था होते हुए भी चूँकि आजतक उन्होंने उन्हें अपने चित्त का प्रहरी न बनाया था तो सहज ही दुर्गुणों ने उनपर अपना आधिपत्य जमा लिया .तो जबतक इस चित्त के प्रहरी स्वयं विष्णु न होंगे माया से बचे रहना संभव नहीं है. सो उन्होंने प्रभु से आर्त प्रार्थना की कि अब से प्रभु सदैव उनके नयनों के सम्मुख रहें और किसी भी प्रकार के दुर्गुण दोष से उनकी रक्षा ठीक ऐसे ही करें जैसे एक स्वामिभक्त द्वारपाल सतत सजग रह द्वार पर डटे अपने राजा की करता है..
भगवान् तो ऐसे ही सत्पुरुष भक्त से बंध जाते हैं,तो यहाँ तो वे वचन से भी बंधे हुए थे. उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक यह अधिभार लिया और पातालपुरी में राजा बलि के राज्य में आठों प्रहर राजा के सम्मुख सशरीर उपस्थित रह उनकी रक्षा करने लगे . इधर वैकुण्ठ से बाहर रहे जब बहुत दिन हो गए तो सभी देवी देवता समेत लक्ष्मी जी अत्यंत चिंतित हो गयीं...सब सोच में पड़े थे कि ऐसा कबतक चलेगा.जैसी स्थिति थी इसमें न भगवान् भक्त को छोड़ सकते थे और भक्त द्वारा स्वेच्छा से उन्हें मुक्त करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था..तब इस कठिन काल में नारद जी ने माता लक्ष्मी को एक युक्ति बताई. उन्होंने कहा कि एक रक्षा सूत्र लेकर वे राजा बलि के पास अपरिचित रूप में दीन हीन दुखियारी बनकर जाएँ और राजा बलि को भाई बनाकर दान में प्रभु को मांग लायें..
लक्ष्मी जी राजा बलि की दरबार में उपस्थित हुईं और उन्होंने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें भाई बनना चाहती हैं.राजन ने उनका प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया और उनसे रक्षासूत्र बंधवा लिया. रक्षासूत्र बंधवाने के उपरान्त राजन ने लक्ष्मी जी से आग्रह किया कि वे अपनी इच्छित कुछ भी उनसे मांग लें,जबतक वे कुछ उपहार न लेंगी,उन्हें संतोष न मिलेगा..लक्ष्मी जी इसी हेतु तो वहां आयीं थीं. उन्होंने राजन से कहा कि आप मुझे अपनी सबसे प्रिय वस्तु दे दें.. राजन घबडा गए. उन्होंने कहा मेरा सर्वाधिक प्रिय तो मेरा यह प्रहरी है,परन्तु इसे देने से पूर्व तो मैं प्राण त्यागना अधिक पसंद करूँगा.
तब लक्ष्मी जी ने अपना परिचय उन्हें दिया और बताया कि मैं आपके उसी प्रहरी की पत्नी हूँ,जिन्हें आपने इतने दिनों से अपने यहाँ टिका रखा है. अब तो राजा पेशोपेश में पड़ गए..बात हो गई थी कि जिन्हें उन्होंने बहन माना था, उसके सुख सौभाग्य और गृहस्थी की रक्षा करना भी उन्ही का दायित्व था और यदि बहन की देखते तो उन्हें अपने प्राणों से भी प्रिय अपने इष्ट का साथ छोड़ना पड़ता.. पर राजन भक्त संत और दानवीर यूँ ही तो न थे.. उन्होंने अपने स्वार्थ से बहुत ऊपर भगिनी के सुख को माना और प्रभु को मुक्त कर उनके साथ वैकुण्ठ वास की सहमति दे दी ..परन्तु इसके साथ ही उन्होंने लक्ष्मी जी से आग्रह किया कि जब बहन बहनोई उनके घर आ ही गए हैं तो कुछ मास और वहीँ ठहर जाएँ और उन्हें आतिथ्य का सुअवसर दें..
लक्ष्मी जी ने उनका आग्रह मान लिया और श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) से कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि (धनतेरस ) तक विष्णु और लक्ष्मी जी वहीँ पाताल लोक में रजा बलि के यहाँ रहे . धनतेरस के बाद प्रभु जब लौटकर वैकुण्ठ को गए तो अगले दिन पूरे लोक में दीप पर्व मनाया गया. माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष रक्षा बंधन से धनतेरस तक विष्णु लक्ष्मी संग राजा बलि के यहाँ रहते हैं और दीपोत्सव का अन्य कई कारणों संग एक कारण यह भी है..
आज भी जब किसी को रक्षा सूत्र बंधा जाता है तो यह मंत्र उच्चारित किया जाता है -
" ॐ एन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः
तेन त्वा मनुबधनानि रक्षे माचल माचल "
*************************************
एक दिन जब राजा बलि पूजनोपरांत याचकों को दान देने हेतु द्वार से बाहर आये तो उन्होंने क्षत्र तथा कमण्डलु धारण किये बावन उंगली के बाल याचक को देखा. राजन ने सबसे पहले उन्ही से उनके अभीष्ट की जिज्ञासा की और वामन ने उनसे तीन पग भूमि दान में माँगा. राजन आश्चर्यचकित हो गए उन्हें याचक के बुद्धि विवेक पर अपार शंका हुई और उन्होंने सोचा कि हो सकता है याचक अपनी क्षमता से अनभिज्ञ है.अब यह छोटा बालक कितने भी प्रयास से भूमि पर डग भरेगा तो भी कितनी भूमि घेर पायेगा. अतः उसकी सहायतार्थ उन्होंने उनसे आग्रह किया कि इतनी तुच्छ वस्तु मांग वे उन्हें लज्जित न करें.वे चाहें तो कुछ गाँव अथवा राज्य ही मांग लें अन्यथा कुछ बहुमूल्य ऐसा मांगे जिसे देने में भी उन्हें प्रसन्नता हो.पर वामन भी थे कि अड़ गए कि उन्हें चाहिए तो तीन पग भूमि या नहीं तो कुछ नहीं.
हार कर राजन ने उनका प्रस्ताव स्वीकार लिया . पर वामन भी कम न थे..उन्होंने राजन से कहा कि ऐसे ही न लूँगा, पहले आप संकल्प कीजिये और वचन दीजिये कि बाद में आप न मुकरेंगे तभी मैं अपनी इच्छित लूँगा. मामला उलझा देख राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य ने जब अपनी दिव्य दृष्टि से देखा तो याचक और उसकी उसकी मंशा सब उनके सम्मुख प्रकट हो गयी..उन्होंने राजा को समझाना प्रारंभ किया कि वे इस वामन की बातों में न आयें ,यह छलिया है उन्हें कहीं का न छोड़ेगा.परन्तु वचनबद्ध राजन कब पीछे हटने वाले थे.
राजन दानी और वामन यजमान बन कुश के आसन पर विराजे और वामन ने अपने कमण्डलु का जल संकल्प के लिए कुश पकडे राजन के कर में डालने का उपक्रम किया.इधर जब शुक्राचार्य ने बात बनती न देखी तो अपने योग बल से वे अतिशूक्ष्म रूप धर कर कमण्डलु की टोंटी में जाकर बैठ गए और जलधार को ही अवरुद्ध कर दिया. उन्हें भय हुआ कि राजन का सब कुछ दान में जब यह वामन ही ले लेगा तो मेरे लिए क्या बचेगा.अतः इस कार्य को बाधित करना अतिआवश्यक था..इधर जल धार अवरुद्ध देख वामन ने अपने कुषाशन से एक कुषा खींचकर टोंटी में डाल कर खरोंच दिया जिससे कि अवरोध दूर हो जाय. कुषा जाकर सीधे शुक्राचार्य की आँख में लगी और रुधिर प्रवाह होने लगा.छटपटाकर शुक्राचार्य जी बाहर निकले और एक आँख वाले काने बनकर रह गए. तभी से यह कहावत चल पड़ी कि दान में जो विघ्न डाले,नजर लगाये, वह काना हो जाता है..
संकल्प पूरा हुआ और राजन ने वामन से कहा कि अब इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जहाँ की भी भूमि लेना चाहें निःसंकोच ले लें.वामन, अबतक जो बावन उंगली के थे, ने अपना विराट रूप प्रकट किया और एक पग पाताल पर रख धरती होते हुए दूसरे पग से सारा आकाश नाप लिया और तीसरा पग धरने को राजन से स्थान माँगा. राजन सोच में पड़ गए,परन्तु त्वरित गति से उनकी पत्नी ने जो कि परम विदुषी ही नहीं विष्णुभक्त भी थी,ने स्थिति सम्हाली. उसने प्रभु का आशय समझ लिया और राजन को समझाया कि अभी तक तो आपने भौतिक भूमि दान किया है, पंचतत्वों से निर्मित आपका यह शरीर भी तो भूमि सामान ही है जो अभी बच ही रहा है,अब इसे प्रभु को अर्पित कर दें..राजन ने झट अपना शीश प्रभु के सम्मुख नत कर स्वयं को प्रभु को अर्पित कर दिया..
राजन परम भक्त थे ,परन्तु मोह ने उन्हें विभ्रम में डाल दिया था.वे जानते थे कि इस ब्रह्माण्ड के एकाधिकारी प्रभु ही हैं ,पर इस बात को वे व्यवहार और स्मरण में नहीं रख पाए थे.तभी तो वे किसी को भी कुछ यह सोचकर देते थे कि अपनी वस्तु वे दान कर रहे हैं.प्रभु पर उनकी श्रद्धा थी,पर उन्होंने अबतक स्वयं को पूर्ण रूपेण प्रभु को समर्पित नहीं किया था, तभी तो सहज ही अहंकार ने उन्हें ग्रस लिया था. और प्रभु उन्हें पूर्णतः दुर्गुणों से मुक्त कर पवित्र कर देना चाहते थे. प्रभु अपने सच्चे भक्तों की देख भाल ठीक ऐसे ही करते हैं जैसे एक वैद्य अपने रोगी की करता है.प्रभु ने भी अपने इस परम स्नेही भक्त के इस रोग से त्राण के लिए यह स्वांग रचा था.
राजन ने जब स्वयं को निश्छल भाव से प्रभु को समर्पित कर दिया तो भगवान् अति प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा बलि से पुरुष्कार स्वरुप इच्छित वर मांगने को कहा. बलि अबतक समझ चुके थे कि प्रभु पर आस्था होते हुए भी चूँकि आजतक उन्होंने उन्हें अपने चित्त का प्रहरी न बनाया था तो सहज ही दुर्गुणों ने उनपर अपना आधिपत्य जमा लिया .तो जबतक इस चित्त के प्रहरी स्वयं विष्णु न होंगे माया से बचे रहना संभव नहीं है. सो उन्होंने प्रभु से आर्त प्रार्थना की कि अब से प्रभु सदैव उनके नयनों के सम्मुख रहें और किसी भी प्रकार के दुर्गुण दोष से उनकी रक्षा ठीक ऐसे ही करें जैसे एक स्वामिभक्त द्वारपाल सतत सजग रह द्वार पर डटे अपने राजा की करता है..
भगवान् तो ऐसे ही सत्पुरुष भक्त से बंध जाते हैं,तो यहाँ तो वे वचन से भी बंधे हुए थे. उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक यह अधिभार लिया और पातालपुरी में राजा बलि के राज्य में आठों प्रहर राजा के सम्मुख सशरीर उपस्थित रह उनकी रक्षा करने लगे . इधर वैकुण्ठ से बाहर रहे जब बहुत दिन हो गए तो सभी देवी देवता समेत लक्ष्मी जी अत्यंत चिंतित हो गयीं...सब सोच में पड़े थे कि ऐसा कबतक चलेगा.जैसी स्थिति थी इसमें न भगवान् भक्त को छोड़ सकते थे और भक्त द्वारा स्वेच्छा से उन्हें मुक्त करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था..तब इस कठिन काल में नारद जी ने माता लक्ष्मी को एक युक्ति बताई. उन्होंने कहा कि एक रक्षा सूत्र लेकर वे राजा बलि के पास अपरिचित रूप में दीन हीन दुखियारी बनकर जाएँ और राजा बलि को भाई बनाकर दान में प्रभु को मांग लायें..
लक्ष्मी जी राजा बलि की दरबार में उपस्थित हुईं और उन्होंने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें भाई बनना चाहती हैं.राजन ने उनका प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया और उनसे रक्षासूत्र बंधवा लिया. रक्षासूत्र बंधवाने के उपरान्त राजन ने लक्ष्मी जी से आग्रह किया कि वे अपनी इच्छित कुछ भी उनसे मांग लें,जबतक वे कुछ उपहार न लेंगी,उन्हें संतोष न मिलेगा..लक्ष्मी जी इसी हेतु तो वहां आयीं थीं. उन्होंने राजन से कहा कि आप मुझे अपनी सबसे प्रिय वस्तु दे दें.. राजन घबडा गए. उन्होंने कहा मेरा सर्वाधिक प्रिय तो मेरा यह प्रहरी है,परन्तु इसे देने से पूर्व तो मैं प्राण त्यागना अधिक पसंद करूँगा.
तब लक्ष्मी जी ने अपना परिचय उन्हें दिया और बताया कि मैं आपके उसी प्रहरी की पत्नी हूँ,जिन्हें आपने इतने दिनों से अपने यहाँ टिका रखा है. अब तो राजा पेशोपेश में पड़ गए..बात हो गई थी कि जिन्हें उन्होंने बहन माना था, उसके सुख सौभाग्य और गृहस्थी की रक्षा करना भी उन्ही का दायित्व था और यदि बहन की देखते तो उन्हें अपने प्राणों से भी प्रिय अपने इष्ट का साथ छोड़ना पड़ता.. पर राजन भक्त संत और दानवीर यूँ ही तो न थे.. उन्होंने अपने स्वार्थ से बहुत ऊपर भगिनी के सुख को माना और प्रभु को मुक्त कर उनके साथ वैकुण्ठ वास की सहमति दे दी ..परन्तु इसके साथ ही उन्होंने लक्ष्मी जी से आग्रह किया कि जब बहन बहनोई उनके घर आ ही गए हैं तो कुछ मास और वहीँ ठहर जाएँ और उन्हें आतिथ्य का सुअवसर दें..
लक्ष्मी जी ने उनका आग्रह मान लिया और श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) से कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि (धनतेरस ) तक विष्णु और लक्ष्मी जी वहीँ पाताल लोक में रजा बलि के यहाँ रहे . धनतेरस के बाद प्रभु जब लौटकर वैकुण्ठ को गए तो अगले दिन पूरे लोक में दीप पर्व मनाया गया. माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष रक्षा बंधन से धनतेरस तक विष्णु लक्ष्मी संग राजा बलि के यहाँ रहते हैं और दीपोत्सव का अन्य कई कारणों संग एक कारण यह भी है..
आज भी जब किसी को रक्षा सूत्र बंधा जाता है तो यह मंत्र उच्चारित किया जाता है -
" ॐ एन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः
तेन त्वा मनुबधनानि रक्षे माचल माचल "
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18.8.10
आखिरी ख्वाहिश ....
बरसों तक केवल चैनपुर ही नहीं, आस पास के कई गांवों के मामले भी बिना मियां हबीबुल्लाह अंसारी के सरपंची के निपटता न था. अपनी नेकदिली और शराफत के बदौलत सबके दिलों पर बादशाहत हासिल थी उन्हें.. मियां बीबे के झगडे से लेकर इलाके के बड़े बड़े मसले वे चुटकियों में ऐसे निपटा देते , कि उनकी अक्लमंदी देख लोग दंग रह जाते...लेकिन कहते हैं न पूर्व जन्म के कु और सु कर्म वर्तमान जन्म में इंसान को औलाद के रूप में मिलते हैं.तो शायद यही वजह रही होगी कि निहायत ही शरीफ मियां जी के पिछले सभी जन्मों का हिसाब बराबर करने को अल्लाह मियां ने तीन तीन नालायक औलाद से नवाज दिया...मियां की लाख कोशिशों के बाद भी न तो वे तालीम हासिल कर पाए ,न नेकदिल इंसान बन पाए . अव्वल बढ़ती उम्र के साथ दिन ब दिन लंठई और लुच्चई में खरे होते गए. आये दिन अपने कारनामो से ये बाप की जान छीलते रहते थे..
लोग शिकायत फ़रियाद लेकर आते,पंचयती बैठती,फैसला भी होता,पर उसे मानता कौन.. थक हार कर लोगों ने मियां जी से किनारा कर लिया..न कोई उन्हें अपने मामलों में बुलाता और न ही उनके बेटों की शिकायत लेकर उनके पास जाता.मियां जी के पास जाने से सीधे थाने जाना लोगों को अधिक जंचने लगा. लेकिन इन गुंडे मवालियों ने थानेदार से भी ऐसी सांठ गाँठ कर रखी थी कि वह इन लफंगों की नहीं थाने पहुंचे शिकायतकर्ता पर ही गाज गिराता था...
औलाद की करतूतों ने मियांजी को खुद से नजरें मिलाने लायक भी न छोड़ा था...एक तो अन्दर की टूटन ऊपर से बेवफा बुढ़ापा.आठों पहर दोजख की आग में जलते रहते वे..साठ की उमर पहुँचते पहुँचते जैसे ही रतौंधी ने ग्रसा, कि मौके का फायदा उठा उनकी औलादों ने धोखे से जायदाद के कागजातों पर उनसे दस्तखत करवा,उनका सबकुछ कब्जिया लिया..इसके बाद तो रोटी के दो कौर के लिए कुत्ते से भी बदतर उनकी जिदगी बना दी..
लम्बे समय तक खटियाग्रस्त रहने के बाद, अपना अंत नजदीक जान एक दिन हबीब मियां ने अपने सभी बेटे और बहुओं को ख़ास राज बताने के लिए बुलाया..बेटों को लगा अब्बा शायद किसी गड़े छिपे धन के बारे में बताएँगे...और सचमुच मियांजी ने उन्हें अपने वालिद की तस्वीर के पीछे छिपा कर रखी हुई सौ अशर्फियों का पता दे दिया, लेकिन इससे पहले उन्होंने उनसे करार करवा लिया कि वे उनकी आखिरी ख्वाहिश जरूर पूरी करेंगे..
उनकी यह ख्वाहिश कुछ यूँ थी -
" बचपन में जिस सरकारी स्कूल में उन्होंने अपनी पढ़ाई की थी,उसके आहते में एक आसमान छूता आम का पेड़ था..पेड़ों पर चढ़ने में वे इतने उस्ताद थे कि पेड़ की जिस शाख पर बन्दर भी चढ़ने से पहले तीन बार सोचते थे,पलक झपकते ही वे चढ़ जाते थे और फिर चाहे उसपर डोल पत्ता खेलने की बात हो, या कच्चे पक्के आम तोड़ने की बात, उनसा अव्वल पूरे गाँव में कोई न था..अपने इस उस्तादी के बल पर वे सब के लीडर बने थे और इसी दरख़्त ने उन्हें हरदिल अजीज बनाया था...
तो मियांजी की आखिरी ख्वाहिश यही थी कि जब भी उनका इंतकाल हो , बिना किसी को खबर लगे, रात के नीम अँधेरे में उन्हें उस दरख़्त की सबसे ऊंची शाख (जहाँ तक उनके बच्चे पहुँच सकते हों) पर उनके पैरों में रस्सी बाँध, उन्हें उल्टा लटका कर पूरे चौबीस घंटे के लिए छोड़ दिया जाय..इन दुनिया को छोड़ कर जाने से पहले वे अपने उस अजीज, महबूब, दरख़्त के आगोश से मन भर लिपट लेना चाहते थे.. अगरचे ऐसा न किया गया तो उनकी रूह कभी सुकून न पायेगी,यह दावा था उनका....
और जबतक वे पेड़ पर लटके हों , उनके बच्चे अपने तमाम यार दोस्तों और समधियाने वालों को इकट्ठी कर, उनके दिए इन अशर्फियाँ में से दो अशर्फियाँ खर्च कर,सबको खूब अच्छी सी दावत दें..लेकिन सनद रहे, कि दावत ख़त्म होने तक किसी को यह इल्म न हो कि उनका इंतकाल हो गया है..अपने बच्चों और अजीजों को खाते पीते जश्न मानते देख वे खुशी खुशी जन्नतनशीन हो जायेंगे..."
बड़ी अटपटी सी थी यह ख्वाहिश...पर बेटे बहुओं ने सोचा,चलो जिन्दगी भर तो बुड्ढे की एक बात न रखी..अब इस छोटी सी बात को रख लेने में कोई हर्ज नहीं है..वैसे भी इसकी ख्वाहिश न पूरी की, तो हो सकता है बुढऊ जिन्न बनकर जीना हराम कर दे..सो तय हुआ कि अब्बा हुजूर की यह ख्वाहिश जरूर पूरी की जायेगी...
संयोग से महीने भर के अन्दर हबीब मियां अल्लाह को प्यारे हो गए..ढलती शाम में उनका इंतकाल हुआ था..बेटों ने रात गहराने का इन्तजार किया और तबतक सभी यार दोस्तों को अगली दोपहर के दावत के लिए न्योत आये..और फिर जैसा मियां ने कहा था,वैसा ही कर दिया..अगले दिन दोपहर को उस शानदार दावत में थानेदार, आस पास के इलाके के सभी लफंगे और बहुओं के मायके वालों का जबरदस्त मजमा लगा..
इधर दावत शबाब पर थी और उधर शहर में एस पी के पास गाँव वालों का खाफिला इस शिकायत के साथ पहुंचा हुआ था कि हबीब मियां के तीनो मवाली बेटों ने अपने बाप का खून कर उसे स्कूल के आहते में पेड़ पर लटका दिया है,जिस दरिंदगी मे थानेदार की भी शह है और अब सारे मिल मजलूम बाप के मौत का जलसा मना रहे हैं.बदमाशों से निजात पाने को लालायित कई लोग खुद को इस वाकये के चश्मदीद गवाह भी ठहरा रहे थे..
एस पी को दल बल सहित पहुंचकर कार्यवाई करनी ही पडी..वहां पहुँच एस पी की भी लौटरी खुल गयी..क्योंकि एकसाथ इक्कट्ठे इतने अपराधियों को पकड़ना कोई हंसी थोड़े न था.. इलाके के लगभग सभी नामी गिरामी गुंडे और भ्रष्ट अफसर बैठे ठाले एस पी के हाथ लग गए.
और मियां हबीबुल्लाह अंसारी ... जीते जी जो न्याय नहीं कर पाए ,मरते मरते कर गए थे....
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लोग शिकायत फ़रियाद लेकर आते,पंचयती बैठती,फैसला भी होता,पर उसे मानता कौन.. थक हार कर लोगों ने मियां जी से किनारा कर लिया..न कोई उन्हें अपने मामलों में बुलाता और न ही उनके बेटों की शिकायत लेकर उनके पास जाता.मियां जी के पास जाने से सीधे थाने जाना लोगों को अधिक जंचने लगा. लेकिन इन गुंडे मवालियों ने थानेदार से भी ऐसी सांठ गाँठ कर रखी थी कि वह इन लफंगों की नहीं थाने पहुंचे शिकायतकर्ता पर ही गाज गिराता था...
औलाद की करतूतों ने मियांजी को खुद से नजरें मिलाने लायक भी न छोड़ा था...एक तो अन्दर की टूटन ऊपर से बेवफा बुढ़ापा.आठों पहर दोजख की आग में जलते रहते वे..साठ की उमर पहुँचते पहुँचते जैसे ही रतौंधी ने ग्रसा, कि मौके का फायदा उठा उनकी औलादों ने धोखे से जायदाद के कागजातों पर उनसे दस्तखत करवा,उनका सबकुछ कब्जिया लिया..इसके बाद तो रोटी के दो कौर के लिए कुत्ते से भी बदतर उनकी जिदगी बना दी..
लम्बे समय तक खटियाग्रस्त रहने के बाद, अपना अंत नजदीक जान एक दिन हबीब मियां ने अपने सभी बेटे और बहुओं को ख़ास राज बताने के लिए बुलाया..बेटों को लगा अब्बा शायद किसी गड़े छिपे धन के बारे में बताएँगे...और सचमुच मियांजी ने उन्हें अपने वालिद की तस्वीर के पीछे छिपा कर रखी हुई सौ अशर्फियों का पता दे दिया, लेकिन इससे पहले उन्होंने उनसे करार करवा लिया कि वे उनकी आखिरी ख्वाहिश जरूर पूरी करेंगे..
उनकी यह ख्वाहिश कुछ यूँ थी -
" बचपन में जिस सरकारी स्कूल में उन्होंने अपनी पढ़ाई की थी,उसके आहते में एक आसमान छूता आम का पेड़ था..पेड़ों पर चढ़ने में वे इतने उस्ताद थे कि पेड़ की जिस शाख पर बन्दर भी चढ़ने से पहले तीन बार सोचते थे,पलक झपकते ही वे चढ़ जाते थे और फिर चाहे उसपर डोल पत्ता खेलने की बात हो, या कच्चे पक्के आम तोड़ने की बात, उनसा अव्वल पूरे गाँव में कोई न था..अपने इस उस्तादी के बल पर वे सब के लीडर बने थे और इसी दरख़्त ने उन्हें हरदिल अजीज बनाया था...
तो मियांजी की आखिरी ख्वाहिश यही थी कि जब भी उनका इंतकाल हो , बिना किसी को खबर लगे, रात के नीम अँधेरे में उन्हें उस दरख़्त की सबसे ऊंची शाख (जहाँ तक उनके बच्चे पहुँच सकते हों) पर उनके पैरों में रस्सी बाँध, उन्हें उल्टा लटका कर पूरे चौबीस घंटे के लिए छोड़ दिया जाय..इन दुनिया को छोड़ कर जाने से पहले वे अपने उस अजीज, महबूब, दरख़्त के आगोश से मन भर लिपट लेना चाहते थे.. अगरचे ऐसा न किया गया तो उनकी रूह कभी सुकून न पायेगी,यह दावा था उनका....
और जबतक वे पेड़ पर लटके हों , उनके बच्चे अपने तमाम यार दोस्तों और समधियाने वालों को इकट्ठी कर, उनके दिए इन अशर्फियाँ में से दो अशर्फियाँ खर्च कर,सबको खूब अच्छी सी दावत दें..लेकिन सनद रहे, कि दावत ख़त्म होने तक किसी को यह इल्म न हो कि उनका इंतकाल हो गया है..अपने बच्चों और अजीजों को खाते पीते जश्न मानते देख वे खुशी खुशी जन्नतनशीन हो जायेंगे..."
बड़ी अटपटी सी थी यह ख्वाहिश...पर बेटे बहुओं ने सोचा,चलो जिन्दगी भर तो बुड्ढे की एक बात न रखी..अब इस छोटी सी बात को रख लेने में कोई हर्ज नहीं है..वैसे भी इसकी ख्वाहिश न पूरी की, तो हो सकता है बुढऊ जिन्न बनकर जीना हराम कर दे..सो तय हुआ कि अब्बा हुजूर की यह ख्वाहिश जरूर पूरी की जायेगी...
संयोग से महीने भर के अन्दर हबीब मियां अल्लाह को प्यारे हो गए..ढलती शाम में उनका इंतकाल हुआ था..बेटों ने रात गहराने का इन्तजार किया और तबतक सभी यार दोस्तों को अगली दोपहर के दावत के लिए न्योत आये..और फिर जैसा मियां ने कहा था,वैसा ही कर दिया..अगले दिन दोपहर को उस शानदार दावत में थानेदार, आस पास के इलाके के सभी लफंगे और बहुओं के मायके वालों का जबरदस्त मजमा लगा..
इधर दावत शबाब पर थी और उधर शहर में एस पी के पास गाँव वालों का खाफिला इस शिकायत के साथ पहुंचा हुआ था कि हबीब मियां के तीनो मवाली बेटों ने अपने बाप का खून कर उसे स्कूल के आहते में पेड़ पर लटका दिया है,जिस दरिंदगी मे थानेदार की भी शह है और अब सारे मिल मजलूम बाप के मौत का जलसा मना रहे हैं.बदमाशों से निजात पाने को लालायित कई लोग खुद को इस वाकये के चश्मदीद गवाह भी ठहरा रहे थे..
एस पी को दल बल सहित पहुंचकर कार्यवाई करनी ही पडी..वहां पहुँच एस पी की भी लौटरी खुल गयी..क्योंकि एकसाथ इक्कट्ठे इतने अपराधियों को पकड़ना कोई हंसी थोड़े न था.. इलाके के लगभग सभी नामी गिरामी गुंडे और भ्रष्ट अफसर बैठे ठाले एस पी के हाथ लग गए.
और मियां हबीबुल्लाह अंसारी ... जीते जी जो न्याय नहीं कर पाए ,मरते मरते कर गए थे....
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