20.5.09

दृष्टिकोण ...........

कभी कहीं पढ़ी हुई ,सुनी हुई एक सामान्य प्रसंग ,एक साधारण वाक्य या घटना भी कभी कभी मर्म को स्पर्श कर मन एवं चिंतन को ऐसे आंदोलित कर दिया करती है कि सोच की दिशा बदल जीवन धारा ही बदल जाया करती है....

आज अपनी एक नितांत ही व्यक्तिगत और गोपनीय अनुभूति यह सोचकर सार्वजानिक कर रही हूँ कि क्या पता जैसे प्रसंग ने मेरे सोच को परिवर्तित कर मुझे अनिर्वचनीय सुख लाभ का सुअवसर दिया,संभव है किसी और के सोच की दिशा को भी प्रभावित करे और उसके सुख का निमित्त बने...

भीड़ भाड़ सदैव ही मुझे आतंकित भयग्रस्त किया करती रही है और इससे बचने में मैं अपना पूरा सामर्थ्य लगा दिया करती हूँ...बाकी भीड़ से तो बच भी जाती थी पर अपने धर्मभीरू माता पिता संग मंदिरों के भीड़ का सामना छुटपन से ही करना पड़ा. धार्मिक स्थलों की अपार अव्यवस्थित भीड़,गन्दगी,पंडों की लूट खसोट,चारों और फ़ैली अव्यवस्था मन में इतनी वितृष्णा भरती थी कि मेरे समझ में नहीं आता था,इन सब के मध्य लोग अपनी श्रद्धा भक्ति का निष्पादन और भक्ति भाव का संवरण कैसे कर पाते हैं.इसके साथ ही तथाकथित भक्तों का क्षद्म रूप भी मुझे बड़ा ही आहत किया करता था और एक तरह से मंदिरों, कर्मकांडों के प्रति मेरी अरुचि दृढ से दृढ़तर होती गयी...मेरे अभिभावक मुझसे बड़े ही क्षुब्ध रहा करते थे. उनकी दृष्टि में मैं घोर नास्तिक थी....

मेरे विवाह के पहले तक हमारे अभिभावक वर्ष में एक बार देवघर (वैद्यनाथ धाम) अवश्य जाते थे. वहां के विहंगम दृश्य के क्या कहने......लोटे का जल शायद ही शिवशम्भू के मस्तक तक पहुँच पाता था.....समस्त पुष्प पत्र जल इत्यादि भक्तों पर ही गिरते थे..गर्भ गृह की यह अवस्था होती थी कि अधिकांशतः भोलेनाथ ही भक्तों के चरण रज प्राप्त करते थे.. यदि कोई उनके स्पर्श का सुअवसर पा जाता तो लगता यदि भोलेनाथ धरती को इतने जकड़ कर न पकडे होते तो कबके भक्त उन्हें समूल उठा अपने जेब में रख चलते बनते...

इस धक्का मुक्की में भक्ति भाव कितना बचा रहता था पता नहीं,हर व्यक्ति दुसरे को अपने स्थान का अपहर्ता घोर शत्रु सम लगता था और वश चलता तो सामने वाले को खदेड़ कर वहां से भगा देता. इस भीड़ में चोरों,जेबकतरों और ठगों की चांदी कटती थी....

उत्तर भारत के प्रायः सभी धर्मस्थलों की कमोबेश यही स्थिति आज भी है .हाँ दक्षिण भारत के जितने भी धर्मस्थलों पर आज तक भ्रमण किया ,अपार भीड़ के बावजूद मंदिर प्रशासन तथा स्थानीय प्रशासन के हस्तक्षेप से क्रमबद्ध कतारों के कारण बहुत अधिक धक्का मुक्की की स्थिति कहीं नहीं देखी...

बचपन में तो अभिभावकों के साथ जब कभी भी इस भीड़ भाड़ में जाने की बाध्यता बनी,मेरा प्रयास होता था ,शीघ्रता से उस भीड़ से निपटकर मंदिर प्रांगन में कोई ऐसा स्थान खोजना और वहां शांति से समय गुजरना जहाँ कि पर्याप्त नीरवता हो.बाद में जब स्वयं निर्णायक बनी तब बहुधा यही प्रयास रहा कि देवस्थानों पर ऐसे समय में जाया जाय जब भीड़ की संभावना न्यूनतम हो.

वर्षो तक देवस्थानों की इस भीड़ और अव्यवस्था ने मन को बड़ा ही तिक्त और खिन्न किया ...परन्तु सुसंयोग से करीब सत्रह अठारह वर्ष पहले एक बार चैतन्य महाप्रभु की जीवनी पढ़ने का अवसर मिला. संभवतः हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की लिखी हुई थी वह.. सम्पूर्ण कथानक इतने हृदयस्पर्शी ढंग से उल्लिखित था कि उसने मन प्राणों को बाँध लिया .....उसी कथानक में विवरण था कि जब चैतन्य महाप्रभु यात्रा क्रम में पुरी के जगन्नाथ मंदिर पहुंचे तो मुख्यद्वार पर पहुँचते ही प्रिय के सानिध्य स्मरण ने उन्हें भावविभोर कर दिया,उनके शरीर में रोमांच भर आया, नयनो से अविरल अश्रुधार प्रवाहित होने लगी, भक्ति और प्रेम के आवेग में वे मूर्छित हो गए.....

जब मैंने यह अंश पढ़ा तो न जाने इस प्रसंग ने ह्रदय के किस तंतु को झकझोरा .... मेरे मन ने मुझे बड़ा दुत्कारा ...मुझे लगा जिस पुरी मंदिर में जाने पर मुझे आजतक भीड़ अव्यवस्था,पण्डे , गन्दगी इत्यादि ही दिखे थे,उसी मंदिर में तो चैतन्य महाप्रभु को श्याम सलोने के दर्शन हुए .....यह तो मेरा ही दृष्टिदोष है जो आज तक मेरी दृष्टि इन अवयवों पर ही केन्द्रित रही थी . मेरा ध्यान जिन वस्तुओं पर था,मुझे वही दिखाई दिया...चैतन्य महाप्रभु के दृष्टि वलय में जो था, उन्हें वह दिखाई दिया...

इस विचार ने मुझे इतने गहरे प्रभावित किया कि ,इसने मेरा दृष्टिकोण ही बदल दिया...और उस दिन के बाद जब भी किसी देवस्थान पर गयी हूँ और मन ध्यान से वहां की सकारात्मक उर्जा से जुड़ने का प्रयत्न किया है,शायद ही कभी असफलता मिली है और उसके उपरांत तो कोई भी कारण ध्यान क्रम को बाधित नहीं कर पाया है..प्रेम और भक्ति रस में आकंठ निमग्न होने पर तन मन की जो स्थिति होती है,जो परमानंद प्राप्त होता है उसके सम्मुख संसार की कोई भी वस्तु कोई भी असुविधा अर्थहीन लगती है.....

जो हम अपनी इस स्थूल शरीर की सीमित सामर्थ्यवान नयनो से दृष्टिगत नहीं कर पाते , उसका आस्तित्व ही नहीं है ,ऐसी धारणा नितांत ही भ्रामक और मूर्खता पूर्ण है. जो ईश्वरीय सत्ता को अस्वीकृत करते हैं ,उनके साथ मैं बहस में नहीं पड़ना चाहती. उन्हें यदि यह सोच शांति और सुख देता है तो,यह बहुत ही अच्छी बात है,वे ऐसे ही सुखी रहें......मैं उनके उन्मुख हूँ जो ईश्वरीय सत्ता को तो मानते हैं ,परन्तु बाह्य अवयवों में फंस उस अपरिमित सुख प्राप्ति से वंचित रह जाते हैं..उन्हें एक बार इस दृष्टिकोण के प्रति सजग करना मुझे अपना कर्तब्य लगा....

धर्म में दिखावे और आडम्बर युक्त कोरे कर्मकांडों की धुर विरोधी मैं भी हूँ..कर्म कांडों की उपयोगिता और आवश्यकता मैं इतने भर के लिए मानती हूँ कि कहीं न कहीं ये मुझे वैज्ञानिक तथा भक्ति प्रेम के उद्दीपक लगते हैं. जैसे अपने किसी प्रिय श्रेष्ठ का सानिध्य हमें सुखद लगता है,उसके सम्मान और प्रेम प्रदर्शन हेतु हम भांति भांति की चेष्टाएँ करते हैं और अंततोगत्वा अपार सुख प्राप्त करते हैं,वैसे ही उस सर्वेश्वर के प्रति स्नेह प्रदर्शन सेवा सम्मान भी भक्ति उद्दीपक तथा सुख के साधन ही हैं.



धार्मिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों को सिरे से नकारना भी पूर्णतः उचित नहीं है क्योंकि इसके रूप को विकृत मनुष्यों और पण्डे पुजारियों ने ही किया है नहीं तो इनमे निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण पूर्ण रूपेण जीवनोपयोगी हैं.यह सत्य है की मानवमात्र का धर्म बह्याडम्बरों की अपेक्षा ईश्वर को मन कर्म व्यवहार में धारण करना है,परन्तु जो भी उपाय ईश्वर के प्रति श्रद्धा निष्ठां भक्ति और प्रेम को सुदृढ़ करने में सहायक हों,जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान करता हो,मेरी दृष्टि में वह ग्रहणीय एवं वन्दनीय है.

यह पूर्ण और अकाट्य सत्य है कि ईश्वर का वास मन आत्मा में होता है,हमारी भावनाओं में होता है,सकारात्मक सोच और कर्म में होता है.परन्तु ईश्वर का वास उस पत्थर और स्थान में भी होता है जो अनंत काल से असंख्य श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है.. यह निश्चित जानिए कि यदि हमारी अनुभूति क्षमता प्रखर है तो हम भी उसी प्रकार पत्थर की मूरत में श्याम को देख सकते हैं जैसे मीरा और सूर ने देखा था..रामकृष्ण ने माँ काली को देखा था....और ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं......तो क्यों न एक बार हम भी प्रयास कर देखें. उस अनिर्वचनीय सुख और आनंदलाभ का प्रयास करें....अधिक कहाँ कुछ करना है,एक दृष्टिकोण भर तो बदलना है इसके लिए.....

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14.5.09

सुख का मार्ग !!!

समाचार पत्र के साथ भी बड़ी विचित्र विडंबना है...सुबह के पहली किरण के साथ जितनी उत्सुकता और स्नेह से इसका स्वागत होता है,पाठोपरांत उतनी ही निर्ममता से इसका तिरस्कार भी होता है..परन्तु इन समाचार पत्रों में बहुत कुछ कभी न पुराने पड़ने तथा सहेजने योग्य सामग्री होती हैं,जो चाहे कितनी भी तिथियाँ बदल जायं अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता नहीं खोती...


ऐसे ही सफाई के क्रम रद्दी में पड़े पुराने समाचार पत्र के एक आलेख ने मन और आँखों को बाँध लिया..


समाचार था - तीन विवाहित पुत्रियों और नाती नतिनियों वाली सड़सठ वर्षीय नंदिता विश्वास ने बी.ए. आनर्स की परीक्षा दी.नंदिता पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के खड़गपुर शहर के वार्ड नंबर अठारह के मलिंचा में रहती हैं.माध्यमिक व जूनियर बेसिक की ट्रेनिंग के बाद नंदिता ने एक सरकारी विद्यालय में अध्यापन कार्य आरम्भ किया.१९८३ से २००३ तक उन्होंने अध्यापन कार्य किया और सेवानिवृति उपरांत उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अपने उस अधूरे स्वप्न को जो कि पारिवारिक एवं शैक्षणिक दायित्वों के व्यस्तता क्रम में अपूर्ण रह गया था,उसे पूर्णता प्रदान करने का संकल्प लिया...


पहले तो जिसने भी सुना, सबने उनका उपहास उड़ाया और पर्याप्त हतोत्साहित किया.परन्तु उनके दृढ संकल्प को देखकर परिवार वालों ने इन्हें सहयोग दिया .बाईस फरवरी २००९ से नेताजी ओपन यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित परीक्षा में उन्होंने बी ए आनर्स में समाज शास्त्र विषय से परीक्षा दी.नंदिता न केवल अपने सफलता के प्रति आश्वस्त हैं बल्कि उतीर्ण होकर आगे भी पढाई जारी रखने को दृढ संकल्प भी हैं...


हो सकता है बहुत लोगों को यह मूर्खता पूर्ण और व्यर्थ लगे,क्योंकि अधिकांशतः शिक्षा को लोग आत्मकल्याण आत्मोत्थान का नहीं धनार्जन का ही साधन मानते हैं.परन्तु नंदिता जैसे लोग परिवार समाज को प्रेरणा देते हैं,नयी राह दिखाते हैं और सही मायने में ऐसे ही लोग जीवन को सच्चा आदर देकर उसे सार्थकता देते हैं.


जीवन जीने और उसमे भी सुखपूर्वक जीने के लिए जितना महत्वपूर्ण स्वस्थ शरीर और धन की आवश्यकता है, आत्मसंतोष और अपने होने की सार्थकता अनुभूत करना,उससे भी अधि़क आवश्यक है.. यूँ तो किसी भी उम्र में जीवन को सुखद आत्मसंतोष ही बनाता है, परन्तु जीवन के उतरार्ध में जिजीविषा के लिए सार्थक सकारात्मक लक्ष्य निर्धारण एवं आत्मसंतुष्टि परम आवश्यक है..


दो ढाई वर्ष की अवस्था में ही शिक्षण में संलिप्त हुआ बालपन समय के साथ उत्तरोत्तर व्यस्त से व्यस्ततम होता चला जाता है.वय के साथ उत्तरदायित्व बढ़ता ही जाता है और कहीं न कहीं उसीमे व्यक्ति अपने होने की सार्थकता ढूंढ लेता है.गृहस्थी के प्रारंभ से लेकर अगली पीढी के तैयार होने और उनकी गृहस्थी बसने तक स्त्री पुरुष परिवार के केंद्र में होते हैं.समस्त परिवार घटनाक्रम और हित अनहित के निर्णय व्यक्ति की मुठ्ठी में होते हैं और एक तरह से परिवार रुपी साम्राज्य के वे स्वामी/स्वामिनी हुआ करते हैं...


परन्तु अगली पीढी के परिवार विस्तार के साथ ही जैसे जैसे इनका उत्तरदायित्व संक्षिप्त होने लगता है, इनके पास रिक्त समय की बहुलता रहने लगती है और अगली पीढी द्वारा स्वविवेक से लिए जाने वाले निर्णय के क्रम में ये स्वयं को निर्णायक भूमिका में नहीं पाते, घोर उपेक्षित अनुपयोगी अनुभूत करने लगते हैं. अनजाने ही इनके मनोभाव कुछ इस प्रकार होने लगते हैं जैसे, इनके इर्द गिर्द दूसरे राज्य पनपने लेगे हैं,जिनपर इनका कोई वश नहीं.अबतक परिवार पर एकक्षत्र शासन का अभ्यास क्रम जैसे ही बाधित होता है,व्यक्ति सहजता से स्वयं को सम्हाल नहीं पाता और विचलित होता हुआ अवसादग्रस्त हो जाता है.भाग दौड़ में फंसे युवा वर्ग के पास न तो इनके मन की सुनने जानने का समय होता है न धैर्य. व्यक्ति अपने ही परिवार के बीच स्वयं को अवांछित अनुपयोगी पाता है,तो तिलमिला जाता है.यदि पहले से इसके लिए मानसिक रूप से तैयार न हो और जबरन सत्तासीन होने का प्रयत्न करने लगता है तो घर की शांति पूर्णतया बाधित होती है.


स्त्रियों की तो इस मामले में और भी दयनीय स्थिति होती है.क्योंकि आम तौर पर पुरुष अपनी संलिप्तता घर के बाहर भी ढूंढ लेते हैं,परन्तु स्त्रियाँ घर संसार के बाहर स्वयं को निकाल ढाल नहीं पातीं.लक्ष्यहीनता और संसारिकता का मोह इन्हें पुराने अभ्यास को बदलने का न तो नया कारण ढूँढने देता है और न ही अपने अवसाद और उग्रता पर इनका वश होता है.फलतः बहुधा ही नयी पीढी के काम में मीन मेख निकाल उन्हें नीचा दिखा ये स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर आत्मसंतोष पाने में जुट जाती हैं.


सहज ही अनुमानित किया जा सकता है कि स्वयं को उपेक्षित अनुभूत करते व्यक्ति के पास लक्ष्य रूप में जब मृत्यु की प्रतीक्षा ही रह जाय तो मनोस्थिति कितनी त्रासद होगी।आज पारिवारिक सामाजिक ढांचा जिस प्रकार बदलता जा रहा है, पूरे विश्व में यह त्रासद स्थिति और भी चिंताजनक होती जा रही है. वय का अवसादग्रस्त चौथपन जीवन को भार सा बना देता है और फिर अवसादग्रस्त व्यक्ति आत्मकेंद्रित हो अपने ही सहेजे संजोये उस परिवार की सुख शांति को भी छिन्न भिन्न करने लगता है.

व्यक्ति ,परिवार और समाज को सुव्यवस्थित रखने हेतु इन्ही कारणों से प्रबुद्ध मनीषियों ने वय के उत्तरार्ध के लिए संन्यास तथा वानप्रस्थ आश्रम की व्यवस्था की थी।अपने अगली पीढी को उतरदायित्व सौंपने के बाद संन्यास ले लिया जाता था.परन्तु संन्यास का तात्पर्य यह नहीं था कि गृह त्याग कर दिया जाय.संन्यास का तात्पर्य था उत्तरदायित्व सौंपने के उपरांत गृहस्थी में ही रहकर संसारिकता के प्रति निर्लिप्त भाव रखना.उत्तराधिकारियों को उनके अग्रहनुसार अपेक्षित मार्गदर्शन देना और अपने आत्मोत्थान के मार्ग पर जीवन को अग्रसर करना.वानप्रस्थ का तात्पर्य था,परिवार से आगे बढ़ समाज तथा अन्य जीव जंतुओं के संरक्षण ,उनकी सेवा में प्रवृत्त होना॥

मन और मष्तिष्क का वय शरीर से बंधा नहीं होता.इसी कारण शरीर की अवस्था से यह किंचित भी अक्षम या बाधित नहीं होता.परन्तु मन मष्तिष्क को यदि निश्चेष्ट रखने का प्रयास किया जायेगा,बलपूर्वक उसे निर्लिप्त रखने का प्रयास किया जायेगा तो वह विद्रोह करेगा ही.इसलिए आवश्यक है कि उसे सकारात्मक कारणों में संलिप्तता दी जाय.एक बार जब उत्तरदायित्व पूर्ण हो गया तो फिर अपने पुराने अधूरे पड़े संकल्पों रुचियों जिसमे आत्मिक आनंद मिलता हो,उसमे संलिप्त हुआ जाय..संगीत ,साहित्य,बागबानी,भ्रमण,सीना पिरोना,पाक कला,इत्यादि इत्यादि न जाने कितने ही कार्य हैं जिसमे व्यक्ति स्वयं को संलिप्त कर सकता है तथा जिन्हें साध व्यक्ति आत्मसंतोष भी पा सकता है और दूसरों को भी ज्ञान और प्रेरणा दे सकते हैं..परोपकार के कार्यों में अपना समय लगा परम संतोष पा सकता है.. ऐसे उपाय .जिजीविषा को कभी क्षीण नहीं पड़ने देते.


मनुष्य चाहे तो अंतिम सांस तक अपने आस पास को बहुत कुछ दे सकता है...और कुछ नहीं तो दो मीठे बोल देकर किसी को भी सुख तो दे ही सकता है और बदले में अकूत संतोष रुपी धन अर्जित कर सकता है.लेकिन यह तभी संभव है जब व्यक्ति स्वयं प्रसन्न और संतुष्ट हो.स्वयं को सुखी करने का साधन कहीं बाहर नहीं हमारी अपनी मुट्ठी में ही है,बस खुले हाथों को बांधकर भींच लेना है..अपने अहम् को दरकिनार कर ,ह्रदय को थोडा बड़ा कर उसमे स्नेह का सागर भरना है,फिर चहुँ और स्नेह ही तो बिखेरेगा मनुष्य.


जिसने आज जन्म लिया उसे भी और जिसने चालीस पचास वर्ष पहले जन्म लिया उसे भी,जीवित बचा तो उसी मोड़ पर पहुंचना है और आगे जाना है,जिसे बुढापा कहते हैं..यदि उम्र के दूसरे तीसरे पड़ाव से ही चौथेपन की तैयारी कर ले , तो सहजता से व्यक्ति उस कष्टदायक अवांछित स्थिति से बच सकता है.

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17.4.09

सप्त्शी के तालीबानी....

किसी भी धर्म के पूज्य ग्रंथोँ, जिन्हें कि न जाने कितने महत अन्वेश्नोपरांत लिखा गया है, को केवल ऊपरी सतही तौर पर पढ़कर, यदि हम शब्द आधारित विश्लेषण करेंगे और उसके विषय में अपना अभिमत स्थिर करेंगे तो यह उस ग्रन्थ और उसके रचयिता के श्रम और उद्देश्य की अवमानना होगी,उसके प्रति सरासर अन्याय होगा..जिस प्रकार गहरे सागर में से मोती चुनने के लिए बार बार गहन तल में उतारना पड़ता है,वैसे ही भाव /ज्ञान रुपी मोती को पाने के लिए एकाधिक बार ग्रन्थ रूपी उस अथाह समुद्र में भी उतरना चाहिए....

जिस किसी ने भी इसका अनुभव किया होगा वह सहज ही इससे सहमत होगा कि रामायण गीता हो या कुरान बाइबिल ,जितनी बार उसे पढ़ा बांचा जाता है,हर बार जैसे नयी नयी परतें खुलती जातीं हैं..हर बार एक नया अनुभव होता है..लगता है.....अरे इतनी बार पहले भी पढ़ा ,पर इसबार तो यह नितांत ही नवीन तथ्य दृष्टिगत हुआ..

कालजयी रचनाओं के विषय में ठोस धारणा स्थापित करने से पहले कम से कम पूर्ण समर्पित भाव से अपने पूर्वाग्रहों को परे कर न्यूनतम दो तीन बार अवश्य पढ़नी चाहिए,इसके पश्चात ही किसी निर्णय पर पहुँच समालोचना देनी चाहिए...

इसी क्रम में एक कथा का स्मरण हो आया..किसी सत्संग सभा में रामकथा पर प्रवचन हो रहा था...कथोपरांत प्रश्न काल में एक महोदय ने तुलसीदास जी के प्रति अपना क्षोभ व्यक्त करते हुए संत से कहा कि, तुलसीदास जी ने रामायण के समस्त पात्रों के साथ सामान न्याय नहीं किया है.राम और सीता का तो उन्होंने इतना गुणगान बखान किया ,पर लक्षमण,उर्मिला,दशरथ इत्यादि पात्रों के उल्लेखनीय व्यक्तित्व को बड़े ही संक्षिप्त कलेवर में समेट दिया.

संत ने उनकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा कि - भाई,अब चूँकि यह रामचरितमानस है,इसलिए इसमें राम के व्यक्तित्व और कृतित्व को प्रमुखता दी गयी है,यदि यह दशरथ वंशावली होती तो निश्चित ही इसमें प्रत्येक पात्र के कृतित्वों की वृहद् विस्तृत व्याख्या की गयी होती.

मैंने अपने अनुभव में अधिकांशतः यह देखा है कि धर्म और धर्मग्रंथों की सर्वाधिक आलोचना करने वालों में बहुलता से वे ही होते हैं, जिन्होंने एक बार भी इन्हें पढने तथा निरपेक्ष भाव से इन्हें जानने का प्रयास नहीं किया है. धर्म हो, चाहे कोई भी अन्य विषय, किसी भी विषय पर अपना अभिमत स्थिर करने तथा उसकी निंदा स्तुति करने से पूर्व उसे एक बार ठीक ठीक जानने का प्रयास अवश्य करना चाहिए तथा अपने मत के साथ साथ दूसरों के दृष्टिकोण को भी सुनना समझना चाहिए..

साधारनतया हमारे धर्मग्रंथों या धार्मिक आख्यानों में जिस प्रकार से कथा वर्णित होती है, प्रथम दृष्टया ग्राह्य नहीं लगते और कुछ हद तक हास्यास्पद भी लगते हैं..परन्तु उन शब्द योजनाओं से आगे जाकर यदि उनके सारगर्भित भावों उद्देश्यों को देखेंगे तो वे बहुत ही समसामयिक लगेंगे..और यही कारण है कि शताब्दियाँ बीत गयीं पर ये आज भी आस्तित्व में हैं और आगे भी रहेंगी.

अभी कुछ दिनों पूर्व नवरात्र में दुर्गा सप्त्शी का पाठ कर रही थी और हटात कथानक को पढ़ मन में कौंधा कि , जिस प्रकार से उसमे वर्णित है कि, देवताओं को राज्यच्युत कर जब राक्षसों ने श्रृष्टि को त्रास देना आरम्भ किया तो उन्होंने रक्षार्थ देवी का आह्वान किया और भीषण युद्ध के उपरांत देवी ने असुरों का विनाश कर सात्विक संस्कृति की रक्षा की...आज के प्रसंग में यदि इस कथा को देखें तो...लगेगा कितनी प्रासंगिक है यह आज भी...इसमें राक्षस और देव दोनों ही रूपक या प्रतीक हैं,संस्कृति के विध्वंसक और पोषक के..

समय के अनंत कालखंड में उत्तरोत्तर प्रगति और विकास के पथ पर चलकर जो सभ्यता सुदृढ़ वैभवशाली हुई है.धार्मिक ,सांस्कृतिक,वैज्ञानिक और सामाजिक प्रत्येक क्षेत्र में जो जीवनोपयोगी अविष्कार किये गए हैं , नवीन मानदंड स्थापित हुए हैं,जिसने जीवन को सुन्दर सुखद बनाने में महत भूमिका निभाई है. मानव जगत का एक वर्ग उसे पूर्णतः नष्ट भ्रष्ट और ध्वस्त कर देना चाहता है.आज भी संसार में देव और दानव मनुष्य के अंतस में विद्यमान हैं.इसमें देव वो लोग हैं,जो किसी भी सकारात्मक प्रगति के पक्षधर हैं तथा किसी न किसी प्रकार इसके पोषण संरक्षण में संलग्न हैं और दनाव वो लोग हैं जो इस प्रगति को नकार कर व्यवस्था को छिन्न भिन्न नष्ट भ्रष्ट कर सभ्यता समाज को, जीवन को मूल्यहीन बर्बर पाषणयुगीन दौर में ले जाना चाहते हैं.

देखिये न ....आज मानव जगत का एक वर्ग जो उग्र विध्वंसक बन प्रगति का धुर विरोधी है,क्या वह पुराण कथाओं में वर्णित दानवों से किसी भांति कम है....तालिबानी के नाम से जाने जाने वाले इस वर्ग के जो भी कार्य कलाप या विचारधारा है,क्या वह बर्बर दानवों से किसी मायने में कम है...

कल्पना कर देखिये की यदि यह वर्ग सचमुच ही सफल हो जाय और पूरे संसार पर इनका आधिपत्य हो जाय...इनके जो भी नियम कानून हैं, उसके अंतर्गत पशुवत जीवन यापन करने को हम बाध्य हों, प्रगति और संस्कृति के पोषक रक्षक इन विध्वंसकों से पराजित हो असहाय हो जायं.....फिर तो लगभग वही स्थिति होगी जो असुरों से पराजित हुई सत्ता शक्ति विहीन शाप्ताशी कथा में वर्णित उन देवों की हुई थी.

आज सभ्यता की विध्वंसक शक्तियां इसलिए सफलता प्राप्त कर रही है क्योंकि वह संगठित है.....अस्त्र शस्त्र दृढ संकल्प शक्ति कठोर अनुशासन और संगठन की वह शक्ति जितनी सुदृढ़ है,रक्षक शक्तियों में इन सबका अभाव है इसलिए चाहकर भी वह इन क्रूर शक्तियों के आगे पराजित हो जाती हैं...जिस दिन देव (रक्षक) शक्तियां संगठित हो जाएँगी और अपने सर्वोच्च तेज पुंज को एकत्रित कर उनके विरुद्ध खड़ी हो jayengee , असुर शक्ति का विनाश हो जायेगा। शांति के पोषक प्रगति के कर्णधार जब तक विखण्डित रहेंगे,असुर शक्तियां फलती फूलती जायेंगी.

दुर्गा का अर्थ ही होता है "संगठित शक्ति" और दुर्गा सप्त्शी की यह कथा मूल रूप में यही दिखाती सिखाती है। सकारात्मक शक्तियां संगठित और अनुशाषित होकर ही दुराचारी विनाशकारी शक्तियों को सहज ही पराजित कर सकती हैं,भले वह शक्ति एक स्त्री शक्ति ही क्यों न हो.

अब बात रही दुर्गा को स्त्री और माँ कहने की,बात तो कुछ लम्बी हो जायेगी,संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि ... शक्ति स्त्रीलिंग है,इसलिए इस शक्तिपुंज को भी स्त्री रूप में माना गया है.दुसरे, जब कभी भी हम कष्ट में होते हैं ,सबसे पहले हमें जिस नाम का स्मरण होता है,वह "माँ" का ही होता है.हम कितने भी कष्ट में रहें " माँ" का नाम दुहराते ही जैसे लगता है जैसे कष्ट कम हो गया....तो शाप्त्शी में भी जो माता के आह्वान की कथा है ,वह इसी भाव में है.

पौराणिक आख्यानों में वस्तुतः जो भी कथा वर्णित है,वह दृष्टान्त या रूपक हैं,जिसे युग विशेष के परिप्रेक्ष्य में देखने समझने का प्रयास करना चाहिए.जिस समय ये कथानक रचित हुए थे ,उस समय के जो भी राजनितिक सामाजिक परिदृश्य थे ,उन रूपकों के साथ ये कथा वर्णित किये गए थे...

एक बात और है,धार्मिक आख्यानों में जिस प्रकार से दंड विधान नियोजित हैं तथा धार्मिक आख्यानों में जिस प्रकार के कथानक रखे गएँ हैं,उनके एकमात्र उद्देश्य यही हैं कि वे अशिक्षित जनसाधारण द्वारा भी सहज ही बोधगम्य ग्राह्य हो और भयवश जनसाधारण नियमों में बंधे रहें। .

"सार्वजानिक स्थान पर धूम्रपान वर्जित है " पता नहीं कितने समय से यह निर्देश सार्वजानिक स्थलों पर उद्दृत रहता था....परन्तु दंड(भय) के अभाव में यह पूर्णतः निरस्त था.जबसे इसके लिए अर्थ दंड का प्रावधान किया गया ,लोग सतर्क रहने लगे. बहुत कुछ इसी आशय से धर्म में भी जो स्वर्ग नर्क ,पाप पुन्य दंड इत्यादि की व्याख्या है,उसका निहितार्थ यही है कि भयवश ही सही लोग धर्माचरण में प्रवृत्त हों और समाज संतुलित सुव्यवस्थित रहे.

एक बात और ....आज हमारे जो भी धर्मग्रन्थ जिस रूप में हमें उपलब्ध हैं,लगभग कोई भी अपने मूल रूप में नहीं रह गए हैं.परवर्ती काल में इसमें बहुत से प्रक्षेपांश जोड़े गए हैं.धर्म को विवादस्पद और दिग्भ्रमित किये रखने के लिए बड़े ही सुनियोजित ढंग से ये प्रयास विशेषकर मध्यकाल में मुस्लिम शासकों द्वारा करवाए गए हैं.उद्देश्य स्पष्ट है,धर्म ही व्यक्ति को दृढ बंधन में आबद्ध कर संगठित करता है,उसमे जितने विवाद होंगे,शासक का काम उतना ही आसान होगा..जात पांत छूआ छूट वैमनस्य फैलाकर और लोगों को असंगठित कर ही कोई भी शासक अपने कुचक्रों में सफल हो सकता है.अब देखिये न एक तरफ जहाँ भगवान् को भी शूद्रों के जूठन खाने की बात कही गयी,स्त्री को सर्वोच्च शक्ति और पूज्य माना गया वहीँ आज उपलब्ध इन्ही ग्रंथों में शूद्रों की उपेक्षा और नारी की अवमानना की बातें भी मिल जातीं हैं...अब सोचने वाली बात यह है कि कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति ऐसी विरोधाभासी बातें कैसे लिख सकता है....यह केवल हिन्दू ग्रंथों के साथ ही नहीं हुआ है,बल्कि अन्य धर्मग्रंथों के साथ भी हुआ है.

इसलिए आज आवश्यकता यह है की अपनी बुद्धि का उपयोग कर हम इन पवित्र ग्रंथों को पढें और इनके प्रक्षेपांशों को नकारते हुए कल्याणकारी सुन्दर बातों को हृदयंगम करने और उनका अनुकरण करने का प्रयास करें.

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30.3.09

श्रद्धा पूजा आधार वही !!!

पथ के कंटक गुंथ ह्रदय मेरे,
जिस पल भी व्याकुल करते हैं.
सब ताप मेरे संताप मेरे,
उन नयनो में घिर झरते हैं.



उन अश्रु कणों के सागर में,
आकंठ निमग्न अस्तित्व मेरा,
जलधि बाहर क्योंकर आऊं,
जो जल ही जीवन सार निरा.



व्रत रक्षा स्नेह समर्पण का,
वह पूर्ण प्रतिष्ठित करता है.
मेरे सुख भर के ही निमित्त,
अपनी हर सांस वह धरता है.



मैं ध्येय हूँ उसके जीवन का,
वह ईश मेरे मन मंदिर का,
कर दिया समर्पित निज अवगुण,
प्रतिरूप है वह परमेश्वर का.



मेरे रोम रोम वह ही रमता,
बन रक्त शिराओं में बहता.
उसके बिन मैं जल बिन मछली,
मेरे बिन वह भी चातक सा.



श्रद्धा पूजा आधार वही,
सपना सुन्दर संसार वही.
वह संग चिरायु सतत रहे,
मेरा तो साज सिंगार वही...

24.3.09

लेडी डॉक्टर (संस्मरण)

यह संभवतः प्रत्येक पीढी के साथ होता है कि ३५ - ४० या ४५ की वय पार कर जाने के बाद, लोग मानसिक रूप से अतीत में जीने में सुखानुभूती करते हैं. ईश्वर ने मानव मस्तिष्क में ऐसी व्यवस्था कर दी है कि समय के साथ स्वतः ही दुखद स्मृतिया धुंधली पड़ क्षीण हो जाती हैं.पूर्णत समाप्त न भी हों तो व्यथा की तीव्रता अवश्य क्षीण कर जाती है.परन्तु व्यवस्था की अलौकिकता है कि एक ओर जहाँ दुखद स्मृतियाँ समय के मस्तिष्क पटल से मिटने लगती हैं प्रभावहीन होती जाती हैं वहीँ सुखद स्मृतियाँ समय के साथ और भी प्रखर होती जाती हैं और सच पूछिए तो यही मनुष्य को उर्जा भी प्रदान करती है.उसमे भी बालपन के संस्मरण संभवतः सर्वाधिक सुखद हुआ करती हैं.आज एक संस्मरण आपलोगों के साथ भी बांटती हूँ..

बाल्यकाल से युवावस्था तक अपने भोंदुपने में हमने ऐसे ऐसे कारनामे किये कि आज भी उक्त घटनाये मेरे संग संग उनके साक्षी रहे लोगों के मनोरंजन के साधन हैं.

संयोग ऐसा रहा कि बाल्यकाल और विवाहोपरांत भी मेरे जीवन के २७ वर्ष तक ऐसे स्थानों पर हमारा वास रहा जहाँ नागरी सभ्यता संस्कृति की पहुँच न थी. .उन स्थानों को हम न देहात कह सकते हैं न ही शहर.मेरे पिताजी माइनिंग इंजीनियर थे और हम सदा ही पहाडों जंगलों के बीच कम्पनी द्वारा बसाये छोटे से कालोनियों में रहे ,जहाँ जंगलों पहाडों के बीच विशुद्ध प्राकृतिक परिवेश में वर्षों तक हमारी सरलता संरक्षित रही.

बात उन दिनों की है जब मैं बी.ए. प्रथम वर्ष में थी. घर से दूर शहर में एक महाविद्यालय में कुछ दिन पूर्व ही दाखिला हुआ था सो किसी के साथ घनिष्टता नही हुई थी.यूँ भी मैं बहुत अधिक अंतर्मुखी स्वभाव की थी.बहुत अधिक मेल जोल मेरा किसी से न था.मित्र के नाम पर अब तक पुस्तकें और मेरे दो छोटे भाई ही मेरे मित्र थे जिनकी संगति में स्वाभाविक ही मेरा सामान्य ज्ञान निम्नतम स्तर पर था.

पता नही कैसे मेरे सीने (ब्रेस्ट) में एक घाव हो गया,जो प्रत्येक दिन के साथ बढ़ता हुआ असह्य कष्टकारक होता गया.पन्द्रह सोहल दिन होते होते यह स्थिति हो गई कि उस असह्य पीडा ने मुझे कलम तक पकड़ने में अक्षम कर दिया...मुझे कराहते छटपटाते देख कुछ सहपाठियों ने जोर देकर मुझसे कारण जान लिया और फ़िर बात छात्रावास की अधीक्षिका तक पहुँचा दी गयी.

पता नहीं क्या सोचकर हमारे महिला क्षात्रावास के लिए पुरुष चिकित्सक नियुक्त किया गया था.आज सा दिमाग रहता तो इसीके लिए एक आन्दोलन कर बैठती..पर उस समय यह सब सोचना नहीं आता था.खैर,अधीक्षिका ने उक्त बुजुर्ग पुरुष चिकित्सक को बुलवा लिया और उनके आने पर मुझे बुलाया गया.

चिकित्सक और अधीक्षिका ने लाख पुचकारा पर मैंने उन्हें वह घाव का स्थान नहीं दिखाया..अब महिला चिकित्सक होती तो कोई और बात होती. हारकर बुजुर्ग चिकित्सक महोदय ने अंदाजे से अपने अनुभव के आधार पर कुछ औषधियां लिख दीं. पर उनकी विद्वता और अनुभव पूर्णतः विफल रहा और उन दवाइयों के सेवन ने मेरी रही सही गति भी निकाल दी.

जहाँ हम रहते थे, माइंस के छोटे अस्पताल में भले और कोई सुविधा न हो पर एक पुरूष और एक महिला चिकित्सक अवश्य होते थे..यह अलग बात थी कि तब तक सिलाई बुनाई में दक्ष उन महिला चिकित्सकों से मैंने कभी अपनी कोई बीमारी नही दिखाई थी.आज तक जरूरत जो न पड़ी थी.

अगले दिन दुखद सन्देश के साथ छोटा भाई क्षात्रावास मुझे लिवाने आया कि अविलम्ब चलना है,माताजी का सड़क दुर्घटना में पैर टूट गया है जिन्हें जमशेदपुर के अस्पताल में रखा गया है. कुछ समय के लिए तो अपनी पीड़ा बिसरा गई मैं और ट्रेन पकड़ भागती हुई माताजी के पास पहुँची. तबतक तो प्लास्टर और ट्रैकसन वगैरह लग चुका था और वे कुछ व्यवस्थित भी हो चुकी थीं ,पर हम दोनों माँ बेटी खूब रोई.

माताजी तो रोकर चुप हो गयीं पर चिकित्सक महोदय के उन पीडाहारी औषधि ने मेरी जो स्थिति की थी कि मारे पीडा के मेरे आंसू थमने का नाम नही ले रहे थे.जब तीसरे दिन भी माताजी ने मुझे रोते देखा तो अबतक जो मुझे सांत्वना दिए जा रहीं थीं,कुछ झुंझला सी पड़ीं. उनका झुंझलाना था कि मैं बुरी तरह रो पड़ी और उन्हें अपने घाव के बारे में बताया.

माताजी ने पिताजी को बताया और अविलम्ब मुझे किसी महिला चिकित्सक(लेडी डाक्टर) से दिखवाने को कहा.जिस अस्पताल में हम थे वह काफी बड़ा था और यहाँ हरेक बीमारी के लिए अलग अलग विभाग थे.पिताजी पूरे अस्पताल का एक पूरा चक्कर लगा आए और वापस आकर उन्होंने माताजी से मंत्रणा की.देर तक मंत्रणा हुई और फ़िर पिताजी ने मुझे अपने साथ चलने को कहा.

उन दिनों हमारे स्वभाव में ही नहीं हुआ करता था कि अभिभावकों से अधिक प्रश्न पूछते या जब उनके पीछे चलना हो तो अपना दिमाग लगाते कि कहाँ जा रहे हैं, जरा देख जान लें. पिताजी ने एक विभाग में मेरा नंबर लगा दिया था और टोकन लाकर मेरे हाथ पकड़ा दिया ,चूंकि वहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित था सो उन्होंने मुझे अपना नंबर आने पर दिखाकर और दवा लेकर माताजी के पास चले जाने की हिदायत दी और स्वयं वहां से चले गए.

उन दिनों शहरों या बड़े भीड़ भाड़ वाले स्थानों में हमारी स्थिति वैसी ही होती थी जैसा कि किसी जंगल में निवास करने वाले सीधे साधे वन्य पशु की शहर के भीड़ भाड़ वाले सड़क पर आने पर होती है. जहाँ मैं बैठी थी पचास के ऊपर केवल महिलाएं ही थीं.परन्तु फिर भी मैं उस अपरिचित भीड़ में बड़ी असहजता का अनुभव कर रही थी.पर वहां से भागने का कोई चारा न था सो मन मार कर बैठी रही. मेरा क्रमांक संभतः बत्तीसवां था.अपनी पारी की प्रतीक्षा में बैठी थी.

मुझे तो यूँ भी आस पास किसी से मतलब नही रहा करता था पर मेरा दुर्भाग्य था कि वहां अधिकाँश को मुझमे बड़ी दिलचस्पी थी और प्रत्येक दो तीन मिनट के अन्तराल पर महिलाएं मुझसे प्रश्न करने लगी.मुझे लगा आस पास की सभी महिलाओं में मैं शायद सबसे छोटी हूँ इसलिए मुझसे सहनुभूतिवस प्रश्न कर रही हैं.पर अधिकांशतः उनके प्रश्नों का आशय मैं समझ नही पा रही थी और मैं जो उत्तर उन्हें दे रही थी वह संभवतः उन्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा था..

उनका प्रश्न होता -

"शादी हो गई ??"मैं - जी नही." कौन सा महिना चल रहा है ?"" जी फरवरी " ........ उसके बाद वे एक दूसरे का मुंह देखने लगती थीं और फ़िर प्रश्न करती " तुम्हारा कौन सा महीना है ??? "

मैं निरुत्तर उनके मुंह देखने लगती और वे अगल बगल वालियों से फुसफुसाने लगतीं. मैं हैरान कि ये क्या पूछ रही हैं और ऐसे मुझे क्यों घूर रही हैं...

लम्बी प्रतीक्षा के बाद मेरी पारी आई.चिकित्सिका के कक्ष में एक साथ तीन मरीजों को भेजा जा रहा था.मैं दूसरे नंबर पर थी.जैसे ही मुझसे पहले वाली उस मुस्लिम महिला ने अपने कागज दिखाए वह अधेड़ खडूस सी चिकित्सिका उसके ऊपर उबल पड़ी.

फ़िर से आ गई ........मैं तुम्हे नही देखूंगी........जाओ अपने आदमी (पति) को बुलाकर लाओ.तुम्हे पिछली बार ही कहा था न कि अब और बच्चे पैदा नही करो.........ये तुम्हारा दसवां है न.........क्यों नही बंद करवाती???????

महिला ...... " जी हमारे मजहब में यह हराम है जी....हमें सब धरम से बहार निकाल देंगे.........मैंने अपने आदमी से कहा था पर उसने मुझे बहुत गलियां दी और छोड़ देने की धमकी भी..........मैं क्या करूँ......वह दूसरी शादी कर लेगा.........."

काफी देर तक दोनों उलझी रहीं और झुंझलाते हुए चिकित्सिका ने उसे डांटते डांटते ही मुझे आदेश दिया....

" खड़ी क्या हो, लेट जाओ........."

मैं चुपचाप जाकर बेड पर लेट गई.जब वो मुड़कर मेरी ओर आई और मुझे चुपचाप सावधान की मुद्रा में लेटे देखा तो फ़िर से उबल पड़ी........

लाख बार कहा तुमलोगों से कि साड़ी पहनकर आया करो और अगर सलवार पहनकर आना ही है तो पहले से खोल कर रखा करो........पर नही ..........केवल टाइम वेस्ट करना है मेरा.....

भयभीत मैं सुन रही थी,पर मेरी समझ में नही आ रहा था कि मैं सलवार क्यों खोलूं भला.

मैंने डरते डरते इंगित करते हुए कहा....

" जी, लेकिन मुझे तो तकलीफ यहाँ ऊपर है........."

अब चौंकने की बारी उसकी थी.

"ऊपर मतलब??"

"....मुझे घाव हो गया है."

चिकित्सिका - कहाँ घाव हुआ है????

मैंने हाथ से ईशारा किया........." यहाँ "

चिकित्सिका - " घाव हुआ तो यहाँ क्यों आई, मालूम नही यह गाइनिक डिपार्टमेंट है और आज के दिन केवल प्रेग्नेंट लेडी का चेकअप होता है..........किसने भेजा तुम्हे यहाँ.......... जाओ मेडिसीन या सर्जरी में दिखाओ.."

मैं उस से क्या कहती कि लेडी डाक्टर से दिखाने के लिए पिताजी ने मुझे यहाँ भेजा था.

अब बेचारे पिताजी भी क्या करते, मेडिसीन या सर्जरी डिपार्टमेंट में कोई महिला चिकित्सक न थीं और हमारे लिए तो डाक्टर मतलब डाक्टर होता था. तो क्या हुआ यदि वे प्रसूती विभाग में थीं.

आज लगता है ,बहुत ही अच्छा हुआ जो हमारा एक्सपोजर बहुत सारे सन्दर्भों, विशेषकर सेक्स संबन्धी परिपेक्ष्यों में नगण्य रहा. ऐसा नही है कि सिर्फ़ मैं ही ऐसी थी,उस समय सामाजिक परिवेश कुछ ऐसा था कि किशोर और युवा वय की बहुसंख्यक लड़कियां ऐसी ही होती थी.पर आज के परिपेक्ष्य में जब देखती हूँ तो एक धक्का सा जरूर लगता है.

स्कूल कालेजों में जो प्रयास यौन शिक्षा ( सेक्स एजुकेसन ) के लिए किया जा रहा है उसमे ज्ञान वर्धन कितना हो रहा है पता नहीं, पर ये बहुत हद तक " कामुद्दीपन" में सहायक या प्रयुक्त होते हैं. वैसे भी आज सेक्स शिक्षा कितनी प्रासंगिक रह गई है जबकि सिनेमा, इश्तेहार, पुस्तकें, इंटरनेट या अन्यान्य मध्यमो से, चारों ओर से ही उस अल्पवय मस्तिष्क पर इस प्रकार के दृश्य श्रव्य अवयवों की वर्षा सी हो रही है.अल्पवय में गुप्त ज्ञान का व्यापक ज्ञान कभी उपयोगी या श्रेयकर नहीं होता...हमें मिलकर इससे बचने का कोई उपाय अवश्य सोचना होगा,नहीं तो इसके परिणाम निश्चित ही घातक होंगे...

खैर ,कभी कभी जब निर्णय के लिए बैठती हूँ तो निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाती कि वह नादानी भली थी या आज की यह समझदारी... ।
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पोस्ट के प्रकाशन के उपरांत जब रंजू दी (रंजना भाटिया) की यह टिपण्णी देखी - (रंजना तुम्हारा यह संस्मरण बहुत से सवाल छोड़ गया ।वह वक़्त मासूम बहुत था ॥अपने शारीरिक बदलाव के बारे में भी पूछना ,बताना बहुत हिम्मत का काम होता था जो अक्सर हम कर ही नहीं पाते थे पर जिस तरह की तकलीफ तुमने भोगी वह भी विचारणीय है ॥आज के बच्चे बहुत सी बाते हमसे भी अधिक जानते हैं ..किसी भी शिक्षा का उद्देश्य सही दिशा में हो तो वह लाभकारी है ...पर यह भी उतना ही कड़वा सच है कि आज का खुला माहौल एक उन्मुक्त भयवाह वातावरण बना रहा है ..सेक्स शिक्षा के साथ साथ सही शारीरिक शिक्षा अपने स्वस्थ के प्रति सचेत रहना आज की जरुरत बनती जा रही है)

जिसने कि मुझे बहुत ही प्रभावित किया. तो लगा कि बात लम्बी अवश्य हो जायेगी पर इसे थोडा और विस्तार अवश्य दिया जाय...
रंजू दी की बात से मैं बहुत अधिक सहमत हूँ.संभवतः इस आलेख के माध्यम से मैं अपना आशय अभी तक स्पष्ट नहीं कर पाई थी.वस्तुतः जो उन्होंने कहा,वही मैं भी कहना चाह रही थी...अपने शरीर के प्रति अल्पज्ञता किस भांति हमें कष्ट में डाल देती थीं,इसके अनुभवों के भण्डार हैं हमारे पास.
शरीर का ज्ञान होना और उसके प्रति सजगता अत्यंत आवश्यक है,किन्तु शरीर का समय से पूर्व जग जाना...यह समाज को अस्वस्थ कर देता है...
जैसे प्राण रक्षक औसधि की भी नियत से अधिक मात्रा का सेवन प्राणघातक होता है,वैसे ही ज्ञान की मात्रा भी अवश्य ही वयानुसार नियत होनी चाहिए...

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18.3.09

प्रतिष्ठा !! (कहानी) भाग - 2

रामेश्वर अपनी ही बेटी के खून से अपने हाथ रंग आये थे...तेरह बरस में शादी और गौने से पहले ही साल भर के अन्दर विधवा हुई बेटी का दुःख उनसे देखा नहीं गया और उसके मोह में पड़कर घर परिवार सबकी बात काटते हुए उन्होंने अपनी अपार सहृदयता दिखाते हुए उसे पढाई में लगा दिया था.लडकी पढने में बहुत तेज़ थी.हर साल अपने कक्षा में अव्वल आती रही और बारहवीं के बाद उसने आगे पढ़नी चाही.रामेश्वर बाबू ने शहर में कालेज में उसका दाखिला करवा दिया.पर यहीं उनसे भारी चूक हो गयी.

लडकी को शहर की हवा लग गयी..परंपरा संस्कार और परिवार के इज्ज़त को ताक पर रखकर उसने अपने ही कालेज के प्रोफेसर से प्रेम की पींगें बढा ली, जो एक नीच जात का लड़का था.और तो और उस कमजात के साथ मुंह काला कर, खुलेआम उससे प्रेम का एलान कर रही थी और उससे ब्याह करने की जिद ठानी हुई थी.

रामेश्वर बाबू ने ममता और सहृदयता दिखाते हुए उसके जिंदगी सवारने के लिए आगे पढने की पूरी सहूलियत और छूट जरूर दी थी....लेकिन इसका यह मतलब न था कि उसे परंपरा और परिवार की प्रतिष्ठा को भी छिन्न भिन्न करने देते....लड़की ने जो अपनी सफ़ेद साडी के साथ साथ उनके परिवार के आबरू को दागदार करने की कोशिश की थी और वह भी एक नीच जात के लड़के के साथ..यह असह्य और अक्षम्य था.....

पत्नी के माध्यम से जब उन्हें इस बात की खबर लगी तो वे गुस्से से एकदम बौरा गए..... दहाड़ते हुए, बन्दूक लेकर घर से निकल पड़े लड़के को मारने....लेकिन किसी तरह बाँध छेककर परिवार वालों ने उन्हें रोका......

कितनी मुश्किल से तो रामेश्वर की पत्नी का अपने पति को मुखिया बनने, दोनों भाइयों और परिवार के बीच कभी न पाटी जा सकने वाली खाई बनाने का सपना साकार होने जा रहा था, इसे किसी कीमत पर वह खोना नहीं चाहती थी.. रामेश्वर के हाथ पैर धरकर किसी तरह उनसे हथियार छीना गया.उन्हें समझाया गया कि इस नाजुक समय में दिमाग से काम लेना चाहिए.सबका मत यही बना कि अभी अपनी लडकी को ही किसी तरह समझा बुझा या धमकाकर चुप करा दिया जाय,लड़की का पेट धुलवा दिया जाय और चुनाव निपटते ही लड़के को ठिकाना लगा दिया जायेगा...फिर न रहेगा बांस ,न बजेगी बंसी.

नाजायज बच्चा गिराना, विधवाओं के नाजायज सम्बन्ध या उम्रदराजों की भी लम्पटता, कोई अजूबी घटना न थी गाँव के लिए. लेकिन, खुलेआम चुनौती देकर ऐसा कुछ भी करने की हिमाकत धनाढ्य सवर्ण पुरुषों को छोड़ किसीमे न थी. विधवा का पुनर्विवाह या अंतरजातीय विवाह आज भी घोर कुकर्म था गाँव वालों के लिए...इस नाजुक मौके पर अगर विरोधी के हाथों यह मुद्दा लग जाता तो परिवार की प्रतिष्ठा और चुनाव,दोनों का बंटाधार हो जाता...

अब समझाते तो क्या, जैसे ही उन्होंने बेटी को धमकाना शुरू किया,वह भी थी तो आखिर उनका ही खून और साथ ही उच्च शिक्षा ने उसे कूपमंडूकता से बाहर निकाल अपने जीवन और अधिकारों के प्रति पर्याप्त सजग कर दिया था.लडकी मौके की नजाकत को न समझ पायी और भिड गयी बाप के साथ...

फिर तो बात बढ़ते बढ़ते इतनी बढ़ गयी कि रामेश्वर बाबू ने जो हाथ में आया उसीसे पीट पीट कर उसका कचूमर निकाल दिया और उसे मौत के मुंह में पहुंचाकर अपने क्रोध की प्यास बुझाई.....शरीर और विद्रोह के उस स्वर को टुकड़े टुकड़े कर परंपरा और प्रतिष्ठा बचा लिया था उन्होंने...

घर में कोहराम मच गया... बात ऐसी न हुई थी जो चाहरदीवारी के अन्दर ही छुपी रह जाती..क्रोध का ज्वार शांत हुआ तो परिणाम के भय ने आतंकित कर दिया....भयाक्रांत, क्षुब्ध और उदिग्न ह्रदय को अपने रक्षक और तारनहार रूप में केवल बड़ा भाई ही दिखा...आज भी वे मानते थे कि भाई के प्रभाव और औकात के आगे उनका अपना व्यक्तिव कितना बौना है.सो वे भाग चले आसरे की ओर.उस घड़ी दुर्घटना से अचंभित आतंकित किन्कर्तब्यविमूढ़ बाकी सदस्यों को भी तारनहार बिन्देश्वर बाबू ही दिखे थे...

मुसीबत की इस घड़ी ने पारस्परिक वैमनस्यता को अप्रासंगिक कर दिया था. आंसुओं में मन के सारे मैल बह गए थे. दोनों भाइयों के ह्रदय अभी एक से धड़क रहे थे,अंतर केवल इतना था कि जहाँ रामेश्वर अपनी सुध बुध खोये हुए थे वही बिन्देश्वर तेजी से अगले कदम के बारे में सोच रहे थे.....समय ठीक न था,जो भूल हो चुकी थी,उसके बाद एक भी चूक महाविनाशक हो सकती थी....

राजनीति बिन्देश्वर बाबू के खून में बसी थी...हवाओं का रुख मोड़ना उन्हें अच्छी तरह आता था. अविलम्ब घर के सभी सदस्यों को इकठ्ठा किया और दुर्घटना की जानकारी देते हुए परिस्थिति की गंभीरता और विकटता से अवगत कराया.परिस्थिति से निपटने के लिए जो योजना उन्होंने बनायीं थी,उसके अनुसार उन्होंने सबको जिम्मेदारियां सौंपी और सबके साथ रामेश्वर को संग ले उसके घर पहुंचे...

वहां भी सबको समझा बुझाकर स्थिति की कमान उन्होंने अपने हाथ ले लिया....घंटे भर के अन्दर बिरादरी के सभी गणमान्य प्रतिष्ठित लोगों का जुटान कर लिया गया और मामले को ऐसे परोसा गया,जिसके तहत यह बात सामने आई कि किसी दूसरे इलाके वाले ने उनके गाँव की प्रतिष्ठा को जो मैला किया,उसे अपने ही संतान के रक्त से धोकर इस महान परिवार ने समूची बिरादरी का उद्धार किया था...

बिन्देश्वर बाबू ने मामले को ऐसा घुमाया कि बिरादरी वालों के नजर में वे दोनों ही भाई पूज्य बन गए....बिन्देश्वर बाबू ने इसी बहाने बिरादरी वालों को जमकर लताडा जिनके आपसी फूट के वजह से छोटी जाति वाले आज इतने मजबूत हो गए थे....इन लोगों को सेट कर आश्वस्त हो जाने के बाद उन्होंने चुनाव के अन्य उम्मीदवारों जगदेव पासवान,हबीब मियां तथा गाँव के अन्य सभी रसूखदार लोगों को बुलवा पंचायत बैठाई.

पूरी घटना को वहां इस तरह रखा गया कि सभी लोग एक मत से दोनों भाइयों के इस कृत्य की सराहना करने लगे और लगे हाथ फैसला हुआ कि, शहर के उस कमजात छोकरे ने, जिसने कि एक विधवा की आबरू पर हाथ डाला, उसे उसके इस कुकृत्य की सजा मृत्युदंड के रूप में अविलम्ब दी जाय और पूरे समाज को सीख देने के लिए दोनों की चिता एक साथ जलाई जाय.....

जब तक यह पागल और बौराई हथियारों से लैस भीड़ उस दुस्साहसी आशिक को पकड़ने उसके घर पहुँचती,रामेश्वर बाबू की छोटी बेटी के मार्फ़त उसतक यह खबर पहुँच चुकी थी और वह वहां से जिला एस पी से मदद की गुहार लगाने निकल चुका था...

दोपहर होने को आया था पर युवक पकड़ में न आया था.तो बिन्देश्वर बाबू की राय पर सर्व सम्मति से फैसला हुआ कि अब शव का अंतिम संस्कार कर दिया जाय.लड़के को बाद में देख लिया जायेगा...

उस अभागन की अर्थी रसूखदार सवर्ण पिता के कन्धों पर भार नहीं बल्कि उनके प्रतिष्ठा को चार चाँद लगा गयी थी.समाज की परंपरा और परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए अपनी ही बेटी का बलिदान देना, कोई छोटी उपलब्धि तो नहीं थी.

चिता जलनी शुरू ही हुई थी कि किसी ने आकर खबर दी कि युवक पुलिस दल सहित एस पी साहब को लेकर वहां आ रहा है और किसी भी समय वहां पहुँच सकता है...

उस समय वहां की एकता देखते ही बनती थी. उत्साही उन युवकों ने, जो अबतक उस विधवा के नाम पर लार टपकाया करते थे,गाँव की प्रतिष्ठा बचाने के लिए अनान फनान में सभी जीपों मोटरसायकिलों तथा आस पास के घरों से पेट्रोल तथा मिट्टी के तेल इक्कट्ठे कर चिता के मद्धिम आग को लपटों में बदल दिया और सभी ने एक स्वर से दोनों भाइयों का जयकारा लगते हुए आश्वस्त किया कि एस पी साहब आयेंगे तो क्या,उन्हें पूरे गाँव से एक गवाह नहीं मिलेगा...किसी प्रकार की चिंता न करें वे....

और यही हुआ......एस पी उन रसूखदारों द्वारा सेट कर लिए गए.......महीने भर के अन्दर बेचारा युवक गायब कर दिया गया...बिन्देश्वर और रामेश्वाए बाबू के घर एक हो गए थे और सबसे बड़ी बात बिन्देश्वर बाबू भारी मतों से चुनाव जीत गए थे......



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16.3.09

प्रतिष्ठा !! (कहानी) भाग- 1

गिनती के पच्चीस दिन ही तो बचे थे चुनाव के.दिन भर की दौड़ धूप गोष्ठी और मगजमारी के बाद थक कर चूर हो चुके थे बिन्देश्वर बाबू. हवा का जो रुख अभी दिखाई पड़ रहा था,वह बहुत अधिक उत्साह जनक नहीं था.कुछ भी अनुमान लगाना मुश्किल था. अब पहले वाली बात न रही थी.उनकी धाक और दबंगता के आगे खुलकर भले कोई सामने आने की हिम्मत अब भी न रखता था ,पर भीतर ही भीतर सुलगती आग कभी भी भड़क कर विकराल विनाशक बन सकती थी. राजपूतों,सवर्णों के आपसी मतभेद तथा अंहकार और छोटी जातिवाले में अधिकार के प्रति सजगता और उनके संगठित हो रहे शक्ति ने परिदृश्य बहुत बदल दिया था।

जगदेव पासवान और हबीब मिया, जिन्हें उन्होंने ही अपोजिसन में खडा किया था, उन्हें विरोधी ताकतों ने उकसाकर भितरघात करने को बहुत हद तक राजी कर लिया था. इन सबने भी अन्दर ही अन्दर अपने लिए अच्छी खासी जमीन तैयार कर ली थी....कुछ घर राजपूत ,ब्रह्मण और यादव से तो वो निश्चिंत थे, पर बाकी सभी के साथ दुसाध,भुइंयाँ,कुर्मी कहार,चमार, मुसलमान आदि वोटर किसके सर जीत का सेहरा बंधेंगे, अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा था..मुंह पर सभी सबको आश्वासन दे रहे थे,पर अंततः करेंगे क्या,यह कोई नहीं जानता था.

पिछले तीन टर्म से बिन्देश्वर बाबू निर्विरोध चुनाव जीत रहे थे. इतना ही नहीं अपने अपोजिसन के केंडीडेट भी वे ही तय किया करते थे और उनकी जप्त जमानत की भरपाई भी वही किया करते थे.इस इलाके में सदियों से उनके पुरखों ने ही राज किया था और परम्परानुसार घर का बड़ा बेटा ही राज के लिए उत्तराधिकारी हुआ करता था,भले जमींदारी समाप्त हो प्रजातंत्र का यह पंचायती चुनाव ही क्यों न हो. हमेशा से इसी परिवार का मुखिया उत्तराधिकारी नियत करता आ रहा था. लेकिन सदियों की यह परंपरा इसबार ध्वस्त हो गयी थी.पत्नी साले और इनसे डाह रखने वाले कुचाक्रियों के बहकावे में आकर रामेश्वर बाबू अपने बड़े भाई बिन्देश्वर बाबू के खिलाफ खड़े हो गए थे।

बिन्देश्वर बाबू समय पहचान रहे थे और आज भाई को छोड़ कोई और अगर खिलाफत में इस तरह सामने आता और मोर्चा खोलता तो उन्हें इतना असह्य कष्ट न होता,पर आज जो अपना भाई ही परम्परा को छिन्न भिन्न कर दुश्मनी पर उतर आया था और उन सारे लोगों को जो वर्षों से इनकी एकता को खंडित कर इनके ताकत और प्रभाव को समाप्त करना चाहते थे,उन्हें सुनहरा मौका दे रहा था,यह बात उन्हें तिल तिल कर तोड़ रही थी..आज तक इस इलाके में उनके परिवार का एकछत्र शासन रहा था.लोग इतने भयाक्रांत रहा करते थे कि चाहकर भी कोई सामने आकर इनका अहित करने की नहीं सोच पाता था. पर आज तो सबको खुला अवसर मिल गया था,हंसने का भी और काटने का भी.

जनानियों के चिख चिख से तंग आकर दोनों भाइयों के सम्मिलित सहमति से जो चूल्हे अलग हुए,वह अलगौझा आज यहाँ तक आ पहुंचा था..पहले चूल्हे अलग हुए,फिर आँगन और अब दिल भी अलग हो गए थे. दोनों तरफ आग लगाने वालों को सुनहरा मौका मिल गया था. बिन्देश्वर बाबू कान के कच्चे न थे,पर कमअक्ल रामेश्वर बाबू को लोग आसानी से फुसला लिया करते थे..हालाँकि बिन्देश्वर बाबू अपने भाई की कमजोरी जानते थे और उन्हें पाता था कि उसके अधिकाँश हरकतों के पीछे उनसे वैर रखने वालों का ही हाथ हुआ करता था,पर इस तरह रामेश्वर को लोगों के हाथों कठपुतली बने इस्तेमाल होते देखना, उन्हें बड़ा ही क्षुब्ध कर जाता था..

चुनाव के नोमिनेशन से पहले तक किसी तरह घर की इज्ज़त को बिन्देश्वर बाबू ढंके हुए थे.पर रामेश्वर ने उनके खिलाफ खड़े होकर चाहरदीवारी के अन्दर के विवाद को सड़क पर लाकर खडा कर दिया था.अब तो हितचिंतकों की नजरों में भी बिन्देश्वर बाबू को व्यंग्य दीखता था.जो घर आज तक दूसरों के झगडे सुलझाया करता था,उसीके किस्से अब सारे आम चटखारे लेकर बांचे जाते थे..

बिन्देश्वर बाबू ने सोचा खुद ही चुनाव से नाम वापस लेकर घर की इज्ज़त बचा लें,पर तबतक बात इतनी आगे बढ़ गयी थी कि उनके इस फैसले के विरोध में उनके अपने परिवार और हितचिन्तक ही अड़ गए थे. एक तरह से उनके वापस मुड़ते पैर को उनके पक्षधरों ने हथियार बनाकर आगे बढा उसे सामने जमीन पर ऐसे रोप दिया था दिया था कि चाहकर भी उसे हिलाने डुलाने में वे अक्षम हो गए थे.

रात दो पहर बीत चुका था. घर में कुत्ते और पहरेदारों को छोड़ लगभग सभी सो चुके थे.पर नींद बिन्देश्वर बाबू के आँखों से कोसों दूर थी.क्षोभ चिंता क्रोध आदि आदि ने उन्हें ऐसे घेर लिया था कि नीद उनकी आँखों से पलायन कर चुकी थी.उसी समय उनके दरवाजे की सांकल बजी.आशंकित स्वर में बिन्देश्वर बाबू ने पूछा....कौन????

बाहर से पहरेदार सुखदेव ने प्रत्युत्तर में अपना नाम बताते हुए दरवाज़ा खोलने का आग्रह किया....

सुखदेव के स्वर की व्यग्रता ने बिन्देश्वर बाबू को आशंकित कर दिया..लगभग भागकर उन्होंने दरवाज़ा खोला...सुखदेव ने खबर दी कि दरवाजे पर रामेश्वर बाबू खड़े हैं और अभी तुंरत मिलने की जिद कर रहे हैं....क्या किया जाय ???

घड़ी भर तो बिन्देश्वर बाबू ऊहापोह में रहे...फिर उन्होंने रामेश्वर को बैठक में लिवा लाने को कहा...आदेश पाकर भी सुखदेव ठिठका रहा, तो उन्होंने उसे आश्वस्त करते हुए कहा....."जो भी है,भाई है मेरा....कोई बहुत बड़ा अहित नहीं कर सकता...डर मत, जाकर लिवा ला.......देखते हैं, क्या बात है "

...यह बात उन्होंने सुखदेव से कही जरूर थी, पर यह दिलासा उन्होंने अपने आप को भी दिया था, क्योंकि आज कुछ लोग दबी जुबान बिन्देश्वर बाबू को रामेश्वर से सम्हल कर रहने की सलाह दे गए थे,जिसे उन्होंने उस समय तो उन्होंने झिड़क दिया था...पर मन से पूरी तरह न झिड़क पाए थे....

बिन्देश्वर बाबू के बैठक में पहुंचने के कुछ क्षणों बाद ही रामेश्वर सुखदेव के साथ पहुँच गए...आते ही वे बिन्देश्वर बाबू के कदमो पर लोट गए और ''भैया हम बर्बाद हो गए" कहकर पैर पकड़कर फूट फूट कर रोने लगे।
बिन्देश्वर बाबू इस अप्रत्याशित स्थिति के लिए बिलकुल तैयार न थे,बुरी तरह अकबका गए और रामेश्वर को किसी तरह पैरों से खींचकर उठाकर उन्होंने खडा किया.खींचतान में रामेश्वर बाबू की ओढी चादर हट गयी थी और जब वो खड़े हुए तो उनके खून से तर कपडों को देख बिन्देश्वर बाबू बुरी तरह आशंकित हो गए...समझा बुझाकर, पानी वगैरह पिलाकर उन्होंने किसी तरह रामेश्वर बाबू को शांत किया और सारा मामला पूछा .रामेश्वर बाबू ने जो बताया, सुनकर दो पल को उनका दिमाग भी एकदम से सन्न रह गया.....