इस संसार में कोई भी शब्द अपने आप में पूर्ण नहीं होता..शब्द को पूर्णता या अर्थ तो उसमे निहित उद्देश्य देते हैं, चाहे सत्य, अहिंसा, स्नेह ,शांति, करुणा, क्षमा आदि जैसे असंख्य सकारात्मक शब्द हों या क्रोध, हिंसा, दंड, घृणा, असत्य आदि आदि असंख्य नकारात्मक शब्द.
एक बार एक वृद्ध साधु अपने युवा शिष्य के साथ कहीं जा रहे थे.जेठ का महीना था और दोपहर का समय. गुरु शिष्य दोनों ही प्यास से विकल हो रहे थे..मार्ग में एक स्थान पर उन्हें एक कुआँ दिखा, जिसमे से एक स्त्री जल भर रही थी.गुरु निकट ही एक वृक्ष की छाँव में बैठ गए और शिष्य से उस स्त्री से जल मांग लाने को कहा. शिष्य उस स्त्री के पास गया और उससे जल की याचना की. स्त्री ने जल से भरी कलसी शिष्य को दे दी और जल पी पिलाकर कलसी वापस ला देने को कहा.शिष्य ने वैसा ही किया. आभार व्यक्त कर कलसी वापस दे, जैसे ही शिष्य वापस आने को मुड़ा, कि उसने स्त्री की चित्कार सुनी. पलटकर उसने देखा, तो देखा कि उस स्त्री का पैर फिसल गया है और वह मुंडेर को पकड़ कुएं में लटकी भयभीत सहायता को गुहार लगा रही है..
शिष्य रक्षा हेतु पलटा तो अवश्य, परन्तु मुंडेर के निकट पहुँच वह सोच में पड़ गया कि उस स्त्री की सहायता करे तो कैसे करे, क्योंकि कठोर ब्रह्मचर्य व्रतधारी वह जीवन भर किसी भी स्त्री का स्पर्श न करने को वचनबद्ध था.. इधर ऊहापोह में पड़ा वह शिष्य जबतक खडा सोचता रहा वह स्त्री कुँए में गिर गयी..वृद्ध गुरूजी ने यह देखा तो झपटकर कुएं के निकट पहुंचे और कुएं में कूद उस स्त्री को बाहर निकाल उन्होंने उसके प्राण बचाए..
स्त्री जब कुछ स्वस्थ हुई तो गुरु जी ने शिष्य की जमकर धुनाई की, कि जिस स्त्री ने उन्हें जल पिलाकर उनके ऊपर इतनी कृपा की, कृतघ्न शिष्य ने अपने प्राण के भय से उसे बचाने का प्रयास नहीं किया...अब निरीह शिष्य पिटते हुए सोच रहा था कि जिस गुरु ने मुझसे आजन्म स्त्री का स्पर्श न करने का वचन लिया था और जो स्वयं भी बाल ब्रह्मचारी थे, उन्होंने न केवल स्वयं स्त्री का स्पर्श किया अपितु उसे स्पर्श न करने पर दण्डित भी किया.
स्त्रीस्पर्श वर्जना तो स्त्री के भोग के लिए थी..शिष्य यदि यह सार ग्रहण कर पाता तो न तो उस स्त्री के जान पर बनती और न किसी के प्राण न बचा पाने तथा कृतघ्नता का दोष उसपर लगता..थोथे अर्थग्रहण ने उसे इतना भ्रमित कर रखा था कि कीडे मकोडे के भी प्राणों की रक्षा करने वाला वह शिष्य परिस्थितिनुकूल अपना करणीय स्थिर न कर पाया.
इसी प्रकार एक बार किसी नगर में नीरव रात्रि बेला में कुछ हत्यारे एक युवक का पीछा करते हुए उसके पीछे दौडे जा रहे थे. वह युवक उन्हें चकमा दे निकटस्थ ही एक घर में जा घुसा जो कि एक शिक्षक का था. शिक्षक कठोर सिद्धांतवादी और सत्यवादी थे. स्वयं भी सत्य बोलते थे और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करते थे. आतंकित उस युवक ने उन्हें अपनी वस्तुस्थिति बताई और उनसे आग्रह किया कि यदि वे हत्यारे उसे ढूंढते वहां आ जाएँ तो वे उनसे उसके बारे में कुछ न बता उसकी प्राणों की रक्षा करें..इतना कह युवक उनके पलंग के नीचे छुप गया.
हत्यारे जब उस युवक की खोज में उनके घर पहुंचे और उनसे उसके विषय में पूछा, तो कुछ पल को तो शिक्षक महोदय को लगा कि इस समय सत्य बोलने से अधिक आवश्यक शरणागत की रक्षा करना है परन्तु फिर उन्हें लगा कि यही तो परीक्षा का समय है..इस कठिन समय में भी यदि उन्होंने सत्य का साथ नहीं छोडा तभी तो सत्य की विजय होगी और इसके साथ ही उस युवक को भी सत्य बोलने का पाठ वे पढ़ा सकेंगे..सो उन्होंने युवक के बारे में हत्यारों को बता दिया..फिर क्या था अविलम्ब हत्यारों ने उस युवक को बाहर निकाल उसकी हत्या तो की ही, इसे गोपनीय रखने तथा साक्ष्य छुपाने को उन शिक्षक महोदय की भी हत्या कर दी.
जो सत्य के मार्ग पर चलना चाहते हैं उनके सम्मुख ऐसी भ्रम तथा शंशय की स्थिति बहुधा ही जीवन में उपस्थित हो जाया करती है,जिसमे बड़ी ही कुशलता पूर्वक यह निर्णीत करना पड़ता है कि सही गलत करणीय अकरणीय क्या है.. किसी की हत्या करना यदि महापाप है तो हत्यारे की हत्या न्यायसंगत मानी जाती है..वस्तुतः शब्दों के वास्तविक अर्थ उसके प्रयोग पर ही निर्भर करते हैं और सार्थक प्रयोग या सार्थक निर्णय हेतु विवेक को प्रखर करना अति आवश्यक है.. मानवमात्र में नैसर्गिक रूप से विवेक रुपी सामर्थ्य विद्यमान रहती है और चाहे संसार का क्रूरतम अपराधी मनोवृत्ति वाला मनुष्य ही क्यों न हो,अपराध से पूर्व एक बार उसका विवेक उसे सही गलत का भान अवश्य कराता है,भले वह उसकी आवाज को अनसुना कर दे..
परन्तु विवेक रूपी इस प्रहरी, अपरिमित सामर्थ्य को जाग्रत और प्रखर करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति सकारात्मकता से अधिकाधिक जुड़ा रहे और उसके निर्देशों को सुने और तदनुरूप चले. जो व्यक्ति आत्मा/विवेक के निर्देशों की जितनी अवहेलना करता है, उसका विवेक उतना ही सुप्तावस्था को प्राप्त होता जाता है.विवेक जागृत और प्रखर होने के लिए किसी वैधानिक शिक्षा या विशेष शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं होती. यह तो जन्म के बाद ही जैसे जैसे व्यक्ति में देखने सुनने समझने की शक्ति का विकास होता जाता है अपने आस पास सामाजिक संरचना में स्थित सही गलत की व्यवस्था को देखकर और आभास कर वह सब सीख जान लेता है.व्यक्ति यदि अपनी परिस्थिति या रूचिवस् गलत अनैतिक कर भी रहा होता है तो उसे इसका भान अवश्य होता है, भले अपने मन को विभिन्न तर्कों द्वारा वह समझा ले और स्वयं को निर्दोषता का प्रमाण पत्र दे दे..
मन मस्तिष्क से जो व्यक्ति जितना स्वस्थ और सबल होगा उसमे उचित अनुचित सोचने समझने की क्षमता उतनी ही अधिक होगी, विवेक उतना ही जागृत प्रखर होगा..अब बात है कि मानसिक स्वास्थ्य का निर्णय हम कैसे करें ??? तो इसके लिए हमें स्वयं से ही ये प्रश्न पूछने होंगे और निर्णय करना होगा कि हम स्वयं को कहाँ देखते हैं..क्योंकि इन्ही प्रश्नों के सार्थक उत्तर हमें बता सकते हैं कि हम सकारात्मकता से कितने जुड़े हैं और फलतः हमारा विवेक कितना परिपुष्ट है ...
१. सत्साहित्य, सात्विक संगीत से हमें कितनी अभिरुचि है और यह हमें कितना आनंदित करती है ?
२. प्रकृति का नैसर्गिक सौन्दर्य हमें कितना आह्लादित करता है ?
३. बिना किसी अपेक्षा के तन मन धन से किसी का हित कर हमें कितना आनंद प्राप्त होता है ?
४. अपने आस पास सबको प्रसन्न देखना कितना सुहाता है ?
५. आध्यात्मिकता से जुड़ना कितना रुचता है ?
६. सात्विक आहार (विशेषकर शाकाहार) और विहार (अनुशाषित दिनचर्या) कितना सुखद लगता है ?
6. अपनी की हुई गलतियाँ कितने समय तक याद रखते हैं और इसके लिए स्वयं को दण्डित करते हैं या नहीं ?
7. दूसरों के किये उपकार को अधिक याद रखते हैं या अपकार को ?
8. रोजमर्रा में कितने निर्णय आवेश ( दुःख, हर्ष, क्रोध, भावुकता इत्यादि ) के अतिरेक में लिया करते हैं ?
9. दूसरों के विचारों को धैर्य पूर्वक सुनने में विश्वास रखते हैं या सुनाने में ?
10. जीवन के लिए धन को कितना महत्वपूर्ण मानते हैं ?
सभी प्रश्नों के लिए दस अंक निर्धारित करें और एक से दस के स्केल में अपनी उत्तर को रेखांकित कर सम्पूर्ण प्रश्नावली के उत्तर में प्राप्तांक जोड़ कर देखें . आपके मानसिक स्वास्थ्य का पैमाना आपके सामने होगा. अधिक पूर्णांक अधिक स्वस्थ मस्तिष्क का परिचायक होगा और न्यूनतम अंक दुर्बलता का और सबसे बड़ी बात ये ही वे सकारात्मक साधन भी हैं जिनसे जुड़ हम अपने अपने सामर्थ्य को बढा सकते हैं..
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12.11.09
27.10.09
क्षमादान !!!
जन्मगत हों या स्वनिर्मित, ह्रदय से गहरे जुड़े सम्बन्ध, हमें जितना मानसिक संबल और स्नेह देने में समर्थ होते हैं,जितना हमें जोड़ते हैं, कभी वे जाने अनजाने ह्रदय को तीव्रतम आघात पहुंचा कर हमें तोड़ने में भी उतने ही प्रभावी तथा सक्षम हुआ करते हैं. स्वाभाविक है कि जो ह्रदय के जितना सन्निकट होगा, प्रतिघात में भी सर्वाधिक सक्षम होगा. कई बार तो अपनों के ये प्रहार इतने तीव्र हुआ करते हैं कि उसका व्यापक प्रभाव जीवन की दशा दिशा ही बदल दिया करते हैं, सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही कुंठाग्रस्त हो जाया करता है. जीवन भर के लिए व्यक्ति इस दंश से मुक्त नहीं हो पाता और फिर न स्वयं सुखी रह पाता है न ही अपने से जुड़े लोगों को सुख दे पाता है.
हमारी एक परिचिता हैं, वे एक नितांत ही खडूस महिला के रूप में विख्यात या कहें कुख्यात हैं.सभी उनकी प्रतिभा का लोहा मानते हैं,परन्तु उनसे घनिष्टता बढ़ाने को कोई भी उत्सुक नहीं होता..लगभग पचपन वर्ष की अविवाहिता हैं,उच्च पद पर आसीन हैं,धन की कमी नहीं..फिर भी न जाने किस अवसाद में घुलती रहती हैं. पूरा संसार ही उन्हें संत्रसक तथा अपना शत्रु लगता है. अपने अधिकार के प्रति अनावश्यक रूप सजग रह कर्तब्यों के प्रति सतत उदासीन रहती हैं.बोझिल माहौल उन्हें बड़ा रुचता है जबकि अपने आस पास किसी को हंसते चहकते देखना कष्टकर लगता है..
परिचय के उपरांत पहले पहल तो मुझे भी उनसे बड़ी चिढ होती थी,पर बाद में जब उनसे निकटता का अवसर मिला तो शनै शनै मेरे सम्मुख उनके व्यक्तित्व की परतें खुलने लगी.उनसे बढ़ती हुई घनिष्ठता के साथ मुझे आभास हुआ कि उनके व्यवहार में जितनी कठोरता और कटुता है,उतनी कठोर और कलुषित हृदया वो हैं नहीं..मैं उनके मन का वह कोना ढूँढने लगी जिसमे संवेदनाएं और बहुत से वे कटु अनुभव संरक्षित थे, जिसने उनके व्यक्तित्व और व्यवहार में यह विकृति दी थी..
अंतत मेरा स्नेह काम कर गया और ज्ञात हुआ कि अति प्रतिभाशाली इस महिला ने बाल्यावस्था से ही बड़े दुःख उठाये हैं..उनके रुढिवादी माता पिता ने छः पुत्रियों और एक पुत्र के बीच पुत्रियों की सदा ही उपेक्षा की.बाकी बहनों ने तो इसे अपनी नियति मान स्वीकार लिया,परन्तु अपने अधिकार के प्रति सजग, विद्रोही स्वभाव की इस महिला ने सदा ही इसका प्रतिवाद किया और फलस्वरूप सर्वाधिक प्रताड़ना भी इन्होने ही पायी..अपने अभिभावकों को अपनी इस उपेक्षा और अनादर के लिए इन्होने कभी क्षमा नहीं किया..इतना ही नहीं दुर्भाग्यवस बालपन में अपने परिचितों तथा रिश्ते के कुछेक पुरुषों द्वारा अवांछनीय व्यवहार ने इनके मन में पुरुषों के प्रति घोर घृणा का भाव भी भर दिया,जिसके फलस्वरूप इन्होने विवाह नहीं किया....इन्होने अपने प्रतिभा का लोहा मनवाने तथा स्वयं को स्थापित करने के लिए पारिवारिक तथा आर्थिक मोर्चे पर कठोर संघर्ष किया और दुर्लभ धन पद सबकुछ पाया,परन्तु अपने जीवन की कटु स्मृतियों की भंवर से वे कभी मुक्त न हो पायीं..
ऐसा नहीं कि इन परिस्थितियों से गुजरी हुई ये एकमात्र महिला हैं...आज भी अधिकांश भारतीय महिलाओं को न्यूनाधिक इन्ही परिस्थितियों से गुजरना होता है. पर इन्होने जैसे इसे दिल से लगाया, इनके व्यक्तित्व में नकारात्मकता ही अधिक परिपुष्ट हुआ.सफलता पाकर भी इनका मन सदा उदिग्न ही रहा..ये यदि अपने मन से कटुता रुपी इस नकारात्मकता को निकाल पातीं तो परिवार समाज के सम्मुख एक बहुत बड़ा अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित कर सकती थीं..स्वयं पाए उपेक्षा अनादर को कइयों में स्नेह और उदारता बाँट स्वयं भी सुखी हो सकती थीं और दूसरों को भी सुखी कर सकती थीं.ये स्थापित कर सकती थीं कि एक उपेक्षिता नारी इस समाज को क्या कुछ नहीं दे सकती है..
जब तक अपने अपनों के प्रति क्षोभ को हम अपनी स्मृतियों में, मन में जीवित पालित पोषित रखेंगे वह हमारे ह्रदय को दग्ध करती ही रहेगी और यदि प्रतिकार की अग्नि ह्रदय में जल रही हो तो सुख और शांति कैसे पाया जा सकता है..
व्यक्ति अपने जीवन में समस्त उपक्रम सुख प्राप्ति के निमित्त ही तो करता है,परन्तु चूँकि साधन को ही साध्य बना लिया करता है तो सुख सुधा से ह्रदय आप्लावित नहीं हो पाता. कितनी भी बहुमूल्य भौतिक वस्तु अपने पास हो, या पद मान प्रतिष्ठा मिल जाए, यदि मन शांत न हो, मन कर्म और वचन से दूसरों को सुख न दे पायें तो मन कभी सच्चे सुख का उपभोग न कर पायेगा....
जीवन है तो उसके साथ घात प्रतिघात दुर्घटनाएं तो लगी ही रहेंगी...लेकिन इसीके के मध्य हमें उन युक्तियों को भी अपनाना पड़ेगा जो हमारे अंतस के नकारात्मक उर्जा का क्षय कर हममे सकारात्मकता को परिपुष्ट करे, ताकि हम अपने सामर्थ्य का सर्वोत्तम निष्पादित कर पायें...दुर्घटनाओं को हम भले न रोक पायें पर दुःख और कष्ट से निकलने के मार्ग पर हम अवश्य ही चल सकते हैं..और सच मानिये तो ऐसे मार्गों की कमी नहीं...
ईश्वर की अपार अनुकम्पा से मेरी स्वाभाविक ही रूचि रही है कि सोच को सकारात्मक बनाने में सहायक जो भी युक्तियाँ जानने में आयें उन्हें जानू, समझूं और इसी क्रम में एक बार जब रेकी का प्रशिक्षण ले रही थी,हमारी गुरु ने हमें एक महिला की तस्वीर दिखाई और उनके विषय में बताया कि उक्त महिला बाल्यावस्था से ही गंभीर रूप से मस्तिष्क पीडा से व्यथित थीं..इसके साथ ही बहुधा ही वे अवचेतनावास्था में अत्यंत उग्र हो किसी को जान से मारने की बात कहा करती थीं..उनके अभिभावकों ने उनका बहुत इलाज कराया पर कोई भी चिकित्सक उनके रोग का न तो कारण बता पाया और न ही उसका प्रभावी निदान हो पाया..
विवाहोपरांत उनके पति ने भी अपने भर कोई कोर कसर न छोडी उनकी चिकित्सा करवाने में, पर सदा ढ़ाक के तीन पात ही निकले..अंततः उन्होंने कहीं रेकी के विषय में सुना और इसके शरण में आये..कुछ महीनो के चिकित्सा के उपरांत ही बड़े सकारात्मक प्रभाव दृष्टिगत होने लगे. तब अतिउत्साहित हो इन्होने स्वयं भी रेकी का प्रशिक्षण लेना आरम्भ किया. आगे बढ़कर एक यौगिक क्रिया के अर्न्तगत जब इन्होने पूर्वजन्म पर्यवेक्षण कर अपने रोग के कारणों तक पहुँचने का प्रयास किया तो इन्हें ज्ञात हुआ कि कई जन्म पूर्व इनके पति ने किसी अन्य महिला के प्रेम में पड़ इनके संग विश्वासघात किया और धोखे से इनके प्राण लेने को इन्हें बहुमंजिली भवन के नीचे धकेल दिया..अप्रत्याशित इस आघात से इनका ह्रदय विह्वल हो गया और इनके मन में प्रतिशोध की प्रबल अग्नि दहक उठी..मृत्युपूर्व कुछ क्षण में ही इन्होने जो प्रण किया था कि विश्वासघाती अपने पति से वे अवश्य ही प्रतिशोध लेंगी और उसे भी मृत्यु दंड देंगी, वह उनके अवचेतन मष्तिष्क में ऐसे संरक्षित हो गया कि कई जन्मो तक विस्मृत न हो पाया..और ऊंचाई से गिरने पर सिर में चोट लगने से इन्हें जो असह्य पीडा हुई ,वह भी जन्म जन्मान्तर तक इनके साथ बनी रही....
क्रिया क्रम में गुरु ने इन्हें आदेश दिया कि जिस व्यक्ति ने इनके साथ विश्वासघात किया ,उसे ये अपने पूरे मन से क्षमादान दे स्वयं भी मुक्त हो जाएँ और उसे भी मुक्त कर दें..सहज रूप से तो इसके लिए वे तैयार न हुयीं ,पर गुरु द्वारा समझाने पर उन्होंने तदनुरूप ही किया..और आर्श्चय कि इस दिन के बाद फिर कभी उन्हें मस्तिष्क पीडा न हुई और न ही मन में कभी वह उद्वेग ही आया...आगे जाकर उक्त महिला ने रेकी में ग्रैंड मास्टर तक का प्रशिक्षण लिया और असंख्य लोगों का उपचार करते हुए अपने जीवन को समाजसेवा में पूर्णतः समर्पित कर दिया...
सुनने में यह एक कथा सी लग रही होगी,परन्तु यह कपोल कल्पित नहीं..मैंने स्वयं ही अपने जीवन में इसे सत्य होते देखा है.कुछेक दंश जो सदा ही मुझे पीडा दिया करते थे,मैंने इस क्रिया के द्वारा पीडक को क्षमादान देते हुए मन स्मृति से तिरोहित करने का प्रयास किया और उस स्मृति दंश से मुक्त हो गयी..इसके बाद से तो मैंने इसे जीवन का मूल मंत्र ही बना लिया है...अब बिना यौगिक क्रिया के ही सच्चे मन से ईश्वर को साक्षी मान कष्ट देने वाले को क्षमा दान दे दिया करती हूँ और निश्चित रूप से कटु स्मृतियों, पीडा से अत्यंत प्रभावशाली रूप से मुक्ति पा जाया करती हूँ..
मेरा मानना है कि सामने वाले को सुख और खुशी देने के लिए हमें स्वयं अपने ह्रदय को सुख शांति से परिपूर्ण रखना होगा.अब परिवार समाज से भागकर तो कहीं जाया नहीं जा सकता..तो इसके बीच रह ही हमें सुखद स्मृतियों को जो कि हमें उर्जा प्रदान करती हों,संजोना पड़ेगा और दुखद स्मृतियाँ जो हमें कमजोर करे हममे नकारात्मकता प्रगाढ़ करे,उससे बचना पड़ेगा..सकारात्मक रह ही हम अपनी क्षमताओं का अधिकाधिक सदुपयोग कर सकते हैं..
क्षमादान से वस्तुतः दूसरों का नहीं सबसे अधिक भला अपना ही होता है.जब तक दुखद स्मृतियाँ अपने अंतस में संरक्षित रहती हैं,वे हमारे सकारात्मक सोच को बाधित करती है,हमें सुखी नहीं होने देती..सच्चे सुख की अभिलाषा हो तो उन सभी साधनों को अंगीकार करना चाहिए,जो हमारी नकारात्मकता न नाश करती हो.व्यक्ति में अपरिमित प्रतिभा क्षमता होती है,जिसका यदि सकारात्मक उपयोग किया जाय तो अपने साथ साथ अपने से जुड़े असंख्य लोगों के हित हम बहुत कुछ कर सकते हैं.ऐसे जीवन का क्या लाभ यदि इसकी पूरी अवधि में हम किसी को सुख और खुशियाँ न दे पायें..
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हमारी एक परिचिता हैं, वे एक नितांत ही खडूस महिला के रूप में विख्यात या कहें कुख्यात हैं.सभी उनकी प्रतिभा का लोहा मानते हैं,परन्तु उनसे घनिष्टता बढ़ाने को कोई भी उत्सुक नहीं होता..लगभग पचपन वर्ष की अविवाहिता हैं,उच्च पद पर आसीन हैं,धन की कमी नहीं..फिर भी न जाने किस अवसाद में घुलती रहती हैं. पूरा संसार ही उन्हें संत्रसक तथा अपना शत्रु लगता है. अपने अधिकार के प्रति अनावश्यक रूप सजग रह कर्तब्यों के प्रति सतत उदासीन रहती हैं.बोझिल माहौल उन्हें बड़ा रुचता है जबकि अपने आस पास किसी को हंसते चहकते देखना कष्टकर लगता है..
परिचय के उपरांत पहले पहल तो मुझे भी उनसे बड़ी चिढ होती थी,पर बाद में जब उनसे निकटता का अवसर मिला तो शनै शनै मेरे सम्मुख उनके व्यक्तित्व की परतें खुलने लगी.उनसे बढ़ती हुई घनिष्ठता के साथ मुझे आभास हुआ कि उनके व्यवहार में जितनी कठोरता और कटुता है,उतनी कठोर और कलुषित हृदया वो हैं नहीं..मैं उनके मन का वह कोना ढूँढने लगी जिसमे संवेदनाएं और बहुत से वे कटु अनुभव संरक्षित थे, जिसने उनके व्यक्तित्व और व्यवहार में यह विकृति दी थी..
अंतत मेरा स्नेह काम कर गया और ज्ञात हुआ कि अति प्रतिभाशाली इस महिला ने बाल्यावस्था से ही बड़े दुःख उठाये हैं..उनके रुढिवादी माता पिता ने छः पुत्रियों और एक पुत्र के बीच पुत्रियों की सदा ही उपेक्षा की.बाकी बहनों ने तो इसे अपनी नियति मान स्वीकार लिया,परन्तु अपने अधिकार के प्रति सजग, विद्रोही स्वभाव की इस महिला ने सदा ही इसका प्रतिवाद किया और फलस्वरूप सर्वाधिक प्रताड़ना भी इन्होने ही पायी..अपने अभिभावकों को अपनी इस उपेक्षा और अनादर के लिए इन्होने कभी क्षमा नहीं किया..इतना ही नहीं दुर्भाग्यवस बालपन में अपने परिचितों तथा रिश्ते के कुछेक पुरुषों द्वारा अवांछनीय व्यवहार ने इनके मन में पुरुषों के प्रति घोर घृणा का भाव भी भर दिया,जिसके फलस्वरूप इन्होने विवाह नहीं किया....इन्होने अपने प्रतिभा का लोहा मनवाने तथा स्वयं को स्थापित करने के लिए पारिवारिक तथा आर्थिक मोर्चे पर कठोर संघर्ष किया और दुर्लभ धन पद सबकुछ पाया,परन्तु अपने जीवन की कटु स्मृतियों की भंवर से वे कभी मुक्त न हो पायीं..
ऐसा नहीं कि इन परिस्थितियों से गुजरी हुई ये एकमात्र महिला हैं...आज भी अधिकांश भारतीय महिलाओं को न्यूनाधिक इन्ही परिस्थितियों से गुजरना होता है. पर इन्होने जैसे इसे दिल से लगाया, इनके व्यक्तित्व में नकारात्मकता ही अधिक परिपुष्ट हुआ.सफलता पाकर भी इनका मन सदा उदिग्न ही रहा..ये यदि अपने मन से कटुता रुपी इस नकारात्मकता को निकाल पातीं तो परिवार समाज के सम्मुख एक बहुत बड़ा अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित कर सकती थीं..स्वयं पाए उपेक्षा अनादर को कइयों में स्नेह और उदारता बाँट स्वयं भी सुखी हो सकती थीं और दूसरों को भी सुखी कर सकती थीं.ये स्थापित कर सकती थीं कि एक उपेक्षिता नारी इस समाज को क्या कुछ नहीं दे सकती है..
जब तक अपने अपनों के प्रति क्षोभ को हम अपनी स्मृतियों में, मन में जीवित पालित पोषित रखेंगे वह हमारे ह्रदय को दग्ध करती ही रहेगी और यदि प्रतिकार की अग्नि ह्रदय में जल रही हो तो सुख और शांति कैसे पाया जा सकता है..
व्यक्ति अपने जीवन में समस्त उपक्रम सुख प्राप्ति के निमित्त ही तो करता है,परन्तु चूँकि साधन को ही साध्य बना लिया करता है तो सुख सुधा से ह्रदय आप्लावित नहीं हो पाता. कितनी भी बहुमूल्य भौतिक वस्तु अपने पास हो, या पद मान प्रतिष्ठा मिल जाए, यदि मन शांत न हो, मन कर्म और वचन से दूसरों को सुख न दे पायें तो मन कभी सच्चे सुख का उपभोग न कर पायेगा....
जीवन है तो उसके साथ घात प्रतिघात दुर्घटनाएं तो लगी ही रहेंगी...लेकिन इसीके के मध्य हमें उन युक्तियों को भी अपनाना पड़ेगा जो हमारे अंतस के नकारात्मक उर्जा का क्षय कर हममे सकारात्मकता को परिपुष्ट करे, ताकि हम अपने सामर्थ्य का सर्वोत्तम निष्पादित कर पायें...दुर्घटनाओं को हम भले न रोक पायें पर दुःख और कष्ट से निकलने के मार्ग पर हम अवश्य ही चल सकते हैं..और सच मानिये तो ऐसे मार्गों की कमी नहीं...
ईश्वर की अपार अनुकम्पा से मेरी स्वाभाविक ही रूचि रही है कि सोच को सकारात्मक बनाने में सहायक जो भी युक्तियाँ जानने में आयें उन्हें जानू, समझूं और इसी क्रम में एक बार जब रेकी का प्रशिक्षण ले रही थी,हमारी गुरु ने हमें एक महिला की तस्वीर दिखाई और उनके विषय में बताया कि उक्त महिला बाल्यावस्था से ही गंभीर रूप से मस्तिष्क पीडा से व्यथित थीं..इसके साथ ही बहुधा ही वे अवचेतनावास्था में अत्यंत उग्र हो किसी को जान से मारने की बात कहा करती थीं..उनके अभिभावकों ने उनका बहुत इलाज कराया पर कोई भी चिकित्सक उनके रोग का न तो कारण बता पाया और न ही उसका प्रभावी निदान हो पाया..
विवाहोपरांत उनके पति ने भी अपने भर कोई कोर कसर न छोडी उनकी चिकित्सा करवाने में, पर सदा ढ़ाक के तीन पात ही निकले..अंततः उन्होंने कहीं रेकी के विषय में सुना और इसके शरण में आये..कुछ महीनो के चिकित्सा के उपरांत ही बड़े सकारात्मक प्रभाव दृष्टिगत होने लगे. तब अतिउत्साहित हो इन्होने स्वयं भी रेकी का प्रशिक्षण लेना आरम्भ किया. आगे बढ़कर एक यौगिक क्रिया के अर्न्तगत जब इन्होने पूर्वजन्म पर्यवेक्षण कर अपने रोग के कारणों तक पहुँचने का प्रयास किया तो इन्हें ज्ञात हुआ कि कई जन्म पूर्व इनके पति ने किसी अन्य महिला के प्रेम में पड़ इनके संग विश्वासघात किया और धोखे से इनके प्राण लेने को इन्हें बहुमंजिली भवन के नीचे धकेल दिया..अप्रत्याशित इस आघात से इनका ह्रदय विह्वल हो गया और इनके मन में प्रतिशोध की प्रबल अग्नि दहक उठी..मृत्युपूर्व कुछ क्षण में ही इन्होने जो प्रण किया था कि विश्वासघाती अपने पति से वे अवश्य ही प्रतिशोध लेंगी और उसे भी मृत्यु दंड देंगी, वह उनके अवचेतन मष्तिष्क में ऐसे संरक्षित हो गया कि कई जन्मो तक विस्मृत न हो पाया..और ऊंचाई से गिरने पर सिर में चोट लगने से इन्हें जो असह्य पीडा हुई ,वह भी जन्म जन्मान्तर तक इनके साथ बनी रही....
क्रिया क्रम में गुरु ने इन्हें आदेश दिया कि जिस व्यक्ति ने इनके साथ विश्वासघात किया ,उसे ये अपने पूरे मन से क्षमादान दे स्वयं भी मुक्त हो जाएँ और उसे भी मुक्त कर दें..सहज रूप से तो इसके लिए वे तैयार न हुयीं ,पर गुरु द्वारा समझाने पर उन्होंने तदनुरूप ही किया..और आर्श्चय कि इस दिन के बाद फिर कभी उन्हें मस्तिष्क पीडा न हुई और न ही मन में कभी वह उद्वेग ही आया...आगे जाकर उक्त महिला ने रेकी में ग्रैंड मास्टर तक का प्रशिक्षण लिया और असंख्य लोगों का उपचार करते हुए अपने जीवन को समाजसेवा में पूर्णतः समर्पित कर दिया...
सुनने में यह एक कथा सी लग रही होगी,परन्तु यह कपोल कल्पित नहीं..मैंने स्वयं ही अपने जीवन में इसे सत्य होते देखा है.कुछेक दंश जो सदा ही मुझे पीडा दिया करते थे,मैंने इस क्रिया के द्वारा पीडक को क्षमादान देते हुए मन स्मृति से तिरोहित करने का प्रयास किया और उस स्मृति दंश से मुक्त हो गयी..इसके बाद से तो मैंने इसे जीवन का मूल मंत्र ही बना लिया है...अब बिना यौगिक क्रिया के ही सच्चे मन से ईश्वर को साक्षी मान कष्ट देने वाले को क्षमा दान दे दिया करती हूँ और निश्चित रूप से कटु स्मृतियों, पीडा से अत्यंत प्रभावशाली रूप से मुक्ति पा जाया करती हूँ..
मेरा मानना है कि सामने वाले को सुख और खुशी देने के लिए हमें स्वयं अपने ह्रदय को सुख शांति से परिपूर्ण रखना होगा.अब परिवार समाज से भागकर तो कहीं जाया नहीं जा सकता..तो इसके बीच रह ही हमें सुखद स्मृतियों को जो कि हमें उर्जा प्रदान करती हों,संजोना पड़ेगा और दुखद स्मृतियाँ जो हमें कमजोर करे हममे नकारात्मकता प्रगाढ़ करे,उससे बचना पड़ेगा..सकारात्मक रह ही हम अपनी क्षमताओं का अधिकाधिक सदुपयोग कर सकते हैं..
क्षमादान से वस्तुतः दूसरों का नहीं सबसे अधिक भला अपना ही होता है.जब तक दुखद स्मृतियाँ अपने अंतस में संरक्षित रहती हैं,वे हमारे सकारात्मक सोच को बाधित करती है,हमें सुखी नहीं होने देती..सच्चे सुख की अभिलाषा हो तो उन सभी साधनों को अंगीकार करना चाहिए,जो हमारी नकारात्मकता न नाश करती हो.व्यक्ति में अपरिमित प्रतिभा क्षमता होती है,जिसका यदि सकारात्मक उपयोग किया जाय तो अपने साथ साथ अपने से जुड़े असंख्य लोगों के हित हम बहुत कुछ कर सकते हैं.ऐसे जीवन का क्या लाभ यदि इसकी पूरी अवधि में हम किसी को सुख और खुशियाँ न दे पायें..
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6.10.09
नक्सलवाद का वाद (???)
स्वयं को बहुत पहले से ही मैंने चेता रखा था कि, अपनी तथा अपने संवेदनशीलता की रक्षा के लिए कभी भी कुछ खाते पीते समय समाचार पठन या दर्शन न किया करूँ...परन्तु दुर्भाग्यवश आज उसे विस्मृत कर दोपहर के भोजन काल में टी वी पर समाचार देखने बैठ गयी ..सामने कल तक जीवित परन्तु आज मृत सी आई डी के पदाधिकारी फ्रांसिस हेम्ब्रम का वह चेहरा आया जिसे नक्सलियों ने अपने तीन शीर्ष नेताओं कोबर्ट गांधी ,छत्रधर महतो और भूषन को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाने के बाद ,उन्हें मुक्त कराने हेतु अपहरण के बाद धमकी स्वरुप अपनी गंभीरता तथा प्रतिबद्धता दिखाते हुए मार डाला था...
मन अत्यंत खिन्न और विचलित हो गया और सच कहूँ तो लगा कि अभी जाकर पुलिस की गिरफ्त में उन तथाकथित महान नेताओं की हत्या कर इन्हें भी सबक सिखाऊँ. यह हमारे देश की कैसी न्याय प्रणाली है,जिसमे दुर्दांत अपराधियों के मानवाधिकारों के लिए भी इतनी चिंता की जाती है कि न्यायिक प्रक्रिया में उसमे और सामान्य अपराधी में कोई भेद नहीं किया जाता और दूसरी ओर कमजोर मासूम आदमी की रक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं....
सामर्थ्यवान द्वारा शक्तिहीन को शोषित पीड़ित होते देख सुन कर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का ह्रदय प्रतिकार को उत्कंठित हो उठता है और आक्रोश की यह मात्रा ज्यों ज्यों बढ़ती जाती है,एक सामान्य शक्तिहीन मनुष्य में भी शोषक को समाप्त करने की प्रतिबद्धता प्रगढ़तम होती जाती है.. और फिर प्रतिकार का सबसे पहला मार्ग जो उसे दीखता है वह उग्रता और हिंसा का ही हुआ करता है...आवेग व्यक्ति में उस सीमा तक धैर्य का स्थान नहीं छोड़ती, कि व्यक्ति सत्याग्रह एवं अहिंसक मार्ग अपना सके और उसपर अडिग रह सके.रक्षक को ही भक्षक बने देख स्वाभाविक ही किसी भी संवेदनशील का खून खौलना और आवेश में उसके द्वारा अस्त्र उठा लेना,एक सामान्य बात है...
विश्व इतिहास साक्षी है ऐसे अनेकानेक विद्रोहों विप्लवों का जब अन्याय के प्रतिकार में व्यक्ति या समूह ने अस्त्र उठाये,आत्मबलिदान दिया और शोषकों के प्राण हरे.हत्या चाहे शोषक करे या शोषित,हत्या तो हत्या ही होती है,लेकिन अपने उद्देश्य के कारण एक पाप है तो दूसरा पुण्य.एक ही कार्य उद्देश्य भिन्न होने पर विपरीत अर्थ और परिणामदाई हो जाते है.परन्तु दोनों के मध्य अदृश्य अतिशूक्ष्म वह अंतर है जो पता ही नहीं चलने देता कि कब शोषित शोषक बन गया....
साठ की दशक में नक्सल आन्दोलन की नींव जिस विचारभूमि पर पड़ी थी, अन्याय और शोषण के विरुद्ध सशश्त्र प्रतिकार को उपस्थित हुआ वह समूह एक तरह से निंदनीय नहीं, वन्दनीय ही था.मुझे लगता है तब यदि मैं वयस्क रही होती तो मैं भी इसकी प्रबल समर्थक और प्रमुख कार्यकर्त्ता रही होती. इसके महत उद्देश्य ने ही देश के युवा वर्ग को सम्मोहित कर एकजुट किया था. देश को चलाने वाले बहुत छोटे से पदाधिकारी से लेकर शीर्षस्थ पदाधिकारी तक,राजनेता ,पूंजीपति आदि आदि यदि पथभ्रष्ट हो जायं और पोषक के बदले शोषक बन आमजन का जीवन दुरूह कर दें,न्याय पालिका तक अपनी प्रासंगिकता खो चुकी हो , तो उनके विरुद्ध आवाज़ बुलंद करना, उन्हें चेताना और दण्डित करना किसी भी लिहाज से अनैतिक नहीं.बल्कि मैं तो कहूँगी आज भी ऐसे ही समूह और शक्ति की आवश्यकता है जो पथविमुख को सही मार्ग पर रखने के लिए सदैव ही प्राणोत्सर्ग को तत्पर रहे...
परन्तु यही रक्षक शक्तियां जनकल्याण मार्ग से विमुख हो यदि शोषक और हिंसक बन जाय तो इन्हें कुचलना भी उतना ही आवश्यक है.कैसी विडंबना है,सरकार द्वारा विकास न किये जाने,पूंजीपतियों द्वारा शोषित होने और समस्त सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के त्रासद स्थिति पर , जिस जनांदोलन की नींव रखी गयी ,आज महज तीन चार दशकों में ही इसका रूप विद्रूप हो आन्दोलन ठीक इसके विपरीत मार्ग पर चल अधोगामी हो चुका है . विकास का मार्ग पूर्ण रूपेण अवरुद्ध कर,उन्ही देशी विदेशी पूंजीपतियों ,विध्वंसक शक्तियों से सांठ गाँठ कर उनके आर्थिक मदद से तथा व्यापारी वर्ग को आतंकित कर उनसे धन उगाह अपना और भ्रष्ट राजनेताओं का स्वार्थ साधना , जब उस उग्रवादी समूह का सिद्धांत और स्वभाव बन जाय तो ऐसे समूह को डाकुओं हत्यारों का एक सुसंगठित गिरोह ही कहना होगा न ,जिसका उद्देश्य ही आतंक के सहारे धन लूटना, आतंक का धंधा चलाना और अपने ही देश को कमजोर करना है .
कहा जाता है कि दलित शोषित गरीब लोग हथियार उठा नक्सली बन रहे हैं.यदि यह समूह दलित शोषित उन गरीब लोगों का है,जिनके पास अन्न,वस्त्र,छत,जमीन और रोजी रोजगार नहीं हैं, तो भला इनके पास बेशकीमती अत्याधुनिक हथियार कहाँ से आ जाते हैं ?? यह सोचने और हंसने वाली बात है..यह किसी से छुपा नहीं अब कि, इस समूह के आय के श्रोत क्या हैं और इनके उद्देश्य क्या हैं...
समूह तो पथभ्रष्ट हो ही चुका है,पर सबसे दुखद यह है कि हमारे देश के कर्ताधर्ताओं को अभी भी यह कोई बड़ी समस्या नहीं लगती.हमारे यहाँ एक विचित्र व्यवस्था है,व्यक्ति का अपराध ही दंड प्रक्रिया से गुजरता है,समूह का अपराध जघन्य नहीं माना जाता और उसमे भी जितना बड़ा समूह, वह उतना ही उच्छश्रृंखल उतना ही मुक्त होता है... जानकार जानते हैं कि अपने ही देश में कई समूहों ने इसे अपना रोजगार बना लिया है..कहीं उल्फा ,कहीं नक्सल कहीं किसी और नाम से एक समूह संगठित होता है और ये सरकार को शांति और सुव्यवस्था बनाये रखने देने में सहयोग के नाम पर लेवी वसूल करते हैं.और इस तरह चलता है इनका पूरा व्यापार..
सरकार और ये आतंकी संगठन दोनों के ही उद्देश्य लोगों को अशिक्षित रख,उन्हें दुनिया और विकास से पूरी तरह काट भली भांति पूरे होते हैं.कौन नहीं जानता कि इनके ही इशारे पर मतदान भी हुआ करते हैं.इन आतंकवादियों से प्रभावित इलाकों में पूर्ण रूपेण इनका ही साम्राज्य चलता है और ये ही फौरी तौर पर राजनेताओं तथा राजनीति की दिशा दशा निर्धारित करते हैं....
इसके विकल्प रूप में तो यही दीखता है कि जब प्रशासन आँख कान मुंह ढांपे पड़ा है तो क्यों न लोहा से लोहे को काटने की तर्ज पर एक ऐसा ही सशश्त्र समूह संगठित किया जाय और इन आततायी शक्तियों को सबक सिखाई जाय...पर फिर यही लगता है कि इसकी क्या गारंटी है कि यह नया समूह भी कभी स्वार्थी नेताओं के नेतृत्व में स्वार्थी तथा विघटनकारी न बनेगा..
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मन अत्यंत खिन्न और विचलित हो गया और सच कहूँ तो लगा कि अभी जाकर पुलिस की गिरफ्त में उन तथाकथित महान नेताओं की हत्या कर इन्हें भी सबक सिखाऊँ. यह हमारे देश की कैसी न्याय प्रणाली है,जिसमे दुर्दांत अपराधियों के मानवाधिकारों के लिए भी इतनी चिंता की जाती है कि न्यायिक प्रक्रिया में उसमे और सामान्य अपराधी में कोई भेद नहीं किया जाता और दूसरी ओर कमजोर मासूम आदमी की रक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं....
सामर्थ्यवान द्वारा शक्तिहीन को शोषित पीड़ित होते देख सुन कर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का ह्रदय प्रतिकार को उत्कंठित हो उठता है और आक्रोश की यह मात्रा ज्यों ज्यों बढ़ती जाती है,एक सामान्य शक्तिहीन मनुष्य में भी शोषक को समाप्त करने की प्रतिबद्धता प्रगढ़तम होती जाती है.. और फिर प्रतिकार का सबसे पहला मार्ग जो उसे दीखता है वह उग्रता और हिंसा का ही हुआ करता है...आवेग व्यक्ति में उस सीमा तक धैर्य का स्थान नहीं छोड़ती, कि व्यक्ति सत्याग्रह एवं अहिंसक मार्ग अपना सके और उसपर अडिग रह सके.रक्षक को ही भक्षक बने देख स्वाभाविक ही किसी भी संवेदनशील का खून खौलना और आवेश में उसके द्वारा अस्त्र उठा लेना,एक सामान्य बात है...
विश्व इतिहास साक्षी है ऐसे अनेकानेक विद्रोहों विप्लवों का जब अन्याय के प्रतिकार में व्यक्ति या समूह ने अस्त्र उठाये,आत्मबलिदान दिया और शोषकों के प्राण हरे.हत्या चाहे शोषक करे या शोषित,हत्या तो हत्या ही होती है,लेकिन अपने उद्देश्य के कारण एक पाप है तो दूसरा पुण्य.एक ही कार्य उद्देश्य भिन्न होने पर विपरीत अर्थ और परिणामदाई हो जाते है.परन्तु दोनों के मध्य अदृश्य अतिशूक्ष्म वह अंतर है जो पता ही नहीं चलने देता कि कब शोषित शोषक बन गया....
साठ की दशक में नक्सल आन्दोलन की नींव जिस विचारभूमि पर पड़ी थी, अन्याय और शोषण के विरुद्ध सशश्त्र प्रतिकार को उपस्थित हुआ वह समूह एक तरह से निंदनीय नहीं, वन्दनीय ही था.मुझे लगता है तब यदि मैं वयस्क रही होती तो मैं भी इसकी प्रबल समर्थक और प्रमुख कार्यकर्त्ता रही होती. इसके महत उद्देश्य ने ही देश के युवा वर्ग को सम्मोहित कर एकजुट किया था. देश को चलाने वाले बहुत छोटे से पदाधिकारी से लेकर शीर्षस्थ पदाधिकारी तक,राजनेता ,पूंजीपति आदि आदि यदि पथभ्रष्ट हो जायं और पोषक के बदले शोषक बन आमजन का जीवन दुरूह कर दें,न्याय पालिका तक अपनी प्रासंगिकता खो चुकी हो , तो उनके विरुद्ध आवाज़ बुलंद करना, उन्हें चेताना और दण्डित करना किसी भी लिहाज से अनैतिक नहीं.बल्कि मैं तो कहूँगी आज भी ऐसे ही समूह और शक्ति की आवश्यकता है जो पथविमुख को सही मार्ग पर रखने के लिए सदैव ही प्राणोत्सर्ग को तत्पर रहे...
परन्तु यही रक्षक शक्तियां जनकल्याण मार्ग से विमुख हो यदि शोषक और हिंसक बन जाय तो इन्हें कुचलना भी उतना ही आवश्यक है.कैसी विडंबना है,सरकार द्वारा विकास न किये जाने,पूंजीपतियों द्वारा शोषित होने और समस्त सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के त्रासद स्थिति पर , जिस जनांदोलन की नींव रखी गयी ,आज महज तीन चार दशकों में ही इसका रूप विद्रूप हो आन्दोलन ठीक इसके विपरीत मार्ग पर चल अधोगामी हो चुका है . विकास का मार्ग पूर्ण रूपेण अवरुद्ध कर,उन्ही देशी विदेशी पूंजीपतियों ,विध्वंसक शक्तियों से सांठ गाँठ कर उनके आर्थिक मदद से तथा व्यापारी वर्ग को आतंकित कर उनसे धन उगाह अपना और भ्रष्ट राजनेताओं का स्वार्थ साधना , जब उस उग्रवादी समूह का सिद्धांत और स्वभाव बन जाय तो ऐसे समूह को डाकुओं हत्यारों का एक सुसंगठित गिरोह ही कहना होगा न ,जिसका उद्देश्य ही आतंक के सहारे धन लूटना, आतंक का धंधा चलाना और अपने ही देश को कमजोर करना है .
कहा जाता है कि दलित शोषित गरीब लोग हथियार उठा नक्सली बन रहे हैं.यदि यह समूह दलित शोषित उन गरीब लोगों का है,जिनके पास अन्न,वस्त्र,छत,जमीन और रोजी रोजगार नहीं हैं, तो भला इनके पास बेशकीमती अत्याधुनिक हथियार कहाँ से आ जाते हैं ?? यह सोचने और हंसने वाली बात है..यह किसी से छुपा नहीं अब कि, इस समूह के आय के श्रोत क्या हैं और इनके उद्देश्य क्या हैं...
समूह तो पथभ्रष्ट हो ही चुका है,पर सबसे दुखद यह है कि हमारे देश के कर्ताधर्ताओं को अभी भी यह कोई बड़ी समस्या नहीं लगती.हमारे यहाँ एक विचित्र व्यवस्था है,व्यक्ति का अपराध ही दंड प्रक्रिया से गुजरता है,समूह का अपराध जघन्य नहीं माना जाता और उसमे भी जितना बड़ा समूह, वह उतना ही उच्छश्रृंखल उतना ही मुक्त होता है... जानकार जानते हैं कि अपने ही देश में कई समूहों ने इसे अपना रोजगार बना लिया है..कहीं उल्फा ,कहीं नक्सल कहीं किसी और नाम से एक समूह संगठित होता है और ये सरकार को शांति और सुव्यवस्था बनाये रखने देने में सहयोग के नाम पर लेवी वसूल करते हैं.और इस तरह चलता है इनका पूरा व्यापार..
सरकार और ये आतंकी संगठन दोनों के ही उद्देश्य लोगों को अशिक्षित रख,उन्हें दुनिया और विकास से पूरी तरह काट भली भांति पूरे होते हैं.कौन नहीं जानता कि इनके ही इशारे पर मतदान भी हुआ करते हैं.इन आतंकवादियों से प्रभावित इलाकों में पूर्ण रूपेण इनका ही साम्राज्य चलता है और ये ही फौरी तौर पर राजनेताओं तथा राजनीति की दिशा दशा निर्धारित करते हैं....
इसके विकल्प रूप में तो यही दीखता है कि जब प्रशासन आँख कान मुंह ढांपे पड़ा है तो क्यों न लोहा से लोहे को काटने की तर्ज पर एक ऐसा ही सशश्त्र समूह संगठित किया जाय और इन आततायी शक्तियों को सबक सिखाई जाय...पर फिर यही लगता है कि इसकी क्या गारंटी है कि यह नया समूह भी कभी स्वार्थी नेताओं के नेतृत्व में स्वार्थी तथा विघटनकारी न बनेगा..
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24.9.09
सिंदूरदान (एक पौराणिक आख्यान) भाग - 2
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गतांक से आगे...
परन्तु क्या यह सब इतना ही सहज था..एक ओर तो क्षोभग्रस्त महारानी लज्जा शोक और पापबोध से घुली जा रही थीं, तो दूसरी ओर कणाद भी मोह और विवेक के मध्य छिड़े गहन द्वंद में घिरा अपना मत और करनीय स्थिर करने में स्वयं को सर्वथा असमर्थ पा रहा था.सरोवर सुन्दरी के आलौकिक सौन्दर्य को विस्मृत कर पाना उसके लिए असंभव हो रहा था.स्मृतिपटल पर अवस्थित वह दृश्य उसे उदिग्न कर दिया करता... सदैव ही उसे आभास होता जैसे वह निष्कलुष सौन्दर्य उसे अपने भुजपाश में आबद्ध होने को प्रतिपल प्रणय निवेदन भेज रहा है.
मोहग्रस्त कणाद कभी तो दर्पण के सम्मुख बैठ विभिन्न प्रकार से अपना श्रृंगार करता, अपनी ही छवि पर मुग्ध होता परन्तु जैसे ही विवेक उसे झकझोर उस पर अट्टहास करता ,वह स्वयं को दण्डित करने लगता. विछिप्त सी हो गयी थी उसकी स्थिति..आर्या गांधारी समस्त उपक्रम देख समझ रही थी,परन्तु कुछ भी कर पाने में वह असमर्थ थी. न तो वे महारानी का सत्य उद्घाटित कर सकतीं थीं न ही शिष्य की भ्रमित बुद्धि पर उनकी धर्मदेशना का किंचित भी प्रभाव पड़ रहा था...दुश्चिंताओं में घिरी आर्या के सम्मुख आचार्यवर के पुनरागमन के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प न रह गया था.महारानी को तो उन्होंने समझा लिया था परन्तु कणाद के सम्पूर्ण गतिविधियों पर दृष्टि रखने के अतिरिक्त उनके पास अन्य कोई साधन न था...
असह्य प्रतीक्षा का वह दीर्घ अन्तराल अंततः समाप्त हुआ और आचार्य के आगमन के साथ ही आर्या गांधारी के व्याकुल मन ने कई दिनों उपरांत अवलंबन पाया . अधीरता से वे रात्रि के एकान्तवेला की प्रतीक्षा करने लगी , जबकि वे आचार्यवर को समस्त वृतांत बता पातीं और इस घोर संकट से मुक्ति का मार्ग संधान वे कर पाते ...
उधर अपने सहपाठियों का संग पा कणाद पुनः प्रफ्फुलित हो गया था.समस्त शिष्य अतिउत्साहित हो यात्रा वृतांत कणाद को सुना रहे थे. परन्तु जो वृतांत कणाद के पास था वह तो अकल्पनीय ही था सबके लिए.. कणाद ने अनुमानित किया था कि ऋषिप्रसाद में गोपनीय ढंग से निवास करने वाली वह अप्सरा कोई ऋषि कन्या ही थी. अंत्यंत उत्साहित हो उसने अपने सहपाठियों को समस्त वृतांत तथा अनुमानित ऋषि कन्या के अनिर्वचनीय अनिद्य सौन्दर्य की विरुदावली सुनाई...
फिर क्या था, कणाद का मोह ऐसे विस्तृत हुआ कि उसके चुम्बकीय प्रभाव में अन्यान्य छात्र भी आ गए और उनके मध्य वाक् युद्ध प्रारंभ हो गया. सभी स्वयं को श्रेष्ठ घोषित कर पाणिग्रहण हेतु स्वयं को उस कन्या का अधिकारी ठहरा रहे थे.ज्येष्ठ शिष्य ने अपने ज्येष्ठता का कारण दिया तो कणाद ने अपने सर्वप्रथम दर्शन और प्रेम का. इसके साथ ही रमणी पर अधिकार हेतु किसी ने अपने बल का तो किसी ने अपने सौन्दर्य का और किसी ने धन का आधार स्थापित किया. आपसी सद्भाव सौहाद्र भाव तिरोहित हो मोह और इर्ष्या ने परस्पर सबको एक दूसरे का प्रबल प्रतिद्वंदी तथा शत्रु बना दिया था...
इस तथ्य से सभी भली भांति परिचित थे कि आचार्य विद्याध्यन के मध्य ब्रह्मचर्य व्रत खण्डित कर गृहस्थ स्थापना की आज्ञां कदापि न देंगे. सो गुरुवर संग किसी प्रकार की मंत्रणा किये या उनकी आज्ञा बिना ही समस्त शिष्य अपने अभिभावकों से विवाह का अनुज्ञान पाने आचार्यवर के नाम एक पत्र छोड़ कर स्वगृह को प्रस्थान कर गए. प्रातःकाल रिक्त संघाराम ने पूर्व से ही दुर्घटना से मर्माहत आचार्य और देवी गांधारी के ह्रदय पर मानों तुषारपात सा कर उन्हें दुःख के सागर में आकंठ निमग्न कर दिया. शोक संतप्त आर्या अपने पुत्रवत शिष्यों के मोह-ग्रस्त अवस्था का ध्यान कर उनका पतन लक्ष्य कर आहत हो विलाप करने लगी.
आचार्य खालित आहत अवश्य थे परन्तु निराश न थे..उन्हें अपनी दी हुई शिक्षा और शिष्यों के सुसंस्कार पर पूर्ण विश्वास था. भग्नहृदया भगिनी को उन्होंने आश्वस्त किया कि कुलीन शिष्यगणों की वर्तमान मनोदशा वयजनित विभ्रम है जो कि नितांत ही क्षणिक है,जैसे ही उनका विवेक जागृत होगा, पश्चात्ताप की अग्नि में शुद्ध हो वे पुनः अपने सुसंस्कार और कर्तब्य का सर्वोत्कृष्ट रूप से वहन करेंगे.... क्षात्रावास में उनका विद्याध्यन हेतु पुनरागमन अवश्यम्भावी है.वस्तुतः विधाता रचित इस घटना के पीछे भी छुपा हुआ उनका कल्याणकारी महत उद्देश्य ही है..दिव्य द्रष्टा आचार्यवर के धीर गंभीर आशापूर्ण वचनों ने आर्या के दग्ध ह्रदय को अनिर्वचनीय शीतलता प्रदान की..
इधर महारानी के गृहत्याग उपरांत क्रोध शांत होने पर जब कोशल नरेश को अपने अकरणीय का आभास हुआ तो वे विह्वल हो उठे और उन्होंने राज्य में चहुँ ओर महारानी का संधान आरम्भ कर दिया..परन्तु सब ओर से उन्हें निराशा ही मिली..निराशा पश्चात्ताप और वियोग महाराजा के दग्ध ह्रदय में हविष्याग्नि बन विरह ज्वाला को और भी उग्र कर दिया करते थे....अंततः चहुँ ओर से निराशा प्राप्ति उपरांत अब नृप के सम्मुख महारानी के संधान हेतु आचार्य के दिव्य ज्ञान का सहयोग लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प न था..
शोक क्षोभ से विह्वल नरेश आश्रम में उपस्थित हो आचार्यवर के सम्मुख व्याकुल भाव से रुदन करने लगे...परन्तु उन्हें कहाँ आभास था कि जिस अभिलाषा से वे आश्रम में उपस्थित हुए हैं, उनका अभीष्ट तो वहीँ सुरक्षित है.जैसे ही उनके सम्मुख यह रहस्योद्घाटन हुआ कोशल नरेश आभारनत हो आचार्यद्वय के चरणों में नतमस्तक हो गए....
दंपत्ति का पुनर्मिलन आह्लाद को भी आह्लादित करने वाला हुआ.परन्तु आचार्यवर ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए नरेश से कहा कि उन्हें उनकी भार्या तभी प्राप्त होगी जब कि वे अग्नि के सम्मुख पवित्र वैदिक मंत्रों के साथ सप्त वचन लेंगे और अग्निदेव को साक्षी मान महारानी की मांग में सिन्दूर भरेंगे...
पवित्र वैदिक मंत्रों संग महारानी का सिंदूरदान संपन्न हुआ.पतिपत्नी ने गृहस्थ धर्म की मर्यादा और अक्षुणता हेतु समस्त देवी देवताओं को साक्षी रख मृत्युपर्यंत एक दूसरे के प्रति प्रेम ,निष्ठां , मर्यादा, आदर और सेवा का शपथ लिया और तभी से परंपरा में सिंदूरदान नाम की इस पावन परंपरा का श्रीगणेश हुआ. सौभाग्य सिन्दूर विवाहित तथा अविवाहित स्त्री के मध्य अंतर स्थापित करने वाला सुगम साधन ही नहीं, स्त्री की मान रक्षा तथा पति के कर्तब्यबोध का सफल वाहक भी बन गया.
पुत्रीवत महारानी को पतिगृह विदा करते आचार्य वर तथा आर्या गांधारी का ह्रदय विह्वल हो उठा,परन्तु उसके सुखी जीवन के आभास और अभिलाषा ने उन्हें परम संतुष्टि और अनिर्वचनीय आनंद भी दिया..
महरानी के गमनोपरांत जब शिष्यगण अपने अभिभावकों से पाणिग्रहण हेतु सहमति ले आश्रम में उपस्थित हुए तो वहां की साज-सज्जा और विवाह वेदी देख अनिष्ट की आशंका से उनका मन विचलित होने लगा. सशंकित ह्रदय वे सभी आर्या तथा आचार्य के सम्मुख उपस्थित हुए तथा अपनी धृष्टता के लिए क्षमायाचना करते हुए अपना प्रयोजन स्पष्ट किया..अपना-अपना पक्ष रखते हुए सबने उस ऋषिकन्या पर अपना अधिकार स्थापित किया तथा पाणिग्रहण की अनुमति मांगी .
आचार्य कुछ पल को तो शांत भाव से समस्त अघटित देखते रहे,यकायक भीषण चीत्कार के साथ उठ खड़े हुए..उस भीषण वज्र ध्वनि ने सभी शिष्यों को स्तब्ध कर दिया.सभी निष्पलक निर्मिमेष दृष्टि से आचार्यवर को देखने लगे...और जैसे ही आचार्यवर ने महारानी का सत्य उनके सम्मुख उद्घाटित किया, लज्जा ग्लानि और पापबोध ने उन्हें विक्षिप्त सा कर दिया...जिन्हें वे अबतक एक कुंवारी ऋषिकन्या मान रहे थे ,वह तो परम वन्दनीय महारानी थीं. क्षणमात्र में मोह तिरोहित हो गया और आत्मग्लानि की भीषण ज्वाला में उनका कोमल ह्रदय दग्ध होने लगा..आचार्यवर के चरणों में भूलुंठित शिष्य अपने इस निकृष्ट कुकृत्य हेतु प्राणदंड की याचना करने लगे.
आचार्यवर ने कठोर शब्दों में उन्हें सावधान किया कि इस घोरतम पाप के लिए उन्हें दंड तो अवश्य मिलेगा परन्तु दंड की उद्घोषणा अगले दिन प्रातः काल की जायेगी इस अवधि-मध्य यदि कोई क्षात्र दंडमुक्ति की अभिलाषा रखता हो तो बिना आज्ञा, आश्रम छोड़कर जा सकता है..
कठोरतम दंड का आश्वासन पा शिष्यों ने मानों नूतन जीवन का आधार पाया था..अत्यंत अधीरतापूर्वक वे उषा काल की प्रतीक्षा करने लगे.अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत पहले ही नित्यक्रिया से निवृत हो वे आचार्यवर के कक्ष के सम्मुख उपस्थित हो गए.
शिष्यों की प्रतिबद्धता ने आचार्यवर को परम सुख और संतोष दिया. पश्चात्ताप की जिस अग्नि में इतने काल तक वे जले थे, उसमे से उनका ह्रदय विशुद्ध कंचन बन बाहर आ गया था.अब इससे बड़ा दंड और क्या हो सकता था कि जीवन भर वे अपने इस अकरणीय से शिक्षा ले मोह बंधन से मुक्त रहते. आचार्यवर ने उन्हें दंडमुक्त कर परम ज्ञान का वह उपदेश दिया जो उनके शिक्षण समाप्ति के पूर्व उन्हें प्राप्त होता. इसके साथ ही आचार्यवर ने अपने इन परमज्ञानी शिष्यों को विश्व कल्याण हेतु ज्ञान प्रसार की आज्ञा दे समाज के बीच भेज दिया..
सर्वविदित है कि महर्षि गौतम, कपिल, जैमिनी, पतंजलि, व्यास और कणाद ने ज्ञान रूपी वह धरोहर विश्व को सौंपी है जो सृष्टि के अंत तक संसार का मार्गदर्शन करती रहेंगी....
(हिंदी साहित्य के सिद्ध हस्ताक्षर, परम आदरणीय श्री रामेश्वर प्रसाद सिंह की ह्रदय से आभारी हूँ,जिनके पुराणों,जैन तथा बौद्ध ग्रंथों के गहन अध्ययन अन्वेश्नोपरांत लिखित महान आध्यात्मिक ऐतिहासिक उपन्यास " पाटलीपुत्र की राजनर्तकी " के अध्ययन क्रम में इस प्रसंग से अवगत होने का सौभाग्य मिला...
उक्त पुस्तक में तो यह प्रसंग अत्यंत विस्तृत रूप में उल्लिखित है,मैंने उसके साररूप को अपने शब्दों में ढाल यहाँ प्रेषित करने का प्रयास किया है.चूँकि यह प्रसंग मेरे लिए सर्वथा नवीन एवं रोमांचक था,सो मैंने सार्वजानिक स्थल पर इसे सर्वसुलभ करने का निर्णय लिया. )
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गतांक से आगे...
परन्तु क्या यह सब इतना ही सहज था..एक ओर तो क्षोभग्रस्त महारानी लज्जा शोक और पापबोध से घुली जा रही थीं, तो दूसरी ओर कणाद भी मोह और विवेक के मध्य छिड़े गहन द्वंद में घिरा अपना मत और करनीय स्थिर करने में स्वयं को सर्वथा असमर्थ पा रहा था.सरोवर सुन्दरी के आलौकिक सौन्दर्य को विस्मृत कर पाना उसके लिए असंभव हो रहा था.स्मृतिपटल पर अवस्थित वह दृश्य उसे उदिग्न कर दिया करता... सदैव ही उसे आभास होता जैसे वह निष्कलुष सौन्दर्य उसे अपने भुजपाश में आबद्ध होने को प्रतिपल प्रणय निवेदन भेज रहा है.
मोहग्रस्त कणाद कभी तो दर्पण के सम्मुख बैठ विभिन्न प्रकार से अपना श्रृंगार करता, अपनी ही छवि पर मुग्ध होता परन्तु जैसे ही विवेक उसे झकझोर उस पर अट्टहास करता ,वह स्वयं को दण्डित करने लगता. विछिप्त सी हो गयी थी उसकी स्थिति..आर्या गांधारी समस्त उपक्रम देख समझ रही थी,परन्तु कुछ भी कर पाने में वह असमर्थ थी. न तो वे महारानी का सत्य उद्घाटित कर सकतीं थीं न ही शिष्य की भ्रमित बुद्धि पर उनकी धर्मदेशना का किंचित भी प्रभाव पड़ रहा था...दुश्चिंताओं में घिरी आर्या के सम्मुख आचार्यवर के पुनरागमन के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प न रह गया था.महारानी को तो उन्होंने समझा लिया था परन्तु कणाद के सम्पूर्ण गतिविधियों पर दृष्टि रखने के अतिरिक्त उनके पास अन्य कोई साधन न था...
असह्य प्रतीक्षा का वह दीर्घ अन्तराल अंततः समाप्त हुआ और आचार्य के आगमन के साथ ही आर्या गांधारी के व्याकुल मन ने कई दिनों उपरांत अवलंबन पाया . अधीरता से वे रात्रि के एकान्तवेला की प्रतीक्षा करने लगी , जबकि वे आचार्यवर को समस्त वृतांत बता पातीं और इस घोर संकट से मुक्ति का मार्ग संधान वे कर पाते ...
उधर अपने सहपाठियों का संग पा कणाद पुनः प्रफ्फुलित हो गया था.समस्त शिष्य अतिउत्साहित हो यात्रा वृतांत कणाद को सुना रहे थे. परन्तु जो वृतांत कणाद के पास था वह तो अकल्पनीय ही था सबके लिए.. कणाद ने अनुमानित किया था कि ऋषिप्रसाद में गोपनीय ढंग से निवास करने वाली वह अप्सरा कोई ऋषि कन्या ही थी. अंत्यंत उत्साहित हो उसने अपने सहपाठियों को समस्त वृतांत तथा अनुमानित ऋषि कन्या के अनिर्वचनीय अनिद्य सौन्दर्य की विरुदावली सुनाई...
फिर क्या था, कणाद का मोह ऐसे विस्तृत हुआ कि उसके चुम्बकीय प्रभाव में अन्यान्य छात्र भी आ गए और उनके मध्य वाक् युद्ध प्रारंभ हो गया. सभी स्वयं को श्रेष्ठ घोषित कर पाणिग्रहण हेतु स्वयं को उस कन्या का अधिकारी ठहरा रहे थे.ज्येष्ठ शिष्य ने अपने ज्येष्ठता का कारण दिया तो कणाद ने अपने सर्वप्रथम दर्शन और प्रेम का. इसके साथ ही रमणी पर अधिकार हेतु किसी ने अपने बल का तो किसी ने अपने सौन्दर्य का और किसी ने धन का आधार स्थापित किया. आपसी सद्भाव सौहाद्र भाव तिरोहित हो मोह और इर्ष्या ने परस्पर सबको एक दूसरे का प्रबल प्रतिद्वंदी तथा शत्रु बना दिया था...
इस तथ्य से सभी भली भांति परिचित थे कि आचार्य विद्याध्यन के मध्य ब्रह्मचर्य व्रत खण्डित कर गृहस्थ स्थापना की आज्ञां कदापि न देंगे. सो गुरुवर संग किसी प्रकार की मंत्रणा किये या उनकी आज्ञा बिना ही समस्त शिष्य अपने अभिभावकों से विवाह का अनुज्ञान पाने आचार्यवर के नाम एक पत्र छोड़ कर स्वगृह को प्रस्थान कर गए. प्रातःकाल रिक्त संघाराम ने पूर्व से ही दुर्घटना से मर्माहत आचार्य और देवी गांधारी के ह्रदय पर मानों तुषारपात सा कर उन्हें दुःख के सागर में आकंठ निमग्न कर दिया. शोक संतप्त आर्या अपने पुत्रवत शिष्यों के मोह-ग्रस्त अवस्था का ध्यान कर उनका पतन लक्ष्य कर आहत हो विलाप करने लगी.
आचार्य खालित आहत अवश्य थे परन्तु निराश न थे..उन्हें अपनी दी हुई शिक्षा और शिष्यों के सुसंस्कार पर पूर्ण विश्वास था. भग्नहृदया भगिनी को उन्होंने आश्वस्त किया कि कुलीन शिष्यगणों की वर्तमान मनोदशा वयजनित विभ्रम है जो कि नितांत ही क्षणिक है,जैसे ही उनका विवेक जागृत होगा, पश्चात्ताप की अग्नि में शुद्ध हो वे पुनः अपने सुसंस्कार और कर्तब्य का सर्वोत्कृष्ट रूप से वहन करेंगे.... क्षात्रावास में उनका विद्याध्यन हेतु पुनरागमन अवश्यम्भावी है.वस्तुतः विधाता रचित इस घटना के पीछे भी छुपा हुआ उनका कल्याणकारी महत उद्देश्य ही है..दिव्य द्रष्टा आचार्यवर के धीर गंभीर आशापूर्ण वचनों ने आर्या के दग्ध ह्रदय को अनिर्वचनीय शीतलता प्रदान की..
इधर महारानी के गृहत्याग उपरांत क्रोध शांत होने पर जब कोशल नरेश को अपने अकरणीय का आभास हुआ तो वे विह्वल हो उठे और उन्होंने राज्य में चहुँ ओर महारानी का संधान आरम्भ कर दिया..परन्तु सब ओर से उन्हें निराशा ही मिली..निराशा पश्चात्ताप और वियोग महाराजा के दग्ध ह्रदय में हविष्याग्नि बन विरह ज्वाला को और भी उग्र कर दिया करते थे....अंततः चहुँ ओर से निराशा प्राप्ति उपरांत अब नृप के सम्मुख महारानी के संधान हेतु आचार्य के दिव्य ज्ञान का सहयोग लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प न था..
शोक क्षोभ से विह्वल नरेश आश्रम में उपस्थित हो आचार्यवर के सम्मुख व्याकुल भाव से रुदन करने लगे...परन्तु उन्हें कहाँ आभास था कि जिस अभिलाषा से वे आश्रम में उपस्थित हुए हैं, उनका अभीष्ट तो वहीँ सुरक्षित है.जैसे ही उनके सम्मुख यह रहस्योद्घाटन हुआ कोशल नरेश आभारनत हो आचार्यद्वय के चरणों में नतमस्तक हो गए....
दंपत्ति का पुनर्मिलन आह्लाद को भी आह्लादित करने वाला हुआ.परन्तु आचार्यवर ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए नरेश से कहा कि उन्हें उनकी भार्या तभी प्राप्त होगी जब कि वे अग्नि के सम्मुख पवित्र वैदिक मंत्रों के साथ सप्त वचन लेंगे और अग्निदेव को साक्षी मान महारानी की मांग में सिन्दूर भरेंगे...
पवित्र वैदिक मंत्रों संग महारानी का सिंदूरदान संपन्न हुआ.पतिपत्नी ने गृहस्थ धर्म की मर्यादा और अक्षुणता हेतु समस्त देवी देवताओं को साक्षी रख मृत्युपर्यंत एक दूसरे के प्रति प्रेम ,निष्ठां , मर्यादा, आदर और सेवा का शपथ लिया और तभी से परंपरा में सिंदूरदान नाम की इस पावन परंपरा का श्रीगणेश हुआ. सौभाग्य सिन्दूर विवाहित तथा अविवाहित स्त्री के मध्य अंतर स्थापित करने वाला सुगम साधन ही नहीं, स्त्री की मान रक्षा तथा पति के कर्तब्यबोध का सफल वाहक भी बन गया.
पुत्रीवत महारानी को पतिगृह विदा करते आचार्य वर तथा आर्या गांधारी का ह्रदय विह्वल हो उठा,परन्तु उसके सुखी जीवन के आभास और अभिलाषा ने उन्हें परम संतुष्टि और अनिर्वचनीय आनंद भी दिया..
महरानी के गमनोपरांत जब शिष्यगण अपने अभिभावकों से पाणिग्रहण हेतु सहमति ले आश्रम में उपस्थित हुए तो वहां की साज-सज्जा और विवाह वेदी देख अनिष्ट की आशंका से उनका मन विचलित होने लगा. सशंकित ह्रदय वे सभी आर्या तथा आचार्य के सम्मुख उपस्थित हुए तथा अपनी धृष्टता के लिए क्षमायाचना करते हुए अपना प्रयोजन स्पष्ट किया..अपना-अपना पक्ष रखते हुए सबने उस ऋषिकन्या पर अपना अधिकार स्थापित किया तथा पाणिग्रहण की अनुमति मांगी .
आचार्य कुछ पल को तो शांत भाव से समस्त अघटित देखते रहे,यकायक भीषण चीत्कार के साथ उठ खड़े हुए..उस भीषण वज्र ध्वनि ने सभी शिष्यों को स्तब्ध कर दिया.सभी निष्पलक निर्मिमेष दृष्टि से आचार्यवर को देखने लगे...और जैसे ही आचार्यवर ने महारानी का सत्य उनके सम्मुख उद्घाटित किया, लज्जा ग्लानि और पापबोध ने उन्हें विक्षिप्त सा कर दिया...जिन्हें वे अबतक एक कुंवारी ऋषिकन्या मान रहे थे ,वह तो परम वन्दनीय महारानी थीं. क्षणमात्र में मोह तिरोहित हो गया और आत्मग्लानि की भीषण ज्वाला में उनका कोमल ह्रदय दग्ध होने लगा..आचार्यवर के चरणों में भूलुंठित शिष्य अपने इस निकृष्ट कुकृत्य हेतु प्राणदंड की याचना करने लगे.
आचार्यवर ने कठोर शब्दों में उन्हें सावधान किया कि इस घोरतम पाप के लिए उन्हें दंड तो अवश्य मिलेगा परन्तु दंड की उद्घोषणा अगले दिन प्रातः काल की जायेगी इस अवधि-मध्य यदि कोई क्षात्र दंडमुक्ति की अभिलाषा रखता हो तो बिना आज्ञा, आश्रम छोड़कर जा सकता है..
कठोरतम दंड का आश्वासन पा शिष्यों ने मानों नूतन जीवन का आधार पाया था..अत्यंत अधीरतापूर्वक वे उषा काल की प्रतीक्षा करने लगे.अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत पहले ही नित्यक्रिया से निवृत हो वे आचार्यवर के कक्ष के सम्मुख उपस्थित हो गए.
शिष्यों की प्रतिबद्धता ने आचार्यवर को परम सुख और संतोष दिया. पश्चात्ताप की जिस अग्नि में इतने काल तक वे जले थे, उसमे से उनका ह्रदय विशुद्ध कंचन बन बाहर आ गया था.अब इससे बड़ा दंड और क्या हो सकता था कि जीवन भर वे अपने इस अकरणीय से शिक्षा ले मोह बंधन से मुक्त रहते. आचार्यवर ने उन्हें दंडमुक्त कर परम ज्ञान का वह उपदेश दिया जो उनके शिक्षण समाप्ति के पूर्व उन्हें प्राप्त होता. इसके साथ ही आचार्यवर ने अपने इन परमज्ञानी शिष्यों को विश्व कल्याण हेतु ज्ञान प्रसार की आज्ञा दे समाज के बीच भेज दिया..
सर्वविदित है कि महर्षि गौतम, कपिल, जैमिनी, पतंजलि, व्यास और कणाद ने ज्ञान रूपी वह धरोहर विश्व को सौंपी है जो सृष्टि के अंत तक संसार का मार्गदर्शन करती रहेंगी....
(हिंदी साहित्य के सिद्ध हस्ताक्षर, परम आदरणीय श्री रामेश्वर प्रसाद सिंह की ह्रदय से आभारी हूँ,जिनके पुराणों,जैन तथा बौद्ध ग्रंथों के गहन अध्ययन अन्वेश्नोपरांत लिखित महान आध्यात्मिक ऐतिहासिक उपन्यास " पाटलीपुत्र की राजनर्तकी " के अध्ययन क्रम में इस प्रसंग से अवगत होने का सौभाग्य मिला...
उक्त पुस्तक में तो यह प्रसंग अत्यंत विस्तृत रूप में उल्लिखित है,मैंने उसके साररूप को अपने शब्दों में ढाल यहाँ प्रेषित करने का प्रयास किया है.चूँकि यह प्रसंग मेरे लिए सर्वथा नवीन एवं रोमांचक था,सो मैंने सार्वजानिक स्थल पर इसे सर्वसुलभ करने का निर्णय लिया. )
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22.9.09
सिंदूरदान (एक पौराणिक आख्यान) भाग-1
वैदिक युग के भी पूर्व सतयुग के आरंभिक काल की कथा है.उन दिनों माता जान्हवी धरा पर अवतरित न हुई थीं..सिन्धु तथा सरस्वती नदी के संगमस्थल पर दैवज्ञ आचार्य महर्षि खालित का गुरुकुल अवस्थित था. महर्षि की बाल विधवा भगिनी गांधारी आश्रम की संचालिका थी.महर्षि के अतुल ज्ञान तथा आर्या गांधारी के वात्सल्यमयी छत्रछाया में छः शिष्य - गौतम, कपिल, जैमिनी, पतंजलि, व्यास और कणाद ब्रह्मचर्य व्रत धारण किये शिक्षण प्राप्त कर रहे थे.
सात वर्षों की शिक्षावधि समाप्त हो चुकी थी,पांच वर्ष शेष रह गए थे. इस काल में कुशाग्रबुद्धि सुसंस्कारी शिष्यों ने कठोरतम साधना द्वारा अपनी कुल कुंडलिनी पर्याप्त जागृत कर ली थी. आत्मबोध तथा युगबोध ने उनके सम्मुख मोह माया को नगण्य कर दिया था.आचार्य खालित तथा आर्या गांधारी को अपने इन पुत्रवत शिष्यों से जितना स्नेह था उतना ही उनपर गर्व भी था.
इन्ही दिनों एक दिन मध्यरात्रि में आश्रम की नीरवता को एक अनिद्य सुन्दरी रमणी के करुण क्रंदन ने अभिशप्त कर दिया. आर्या गांधारी तथा आचार्य महर्षि के पाद पद्मों में भूलुंठित रमणी आश्रय हेतु गुहार लगा रही थी...वह परम सुन्दरी और कोई नहीं कोशल नरेश की अर्धांगिनी महारानी वेपुथमति थी. क्रोधोन्मत्त नृप ने पतिपरायना भार्या का परित्याग कर दिया था..भग्नहृदया महारानी को अपने मान शील की रक्षा की शरणस्थली आश्रय स्वरुप एकमात्र विकल्प यह पावन आश्रम ही दृष्टिगत हुआ था, सो निःशंक निस्पंद उस रात्रि में ऋषि आश्रम में वह आ उपस्थित हुई थी.
महारानी की करुण अवस्था ने भाई बहन के ह्रदय को दग्ध कर दिया.. उन्होंने महारानी को पुत्रीवत स्नेह और आश्रय का आश्वासन दे आश्वस्त किया. परन्तु महारानी के आलौकिक सौन्दर्य ने उन्हें चिंतित और दुविधाग्रस्त भी कर दिया .एक तो महारानी की मानरक्षा के लिए इस तथ्य की गोपनीयता सर्वथा अनिवार्य थी और इसके लिए उन्हें महारानी के लिए गोपनीय वास की व्यवस्था करनी थी और दूसरे अपरिपक्व वयि शिष्यों को उनके परिपक्व होने तथा शिक्षण समाप्ति पर्यंत स्त्री संपर्क से पूर्णतः वंचित रखना था. जिस वयः संधि पर उनके शिष्यगन अवस्थित थे,उनमे विवेक उतना प्रखर न हुआ था कि वे अपना करनीय भली भांति स्थिर कर पाते.आचार्यवर अपने शिष्यों के शिक्षण समाप्ति से पूर्व किसी भी भांति तपश्चर्या में विघ्न उपस्थित होने देना नहीं चाहते थे.
अंततः भाई बहनों ने गहन मंत्रणा कर आश्रम के विस्तृत प्रांगन के एक जनशून्य अलंघ्य दुकूल में महारानी के रहने की समुचित व्यवस्था कर दी तथा महारानी से वचन लिया कि अपनी गोपनीयता को संरक्षित रखते हुए वे कभी भी आश्रम के अवांछित भाग में आवागमन नहीं करेंगी. विछिन्न हृदया महारानी तो स्वयं ही एकांत की अभिलाषिनी थीं, अभीष्ट पूर्ण होते देख उनके संतप्त उदिग्न ह्रदय में नव आशा का संचार हुआ. समय के साथ आर्या गांधारी की देख रेख उनके वात्सल्यपूर्ण स्नेहिल व्यवहार तथा धर्मदेशना के संग आश्रम के उस पवित्र सात्विक परिवेश में शनैः शनैः महारानी का संताप भी घुलने लगा..
कुछ मास में जब सब व्यवस्थित और सुचारू रूप से चलने लगा, पूर्वनियोजित कार्यक्रमानुसार आचार्य ने अपने शिष्यगणों संग चातुर्मास हेतु तीर्थाटन का अनुष्ठान किया. सब व्यवस्था हो गयी किन्तु प्रस्थान से ठीक एक दिन पूर्व कनिष्ठ शिष्य कणाद भीषण ज्वर बाधा से पीड़ित हो गया. उसके स्वस्थ होने तक यात्रा स्थगित कर दी गयी. आचार्य सहित समस्त शिष्य समुदाय उसके उपचार और सेवा में जुट गए,परन्तु रोग दिनानुदिन असाध्य ही होता गया. ज्वर मुक्त होने में कणाद को मास भर लग गया.परन्तु इस दीर्घकालिक ज्वर ने उसे जीर्णकाय कर, उसकी शारीरिक अवस्था ऐसी न छोडी थी कि वह सहस्त्र कोसों की पद यात्रा में सक्षम हो पाता. अंतत महर्षि ने उसे स्वास्थ्य लाभ हेतु आश्रम में ही आर्या गांधारी की देख रेख में छोड़, अन्य शिष्यों संग तीर्थयात्रा को प्रस्थान किया...
स्वास्थ्य लाभ करते हुए कणाद देवी गांधारी के संग आश्रम में रह तो गया परन्तु अपने सहपाठियों का विछोह उसे कष्टकर लगने लगा. एकाकीपन ने उसके मन को अस्थिर और व्यथित कर रखा था...ऐसे ही एक दिन पूर्णमासी की रात्रि को तृतीय प्रहर में ही उसकी निद्रा विखण्डित हो गयी. विचलित मन आसन त्याग जब वह कक्ष से बाहर आया तो, शुभ्र ज्योत्स्ना की चहुँ ओर विस्तृत धवल आभा ने उसे विमुग्ध कर दिया. मन का एकाकीपन और अस्थिरता जैसे उस धवल उर्मी में धुल कर बह गया.आत्मविस्मृत मंत्रमुग्ध हो प्रकृति की उस मनोरम छटा का आनंद लेते हुए उस सौन्दर्य सुधा का रसपान करता भ्रमण को निकल पड़ा..आनंद और चिंतन में मग्न किशोर लक्ष्य ही न कर पाया कि कब उसने आश्रम के निषिद्ध प्रकोष्ठ की परिसीमा का उल्लंघन कर दिया था.....
संयोगवश दुश्चिंताओं में घिरी रानी भी असमय निद्रा भंग के बाद क्लांत मन को प्रकृति की सुरम्यता में रमा दुश्चिंताओं से मुक्ति हेतु सरोवर में स्नान करने चली आयीं थीं.चूँकि रानी आचार्य तथा शिष्यों के तीर्थाटन गमन तथ्य से अवगत थी ,सो निश्चित होकर उन्होंने सरोवर के दुकूल में अवस्थित वृक्ष की शाख पर अपने वस्त्र रख सरोवर के स्निग्ध जल में मुक्त भाव से संतरण करने लगीं.
सरोवर कूल में वृक्ष द्रुमो पर रखे वस्त्रों का मस्तक पर स्पर्श होते ही सहसा कणाद का ध्यान भंग हुआ और जैसे ही उसकी दृष्टि सद्यः स्नाता सर्वांग सुंदरी महारानी पर पडी अचंभित किशोर जड़वत वहां संज्ञासून्य सा ठिठका खडा अपलक उस दृश्य को निहारता रह गया..आकस्मात जब महारानी की दृष्टि इस ओर गयी तो संकोच लज्जा और भयवश वह भी पल भर को काष्ठवत स्थिर हो गयी.परन्तु शीघ्र ही अपनी सम्पूर्ण उर्जा लगा द्युत गति से सरोवर से बाहर निकल पलक मारते लता द्रुमो के मध्य लुप्त हो गयी..
कुछ क्षणों का यह सम्पूर्ण दृश्य विद्युत्पात सा बारम्बार कणाद के मनोमस्तिष्क पर कौंधने लगा...यह एक स्वप्न था अथवा सत्य , निर्णीत करने में वह सर्वथा असमर्थ हो रहा था. हतप्रभ सा किशोर चकित थकित उसी मुद्रा में एक प्रहर तक जड़वत ऐसे ही निर्मिमेष दृष्टि से सरोवर को निहारता सुध बुध बिसराए खडा रह गया.
प्रतिदिन की भांति चतुर्थ प्रहर में आकर जब कणाद ने आर्या गांधारी का अभिवादन और चरण स्पर्श नहीं किया तो चिंतातुर गांधारी ही संघाराम (छात्रावास) की ओर चल दी. वहां कणाद को अनुपस्थित देख अनिष्ट की आशंका से आतंकित गांधारी आश्रम में चहुँ ओर उसका संधान करने लगी. अनुमानित किसी भी स्थल पर उसे न पा सशंकित जब वह महारानी के प्रकोष्ठ की ओर बढ़ी और सरोवर के कूल में महारानी के वस्त्रों के निकट निश्चल कणाद को विस्मृत उस अवस्था में देखा तो सबकुछ समझने में उन्हें दो पल भी न लगा...
अंततः वही हुआ था, जिसका उन्हें भय था. महारानी के अतुलित सौन्दर्य ने बालक के बुद्धि विवेक को राहु सा ग्रस लिया था..आशंकित आर्या ने शिष्य को झकझोरा .. तंद्रा भंग होने पर स्वयं की स्थिति का उसे भान हुआ. वर्जित प्रदेश में प्रवेश कर आश्रम के अनुशाशन को तो उसने भंग किया ही था, वस्त्रहीना स्त्री के सम्मुख इस प्रकार निर्लज्जता से खड़े रह उसका घोर अपमान भी किया था. अनुशाशन तथा मर्यादा भंग कर उसने घोरतम अपराध किया था. विवेक जब पुनर्प्रतिष्ठित हुआ तो अपराधबोध से उसका ह्रदय दग्ध होने लगा..अपने ही मुख से अपने समस्त दोषों को स्वीकृत करते हुए माता गांधारी के पाद पद्मों में लोट कर वह अपने लिए कठोरतम दंड की याचना करने लगा.
बालक के निष्कलुष अश्रुबिंदुओं ने ममतामयी गांधारी का ह्रदय द्रवित कर दिया था..उसकी स्वीकारोक्ति ने उन्हें संशयहीन कर दिया..इस अप्रिय प्रसंग को स्वप्नवत विस्मृत करते हुए, उस निषिद्ध प्रदेश में पुनर्प्रवेश न करने के अनुशासन का प्रतिबद्धता पूर्वक पालन करने का निर्देश दे आर्या एक प्रकार से निश्चिंत सी हो गयी. कणाद ने भी शपथ लेते हुए माता को आश्वस्त किया कि इस प्रकार का अकरणीय भविष्य में कदापि घटित न होगा...
क्रमशः
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सात वर्षों की शिक्षावधि समाप्त हो चुकी थी,पांच वर्ष शेष रह गए थे. इस काल में कुशाग्रबुद्धि सुसंस्कारी शिष्यों ने कठोरतम साधना द्वारा अपनी कुल कुंडलिनी पर्याप्त जागृत कर ली थी. आत्मबोध तथा युगबोध ने उनके सम्मुख मोह माया को नगण्य कर दिया था.आचार्य खालित तथा आर्या गांधारी को अपने इन पुत्रवत शिष्यों से जितना स्नेह था उतना ही उनपर गर्व भी था.
इन्ही दिनों एक दिन मध्यरात्रि में आश्रम की नीरवता को एक अनिद्य सुन्दरी रमणी के करुण क्रंदन ने अभिशप्त कर दिया. आर्या गांधारी तथा आचार्य महर्षि के पाद पद्मों में भूलुंठित रमणी आश्रय हेतु गुहार लगा रही थी...वह परम सुन्दरी और कोई नहीं कोशल नरेश की अर्धांगिनी महारानी वेपुथमति थी. क्रोधोन्मत्त नृप ने पतिपरायना भार्या का परित्याग कर दिया था..भग्नहृदया महारानी को अपने मान शील की रक्षा की शरणस्थली आश्रय स्वरुप एकमात्र विकल्प यह पावन आश्रम ही दृष्टिगत हुआ था, सो निःशंक निस्पंद उस रात्रि में ऋषि आश्रम में वह आ उपस्थित हुई थी.
महारानी की करुण अवस्था ने भाई बहन के ह्रदय को दग्ध कर दिया.. उन्होंने महारानी को पुत्रीवत स्नेह और आश्रय का आश्वासन दे आश्वस्त किया. परन्तु महारानी के आलौकिक सौन्दर्य ने उन्हें चिंतित और दुविधाग्रस्त भी कर दिया .एक तो महारानी की मानरक्षा के लिए इस तथ्य की गोपनीयता सर्वथा अनिवार्य थी और इसके लिए उन्हें महारानी के लिए गोपनीय वास की व्यवस्था करनी थी और दूसरे अपरिपक्व वयि शिष्यों को उनके परिपक्व होने तथा शिक्षण समाप्ति पर्यंत स्त्री संपर्क से पूर्णतः वंचित रखना था. जिस वयः संधि पर उनके शिष्यगन अवस्थित थे,उनमे विवेक उतना प्रखर न हुआ था कि वे अपना करनीय भली भांति स्थिर कर पाते.आचार्यवर अपने शिष्यों के शिक्षण समाप्ति से पूर्व किसी भी भांति तपश्चर्या में विघ्न उपस्थित होने देना नहीं चाहते थे.
अंततः भाई बहनों ने गहन मंत्रणा कर आश्रम के विस्तृत प्रांगन के एक जनशून्य अलंघ्य दुकूल में महारानी के रहने की समुचित व्यवस्था कर दी तथा महारानी से वचन लिया कि अपनी गोपनीयता को संरक्षित रखते हुए वे कभी भी आश्रम के अवांछित भाग में आवागमन नहीं करेंगी. विछिन्न हृदया महारानी तो स्वयं ही एकांत की अभिलाषिनी थीं, अभीष्ट पूर्ण होते देख उनके संतप्त उदिग्न ह्रदय में नव आशा का संचार हुआ. समय के साथ आर्या गांधारी की देख रेख उनके वात्सल्यपूर्ण स्नेहिल व्यवहार तथा धर्मदेशना के संग आश्रम के उस पवित्र सात्विक परिवेश में शनैः शनैः महारानी का संताप भी घुलने लगा..
कुछ मास में जब सब व्यवस्थित और सुचारू रूप से चलने लगा, पूर्वनियोजित कार्यक्रमानुसार आचार्य ने अपने शिष्यगणों संग चातुर्मास हेतु तीर्थाटन का अनुष्ठान किया. सब व्यवस्था हो गयी किन्तु प्रस्थान से ठीक एक दिन पूर्व कनिष्ठ शिष्य कणाद भीषण ज्वर बाधा से पीड़ित हो गया. उसके स्वस्थ होने तक यात्रा स्थगित कर दी गयी. आचार्य सहित समस्त शिष्य समुदाय उसके उपचार और सेवा में जुट गए,परन्तु रोग दिनानुदिन असाध्य ही होता गया. ज्वर मुक्त होने में कणाद को मास भर लग गया.परन्तु इस दीर्घकालिक ज्वर ने उसे जीर्णकाय कर, उसकी शारीरिक अवस्था ऐसी न छोडी थी कि वह सहस्त्र कोसों की पद यात्रा में सक्षम हो पाता. अंतत महर्षि ने उसे स्वास्थ्य लाभ हेतु आश्रम में ही आर्या गांधारी की देख रेख में छोड़, अन्य शिष्यों संग तीर्थयात्रा को प्रस्थान किया...
स्वास्थ्य लाभ करते हुए कणाद देवी गांधारी के संग आश्रम में रह तो गया परन्तु अपने सहपाठियों का विछोह उसे कष्टकर लगने लगा. एकाकीपन ने उसके मन को अस्थिर और व्यथित कर रखा था...ऐसे ही एक दिन पूर्णमासी की रात्रि को तृतीय प्रहर में ही उसकी निद्रा विखण्डित हो गयी. विचलित मन आसन त्याग जब वह कक्ष से बाहर आया तो, शुभ्र ज्योत्स्ना की चहुँ ओर विस्तृत धवल आभा ने उसे विमुग्ध कर दिया. मन का एकाकीपन और अस्थिरता जैसे उस धवल उर्मी में धुल कर बह गया.आत्मविस्मृत मंत्रमुग्ध हो प्रकृति की उस मनोरम छटा का आनंद लेते हुए उस सौन्दर्य सुधा का रसपान करता भ्रमण को निकल पड़ा..आनंद और चिंतन में मग्न किशोर लक्ष्य ही न कर पाया कि कब उसने आश्रम के निषिद्ध प्रकोष्ठ की परिसीमा का उल्लंघन कर दिया था.....
संयोगवश दुश्चिंताओं में घिरी रानी भी असमय निद्रा भंग के बाद क्लांत मन को प्रकृति की सुरम्यता में रमा दुश्चिंताओं से मुक्ति हेतु सरोवर में स्नान करने चली आयीं थीं.चूँकि रानी आचार्य तथा शिष्यों के तीर्थाटन गमन तथ्य से अवगत थी ,सो निश्चित होकर उन्होंने सरोवर के दुकूल में अवस्थित वृक्ष की शाख पर अपने वस्त्र रख सरोवर के स्निग्ध जल में मुक्त भाव से संतरण करने लगीं.
सरोवर कूल में वृक्ष द्रुमो पर रखे वस्त्रों का मस्तक पर स्पर्श होते ही सहसा कणाद का ध्यान भंग हुआ और जैसे ही उसकी दृष्टि सद्यः स्नाता सर्वांग सुंदरी महारानी पर पडी अचंभित किशोर जड़वत वहां संज्ञासून्य सा ठिठका खडा अपलक उस दृश्य को निहारता रह गया..आकस्मात जब महारानी की दृष्टि इस ओर गयी तो संकोच लज्जा और भयवश वह भी पल भर को काष्ठवत स्थिर हो गयी.परन्तु शीघ्र ही अपनी सम्पूर्ण उर्जा लगा द्युत गति से सरोवर से बाहर निकल पलक मारते लता द्रुमो के मध्य लुप्त हो गयी..
कुछ क्षणों का यह सम्पूर्ण दृश्य विद्युत्पात सा बारम्बार कणाद के मनोमस्तिष्क पर कौंधने लगा...यह एक स्वप्न था अथवा सत्य , निर्णीत करने में वह सर्वथा असमर्थ हो रहा था. हतप्रभ सा किशोर चकित थकित उसी मुद्रा में एक प्रहर तक जड़वत ऐसे ही निर्मिमेष दृष्टि से सरोवर को निहारता सुध बुध बिसराए खडा रह गया.
प्रतिदिन की भांति चतुर्थ प्रहर में आकर जब कणाद ने आर्या गांधारी का अभिवादन और चरण स्पर्श नहीं किया तो चिंतातुर गांधारी ही संघाराम (छात्रावास) की ओर चल दी. वहां कणाद को अनुपस्थित देख अनिष्ट की आशंका से आतंकित गांधारी आश्रम में चहुँ ओर उसका संधान करने लगी. अनुमानित किसी भी स्थल पर उसे न पा सशंकित जब वह महारानी के प्रकोष्ठ की ओर बढ़ी और सरोवर के कूल में महारानी के वस्त्रों के निकट निश्चल कणाद को विस्मृत उस अवस्था में देखा तो सबकुछ समझने में उन्हें दो पल भी न लगा...
अंततः वही हुआ था, जिसका उन्हें भय था. महारानी के अतुलित सौन्दर्य ने बालक के बुद्धि विवेक को राहु सा ग्रस लिया था..आशंकित आर्या ने शिष्य को झकझोरा .. तंद्रा भंग होने पर स्वयं की स्थिति का उसे भान हुआ. वर्जित प्रदेश में प्रवेश कर आश्रम के अनुशाशन को तो उसने भंग किया ही था, वस्त्रहीना स्त्री के सम्मुख इस प्रकार निर्लज्जता से खड़े रह उसका घोर अपमान भी किया था. अनुशाशन तथा मर्यादा भंग कर उसने घोरतम अपराध किया था. विवेक जब पुनर्प्रतिष्ठित हुआ तो अपराधबोध से उसका ह्रदय दग्ध होने लगा..अपने ही मुख से अपने समस्त दोषों को स्वीकृत करते हुए माता गांधारी के पाद पद्मों में लोट कर वह अपने लिए कठोरतम दंड की याचना करने लगा.
बालक के निष्कलुष अश्रुबिंदुओं ने ममतामयी गांधारी का ह्रदय द्रवित कर दिया था..उसकी स्वीकारोक्ति ने उन्हें संशयहीन कर दिया..इस अप्रिय प्रसंग को स्वप्नवत विस्मृत करते हुए, उस निषिद्ध प्रदेश में पुनर्प्रवेश न करने के अनुशासन का प्रतिबद्धता पूर्वक पालन करने का निर्देश दे आर्या एक प्रकार से निश्चिंत सी हो गयी. कणाद ने भी शपथ लेते हुए माता को आश्वस्त किया कि इस प्रकार का अकरणीय भविष्य में कदापि घटित न होगा...
क्रमशः
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8.9.09
समालोचना !!!
सम्पूर्ण श्रृष्टि में चर चराचर, प्रत्येक उद्यम सुख और आनंद प्राप्ति के निमित्त ही तो करते हैं. परन्तु समस्या यह है कि सुख आनंद विभिन्न श्रोतों द्वारा जितना अधिक हम लेने / जोड़ने में तत्पर रहा करते हैं, उतना किसी को देने में नहीं. जबकि यदि हम सचमुच ही शाश्वत सुख के अभिलाषी हैं, तो मन वचन और कर्म से सतत सजग रह कर हमें अपने आस पास अपने से जुड़े प्रकृति से लेकर प्राणिमात्र को सुख देना होगा...क्योंकि भौतिकी का यह सिद्धांत निर्विवादित सत्य है कि, हमारे द्वारा संपादित प्रत्येक क्रिया के सापेक्षिक समानुपातिक प्रतिक्रिया होती है..यदि हम सदैव यह ध्यान रखें कि अमुक कारक यदि मेरे सुख का कारण बनती है तो मैं भी दूसरे को यह सुख दूँ, तो संसार में दुःख का संभवतः कोई कारण ही नहीं बचेगा...
जैसे कि यही देख लें , सामान्य जीवन में हम प्रशंषित प्रोत्साहित होने में तो सुख पाते हैं,परन्तु सच्चे मन से प्रशंशा या प्रोत्साहन देने में संकोच कर जाते हैं. अधिकांशतः ऐसे अवसरों पर हमारा अहम् आड़े आ जाया करता है. यही नहीं, बहुधा जाने अनजाने अपने आत्मीय, अपने प्रिय तक से ऐसा कुछ कह जाया करते हैं, जो उनकी आत्मा को गहरे खरोंच जाया करती हैं. हमारे लिए साधारण लगने वाली बातों को भी मन में चुभ जाने पर हमारे अपने अति गंभीरता से ले लिया करते हैं और फिर ये बातें उनके जीवन की दिशा ही बदल दिया करती है. नकारात्मक बातें जीवन को अधोगामी बना बड़ा ही घातक परिणाम छोडा करती हैं...
मेरी एक प्रिय सखी है. उसके लेखन की मैं कायल हूँ..परन्तु इधर बहुत लम्बे समय से उसका मन लेखन से विरत हो गया था...पहले तो मुझे लगा उसकी अन्मयस्कता का कारण संभवतः पारिवारिक व्यस्तता है, पर वार्ता क्रम में जब उसे बड़ा ही निराश हतोत्साहित सा देखा तो मैं कारण जानने को बाध्य हो गयी.....बहुत खोंदने पर ज्ञात हुआ कि एक वरिष्ठ साहित्यकार , जिनपर उसकी अपार आस्था और श्रद्धा थी तथा जिनके मार्गदर्शन में चलना ही उसने अपना परम कर्तब्य माना था, ने न जाने क्या सोचकर उसके लेखन कला की तीव्र भर्त्सना कर दी...इस घटना से उसका संवेदनशील ह्रदय इतना आहत और हतोत्साहित हुआ कि उसने स्वयं ही अपने आप को अयोग्यता का प्रमाण पत्र देते हुए भविष्य में रचनाशीलता से किनारा करने का मन बना लिया.यह मेरे लिए असह्य था,क्योंकि अपनी श्रीजनात्मकता से वह साहित्य को समृद्धि प्रदान कर रही थी...
अपने जीवन में बहुधा ही इन परिस्थितियों से मैं स्वयं भी गुजरी हूँ तथा असंख्य लोगों को गुजरते देखा है,चाहे वह घर हो,कार्यालय हो, साहित्य/कला का क्षेत्र हो या जीवन से जुड़ा कोई भी अन्य क्षेत्र...और मुझे लगता है इस संसार का कोई मनुष्य नहीं जो इससे अछूता रहा होगा..जिससे हम नकारात्मकता की अपेक्षा किये होते हैं,जो हमारे आत्मीय नहीं होते , उनकी आलोचना से भले हम आहत न हो..परन्तु अपने आत्मीय जनों या जिनपर हमें आपर आस्था हो, अनपेक्षित रूप से यदि आलोचना मिले या प्रोत्साहन न मिले,तो हतोत्साहित हताश होना स्वाभाविक है.
ऐसी परिस्थतियों में हौसला हार कर शिथिल हो बैठा जाना, अपने कर्तब्य से विमुख होना, स्वाभाविक सही पर उतना ही अनुचित है, जितना कि किसी को हतोत्साहित करना. यदि हमने अपने कर्म का मार्ग परोपकार(मन वचन या कर्म से किसी को भी सुख देने का) का चुना है, तो ऐसे मार्ग पर कर्म विमुख कर्ताब्य्च्युत होकर बैठना निसंदेह पाप है. हाँ बात यह है कि संवेदनशील ह्रदय जब आहत व्यथित होगा यह नकारात्मक भाव हमारे रचनात्मक उर्जा का क्षय तो करेगा ही...ऐसे में इससे उबरने के साधनों पर यदि विचार कर लिया जाय तथा उसे सदैव ध्यान में रखा जाय तो नकारात्मक भाव से यथासंभव शीघ्रातिशीघ्र छुटकारा मिल सकता है..
सबसे पहले इसपर विचार करें कि क्या आलोचक की व्यक्तिगत योग्यता, अभिरुचि या कार्यक्षेत्र वह है कि वह हमारे विचारों और कार्यों का सही मूल्यांकन कर सकता है....
दुसरे, कि कहीं अधिकांश व्यक्तियों या उनके कृतित्वों का क्षिद्रान्वेशन आलोचक की स्वाभाविक प्रवृत्ति ही तो नहीं .....(क्योंकि कुछ वरिष्ठ और महत्वपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित तथा महत कार्य संपादित कर रहे व्यक्ति भी कुंठाग्रस्त नकारात्मक प्रवृत्ति के होते हैं और उनसे सकारात्मकता की आशा करना रेत से तेल निकलने सा है)
तीसरे ,यदि आलोचक में उपर्युक्त कोई भी दोष नहीं, तो कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने जब नकारात्मक प्रतिक्रिया दी उस कालावधि में वह तनावग्रस्त ,खीझा चिड़चिडाया हुआ था .
इन तथ्यों को ध्यान में रखकर ही निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए कि आलोचक की बातों को कितना वजन देना है और अंगीकार करना है. यूँ तो सर्वोत्तम यह होता है कि सौ पैसे अपनी भी न सुनी जाय.... सबकी सुन, अपनी तथा बाकियों की बातों को अपने विवेक की कसौटी पर भली प्रकार जांच परख कर,अभिमत स्थिर करना ही श्रेयकर हुआ करता है और तत्पश्चात उस मार्ग पर पूर्ण सकारात्मक उर्जा के साथ अग्रसर हों..सामान्यतया यदि व्यक्ति सकारात्मकता से गहरे जुड़ा होता है तो उसका विवेक भी उतना ही जागृत होता है और फिर छोटी छोटी बातों, दुर्घटनाओं की तो बात ही क्या, बड़ी से बड़ी दुर्घट्नाये बाधाएं उसका कर्मपथ अवरुद्ध बाधित नहीं कर पातीं.
कहते हैं न...... " खुदी को कर बुलंद इतना,कि खुदा भी बन्दे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है..." वस्तुतः सही मायने में जिसने भी अपने आत्मबल को सुदृढ़ कर लिया ,विवेक को सतत जागृत रखा, जीवन उसीने जिया...वही विजेता बना... क्योंकि अंततः जीवन में यदि कुछ माने रखता है तो स्वयं द्वारा निष्पादित सत्कर्म और उससे प्राप्त संतोष और शांति...
यह सतत स्मरणीय है कि समालोचना क्रम में सदैव सकारात्मक रहें,नहीं तो आपकी नकारात्मक उक्ति किसी की रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर सकती है...
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जैसे कि यही देख लें , सामान्य जीवन में हम प्रशंषित प्रोत्साहित होने में तो सुख पाते हैं,परन्तु सच्चे मन से प्रशंशा या प्रोत्साहन देने में संकोच कर जाते हैं. अधिकांशतः ऐसे अवसरों पर हमारा अहम् आड़े आ जाया करता है. यही नहीं, बहुधा जाने अनजाने अपने आत्मीय, अपने प्रिय तक से ऐसा कुछ कह जाया करते हैं, जो उनकी आत्मा को गहरे खरोंच जाया करती हैं. हमारे लिए साधारण लगने वाली बातों को भी मन में चुभ जाने पर हमारे अपने अति गंभीरता से ले लिया करते हैं और फिर ये बातें उनके जीवन की दिशा ही बदल दिया करती है. नकारात्मक बातें जीवन को अधोगामी बना बड़ा ही घातक परिणाम छोडा करती हैं...
मेरी एक प्रिय सखी है. उसके लेखन की मैं कायल हूँ..परन्तु इधर बहुत लम्बे समय से उसका मन लेखन से विरत हो गया था...पहले तो मुझे लगा उसकी अन्मयस्कता का कारण संभवतः पारिवारिक व्यस्तता है, पर वार्ता क्रम में जब उसे बड़ा ही निराश हतोत्साहित सा देखा तो मैं कारण जानने को बाध्य हो गयी.....बहुत खोंदने पर ज्ञात हुआ कि एक वरिष्ठ साहित्यकार , जिनपर उसकी अपार आस्था और श्रद्धा थी तथा जिनके मार्गदर्शन में चलना ही उसने अपना परम कर्तब्य माना था, ने न जाने क्या सोचकर उसके लेखन कला की तीव्र भर्त्सना कर दी...इस घटना से उसका संवेदनशील ह्रदय इतना आहत और हतोत्साहित हुआ कि उसने स्वयं ही अपने आप को अयोग्यता का प्रमाण पत्र देते हुए भविष्य में रचनाशीलता से किनारा करने का मन बना लिया.यह मेरे लिए असह्य था,क्योंकि अपनी श्रीजनात्मकता से वह साहित्य को समृद्धि प्रदान कर रही थी...
अपने जीवन में बहुधा ही इन परिस्थितियों से मैं स्वयं भी गुजरी हूँ तथा असंख्य लोगों को गुजरते देखा है,चाहे वह घर हो,कार्यालय हो, साहित्य/कला का क्षेत्र हो या जीवन से जुड़ा कोई भी अन्य क्षेत्र...और मुझे लगता है इस संसार का कोई मनुष्य नहीं जो इससे अछूता रहा होगा..जिससे हम नकारात्मकता की अपेक्षा किये होते हैं,जो हमारे आत्मीय नहीं होते , उनकी आलोचना से भले हम आहत न हो..परन्तु अपने आत्मीय जनों या जिनपर हमें आपर आस्था हो, अनपेक्षित रूप से यदि आलोचना मिले या प्रोत्साहन न मिले,तो हतोत्साहित हताश होना स्वाभाविक है.
ऐसी परिस्थतियों में हौसला हार कर शिथिल हो बैठा जाना, अपने कर्तब्य से विमुख होना, स्वाभाविक सही पर उतना ही अनुचित है, जितना कि किसी को हतोत्साहित करना. यदि हमने अपने कर्म का मार्ग परोपकार(मन वचन या कर्म से किसी को भी सुख देने का) का चुना है, तो ऐसे मार्ग पर कर्म विमुख कर्ताब्य्च्युत होकर बैठना निसंदेह पाप है. हाँ बात यह है कि संवेदनशील ह्रदय जब आहत व्यथित होगा यह नकारात्मक भाव हमारे रचनात्मक उर्जा का क्षय तो करेगा ही...ऐसे में इससे उबरने के साधनों पर यदि विचार कर लिया जाय तथा उसे सदैव ध्यान में रखा जाय तो नकारात्मक भाव से यथासंभव शीघ्रातिशीघ्र छुटकारा मिल सकता है..
सबसे पहले इसपर विचार करें कि क्या आलोचक की व्यक्तिगत योग्यता, अभिरुचि या कार्यक्षेत्र वह है कि वह हमारे विचारों और कार्यों का सही मूल्यांकन कर सकता है....
दुसरे, कि कहीं अधिकांश व्यक्तियों या उनके कृतित्वों का क्षिद्रान्वेशन आलोचक की स्वाभाविक प्रवृत्ति ही तो नहीं .....(क्योंकि कुछ वरिष्ठ और महत्वपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित तथा महत कार्य संपादित कर रहे व्यक्ति भी कुंठाग्रस्त नकारात्मक प्रवृत्ति के होते हैं और उनसे सकारात्मकता की आशा करना रेत से तेल निकलने सा है)
तीसरे ,यदि आलोचक में उपर्युक्त कोई भी दोष नहीं, तो कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने जब नकारात्मक प्रतिक्रिया दी उस कालावधि में वह तनावग्रस्त ,खीझा चिड़चिडाया हुआ था .
इन तथ्यों को ध्यान में रखकर ही निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए कि आलोचक की बातों को कितना वजन देना है और अंगीकार करना है. यूँ तो सर्वोत्तम यह होता है कि सौ पैसे अपनी भी न सुनी जाय.... सबकी सुन, अपनी तथा बाकियों की बातों को अपने विवेक की कसौटी पर भली प्रकार जांच परख कर,अभिमत स्थिर करना ही श्रेयकर हुआ करता है और तत्पश्चात उस मार्ग पर पूर्ण सकारात्मक उर्जा के साथ अग्रसर हों..सामान्यतया यदि व्यक्ति सकारात्मकता से गहरे जुड़ा होता है तो उसका विवेक भी उतना ही जागृत होता है और फिर छोटी छोटी बातों, दुर्घटनाओं की तो बात ही क्या, बड़ी से बड़ी दुर्घट्नाये बाधाएं उसका कर्मपथ अवरुद्ध बाधित नहीं कर पातीं.
कहते हैं न...... " खुदी को कर बुलंद इतना,कि खुदा भी बन्दे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है..." वस्तुतः सही मायने में जिसने भी अपने आत्मबल को सुदृढ़ कर लिया ,विवेक को सतत जागृत रखा, जीवन उसीने जिया...वही विजेता बना... क्योंकि अंततः जीवन में यदि कुछ माने रखता है तो स्वयं द्वारा निष्पादित सत्कर्म और उससे प्राप्त संतोष और शांति...
यह सतत स्मरणीय है कि समालोचना क्रम में सदैव सकारात्मक रहें,नहीं तो आपकी नकारात्मक उक्ति किसी की रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर सकती है...
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समाज
31.8.09
मुद्रा चिकित्सा (भाग -२)
भाग - १ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये.
अतिविनाम्रतापूर्वक मैं स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि मैं कोई योग विशेषज्ञ नहीं और न ही मुद्रा चिकित्सा में मैंने कोई विशेषज्ञता प्राप्त की है..ईश्वर की असीम अनुकम्पा से बाल्यावस्था से ही अपने परिवेश तथा अन्यान्य श्रोतों से शरीर तथा मन को सात्विकता से जोड़कर जीवन में सच्चे सुख प्राप्ति के साधनों के विषय में जानने का महत सुअवसर मिला..
मेरे पिताजी योग से जुड़े थे और उनके पास योग की अनेक पुस्तकें थीं. उन्हें क्रियायें / मुद्राएँ करते देखा करती तथा उन पुस्तकों को भी यदा कदा उल्टा-पुल्टा करती थी..परवर्ती वर्षों में अध्यात्म के साथ साथ "रेकी ", "आर्ट ऑफ़ लिविंग" इत्यादि के प्रशिक्षण क्रम में भी मुद्रा चिकित्सा के विषय में बहुत कुछ जानने-सुनने तथा सीखने का सुअवसर मिला...
इसके विस्मयकारी सकारात्मक प्रभाव को प्रत्यक्ष ही अपने जीवन में मैंने अनुभव किया है..और आज इसे उत्सुक परन्तु अनभिज्ञ लोगों के कल्याणार्थ प्रेषित कर रही हूँ. मनुष्य अपने जीवन में प्रत्येक उपक्रम सुख प्राप्ति हेतु ही तो करता है,पर चूँकि उसकी समस्त चेष्टाएँ सदा ही सकारात्मक दिशा में नहीं रहतीं, फलस्वरूप सुख के स्थान पर दुःख उसके हाथ आता है.
इस विधा पर सचित्र विस्तृत विवरण किसी भी मुद्रा चिकित्सा या योग मुद्रा की पुस्तक में जिज्ञासु सहज ही पा सकते हैं...
हमें तो प्रशिक्षण क्रम में यही निर्देशित किया गया था कि किसी भी मुद्रा को अपरिहार्य लाभ हेतु न्यूनतम चालीस मिनट करना चाहिए,परन्तु मैंने अनुभूत किया है कि कभी कभार व्यस्तता वश यह समय सीमा यदि संकुचित भी हो जाती है तो अल्पकाल में भी लाभ मिलता ही है.समयाभाव के बहाने इसे पूर्णतः टालना उचित नहीं रहता..
2. अपान मुद्रा :- अंगूठे से दूसरी अंगुली (मध्यमा) तथा तीसरी अंगुली (अनामिका) के पोरों को मोड़कर अंगूठे के पोर से स्पर्श करने से जो मुद्रा बनती है,उसे अपान मुद्रा कहते हैं..
लाभ - यदि मल मूत्र निष्कासन में समस्या आ रही हो,पसीना नहीं आ रहा हो,तो इस मुद्रा के चालीस मिनट के प्रयोग से इस अवधि के मध्य ही शरीर से प्रदूषित विजातीय द्रव्य निष्काषित हो जाते हैं.देखा गया है कि जब औषधि तक का प्रयोग निष्फल रहता है, इस मुद्रा का प्रयोग त्वरित लाभ देता है..
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3. शून्य मुद्रा :- अंगूठे से दूसरी अंगुली (मध्यमा,सबसे लम्बी वाली अंगुली) को मोड़कर अंगूठे के मूल भाग (जड़ में) स्पर्श करें और अंगूठे को मोड़कर मध्यमा के ऊपर से ऐसे दबायें कि मध्यमा उंगली का निरंतर स्पर्श अंगूठे के मूल भाग से बना रहे..बाकी की तीनो अँगुलियों को अपनी सीध में रखें.इस तरह से जो मुद्रा बनती है उसे शून्य मुद्रा कहते हैं..
लाभ - इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से कान बहना, बहरापन, कान में दर्द इत्यादि कान के विभिन्न रोगों से मुक्ति संभव है.यदि कान में दर्द उठे और इस मुद्रा को प्रयुक्त किया जाय तो पांच सात मिनट के मध्य ही लाभ अनुभूत होने लगता है.इसके निरंतर अभ्यास से कान के पुराने रोग भी पूर्णतः ठीक हो जाते हैं..
इसकी अनुपूरक मुद्रा आकाश मुद्रा है.इस मुद्रा के साथ साथ यदि आकाश मुद्रा का प्रयोग भी किया जाय तो व्यापक लाभ मिलता है.

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4. सूर्य मुद्रा :- अंगूठे से तीसरी अंगुली अनामिका (रिंग फिंगर) को मोड़कर उसके ऊपरी नाखून वाले भाग को अंगूठे के जड़ (गद्देदार भाग) पर दवाब(हल्का) डालें और अंगूठा मोड़कर अनामिका पर निरंतर दवाब(हल्का) बनाये रखें तथा शेष अँगुलियों को अपने सीध में सीधा रखें.....इस तरह जिस मुद्रा का निर्माण होगा उसे सूर्य मुद्रा कहते हैं...
लाभ - यह मुद्रा शारीरिक स्थूलता (मोटापा) घटाने में अत्यंत सहायक होता है...जो लोग मोटापे से परेशान हैं,इस मुद्रा का प्रयोग कर फलित होते देख सकते हैं..
( अनामिका को महत्त्व लगभग सभी धर्म सम्प्रदाय में दिया गया है.इसे बड़ा ही शुभ और मंगलकारी माना गया है.हिन्दुओं में पूजा पाठ उत्सव आदि पर मस्तक पर जो तिलक लगाया जाता है,वह इसलिए कि ललाट में जिस स्थान पर तिलक लगाया जाता है योग के अनुसार मस्तक के उस भाग में द्विदल कमल होता है और अनामिका द्वारा उस स्थान के स्पर्श से मस्तिष्क की अदृश्य शक्ति जागृत हो जाती हैं,व्यक्तित्व तेजोमय हो जाता है)

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5. वायु मुद्रा :- अंगूठे के बाद वाली पहली अंगुली - तर्जनी को मोड़कर उसके नाखभाग का दवाब (हल्का) अंगूठे के मूल भाग (जड़) में किया जाय और अंगूठे से तर्जनी पर दवाब बनाया जाय ,शेष तीनो अँगुलियों को अपने सीध में सीधा रखा जाय...इससे जो मुद्रा बनती है,उसे वायु मुद्रा कहते हैं.
लाभ - वायु संबन्धी समस्त रोग यथा - गठिया,जोडों का दर्द, वात, पक्षाघात, हाथ पैर या शरीर में कम्पन , लकवा, हिस्टीरिया, वायु शूल, गैस, इत्यादि अनेक असाध्य रोग इस मुद्रा से ठीक हो जाते हैं. इस मुद्रा के साथ कभी कभी प्राण मुद्रा भी करते रहना चाहिए...

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6. प्राण मुद्रा :- अंगूठे से तीसरी अनामिका तथा चौथी कनिष्ठिका अँगुलियों के पोरों को एकसाथ अंगूठे के पोर के साथ मिलाकर शेष दोनों अँगुलियों को अपने सीध में खडा रखने से जो मुद्रा बनती है उसे प्राण मुद्रा कहते हैं..
लाभ - ह्रदय रोग में रामबाण तथा नेत्रज्योति बढाने में यह मुद्रा परम सहायक है.साथ ही यह प्राण शक्ति बढ़ाने वाला भी होता है.प्राण शक्ति प्रबल होने पर मनुष्य के लिए किसी भी प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्यवान रहना अत्यंत सहज हो जाता है.वस्तुतः दृढ प्राण शक्ति ही जीवन को सुखद बनाती है..
इस मुद्रा की विशेषता यह है कि इसके लिए अवधि की कोई बाध्यता नहीं..इसे कुछ मिनट भी किया जा सकता है.

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7. पृथ्वी मुद्रा :- अंगूठे से तीसरी अंगुली - अनामिका (रिंग फिंगर) के पोर को अंगूठे के पोर के साथ स्पर्श करने पर पृथ्वी मुद्रा बनती है.शेष तीनो अंगुलियाँ अपनी सीध में खड़ी होनी चाहिए..
लाभ - जैसे पृथ्वी सदैव पोषण करती है,इस मुद्रा से भी शरीर का पोषण होता है.शारीरिक दुर्बलता दूर कर स्फूर्ति और ताजगी देने वाला, बल वृद्धिकारक यह मुद्रा अति उपयोगी है.जो व्यक्ति अपने क्षीण काया (दुबलेपन) से चिंतित व्यथित हैं,वे यदि इस मुद्रा का निरंतर अभ्यास करें तो निश्चित ही कष्ट से मुक्ति पा सकते हैं. यह मुद्रा रोगमुक्त ही नहीं बल्कि तनाव मुक्त भी करती है..यह व्यक्ति में सहिष्णुता का विकाश करती है.
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8. वरुण मुद्रा :- कनिष्ठिका (सबसे छोटी अंगुली) तथा अंगूठे के पोर को मिलाकर शेष अँगुलियों को यदि अपनी सीध में राखी जाय तो वरुण मुद्रा बनती है..
लाभ - यह मुद्रा रक्त संचार संतुलित करने,चर्मरोग से मुक्ति दिलाने, रक्त की न्यूनता (एनीमिया) दूर करने में परम सहायक है.वरुण मुद्रा के नियमित अभ्यास से शरीर में जल तत्व की कमी से होने वाले अनेक विकार समाप्त हो जाते हैं.वस्तुतः जल की कमी से ही शरीर में रक्त विकार होते हैं.यह मुद्रा त्वचा को स्निग्ध तथा सुन्दर बनता है.
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9. अंगुष्ठ मुद्रा :- बाएँ हाथ का अंगूठा सीधा खडा कर दाहिने हाथ से बाएं हाथ कि अँगुलियों में परस्पर फँसाते हुए दोनों पंजों को ऐसे जोडें कि दाहिना अंगूठा बाएं अंगूठे को बहार से आवृत्त कर ले ,इस प्रकार जो मुद्रा बनेगी उसे अंगुष्ठ मुद्रा कहेंगे.
लाभ - अंगूठे में अग्नि तत्व होता है.इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर में उष्मता बढ़ने लगती है.शरीर में जमा कफ तत्व सूखकर नष्ट हो जाता है.सर्दी जुकाम,खांसी इत्यादि रोगों में यह बड़ा लाभदायी होता है.कभी यदि शीत प्रकोप में आ जाएँ और शरीर में ठण्ड से कंपकंपाहट होने लगे तो इस मुद्रा का प्रयोग त्वरित लाभ देता है.

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मेरे अनुज, (शिवकुमार मिश्र) ने आलेख आलेख के प्रथम भाग का शीर्षक पढ़ कहा था कि उसने सोचा वर्तमान चिकित्सा में मुद्रा की आवश्यकता पर मैंने कोई व्यंग्य लिखा है...
व्यंगात्मक तो नहीं विवेचनात्मक प्रयास अवश्य है मेरा इस आलेख के माध्यम से कि चिकित्सा में मुद्रा की अपरिहार्यता को हम अपने इन मुद्राओं द्वारा नगण्य ठहरा सकते हैं.जब इतनी शक्ति हमारे अपने ही इन अँगुलियों में है,तो क्यों न इन मुद्राओं के प्रयोग द्वारा उस मुद्रा (पैसे) की बचत कर लें...
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अतिविनाम्रतापूर्वक मैं स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि मैं कोई योग विशेषज्ञ नहीं और न ही मुद्रा चिकित्सा में मैंने कोई विशेषज्ञता प्राप्त की है..ईश्वर की असीम अनुकम्पा से बाल्यावस्था से ही अपने परिवेश तथा अन्यान्य श्रोतों से शरीर तथा मन को सात्विकता से जोड़कर जीवन में सच्चे सुख प्राप्ति के साधनों के विषय में जानने का महत सुअवसर मिला..
मेरे पिताजी योग से जुड़े थे और उनके पास योग की अनेक पुस्तकें थीं. उन्हें क्रियायें / मुद्राएँ करते देखा करती तथा उन पुस्तकों को भी यदा कदा उल्टा-पुल्टा करती थी..परवर्ती वर्षों में अध्यात्म के साथ साथ "रेकी ", "आर्ट ऑफ़ लिविंग" इत्यादि के प्रशिक्षण क्रम में भी मुद्रा चिकित्सा के विषय में बहुत कुछ जानने-सुनने तथा सीखने का सुअवसर मिला...
इसके विस्मयकारी सकारात्मक प्रभाव को प्रत्यक्ष ही अपने जीवन में मैंने अनुभव किया है..और आज इसे उत्सुक परन्तु अनभिज्ञ लोगों के कल्याणार्थ प्रेषित कर रही हूँ. मनुष्य अपने जीवन में प्रत्येक उपक्रम सुख प्राप्ति हेतु ही तो करता है,पर चूँकि उसकी समस्त चेष्टाएँ सदा ही सकारात्मक दिशा में नहीं रहतीं, फलस्वरूप सुख के स्थान पर दुःख उसके हाथ आता है.
इस विधा पर सचित्र विस्तृत विवरण किसी भी मुद्रा चिकित्सा या योग मुद्रा की पुस्तक में जिज्ञासु सहज ही पा सकते हैं...
हमें तो प्रशिक्षण क्रम में यही निर्देशित किया गया था कि किसी भी मुद्रा को अपरिहार्य लाभ हेतु न्यूनतम चालीस मिनट करना चाहिए,परन्तु मैंने अनुभूत किया है कि कभी कभार व्यस्तता वश यह समय सीमा यदि संकुचित भी हो जाती है तो अल्पकाल में भी लाभ मिलता ही है.समयाभाव के बहाने इसे पूर्णतः टालना उचित नहीं रहता..
2. अपान मुद्रा :- अंगूठे से दूसरी अंगुली (मध्यमा) तथा तीसरी अंगुली (अनामिका) के पोरों को मोड़कर अंगूठे के पोर से स्पर्श करने से जो मुद्रा बनती है,उसे अपान मुद्रा कहते हैं..
लाभ - यदि मल मूत्र निष्कासन में समस्या आ रही हो,पसीना नहीं आ रहा हो,तो इस मुद्रा के चालीस मिनट के प्रयोग से इस अवधि के मध्य ही शरीर से प्रदूषित विजातीय द्रव्य निष्काषित हो जाते हैं.देखा गया है कि जब औषधि तक का प्रयोग निष्फल रहता है, इस मुद्रा का प्रयोग त्वरित लाभ देता है..
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3. शून्य मुद्रा :- अंगूठे से दूसरी अंगुली (मध्यमा,सबसे लम्बी वाली अंगुली) को मोड़कर अंगूठे के मूल भाग (जड़ में) स्पर्श करें और अंगूठे को मोड़कर मध्यमा के ऊपर से ऐसे दबायें कि मध्यमा उंगली का निरंतर स्पर्श अंगूठे के मूल भाग से बना रहे..बाकी की तीनो अँगुलियों को अपनी सीध में रखें.इस तरह से जो मुद्रा बनती है उसे शून्य मुद्रा कहते हैं..
लाभ - इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से कान बहना, बहरापन, कान में दर्द इत्यादि कान के विभिन्न रोगों से मुक्ति संभव है.यदि कान में दर्द उठे और इस मुद्रा को प्रयुक्त किया जाय तो पांच सात मिनट के मध्य ही लाभ अनुभूत होने लगता है.इसके निरंतर अभ्यास से कान के पुराने रोग भी पूर्णतः ठीक हो जाते हैं..
इसकी अनुपूरक मुद्रा आकाश मुद्रा है.इस मुद्रा के साथ साथ यदि आकाश मुद्रा का प्रयोग भी किया जाय तो व्यापक लाभ मिलता है.

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4. सूर्य मुद्रा :- अंगूठे से तीसरी अंगुली अनामिका (रिंग फिंगर) को मोड़कर उसके ऊपरी नाखून वाले भाग को अंगूठे के जड़ (गद्देदार भाग) पर दवाब(हल्का) डालें और अंगूठा मोड़कर अनामिका पर निरंतर दवाब(हल्का) बनाये रखें तथा शेष अँगुलियों को अपने सीध में सीधा रखें.....इस तरह जिस मुद्रा का निर्माण होगा उसे सूर्य मुद्रा कहते हैं...
लाभ - यह मुद्रा शारीरिक स्थूलता (मोटापा) घटाने में अत्यंत सहायक होता है...जो लोग मोटापे से परेशान हैं,इस मुद्रा का प्रयोग कर फलित होते देख सकते हैं..
( अनामिका को महत्त्व लगभग सभी धर्म सम्प्रदाय में दिया गया है.इसे बड़ा ही शुभ और मंगलकारी माना गया है.हिन्दुओं में पूजा पाठ उत्सव आदि पर मस्तक पर जो तिलक लगाया जाता है,वह इसलिए कि ललाट में जिस स्थान पर तिलक लगाया जाता है योग के अनुसार मस्तक के उस भाग में द्विदल कमल होता है और अनामिका द्वारा उस स्थान के स्पर्श से मस्तिष्क की अदृश्य शक्ति जागृत हो जाती हैं,व्यक्तित्व तेजोमय हो जाता है)

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5. वायु मुद्रा :- अंगूठे के बाद वाली पहली अंगुली - तर्जनी को मोड़कर उसके नाखभाग का दवाब (हल्का) अंगूठे के मूल भाग (जड़) में किया जाय और अंगूठे से तर्जनी पर दवाब बनाया जाय ,शेष तीनो अँगुलियों को अपने सीध में सीधा रखा जाय...इससे जो मुद्रा बनती है,उसे वायु मुद्रा कहते हैं.
लाभ - वायु संबन्धी समस्त रोग यथा - गठिया,जोडों का दर्द, वात, पक्षाघात, हाथ पैर या शरीर में कम्पन , लकवा, हिस्टीरिया, वायु शूल, गैस, इत्यादि अनेक असाध्य रोग इस मुद्रा से ठीक हो जाते हैं. इस मुद्रा के साथ कभी कभी प्राण मुद्रा भी करते रहना चाहिए...
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6. प्राण मुद्रा :- अंगूठे से तीसरी अनामिका तथा चौथी कनिष्ठिका अँगुलियों के पोरों को एकसाथ अंगूठे के पोर के साथ मिलाकर शेष दोनों अँगुलियों को अपने सीध में खडा रखने से जो मुद्रा बनती है उसे प्राण मुद्रा कहते हैं..
लाभ - ह्रदय रोग में रामबाण तथा नेत्रज्योति बढाने में यह मुद्रा परम सहायक है.साथ ही यह प्राण शक्ति बढ़ाने वाला भी होता है.प्राण शक्ति प्रबल होने पर मनुष्य के लिए किसी भी प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्यवान रहना अत्यंत सहज हो जाता है.वस्तुतः दृढ प्राण शक्ति ही जीवन को सुखद बनाती है..
इस मुद्रा की विशेषता यह है कि इसके लिए अवधि की कोई बाध्यता नहीं..इसे कुछ मिनट भी किया जा सकता है.

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7. पृथ्वी मुद्रा :- अंगूठे से तीसरी अंगुली - अनामिका (रिंग फिंगर) के पोर को अंगूठे के पोर के साथ स्पर्श करने पर पृथ्वी मुद्रा बनती है.शेष तीनो अंगुलियाँ अपनी सीध में खड़ी होनी चाहिए..
लाभ - जैसे पृथ्वी सदैव पोषण करती है,इस मुद्रा से भी शरीर का पोषण होता है.शारीरिक दुर्बलता दूर कर स्फूर्ति और ताजगी देने वाला, बल वृद्धिकारक यह मुद्रा अति उपयोगी है.जो व्यक्ति अपने क्षीण काया (दुबलेपन) से चिंतित व्यथित हैं,वे यदि इस मुद्रा का निरंतर अभ्यास करें तो निश्चित ही कष्ट से मुक्ति पा सकते हैं. यह मुद्रा रोगमुक्त ही नहीं बल्कि तनाव मुक्त भी करती है..यह व्यक्ति में सहिष्णुता का विकाश करती है.
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8. वरुण मुद्रा :- कनिष्ठिका (सबसे छोटी अंगुली) तथा अंगूठे के पोर को मिलाकर शेष अँगुलियों को यदि अपनी सीध में राखी जाय तो वरुण मुद्रा बनती है..
लाभ - यह मुद्रा रक्त संचार संतुलित करने,चर्मरोग से मुक्ति दिलाने, रक्त की न्यूनता (एनीमिया) दूर करने में परम सहायक है.वरुण मुद्रा के नियमित अभ्यास से शरीर में जल तत्व की कमी से होने वाले अनेक विकार समाप्त हो जाते हैं.वस्तुतः जल की कमी से ही शरीर में रक्त विकार होते हैं.यह मुद्रा त्वचा को स्निग्ध तथा सुन्दर बनता है.
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9. अंगुष्ठ मुद्रा :- बाएँ हाथ का अंगूठा सीधा खडा कर दाहिने हाथ से बाएं हाथ कि अँगुलियों में परस्पर फँसाते हुए दोनों पंजों को ऐसे जोडें कि दाहिना अंगूठा बाएं अंगूठे को बहार से आवृत्त कर ले ,इस प्रकार जो मुद्रा बनेगी उसे अंगुष्ठ मुद्रा कहेंगे.
लाभ - अंगूठे में अग्नि तत्व होता है.इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर में उष्मता बढ़ने लगती है.शरीर में जमा कफ तत्व सूखकर नष्ट हो जाता है.सर्दी जुकाम,खांसी इत्यादि रोगों में यह बड़ा लाभदायी होता है.कभी यदि शीत प्रकोप में आ जाएँ और शरीर में ठण्ड से कंपकंपाहट होने लगे तो इस मुद्रा का प्रयोग त्वरित लाभ देता है.

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मेरे अनुज, (शिवकुमार मिश्र) ने आलेख आलेख के प्रथम भाग का शीर्षक पढ़ कहा था कि उसने सोचा वर्तमान चिकित्सा में मुद्रा की आवश्यकता पर मैंने कोई व्यंग्य लिखा है...
व्यंगात्मक तो नहीं विवेचनात्मक प्रयास अवश्य है मेरा इस आलेख के माध्यम से कि चिकित्सा में मुद्रा की अपरिहार्यता को हम अपने इन मुद्राओं द्वारा नगण्य ठहरा सकते हैं.जब इतनी शक्ति हमारे अपने ही इन अँगुलियों में है,तो क्यों न इन मुद्राओं के प्रयोग द्वारा उस मुद्रा (पैसे) की बचत कर लें...
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