30.4.12

आदर्शवादी ..

घबराए आवाज में बुचिया ने मून बाबू को हंकारा लगाया- "ओ भैया, दौड़ के आओ हो,देखो तो मैया को का हो गया.."
मून बाबू हड़बडाये दौड़ के आँगन में पहुंचे तो देखा मैया का केहुनी रगडाया हुआ है और माथे पर भी गूमड़ निकल आया है..
वो समझ गए कि गिरने के कारण कोई बहुत गहरी चोट तो न आई है ,पर मन पर चोट का क्षोभ गहरा है....
उन्होंने पुचकारा, "का हुआ माई कहाँ और कैसे गिर गई...? अच्छा कोई बात नहीं, बहुत गहरा जखम नहीं है ,दुई चोट दवाई में एकदम ठीक हो जायेगा..जा रे तो सोनू, मेरा दवाई का बकसवा तो दौड़ के उठा ला..आ बुचिया, तू जरा दौड़ के पानी तो गरमा ला, घाव साफ़ कर मरहम पट्टी कर दें..."
 
 
मैया अबतक भरी आँखें और भर्राए गले से जो चुपचाप बैठी हुईं थीं, गुर्राई..खबरदार जो कोई सटा है हमसे.. नहीं कराना है हमको दबाई बीरो..

का हुआ माई, कुछो बताएगी, काहे एतना खिसियायेल है, मून बाबू बोले..और साथ ही उन्होंने लखना के तरफ आँखों के इशारे से पूछा कि बात क्या हुई..

लखना बोला, मालिक बात ई हुआ कि दादी मंदिरवा से फिरल आ रही थी कि घरे के पास वाले रोडवा पर हेंज के हेंज उ जमुन्वा मन्तरी का गुंडवा सब मोटरसाइकिलवा पर जा रहिस था, ओही में से दू गो मोटरसाइकिलवा वाला दादी के एकदम नगीचे आ के मोटर साइकिलवा हेंडा दिहिस..डरे के मारे दादी बगले हटीं त खड्डा में चित्त होई गयीं..सब गुंडवन ठट्ठा उड़ाते निकल लिए हुआं से, एहिसे दादी जोरे खिसियायेल हैं..

ओह त ई बात...

छोड़े न माई, का उ गुंडवन उचकवन सब के बात मन से लगा रही है...जाने दे..मून बाबू बोले..

क्षोभ क्रोध मिश्रित आवाज में माई बोली.. हाँ रे..!! जाने काहे न दें.. जब भाग में कीड़ा पडल हो तो सबे जाने देना पड़ेगा..
सब कसूर तोहरे बाप के है..ओकरे कारण हमको का का भोगना लिखा है राम जाने..


का माई, काहे बात बात में बाबूजी को लई आती हो, ई कौनो अच्छा बात है का,मून बाबू और बुचिया ने एकसाथ प्रतिवाद किया..

काहे न लायें, बोल...काहे न लायें..आज जौन भी दुर्दशा हमरा , हमरा परिवार का हुआ है,इसका जिम्मेवार तोहरे बाप के सिवा है कौन..??

पूरा गाँव का भिखमंगवन के रात दिन जुटाए रहे घर में, अपना बच्चा सब का हिस्सा का खाना पीना, कपडा लत्ता, किताब कलम सबमे बाँट दिया..
कभी न सोचा कि पहले अपना घर में दिया जला लें फेर मंदिर की सोचेंगे..अपना घर फूंक के गाँव उजियार किया जिनगी भर...का मिला फल बोल, का मिला..?

ऐसे काहे कहती हो माई, बाबूजी को भगवान् मानता है सारा गाँव, केतना इज्जत है उनका, ई का छोटा कमाई है. मून बाबू बोले..

कमाई..?? देख, आग न लगा देह में, कहे देते हैं...ई कमाई है ,त काहे नहीं ई कमाई का फीस भरके अंगरेजी डाक्टर बनाया तुझे ..?? फीस का रकम सुनके तो होसे उड़ गया था बाप बेटा का, याद है कि नहीं..?..बाप बेटा मिलके ऊ घड़ी भी हमको ठगा..अंगरेजी डाक्टर त अपना देस में ढेरे  है, बेटा आयुर्वेदी डाक्टर बनेगा, उसमे फीस भी नामे का लगेगा..
और लो बन भी गया डाक्टर तो इसमें भी तो कमाई है, लेकिन बेटा चला बाप के आदर्श की राह...लोक कल्याण करेगा...बाप का दुर्दशा देखा फिर भी नहीं चेता..


क्या बेटा.. क्या बेटी ... सबको बाप वाला आदर्श का रोग लगा है..ई करमजली को कहे कि एतना पढ़ी लिखी,निकल जा शहर , बड़का अफसर बन, खूब कमा और अपना जिनगी सम्हाल...लेकिन नहीं, ई महरानी भी बाप का विरासत ऊ कंगला इस्कूले चलाएगी.दहेज़ लेने वाले से बियाह न करेगी, जिनगी भर बिनब्याही बैठे रहेगी..सब मिल के करो अपने अपने मन का और मरते रहो..

आह!! देखो तो ,फोड़ डाला उस राच्छस के सेना ने, लेकिन खून नहीं खौला मेरे संतानों का, इससे बढ़िया तो हम बांझे रहते...जाने कैसा आदर्श, कैसा क्षमाशीलता है ई ..?


हम कहे थे ,हजार बार कहे थे, कि ई संपोलवा के न पोसो...ई मुसखौका छोटका जात, बचपन्ने से एक नंबर का झुट्ठा , एक नंबर का चोर था,पहला किलास से मैट्रिक, आइये, बीए सब चोरी आ धांधलेबाजी कर के पास किया..का सोचे थे, कि अभी जो छोटका चोरी कर रहा है, आगे जाकर बड़का बडका डाका नहीं डालेगा..कम से कम अनपढ़ रहता त मूसे न खाता, आज त आदमी खाता है..
कोयला बिभाग के किरानी पद पर बहाल हुआ औ एतना चोरी बेईमानी किया कि पंदरह बरस सस्पेन रहा, लेकिन देखो, ई पंदरह बरस में पैसा का अइसा बुरुज लगाया कि झीटकी जैसा पैसा उड़ा, चुनाव जीत गया औ सीधे मंतरिए बन गया..अब आग मूत रहा है तो बस सब मिल के झेलो..

मून बाबू ने साहस कर एक बार फिर प्रतिवाद किया- ऐसे काहे कहती है माई, सब जमुन्वे थोड़े न बन गया..देखो बाबूजी के पढाये आज एक से एक पद पर पहुंचा हुआ है कि नहीं.भला लोक को याद करो न,बुरा को याद करके का फायदा है..

माई का स्वर अब और ऊंचा उठा गया.. हाँ, हाँ, रे देखे. पद उद भी देखे ..
बडका कलक्टर है न पसमनमा ..
अपने से जाके हम घिघियाये, बचवा बचा लो हमरा घर, उ रच्छसवा जमुन्वा से.बड़का मशीन लगा के ढाह रहा है रे ..

त कहा , माफ़ कई दे माई , मंत्री के खिलाफ एक्सन लेवे के पावर हमरा नहीं है..औ उसके पास तो मास्साब का हस्ताक्षर किया भेलिड कागज भी है..केतना कहे हम, बिटवा गुरूजी काहे कागज पर दस्खत करेंगे रे..ऊ सब उसका धोखा है .. उसका पुरखन को हमरे पुरुखन रहे के बास दया खाकर ऐसे ही दिए थे, अपना घर से एकदम अलग हटके..ई फैलाते फैलाते हमरे घर से दीवार सटा लिया और अब अपना घर बगीचा सुन्दर बनाने को हमरे घर का आधा हिस्सा भी चाहिए उसको..अब बता न हम जान बूझके अपना आधा घर आ खलिहान काहे को उसके नाम करेंगे..

पर ऊ..एक सुना हमरा..??

बात में सच्चाई थी, इसका उत्तर किसीके पास नहीं था..लम्बी खामोशी रही..

इस भारी माहौल को हल्का करने के लिए बुचिया ने ही पहल की..नन्हे भतीजों को इशारे से दादी को लाड़ करने को कहा..दोनों बच्चे दादी से लिपट गए और एक हाथ पकड़ कर अपने पिता से कहने लगा देखो बापू दादी को लहरने वाली दवाई न लगाना, प्यारी प्यारी दवाई लगाना जिससे जले भी न और घाव झट्ट से ठीक हो जाए..दूसरा दादी के माथे के गूमड़ को सहलाने लगा. मून बाबू की पत्नी तबतक गरम गरम दूध हल्दी का गिलास ले उपस्थित हो गई थी..इस एकत्रित लाड़ ने माई के क्षोभ की अग्नि को हल्का और ठंढा करने में प्रभावकारी काम किया..
मरहम पट्टी कर चुकने के बाद मून बाबू ने बड़े लाड़ से कहा, माई, तू इतना कोसती रहती है बाबूजी को ,पर बाबूजी जैसा देवता इंसान, इतना बड़ा दिल वाला आदमी दुनिया में कितना देखा सुना है बता ना..और जानती है, बाबूजी ने पैसा भले न कमाया, पर जो नाम, सम्मान और संतोष रूपी धन उन्होंने कमाया, वह बिरले को नसीब होता है..

मैया कराह उठी...बोली- बिटवा , उनके सारे किये मैं माफ़ कर देती, अगर सचमुच वो अपना दिल को बड़ा और कड़ा बनाये रख लेते रे..जिस दिन उनका ई प्यारा शिष्य , यही जमुन्वा ,धोखे के कागज के बल पर घर ढहवा रहा था, उस घड़ी जदि अपना यही बड़प्पन, सहनशीलता कायम रख उस झटके को सह लेते,अपना प्राण न त्यागे होते , तो हमरा दुनिया ऐसे उजड़ता रे, बोल !!! हमरा तो सोहाग भाग,सबकुछ लुटे लिए चले न गए अपने साथ.कैसे माफ़ कई दें उनको, तू ही कह...


यह दुःख केवल उन्ही तक सीमित न रह पाया, सबकी आँखों से झर धरती भिंगोने लगा..
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12.3.12

गुहार ...


पिता भाई ने विदा किया था, अबकी डोली तुम उठवाना.
पहले मुझको विदा कराके, घर सहेजकर फिर तुम आना.
दाम्पत्य की गरिमा हेतु, सप्त पदी के वचन निभाना,
सांसों की लड़ियाँ जब टूटे, विकल न होना गले लगाना..

भरना मांग सिन्दूर सजन, करना मेरा सोलह श्रृंगार,
सज धज रूप दमक ले मेरा, पहनाना फूलों का हार.
संचित इक अभिलाषा मेरी, पाऊं यह अनुपम उपहार,
प्रिय, आमजन हित लगवाना, कई- कई वृक्ष फलदार..



तुमसे पूर्व पहुँच जो जाऊं, लीपपोत गृह-द्वार संवारूं,
मोहक बंदनवार रचाकर ,कुसुम सुसज्जित सेज बिछाऊं,
मेंहदी बेंदी सेंदुर गहना, पहन के अपना रूप निखारुं,
जैसे ही पहुंचो तुम देहरी, पौ पखार जयमाल पिन्हाऊं..

सजे गृहस्थी फिर से अपनी, ठने रार तो कभी बरसे प्यार.
दोनों मिल जब एक ही हैं तो,किसकी जीत औ किसकी हार.
जन्म जन्म के संगी हों हम, रहे सदा अखंडित यह क्रमवार.
ह्रदय से यह आशीष दो प्रियवर, प्रभु से भी मेरी यही गुहार..
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23.1.12

सेलिब्रेशन ऑफ़ डर्टीनेस ..

धूम मची है, नायिका ने किरदार को जीवंत कर दिया है. इसे कहते हैं कला, और कला के प्रति समर्पण..यत्र तत्र सर्वत्र सेलेब्रेशन हो रहे हैं.मंच शुशोभित गुंजायमान हैं..मंच पर नायिका के अश्लील इशारों,कामुक अदाओं और उघडे देह पर लोग तालियाँ सीटियाँ लुटा हाँफते, बेहोश से हुए जा रहे हैं.कला कई कई सीढियाँ एक साथ फांदता हुआ नयी ऊँचाइयाँ जो पा रहा है..सत्य यह स्थापित और रूढ़ होता जा रहा कि कला का वास नग्नता में है, इसलिए होड़ मची है कि कला को कौन कितना उत्कर्ष दे सकता है और दर्शकों के मुंह से ऊह!! आह!! आउच!! संग ऊ-- ला-- ला!! कौन कितना निकलवा सकता है..

एक फिल्म बनी-"डर्टी पिक्चर" , यह कह कि त्रासदी देखो !!!..पर चकाचौंध में नेपथ्य में जा लुप्त हो गया सन्देश, कि इस मार्ग पर चल, धन भले मिल जाए पर अंततः हताशा निराशा एकाकीपन और असह्य मानसिक संताप के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता ..

महेश बाबू कहते हैं "मुझे पसंद हैं वो लोग जो जिन्दगी अपनी शर्तों पर जीते हैं" . यानि कि अश्लीलता के कीर्तीमान स्थापित करते समय परिवार समाज, आत्मा परमात्मा पर थूकने में जो जितना बड़ा वीर (निर्लज्ज) , वही महान .."बोल्ड एंड ब्यूटीफुल" वही जो जितना बड़ा निर्लज्ज और जो जितना बड़ा निर्लज्ज, वह धन, मान, प्रसिद्धि ,प्रतिष्ठा सबसे उतना ही सफल और बड़ा..

मनोरंजन को जबतक रेडियो उपलब्ध था,लोग दृश्यों की कल्पना करते और सोचते कि काश यह सब दृश्यगत भी होता..यह हुआ और दूरदर्शन ने एक ही मंच पर ज्ञान विज्ञान खेल कूद और समाचार से लेकर मनोरंजन तक सब कुछ उपलब्ध कराया. पर मनोरंजन का यह सिमित कोटा विस्तार पाए,लोग इसके लिए लालायित थे..हमारी सरकार ने जनभावनाओं को समझा, पर उसे आदर देने हेतु दूरदर्शन का विस्तार नहीं किया, अपितु अपने ह्रदय द्वार खोल दिए असंख्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए, कि आओ और मनोरंजन परोसो..इन कंपनियों की सहूलियत के लिए दूरदर्शन को इतना इतना उबाऊ बना दिया कि लोग इसे कूड़ा समझ इससे पूर्णतः किनारा कर लें.

और फिर अचानक ही हमारे देश की सुंदरियाँ विश्व स्तर पर सौन्दर्य प्रतियोगिताएं जीतने लगीं.देश का गौरव ,महान उपलब्धि ठहराया गया इसे.लोग गर्व से गदगद उभचुभ...आश्चर्य यह कि उन दो तीन वर्षों से पहले या बाद भारत में तथाकथित "ब्यूटी विथ ब्रेन" का पूर्ण अकाल पड़ गया..क्यों ?? प्रश्न -ग्लोबलाइजेशन, बाजारवाद का यह रहस्य सात पर्दों में कैद रह गया.

बहुत बड़ा बाज़ार है हमारा देश, जहाँ सौन्दर्य तथा मनोरंजन क्षेत्र एक विस्तृत हरा भरा चारागाह है..लेकिन समस्या यह है कि आत्मोन्नति, सादा जीवन उच्च विचार,भौतिकता से दूरी आदि भारतीय संस्कार विचार बाज़ार का सबसे बड़ा शत्रु है..संस्कारहीन किये बिना व्यक्ति को विलासी, भौतिकवादी नहीं बनाया जा सकता...और जबतक व्यक्ति भौतिकवादी नहीं होगा पूरे बाज़ार को समेट अपने घर में बसा लेने के रोग से ग्रसित कैसे होगा...

पहलेसिनेमा से लेकर बुद्धू बक्से(टी वी)द्वारा महलनुमा घर, बहुमूल्य कपडे व साजो सामान की चकाचौंध में व्यक्ति की बुद्धि को चुंधिया उसे भोग के उन वस्तुओं लिए लालायित करना और फिर लुभावने विज्ञापन द्वारा उपभोक्ता का प्रोडक्ट के प्रति ज्ञानवर्धन कर उसे पा लेने को प्रतिबद्ध करना आठो याम अबाध जारी रहता है.दर्शक/उपभोक्ता इन सब से निर्लिप्त रहे भी तो कैसे..

इस विराट बाज़ार में अन्य समस्त भौतिक वस्तुओं के साथ स्त्री भी एक वस्तु है "पारस" सी अनमोल. एक ऐसी वस्तु, जिसे किसी भी वस्तु के साथ खड़ा कर दो, उस वस्तु को चमका दे, उसे मूल्यवान बना दे.. कार से सेविंग ब्लेड तक और दियासलाई से हवाई यात्रा तक, फ्रंट में सुंदरियों को चिपकाया नहीं कि ग्राहक हँसते हँसते अक्ल और जेब लुटा देता है ...और अब तो हसीनाएं दिखा, पुरुष ग्राहकों को पटाने की प्रथा अपार विस्तार पा, "हैंडसम" दिखा, महिला ग्राहकों को लुभाने का भी आ गया है..

सुन्दर सुगठित मोहक शरीर और अदाओं वाले युवक युवतियों की मार्केट में भारी डिमांड है..पहले जो यह विभेद था कि ए ग्रेड की हसीनाएं इतना ही उघड़ेंगी, बी ग्रेड वाली इससे अधिक और सी ग्रेड वाली इससे काफी आगे बढ़कर, बाज़ार यह फर्क मिटा देने पर आमदा है..उसे कोई सीमा नहीं चाहिए,सब असीम चाहिए... तो, इसमें स्पेशल ग्रेड(पोर्न स्टार) को उतरा गया..अब इस स्पेशल ग्रेड को इतना अधिक महिमामंडित किया जाएगा, इसपर धन प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा की ऐसी वर्षा की जायेगी, कि ए- बी- सी में होड़ मच जायेगी इस ग्रेड में शामिल होने के लिए.."बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा" विश्वास अपार सुदृढ़ता पा सिद्ध अकाट्य हो जायेगा..

संचार के समस्त दृश्य श्रव्य माध्यमो द्वारा व्यक्ति के मन में अहर्निश अश्लीलता, कुसंस्कार, भौतिकवादिता के प्रति प्रेम उतार मनुष्य को केवल और केवल एक उपभोक्ता बनाने का अभियान चल रहा है.. एक वह समाज जिसे पीढ़ियों से यह सिखा पोषित किया गया है कि भोग तुच्छ और अधोगामी है , उन मूल्यों से विलग कर विलासप्रिय भोगवादी बनाये बिना बाज़ार का प्रयोजन कैसे सिद्ध होगा..व्यक्ति जबतक यह न माने कि जीवन और शरीर इन्द्रिय भोग के लिए ही मिला है,भोग की और उन्मुख कैसे होगा..? और सांसारिक समस्त भोगों के साधनों को जुटाने का एकमात्र साधन तो "धन" ही है, तो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित कर, निकृष्ट प्रतिस्पर्धा(जिसमे कोई किसी का संगी नहीं,प्रतियोगी है जिसके हाथ से अवसर लूट अपने कब्जे में करना ही सक्सेसफुल मैनेजर होने की शर्त है) में लगा ,उप्भोग्तावादी संस्कृति को मजबूती देता बाज़ार फलता फूलता जा रहा है,

क्या विडंबना है, एक समय था जब शिक्षा , समाजिक सरोकारों से पूर्णतः काट स्त्री को संपत्ति और केवल उपभोग की वस्तु बना छोड़ा गया था..पिता भाई पति या पुत्र के अधीन जीवन भर उसे हाड मांस के एक पुतले सा चलना पड़ता था..किसीके भी सही गलत का प्रतिवाद करना, उनके सम्मुख ऊंची आवाज में बात करना,बिना उनकी आज्ञा या परामर्श के निर्णय लेना, स्त्री की स्वेच्छाचारिता मानी जाती थी.परिवार के पुरुष सदस्यों से अधिक महिला सदस्य इसके लिए सजग रहती थी कि किसी भी भांति किसी भी स्त्री में स्वविवेक व स्वनिर्णय का विध्वंसक गुण न आ जाये.इसके लिए जो कुछ भी किया जा सकता था, किया गया. शिक्षा से दूर रख उनके व्यक्तित्व को इतना कुंठित किया गया कि दब्बूपना उनके स्वभाव में स्थायी रूप से स्थिर हो गया और सबसे मजे की बात कि इस दब्बूपना को शील, लज्जा,संस्कार,सच्चरित्रता कह पर्याप्त महिमामंडित किया गया. अज्ञान के अंध कूप में पड़ी स्त्रियों ने हथियार डाल दिए और स्वयं को असहाय निर्बल मानते हुए पिता भाई पति तक को ही नहीं पुत्र को भी अपना स्वामी मान लिया..कभी गर्वोन्नत हो यह माना कि वह अमूल्य संपत्ति है जिसकी रक्षा पुरुष सदस्यों(सबल) द्वारा होनी आवश्यक है, तो कभी मान लिया कि वह तो सचमुच एक उपयोग उपभोग की वस्तु मात्र है..

पर समय ने समाज को जब यह सिखाया कि उसका निर्बल पड़ा पूरा आधा भाग परिवार समाज के विकास में सहभागिता नहीं निभा पा रहा, तो जागृति फ़ैली और इस वर्ग सबल करने पर पूरा ध्यान दिया जाने लगा..और आज जब शारीरिक,मानसिक व बौद्धिक विकास का अवसर नारी पुरुष को सामान रूप प्राप्त है, स्त्रियों ने दिखा दिया है कि शारीरिक बल में भले वे पुरुषों से कभी कभार उन्नीस पड़ जाती हों पर मानसिक और बौद्धिक बल में वे सरलता से उन्हें पछाड़ सकती हैं..लेकिन यह अपार सामर्थ्य संपन्न नवजागृत समूह जिस प्रकार दिग्भ्रमित हो रहा है, असह्य दुखदायी है यह..इतने लम्बे संघर्ष के उपरांत प्राप्त अवसर को एक बार पुनः स्वयं को उत्पाद और वस्तु रूप में स्थापित कर स्त्री कैसे नष्ट कर रही है.. इस पेंच को वह नहीं समझ पा रही कि बोल्डनेस कह जिस नग्नता को महिमामंडित किया जा रहा है,वह पूरा उपक्रम उसे मनुष्य से पुनः उपभोग की एक सुन्दर वस्तु बना छोड़ने की है.. व्यभिचार को आचार ठहरा उसका मानसिक विकास का आधार नहीं तैयार हो रहा बल्कि उसके शारीरिक शोषण का बाज़ार तैयार हो रहा है...

आवश्यकता साक्षर भर होने की नहीं बल्कि सही मायने में शिक्षित होने की है, विवेक को जगाने और आत्मोत्थान की है.स्त्री स्वयं जबतक अपने आप को केवल शरीर.. और शरीर को, धनार्जन का साधन नहीं मानेगी , मजाल नहीं कि कोई पुरुष उसे इसके लिए बाध्य कर सकेगा..



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23.12.11

जीवन..

सांस सांस कर चुकती जाती, साँसों की यह पूंजी,
जीवन क्यों,जगत है क्या, है अभी तलक अनबूझी..

कभी लगे यह विषम पहेली, अनुपम कभी सहेली,
संगसाथ चलने का भ्रम दे, कर दे निपट अकेली.

कभी लगे है क्या कुछ ऐसा, जो मैं न कर पाऊं,
काल तरेरे भौं जब भी तो , दंभ पे अपनी लजाऊँ.

कभी लगे है बचा हुआ क्या, जो न अबतक देखा,
तभी रचयिता विहंस के पूछे, क्या है अबतक देखा.

कूड़ा कचड़ा ही तो समेटा, जन्म कर दिया जाया,
महत ज्ञानसागर का अबतक, बूँद भी कहाँ पाया.

सोचा था पावन जीवन को, सार्थक कर है जाना,
अर्थ ढूंढते समय चुका , वश है क्या गुजरा पाना.

जाने किस पल न्योता आये, क्षण में उठ जाए डेरा,
माया में भरमाया चित, किस विध समझे यह फेरा..



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7.12.11

हाथ का साथ ....




अईसे काहे बघुआ के, अंखिया तरेर के देख रहा है बे,
साला..नंगा..भुक्खर ...???

आ ...समझा !!! ... भूखा है ???
त ई से हमको मतलब..???
सब अपना अपना भाग का खाते हैं...
हम भी अपना पुन्न का स्टाक से खा और इतरा रहे हैं...
तू भूखा.. नंगा... ई तोरा भाग...
त फिर हमरा भरलका मलाईदार छप्पन भोग थरिया देख के ई जलन काहे.. ई आक्रोस काहे..आयं  ??

चल भाग इहाँ से..

नहीं भागेगा..??

त,,, का कल्लेगा बोल..???

जल्ला कट्टा बोली मारेगा...???

हा हा हा हा...कैसे ??

तोरा जीभ त है, हमरे जेब में ...!!!

त,,, अब का ...???

ओ....गोली मारेगा..???

लेकिन कैसे बे...???

हाथ है...???

सबका हाथ काट के हम जमा कर लिए अपना खजाना में...
अब हाथ, केवल औ केवल हमरे पास है...
आ जिसके हाथ में हमरा दिया हाथ है, ओही किसीको भी बोली या गोली, कुच्छो मार सकता है..

एहिलिये न कहते हैं, धड से आके धर लो ई हाथ...ससुर, राज करेगा राज ...!!!

" हमरा हाथ, हमरा हाथ धरने वाले हर जन- जनावर के साथ "



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15.11.11

न्यायप्रिय राजा ....

एक राजा थे, बड़े ही न्यायप्रिय..न्याय करना एक तरह से उनका शौक था,जूनून था,जिन्दगी थी...जबतक दिन भर में सौ, डेढ़ सौ न्याय न कर लेते उन्हें चैन न मिलता,खाना न पचता..कहते हैं, जस राजा तस प्रजा.. उनके विश्वस्त स्वामिभक्त दरबारियों को भी न्याय प्रक्रिया में भाग लेने से प्रिय और कुछ भी न था..वे भी अपना सब काम धाम किनारे कर राजा को न्याय करते देखते रहते और इस एकमात्र विषय की जुगाली करते रहते .
तो एक दिन ऐसे ही न्याय प्रक्रिया के बीच दो अपराधियों को लाया गया.
राजा ने दोनों के अपराध पूछे. तो बताया गया कि "क" ने दस चूहे और पचास मच्छर जान से मारे हैं, कोतवाल को थप्पड़ से मारा है और राजा को अन्यायी कहा है...
और "ख" ने पंद्रह आदमियों को मारा, बीस एक डाके डाले ,करीब डेढ़ दर्जन बलात्कार किया और कई हेराफेरियां की हैं..
राजा अत्यंत क्रोधित हो गए कि जिस राज्य को वे रामराज्य बनाने के लिए दिन रात सोचते रहते हैं,वहीँ उनकी प्रजा ऐसे कारनामों से उनके अभियान पर पानी फेरने को तैयार रहती है...
घुडकते हुए वे गरजे - अरे दुष्टों, क्यों की तुम लोगों ने ऐसी हरकतें..जीव हत्या !!! ऐसा जघन्य अपराध !!! दे दूँ फांसी..???
"क" हड़का नहीं, बल्कि अड़ गया और बोला -

"महाराज, ये भी क्या बात हुई..चूहे मेरी फसलों को नष्ट कर रहे थे, तो न मारता उन्हें...और आपको पता भी है, आपके राजमहल के बाहर क्या स्थिति है .जिन म्युनिसिपैलिटी वालों को नगर की सफाई व्यवस्था देखनी है, मच्छड मारना है, वे तो राजमहल चमकाने और यहाँ के मच्छड मारने में लगे रहते हैं ,तो जो मच्छड दिन रात हमारा खून पीते रहते हैं,उन्हें मार हम अपना खून नहीं बचा सकते..?
और यह कोतवाल , वर्दी की धौंस दिखाकर हफ्ता मांग मांग हमें कंगाल किये हुए है..आज मैंने मना किया तो इसने मुझपर कोड़े बरसाए , तो बताइए न धोता उस अन्यायी को ..? "
"क" की दबंगई और ध्रिष्ट्ता देख राजा समेत समस्त दरबारी हतप्रभ रह गए..
 "ख" की उपस्थिति और अपराध तो लोग भूल ही गए...
ऐसा दुस्साहस ..!!!
सन्नाटा पसर गया दरबार में...
ऐसे में सबसे पहली आवाज उभरी "ख" की -
धिक्कार है,धिक्कार है...शेम शेम...
हमारे अन्नदाता प्रजापालक के साथ ऐसी बेहूदगी से सवाल- जवाब, ऊंची आवाज ..यह तो राज्य को चुनौती है..देशद्रोह है..
सबने "ख" से सहमति जताते हुए - शेम शेम और धिक्कार है, धिक्कार है.. उचारा ..
काफी समय लगा कोलाहल शान्त होने में..फिर बारी आई "ख" की ..
उससे पूछा गया कि ये हत्याएं और अपराध उसने क्यों किये...बिना एक पल गँवाए अत्यंत कातर और विनीत स्वर में गिडगिडा उठा वह ..
"महाराज ये जो भी अपराध गिनाये गए हैं, अपराध हैं,यह मैंने अभी अभी जाना है...सर्वथा अनभिज्ञता में यह सब कर गया  .. अब चूँकि मैंने ईश्वरपुत्र महाराज के साक्षात दर्शन कर लिए तो एकदम से विवेक जाग उठा मेरा, मन निर्मल हो गया... और अभी के अभी मैं ईश्वरपुत्र हमारे महान राजा तथा पवित्र धर्मग्रन्थ की शपथ लेकर कहता हूँ कि अब आगे से कभी भी ऐसे कर्मों में लिप्त नहीं होऊंगा.. "
दोनों पक्षों की सुन ली गई थी.गहन मंत्रणा हुई. और पवित्र न्यायप्रिय राजा ने अपना न्याय सुनाया :-
"ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की ,सब जीवों को जीवन जीने का सामान अधिकार दिया,जिसे लेने का मनुष्य को कोई अधिकार नहीं..इस तरह हत्या के तो "क" और "ख" दोनों ही सामान रूप से दोषी हैं, परन्तु जैसा कि सबने देखा "क" को न ही अपने किये पर पश्चाताप है और न ही आगे वह ऐसा नहीं करेगा, इसका उनसे कोई आश्वासन दिया है, इसके साथ ही राज्य या सत्ता के प्रति इसके मन में स्नेह या आदर का कोई भाव लक्षित नहीं होता..ऐसे अपराधी मनोवृत्ति के मनुष्य का समाज में खुले घूमना घातक है.अतः "क" को उसके जघन्य कृत्य और मानसिकता के लिए मृत्युदंड दिया जाता है..
और जैसा कि आप सबने अभी देखा कि देशभक्ति राष्ट्रप्रेम की भावना कैसे कूट कूट कर "ख" में भरी हुई है, कैसे उसे अपने कृत्य पर घोर पश्चाताप है..कैसे निर्मल और उच्च विचार हैं इसके.. साथ ही इसने आगे ऐसे किसी भी अपराध में लिप्त न होने की सौगंध खायी है ..अतः "ख" को अपराध मुक्त किया जाता है और साथ ही उसकी पवित्र भावना का आदर करते हुए ससम्मान  न्याय समिति में सलाहकार पद पर नियुक्त किया जाता है.."
दूध और पानी को अलग करता ऐसा विवेकपूर्ण न्याय...!!! प्रजा एक स्वर से साधु साधु कर उठी..जयघोष से राजमहल गुंजायमान हो उठा..
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समझे, कथा सन्देश (माने  कि  ओही - मोरल आफ द इस्टोरी) ???
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चलिए हमहीं बता देते हैं -
त मोरल ई है कि, राजनीति में पाप-पुण्य, सही-गलत, निति-नियम ..सब ऊ निर्धारित करता है जिसके हाथ में सत्ता होती है...

जदी राजा सही, त सबकुछ सही, आ राजा गोबर, त राष्ट्र गोबर... बाकी कोई मोरल बाला चिचिया छटपटा के का कर लेगा... चीं चपड़ जरूरत से जादे करेगा त भांग भूजते सूली लटकेगा..
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10.10.11

तीस साल का इतिहास...

तीन, साढ़े तीन दशक !!!! बहुत लम्बा समय होता है यह..एक पूरी जन्मी पीढी स्वयं जनक बन जाती है इस अंतराल में.चालीस से अस्सी बसंत गुजार चुके किसी से पूछिए कि इस अंतराल में क्या क्या बदला देखा उन्होंने..समय की रफ़्तार की वे बताएँगे..परन्तु कई बार कुछ चीजों को देख प्रवाह और परिवर्तन की यह बात एकदम गलत और झूठी लगने लगती है.लगता है इस क्षेत्र विशेष में तो कुछ भी नहीं बदला.यहाँ आकर घड़ी की सुइयां एकदम स्थिर हो टिक टिक कर चलने ,गुजरने का केवल भ्रम दे रही हैं..
लगभग तीन दशक पहले मूर्धन्य व्यंगकार श्री शरद जोशी जी ने समय के उस टुकड़े को कलमबद्ध किया था अपने आलेख "तीस साल का इतिहास" में जो उनकी पुस्तक " जादू की सरकार" में संकलित है..कईयों ने पढ़ा होगा इसे, पर मैं अस्वस्त हूँ कि इसका पुनर्पाठ किसी को भी अप्रिय न लगेगा ...प्रस्तुत है श्री शरद जोशी जी द्वारा लिखित उनकी पुस्तक "जादू की सरकार" का आलेख " तीस साल का इतिहास " जिसे पढ़कर बस यही लगता है कि राजनीति में कभी कुछ नहीं बदलता,चाहे समय कितना भी बदल जाए..
"तीस साल का इतिहास"

कांग्रेस को राज करते करते तीस साल बीत गए . कुछ कहते हैं , तीन सौ साल बीत गए . गलत है .सिर्फ तीस साल बीते . इन तीस सालों में कभी देश आगे बढ़ा , कभी कांग्रेस आगे बढ़ी . कभी दोनों आगे बढ़ गए, कभी दोनों नहीं बढ़ पाए .फिर यों हुआ कि देश आगे बढ़ गया और कांग्रेस पीछे रह गई. तीस सालों की यह यात्रा कांग्रेस की महायात्रा है. वह खादी भंडार से आरम्भ हुई और सचिवालय पर समाप्त हो गई.

पुरे तीस साल तक कांग्रेस हमारे देश पर तम्बू की तरह तनी रही, गुब्बारे की तरह फैली रही, हवा की तरह सनसनाती रही, बर्फ सी जमी रही. पुरे तीस साल तक कांग्रेस ने देश में इतिहास बनाया, उसे सरकारी कर्मचारियों ने लिखा और विधानसभा के सदस्यों ने पढ़ा. पोस्टरों ,किताबों ,सिनेमा की स्लाइडों, गरज यह है कि देश के जर्रे-जर्रे पर कांग्रेस का नाम लिखा रहा. रेडियो ,टीवी डाक्यूमेंट्री , सरकारी बैठकों और सम्मेलनों में, गरज यह कि दसों दिशाओं में सिर्फ एक ही गूँज थी और वह कांग्रेस की थी. कांग्रेस हमारी आदत बन गई. कभी न छुटने वाली बुरी आदत. हम सब यहाँ वहां से दिल दिमाग और तोंद से कांग्रेसी होने लगे. इन तीस सालों में हर भारतवासी के अंतर में कांग्रेस गेस्ट्रिक ट्रबल की तरह समां गई.
जैसे ही आजादी मिली कांग्रेस ने यह महसूस किया कि खादी का कपड़ा मोटा, भद्दा और खुरदुरा होता है और बदन बहुत कोमल और नाजुक होता है. इसलिए कांग्रेस ने यह निर्णय लिया कि खादी को महीन किया जाए, रेशम किया जाए, टेरेलीन किया जाए. अंग्रेजों की जेल में कांग्रेसी के साथ बहुत अत्याचार हुआ था. उन्हें पत्थर और सीमेंट की बेंचों पर सोने को मिला था. अगर आजादी के बाद अच्छी क्वालिटी की कपास का उत्पादन बढ़ाया गया, उसके गद्दे-तकिये भरे गए. और कांग्रेसी उस पर विराज कर, टिक कर देश की समस्याओं पर चिंतन करने लगे. देश में समस्याएँ बहुत थीं, कांग्रेसी भी बहुत थे.समस्याएँ बढ़ रही थीं, कांग्रेस भी बढ़ रही थी. एक दिन ऐसा आया की समस्याएं कांग्रेस हो गईं और कांग्रेस समस्या हो गई. दोनों बढ़ने लगे.
पुरे तीस साल तक देश ने यह समझने की कोशिश की कि कांग्रेस क्या है? खुद कांग्रेसी यह नहीं समझ पाया कि कांग्रेस क्या है? लोगों ने कांग्रेस को ब्रह्म की तरह नेति-नेति के तरीके से समझा. जो दाएं नहीं है वह कांग्रेस है.जो बाएँ नहीं है वह कांग्रेस है. जो मध्य में भी नहीं है वह कांग्रेस है. जो मध्य से बाएँ है वह कांग्रेस है. मनुष्य जितने रूपों में मिलता है, कांग्रेस उससे ज्यादा रूपों में मिलती है. कांग्रेस सर्वत्र है. हर कुर्सी पर है. हर कुर्सी के पीछे है. हर कुर्सी के सामने खड़ी है. हर सिद्धांत कांग्रेस का सिद्धांत है है. इन सभी सिद्धांतों पर कांग्रेस तीस साल तक अचल खड़ी हिलती रही.

तीस साल का इतिहास साक्षी है कांग्रेस ने हमेशा संतुलन की नीति को बनाए रखा. जो कहा वो किया नहीं, जो किया वो बताया नहीं,जो बताया वह था नहीं, जो था वह गलत था. अहिंसा की नीति पर विश्वास किया और उस नीति को संतुलित किया लाठी और गोली से. सत्य की नीति पर चली, पर सच बोलने वाले से सदा नाराज रही.पेड़ लगाने का आन्दोलन चलाया और ठेके देकर जंगल के जंगल साफ़ कर दिए. राहत दी मगर टैक्स बढ़ा दिए. शराब के ठेके दिए, दारु के कारखाने खुलवाए; पर नशाबंदी का समर्थन करती रही. हिंदी की हिमायती रही अंग्रेजी को चालू रखा. योजना बनायी तो लागू नहीं होने दी. लागू की तो रोक दिया. रोक दिया तो चालू नहीं की. समस्याएं उठी तो कमीशन बैठे, रिपोर्ट आई तो पढ़ा नहीं. कांग्रेस का इतिहास निरंतर संतुलन का इतिहास है. समाजवाद की समर्थक रही, पर पूंजीवाद को शिकायत का मौका नहीं दिया. नारा दिया तो पूरा नहीं किया. प्राइवेट सेक्टर के खिलाफ पब्लिक सेक्टर को खड़ा किया, पब्लिक सेक्टर के खिलाफ प्राइवेट सेक्टर को. दोनों के बीच खुद खड़ी हो गई . तीस साल तक खड़ी रही. एक को बढ़ने नहीं दिया.दूसरे को घटने नहीं दिया.आत्मनिर्भरता पर जोर देते रहे, विदेशों से मदद मांगते रहे. 'यूथ' को बढ़ावा दिया, बुड्द्धों को टिकेट दिया. जो जीता वह मुख्यमंत्री बना, जो हारा सो गवर्नर हो गया. जो केंद्र में बेकार था उसे राज्य में भेजा, जो राज्य में बेकार था उसे उसे केंद्र में ले आए. जो दोनों जगह बेकार थे उसे एम्बेसेडर बना दिया. वह देश का प्रतिनिधित्व करने लगा.

एकता पर जोर दिया आपस में लड़ाते रहे. जातिवाद का विरोध किया, मगर अपनेवालों का हमेशा ख्याल रखा. प्रार्थनाएं सुनीं और भूल गए. आश्वासन दिए, पर निभाए नहीं. जिन्हें निभाया वे आश्वश्त नहीं हुए. मेहनत पर जोर दिया, अभिनन्दन करवाते रहे. जनता की सुनते रहे अफसर की मानते रहे.शांति की अपील की, भाषण देते रहे. खुद कुछ किया नहीं दुसरे का होने नहीं दिया. संतुलन की इन्तहां यह हुई कि उत्तर में जोर था तब दक्षिण में कमजोर थे. दक्षिण में जीते तो उत्तर में हार गए. तीस साल तक पुरे, पुरे तीस साल तक, कांग्रेस एक सरकार नहीं, एक संतुलन का नाम था. संतुलन, तम्बू की तरह तनी रही,गुब्बारे की तरह फैली रही, हवा की तरह सनसनाती रही बर्फ सी जमी रही पुरे तीस साल तक.
कांग्रेस अमर है. वह मर नहीं सकती. उसके दोष बने रहेंगे और गुण लौट-लौट कर आएँगे. जब तक पक्षपात ,निर्णयहीनता ढीलापन, दोमुंहापन, पूर्वाग्रह , ढोंग, दिखावा, सस्ती आकांक्षा और लालच कायम है, इस देश से कांग्रेस को कोई समाप्त नहीं कर सकता. कांग्रेस कायम रहेगी. दाएं, बाएँ, मध्य, मध्य के मध्य, गरज यह कि कहीं भी किसी भी रूप में आपको कांग्रेस नजर आएगी. इस देश में जो भी होता है अंततः कांग्रेस होता है. जनता पार्टी भी अंततः कांग्रेस हो जाएगी. जो कुछ होना है उसे आखिर में कांग्रेस होना है. तीस नहीं तीन सौ साल बीत जाएँगे, कांग्रेस इस देश का पीछा नहीं छोड़ने वाली...
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साभार, व्यंगकार श्री शरद जोशी जी के संकलन "जादू की सरकार" के "तीस साल का इतिहास" से !!!