28.8.17

आरक्षण

बड़े आराम से यह कहा जा सकता है कि लालू मुलायम मायावती से लेकर जातिवादी राजनीति करते अपनी व्यक्तिगत दुकान चलाने वाले आरक्षण पैरोकारों से लेकर नवोदित "हार्दिक पटेल" जैसे लोगों तक की रैलियों में जो विशाल भीड़ उमड़ती है,वह भाड़े की होती है...
लेकिन मुझे लगता है यह सत्य से मुँह मोड़ना होगा।
देशतोड़कों द्वारा लाख पैसे फूँके जाएँ, मिडिया कवरेज दे,,फिर भी उस हुजूम में सारे सेट किये ही लोग होते हैं,यह नहीं कह सकते हम।जेनुइन लोग होते हैं इसमें यह मानना होगा..और जब हम यह मानेंगे,तभी उन मूल कारणों तक भी पहुँच पाएँगे और समाधान की दिशा में बढ़ पाएँगे।

स्कूल कॉलेज में बच्चों का एडमिशन करवाना हो,रेलवे टिकट कटवाना हो,मंदिर में भगवान का दर्शन करना हो या जीवन के किसी भी क्षेत्र में,जहाँ भारी भीड़ हो और अवसर कम हो,यह निश्चितता न हो कि अवसर मिलेगा हमें, क्यू में स्वेच्छा और निश्चिंतता से खड़ा होना चाहते हैं क्या हम?कभी भी,कहीं भी, सही गलत कुछ भी करते, अगर शार्ट कट मिल रहा हो,हममें से कितने हैं ज अपना लोग संवरण कर पाते हैं?121 करोड़ की आबादी में 8-10 हजार लोग बमुश्किल निकल पाएँगे जो अगर उसके अगल बगल के सभी लोग सुविधा/ सिस्टम का बेजा इस्तेमाल भी कर रहे हों तो अपना ईमान पकड़ कर रखते हैं और मुफ़्त मिल रही अन्हक सुविधा को भीख और आत्मसम्मान पर ठेस समझते हैं?

तो कुल मिलाकर बात यह हुई कि पिछले दशकों में सत्तासीनों ने देश का जो चारित्रिक संस्कारण किया है,मुफ्तखोरत्व,निकम्मेपन और बेशर्मी को उस स्तर पर पहुँचा दिया है जिससे कुछ वर्षों में समझा बुझा कर तो नहीं हटाया जा सकता,,तो इसके लिए सुप्रीम कोर्ट को ही आगे बढ़ स्वतः संज्ञान लेते एक बड़ा वाला झाड़ू चलाते सारे ही आरक्षणों को इस आधार पर रद्द करे कि -
*इससे समूहों के बीच वैमनस्यता फैलती है
*प्रतिभावान का हक़ मारा जाता है और अयोग्य लोग अंततः देश की प्रगति में बाधक होते हैं
* कुछ ही परिवारों के पुश्त दर पुश्त आरक्षण मलाई का भक्षण करते फूलते फलते हैं और जो पिछड़े हैं,पिछड़ते ही चले जाते हैं।
अतः यह प्रत्येक दृष्टि से देश की एकता अखंडता,प्रत्येक नागरिकों के लिए सामान अधिकार के समदृष्टिमूलक मूल सिद्धांत के विरुद्ध और प्रगति का बाधक है..और इसका अंत आवश्यक है।
इसके स्थान पर बिना किसी भेदभाव के देश के बड़े छोटे अमीर गरीब सभी नागरिकों के लिए शिक्षा की एक व्यवस्था(सरकारी स्कूलों में सभी सरकारी मुलाजिमों को अपने बच्चों को पढ़वाने की जैसी व्यवस्था अभी इलाहाबाद हाई कोर्ट ने की)हो,प्रतिभा/योग्यता ही एकमात्र आधार आगे बढ़ने का हो।आर्थिक रूप से वंचित वर्ग की उन कठिनाइयों को दूर किया जाय जो उन्हें भोजन संधान में लिप्त रखते शिक्षा से दूर रखते हैं।

14.7.17

जागो ग्राहक जागो


साधु", शब्द सुनते ही हमारे मानस पटल पर औचक जो चित्र उभरता है,वह कटोरा लिए दरवाजे पर खड़े गेरुआधारी भिखारी का या फिर आँखें मूँदे बैठे माला जपते व्यक्ति का होता है।
वैसे तो कुछ 'तथाकथित' लघु गुरु साधुओं के कु-कृत्यों ने और बाकी बची कसर सेकुलर बुद्धिजीवियों के दुष्प्रचारों ने पूरी करते पिछले दशकों में साधुओं की वह छवि बना डाली है, कि इनके झोले में डालने को जनसाधारण के पास संशय घृणा और तिरस्कार रूपी भाव भिक्षा के अतिरिक्त शायद ही कुछ अच्छा बचा है।

ऐसे में किसी गेरुआधारी बाबा को घी तेल सौंदर्य प्रसाधनों से लेकर दैनिक उपयोग की अन्यान्य वस्तुओं के उत्पादक/विक्रेता रूप में कोई कैसे बर्दाश्त कर ले? सो, अपने देश में एक बड़ी संख्या उन लोगों की है,जो पतञ्जलि के प्रॉडक्ट्स केवल इसलिए नहीं खरीदते या बाबाजी से घृणा इसलिए करते हैं कि एक गेरुआधारी साधु भीख माँगना और धूनी रमाना छोड़ सामान क्यों बेच रहा, वह ऐसा कैसे कर सकता है? 
निष्कर्ष - वह ढोंगी है!!!

मेड इन चाइना,जापान,अमेरिका,रशिया,, और तो और पाकिस्तान भी,,के उत्पाद आप सहर्ष खरीदेंगे,पर बाबा वाला नहीं, क्योंकि -
" बाबा गन्दे होते हैं, या फिर बाबा ऐसे नहीं होते हैं"(बचपन से दिमाग में बैठायी गयी बात)।इससे क्या कि सतयुग त्रेता आदि में कोई भी वैज्ञानिक/अविष्कारक गेरुआधारी तपस्वी "साधक/साधु" ही होता था, अस्त्र निर्माण से लेकर इतिहास भूगोल ज्योतिष साहित्य भवन निर्माण विशेषज्ञ और कामयोग तक के सिद्धांतों के प्रतिपादक और इनसे सम्बद्ध उत्पादों के उत्पादन भी इन्हीं की देखरेख में होते थे।
इनके सम्मुख राजसत्ता नतमस्तक रहती थी,जनसाधारण की तो बात ही क्या।
पर सही है, यह वह काल नहीं,,,कल-युग है।जिसमें हम प्रोग्रेसिव हैं और हमारी प्रोग्रेसिवनेस तथा सेकुलरिज्म हमें साधुओं को सम्मान देने से ख़ारिज होती है।

अरे भैया, आप एक उपभोक्ता हैं।आपका प्रथम कर्तब्य अपनी जेब को और फिर उत्पाद की गुणवत्ता को देखना तौलना है। हाँ, कोई दूसरा देश जो भारत को हानि पहुँचा रहा हो,राष्ट्रसेवा के तहत उस देश के वस्तुओं का बहिष्कार कर सकते हैं, जैसे कभी भारत भर में मैनचेस्टर के कपड़ों की होली जला कर की गई थी या अभी हाल ही में लोगों ने अमेज़न की बैंड बजायी थी।

बाबा बोली से हल्के हैं,व्यक्तित्व में भी वह बात नहीं कि स्मरण ही नतमस्तक कर दे,,यह मेरी भी व्यक्तिगत राय है।लेकिन यह तो आपको मानना ही पड़ेगा कि स्वदेशी आंदोलन या योग के प्रचार प्रसार में,इनके प्रति जनस्वीकार्यता बढ़ाने में, बाबा ने जो भूमिका निभायी है, वह अपने आप में अभूतपूर्व है।वरना तो ये दोनों ही सदियों से भारत में रहे हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन में तो लड़ाई का एक प्रमुख हथियार ही स्वदेशी आन्दोलन रहा था। लेकिन उसके बाद से तो लगातार लोगों का वह ब्रेनवाश हुआ कि अंग्रेज,अँग्रेजी और उनके सामान ही श्रेष्ठ और विश्वसनीय होते हैं,यह स्थापित हो गया। चाहे वे अपने कुत्तों वाला साबुन आपके स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम बताते आपको पकड़ा दें या अपने देश का भूसा भूसी हेल्थ ड्रिंक कहते आपको पिला दें या फिर टॉयलेट क्लीनर को शॉफ्ट कोल्ड ड्रिंक कहते उसको आपका प्रिय पेय बना दें, आप पूरी श्रद्धा विश्वास से उसे ग्रहण कर लेंगे।

विकसित देश की श्रेणी में आने को अकुलाए हे भारतवासियों,,कृपया पूर्वाग्रहों से मुक्त होइए।
"जागो,ग्राहक जागो" 
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