पिताजी की चिट्ठी आई थी,माँ की तबियत कुछ खराब है,तुमसे मिलने की जिद ठाने हुए है,हो सके तो दो दिन के लिए आकर मिल जाओ...चार दिन बाद से थर्ड ईयर के पेपर शुरू होने वाले थे...मैं ऊहापोह में था कि क्या करूँ...लेकिन माँ का मोह सब पर भारी पड़ा और मैं स्टेशन की तरफ निकल पड़ा...सोचा ,जल्दी से जाकर पहली ही ट्रेन पकड़ लूँ और मिलकर कल रात तक वापस आ जाऊं...स्टेशन की तरफ तेज कदमो से बढा चला जा रहा था, दस फर्लांग की ही दूरी बची होगी कि ट्रेन खुल गयी...बदहवास सा मैं दौड़ पड़ा...पर भीड़ में घिरा मैं आगे बढ़ने में असमर्थ रहा और मेरे सामने से सीटी बजाती हुई ट्रेन निकल गयी....
दिमाग सीटियों के शोर से भर गया.....बार बार लगातार किसी न किसी प्लेटफार्म पर सीटियों का जैसे सिलसिला सा चल निकला....उस कनफोडू शोर से बचकर भागने के लिए मैं तेजी से स्टेशन से बाहर की ओर भागा... कि अचानक किसी के सामन से मेरा पैर टकराया और गिरते हुए मैं सीढियों से नीचे चला गया ........
तभी अचानक आँख खुली....अपने चारों तरफ आँखें फाड़ फाड़ कर देखने लगा...सारे दृश्य गायब हो चुके थे.....मैं स्टेशन पर नहीं अपने कमरे में था और अपने बिस्तर से नीचे गिरा हुआ था....लेकिन सीटियों का शोर अब भी वैसा ही था...तभी तंद्रा कुछ भंग हुई और आभास हुआ कि यह शोर सीटियों का नहीं बल्कि लगातार बजते कॉल बेल का था ... दीवार पर लटके घडी पर नजर डाली तो देखा रात के सवा दो बज रहे हैं....
आशंकित सा आगे बढ़ बत्ती जलाते हुए मैंने दरवाजा खोला....एक औरत और मर्द आकर पैरों से लिपट गए....हतप्रभ सा होते हुए मैं पीछे हटने लगा...बड़ी मुश्किल से किसी तरह मैंने उनसे अपने पैर छुडाये....वे खड़े हुए तो पहचाना, गली के अगले छोर पर रहने वाले अम्मा और झुमरू हैं....दोनों घिघिया रहे थे....डाक्टर बाबू रधिया को बचा लो,नहीं तो वह मर जायेगी.
पता चला दो दिनों से उसे जचगी का दर्द उठा हुआ था,पर दाई जचगी करवा नहीं पा रही थी और अब हारकर उसने राधा को अंग्रेजी डाक्टर को दिखने की बात कही थी....मैंने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की कि मैं इसमें कुछ नहीं कर पाउँगा ,वे लोग राधा को लेकर तुंरत अस्पताल के लिए निकल जाएँ...पर उन्होंने ऐसी जिद ठान रखी थी कि आखिर झुककर मुझे वहां जाना ही पड़ा....
जाकर देखा तो सचमुच राधा की स्थिति बहुत खराब थी...बच्चे की धड़कन सुनने की कोशिश की तो वह भी बिलकुल क्षीण हो रही थी....मैंने उनसे अपनी लाचारी बताई और कहा कि अब ज़ल्द से जल्द अस्पताल ले जाकर ओपरेशन करवाए बगैर उन्हें बचाने का कोई उपाय नहीं...
उन लोगों की स्थिति देख मेरा दिल पसीज गया और फिर मैंने अपने एक सीनियर के बड़े भाई के नर्सिंग होम में बात कर किसी तरह केस लेने को उन्हें मनवाया...मेरी निगरानी में दो ओटो रिक्शाओं में बैठकर वह काफिला मेरे संग नर्सिंग होम पहुंचा....
प्रारंभिक जांच के बाद कहा गया की अभी दस मिनट के अन्दर अगर ओपरेशन न किया गया तो जच्चा बच्चा दोनों में से किसी का भी बचना नामुमकिन था...और ओप्रेशन के लिए तुंरत ही पच्चीस हजार रुपये जमा करना था.....
मैं पेशोपेश में पड़ गया....मेरे पास पचीस हजार क्या ढाई सौ रुपये भी न थे और इतनी बड़ी रकम इनके पास होने की कोई सम्भावना मुझे नहीं दिख रही थी...मेरे माथे की शिकन को देख अम्मा ने मानो सब ताड़ लिया....कहने लगी, पैसे की कोई चिंता नहीं बाबू, मैं तीस हज़ार रुपये साथ लेकर आई हूँ ...और जरूरत पड़ी तो भी दिक्कत नहीं सब इंतजाम हो जायेगा,बस आप माई बाप लोग मेरी बच्ची को बचा लीजिये......
सीनियर डाक्टर से रिक्वेस्ट कर मैं भी आपरेशन थियेटर में गया....दो दिनों तक दाई ने जो युक्तियाँ लगायी थी,इससे केस बड़ा ही कॉम्प्लीकेटेड हो गया था...बच्ची के गले में नाड़ इस कदर फंसी हुई थी कि वह बच्ची का दम घोंट रही थी....लग रहा था जैसे गर्भ में ही उसे फांसी की सजा मिल गयी थी..बड़ी मुश्किल से बेजान पड़ी उस बच्ची में जान लायी गयी.....
सबकुछ कुशल मंगल देख मैंने रहत की साँस ली.....डॉक्टर जबतक स्टिचिंग तथा सफाई में लगे हुए थे,मैंने सोचा बाहर जाकर इनके अपनों को यह खबर दे आऊँ....जैसे ही बाहर निकला सबने आकर मुझे घेर लिया...मैं थोडी दुविधा में था,कि बेचारों का इतना पैसा लग भी गया और तीसरे संतान के रूप में फिर से लडकी होने की खबर इन्हें मायूसी ही देगी.......मैंने धीमे से कहा.....चिंता की कोई बात नहीं,सब कुशल मंगल है,राधा को लडकी हुई है.......
मैं अचंभित रह गया.......सब लोग खुशी से झूम उठे थे,एक दुसरे के गले लग रहे थे....अम्मा की आँखों में खुशी के आँसू झड़ी बने हुए थे.....खुशी से कांपती हाथों से मेरा हाथ पकड़ बोली.. ...बचवा तुम्हारे मुंह में घी शक्कर.......हमारे घर तो लछमी आई हैं....तुम हमारे लिए भगवान् हो....सदा सुखी रहो बेटा...खूब बड़े डाक्टर बनो....
सब निपटते निपटते सुबह हो गयी थी....घर पहुंचकर हाथ मुंह धो, मैं कॉलेज होस्टल की ओर निकल पड़ा...वहां अपने सहपाठी अशोक के साथ अगले पेपर की तैयारी और विषय चर्चा करते करते समय का ध्यान ही न रहा.....जब पेट में भूख के मडोड़े पड़ने लगे तो समय का ध्यान आया...रात के दस बज चुके थे...वहीँ पर खाना खा मैं करीब साढ़े ग्यारह बजे अपने घर पहुंचा....
दरवाजे के बाहर अम्मा बैठी थी..पढाई के चक्कर में यह बात दिमाग से निकल ही चुकी थी...मुझे लगा कहीं कुछ और असुविधा तो नहीं हो गयी,जो अम्मा इतनी रात गए दरवाजे के बाहर बैठी है...
मैंने चिंतित होकर पूछा ...क्या अम्मा फिर से कोई परेशानी हो गयी क्या...उसे हमेशा इसी नाम से पुकारा जाते सुना था, सो यही संबोधन दिया.
अम्मा बोली....अरे नहीं बचवा ,कोई परेशानी नहीं...तुम तनिक किवाडी तो खोलो, फिर बताती हूँ...थोडा तो मैं झिझका ,पर फिर भी उस आवाज में जो आग्रह, अपनापन और हर्ष था ,मैं कुछ कह न सका...
दरवाजा खोलते ही वह अन्दर आई और उसने मेरे हाथ पकड़ एक घडी मेरे हाथों में पहना दी और मिठाई का एक डब्बा मेरे मेज पर रख दिया.....मैं अचकचा गया....यह क्या है अम्मा?????
अम्मा बोली, बचवा हम गरीब का यह भेंट तो तुम्हे स्वीकारना ही पड़ेगा,नहीं तो हमें किसी कल भी चैन नहीं पड़ेगा...अगर तुम न होते तो हमारी रधिया निश्चित ही मर जाती और उसके साथ वह लछमी भी मर जाती....अब हम लोगों को कोई डाक्टर बैद अपने यहाँ घुसने थोड़े ही न देता....तो बोलो तुम भगवान् हुए की नहीं....
मैं संकोच में गडा जा रहा था....मैंने कहा...अरे नहीं अम्मा डाक्टर के लिए सब मरीज मरीज ही होता है....उसे भेद करना नहीं सिखाया जाता....यह तो हम सब का फर्ज है,इसके लिए इतना महंगा तोहफा मैं नहीं ले सकता....तुम लोग ऐसे ही जिस नर्क में रह रहे हो,मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा हूँ...इसपर यह तो मैं नहीं ही ले सकता...मुझे तो खेद इस बात का है कि मैं आर्थिक रूप से तुमलोगों की कोई मदद न कर पाया.....
हम दोनों ही भावुक हो गए थे...हालाँकि इस घटना से पहले हम दोनों में कभी कोई बात नहीं हुई थी,जब कभी कोई बीमार पड़ता तो झुमरू मेरे पास आकर दवाई लिखवा जाता था,इसके आगे हमारा कोई परिचय न था, पर नितांत अपरिचित होते हुए भी जैसे हम एक दूसरे की भावनाओ और स्थिति से पूर्णतः भिज्ञ थे...वे लोग जानते थे कि किस मजबूरी में मैं इस गंदी बस्ती में रह रहा हूँ और मैं भी जनता था कि वे लोग कैसी जिन्दगी जी रहे हैं....
मैंने अपने जीवन का लक्ष्य ही यह बना लिया था कि पढाई ख़तम कर जब मैं डॉक्टर बन जाऊंगा तो इन जैसे उपेक्षित लोगों की सेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता दूंगा.... पता नहीं कैसे बिना बताये ही मेरी यह भावना उन तक पहुँच गयी थी....मेरे लिए उनके मन में क्या था ,यह मैं उनकी आँखों में सहज ही दूर से आते जाते पढ़ पाता था...
उस क्षण भावुकता में मेरी बुद्धि ऐसे सठिया गयी थी कि बिना कुछ सोचे समझे मैं पूछ बैठा.....
लेकिन अम्मा, तुंरत के तुंरत इतने रुपये का इंतजाम तुमने कैसे कर लिया,मैं तो घबरा ही गया था कि पैसों का इंतजाम कैसे होगा.........
अम्मा ने कहा...बेटा जब ऊपर वाला जीवन देता है तो उसे चलाने के रस्ते भी दे देता है....अब देखो न,एक रधिया ही तो है जिसे भगवान् ने इतनी खूबसूरती दी है कि दो बच्चे बियाने के बाद भी सबसे ज्यादा कमाई वही करती है..एक तरफ सातों लड़कियों की कमाई है और दुसरे तरफ अकेले रधिया की कमाई है....उसने बच्चे भी ऐसे खूबसूरत दिए हैं ,जिनसे हमारा घराना रौशन है.
हमारे घर की कमाऊ पूत तो वही है....उसे ऐसे कैसे मर जाने देते...और ये पैसे भी तो उसी के भाग के हैं,जो उसके इलाज में लगे....चार दिन पहले ही उसकी बड़ी लडकी निशा की नथ उतराई में पच्चीस हजार रुपये मिले थे,जो इस उल्टे समय में काम आ गए....
मेरे दिमाग की नसें फटी जा रही थीं, मेरी आँखों के सामने उन बच्चियों का चेहरा घूम गया,जिन्हें आते जाते गली में खेलते हुए देखा करता था....मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया.........लेकिन अम्मा वो तो अभी इतनी छोटी सी मासूम बच्ची है....
अम्मा बोली....बच्ची काहे की बाबूजी,बारह बसंत देख लिए हैं उसने....
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17.7.09
9.7.09
अमरत्व की लालसा ------>>>>
जीवन में सबकुछ सामान्य हो, फिर भी संक्षिप्त जीवन की अभिलाषा रखने वाले मनुष्य संसार में दुर्लभ ही रहे हैं. इतिहास साक्षी है ,अमरत्व पाने के लिए व्यक्ति ने न जाने कितने संधान किये ,इस हेतु क्या क्या न किया....... मृत्यु भयप्रद तथा अमरत्व की अभिलाषा चिरंतन रही है...विरले ही इसके अपवाद हुआ करते हैं..
आधुनिक विज्ञान भी इस ओर अपना पूर्ण सामर्थ्य लगाये हुए है तथा पूर्णतः आशावान है कि इस प्रयास में वह अवश्य ही सफलीभूत होगा.... हमारे भारतीय दंड विधान में तो नहीं परन्तु विश्व के कई संविधानों में आजीवन कारावास के प्रावधान में अक्षम्य,घोर निंदनीय अपराध में कारा वास की अवधि दो सौ ,पांच सौ या इससे भी अधिक वर्षों की होती है.क्योंकि उनका विश्वास है कि विज्ञान जब जीवन काल को वृहत्तर करने या अमरत्व के साधन प्राप्त कर लेगा तो २० ,२५,५० वर्षों को ही सम्पूर्ण जीवन काल मानना अर्थहीन हो जायेगा और ऐसे में ऐसे अपराधियों को जिनका स्वछन्द समाज में विचरना घातक,समाज के लिए अहितकर है,उन के आजीवन कारावास का प्रावधान निरुद्देश्य हो जायेगा...
परन्तु विचारणीय यह है कि क्या हमें अमरत्व चाहिए ? और यदि चाहिए भी तो क्या हम इस अमरत्व का सदुपयोग कर पाएंगे ? कहते हैं अश्वत्थामा को द्रोणाचार्य ने अपने तपोबल से अमरत्व का वरदान दिया था.दुर्योधन के प्रत्येक कुकृत्यों का सहभागी होने के साथ साथ पांडवों के संतानों का वध करने तक भगवान् कृष्ण ने उसे जीवनदान दिए रखा परन्तु जब उसने उत्तरा के गर्भ पर आघात किया तब कृष्ण ने उसके शरीर को नष्ट कर दिया परन्तु उसके मन,आत्मा तथा चेतना के अमरत्व को यथावत रहने दिया...माना जाता है की आज भी अश्वत्थामा की विह्वल आत्मा भटक रही है और युग युगांतर पर्यंत भटकती रहेगी. सहज ही अनुमानित किया जा सकता है कि यदि यह सत्य है तो अश्वत्थामा की क्या दशा होगी....
किंवदंती है की समुद्र मंथन काल में समुद्र से अमृत घट प्राप्य हुआ था.जिस मंथन में ब्रह्माण्ड की समस्त शक्तियां (देवता तथा असुर) लगी थीं,तिसपर भी अमृत की उतनी ही मात्रा प्राप्त हुई थी कि यह उभय समूहों में वितरित नहीं हो सकती थी. तो आज भी यदि संसार की साधनसम्पन्न समस्त वैज्ञानिक शक्तियां संयुक्त प्रयास कर अमरत्व के साधान को पा भी लेती है तो निश्चित ही यह समस्त संसार के समस्तआम जनों के लिए तो सर्वसुलभ न ही हो पायेगी .यह दुर्लभ साधन निसंदेह इतनी मूल्यवान होगी की इसे प्राप्त कर पाना सहज न होगा .मान लें की हम में से कुछ लोगों को अमरत्व का वह दुर्लभ साधन मिल भी जाता है,तो हम क्या करेंगे ?
हम जिस जीवन से आज बंधे हुए हैं, उसके मोह के निमित्त क्या हैं ? हमारा इस जीवन से मोह का कारण साधारणतया शरीर, धन संपदा,पद प्रतिष्ठा,परिवार संबन्धी इत्यादि ही तो हुआ करते हैं.ऐसे में हममे से कुछ को यदि अमरत्व का साधन मिल भी जाय तो क्या हम उसे स्वीकार करेंगे ?
सुख का कारण धन संपदा या कोई स्थान विशेष नहीं हुआ करते,बल्कि स्थान विशेष में अपने अपनों से जुड़े सुखद क्षणों की स्मृतियाँ हुआ करती हैं. धन सुखद तब लगता है जब उसका उपभोग हम अपने अपनों के साथ मिलकर करते हैं....मान लेते हैं कि यह शरीर, धन वैभव तथा स्थान अपने पास अक्षुण रहे परन्तु जिनके साथ हमने इन सब के सुख का उपभोग किया उनका साथ ही न रहे...तो भी क्या हम अमरत्व को वरदान मान पाएंगे.....उन अपनों के बिना जिनका होना ही हमें पूर्णता प्रदान करता है ,हमारे जीजिविषा को पोषित करता है, जीवन सुख का उपभोग कर पाएंगे?
जीवन में किसी स्थान का महत्त्व स्थान विशेष के कारण नहीं बल्कि स्थान विशेष पर कालखंड में घटित घटना विशेष के कारण होती है.किसी स्थान से यदि दुखद स्मृतियाँ जुड़ीं हों तो अपने प्रिय के संग वहां जाकर उस स्थान विशेष के दुखद अनुभूतियों को धूमिल करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए ,परन्तु किसी स्थान विशेष से यदि मधुरतम, सुखद स्मृतियाँ बंधी हों तो वहां दुबारा कभी नहीं जाना चाहिए,नहीं तो कालखंड विशेष में सुरक्षित सुखद स्मृतियों को आघात पहुँचता है,क्योंकि तबतक समय और परिस्थितियां पूर्ववत नहीं रहतीं.......यह कहीं पढ़ा था और अनुभव के धरातल पर इसे पूर्ण सत्य पाया.
ऐसे में इस नश्वर संसार में अधिक रहकर क्या करना जहाँ प्रतिपल सबकुछ छीजता ही जा रहा है,चाहे वह काया हो या अपने से जुड़ा कुछ भी .मनुष्य अपनों के बीच अपनों के कारण ही जीता और सुखी रहता है,ऐसे अमरत्व का क्या करना जो अकेले भोगना हो...संवेदनशील मनुष्य संभवतः यही चाहेगा.और यदि कोई कठोर ह्रदय व्यक्ति ऐसा जीवन पा भी ले तो क्या वह सचमुच सुखोपभोग कर पायेगा या दुनिया को कुछ दे पायेगा......ययाति ने तो सुख की लालसा में अपने पुत्रों के भाग के जीवन का भी उपभोग किया था,पर क्या वह सचमुच सुखी हो पाया था...
जीवन को सुखी उसकी दीर्घता नहीं बल्कि उसके सकारात्मक सोच और कार्य ही बना पाते हैं,यह हमें सदैव स्मरण रखना होगा।
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आधुनिक विज्ञान भी इस ओर अपना पूर्ण सामर्थ्य लगाये हुए है तथा पूर्णतः आशावान है कि इस प्रयास में वह अवश्य ही सफलीभूत होगा.... हमारे भारतीय दंड विधान में तो नहीं परन्तु विश्व के कई संविधानों में आजीवन कारावास के प्रावधान में अक्षम्य,घोर निंदनीय अपराध में कारा वास की अवधि दो सौ ,पांच सौ या इससे भी अधिक वर्षों की होती है.क्योंकि उनका विश्वास है कि विज्ञान जब जीवन काल को वृहत्तर करने या अमरत्व के साधन प्राप्त कर लेगा तो २० ,२५,५० वर्षों को ही सम्पूर्ण जीवन काल मानना अर्थहीन हो जायेगा और ऐसे में ऐसे अपराधियों को जिनका स्वछन्द समाज में विचरना घातक,समाज के लिए अहितकर है,उन के आजीवन कारावास का प्रावधान निरुद्देश्य हो जायेगा...
परन्तु विचारणीय यह है कि क्या हमें अमरत्व चाहिए ? और यदि चाहिए भी तो क्या हम इस अमरत्व का सदुपयोग कर पाएंगे ? कहते हैं अश्वत्थामा को द्रोणाचार्य ने अपने तपोबल से अमरत्व का वरदान दिया था.दुर्योधन के प्रत्येक कुकृत्यों का सहभागी होने के साथ साथ पांडवों के संतानों का वध करने तक भगवान् कृष्ण ने उसे जीवनदान दिए रखा परन्तु जब उसने उत्तरा के गर्भ पर आघात किया तब कृष्ण ने उसके शरीर को नष्ट कर दिया परन्तु उसके मन,आत्मा तथा चेतना के अमरत्व को यथावत रहने दिया...माना जाता है की आज भी अश्वत्थामा की विह्वल आत्मा भटक रही है और युग युगांतर पर्यंत भटकती रहेगी. सहज ही अनुमानित किया जा सकता है कि यदि यह सत्य है तो अश्वत्थामा की क्या दशा होगी....
किंवदंती है की समुद्र मंथन काल में समुद्र से अमृत घट प्राप्य हुआ था.जिस मंथन में ब्रह्माण्ड की समस्त शक्तियां (देवता तथा असुर) लगी थीं,तिसपर भी अमृत की उतनी ही मात्रा प्राप्त हुई थी कि यह उभय समूहों में वितरित नहीं हो सकती थी. तो आज भी यदि संसार की साधनसम्पन्न समस्त वैज्ञानिक शक्तियां संयुक्त प्रयास कर अमरत्व के साधान को पा भी लेती है तो निश्चित ही यह समस्त संसार के समस्तआम जनों के लिए तो सर्वसुलभ न ही हो पायेगी .यह दुर्लभ साधन निसंदेह इतनी मूल्यवान होगी की इसे प्राप्त कर पाना सहज न होगा .मान लें की हम में से कुछ लोगों को अमरत्व का वह दुर्लभ साधन मिल भी जाता है,तो हम क्या करेंगे ?
हम जिस जीवन से आज बंधे हुए हैं, उसके मोह के निमित्त क्या हैं ? हमारा इस जीवन से मोह का कारण साधारणतया शरीर, धन संपदा,पद प्रतिष्ठा,परिवार संबन्धी इत्यादि ही तो हुआ करते हैं.ऐसे में हममे से कुछ को यदि अमरत्व का साधन मिल भी जाय तो क्या हम उसे स्वीकार करेंगे ?
सुख का कारण धन संपदा या कोई स्थान विशेष नहीं हुआ करते,बल्कि स्थान विशेष में अपने अपनों से जुड़े सुखद क्षणों की स्मृतियाँ हुआ करती हैं. धन सुखद तब लगता है जब उसका उपभोग हम अपने अपनों के साथ मिलकर करते हैं....मान लेते हैं कि यह शरीर, धन वैभव तथा स्थान अपने पास अक्षुण रहे परन्तु जिनके साथ हमने इन सब के सुख का उपभोग किया उनका साथ ही न रहे...तो भी क्या हम अमरत्व को वरदान मान पाएंगे.....उन अपनों के बिना जिनका होना ही हमें पूर्णता प्रदान करता है ,हमारे जीजिविषा को पोषित करता है, जीवन सुख का उपभोग कर पाएंगे?
जीवन में किसी स्थान का महत्त्व स्थान विशेष के कारण नहीं बल्कि स्थान विशेष पर कालखंड में घटित घटना विशेष के कारण होती है.किसी स्थान से यदि दुखद स्मृतियाँ जुड़ीं हों तो अपने प्रिय के संग वहां जाकर उस स्थान विशेष के दुखद अनुभूतियों को धूमिल करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए ,परन्तु किसी स्थान विशेष से यदि मधुरतम, सुखद स्मृतियाँ बंधी हों तो वहां दुबारा कभी नहीं जाना चाहिए,नहीं तो कालखंड विशेष में सुरक्षित सुखद स्मृतियों को आघात पहुँचता है,क्योंकि तबतक समय और परिस्थितियां पूर्ववत नहीं रहतीं.......यह कहीं पढ़ा था और अनुभव के धरातल पर इसे पूर्ण सत्य पाया.
ऐसे में इस नश्वर संसार में अधिक रहकर क्या करना जहाँ प्रतिपल सबकुछ छीजता ही जा रहा है,चाहे वह काया हो या अपने से जुड़ा कुछ भी .मनुष्य अपनों के बीच अपनों के कारण ही जीता और सुखी रहता है,ऐसे अमरत्व का क्या करना जो अकेले भोगना हो...संवेदनशील मनुष्य संभवतः यही चाहेगा.और यदि कोई कठोर ह्रदय व्यक्ति ऐसा जीवन पा भी ले तो क्या वह सचमुच सुखोपभोग कर पायेगा या दुनिया को कुछ दे पायेगा......ययाति ने तो सुख की लालसा में अपने पुत्रों के भाग के जीवन का भी उपभोग किया था,पर क्या वह सचमुच सुखी हो पाया था...
जीवन को सुखी उसकी दीर्घता नहीं बल्कि उसके सकारात्मक सोच और कार्य ही बना पाते हैं,यह हमें सदैव स्मरण रखना होगा।
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23.6.09
यादों की खूंटी पर टंगा पजामा !!!
सहज स्वाभाविक रूप से दुनिया के प्रत्येक अभिभावक के तरह मेरे माता पिता की भी मुझसे बहुत सी अपेक्षाएं थीं, बहुत से सपने उन्होंने देख रखे थे मेरे लिए... पर समस्या यह थी कि माताजी और पिताजी दोनों के सपने विपरीत दिशाओं में फ़ैली दो ऐसी टहनियों सी थी जिनका मूल एक मुझ कमजोर से जुड़ा था पर दोनों डालों को सम्हालने के लिए मुझे अपने सामर्थ्य से बहुत अधिक विस्तार करना पड़ता...
पिताजी जहाँ मुझे गायन, वादन, नृत्य, संगीत, चित्रकला इत्यादि में प्रवीण देखने के साथ साथ डाक्टर इंजिनियर या उच्च प्राशासनिक पद पर प्रतिष्ठित देखना चाहते थे, वहीँ मेरी माताजी मुझे सिलाई बुनाई कढाई पाक कला तथा गृहकार्य में दक्ष एक अत्यंत कुशल, शुशील ,संकोची, छुई मुई गृहणी जो ससुराल जाकर उनका नाम ऊंचा करे , न कि नाक कटवाए.. के रूप में देखना चाहती थीं..
मुझे दक्ष करने के लिए पिताजी ने संगीत ,नृत्य, चित्रकारी तथा एक पढाई के शिक्षक की व्यवस्था घर पर ही कर दी थी।संगीत, चित्रकला तथा पढाई तक तो ठीक था पर नृत्य वाले गुरूजी मुझसे बड़े परेशान रहते थे...मैं इतनी संकोची और अंतर्मुखी थी कि मुझसे हाथ पैर हिलवाना किसी के लिए भी सहज न था.
दो सप्ताह के अथक परिश्रम के बाद मुझसे किसी तरह हल्का फुल्का हाथ पैर तो हिलवा लिए गुरूजी ने पर जैसे ही आँखों तथा गर्दन की मुद्राओं की बारी आई ,उनके झटके देख मेरी ऐसी हंसी छूटती कि उन्हें दुहराने के हाल में ही मैं नहीं बचती थी.. गुरूजी बेचारे माथा पीटकर रह जाते थे... यूँ भी गुरूजी की लड़कियों की तरह लचकती चाल और उनके बात करने का ढंग मेरी हंसी की बांध तोड़ दिया करते थे...जब हर प्रकार से गुरूजी अस्वस्त हो गए कि मैं किसी जनम में नृत्य नहीं सीख सकती तो उन्होंने पिताजी से अपनी व्यस्तता का बहाना बना किनारा कर लिया.... और तब जाकर मेरी जान छूटी थी....
जहाँ तक प्रश्न माताजी के अपेक्षाओं का था,माँ जितना ही अधिक मुझमे स्त्रियोचित गुण देखना चाहती थी,मुझे उससे उतनी ही वितृष्णा होती थी.पता नहीं कैसे मेरे दिमाग में यह बात घर कर गयी कि बुनाई कढाई कला नहीं बल्कि परनिंदा के माध्यम हैं...औरतें फालतू के समय में इक्कठे बैठ हाथ में सलाइयाँ ले सबके घरों के चारित्रिक फंदे बुनने उघाड़ने में लग जातीं हैं. मुझे यह बड़ा ही निकृष्ट कार्य लगता था और "औरतों के काम मैं नहीं करती" कहकर मैं भाग लिया करती थी..मेरे लक्षण देखकर माताजी दिन रात कुढा करतीं थीं..
डांट डपट या झापड़ खाकर जब कभी रोती बिसूरती मैं बुनाई के लिए बैठती भी थी, तो चार छः लाइन बुनकर मेरा धैर्य चुक जाता था. जब देखती कि इतनी देर से आँखें गोडे एक एक घर गिरा उठा रही हूँ और इतने अथक परिश्रम के बाद भी स्वेटर की लम्बाई दो उंगली भी नहीं बढ़ी तो मुझे बड़ी कोफ्त होती थी... वस्तुतः मुझे वही काम करना भाता था जो एक बैठकी में संपन्न हो जाये और तैयार परिणाम सामने हो और स्वेटर या क्रोशिये में ऐसी कोई बात तो थी नहीं..
नया कुछ सिलने की उत्सुकता बहुत होती थी पर पुराने की मरम्मती मुझे सर्वाधिक नीरस लगा करती थी.मेरी माँ मुझे कोसते गलियां देते ,ससुराल में उन्हें कौन कौन सी गालियाँ सुन्वाउंगी इसके विवरण सुनाते हुए हमारे फटे कपडों की मरम्मती किया करती, पर मेरे कानो पर किंचित भी जूं न रेंगती..
संभवतः मैं साथ आठ साल की रही होउंगी तभी से मेरे दहेज़ का सामान जोड़ा जाने लगा था..इसी क्रम में मेरे विवाह से करीब दो वर्ष पहले एक सिलाई मशीन ख़रीदी गयी. जब वह मशीन खरीदी गयी,उन दिनों मैं छात्रावास में थी और मेरी अनुपस्थिति में मेरे मझले भाई ने मशीन चलाने से लेकर उसके छोटे मोटे तकनीकी खामियों तक से निपटने की पूरी जानकारी ली.
जब मैं छुट्टियों में आई तो यह नया उपकरण मुझे अत्यंत उत्साहित कर गया. मैं अपने पर लगे निकम्मेपन के कालिख को इस महत उपकरण की सहायता से धो डालने को कटिबद्ध हो गयी. मझले भाई के आगे पीछे घूमकर बड़ी चिरौरी करके किसी तरह उससे मशीन चलाना तो सीख लिया, पर उसपर सिला क्या जाय यह बड़ा सवाल था.
मेरे सौभाग्य से उन दिनों हमारे घर आकर ठहरे साधू महराज ने मेरे छोटे भाई को विश्वास दिला दिया कि किशोर वय से ही पुरुष को लंगोट का मजबूत होना चाहिए और उन्हें आधुनिक अंडरवियर नहीं लंगोट पहनना चाहिए,इससे बल वीर्य की वृद्धि होती है.....आखिर इसी लंगोट की वजह से तो हनुमान जी इतने बलशाली हुए हैं...हनुमान जी की तरह बलशाली बनने की चाह रखने वाला मेरा भाई उनके तर्कों से इतना प्रभावित हुआ कि उसने तुंरत चड्डी को लंगोट से स्थानांतरित करने की ठान ली.
अब हम भाई बहन चल निकले लंगोट अभियान में..माताजी के बक्से से उनके एक पेटीकोट का कपडा हमने उड़ा लिया, साधू महराज के धूप में तार पर सूखते लंगोट का पर्यवेक्षण किया गया और हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे की पतंग के ऊपर के आधे भाग को काटकर यदि उसकी लम्बी पूंछ और दो बड़ी डोरियाँ बना दी जाय ..तो बस लंगोट बन जायेगा...अब बचपन से इतने तो पतंग बना चुके हैं हम..तो यह लंगोट सिलना कौन सी बड़ी बात है.
फटाफट कपडे को काटा गया और सिलकर आधे घंटे के अन्दर खूबसूरत लंगोट तैयार कर लिया गया...मेरे जीवन की यह सबसे बड़ी सफलता थी..कई दिनों तक मैं छोटे भाई को गर्व से वह लंगोट खुद ही बांधा करती थी और भाई भी मेरी कलाकारी की दाद दिए नहीं थकता था...उसका बस चलता तो आस पड़ोस मोहल्ले को वह सगर्व मेरी उत्कृष्ट कलाकारी और इस नूतन अनोखे परिधान का दिग्दर्शन करवा आता.
मेरा उत्साह अपनी चरम पर था..हाथ हमेशा कुछ न कुछ सिलने को कुलबुलाया करते थे.....एक दिन देखा छोटा भाई माताजी के आदेश पर कपडा लिए दरजी से पजामा सिलवाने चला जा रहा है...यह मेरा सरासर अपमान था...भागकर मैं उससे कपडा छीन कर लायी..
मेरी एक सहेली ने बताया था कि जो भी कपडा सिलना हो नाप के लिए अपने पुराने कपडे को नए कपडे पर बिछाकर उसके नाप से नया कपडा काट लेना..मुझे लगा अब भला पजामा सिलने में कौन सी कलाकारी है,दो पैर ही तो बनाने हैं और नाडा डालने के लिए एक पट्टी डाल देनी है बस..
भाई कुछ डरा हुआ था कि अगर मैंने कपडा बिगाड़ दिया तो माँ से बहुत बुरी झाड़ पड़ेगी..मैंने उसे याद दिलाया कि जीवन में पहली बार बिना किसी पूर्व प्रशिक्षण के मैंने मशीन पकडा और इतना सुन्दर लंगोट सिला फिर भी वह मेरी कला पर शक करता है...वह कुछ आश्वस्त तो हुआ पर बार बार मुझे चेताता रहा कि अगर पजामा गड़बडाया तो माता क्या गत बनायेंगी.....
पूर्ण आश्वस्त और अपार उत्साहित ह्रदय से कपडा नीचे बिछा उसपर उसके पुराने पजामे को सोंटकर नाप के लिए फैला दिया मैंने. जैसे ही काटने के लिए कैंची उठाई कि भाई ने फरमाइश की......दीदी परसों वाली फिल्म में जैसे अमिताभ बच्चन ने चुस्त वाला चूडीदार पायजामा पहना था ,वैसा ही बना देगी ???...मैंने पूरे लाड से उसे पुचकारा...क्यों नहीं भाई...जरूर बना दूंगी...इसमें कौन सी बड़ी बात है.
बिछे हुए कपडे के बीच का कपडा काट कर मैंने दो पैरों की शक्ल दे दी और बड़े ही मनोयोग से उसे सिलना शुरू किया..भाई अपनी आँखों में अमिताभ बच्चन के पजामे का सपना संजोये और खुद को अमिताभ सा स्मार्ट देखने की ललक लिए पूरे समय मेरे साथ बना रहा..
लगभग चालीस मिनट लगा और दो पैरों और नाडे के साथ पायजामा तैयार हो गया.माताजी पड़ोस में गयीं हुईं थीं और हम दोनों भाई बहनों ने तय किया कि जब वो घर आयें तो भाई पजामा पहनकर उन्हें चौंकाने को तैयार रहेगा..
लेकिन यह क्या....चुस्त करने के चक्कर में पजामा बहुत ही तंग बन गया था,आधे पैर के ऊपर चढ़ ही नहीं पा रहा था... ...लेकिन हम कहाँ हार मानने वाले थे, ठूंस ठांस कर पजामे में भाई को फिट कर दिया...बेचारे भाई ने पजामा पहन तो लिया पर पता नहीं उसमे गडबडी क्या हुई थी कि वह हिल डुल या चल ही नहीं पा रहा था..
भाई ठुनकने लगा...दीदी तूने पजामा खराब कर दिया न....देख तो मैं चल नहीं पा रहा...पैर एकदम जाम हो गया...मेरी बनी बनाई इज्जत धूल में मिलने जा रही थी.....मैंने उसे उत्साहित किया ... ऐसे कैसे चला नहीं जा रहा है,तू पैर तो आगे बढा...और फिर....जैसे ही उसने पैर जबरदस्ती आगे बढाया कि ठीक बीचोबीच पजामा दो भागों में बटकर फट गया..
इस दौरान मझला भाई भी वहां आ गया था और छुटके की हालत देख हम हंसते हंसते पहले तो लोट पोट हो गए...फिर याद आया कि माँ किसी भी क्षण वापस आ जायेंगी....और हमारा जोरदार बैंड बजेगा....सो फटाफट मझले और मैंने मिलकर अपनी पूरी ताकत लगा पजामा खींच उसमे से भाई को किसी तरह निकला....खूब पुचकारकर और हलवा बनाकर खिलाने के आश्वासन के बाद दोनों भाई राजी हो गए कि वे माताजी को कुछ नहीं बताएँगे...मैंने उन्हें आश्वाशन दिया कि कोई न कोई जुगाड़ लगाकर मैं पजामा ठीक कर दूंगी....
मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर गडबडी हुई कैसे...सिला तो मैंने ठीक ठाक ही था...चुपके से दरजी के पास वह पजामा लेकर हम भाई बहन पहुंचे...दरजी ने जब पजामा देखा तो पहले तो लोट लोट कर हंसा और फिर उसने पूछा कि यह नायाब सिलाई की किसने...मेरे मूरख भाई ने जैसे ही मेरा नाम लेने के लिए अपना मुंह खोला कि मैंने उसे इतने जोर की चींटी काटी कि उसकी चीख निकल गयी..मेरे डर से उसने नाम तो नहीं लिया पर दरजी था एक नंबर का धूर्त उसने सब समझ लिया...उसके बाद तो उसने ऐसी खिल्ली उडानी शुरू की कि मैं दांत पीसकर रह गयी...
जान बूझकर उसने कहा कि अब इसका कुछ नहीं हो सकता.. तो सारे गुस्से को पी उसके आगे रिरियाने के सिवाय दूसरा कोई विकल्प न था मेरे पास...खूब हाथ पैर जोड़े,अंकल अंकल कहा ...तो उसने कहा कि अलग से कपडे लगाकर वह पजामे को ठीक करने की कोशिश करेगा...
जब लौटकर अपने क्षात्रावास पहुँची और सिलाई जानने वाली सहेलियों से पूछा तो पता चला कि भले पजामा क्यों न हो ,उसकी कटाई विशेष प्रकार से होती है और दोनों पैरों के बीच कली लगायी जाती है..
जो भी हो... वह पजामा आज भे हमारी यादों की खूंटी पर वैसे ही लटका पड़ा है,जिसे देख हम भाई बहन आज भी उतना ही हंसा करते हैं...
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पिताजी जहाँ मुझे गायन, वादन, नृत्य, संगीत, चित्रकला इत्यादि में प्रवीण देखने के साथ साथ डाक्टर इंजिनियर या उच्च प्राशासनिक पद पर प्रतिष्ठित देखना चाहते थे, वहीँ मेरी माताजी मुझे सिलाई बुनाई कढाई पाक कला तथा गृहकार्य में दक्ष एक अत्यंत कुशल, शुशील ,संकोची, छुई मुई गृहणी जो ससुराल जाकर उनका नाम ऊंचा करे , न कि नाक कटवाए.. के रूप में देखना चाहती थीं..
मुझे दक्ष करने के लिए पिताजी ने संगीत ,नृत्य, चित्रकारी तथा एक पढाई के शिक्षक की व्यवस्था घर पर ही कर दी थी।संगीत, चित्रकला तथा पढाई तक तो ठीक था पर नृत्य वाले गुरूजी मुझसे बड़े परेशान रहते थे...मैं इतनी संकोची और अंतर्मुखी थी कि मुझसे हाथ पैर हिलवाना किसी के लिए भी सहज न था.
दो सप्ताह के अथक परिश्रम के बाद मुझसे किसी तरह हल्का फुल्का हाथ पैर तो हिलवा लिए गुरूजी ने पर जैसे ही आँखों तथा गर्दन की मुद्राओं की बारी आई ,उनके झटके देख मेरी ऐसी हंसी छूटती कि उन्हें दुहराने के हाल में ही मैं नहीं बचती थी.. गुरूजी बेचारे माथा पीटकर रह जाते थे... यूँ भी गुरूजी की लड़कियों की तरह लचकती चाल और उनके बात करने का ढंग मेरी हंसी की बांध तोड़ दिया करते थे...जब हर प्रकार से गुरूजी अस्वस्त हो गए कि मैं किसी जनम में नृत्य नहीं सीख सकती तो उन्होंने पिताजी से अपनी व्यस्तता का बहाना बना किनारा कर लिया.... और तब जाकर मेरी जान छूटी थी....
जहाँ तक प्रश्न माताजी के अपेक्षाओं का था,माँ जितना ही अधिक मुझमे स्त्रियोचित गुण देखना चाहती थी,मुझे उससे उतनी ही वितृष्णा होती थी.पता नहीं कैसे मेरे दिमाग में यह बात घर कर गयी कि बुनाई कढाई कला नहीं बल्कि परनिंदा के माध्यम हैं...औरतें फालतू के समय में इक्कठे बैठ हाथ में सलाइयाँ ले सबके घरों के चारित्रिक फंदे बुनने उघाड़ने में लग जातीं हैं. मुझे यह बड़ा ही निकृष्ट कार्य लगता था और "औरतों के काम मैं नहीं करती" कहकर मैं भाग लिया करती थी..मेरे लक्षण देखकर माताजी दिन रात कुढा करतीं थीं..
डांट डपट या झापड़ खाकर जब कभी रोती बिसूरती मैं बुनाई के लिए बैठती भी थी, तो चार छः लाइन बुनकर मेरा धैर्य चुक जाता था. जब देखती कि इतनी देर से आँखें गोडे एक एक घर गिरा उठा रही हूँ और इतने अथक परिश्रम के बाद भी स्वेटर की लम्बाई दो उंगली भी नहीं बढ़ी तो मुझे बड़ी कोफ्त होती थी... वस्तुतः मुझे वही काम करना भाता था जो एक बैठकी में संपन्न हो जाये और तैयार परिणाम सामने हो और स्वेटर या क्रोशिये में ऐसी कोई बात तो थी नहीं..
नया कुछ सिलने की उत्सुकता बहुत होती थी पर पुराने की मरम्मती मुझे सर्वाधिक नीरस लगा करती थी.मेरी माँ मुझे कोसते गलियां देते ,ससुराल में उन्हें कौन कौन सी गालियाँ सुन्वाउंगी इसके विवरण सुनाते हुए हमारे फटे कपडों की मरम्मती किया करती, पर मेरे कानो पर किंचित भी जूं न रेंगती..
संभवतः मैं साथ आठ साल की रही होउंगी तभी से मेरे दहेज़ का सामान जोड़ा जाने लगा था..इसी क्रम में मेरे विवाह से करीब दो वर्ष पहले एक सिलाई मशीन ख़रीदी गयी. जब वह मशीन खरीदी गयी,उन दिनों मैं छात्रावास में थी और मेरी अनुपस्थिति में मेरे मझले भाई ने मशीन चलाने से लेकर उसके छोटे मोटे तकनीकी खामियों तक से निपटने की पूरी जानकारी ली.
जब मैं छुट्टियों में आई तो यह नया उपकरण मुझे अत्यंत उत्साहित कर गया. मैं अपने पर लगे निकम्मेपन के कालिख को इस महत उपकरण की सहायता से धो डालने को कटिबद्ध हो गयी. मझले भाई के आगे पीछे घूमकर बड़ी चिरौरी करके किसी तरह उससे मशीन चलाना तो सीख लिया, पर उसपर सिला क्या जाय यह बड़ा सवाल था.
मेरे सौभाग्य से उन दिनों हमारे घर आकर ठहरे साधू महराज ने मेरे छोटे भाई को विश्वास दिला दिया कि किशोर वय से ही पुरुष को लंगोट का मजबूत होना चाहिए और उन्हें आधुनिक अंडरवियर नहीं लंगोट पहनना चाहिए,इससे बल वीर्य की वृद्धि होती है.....आखिर इसी लंगोट की वजह से तो हनुमान जी इतने बलशाली हुए हैं...हनुमान जी की तरह बलशाली बनने की चाह रखने वाला मेरा भाई उनके तर्कों से इतना प्रभावित हुआ कि उसने तुंरत चड्डी को लंगोट से स्थानांतरित करने की ठान ली.
अब हम भाई बहन चल निकले लंगोट अभियान में..माताजी के बक्से से उनके एक पेटीकोट का कपडा हमने उड़ा लिया, साधू महराज के धूप में तार पर सूखते लंगोट का पर्यवेक्षण किया गया और हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे की पतंग के ऊपर के आधे भाग को काटकर यदि उसकी लम्बी पूंछ और दो बड़ी डोरियाँ बना दी जाय ..तो बस लंगोट बन जायेगा...अब बचपन से इतने तो पतंग बना चुके हैं हम..तो यह लंगोट सिलना कौन सी बड़ी बात है.
फटाफट कपडे को काटा गया और सिलकर आधे घंटे के अन्दर खूबसूरत लंगोट तैयार कर लिया गया...मेरे जीवन की यह सबसे बड़ी सफलता थी..कई दिनों तक मैं छोटे भाई को गर्व से वह लंगोट खुद ही बांधा करती थी और भाई भी मेरी कलाकारी की दाद दिए नहीं थकता था...उसका बस चलता तो आस पड़ोस मोहल्ले को वह सगर्व मेरी उत्कृष्ट कलाकारी और इस नूतन अनोखे परिधान का दिग्दर्शन करवा आता.
मेरा उत्साह अपनी चरम पर था..हाथ हमेशा कुछ न कुछ सिलने को कुलबुलाया करते थे.....एक दिन देखा छोटा भाई माताजी के आदेश पर कपडा लिए दरजी से पजामा सिलवाने चला जा रहा है...यह मेरा सरासर अपमान था...भागकर मैं उससे कपडा छीन कर लायी..
मेरी एक सहेली ने बताया था कि जो भी कपडा सिलना हो नाप के लिए अपने पुराने कपडे को नए कपडे पर बिछाकर उसके नाप से नया कपडा काट लेना..मुझे लगा अब भला पजामा सिलने में कौन सी कलाकारी है,दो पैर ही तो बनाने हैं और नाडा डालने के लिए एक पट्टी डाल देनी है बस..
भाई कुछ डरा हुआ था कि अगर मैंने कपडा बिगाड़ दिया तो माँ से बहुत बुरी झाड़ पड़ेगी..मैंने उसे याद दिलाया कि जीवन में पहली बार बिना किसी पूर्व प्रशिक्षण के मैंने मशीन पकडा और इतना सुन्दर लंगोट सिला फिर भी वह मेरी कला पर शक करता है...वह कुछ आश्वस्त तो हुआ पर बार बार मुझे चेताता रहा कि अगर पजामा गड़बडाया तो माता क्या गत बनायेंगी.....
पूर्ण आश्वस्त और अपार उत्साहित ह्रदय से कपडा नीचे बिछा उसपर उसके पुराने पजामे को सोंटकर नाप के लिए फैला दिया मैंने. जैसे ही काटने के लिए कैंची उठाई कि भाई ने फरमाइश की......दीदी परसों वाली फिल्म में जैसे अमिताभ बच्चन ने चुस्त वाला चूडीदार पायजामा पहना था ,वैसा ही बना देगी ???...मैंने पूरे लाड से उसे पुचकारा...क्यों नहीं भाई...जरूर बना दूंगी...इसमें कौन सी बड़ी बात है.
बिछे हुए कपडे के बीच का कपडा काट कर मैंने दो पैरों की शक्ल दे दी और बड़े ही मनोयोग से उसे सिलना शुरू किया..भाई अपनी आँखों में अमिताभ बच्चन के पजामे का सपना संजोये और खुद को अमिताभ सा स्मार्ट देखने की ललक लिए पूरे समय मेरे साथ बना रहा..
लगभग चालीस मिनट लगा और दो पैरों और नाडे के साथ पायजामा तैयार हो गया.माताजी पड़ोस में गयीं हुईं थीं और हम दोनों भाई बहनों ने तय किया कि जब वो घर आयें तो भाई पजामा पहनकर उन्हें चौंकाने को तैयार रहेगा..
लेकिन यह क्या....चुस्त करने के चक्कर में पजामा बहुत ही तंग बन गया था,आधे पैर के ऊपर चढ़ ही नहीं पा रहा था... ...लेकिन हम कहाँ हार मानने वाले थे, ठूंस ठांस कर पजामे में भाई को फिट कर दिया...बेचारे भाई ने पजामा पहन तो लिया पर पता नहीं उसमे गडबडी क्या हुई थी कि वह हिल डुल या चल ही नहीं पा रहा था..
भाई ठुनकने लगा...दीदी तूने पजामा खराब कर दिया न....देख तो मैं चल नहीं पा रहा...पैर एकदम जाम हो गया...मेरी बनी बनाई इज्जत धूल में मिलने जा रही थी.....मैंने उसे उत्साहित किया ... ऐसे कैसे चला नहीं जा रहा है,तू पैर तो आगे बढा...और फिर....जैसे ही उसने पैर जबरदस्ती आगे बढाया कि ठीक बीचोबीच पजामा दो भागों में बटकर फट गया..
इस दौरान मझला भाई भी वहां आ गया था और छुटके की हालत देख हम हंसते हंसते पहले तो लोट पोट हो गए...फिर याद आया कि माँ किसी भी क्षण वापस आ जायेंगी....और हमारा जोरदार बैंड बजेगा....सो फटाफट मझले और मैंने मिलकर अपनी पूरी ताकत लगा पजामा खींच उसमे से भाई को किसी तरह निकला....खूब पुचकारकर और हलवा बनाकर खिलाने के आश्वासन के बाद दोनों भाई राजी हो गए कि वे माताजी को कुछ नहीं बताएँगे...मैंने उन्हें आश्वाशन दिया कि कोई न कोई जुगाड़ लगाकर मैं पजामा ठीक कर दूंगी....
मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर गडबडी हुई कैसे...सिला तो मैंने ठीक ठाक ही था...चुपके से दरजी के पास वह पजामा लेकर हम भाई बहन पहुंचे...दरजी ने जब पजामा देखा तो पहले तो लोट लोट कर हंसा और फिर उसने पूछा कि यह नायाब सिलाई की किसने...मेरे मूरख भाई ने जैसे ही मेरा नाम लेने के लिए अपना मुंह खोला कि मैंने उसे इतने जोर की चींटी काटी कि उसकी चीख निकल गयी..मेरे डर से उसने नाम तो नहीं लिया पर दरजी था एक नंबर का धूर्त उसने सब समझ लिया...उसके बाद तो उसने ऐसी खिल्ली उडानी शुरू की कि मैं दांत पीसकर रह गयी...
जान बूझकर उसने कहा कि अब इसका कुछ नहीं हो सकता.. तो सारे गुस्से को पी उसके आगे रिरियाने के सिवाय दूसरा कोई विकल्प न था मेरे पास...खूब हाथ पैर जोड़े,अंकल अंकल कहा ...तो उसने कहा कि अलग से कपडे लगाकर वह पजामे को ठीक करने की कोशिश करेगा...
जब लौटकर अपने क्षात्रावास पहुँची और सिलाई जानने वाली सहेलियों से पूछा तो पता चला कि भले पजामा क्यों न हो ,उसकी कटाई विशेष प्रकार से होती है और दोनों पैरों के बीच कली लगायी जाती है..
जो भी हो... वह पजामा आज भे हमारी यादों की खूंटी पर वैसे ही लटका पड़ा है,जिसे देख हम भाई बहन आज भी उतना ही हंसा करते हैं...
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12.6.09
गुनाहगार
भगवान् ने अपनी पसंद से माँ बाप संतान या रिश्तेदार चुनने का हक किसी को नहीं दिया है,यदि दिया होता तो ऐसे असंख्य लोग होते जिन्होंने अपने से जुड़े लोग बदल लिए होते....
अपनी मेहनत और काबिलियत के बल पर गुरबत में भी इंजीनियरिंग और एम् बी ए की डिग्रियां हासिल कर गुप्ता अंकल ने ऊंचा ओहदा हासिल किया और इसी ऊंचे ओहदे के बल पर आंटी जैसी स्मार्ट मेधावी लड़की पत्नी रूप में पाया यहाँ तक तो सब उनके बस में था पर आगे की जिन्दगी में बहुत कुछ ऐसा घटा जिनपर उनका कोई वश नहीं चला॥
गुप्ता आंटी अपने समय में बड़ी ही मेधावी और महत्वकांक्षी थीं लेकिन हाथ आये इतने अच्छे रिश्ते को उनके अभिभावक छोड़ना नहीं चाहते थे,सो उन्होंने आंटी के आगे पढने और बढ़ने के सारे सपनो को विराम दे उनके हाथों बड़े साहब की पत्नी बनने का सौभाग्य और मिसेज गुप्ता नाम की डिग्री पकडा दी।
गुप्ता आंटी भी कम जीवट न थी। जबतक गुप्ता अंकल कलकत्ते में रहे, शादी और बेटे राजीव के जन्म के बाद भी आंटी ने हार नही मानी और बेटे को स्कूल भेजने के बाद उन्होंने अपनी पढाई का सिलसिला जो कि इन्टरमीडियेट के बाद रुक गया था फिर से चलाया और एक बच्चे को लेकर भी उन्होंने ग्रेजुएसन और ला की पढाई पूरी की.एक अच्छे फार्म में उन्होंने प्रैक्टिस भी शुरू कर दी थी.लेकिन इसी बीच अंकल को एक नए आ रहे फैक्टरी में बहुत ही ऊंचे पोस्ट का आफर मिला और अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए उन्होंने उस कम्पनी को ज्वाइन कर लिया॥
यह नयी फैक्टरी ऐसे उजाड़ बियावान में बसाया जा रहा था जिसके सबसे नजदीक के शहर से दूरी डेढ़ सौ किलोमीटर थी...अंकल के सितारे तो बुलंद हो गए पर आंटी का अपने पैरों पर खड़े होने,अपनी पहचान बनाने के सपनों पर फिर से धूल पड़ गया। राजीव को होस्टल में डाल दिया गया था. आंटी के पास अब कोई इंगेजमेंट नहीं बचा था॥वे बुरी तरह डिप्रेस रहने लगीं.अंकल को और कोई उपाय न सूझा तो उन्होंने आंटी को फिर से मातृत्व रूपी इंगेजमेंट दे दिया...
यहीं रागिनी का जन्म हुआ था।अंकल और हमलोग पडोसी थे.उनके बड़े से बंगले के बगल में हमारा छोटा बंगला.मेरे पापा अंकल से दो पोस्ट नीचे थे.इस अंतर को ऑफिस से लेकर घर तक पूरी तरह मेंटेन किया जाता था.न ही हम दोनों परिवार में बहुत अधिक घनिष्टता थी और न ही दूरी.
रागिनी मुझसे तीन साल छोटी और मेरी छोटी बहन बबली से साल भर बड़ी थी।दूध सी गोरी चिट्टी बड़ी बड़ी आँखों वाली रागिनी किसी की भी आँखें बांध लेती थी पर उम्र के साथ साथ स्पष्ट अनुभव किया जाने लगा कि उसका मेंटल और फिजिकल ग्रोथ एक सामान नहीं हो रहा था. उनके सामने हमारी बबली थी जो इतनी तेज थी कि जैसे लगता था मानसिक परिपक्वता में वह रागिनी से न जाने कितने साल बड़ी है॥
आंटी ने न कभी अपना हारना बर्दाश्त किया था और न ही वो अपने बच्चों का किसी भी बात में किसी से भी कम होना बर्दाश्त कर सकती थीं।रागिनी की कमजोरी भी वह बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर पाती थीं॥जब उन्होंने डाक्टरों को दिखाना शुरू किया और उन्होंने भी इस बात से सहमति जताई कि रागिनी पूर्णतः मंदबुद्धि तो नहीं पर उसका दिमागी विकास सामान्य बच्चों से कुछ धीमा जरूर है..तो भी आंटी यह मानने को तैयार न थी कि उनकी बेटी में इस तरह की कोई कमी हो सकती थी.
वो बहुत ही फ़्रसटेटेड रहने लगीं।उनका सारा गुस्सा अंकल और रागिनी पर निकलता था.जैसे जैसे रागिनी बड़ी हो रही थी अंकल आंटी की बढती चिंताओं के साथ डाक्टरों के पास उनका भाग दौड़ भी बढ़ रहा था.पर कोई बहुत अधिक सुधार होता नहीं दिख रहा था॥दस बारह वर्ष की उम्र में भी उसकी बुद्धि पांच छः वर्ष के बच्चे से अधिक न थी.बहुत ही सरल और भोली थी वह.बल्कि कहा जाय कि न ही यह दुनिया इस सरल भोली लडकी के लायक थी और न ही इस समझदारों की दुनिया में इसकी सच्ची क़द्र थी..
भोलेपन में की गयी उसकी हरकतें बड़ी अजीब हुआ करती थीं। वह करीब ग्यारह साल की थी.एक दिन वह मेरे साथ कहीं जा रही थी. उसने मुझसे कहानी सुनाने की जिद की तो मैं उसे एक कहानी सुनाने लगी.आंटी के यहाँ एक बड़ा सा कुत्ता था जो कि रागिनी का बेस्ट फ्रेंड था॥रागिनी को कुत्ते बहुत पसंद थे सो मैं उसे कुत्तों की ही कहानी सुनाने लगी......अचानक उसे क्या हुआ कि उसने मुझे कहा...दी, पता है डॉगी कैसे शूशू करता है और जबतक मैं उसे पकड़ती सम्हालती,सड़क किनारे पैंटी खोलकर लैंप पोस्ट के ऊपर पैर उठाकर उसने शू शू कर दिया..आते जाते लोग हंसते हुए खड़े हो गए.मैंने झपटकर उसे पकडा और लगभग घसीटते हुए घर ले कर आई और घर पहुंचकर उसे एक चांटा लगाया.बेचारी गाल सहलाती रह गयी कि इसमें बुरा क्या किया उसने....
दुनियादारी से पूरी तरह अनजान ,इतनी भोली और मासूम थी वह कि बहुत सी सामान्य बातें वह समझ ही नहीं पाती थी।पढाई की बातें भी उसे समझ नहीं आती थी.अब चूँकि कंपनी का ही स्कूल था तो हरेक क्लास में किसी में साल भर किसी में दो साल तक फेल होने पर अंकल का लिहाज कर उसे प्रोमोशन दे दिया जाता था.पर अंकल आंटी बहुत ही चिंतित थे रागिनी के भविष्य को लेकर...
संयोग से एक बार कंपनी ने अपने कर्मचारियों के मेंटल फिटनेस के लिए सात दिवसीय योग साधना शिविर आयोजित कराया..आयोजन इतना सफल रहा कि अगले महीने इसे कर्मचारियों के परिवार वालों के लिए भी आयोजित कराया गया.माँ पापा के कहने रागिनी को भी आंटी शिविर में ले गयीं...
आश्चर्यजनक परिणाम मिले...आजतक वर्षों से खिलाई जा रही सारी दवाईयां जो न कर सकी इस सात दिन के शिविर ने वह चमत्कार कर दिखाया॥
योग गुरु ने दावा किया कि अधिकतम साल डेढ़ साल में वे रागिनी को पूरी तरह ठीक कर देंगे...अंकल आंटी के खुशी का पारावार न रहा था।लेकिन समस्या यह थी कि तो अस्थायी शिविर था.योग आश्रम में अकेले रागिनी को लम्बे समय तक छोड़ना भी मुश्किल था॥
अंकल ने हाइयर मैनेजमेंट से बात कर यह व्यवस्था करवा दी कि योग आश्रम का एक योग प्रशिक्षक वहीँ कम्पनी के पे रोल पर बहाल कर दिया जायेगा जो रेगुलर बेसिस पर स्कूल में योगा क्लासेस लिया करेगा और कम्पनी के कर्मचारियों तथा उनके परिवारवालों के लिए भी नियमित कार्यशालाएं आयोजित करवाया करेगा।
जब से रागिनी इस योग क्लास को रेगुलर अटेंड करने लगी थी,उसमे अप्रत्यासित सुधार होने लगा था।पढाई में भी अब उसे बहुत दिक्कत नहीं रही थी॥योगा टीचर तो अंकल आंटी के लिए भगवान् बन गए थे.अंकल आंटी उन्हें अपने सर माथे पर बिठाते थे.वे जब चाहें उनके घर आ जा सकते थे..एक तरह से रागिनी के गार्जियन वही हो गए थे. बीच बीच में रागिनी को उनके साथ विशेष प्रशिक्षण के लिए आश्रम भी भेज दिया जाता था.
रागिनी का ऐसा काया पलट हो रहा था की उसका एक नया ही रूप सब देख रहे थे। दो साल पहले मैं तो शहर के कालेज होस्टल में रहने लगी थी पर बबली से रागिनी के बारे में बहुत कुछ सुनती रहती थी.बबली की खूब बनती थी उसके साथ.
उन्ही दिनों जब मैं होस्टल में थी,एक दिन अप्रत्यासित रूप से माँ ने फोन पर ऐसी खबर दी कि मैं अन्दर तक हिल गयी।
रागिनी ने आत्महत्या कर ली थी।अपने कानो पर मुझे बिलकुल भी भरोसा न हुआ॥माँ ने बताया कि सुबह करीब दस बजे गुप्ता आंटी ने फोन कर बबली को बताया कि रागिनी उसे बुला रही है॥बबली जब उनके घर पहुँची तो आंटी ने कहा कि रागिनी नहाने गयी है और उसे इन्तजार करने को कहा है..आधे घंटे इन्तजार करने के बाद भी जब रागिनी बाहर नहीं आई तो आंटी ने बबली से कहा कि जाओ उसे आवाज दो..बबली ने बाथरूम के दरवाजे के बाहर से उसे तीन चार आवाजें लगायी पर अन्दर केवल पानी गिरने की आवाज आती रही रागिनी ने कोई जवाब नहीं दिया...
बबली चिढ़कर आंटी के पास जाकर बोली कि आंटी वह पता नहीं और कितने देर नहायेगी,मैं जा रही हूँ निकलने पर उसे कह दीजियेगा वही मेरे पास आ जाय।आंटी ने बबली को साथ लेकर यह कहते हुए कि चलो उसे डांटती हूँ बाथरूम तक ले गयी और कई आवाजें लगायी.जब अन्दर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्होंने दरवाजा ठेला और अन्दर देखा कि रागिनी के गले में चुन्नी बंधी हुई थी जिसका छोर वेंटिलेटर में बंधा हुआ था.
केस पुलिस तक पहुँची। कालोनी क्या आस पास के पूरे इलाके में खबर तूफ़ान सा फ़ैल गया॥केस के गवाह में बबली का नाम भी फंसा और उसके दोस्तों के फेरहिस्त में मेरा नाम भी आया था.पूरी सम्भावना थी कि पुलिस मुझसे भी पूछताछ करती.माँ ने इसी वजह से मुझे फोन किया था कि अगर पुलिस आकर मुझसे होस्टल में या घर आने पर पूछती है तो उन्हें बस इतना ही बताना था कि रागिनी अपने पढाई में पिछड़ने को लेकर बहुत ही हतास और फ़्रसटेटेड रहा करती थी और हमेशा सुसाईट की बातें किया करती थी,हो सकता है इसी वजह से उसने ऐसा किया हो....
यह सरासर गलत था ...मैं जितना जानती थी रागिनी को कभी उसे हतास परेशान नहीं देखा था या ऐसा कोई भी कारण नहीं महसूस किया था जो उसे आत्महत्या करने को मजबूर करता...फोन पर माँ से बहुत पूछा कि इस अनहोनी की वजह क्या हो सकती है,पर माँ ने कुछ नहीं बताया।
मेरे दिमाग में सवालों ने भूचाल मचा दिया था।किसी तरह विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस रागिनी को बात बात पर इतना डर लगता था,जो पिछले कुछ सालों से अपने सफलता से इतनी खुश रहने लगी थी, जिसे आंटी के फ्रस्टेशन और गुस्से को सहने की आदत पड़ी हुई थी और ये कभी भी उसे विचलित नहीं करते थे... वह आत्महत्या जैसा कदम कैसे उठा सकती थी......
जिस वेंटिलेटर से लटकने की बात हो रही थी,वह वेंटिलेटर तो पांच ही फिट ऊपर था,उसपर कैसे लटका जा सकता था....माँ ने कहा फंदा गले में लगा था और वह बाथरूम में बैठी हुई थी...ऐसे मरना कैसे संभव था...मेरा सर फटा जा रहा था इन सवालों के जवाब पाने को....
भागी हुई मैं घर पहुँची थी।बबली इस हादसे से इतनी डर गयी थी कि उसे कम्पोज का इंजेक्सन देकर कई दिन तक सुलाए रखा गया था।माँ पापा तथा डाक्टरों की सख्त हिदायत थी कि बबली के सामने उस हादसे का कोई जिक्र न किया जाय. मैं तो अपने सवालों के जवाब पाने के लिए बस छटपटा कर रह गयी थी, उससे कुछ पूछने का रास्ता ही बंद हो गया था....
केस को तो किसी तरह पुलिस के साथ गंठजोड़ कर निपटा दिया गया था...पर जो सवाल उठे थे उन्हें कैसे खामोश किया जा सकता था।सालों तक वह हवाओं में तैरता रहा॥
घटना के सात महीने बाद गुप्ता अंकल ने यह कंपनी छोड़ एक विदेशी कम्पनी ज्वाइन कर लिया और सपरिवार भारत को अलविदा कह वहीँ जा बसे।
कई महीनो बाद एक दिन अचानक माँ पापा और राजन अंकल जो कि गुप्ता अंकल के सहयोगी थे और जिन्होंने गुप्ता अंकल के केस के निपटारे में बड़ा ही महत्वपूर्ण रोल निभाया था,उनकी फुसफुसाती आवाजें मेरे कानो में पड़ गयी और उन कुछ वाक्यों ने मेरे सारे सवालों के जवाब मुझे दे दिए...
पोस्ट मार्टम में खुलासा हुआ था कि रागिनी तीन महीने की गर्भवती थी और उसकी शरीर की कई हड्डियाँ टूटी हुई थी।शरीर पर गहरे घावों के निशान पाए गए थे.... पर जो पोस्ट मार्टम रिपोर्ट दर्ज हुई उसमे से ये सारी बातें लाखों रुपये के झाडू से साफ़ कर दिए गए थे॥फाइनल रिपोर्ट में इस केस को सिंपल आत्महत्या का केस करार दिया गया था...
एक मासूम जान चली गयी ..........असली गुनाहगार कौन था ........
******************************
अपनी मेहनत और काबिलियत के बल पर गुरबत में भी इंजीनियरिंग और एम् बी ए की डिग्रियां हासिल कर गुप्ता अंकल ने ऊंचा ओहदा हासिल किया और इसी ऊंचे ओहदे के बल पर आंटी जैसी स्मार्ट मेधावी लड़की पत्नी रूप में पाया यहाँ तक तो सब उनके बस में था पर आगे की जिन्दगी में बहुत कुछ ऐसा घटा जिनपर उनका कोई वश नहीं चला॥
गुप्ता आंटी अपने समय में बड़ी ही मेधावी और महत्वकांक्षी थीं लेकिन हाथ आये इतने अच्छे रिश्ते को उनके अभिभावक छोड़ना नहीं चाहते थे,सो उन्होंने आंटी के आगे पढने और बढ़ने के सारे सपनो को विराम दे उनके हाथों बड़े साहब की पत्नी बनने का सौभाग्य और मिसेज गुप्ता नाम की डिग्री पकडा दी।
गुप्ता आंटी भी कम जीवट न थी। जबतक गुप्ता अंकल कलकत्ते में रहे, शादी और बेटे राजीव के जन्म के बाद भी आंटी ने हार नही मानी और बेटे को स्कूल भेजने के बाद उन्होंने अपनी पढाई का सिलसिला जो कि इन्टरमीडियेट के बाद रुक गया था फिर से चलाया और एक बच्चे को लेकर भी उन्होंने ग्रेजुएसन और ला की पढाई पूरी की.एक अच्छे फार्म में उन्होंने प्रैक्टिस भी शुरू कर दी थी.लेकिन इसी बीच अंकल को एक नए आ रहे फैक्टरी में बहुत ही ऊंचे पोस्ट का आफर मिला और अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए उन्होंने उस कम्पनी को ज्वाइन कर लिया॥
यह नयी फैक्टरी ऐसे उजाड़ बियावान में बसाया जा रहा था जिसके सबसे नजदीक के शहर से दूरी डेढ़ सौ किलोमीटर थी...अंकल के सितारे तो बुलंद हो गए पर आंटी का अपने पैरों पर खड़े होने,अपनी पहचान बनाने के सपनों पर फिर से धूल पड़ गया। राजीव को होस्टल में डाल दिया गया था. आंटी के पास अब कोई इंगेजमेंट नहीं बचा था॥वे बुरी तरह डिप्रेस रहने लगीं.अंकल को और कोई उपाय न सूझा तो उन्होंने आंटी को फिर से मातृत्व रूपी इंगेजमेंट दे दिया...
यहीं रागिनी का जन्म हुआ था।अंकल और हमलोग पडोसी थे.उनके बड़े से बंगले के बगल में हमारा छोटा बंगला.मेरे पापा अंकल से दो पोस्ट नीचे थे.इस अंतर को ऑफिस से लेकर घर तक पूरी तरह मेंटेन किया जाता था.न ही हम दोनों परिवार में बहुत अधिक घनिष्टता थी और न ही दूरी.
रागिनी मुझसे तीन साल छोटी और मेरी छोटी बहन बबली से साल भर बड़ी थी।दूध सी गोरी चिट्टी बड़ी बड़ी आँखों वाली रागिनी किसी की भी आँखें बांध लेती थी पर उम्र के साथ साथ स्पष्ट अनुभव किया जाने लगा कि उसका मेंटल और फिजिकल ग्रोथ एक सामान नहीं हो रहा था. उनके सामने हमारी बबली थी जो इतनी तेज थी कि जैसे लगता था मानसिक परिपक्वता में वह रागिनी से न जाने कितने साल बड़ी है॥
आंटी ने न कभी अपना हारना बर्दाश्त किया था और न ही वो अपने बच्चों का किसी भी बात में किसी से भी कम होना बर्दाश्त कर सकती थीं।रागिनी की कमजोरी भी वह बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर पाती थीं॥जब उन्होंने डाक्टरों को दिखाना शुरू किया और उन्होंने भी इस बात से सहमति जताई कि रागिनी पूर्णतः मंदबुद्धि तो नहीं पर उसका दिमागी विकास सामान्य बच्चों से कुछ धीमा जरूर है..तो भी आंटी यह मानने को तैयार न थी कि उनकी बेटी में इस तरह की कोई कमी हो सकती थी.
वो बहुत ही फ़्रसटेटेड रहने लगीं।उनका सारा गुस्सा अंकल और रागिनी पर निकलता था.जैसे जैसे रागिनी बड़ी हो रही थी अंकल आंटी की बढती चिंताओं के साथ डाक्टरों के पास उनका भाग दौड़ भी बढ़ रहा था.पर कोई बहुत अधिक सुधार होता नहीं दिख रहा था॥दस बारह वर्ष की उम्र में भी उसकी बुद्धि पांच छः वर्ष के बच्चे से अधिक न थी.बहुत ही सरल और भोली थी वह.बल्कि कहा जाय कि न ही यह दुनिया इस सरल भोली लडकी के लायक थी और न ही इस समझदारों की दुनिया में इसकी सच्ची क़द्र थी..
भोलेपन में की गयी उसकी हरकतें बड़ी अजीब हुआ करती थीं। वह करीब ग्यारह साल की थी.एक दिन वह मेरे साथ कहीं जा रही थी. उसने मुझसे कहानी सुनाने की जिद की तो मैं उसे एक कहानी सुनाने लगी.आंटी के यहाँ एक बड़ा सा कुत्ता था जो कि रागिनी का बेस्ट फ्रेंड था॥रागिनी को कुत्ते बहुत पसंद थे सो मैं उसे कुत्तों की ही कहानी सुनाने लगी......अचानक उसे क्या हुआ कि उसने मुझे कहा...दी, पता है डॉगी कैसे शूशू करता है और जबतक मैं उसे पकड़ती सम्हालती,सड़क किनारे पैंटी खोलकर लैंप पोस्ट के ऊपर पैर उठाकर उसने शू शू कर दिया..आते जाते लोग हंसते हुए खड़े हो गए.मैंने झपटकर उसे पकडा और लगभग घसीटते हुए घर ले कर आई और घर पहुंचकर उसे एक चांटा लगाया.बेचारी गाल सहलाती रह गयी कि इसमें बुरा क्या किया उसने....
दुनियादारी से पूरी तरह अनजान ,इतनी भोली और मासूम थी वह कि बहुत सी सामान्य बातें वह समझ ही नहीं पाती थी।पढाई की बातें भी उसे समझ नहीं आती थी.अब चूँकि कंपनी का ही स्कूल था तो हरेक क्लास में किसी में साल भर किसी में दो साल तक फेल होने पर अंकल का लिहाज कर उसे प्रोमोशन दे दिया जाता था.पर अंकल आंटी बहुत ही चिंतित थे रागिनी के भविष्य को लेकर...
संयोग से एक बार कंपनी ने अपने कर्मचारियों के मेंटल फिटनेस के लिए सात दिवसीय योग साधना शिविर आयोजित कराया..आयोजन इतना सफल रहा कि अगले महीने इसे कर्मचारियों के परिवार वालों के लिए भी आयोजित कराया गया.माँ पापा के कहने रागिनी को भी आंटी शिविर में ले गयीं...
आश्चर्यजनक परिणाम मिले...आजतक वर्षों से खिलाई जा रही सारी दवाईयां जो न कर सकी इस सात दिन के शिविर ने वह चमत्कार कर दिखाया॥
योग गुरु ने दावा किया कि अधिकतम साल डेढ़ साल में वे रागिनी को पूरी तरह ठीक कर देंगे...अंकल आंटी के खुशी का पारावार न रहा था।लेकिन समस्या यह थी कि तो अस्थायी शिविर था.योग आश्रम में अकेले रागिनी को लम्बे समय तक छोड़ना भी मुश्किल था॥
अंकल ने हाइयर मैनेजमेंट से बात कर यह व्यवस्था करवा दी कि योग आश्रम का एक योग प्रशिक्षक वहीँ कम्पनी के पे रोल पर बहाल कर दिया जायेगा जो रेगुलर बेसिस पर स्कूल में योगा क्लासेस लिया करेगा और कम्पनी के कर्मचारियों तथा उनके परिवारवालों के लिए भी नियमित कार्यशालाएं आयोजित करवाया करेगा।
जब से रागिनी इस योग क्लास को रेगुलर अटेंड करने लगी थी,उसमे अप्रत्यासित सुधार होने लगा था।पढाई में भी अब उसे बहुत दिक्कत नहीं रही थी॥योगा टीचर तो अंकल आंटी के लिए भगवान् बन गए थे.अंकल आंटी उन्हें अपने सर माथे पर बिठाते थे.वे जब चाहें उनके घर आ जा सकते थे..एक तरह से रागिनी के गार्जियन वही हो गए थे. बीच बीच में रागिनी को उनके साथ विशेष प्रशिक्षण के लिए आश्रम भी भेज दिया जाता था.
रागिनी का ऐसा काया पलट हो रहा था की उसका एक नया ही रूप सब देख रहे थे। दो साल पहले मैं तो शहर के कालेज होस्टल में रहने लगी थी पर बबली से रागिनी के बारे में बहुत कुछ सुनती रहती थी.बबली की खूब बनती थी उसके साथ.
उन्ही दिनों जब मैं होस्टल में थी,एक दिन अप्रत्यासित रूप से माँ ने फोन पर ऐसी खबर दी कि मैं अन्दर तक हिल गयी।
रागिनी ने आत्महत्या कर ली थी।अपने कानो पर मुझे बिलकुल भी भरोसा न हुआ॥माँ ने बताया कि सुबह करीब दस बजे गुप्ता आंटी ने फोन कर बबली को बताया कि रागिनी उसे बुला रही है॥बबली जब उनके घर पहुँची तो आंटी ने कहा कि रागिनी नहाने गयी है और उसे इन्तजार करने को कहा है..आधे घंटे इन्तजार करने के बाद भी जब रागिनी बाहर नहीं आई तो आंटी ने बबली से कहा कि जाओ उसे आवाज दो..बबली ने बाथरूम के दरवाजे के बाहर से उसे तीन चार आवाजें लगायी पर अन्दर केवल पानी गिरने की आवाज आती रही रागिनी ने कोई जवाब नहीं दिया...
बबली चिढ़कर आंटी के पास जाकर बोली कि आंटी वह पता नहीं और कितने देर नहायेगी,मैं जा रही हूँ निकलने पर उसे कह दीजियेगा वही मेरे पास आ जाय।आंटी ने बबली को साथ लेकर यह कहते हुए कि चलो उसे डांटती हूँ बाथरूम तक ले गयी और कई आवाजें लगायी.जब अन्दर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्होंने दरवाजा ठेला और अन्दर देखा कि रागिनी के गले में चुन्नी बंधी हुई थी जिसका छोर वेंटिलेटर में बंधा हुआ था.
केस पुलिस तक पहुँची। कालोनी क्या आस पास के पूरे इलाके में खबर तूफ़ान सा फ़ैल गया॥केस के गवाह में बबली का नाम भी फंसा और उसके दोस्तों के फेरहिस्त में मेरा नाम भी आया था.पूरी सम्भावना थी कि पुलिस मुझसे भी पूछताछ करती.माँ ने इसी वजह से मुझे फोन किया था कि अगर पुलिस आकर मुझसे होस्टल में या घर आने पर पूछती है तो उन्हें बस इतना ही बताना था कि रागिनी अपने पढाई में पिछड़ने को लेकर बहुत ही हतास और फ़्रसटेटेड रहा करती थी और हमेशा सुसाईट की बातें किया करती थी,हो सकता है इसी वजह से उसने ऐसा किया हो....
यह सरासर गलत था ...मैं जितना जानती थी रागिनी को कभी उसे हतास परेशान नहीं देखा था या ऐसा कोई भी कारण नहीं महसूस किया था जो उसे आत्महत्या करने को मजबूर करता...फोन पर माँ से बहुत पूछा कि इस अनहोनी की वजह क्या हो सकती है,पर माँ ने कुछ नहीं बताया।
मेरे दिमाग में सवालों ने भूचाल मचा दिया था।किसी तरह विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस रागिनी को बात बात पर इतना डर लगता था,जो पिछले कुछ सालों से अपने सफलता से इतनी खुश रहने लगी थी, जिसे आंटी के फ्रस्टेशन और गुस्से को सहने की आदत पड़ी हुई थी और ये कभी भी उसे विचलित नहीं करते थे... वह आत्महत्या जैसा कदम कैसे उठा सकती थी......
जिस वेंटिलेटर से लटकने की बात हो रही थी,वह वेंटिलेटर तो पांच ही फिट ऊपर था,उसपर कैसे लटका जा सकता था....माँ ने कहा फंदा गले में लगा था और वह बाथरूम में बैठी हुई थी...ऐसे मरना कैसे संभव था...मेरा सर फटा जा रहा था इन सवालों के जवाब पाने को....
भागी हुई मैं घर पहुँची थी।बबली इस हादसे से इतनी डर गयी थी कि उसे कम्पोज का इंजेक्सन देकर कई दिन तक सुलाए रखा गया था।माँ पापा तथा डाक्टरों की सख्त हिदायत थी कि बबली के सामने उस हादसे का कोई जिक्र न किया जाय. मैं तो अपने सवालों के जवाब पाने के लिए बस छटपटा कर रह गयी थी, उससे कुछ पूछने का रास्ता ही बंद हो गया था....
केस को तो किसी तरह पुलिस के साथ गंठजोड़ कर निपटा दिया गया था...पर जो सवाल उठे थे उन्हें कैसे खामोश किया जा सकता था।सालों तक वह हवाओं में तैरता रहा॥
घटना के सात महीने बाद गुप्ता अंकल ने यह कंपनी छोड़ एक विदेशी कम्पनी ज्वाइन कर लिया और सपरिवार भारत को अलविदा कह वहीँ जा बसे।
कई महीनो बाद एक दिन अचानक माँ पापा और राजन अंकल जो कि गुप्ता अंकल के सहयोगी थे और जिन्होंने गुप्ता अंकल के केस के निपटारे में बड़ा ही महत्वपूर्ण रोल निभाया था,उनकी फुसफुसाती आवाजें मेरे कानो में पड़ गयी और उन कुछ वाक्यों ने मेरे सारे सवालों के जवाब मुझे दे दिए...
पोस्ट मार्टम में खुलासा हुआ था कि रागिनी तीन महीने की गर्भवती थी और उसकी शरीर की कई हड्डियाँ टूटी हुई थी।शरीर पर गहरे घावों के निशान पाए गए थे.... पर जो पोस्ट मार्टम रिपोर्ट दर्ज हुई उसमे से ये सारी बातें लाखों रुपये के झाडू से साफ़ कर दिए गए थे॥फाइनल रिपोर्ट में इस केस को सिंपल आत्महत्या का केस करार दिया गया था...
एक मासूम जान चली गयी ..........असली गुनाहगार कौन था ........
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29.5.09
भोज !!!!
कहाँ नहीं मनौती मानी गयी।अंगरेजी डाक्टर, बैद हकीम, गंडा ताबीज क्या क्या न किया गया॥आखिर शादी के बारहवें बरस में भाग बना और देवकी बाबू के घर चिराग जला था...सरोज के विकल ममत्व को स्नेह अवलंबन मिला....नन्हा सोनू दोनों के जीवन का सार था.दोनों पति पत्नी की आँखे आठों पहर उसी पर लगी रहती थी..
और लड़का था भी ऐसा कि देखने वालों की आँखें बाँध लेता था...ऐसा कोई दिन न होता जब सरोज उसकी दीठ न उतारती हो।उसका बस चलता तो उसे आँचल तले ही छुपाये रखती. पर हाथ पैर वाले बच्चे को आँचल तले कितने दिन रखा जा सकता था,बच्चा भाग दौड़ में लग जाता और आशंकित सरोज कभी भी निश्चिंत होकर उसके बाल क्रियाओं का मन भर सुख न ले पाती......
चार साल तक तो सरोज ने उसे घर खलिहान और आँगन तक में सीमित रखा,पर आखिर ऐसे ही सारी उम्र घर में घुसाए तो न रखा जा सकता था॥शिक्षा की बात आई तो सरोज ने जिद ठान दी कि सोनू स्कूल नहीं जायेगा,बल्कि उसके शिक्षा की व्यवस्था घर पर ही कर दी जाय। बड़ी मशक्कत से देवकी बाबू ने सरोज को समझा बुझाकर बच्चे का दाखिला स्कूल में करवाया.
देवकी बाबू नहीं चाहते थे कि उनका बच्चा भी उनकी तरह जमींदारी की इस डूबती नैया के भरोसे अनपढ़ बैठा रहे॥अपने लाल के लिए उनकी आँखों में बहुत बड़े बड़े सपने थे..उन्होंने सोच रखा था कि किसी भी तरह हाई स्कूल की शिक्षा के लिए वे उसे शहर के सबसे बड़े स्कूल में डाल देंगे और अपना पूरा सामर्थ्य इस बच्चे के उज्जवल भविष्य निर्माण में लगा देंगे..
ज्यों ज्यों दिन बीतते गए उनका सोनू अपनी प्रतिभा से उनके सपने को और भी पुख्ता करता गया।उसके प्रतिभा से स्कूल से मास्टर भी अचंभित रहा करते थे. छठी कक्षा तक पहुँचते पहुँचते सोनू स्कूल की शान बन गया था.
लेकिन विधाता भी कैसे खेल खेला करता है, कि कभी कभी उससे निष्ठुर संसार में कोई नहीं लगता। स्कूल के आहते में ही आम का एक विशाल पेड़ था. उस साल वह फल से लद सा गया था.नीचे के सभी फल तो बच्चों ने चढ़कर या डंडे पत्थर मारकर बतिया में ही झाड़ लिए थे,पर ऊपर की टहनियों पर जो कुछ फल बच गए थे,बच्चों को हमेशा चुनौती दे चिढाया करते थे.... रोज ही बच्चों में दावं लगाया जाता कि जो भी बच्चा ऊपर वाली टहनियों से बीस फल तोड़ लाएगा वही स्कूल का लीडर ,सबसे बहादुर माना जाएगा.
फिर क्या था,इसी होड़ में एक दिन सोनू चढ़ गया ऊपर वाली टहनियों पर॥नीचे से सारे बच्चे ललकार रहे थे और सोनू फुनगियों की तरफ बढा चला जा रहा था।हरेक आम के साथ उसका उत्साह बढा ही चला जा रहा था.पंद्रह आम तोड़ लिए थे उसने .लेकिन जैसे ही सोलहवें की ओर बढा, एक कमजोर टहनी ऐसे टूटी कि वह सोनू के लिए यमराज बन गयी.सर में इतनी भारी चोट आई कि जमीन पर गिरने के बाद उसके मुंह से आवाज तक नहीं फूटी....एक पल में देवकी बाबू और सरोज का वह सुन्दर संसार लुट गया.
देवकी बाबू के घर में पूरा गाँव उमड़ आया था।देवकी बाबू के कुछेक गोतिया लोगों को छोड़ शायद ही कोई ऐसा था जिसकी आँखें नहीं बह रही थी.सरोज की नजर जैसे ही अपने बच्चे के लहूलुहान शरीर पर पडी बदहवास भागती उसे गोद में झपट लिया...लेकिन उसके ठंढे पड़े शरीर ने जैसे ही उसे यथार्थ बोध कराया तो वह अपने होशो हवाश खो बैठी.उसके बाद तो किसी तरह जैसे ही उसे होश में लाया जाता,एक चित्कार के साथ फिर से वह अपने होश गवां बैठती.देवकी बाबू बेहोश भले न हुए थे,पर बेटे के मृत शरीर के आगे जो पत्थर होकर बैठे,तो लग ही नहीं रहा था कि उनके काठ बने शरीर में प्राण बचा हुआ है.
दोपहर को घटना घटी थी और सूरज डूबने को आया था...सबके समझाने बुझाने पर किसी तरह अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हुई।देवकी बाबू का माथा तो सुन्न पड़ा था,गोतिया दियाद तथा ग्रामीणों ने ही मिलकर सारी तैयारियां कीं.अंतिम विदाई के ह्रदय विदारक दृश्य ने सबके कलेजे दहला दिए थे॥
दाह संस्कार के अगले दिन सभी सम्बन्धियों पुरोहितों तथा गणमान्य ग्रामीणों की देवकी बाबू के घर बैठकी हुई। आगे के कार्यक्रम की रूपरेखा पर विचार शुरू हुआ. कुछ भलेमानसों ने जैसे ही राय दी कि दुःख की इस घड़ी में क्रिया कर्म में कोई ताम झाम न किया जाय,बाकियों ने उन्हें इतना दुरदुराया कि उन्होंने चुप रहने में ही भलाई समझी.लोगों का तर्क था कि अब चूँकि सोनू का जनेऊ हो चुका था, इसलिए उसका सारा कर्म एक वयस्क सा ही होना चाहिए. इन विरोधी स्वरों में देवकी बाबू के अलग हो चुके भाइयों का स्वर सबसे मुखर था.
यह तो उनके लिए एक सुनहरा अवसर था,जिसके द्वारा वे अपना सारा गुप्त वैर निकाल मन ठंढा कर सकते थे।एकसाथ मानसिक और आर्थिक आघात दे वे अपना अगला पिछला सब हिसाब चुकता कर सकते थे,जो जमीन विभाजन के समय से उनके मन में पल रहे थे॥इस सुनहरे अवसर को वे भला क्योंकर गवांते.
क्रिया कर्म दान इत्यादि की लम्बी फेरहिस्त बनी।लगभग दो घंटे तक इस बात पर विचार या कहें वाद विवाद चलता रहा कि चार दिनों के भोज में किस दिन कौन सा व्यंजन रखा जायेगा, कितने किस्म की कौन कौन सी मिठाई का प्रावधान रखा उचित होगा॥ पूरी परिचर्चा ऐसे हो रही थी जैसे वह सोनू के विवाहोत्सव का अवसर हो.मिठाइयों के स्वाद ने सबकी बुद्धि और जीभ को ऐसे मोहित किया कि उनका हर्ष परिचर्चा में परिहास ले आया.हंसी ठठा से पूरा माहौल गमगमा गया.
उसी समय देवकी बाबू की आँखों के आगे दृश्य घूम गया कि उनका सोनू पेड़ से गिर रहा है और जबतक वे उसे अपने हाथों में थामते कि वह जमीन पर गिरकर लहूलुहान हो गया है। देवकी बाबू चिंघाड़ मारकर बिलख पड़े और संज्ञाशून्य हो कर जमीन पर गिर पड़े.माहौल अचानक ही बदल गया.पानी के छींटे और हवा कर किसी तरह उन्हें होश में लाया गया. लोगों ने दबी जुबान से एक दुसरे को परिचर्चा को विराम देने को खबरदार किया॥अभी इसे आगे बढ़ाने का उचित माहौल नहीं रह गया था.. अगले दिन बैठक के निर्धारण के साथ उस दिन की सभा बीच में ही स्थगित हो गयी..
दो पुस्त पहले तक बड़ी भारी जमींदारी थी उनकी। जहाँ तक नजर दौडाओ उनके ही खेत नजर आते थे...खलिहान में फसल के अम्बार लगे रहते थे...कमला नदी का आर्शीवाद था.साल में तीन फसल हुआ करते थे.उनके ज्यादातर जमीन कमला जी के किनारे ही थे॥लेकिन समय के साथ सब तहस नहस होता चला गया.नालायक निकम्मी पीढी ने केस मुक़दमे तथा अय्यासी में सारा धन कमला जी के सतत प्रवाहित धार सा पानी कर बहा दिया...
आज बस सब ऊपरी दिखावा भर रह गया था॥अन्दर से सभी खोखले थे। यह भी जो आज बचा था देवकी बाबू के पिताजी रामनारायण बाबू सूझ बूझ के कारण ही बचा था.उन्होंने अपनी जिन्दगी में ही अपने बेटियों को निपटाकर सातों बेटों को फरिया दिया था.. पर बाँट बखरा के बाद सातों भाइयों के हिस्से जो जमीन आई थी,वह इतनी न थी कि उसके भरोसे ठीक से पहना ओढा या शान बघारा जा सकता था.
जब हैसियत थी तब इन्होने मरनी जीनी शादी ब्याह सबमे बेहिसाब पैसे लुटाये थे, कुत्ते बिल्लियों के भी धूम धाम से ब्याह रचाए थे॥पर आज वह सब करना नामुमकिन था।आज हैसियत के हिसाब से काम क्रिया का मतलब था,कम से कम छः सात लाख की चोट.देवकी बाबू अपने हिस्से की लगभग सारी जमीन बेच देते तो ही इतनी रकम का इंतजाम हो सकता था.
लेकिन जमीन बेचना भी क्या इतना आसान था।लोग इसी ताक में तो रहते थे.सख्त जरूरत के ऐसे मौकों पर खरीदार के हजार नखरे होते थे.मजबूरी में औने पौने दाम पर लोगों को जमीन बेचना पड़ता था या फिर सूदखोरों के पास चक्रवृद्धि ब्याज पर जमीन गिरवी रखना पड़ता था,जिसके मूल और सूद चुकाने में पीढियों के तेल निकल जाते थे.
एक तो बेटे के मौत का गम ऊपर से इतना बड़ा खर्चा....देवकी बाबू विक्षिप्त से हुए जा रहे थे।अपने मुंह से अपने आर्थिक स्थिति की पोल तो खोल नहीं सकते थे...सो उन्होंने सोचा कि मानसिक स्थिति का हवाला देकर किसी तरह पंचों को मानाने का प्रयत्न करेंगे॥
अगले दिन की बैठक में उन्होंने पंचों के सामने जैसे ही अपना अनुनय रखा कि वर्तमान मानसिक अवस्था में उनका मन जरा भी गवाही नहीं दे रहा इस आयोजन को वृहत रूप में करने का॥कि सारे लोग इस बात पर उखड गए।पीढियों से चली आ रही परंपरा, रीत रिवाज के ये ही तो रक्षक थे.माना कि दुःख बहुत बड़ा था,लेकिन इसका यह तो मतलब नहीं था कि लोकाचार से मुंह मोड़ लिया जाय..एक से एक किस्से निकलने लगे कि कैसे फलाने ने अपने फलाने के आकस्मिक निधन पर क्रिया कर्म में कितने शान से खर्च किया ,फलाने ने नहीं किया तो उसके खानदान पर कितनी विपदा आई.आखिर इस आसमयिक मौत से आत्मा अतृप्त होकर जो भटकेगी,उसके शांति का रास्ता इन्ही कर्मो से होकर तो निकलेगा.जितने अच्छे ढंग से कर्म होगा आत्मा उतनी ही तृप्त होगी.
आखिर इनके तर्क और क्षोभ के सामने देवकी बाबू ने अपने हथियार डाल दिए और अंततः उन्हें कूबूलना ही पड़ा कि अभी इस समय इस रूप में यह सब करने में वे आर्थिक रूप से पूर्णतः अक्षम हैं। अब अगर पञ्च सहारा दें,इस विषम समय में हाथ पकडें,तभी वे यह सब संपन्न कर सकते हैं.
बस क्या था,सांत्वना और सहानुभूति का दौर सा चल निकला॥वाणी में मधु घोलते हुए सबने समवेत स्वर में अपने विशाल ह्रदय और अपनापन का भरोसा दिया..देवकी बाबू को लताड़ भी लगायी कि उनके रहते वे अपने आप को ऐसा असहाय कैसे समझ सकते हैं...
पुराहितों और पंचों ने पूरी सहृदयता से आयोजन की विस्तृत रूपरेखा बनाई ।खर्च का हिसाब लगाया गया और सबने अपना अपना भाग तय कर दिया॥कुछ ही पलों में पूरे पैसों का इंतजाम हो गया था..सबकी राय थी कि कहीं किसी बात की कोई कमी उनके रहते न रखी जाय..
सब कुछ तय कर तृप्त ह्रदय से चाय नाश्ते के साथ सभा संपन्न हुई.एक एक कर लोग उठ उठ कर जाने लगे.जाते समय व्यक्तिगत आश्वासन देने के बहाने सब एकांत में देवकी बाबू से मिलते गए और फुसफुसाते हुए उनके कान में अपने पसंदीदा जमीन के कागजात निश्चित रूप से लेकर आने की ताकीद करते गए...
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और लड़का था भी ऐसा कि देखने वालों की आँखें बाँध लेता था...ऐसा कोई दिन न होता जब सरोज उसकी दीठ न उतारती हो।उसका बस चलता तो उसे आँचल तले ही छुपाये रखती. पर हाथ पैर वाले बच्चे को आँचल तले कितने दिन रखा जा सकता था,बच्चा भाग दौड़ में लग जाता और आशंकित सरोज कभी भी निश्चिंत होकर उसके बाल क्रियाओं का मन भर सुख न ले पाती......
चार साल तक तो सरोज ने उसे घर खलिहान और आँगन तक में सीमित रखा,पर आखिर ऐसे ही सारी उम्र घर में घुसाए तो न रखा जा सकता था॥शिक्षा की बात आई तो सरोज ने जिद ठान दी कि सोनू स्कूल नहीं जायेगा,बल्कि उसके शिक्षा की व्यवस्था घर पर ही कर दी जाय। बड़ी मशक्कत से देवकी बाबू ने सरोज को समझा बुझाकर बच्चे का दाखिला स्कूल में करवाया.
देवकी बाबू नहीं चाहते थे कि उनका बच्चा भी उनकी तरह जमींदारी की इस डूबती नैया के भरोसे अनपढ़ बैठा रहे॥अपने लाल के लिए उनकी आँखों में बहुत बड़े बड़े सपने थे..उन्होंने सोच रखा था कि किसी भी तरह हाई स्कूल की शिक्षा के लिए वे उसे शहर के सबसे बड़े स्कूल में डाल देंगे और अपना पूरा सामर्थ्य इस बच्चे के उज्जवल भविष्य निर्माण में लगा देंगे..
ज्यों ज्यों दिन बीतते गए उनका सोनू अपनी प्रतिभा से उनके सपने को और भी पुख्ता करता गया।उसके प्रतिभा से स्कूल से मास्टर भी अचंभित रहा करते थे. छठी कक्षा तक पहुँचते पहुँचते सोनू स्कूल की शान बन गया था.
लेकिन विधाता भी कैसे खेल खेला करता है, कि कभी कभी उससे निष्ठुर संसार में कोई नहीं लगता। स्कूल के आहते में ही आम का एक विशाल पेड़ था. उस साल वह फल से लद सा गया था.नीचे के सभी फल तो बच्चों ने चढ़कर या डंडे पत्थर मारकर बतिया में ही झाड़ लिए थे,पर ऊपर की टहनियों पर जो कुछ फल बच गए थे,बच्चों को हमेशा चुनौती दे चिढाया करते थे.... रोज ही बच्चों में दावं लगाया जाता कि जो भी बच्चा ऊपर वाली टहनियों से बीस फल तोड़ लाएगा वही स्कूल का लीडर ,सबसे बहादुर माना जाएगा.
फिर क्या था,इसी होड़ में एक दिन सोनू चढ़ गया ऊपर वाली टहनियों पर॥नीचे से सारे बच्चे ललकार रहे थे और सोनू फुनगियों की तरफ बढा चला जा रहा था।हरेक आम के साथ उसका उत्साह बढा ही चला जा रहा था.पंद्रह आम तोड़ लिए थे उसने .लेकिन जैसे ही सोलहवें की ओर बढा, एक कमजोर टहनी ऐसे टूटी कि वह सोनू के लिए यमराज बन गयी.सर में इतनी भारी चोट आई कि जमीन पर गिरने के बाद उसके मुंह से आवाज तक नहीं फूटी....एक पल में देवकी बाबू और सरोज का वह सुन्दर संसार लुट गया.
देवकी बाबू के घर में पूरा गाँव उमड़ आया था।देवकी बाबू के कुछेक गोतिया लोगों को छोड़ शायद ही कोई ऐसा था जिसकी आँखें नहीं बह रही थी.सरोज की नजर जैसे ही अपने बच्चे के लहूलुहान शरीर पर पडी बदहवास भागती उसे गोद में झपट लिया...लेकिन उसके ठंढे पड़े शरीर ने जैसे ही उसे यथार्थ बोध कराया तो वह अपने होशो हवाश खो बैठी.उसके बाद तो किसी तरह जैसे ही उसे होश में लाया जाता,एक चित्कार के साथ फिर से वह अपने होश गवां बैठती.देवकी बाबू बेहोश भले न हुए थे,पर बेटे के मृत शरीर के आगे जो पत्थर होकर बैठे,तो लग ही नहीं रहा था कि उनके काठ बने शरीर में प्राण बचा हुआ है.
दोपहर को घटना घटी थी और सूरज डूबने को आया था...सबके समझाने बुझाने पर किसी तरह अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हुई।देवकी बाबू का माथा तो सुन्न पड़ा था,गोतिया दियाद तथा ग्रामीणों ने ही मिलकर सारी तैयारियां कीं.अंतिम विदाई के ह्रदय विदारक दृश्य ने सबके कलेजे दहला दिए थे॥
दाह संस्कार के अगले दिन सभी सम्बन्धियों पुरोहितों तथा गणमान्य ग्रामीणों की देवकी बाबू के घर बैठकी हुई। आगे के कार्यक्रम की रूपरेखा पर विचार शुरू हुआ. कुछ भलेमानसों ने जैसे ही राय दी कि दुःख की इस घड़ी में क्रिया कर्म में कोई ताम झाम न किया जाय,बाकियों ने उन्हें इतना दुरदुराया कि उन्होंने चुप रहने में ही भलाई समझी.लोगों का तर्क था कि अब चूँकि सोनू का जनेऊ हो चुका था, इसलिए उसका सारा कर्म एक वयस्क सा ही होना चाहिए. इन विरोधी स्वरों में देवकी बाबू के अलग हो चुके भाइयों का स्वर सबसे मुखर था.
यह तो उनके लिए एक सुनहरा अवसर था,जिसके द्वारा वे अपना सारा गुप्त वैर निकाल मन ठंढा कर सकते थे।एकसाथ मानसिक और आर्थिक आघात दे वे अपना अगला पिछला सब हिसाब चुकता कर सकते थे,जो जमीन विभाजन के समय से उनके मन में पल रहे थे॥इस सुनहरे अवसर को वे भला क्योंकर गवांते.
क्रिया कर्म दान इत्यादि की लम्बी फेरहिस्त बनी।लगभग दो घंटे तक इस बात पर विचार या कहें वाद विवाद चलता रहा कि चार दिनों के भोज में किस दिन कौन सा व्यंजन रखा जायेगा, कितने किस्म की कौन कौन सी मिठाई का प्रावधान रखा उचित होगा॥ पूरी परिचर्चा ऐसे हो रही थी जैसे वह सोनू के विवाहोत्सव का अवसर हो.मिठाइयों के स्वाद ने सबकी बुद्धि और जीभ को ऐसे मोहित किया कि उनका हर्ष परिचर्चा में परिहास ले आया.हंसी ठठा से पूरा माहौल गमगमा गया.
उसी समय देवकी बाबू की आँखों के आगे दृश्य घूम गया कि उनका सोनू पेड़ से गिर रहा है और जबतक वे उसे अपने हाथों में थामते कि वह जमीन पर गिरकर लहूलुहान हो गया है। देवकी बाबू चिंघाड़ मारकर बिलख पड़े और संज्ञाशून्य हो कर जमीन पर गिर पड़े.माहौल अचानक ही बदल गया.पानी के छींटे और हवा कर किसी तरह उन्हें होश में लाया गया. लोगों ने दबी जुबान से एक दुसरे को परिचर्चा को विराम देने को खबरदार किया॥अभी इसे आगे बढ़ाने का उचित माहौल नहीं रह गया था.. अगले दिन बैठक के निर्धारण के साथ उस दिन की सभा बीच में ही स्थगित हो गयी..
दो पुस्त पहले तक बड़ी भारी जमींदारी थी उनकी। जहाँ तक नजर दौडाओ उनके ही खेत नजर आते थे...खलिहान में फसल के अम्बार लगे रहते थे...कमला नदी का आर्शीवाद था.साल में तीन फसल हुआ करते थे.उनके ज्यादातर जमीन कमला जी के किनारे ही थे॥लेकिन समय के साथ सब तहस नहस होता चला गया.नालायक निकम्मी पीढी ने केस मुक़दमे तथा अय्यासी में सारा धन कमला जी के सतत प्रवाहित धार सा पानी कर बहा दिया...
आज बस सब ऊपरी दिखावा भर रह गया था॥अन्दर से सभी खोखले थे। यह भी जो आज बचा था देवकी बाबू के पिताजी रामनारायण बाबू सूझ बूझ के कारण ही बचा था.उन्होंने अपनी जिन्दगी में ही अपने बेटियों को निपटाकर सातों बेटों को फरिया दिया था.. पर बाँट बखरा के बाद सातों भाइयों के हिस्से जो जमीन आई थी,वह इतनी न थी कि उसके भरोसे ठीक से पहना ओढा या शान बघारा जा सकता था.
जब हैसियत थी तब इन्होने मरनी जीनी शादी ब्याह सबमे बेहिसाब पैसे लुटाये थे, कुत्ते बिल्लियों के भी धूम धाम से ब्याह रचाए थे॥पर आज वह सब करना नामुमकिन था।आज हैसियत के हिसाब से काम क्रिया का मतलब था,कम से कम छः सात लाख की चोट.देवकी बाबू अपने हिस्से की लगभग सारी जमीन बेच देते तो ही इतनी रकम का इंतजाम हो सकता था.
लेकिन जमीन बेचना भी क्या इतना आसान था।लोग इसी ताक में तो रहते थे.सख्त जरूरत के ऐसे मौकों पर खरीदार के हजार नखरे होते थे.मजबूरी में औने पौने दाम पर लोगों को जमीन बेचना पड़ता था या फिर सूदखोरों के पास चक्रवृद्धि ब्याज पर जमीन गिरवी रखना पड़ता था,जिसके मूल और सूद चुकाने में पीढियों के तेल निकल जाते थे.
एक तो बेटे के मौत का गम ऊपर से इतना बड़ा खर्चा....देवकी बाबू विक्षिप्त से हुए जा रहे थे।अपने मुंह से अपने आर्थिक स्थिति की पोल तो खोल नहीं सकते थे...सो उन्होंने सोचा कि मानसिक स्थिति का हवाला देकर किसी तरह पंचों को मानाने का प्रयत्न करेंगे॥
अगले दिन की बैठक में उन्होंने पंचों के सामने जैसे ही अपना अनुनय रखा कि वर्तमान मानसिक अवस्था में उनका मन जरा भी गवाही नहीं दे रहा इस आयोजन को वृहत रूप में करने का॥कि सारे लोग इस बात पर उखड गए।पीढियों से चली आ रही परंपरा, रीत रिवाज के ये ही तो रक्षक थे.माना कि दुःख बहुत बड़ा था,लेकिन इसका यह तो मतलब नहीं था कि लोकाचार से मुंह मोड़ लिया जाय..एक से एक किस्से निकलने लगे कि कैसे फलाने ने अपने फलाने के आकस्मिक निधन पर क्रिया कर्म में कितने शान से खर्च किया ,फलाने ने नहीं किया तो उसके खानदान पर कितनी विपदा आई.आखिर इस आसमयिक मौत से आत्मा अतृप्त होकर जो भटकेगी,उसके शांति का रास्ता इन्ही कर्मो से होकर तो निकलेगा.जितने अच्छे ढंग से कर्म होगा आत्मा उतनी ही तृप्त होगी.
आखिर इनके तर्क और क्षोभ के सामने देवकी बाबू ने अपने हथियार डाल दिए और अंततः उन्हें कूबूलना ही पड़ा कि अभी इस समय इस रूप में यह सब करने में वे आर्थिक रूप से पूर्णतः अक्षम हैं। अब अगर पञ्च सहारा दें,इस विषम समय में हाथ पकडें,तभी वे यह सब संपन्न कर सकते हैं.
बस क्या था,सांत्वना और सहानुभूति का दौर सा चल निकला॥वाणी में मधु घोलते हुए सबने समवेत स्वर में अपने विशाल ह्रदय और अपनापन का भरोसा दिया..देवकी बाबू को लताड़ भी लगायी कि उनके रहते वे अपने आप को ऐसा असहाय कैसे समझ सकते हैं...
पुराहितों और पंचों ने पूरी सहृदयता से आयोजन की विस्तृत रूपरेखा बनाई ।खर्च का हिसाब लगाया गया और सबने अपना अपना भाग तय कर दिया॥कुछ ही पलों में पूरे पैसों का इंतजाम हो गया था..सबकी राय थी कि कहीं किसी बात की कोई कमी उनके रहते न रखी जाय..
सब कुछ तय कर तृप्त ह्रदय से चाय नाश्ते के साथ सभा संपन्न हुई.एक एक कर लोग उठ उठ कर जाने लगे.जाते समय व्यक्तिगत आश्वासन देने के बहाने सब एकांत में देवकी बाबू से मिलते गए और फुसफुसाते हुए उनके कान में अपने पसंदीदा जमीन के कागजात निश्चित रूप से लेकर आने की ताकीद करते गए...
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20.5.09
दृष्टिकोण ...........
कभी कहीं पढ़ी हुई ,सुनी हुई एक सामान्य प्रसंग ,एक साधारण वाक्य या घटना भी कभी कभी मर्म को स्पर्श कर मन एवं चिंतन को ऐसे आंदोलित कर दिया करती है कि सोच की दिशा बदल जीवन धारा ही बदल जाया करती है....
आज अपनी एक नितांत ही व्यक्तिगत और गोपनीय अनुभूति यह सोचकर सार्वजानिक कर रही हूँ कि क्या पता जैसे प्रसंग ने मेरे सोच को परिवर्तित कर मुझे अनिर्वचनीय सुख लाभ का सुअवसर दिया,संभव है किसी और के सोच की दिशा को भी प्रभावित करे और उसके सुख का निमित्त बने...
भीड़ भाड़ सदैव ही मुझे आतंकित भयग्रस्त किया करती रही है और इससे बचने में मैं अपना पूरा सामर्थ्य लगा दिया करती हूँ...बाकी भीड़ से तो बच भी जाती थी पर अपने धर्मभीरू माता पिता संग मंदिरों के भीड़ का सामना छुटपन से ही करना पड़ा. धार्मिक स्थलों की अपार अव्यवस्थित भीड़,गन्दगी,पंडों की लूट खसोट,चारों और फ़ैली अव्यवस्था मन में इतनी वितृष्णा भरती थी कि मेरे समझ में नहीं आता था,इन सब के मध्य लोग अपनी श्रद्धा भक्ति का निष्पादन और भक्ति भाव का संवरण कैसे कर पाते हैं.इसके साथ ही तथाकथित भक्तों का क्षद्म रूप भी मुझे बड़ा ही आहत किया करता था और एक तरह से मंदिरों, कर्मकांडों के प्रति मेरी अरुचि दृढ से दृढ़तर होती गयी...मेरे अभिभावक मुझसे बड़े ही क्षुब्ध रहा करते थे. उनकी दृष्टि में मैं घोर नास्तिक थी....
मेरे विवाह के पहले तक हमारे अभिभावक वर्ष में एक बार देवघर (वैद्यनाथ धाम) अवश्य जाते थे. वहां के विहंगम दृश्य के क्या कहने......लोटे का जल शायद ही शिवशम्भू के मस्तक तक पहुँच पाता था.....समस्त पुष्प पत्र जल इत्यादि भक्तों पर ही गिरते थे..गर्भ गृह की यह अवस्था होती थी कि अधिकांशतः भोलेनाथ ही भक्तों के चरण रज प्राप्त करते थे.. यदि कोई उनके स्पर्श का सुअवसर पा जाता तो लगता यदि भोलेनाथ धरती को इतने जकड़ कर न पकडे होते तो कबके भक्त उन्हें समूल उठा अपने जेब में रख चलते बनते...
इस धक्का मुक्की में भक्ति भाव कितना बचा रहता था पता नहीं,हर व्यक्ति दुसरे को अपने स्थान का अपहर्ता घोर शत्रु सम लगता था और वश चलता तो सामने वाले को खदेड़ कर वहां से भगा देता. इस भीड़ में चोरों,जेबकतरों और ठगों की चांदी कटती थी....
उत्तर भारत के प्रायः सभी धर्मस्थलों की कमोबेश यही स्थिति आज भी है .हाँ दक्षिण भारत के जितने भी धर्मस्थलों पर आज तक भ्रमण किया ,अपार भीड़ के बावजूद मंदिर प्रशासन तथा स्थानीय प्रशासन के हस्तक्षेप से क्रमबद्ध कतारों के कारण बहुत अधिक धक्का मुक्की की स्थिति कहीं नहीं देखी...
बचपन में तो अभिभावकों के साथ जब कभी भी इस भीड़ भाड़ में जाने की बाध्यता बनी,मेरा प्रयास होता था ,शीघ्रता से उस भीड़ से निपटकर मंदिर प्रांगन में कोई ऐसा स्थान खोजना और वहां शांति से समय गुजरना जहाँ कि पर्याप्त नीरवता हो.बाद में जब स्वयं निर्णायक बनी तब बहुधा यही प्रयास रहा कि देवस्थानों पर ऐसे समय में जाया जाय जब भीड़ की संभावना न्यूनतम हो.
वर्षो तक देवस्थानों की इस भीड़ और अव्यवस्था ने मन को बड़ा ही तिक्त और खिन्न किया ...परन्तु सुसंयोग से करीब सत्रह अठारह वर्ष पहले एक बार चैतन्य महाप्रभु की जीवनी पढ़ने का अवसर मिला. संभवतः हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की लिखी हुई थी वह.. सम्पूर्ण कथानक इतने हृदयस्पर्शी ढंग से उल्लिखित था कि उसने मन प्राणों को बाँध लिया .....उसी कथानक में विवरण था कि जब चैतन्य महाप्रभु यात्रा क्रम में पुरी के जगन्नाथ मंदिर पहुंचे तो मुख्यद्वार पर पहुँचते ही प्रिय के सानिध्य स्मरण ने उन्हें भावविभोर कर दिया,उनके शरीर में रोमांच भर आया, नयनो से अविरल अश्रुधार प्रवाहित होने लगी, भक्ति और प्रेम के आवेग में वे मूर्छित हो गए.....
जब मैंने यह अंश पढ़ा तो न जाने इस प्रसंग ने ह्रदय के किस तंतु को झकझोरा .... मेरे मन ने मुझे बड़ा दुत्कारा ...मुझे लगा जिस पुरी मंदिर में जाने पर मुझे आजतक भीड़ अव्यवस्था,पण्डे , गन्दगी इत्यादि ही दिखे थे,उसी मंदिर में तो चैतन्य महाप्रभु को श्याम सलोने के दर्शन हुए .....यह तो मेरा ही दृष्टिदोष है जो आज तक मेरी दृष्टि इन अवयवों पर ही केन्द्रित रही थी . मेरा ध्यान जिन वस्तुओं पर था,मुझे वही दिखाई दिया...चैतन्य महाप्रभु के दृष्टि वलय में जो था, उन्हें वह दिखाई दिया...
इस विचार ने मुझे इतने गहरे प्रभावित किया कि ,इसने मेरा दृष्टिकोण ही बदल दिया...और उस दिन के बाद जब भी किसी देवस्थान पर गयी हूँ और मन ध्यान से वहां की सकारात्मक उर्जा से जुड़ने का प्रयत्न किया है,शायद ही कभी असफलता मिली है और उसके उपरांत तो कोई भी कारण ध्यान क्रम को बाधित नहीं कर पाया है..प्रेम और भक्ति रस में आकंठ निमग्न होने पर तन मन की जो स्थिति होती है,जो परमानंद प्राप्त होता है उसके सम्मुख संसार की कोई भी वस्तु कोई भी असुविधा अर्थहीन लगती है.....
जो हम अपनी इस स्थूल शरीर की सीमित सामर्थ्यवान नयनो से दृष्टिगत नहीं कर पाते , उसका आस्तित्व ही नहीं है ,ऐसी धारणा नितांत ही भ्रामक और मूर्खता पूर्ण है. जो ईश्वरीय सत्ता को अस्वीकृत करते हैं ,उनके साथ मैं बहस में नहीं पड़ना चाहती. उन्हें यदि यह सोच शांति और सुख देता है तो,यह बहुत ही अच्छी बात है,वे ऐसे ही सुखी रहें......मैं उनके उन्मुख हूँ जो ईश्वरीय सत्ता को तो मानते हैं ,परन्तु बाह्य अवयवों में फंस उस अपरिमित सुख प्राप्ति से वंचित रह जाते हैं..उन्हें एक बार इस दृष्टिकोण के प्रति सजग करना मुझे अपना कर्तब्य लगा....
धर्म में दिखावे और आडम्बर युक्त कोरे कर्मकांडों की धुर विरोधी मैं भी हूँ..कर्म कांडों की उपयोगिता और आवश्यकता मैं इतने भर के लिए मानती हूँ कि कहीं न कहीं ये मुझे वैज्ञानिक तथा भक्ति प्रेम के उद्दीपक लगते हैं. जैसे अपने किसी प्रिय श्रेष्ठ का सानिध्य हमें सुखद लगता है,उसके सम्मान और प्रेम प्रदर्शन हेतु हम भांति भांति की चेष्टाएँ करते हैं और अंततोगत्वा अपार सुख प्राप्त करते हैं,वैसे ही उस सर्वेश्वर के प्रति स्नेह प्रदर्शन सेवा सम्मान भी भक्ति उद्दीपक तथा सुख के साधन ही हैं.
धार्मिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों को सिरे से नकारना भी पूर्णतः उचित नहीं है क्योंकि इसके रूप को विकृत मनुष्यों और पण्डे पुजारियों ने ही किया है नहीं तो इनमे निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण पूर्ण रूपेण जीवनोपयोगी हैं.यह सत्य है की मानवमात्र का धर्म बह्याडम्बरों की अपेक्षा ईश्वर को मन कर्म व्यवहार में धारण करना है,परन्तु जो भी उपाय ईश्वर के प्रति श्रद्धा निष्ठां भक्ति और प्रेम को सुदृढ़ करने में सहायक हों,जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान करता हो,मेरी दृष्टि में वह ग्रहणीय एवं वन्दनीय है.
यह पूर्ण और अकाट्य सत्य है कि ईश्वर का वास मन आत्मा में होता है,हमारी भावनाओं में होता है,सकारात्मक सोच और कर्म में होता है.परन्तु ईश्वर का वास उस पत्थर और स्थान में भी होता है जो अनंत काल से असंख्य श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है.. यह निश्चित जानिए कि यदि हमारी अनुभूति क्षमता प्रखर है तो हम भी उसी प्रकार पत्थर की मूरत में श्याम को देख सकते हैं जैसे मीरा और सूर ने देखा था..रामकृष्ण ने माँ काली को देखा था....और ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं......तो क्यों न एक बार हम भी प्रयास कर देखें. उस अनिर्वचनीय सुख और आनंदलाभ का प्रयास करें....अधिक कहाँ कुछ करना है,एक दृष्टिकोण भर तो बदलना है इसके लिए.....
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आज अपनी एक नितांत ही व्यक्तिगत और गोपनीय अनुभूति यह सोचकर सार्वजानिक कर रही हूँ कि क्या पता जैसे प्रसंग ने मेरे सोच को परिवर्तित कर मुझे अनिर्वचनीय सुख लाभ का सुअवसर दिया,संभव है किसी और के सोच की दिशा को भी प्रभावित करे और उसके सुख का निमित्त बने...
भीड़ भाड़ सदैव ही मुझे आतंकित भयग्रस्त किया करती रही है और इससे बचने में मैं अपना पूरा सामर्थ्य लगा दिया करती हूँ...बाकी भीड़ से तो बच भी जाती थी पर अपने धर्मभीरू माता पिता संग मंदिरों के भीड़ का सामना छुटपन से ही करना पड़ा. धार्मिक स्थलों की अपार अव्यवस्थित भीड़,गन्दगी,पंडों की लूट खसोट,चारों और फ़ैली अव्यवस्था मन में इतनी वितृष्णा भरती थी कि मेरे समझ में नहीं आता था,इन सब के मध्य लोग अपनी श्रद्धा भक्ति का निष्पादन और भक्ति भाव का संवरण कैसे कर पाते हैं.इसके साथ ही तथाकथित भक्तों का क्षद्म रूप भी मुझे बड़ा ही आहत किया करता था और एक तरह से मंदिरों, कर्मकांडों के प्रति मेरी अरुचि दृढ से दृढ़तर होती गयी...मेरे अभिभावक मुझसे बड़े ही क्षुब्ध रहा करते थे. उनकी दृष्टि में मैं घोर नास्तिक थी....
मेरे विवाह के पहले तक हमारे अभिभावक वर्ष में एक बार देवघर (वैद्यनाथ धाम) अवश्य जाते थे. वहां के विहंगम दृश्य के क्या कहने......लोटे का जल शायद ही शिवशम्भू के मस्तक तक पहुँच पाता था.....समस्त पुष्प पत्र जल इत्यादि भक्तों पर ही गिरते थे..गर्भ गृह की यह अवस्था होती थी कि अधिकांशतः भोलेनाथ ही भक्तों के चरण रज प्राप्त करते थे.. यदि कोई उनके स्पर्श का सुअवसर पा जाता तो लगता यदि भोलेनाथ धरती को इतने जकड़ कर न पकडे होते तो कबके भक्त उन्हें समूल उठा अपने जेब में रख चलते बनते...
इस धक्का मुक्की में भक्ति भाव कितना बचा रहता था पता नहीं,हर व्यक्ति दुसरे को अपने स्थान का अपहर्ता घोर शत्रु सम लगता था और वश चलता तो सामने वाले को खदेड़ कर वहां से भगा देता. इस भीड़ में चोरों,जेबकतरों और ठगों की चांदी कटती थी....
उत्तर भारत के प्रायः सभी धर्मस्थलों की कमोबेश यही स्थिति आज भी है .हाँ दक्षिण भारत के जितने भी धर्मस्थलों पर आज तक भ्रमण किया ,अपार भीड़ के बावजूद मंदिर प्रशासन तथा स्थानीय प्रशासन के हस्तक्षेप से क्रमबद्ध कतारों के कारण बहुत अधिक धक्का मुक्की की स्थिति कहीं नहीं देखी...
बचपन में तो अभिभावकों के साथ जब कभी भी इस भीड़ भाड़ में जाने की बाध्यता बनी,मेरा प्रयास होता था ,शीघ्रता से उस भीड़ से निपटकर मंदिर प्रांगन में कोई ऐसा स्थान खोजना और वहां शांति से समय गुजरना जहाँ कि पर्याप्त नीरवता हो.बाद में जब स्वयं निर्णायक बनी तब बहुधा यही प्रयास रहा कि देवस्थानों पर ऐसे समय में जाया जाय जब भीड़ की संभावना न्यूनतम हो.
वर्षो तक देवस्थानों की इस भीड़ और अव्यवस्था ने मन को बड़ा ही तिक्त और खिन्न किया ...परन्तु सुसंयोग से करीब सत्रह अठारह वर्ष पहले एक बार चैतन्य महाप्रभु की जीवनी पढ़ने का अवसर मिला. संभवतः हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की लिखी हुई थी वह.. सम्पूर्ण कथानक इतने हृदयस्पर्शी ढंग से उल्लिखित था कि उसने मन प्राणों को बाँध लिया .....उसी कथानक में विवरण था कि जब चैतन्य महाप्रभु यात्रा क्रम में पुरी के जगन्नाथ मंदिर पहुंचे तो मुख्यद्वार पर पहुँचते ही प्रिय के सानिध्य स्मरण ने उन्हें भावविभोर कर दिया,उनके शरीर में रोमांच भर आया, नयनो से अविरल अश्रुधार प्रवाहित होने लगी, भक्ति और प्रेम के आवेग में वे मूर्छित हो गए.....
जब मैंने यह अंश पढ़ा तो न जाने इस प्रसंग ने ह्रदय के किस तंतु को झकझोरा .... मेरे मन ने मुझे बड़ा दुत्कारा ...मुझे लगा जिस पुरी मंदिर में जाने पर मुझे आजतक भीड़ अव्यवस्था,पण्डे , गन्दगी इत्यादि ही दिखे थे,उसी मंदिर में तो चैतन्य महाप्रभु को श्याम सलोने के दर्शन हुए .....यह तो मेरा ही दृष्टिदोष है जो आज तक मेरी दृष्टि इन अवयवों पर ही केन्द्रित रही थी . मेरा ध्यान जिन वस्तुओं पर था,मुझे वही दिखाई दिया...चैतन्य महाप्रभु के दृष्टि वलय में जो था, उन्हें वह दिखाई दिया...
इस विचार ने मुझे इतने गहरे प्रभावित किया कि ,इसने मेरा दृष्टिकोण ही बदल दिया...और उस दिन के बाद जब भी किसी देवस्थान पर गयी हूँ और मन ध्यान से वहां की सकारात्मक उर्जा से जुड़ने का प्रयत्न किया है,शायद ही कभी असफलता मिली है और उसके उपरांत तो कोई भी कारण ध्यान क्रम को बाधित नहीं कर पाया है..प्रेम और भक्ति रस में आकंठ निमग्न होने पर तन मन की जो स्थिति होती है,जो परमानंद प्राप्त होता है उसके सम्मुख संसार की कोई भी वस्तु कोई भी असुविधा अर्थहीन लगती है.....
जो हम अपनी इस स्थूल शरीर की सीमित सामर्थ्यवान नयनो से दृष्टिगत नहीं कर पाते , उसका आस्तित्व ही नहीं है ,ऐसी धारणा नितांत ही भ्रामक और मूर्खता पूर्ण है. जो ईश्वरीय सत्ता को अस्वीकृत करते हैं ,उनके साथ मैं बहस में नहीं पड़ना चाहती. उन्हें यदि यह सोच शांति और सुख देता है तो,यह बहुत ही अच्छी बात है,वे ऐसे ही सुखी रहें......मैं उनके उन्मुख हूँ जो ईश्वरीय सत्ता को तो मानते हैं ,परन्तु बाह्य अवयवों में फंस उस अपरिमित सुख प्राप्ति से वंचित रह जाते हैं..उन्हें एक बार इस दृष्टिकोण के प्रति सजग करना मुझे अपना कर्तब्य लगा....
धर्म में दिखावे और आडम्बर युक्त कोरे कर्मकांडों की धुर विरोधी मैं भी हूँ..कर्म कांडों की उपयोगिता और आवश्यकता मैं इतने भर के लिए मानती हूँ कि कहीं न कहीं ये मुझे वैज्ञानिक तथा भक्ति प्रेम के उद्दीपक लगते हैं. जैसे अपने किसी प्रिय श्रेष्ठ का सानिध्य हमें सुखद लगता है,उसके सम्मान और प्रेम प्रदर्शन हेतु हम भांति भांति की चेष्टाएँ करते हैं और अंततोगत्वा अपार सुख प्राप्त करते हैं,वैसे ही उस सर्वेश्वर के प्रति स्नेह प्रदर्शन सेवा सम्मान भी भक्ति उद्दीपक तथा सुख के साधन ही हैं.
धार्मिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों को सिरे से नकारना भी पूर्णतः उचित नहीं है क्योंकि इसके रूप को विकृत मनुष्यों और पण्डे पुजारियों ने ही किया है नहीं तो इनमे निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण पूर्ण रूपेण जीवनोपयोगी हैं.यह सत्य है की मानवमात्र का धर्म बह्याडम्बरों की अपेक्षा ईश्वर को मन कर्म व्यवहार में धारण करना है,परन्तु जो भी उपाय ईश्वर के प्रति श्रद्धा निष्ठां भक्ति और प्रेम को सुदृढ़ करने में सहायक हों,जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान करता हो,मेरी दृष्टि में वह ग्रहणीय एवं वन्दनीय है.
यह पूर्ण और अकाट्य सत्य है कि ईश्वर का वास मन आत्मा में होता है,हमारी भावनाओं में होता है,सकारात्मक सोच और कर्म में होता है.परन्तु ईश्वर का वास उस पत्थर और स्थान में भी होता है जो अनंत काल से असंख्य श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है.. यह निश्चित जानिए कि यदि हमारी अनुभूति क्षमता प्रखर है तो हम भी उसी प्रकार पत्थर की मूरत में श्याम को देख सकते हैं जैसे मीरा और सूर ने देखा था..रामकृष्ण ने माँ काली को देखा था....और ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं......तो क्यों न एक बार हम भी प्रयास कर देखें. उस अनिर्वचनीय सुख और आनंदलाभ का प्रयास करें....अधिक कहाँ कुछ करना है,एक दृष्टिकोण भर तो बदलना है इसके लिए.....
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14.5.09
सुख का मार्ग !!!
समाचार पत्र के साथ भी बड़ी विचित्र विडंबना है...सुबह के पहली किरण के साथ जितनी उत्सुकता और स्नेह से इसका स्वागत होता है,पाठोपरांत उतनी ही निर्ममता से इसका तिरस्कार भी होता है..परन्तु इन समाचार पत्रों में बहुत कुछ कभी न पुराने पड़ने तथा सहेजने योग्य सामग्री होती हैं,जो चाहे कितनी भी तिथियाँ बदल जायं अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता नहीं खोती...
ऐसे ही सफाई के क्रम रद्दी में पड़े पुराने समाचार पत्र के एक आलेख ने मन और आँखों को बाँध लिया..
समाचार था - तीन विवाहित पुत्रियों और नाती नतिनियों वाली सड़सठ वर्षीय नंदिता विश्वास ने बी.ए. आनर्स की परीक्षा दी.नंदिता पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के खड़गपुर शहर के वार्ड नंबर अठारह के मलिंचा में रहती हैं.माध्यमिक व जूनियर बेसिक की ट्रेनिंग के बाद नंदिता ने एक सरकारी विद्यालय में अध्यापन कार्य आरम्भ किया.१९८३ से २००३ तक उन्होंने अध्यापन कार्य किया और सेवानिवृति उपरांत उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अपने उस अधूरे स्वप्न को जो कि पारिवारिक एवं शैक्षणिक दायित्वों के व्यस्तता क्रम में अपूर्ण रह गया था,उसे पूर्णता प्रदान करने का संकल्प लिया...
पहले तो जिसने भी सुना, सबने उनका उपहास उड़ाया और पर्याप्त हतोत्साहित किया.परन्तु उनके दृढ संकल्प को देखकर परिवार वालों ने इन्हें सहयोग दिया .बाईस फरवरी २००९ से नेताजी ओपन यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित परीक्षा में उन्होंने बी ए आनर्स में समाज शास्त्र विषय से परीक्षा दी.नंदिता न केवल अपने सफलता के प्रति आश्वस्त हैं बल्कि उतीर्ण होकर आगे भी पढाई जारी रखने को दृढ संकल्प भी हैं...
हो सकता है बहुत लोगों को यह मूर्खता पूर्ण और व्यर्थ लगे,क्योंकि अधिकांशतः शिक्षा को लोग आत्मकल्याण आत्मोत्थान का नहीं धनार्जन का ही साधन मानते हैं.परन्तु नंदिता जैसे लोग परिवार समाज को प्रेरणा देते हैं,नयी राह दिखाते हैं और सही मायने में ऐसे ही लोग जीवन को सच्चा आदर देकर उसे सार्थकता देते हैं.
जीवन जीने और उसमे भी सुखपूर्वक जीने के लिए जितना महत्वपूर्ण स्वस्थ शरीर और धन की आवश्यकता है, आत्मसंतोष और अपने होने की सार्थकता अनुभूत करना,उससे भी अधि़क आवश्यक है.. यूँ तो किसी भी उम्र में जीवन को सुखद आत्मसंतोष ही बनाता है, परन्तु जीवन के उतरार्ध में जिजीविषा के लिए सार्थक सकारात्मक लक्ष्य निर्धारण एवं आत्मसंतुष्टि परम आवश्यक है..
दो ढाई वर्ष की अवस्था में ही शिक्षण में संलिप्त हुआ बालपन समय के साथ उत्तरोत्तर व्यस्त से व्यस्ततम होता चला जाता है.वय के साथ उत्तरदायित्व बढ़ता ही जाता है और कहीं न कहीं उसीमे व्यक्ति अपने होने की सार्थकता ढूंढ लेता है.गृहस्थी के प्रारंभ से लेकर अगली पीढी के तैयार होने और उनकी गृहस्थी बसने तक स्त्री पुरुष परिवार के केंद्र में होते हैं.समस्त परिवार घटनाक्रम और हित अनहित के निर्णय व्यक्ति की मुठ्ठी में होते हैं और एक तरह से परिवार रुपी साम्राज्य के वे स्वामी/स्वामिनी हुआ करते हैं...
परन्तु अगली पीढी के परिवार विस्तार के साथ ही जैसे जैसे इनका उत्तरदायित्व संक्षिप्त होने लगता है, इनके पास रिक्त समय की बहुलता रहने लगती है और अगली पीढी द्वारा स्वविवेक से लिए जाने वाले निर्णय के क्रम में ये स्वयं को निर्णायक भूमिका में नहीं पाते, घोर उपेक्षित अनुपयोगी अनुभूत करने लगते हैं. अनजाने ही इनके मनोभाव कुछ इस प्रकार होने लगते हैं जैसे, इनके इर्द गिर्द दूसरे राज्य पनपने लेगे हैं,जिनपर इनका कोई वश नहीं.अबतक परिवार पर एकक्षत्र शासन का अभ्यास क्रम जैसे ही बाधित होता है,व्यक्ति सहजता से स्वयं को सम्हाल नहीं पाता और विचलित होता हुआ अवसादग्रस्त हो जाता है.भाग दौड़ में फंसे युवा वर्ग के पास न तो इनके मन की सुनने जानने का समय होता है न धैर्य. व्यक्ति अपने ही परिवार के बीच स्वयं को अवांछित अनुपयोगी पाता है,तो तिलमिला जाता है.यदि पहले से इसके लिए मानसिक रूप से तैयार न हो और जबरन सत्तासीन होने का प्रयत्न करने लगता है तो घर की शांति पूर्णतया बाधित होती है.
स्त्रियों की तो इस मामले में और भी दयनीय स्थिति होती है.क्योंकि आम तौर पर पुरुष अपनी संलिप्तता घर के बाहर भी ढूंढ लेते हैं,परन्तु स्त्रियाँ घर संसार के बाहर स्वयं को निकाल ढाल नहीं पातीं.लक्ष्यहीनता और संसारिकता का मोह इन्हें पुराने अभ्यास को बदलने का न तो नया कारण ढूँढने देता है और न ही अपने अवसाद और उग्रता पर इनका वश होता है.फलतः बहुधा ही नयी पीढी के काम में मीन मेख निकाल उन्हें नीचा दिखा ये स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर आत्मसंतोष पाने में जुट जाती हैं.
सहज ही अनुमानित किया जा सकता है कि स्वयं को उपेक्षित अनुभूत करते व्यक्ति के पास लक्ष्य रूप में जब मृत्यु की प्रतीक्षा ही रह जाय तो मनोस्थिति कितनी त्रासद होगी।आज पारिवारिक सामाजिक ढांचा जिस प्रकार बदलता जा रहा है, पूरे विश्व में यह त्रासद स्थिति और भी चिंताजनक होती जा रही है. वय का अवसादग्रस्त चौथपन जीवन को भार सा बना देता है और फिर अवसादग्रस्त व्यक्ति आत्मकेंद्रित हो अपने ही सहेजे संजोये उस परिवार की सुख शांति को भी छिन्न भिन्न करने लगता है.
व्यक्ति ,परिवार और समाज को सुव्यवस्थित रखने हेतु इन्ही कारणों से प्रबुद्ध मनीषियों ने वय के उत्तरार्ध के लिए संन्यास तथा वानप्रस्थ आश्रम की व्यवस्था की थी।अपने अगली पीढी को उतरदायित्व सौंपने के बाद संन्यास ले लिया जाता था.परन्तु संन्यास का तात्पर्य यह नहीं था कि गृह त्याग कर दिया जाय.संन्यास का तात्पर्य था उत्तरदायित्व सौंपने के उपरांत गृहस्थी में ही रहकर संसारिकता के प्रति निर्लिप्त भाव रखना.उत्तराधिकारियों को उनके अग्रहनुसार अपेक्षित मार्गदर्शन देना और अपने आत्मोत्थान के मार्ग पर जीवन को अग्रसर करना.वानप्रस्थ का तात्पर्य था,परिवार से आगे बढ़ समाज तथा अन्य जीव जंतुओं के संरक्षण ,उनकी सेवा में प्रवृत्त होना॥
मन और मष्तिष्क का वय शरीर से बंधा नहीं होता.इसी कारण शरीर की अवस्था से यह किंचित भी अक्षम या बाधित नहीं होता.परन्तु मन मष्तिष्क को यदि निश्चेष्ट रखने का प्रयास किया जायेगा,बलपूर्वक उसे निर्लिप्त रखने का प्रयास किया जायेगा तो वह विद्रोह करेगा ही.इसलिए आवश्यक है कि उसे सकारात्मक कारणों में संलिप्तता दी जाय.एक बार जब उत्तरदायित्व पूर्ण हो गया तो फिर अपने पुराने अधूरे पड़े संकल्पों रुचियों जिसमे आत्मिक आनंद मिलता हो,उसमे संलिप्त हुआ जाय..संगीत ,साहित्य,बागबानी,भ्रमण,सीना पिरोना,पाक कला,इत्यादि इत्यादि न जाने कितने ही कार्य हैं जिसमे व्यक्ति स्वयं को संलिप्त कर सकता है तथा जिन्हें साध व्यक्ति आत्मसंतोष भी पा सकता है और दूसरों को भी ज्ञान और प्रेरणा दे सकते हैं..परोपकार के कार्यों में अपना समय लगा परम संतोष पा सकता है.. ऐसे उपाय .जिजीविषा को कभी क्षीण नहीं पड़ने देते.
मनुष्य चाहे तो अंतिम सांस तक अपने आस पास को बहुत कुछ दे सकता है...और कुछ नहीं तो दो मीठे बोल देकर किसी को भी सुख तो दे ही सकता है और बदले में अकूत संतोष रुपी धन अर्जित कर सकता है.लेकिन यह तभी संभव है जब व्यक्ति स्वयं प्रसन्न और संतुष्ट हो.स्वयं को सुखी करने का साधन कहीं बाहर नहीं हमारी अपनी मुट्ठी में ही है,बस खुले हाथों को बांधकर भींच लेना है..अपने अहम् को दरकिनार कर ,ह्रदय को थोडा बड़ा कर उसमे स्नेह का सागर भरना है,फिर चहुँ और स्नेह ही तो बिखेरेगा मनुष्य.
जिसने आज जन्म लिया उसे भी और जिसने चालीस पचास वर्ष पहले जन्म लिया उसे भी,जीवित बचा तो उसी मोड़ पर पहुंचना है और आगे जाना है,जिसे बुढापा कहते हैं..यदि उम्र के दूसरे तीसरे पड़ाव से ही चौथेपन की तैयारी कर ले , तो सहजता से व्यक्ति उस कष्टदायक अवांछित स्थिति से बच सकता है.
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ऐसे ही सफाई के क्रम रद्दी में पड़े पुराने समाचार पत्र के एक आलेख ने मन और आँखों को बाँध लिया..
समाचार था - तीन विवाहित पुत्रियों और नाती नतिनियों वाली सड़सठ वर्षीय नंदिता विश्वास ने बी.ए. आनर्स की परीक्षा दी.नंदिता पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के खड़गपुर शहर के वार्ड नंबर अठारह के मलिंचा में रहती हैं.माध्यमिक व जूनियर बेसिक की ट्रेनिंग के बाद नंदिता ने एक सरकारी विद्यालय में अध्यापन कार्य आरम्भ किया.१९८३ से २००३ तक उन्होंने अध्यापन कार्य किया और सेवानिवृति उपरांत उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अपने उस अधूरे स्वप्न को जो कि पारिवारिक एवं शैक्षणिक दायित्वों के व्यस्तता क्रम में अपूर्ण रह गया था,उसे पूर्णता प्रदान करने का संकल्प लिया...
पहले तो जिसने भी सुना, सबने उनका उपहास उड़ाया और पर्याप्त हतोत्साहित किया.परन्तु उनके दृढ संकल्प को देखकर परिवार वालों ने इन्हें सहयोग दिया .बाईस फरवरी २००९ से नेताजी ओपन यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित परीक्षा में उन्होंने बी ए आनर्स में समाज शास्त्र विषय से परीक्षा दी.नंदिता न केवल अपने सफलता के प्रति आश्वस्त हैं बल्कि उतीर्ण होकर आगे भी पढाई जारी रखने को दृढ संकल्प भी हैं...
हो सकता है बहुत लोगों को यह मूर्खता पूर्ण और व्यर्थ लगे,क्योंकि अधिकांशतः शिक्षा को लोग आत्मकल्याण आत्मोत्थान का नहीं धनार्जन का ही साधन मानते हैं.परन्तु नंदिता जैसे लोग परिवार समाज को प्रेरणा देते हैं,नयी राह दिखाते हैं और सही मायने में ऐसे ही लोग जीवन को सच्चा आदर देकर उसे सार्थकता देते हैं.
जीवन जीने और उसमे भी सुखपूर्वक जीने के लिए जितना महत्वपूर्ण स्वस्थ शरीर और धन की आवश्यकता है, आत्मसंतोष और अपने होने की सार्थकता अनुभूत करना,उससे भी अधि़क आवश्यक है.. यूँ तो किसी भी उम्र में जीवन को सुखद आत्मसंतोष ही बनाता है, परन्तु जीवन के उतरार्ध में जिजीविषा के लिए सार्थक सकारात्मक लक्ष्य निर्धारण एवं आत्मसंतुष्टि परम आवश्यक है..
दो ढाई वर्ष की अवस्था में ही शिक्षण में संलिप्त हुआ बालपन समय के साथ उत्तरोत्तर व्यस्त से व्यस्ततम होता चला जाता है.वय के साथ उत्तरदायित्व बढ़ता ही जाता है और कहीं न कहीं उसीमे व्यक्ति अपने होने की सार्थकता ढूंढ लेता है.गृहस्थी के प्रारंभ से लेकर अगली पीढी के तैयार होने और उनकी गृहस्थी बसने तक स्त्री पुरुष परिवार के केंद्र में होते हैं.समस्त परिवार घटनाक्रम और हित अनहित के निर्णय व्यक्ति की मुठ्ठी में होते हैं और एक तरह से परिवार रुपी साम्राज्य के वे स्वामी/स्वामिनी हुआ करते हैं...
परन्तु अगली पीढी के परिवार विस्तार के साथ ही जैसे जैसे इनका उत्तरदायित्व संक्षिप्त होने लगता है, इनके पास रिक्त समय की बहुलता रहने लगती है और अगली पीढी द्वारा स्वविवेक से लिए जाने वाले निर्णय के क्रम में ये स्वयं को निर्णायक भूमिका में नहीं पाते, घोर उपेक्षित अनुपयोगी अनुभूत करने लगते हैं. अनजाने ही इनके मनोभाव कुछ इस प्रकार होने लगते हैं जैसे, इनके इर्द गिर्द दूसरे राज्य पनपने लेगे हैं,जिनपर इनका कोई वश नहीं.अबतक परिवार पर एकक्षत्र शासन का अभ्यास क्रम जैसे ही बाधित होता है,व्यक्ति सहजता से स्वयं को सम्हाल नहीं पाता और विचलित होता हुआ अवसादग्रस्त हो जाता है.भाग दौड़ में फंसे युवा वर्ग के पास न तो इनके मन की सुनने जानने का समय होता है न धैर्य. व्यक्ति अपने ही परिवार के बीच स्वयं को अवांछित अनुपयोगी पाता है,तो तिलमिला जाता है.यदि पहले से इसके लिए मानसिक रूप से तैयार न हो और जबरन सत्तासीन होने का प्रयत्न करने लगता है तो घर की शांति पूर्णतया बाधित होती है.
स्त्रियों की तो इस मामले में और भी दयनीय स्थिति होती है.क्योंकि आम तौर पर पुरुष अपनी संलिप्तता घर के बाहर भी ढूंढ लेते हैं,परन्तु स्त्रियाँ घर संसार के बाहर स्वयं को निकाल ढाल नहीं पातीं.लक्ष्यहीनता और संसारिकता का मोह इन्हें पुराने अभ्यास को बदलने का न तो नया कारण ढूँढने देता है और न ही अपने अवसाद और उग्रता पर इनका वश होता है.फलतः बहुधा ही नयी पीढी के काम में मीन मेख निकाल उन्हें नीचा दिखा ये स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर आत्मसंतोष पाने में जुट जाती हैं.
सहज ही अनुमानित किया जा सकता है कि स्वयं को उपेक्षित अनुभूत करते व्यक्ति के पास लक्ष्य रूप में जब मृत्यु की प्रतीक्षा ही रह जाय तो मनोस्थिति कितनी त्रासद होगी।आज पारिवारिक सामाजिक ढांचा जिस प्रकार बदलता जा रहा है, पूरे विश्व में यह त्रासद स्थिति और भी चिंताजनक होती जा रही है. वय का अवसादग्रस्त चौथपन जीवन को भार सा बना देता है और फिर अवसादग्रस्त व्यक्ति आत्मकेंद्रित हो अपने ही सहेजे संजोये उस परिवार की सुख शांति को भी छिन्न भिन्न करने लगता है.
व्यक्ति ,परिवार और समाज को सुव्यवस्थित रखने हेतु इन्ही कारणों से प्रबुद्ध मनीषियों ने वय के उत्तरार्ध के लिए संन्यास तथा वानप्रस्थ आश्रम की व्यवस्था की थी।अपने अगली पीढी को उतरदायित्व सौंपने के बाद संन्यास ले लिया जाता था.परन्तु संन्यास का तात्पर्य यह नहीं था कि गृह त्याग कर दिया जाय.संन्यास का तात्पर्य था उत्तरदायित्व सौंपने के उपरांत गृहस्थी में ही रहकर संसारिकता के प्रति निर्लिप्त भाव रखना.उत्तराधिकारियों को उनके अग्रहनुसार अपेक्षित मार्गदर्शन देना और अपने आत्मोत्थान के मार्ग पर जीवन को अग्रसर करना.वानप्रस्थ का तात्पर्य था,परिवार से आगे बढ़ समाज तथा अन्य जीव जंतुओं के संरक्षण ,उनकी सेवा में प्रवृत्त होना॥
मन और मष्तिष्क का वय शरीर से बंधा नहीं होता.इसी कारण शरीर की अवस्था से यह किंचित भी अक्षम या बाधित नहीं होता.परन्तु मन मष्तिष्क को यदि निश्चेष्ट रखने का प्रयास किया जायेगा,बलपूर्वक उसे निर्लिप्त रखने का प्रयास किया जायेगा तो वह विद्रोह करेगा ही.इसलिए आवश्यक है कि उसे सकारात्मक कारणों में संलिप्तता दी जाय.एक बार जब उत्तरदायित्व पूर्ण हो गया तो फिर अपने पुराने अधूरे पड़े संकल्पों रुचियों जिसमे आत्मिक आनंद मिलता हो,उसमे संलिप्त हुआ जाय..संगीत ,साहित्य,बागबानी,भ्रमण,सीना पिरोना,पाक कला,इत्यादि इत्यादि न जाने कितने ही कार्य हैं जिसमे व्यक्ति स्वयं को संलिप्त कर सकता है तथा जिन्हें साध व्यक्ति आत्मसंतोष भी पा सकता है और दूसरों को भी ज्ञान और प्रेरणा दे सकते हैं..परोपकार के कार्यों में अपना समय लगा परम संतोष पा सकता है.. ऐसे उपाय .जिजीविषा को कभी क्षीण नहीं पड़ने देते.
मनुष्य चाहे तो अंतिम सांस तक अपने आस पास को बहुत कुछ दे सकता है...और कुछ नहीं तो दो मीठे बोल देकर किसी को भी सुख तो दे ही सकता है और बदले में अकूत संतोष रुपी धन अर्जित कर सकता है.लेकिन यह तभी संभव है जब व्यक्ति स्वयं प्रसन्न और संतुष्ट हो.स्वयं को सुखी करने का साधन कहीं बाहर नहीं हमारी अपनी मुट्ठी में ही है,बस खुले हाथों को बांधकर भींच लेना है..अपने अहम् को दरकिनार कर ,ह्रदय को थोडा बड़ा कर उसमे स्नेह का सागर भरना है,फिर चहुँ और स्नेह ही तो बिखेरेगा मनुष्य.
जिसने आज जन्म लिया उसे भी और जिसने चालीस पचास वर्ष पहले जन्म लिया उसे भी,जीवित बचा तो उसी मोड़ पर पहुंचना है और आगे जाना है,जिसे बुढापा कहते हैं..यदि उम्र के दूसरे तीसरे पड़ाव से ही चौथेपन की तैयारी कर ले , तो सहजता से व्यक्ति उस कष्टदायक अवांछित स्थिति से बच सकता है.
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