22.10.10

अँधा प्रेम !!!

प्रेम,एक ऐसी दिव्य अनुभूति, जिससे सुन्दर,जिससे अलौकिक संसार में और कोई अनुभूति नहीं.जब यह ह्रदय में उमड़े तो फिर सम्पूर्ण सृष्टि रसमय सारयुक्त लगने लगती है.ह्रदय विस्तृत हो ब्रह्माण्ड में और ब्रह्माण्ड ह्रदय में समाहित हो जाता है. मन और कल्पनाएँ अगरु के सुवास से सुवासित और उस जैसी ही हल्की हो व्योम में धवल मेघों के परों पर सवार हो चहुँ ओर विचरने लगता है. मन तन से और तन मन से बेखबर हो जाता है. यह बेसुधी ही आनंद का आगार बन जाती है.पवन मादक सुगंध से मदमाने लगता है और मौन में संगीत भर जाता है. जीवन सार्थकता पाया लगता है..

मनुष्य ही क्या संसार में जीवित ऐसा कोई प्राणी नहीं, जो प्रेम की भाषा न समझता हो और इस दिव्य अनुभूति का अभिलाषी न हो . आज तक न जाने कितने पन्ने इस विषय पर रंगे गए परन्तु इसका आकर्षण ऐसा, इसमें रस ऐसा, कि न तो आज तक कोई इसे शब्दों में पूर्ण रूपेण बाँध पाया है और न असंख्यों बार विवेचित होने पर भी यह विषय पुराना पड़ा है.आज ही क्या, सृष्टि के आरम्भ से इसके अंतिम क्षण तक यह भाव,यह विषय, अपना शौष्ठव,अपना आकर्षण नहीं खोएगा, क्योंकि कहीं न कहीं यही तो इस श्रृष्टि का आधार है..

माना जाता है प्रेम सीमाएं नहीं मानता. यह तो अनंत आकाश सा असीम होता है और जो यह मन को अपने रंग में रंग जाए तो ह्रदय को नभ सा ही विस्तार दे जाता है.प्रेम का सर्वोच्च रूप ईश्वर और ईश्वर का दृश्य रूप प्रेम है..और ईश्वर क्या है ?? करुणा,प्रेम, परोपकार इत्यादि समस्त सद्गुणों का संघीभूत रूप. तो तात्पर्य हुआ जो हृहय प्रेम से परिपूर्ण होगा वहां क्रोध , लोभ , इर्ष्या, असहिष्णुता, हिंसा इत्यादि भावों के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा. प्रेमी के ह्रदय में केवल ईश्वर स्वरुप सत का वास होगा और जहाँ सत हो, असत के लिए कोई स्थान ही कहाँ बचता है..

पर वास्तविकता के धरातल पर देखें, ऐसा सदैव होता है क्या ?? प्रेम पूर्णतया दैवीय गुण है,परन्तु इसके रहते भी व्यक्ति अपने उसी प्रेमाधार के प्रति शंकालु , ईर्ष्यालु , प्रतिस्पर्धी, स्वार्थी, कपटी,क्रोधी,अधीर होता ही है. तो क्या कहें ?? प्रेम का स्वरुप क्या माने ?? हम दिनानुदिन तो देखते हैं, प्रेम यदि ह्रदय को नभ सा विस्तार देता है तो छुद्रतम रूप से संकुचित भी कर देता है और कभी तो दुर्दांत अपराध तक करवा देता है. फिर क्या निश्चित करें ? क्या यह मानें कि प्रेम व्यक्ति की एक ऐसी मानसिक आवश्यकता है,जो अपने आधार से केवल सुख लेने में ही विश्वास रखता है, प्रेम के प्रतिदान का ही आकांक्षी होता है? प्रेमी उसकी प्रशंशा करे, उसपर तन मन धन न्योछावर कर दे, उसके अहम् और रुचियों को सर्वोपरि रखे, उसे अपना स्वत्व समर्पित कर दे,तब प्रेमी को लगे कि उसने सच्चे रूप से प्रेम पाया...क्या यह प्रेम है?

क्या इस भाव को जिसे अलंकृत और महिमामंडित कर इतना आकर्षक बना दिया गया है, वैयक्तिक स्वार्थ का पर्यायवाची नहीं ठहराया जा सकता ? एक प्रेमी चाहता क्या है? अपने प्रेमाधार का सम्पूर्ण समर्पण ,उसकी एकनिष्ठता,उसका पूरा ध्यान ,उसपर एकाधिकार, उसपर वर्चस्व या स्वामित्व, कुल मिलाकर उसका सर्वस्व. एक सतत सजग व्यापारी बन जाता है प्रेमी,जो व्यक्तिगत लाभ का लोभ कभी नहीं त्याग पाता. लेन देन के हिसाब में एक प्रेमी सा कुशल और कृपण तो एक बनिक भी नहीं हो पाता.हार और हानि कभी नहीं सह सकता और जहाँ यह स्थिति पहुंची नहीं कि तलवारें म्यान से बाहर निकल आतीं हैं..

प्रेम पाश में आबद्ध प्रेमी युगल प्रेम के प्रथम चरण में परस्पर एक दूसरे में सब कुछ आलौकिक देखता है.जो वास्तव में सामने वाले में रंचमात्र भी नहीं,वह भी परिकल्पित कर लेता है. सामने वाले में उसे रहस्य और सद्गुणों का अक्षय भण्डार दीखता है..युगल परस्पर एक दूसरे के गहन मन का एक एक कोना देख लेने,जान लेने और उसे आत्मसात कर लेने की सुखद यात्रा पर निकल पड़ते हैं. आरंभिक अवस्था में युगल एक दूसरे के लिए अत्यधिक उदार रहते हैं, प्रतिदान की प्रतिस्पर्धा लगी रहती है,जिसमे दोनों अपनी विजय पताका उन्नत रखना चाहते हैं, पर जैसे जैसे ह्रदय कोष्ठक की यह यात्रा संपन्न होती जाती है,कल्पनाओं का मुल्लम्मा उतरने लगता है,यथार्थ उतना सुन्दर ,उतना आकर्षक नहीं लगता फिर. रहस्य जैसे जैसे संक्षिप्तता पाता है,कल्पना के नील गगन में विचारने वाला मन यथार्थ के ठोस धरातल पर उतरने को बाध्य हो जाता है,जहाँ कंकड़ पत्थर कील कांटे सब हैं..इसे सहजता से स्वीकार करने को मन प्रस्तुत नहीं होता और तब आरम्भ होता है हिसाब किताब,कृपणता का दौर.

जो युगल एक दूसरे के लिए प्राण न्योछावर करने को आठों याम प्रस्तुत रहते थे, अपने इस प्रेम को जीवन की सबसे बड़ी भूल मानने लगते हैं,इस परिताप की आंच में जलते प्रेमी क्षोभ मिटाने को सामने वाले को अतिनिष्ठुर होकर दंडित करने लगते हैं और एक समय के बाद इस प्रेम पाश से मुक्ति को छटपटाने लगते हैं या फिर एक बार फिर से एक सच्चे प्रेम की खोज में निकल पड़ते हैं. कहाँ है प्रेम,किसे कहें प्रेम ?? इस युगल ने भी तो बादलों की सैर की थी तथा प्रेम के समस्त लक्ष्ण जिए थे और मान लिया था कि उनका यह प्रेम आलौकिक है.

अब एक और पक्ष -

प्रेम स्वतःस्फूर्त घटना है,जो किसे कब कहाँ किससे और कैसे हो जायेगा ,कोई नहीं कह सकता..इसपर किसी का जोर नहीं चलता और न ही यह कोई नियम बंधन मानता है.

अस्तु,

पचहत्तर हजार आबादी वाला एक गाँव, जिसमे पांच महीने में चौदह वर्ष से लेकर पचपन वर्ष तक के छः प्रेमी जोड़े अपना स्वप्निल संसार बसाने समाज के समस्त नियमों के जंजीर खंडित करते घर से भाग गए.यह आंकडा उक्त गाँव के स्थानीय पुलिस थाने में दर्ज हुए जिसे लोगों ने जाना. ऐसे कितने प्रकरण और हुए जिसे परिवार वालों ने लोक लाज के बहाने दबाने छिपाने का प्रयास किया,कहा नहीं जा सकता. इन छः जोड़ों में से तीन जोड़ा था ममेरे चचेरे भाई बहनों का,एक जोड़ा मामा भगिनी का, एक जोड़ा गुरु शिष्या का और एक जोड़ा जीजा साली का. निश्चित रूप से उसी अलौकिक प्रेम ने ही इन्हें कुछ भी सोचने समझने योग्य नहीं छोड़ा.यह केवल स्थान विशेष की घटना नहीं,विकट प्रेम की यह आंधी सब ओर बही हुई है जो अपने वेग से समस्त नैतिक मूल्यों को ध्वस्त करने को प्रतिबद्ध है...

तो फिर प्रेम तो प्रेम होता है,इसमें सही गलत कुछ नहीं होता,मान कर इन घटनाओं को सामाजिक स्वीकृति/मान्यता मिल जानी चाहिए क्या ?? यह यदि आज गंभीरता पूर्वक न विचारा गया तो संभवतः मनुष्य और पशु समाज में भेद करना कठिन हो जायेगा. शहरों महानगरों में गाँवों की तरह सख्त बंदिश नहीं होती और वहां परिवार तथा आस पड़ोस में ही प्रेम के आधार ढूंढ लेने की बाध्यता भी नहीं होती ,इसलिए वहां चचेरे ममेरे भाई बहनों में ही यह आधार नहीं तलाशा जाता..पर एक बार अपने आस पास दृष्टिपात किया जाय..आज जो कुछ यहाँ भी हो रहा है,सहज ही स्वीकार लेना चाहिए??

परंपरा आज की ही नहीं ,बहुत पुरातन है, पर आज बहुचर्चित है..यह है "आनर किलिंग". इसके समर्थक और विरोधी दोनों ही अपना अपना पक्ष लेकर मैदान में जोर शोर से कूद पड़े हैं.पर "आनर किलिंग" के नाम पर न तो डेंगू मच्छरों की तरह पकड़ पकड़ कर प्रेमियों का सफाया करने से समस्या का समाधान मिलेगा और न ही प्रेम को इस प्रकार अँधा मान कर बैठने से सामाजिक मूल्यों के विघटन को रोका जा सकेगा . आज आवश्यकता है व्यक्तिमात्र द्वारा व्यक्तिगत नैतिकता,सामाजिक मूल्यों की सीमा रेखाओं को सुदृढ़ करने की और प्रेम के सच्चे स्वरुप को पहचानने और समझने की.

समग्र रूप में जो प्रेम व्यक्ति के ह्रदय को नभ सा विस्तृत न बनाये,फलदायी सघन उस वृक्ष सा न बनाये जो अपने आस पास सबको फल और शीतल छांह देती है,जो व्यक्ति को सात्विक और उदार न बनाये,उसका नैतिक उत्थान न करे , वह प्रेम नहीं, प्रेम का भ्रम भर है. प्रेम अँधा नहीं होता,बल्कि उसकी तो हज़ार आँखें होती हैं जिनसे वह असंख्य हृदयों का दुःख देख सकता है और उनके सुख के उद्योग में अपना जीवन समर्पित कर सकता है..

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44 comments:

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

ranjana ji...
waakai mein bahut hee khoobsurat lekh hai!

उस्ताद जी said...

6.5/10

बहुत ही मंझा हुआ प्रभावी लेखन
"प्रेम" की ऐसी गहन मीमांसा - कमाल.
किसी को इस जादुई शब्द को समझना हो तो आपकी पोस्ट का हवाला दया जा सकता है.

मशवरा : पोस्ट की लम्बाई जरा सी ज्यादा हो गयी है. पाठक लम्बाई देखकर घबराते हैं और कन्नी काटकर निकल जाते हैं :)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

सुंदर आलेख।
..प्रेम न जाने देश-धर्म, प्रेम न जाने समाज
कल की फिकर करें ना प्रेमी उनका तो बस आज।
..आपके लेख को पढ़कर सहज उपजी ये पंक्तियाँ इस लेख की सार्थकता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है।

कंचन सिंह चौहान said...

वाऽऽऽऽऽऽह दीदी..!
क्या सधा लेख है ? सारे अप डॉउन बता दिये।

सही है प्रेम का कोई नियम नही होता। ये जब होता है तो बस हो जाता है। मगर ज़रूरी तो नही कि इसकी परिणिति इस तरह हो। जैसा आपने बताया उस पचहत्तर हज़ार की आबादी वाले गाँव की।

नियम टूटते जा रहे हैं। हमें जो पसंद आया हम उसके साथ हैं। हमे प्रेम हो गया। हमने अपना साथी छोड़ा ‌और हो लिये उसके साथ और उसने अपना साथी छोड़ा और हो लिया मेरे साथ। मगर उन साथियों का क्या जो हमारे ही थे। जिन्हे हमने अकेला छोड़ दिया। ये सोचती हूँ, तो सोच में पड़ जाती हँ।

आज सुबह लिविंग रिलेशन की परिणिति सुन रही थी अपने कज़िन से। वो दोनो १५ साल से अपने घर नही गये। मैने कहा " जिसमें इतना बूता हो कि वो एक व्यक्ति के लिये माँ, बाप, भाई, बहन सबको छोड़ सके वो ही कर सकता है।"

खैर मान लीजिये कि माँ बाप भाई बहन सब मान ही लेते हैं, तो मैं आने वाली पीढ़ी के सामने प्रस्तुत होने वाले आदर्श के प्रति अधिक चिंतित हूँ। १३ से २४ तक की वो उम्र जिसमें सब सही लगता है। उसे क्रॉस करते करते तो बहुत कुछ सामाजिक असंतुलन हो गया होगा। आने वालौ पीढ़ी, जिसके लिये लिविंग रिलेशन, छः माह में तलाक, सगे चचेरे सारे रिश्तों में जोड़ा ढूँढ़ना सब जायज़ ही हो जायेगा। उसमें सामाजि ढाँचा कैसा होगा ? और इतनी उच्छृंखलता के बाद समाज में कितनी कुंठाए जन्म लेंगी ?? ये सब जब सोचती हूँ, तो तेजी से आधुनिक मन को रोकने के अतिरिक्त कोई चारा नही पाती.....!!!

cmpershad said...

`प्रेमाधार के प्रति शंकालु , ईर्ष्यालु , प्रतिस्पर्धी, स्वार्थी, कपटी,क्रोधी,अधीर होता ही है. तो क्या कहें ?? '

इसका कारण समाज के बनाए नियम हैं जो कभी प्रेम के आडे आते हैं॥

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

प्रेम पर आपका यह आख्यान बहुत सुन्दर है!

निर्मला कपिला said...

अपने बहुत अच्छे सवाल उठाये हैं मगर मुझे लगता है कि प्रेम और आस्क्ति मे फर्क है आजकल के बच्चोंण के दुआरा जो कदम उठाये जा रहे हैं वो सब प्रेम नही है कुछ जवानी की स्वाभाविक आस्क्तिवश ही उठाये जाते हैं। जो किसी से प्रेम करते हैं वो किसी को धोखा दे ही नही सकते और जिस ने सब से पहले अपने माँ बाप को धोखा दिया वो और किसी से प्रेम कैसे कर सकते हैं।
प्रेम तब तक विवादित रहेगा जब तक हम उसे केवल शादी या शारीरिक सम्बन्धों से जोड कर ही देखेंगे।अस्क्ति और प्रेम के अन्तर को नही जानेंगे। बहुत अच्छा आलेख है। धन्यवाद।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

रंजना जी, प्रेम की इतनी विस्तृत व्याख्य आपने की है कि कुछ भी नहीं बाकी रहा विवेचना के लिये. किंतु अंत में जो प्रश्न आपने पूछा है, उसका उत्तर भी अत्यंत दुरूह है. यह एक ऐसा विषय है, जिसपर सिर्फ उचित या अनुचित कहकर विचार नहीं रखा जा सकता. हर विचार वैयक्तिक ही नहीं अतिवैयक्तिक होंगे और इनको जेनेरलाइज़ भी नहीं किया जा सकता.
प्रेम का स्वरूप बहुत बदला है, प्रेमी जनों के चरित्र भी परिवर्तित हुये हैं. मैं यह नहीं कह रहा कि इनका चारित्रिक क्षरण हुआ है. रंजना जी आपके प्रश्न उचित हैं, किंतु सम्भव नहीं कि इसका कोई व्यावहारिक उत्तर खोजकर उसपर मतैक्य स्थापित किया जा सके.

Rajey Sha said...

इस सारे लेख में प्रेम की एक वि‍शि‍ष्‍ट प्रकृति‍ के बारे में लि‍खी जाने वाली एक पंक्‍ि‍त रह गई है- प्रेम को कि‍सी भी परि‍भाषा में नहीं बांधा जा सकता। और ये भी कि‍ उसके बारे में बहुत कुछ कह सुनकर भी बहुत कुछ बाकी रह जाता है। वो अचानक उतरता है और परवाह नहीं करता कि‍ आपकी पूर्व धारणाएं, समझ और मानक परि‍भाषाये क्‍या हैं।

वाणी गीत said...

समग्र रूप में जो प्रेम व्यक्ति के ह्रदय को नभ सा विस्तृत न बनाये,फलदायी सघन उस वृक्ष सा न बनाये जो अपने आस पास सबको फल और शीतल छांह देती है,जो व्यक्ति को सात्विक और उदार न बनाये,उसका नैतिक उत्थान न करे , वह प्रेम नहीं, प्रेम का भ्रम भर है....

प्रेम का यही रूप सर्वमान्य होना चाहिए ...
सहमत ...!

सूर्यकान्त गुप्ता said...

"प्रेम" वर्तमान मे अपना वास्तविक अर्थ खोता नज़र आ रहा है। आपने एकदम सही प्रसंग लिखा है। अच्छा लगा।

Kunwar Kusumesh said...

प्रेम हर उम्र के लोग अलग अलग तरह से आज की दुनिया में परिभाषित कर रहे हैं.
प्रेम तो बस समर्पण चाहता है.
अब चाहे बेटे का माँ-बाप के प्रति हो, मानव का ईश्वर के प्रति हो या पति - पत्नी का एक दूसरे के प्रति हो इत्यादि इत्यादि.
जहाँ समर्पण नहीं, वहां प्रेम नहीं.
आपने लिखा अच्छा परन्तु शायद इतनी लम्बी चौड़ी तक़रीर भी प्रेम को परिभाषित नहीं कर सकती.

कुँवर कुसुमेश
समय हो तो मेरा ब्लॉग kunwarkusumesh.blogspot.com देखें

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रेम उनके लिये सीमा नहीं हैं जो उड़ना चाहते हैं। जो मन समेटे बैठे हैं उन्हे प्रेम में भी व्यापार दिखता है।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

कह नहीं सकता कि प्रेम क्या है। हां एक शुष्क व्यापारी का चरित्र मालुम है जो प्रेम जैसे निरर्थक इमोशन में बंधना बेवकूफी मानता था।

और अन्तत: पता चला कि वह एक प्रेम में इतना ग्रस्त था कि उतनी ऊंचाई छूना सामान्य मानव के लिये सम्भव ही नहीं!

और यह व्यक्तित्व का आयाम आंधी सा लगता है। अनियंत्रित।

मनोज कुमार said...

बहुत उच्च कोटि का आलेख। इसे पढकर गुलज़ार साहब की पंक्तियां याद आ गई---

प्यार अहसास है
प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज़ नहीं
एक ख़ामोशी है, सुनती है, कहा करती है।
न यह बुझती है, न रुकती है, न ठहरी है कहीं
नूर की बूंद है, सदियों से बहा करती है।

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said...

प्रेम तो प्रेम है ....उसे कोई नाम ना दो ना ?

अभिषेक ओझा said...

सटीक लेख...
...एक समस्या दूसरी समस्या का समाधान नहीं हो सकता. और ऑनर किलिंग तो जघन्य अपराध है.

girish pankaj said...

pyar par bahut kuchh parhta rahata hu, likhata bhi hu. par aapne kamal kar diyaa. har pahaloo par dil se likha hai.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

निर्मला कपिला जी की बात महत्वपूर्ण है। प्रेम का नाम हर उस रिश्ते को नहीं दिया जा सकता जो दो विपरीत लिंगी व्यक्तियों को एक साथ रहने के लिए जोड़ देता है। उस गाँव के जिन जोड़ों का उल्लेख आपने किया है उनके बीच उस आदर्श प्रेम का सम्बंध मुझे नहीं दिखायी देता जिसका वर्णन आपने शुरू में किया है।

यह तो एक खास परिस्थिति में इनकी भौतिक मुलाकातों के दौरान उपजी यौन आसक्ति का प्रतिफलन भी हो सकता है। हमारे समाज ने जिन रिश्तों को अन्य स्वरूप में परिभाषित किया है उनमें प्रेम सम्बंध का पैदा हो जाना असम्भव तो नहीं लेकिन असामान्य जरूर है।

डॉ .अनुराग said...

विचारणीय......संतुलित .ओर सारगर्भित लेख........
वैसे हमरे एक टीचर कहा करते थे की "प्यार करने वाला युगल ही उसकी गरिमा डिसाइड करता है ...."

शोभा said...

बहुत ही अच्छा लिखा है आपने। प्रेम की विशद व्याख्या पढकर आनन्द आया। आपकी भाषा प्रभावी है।

Dorothy said...

प्रेम किसी अकिंचन अतिथि के रूप में हमारी जिंदगियों में प्रवेश करता है और हमारी स्व केंद्रित जीवनों को पूर्णतया बदल कर देता है और अधिकार जमाने की प्रवृति को मूक "अनकडीशनल समर्पण" की भाषा सिखा जाता है. बहुत सुंदर आलेख. आभार.
सादर
डोरोथी.

Manish Kumar said...

आपका ये लेख चिंतन मनन के लिए कई बिंदुओं को छोड़ता है। मनोहर श्याम जोशी के कुछ सदवचन जो मैंने कसप के दौरान पढ़े थे प्रेम के डायनमिक्स की कई रोचक निष्कर्षों से भरे थे। यहाँ हू बहू प्रस्तुत कर रहा हूँ इस बारे में कुछ और मंथन के लिए
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"प्यार वह भार है जिससे मानस-पोत जीवन सागर में संतुलित गर्वोन्नत तिर पाता है। इस भार के लिए छोड़े गये स्थान की पूर्ति हम यथाशक्य अपने प्रति अपने प्यार से करते हैं किंतु कुछ स्थान फिर भी बच रहता है। इसे कैसे भी, किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार के प्रति प्यार से भरा जाना जरूरी है, भरा जाता भी है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए हम किसी अज्ञात, अनाम तक से भी प्यार कर सकते हैं! "

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प्रेम जब ये चाहने लगे कि मैं अपने प्रिय को एक नए आकार में ढाल लूँ, प्रेम जब ये कल्पना करने लगे कि वह जो मेरा प्रिय है, मिट्टी का बना है ओर मैं उसे मनचाही आकृति दे सकता हूँ...अलग अलग कोणों से मिट्टी सने हाथों वाले किसी क्षण परम संतोष को प्राप्त हो सकता हूँ, तब प्रेम, प्रेम रह जाता है कि नहीं, इस पर शास्त्रार्थ की परम संभावना है।"

रश्मि प्रभा... said...

prem ke vibhinn ayaam... bahut hi achha likha hai

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

प्रेम के विषय पर इतने विचार.... आपने प्रवाह कैसे बनाकर रखा ...? कमाल है रंजना जी
शब्द चयन भी खूब ..... प्रेम के कई रूपों को समेटे सारगर्भित अभिव्यक्ति

निर्झर'नीर said...

प्रेम पाश में आबद्ध प्रेमी युगल प्रेम के प्रथम चरण में परस्पर एक दूसरे में सब कुछ आलौकिक देखता है.जो वास्तव में सामने वाले में रंचमात्र भी नहीं,वह भी परिकल्पित कर लेता है.

satya

maine bhi kai charchayen padhi or suni owner killing par lekin kisi se sahmat nahi ho paya .

aaj aapka lekh padhkar laga ki haan samaj mein aaj bhi aise buddhijiivi hai jo samaj ko sahi disha de sakte hai .
you r one of them

Shiv said...

बहुत ही बढ़िया पोस्ट!

यह विषय बहुत आवश्यक है. कारण यह है कि यह मनुष्य की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ मसला है. स्वतंत्र होने का मतलब यह नहीं है जो प्रोजेक्ट किया जा रहा है. स्वतंत्र होने का मतलब यह नहीं है कि प्रेमी जोड़े परिवार नामक संस्था का सत्यानाश कर दें. कोई माँ-बाप, जिन्होंने १८-१९ वर्षों तक अपने बेटियों और बेटों को पाल-पोष कर बड़ा किया है, कभी नहीं चाहेंगे कि वे या उनके परिवार वाले उनके बेटियों और बेटों की हत्या कर दें.

और फिर क्या यह केवल बेटियों और बेटों के केस में है? पिछले ३-४ महीनों में मैंने टीवी पर कम से कम तीन ऐसी घटनाएं देखीं जिसमें माँ और बाप ने प्रेम में अंधे होकर अपने छोटे-छोटे बेटियों और बेटों की हत्या कर दी. क्या इसे भी आनर किलिंग कहा जाएगा? क्या ऐसे माँ-बाप अपने ऐसे कुकृत्यों को जस्टिफाई कर सकते हैं?

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ही प्रभावी लिखा है .... प्रेम सच में एक अनुभूति है और मानव मन में जहाँ प्रेम जैसे सरल एहसास हैं वहीं क्रोध, ईर्षा, बदला और जैल्सी जैसे भाव भी हैं .... इसलिए परिस्थी अनुसार बहुत कुछ चलता रहता हैं मानव मन में .... वो कुछ हद तक प्यार ही होता है ... जहाँ तक आलोकिक प्रेम की बात है ... वो अस्थाई है .. प्रेम है ही नही .... दरअसल प्रेम की सीमाएँ होती हैं ... अपने आप बन जाती हैं ... आनर किलिंग ग़लत है गाँवों की प्रथा में बदलाव लाने की ज़रूरत है ...

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

प्रभावशाली लेखन ! सच्चा प्रेम मनुष्य के जीवन में एक ऐसा मोड़ लाता है जिससे मनुष्य सदमार्ग पे चलते हुए इश्वर तक को प्राप्त कर सकता है. ज्यादातर प्रेमी युगल का प्रेम अधूरा सा होता है, जिसमें सिर्फ एक दुसरे को पा लेना ही चरम होता है. एक-दुसरे को किसी भी कीमत पे पा लेने के बाद फिर वही अँधेरी रात ...

आज समाज द्वारा त्यज संबंधों को भी सच्चे प्रेम की संज्ञा देने की भूल कर रहे हैं हम. मनुष्य और समाज का नैतिक उत्थान ही इस समस्या का हल ढूंढ़ सकता है. वरना आधुनिकता के नाम पे नंगा नाच कर, प्रेम को गलत परिभाषित कर प्रेमी युगल ऐसे ही भागते रहेंगे और "आनर किलिंग" के समर्थक उन्हें ढूंढ़-ढूंढ़ कर मारकर अपनी विजय साबित करते रहेंगे.

डॉ. नूतन - नीति said...

बहुत अद्दभुत लेख .. प्रेम का इतना सुन्दर विश्लेषण .. बधाई इस सुन्दर लेख के लिए..

arun c roy said...

सही है प्रेम का कोई नियम नही होता। ये जब होता है तो बस हो जाता है। ... अद्दभुत लेख

unkavi said...

hai pahalee baarishon kee sondhi si mahak jaisaa,
jadon ki dhoop jaisaa ye pyaar kaa jadoo hai.

aur samaaj kee sweekaaryataa par kahnaa chahoongaa ki.

alag har simt se dikhataa hai manzar,
nazariyaa hai galat kyaa aur sahee kyaa.

aapkaa lekh man ko mathne kee chamataa rakhtaa hai.
meri gazal kee prasanshaa hetu dhanyawaad.

जयकृष्ण राय तुषार said...

very nice ranjanaji badhai

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

वाह रंजना जी!
आप तो कमाल का लिखती हैं !
आपके ब्लॉग पर आकर बहुत ही अच्छा लगा !
अब तो आना जाना लगा ही रहेगा !
सादर ,
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

रंजना जी,
आपने प्रेम को उसकी गहनता में पकड़ा है। एक अत्यंत सारगर्भित आलेख जिसमें आपने विषयानुकूल भाषा को भी बख़ूबी साध लिया। बधाई...!

और हाँ... आपने जहाँ-जहाँ ‘श्रृष्टि’ शब्द का प्रयोग किया, वहाँ ‘सृष्टि’ होना चाहिए था। इसे अन्यथा न लें, ग़लतियाँ तो किसी से भी हो सकती हैं...मैं भी बहुत करता हूँ!

जयकृष्ण राय तुषार said...

bahut sundar post deepavali ki shubhkamnayen

श्यामल सुमन said...

एक सार्थक और समसामयिक चिन्तन - यह सच है कि यह दुबिया ही प्रेममय है - प्रेम से बाहर कुछ नहीं - लेकिन उसकी भी निर्धारित सीमाएं हैं - वर्जनाएं हैं - जिसे तोड़ा जाना समाज के हित में बहीं। जितने भी मानदणड तय किए गए हैं - तथाकथित "प्रेम" की जो वर्जनाएं हैं - वह हजारों बर्षों के शोध का ही परिणाम है - लेकिन पश्चिमी बहाव में बहने की जिसे ललक हो - समझाना भी कठिन है - हाँ वक्त उसे वक्त पर सीख जरूर देगा।

नैसर्गिक प्रेम तो -

आये पतंगा बिना बुलाये कैसे दीप के पास
चिन्ता क्या परिणाम की उसको पिया मिलन की आस
जिद है मिलकर मिट जाने की यह कैसा अनुराग
प्रियतम प्रेम है दीपक राग

लेकिन आज प्रेम को सामान्यतया देह की भाषा में ही समझने पर जोर है - तभी तो-

जिन्दगी तो बस मुहब्बत और मुहब्बत जिन्दगी
तब सुमन दहशत में जीकर हाथ क्यों मलता रहा

अनन्त शुभकामनाएं बहन रंजना।

सादर
श्यामल सुमन
www.manoramsuman.blogspot.com

M VERMA said...

प्रेम पाश में आबद्ध प्रेमी युगल प्रेम के प्रथम चरण में परस्पर एक दूसरे में सब कुछ आलौकिक देखता है.'
आपके लेखन ने प्रेम के सभी पक्षो को रेखांकित किया है.
सुन्दर और सार्थक

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

रंजना जी, आपकी बात पर इब्ने इंशा के शब्द याद आये:
हैं लाखों रोग ज़माने में, क्यों इश्क़ है रुसवा बेचारा।
हैं और भी वजहें वहशत की, इन्सान को रखतीं दुखियारा॥

सच तो यह है कि किसी व्यक्ति या वस्तु को अपना बनाने की चाहत प्रेम नहीं है सिर्फ अधिकार जताने की भावना है। इसी नासमझी के कारण प्रेम बदनाम भी होता है और गलत भी समझा जाता है। बात लम्बी है, थोडे को बहुत समझियेगा, आभार

करण समस्तीपुरी said...

प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय !
राजा परजा जाहि रुचे, शीश देई लै जाय !!

जा घट प्रेम न संचरै, सोइ मरघट के समान !
जैसे खाल लोहार की, सांस लेत बिनु प्राण !!

प्रेम का प्रभाव,
लाली मेरे लाल की जित देखूं, तित लाल !
लाली देखन मैं चली, मैं भी हो गयी लाल !!

क्योंकि,
प्रेमगली अति सांकरी जा मे दुई न समाई !

सच कहा है आपने, प्रेम में व्यक्ति का ब्रह्मांड से एकाकार हो जाता है. बहुत ही सारगर्भित विवेचन है. साधुवाद !!!

ZEAL said...

prem par ek sukhad charcha. -- aabhar.

गिरीश बिल्लोरे said...

कैसे मुक्त हों हम
ताज़ा पोस्ट विरहणी का प्रेम गीत

सतीश सक्सेना said...

इस विषय पर बहुत अच्छा आलेख !
आपको शुभकामनायें

Vijai Mathur said...

पढ़े जो ढाई आखर प्रेम का सो पंडित होए,कह कर कबीर दास जी ने जो कहा वही प्रेम है.जिन घटनाओं का उल्लेख है वे तो प्रेम नहींहैं -वासना एवं अपराध हैं.