10.9.20

ममत्व के निहितार्थ- जिउतिया पर

 असंख्यों नरबलियों के उपरान्त जब महाभारत का युद्ध सम्पन्न हुआ तो कलपती बिलखती स्त्रियों के बीच कुछ ही ऐसी स्त्रियाँ बची थीं, जिनके पति या सन्तान में से कोई बचे थे।इन्हीं में से एक द्रौपदी भी थीं,दैव कृपा से जिनके पति और पाँचों पुत्र बच गए थे।किन्तु यह सन्तोष शीघ्र ही धराशायी हो गया जब अश्वत्थामा ने छल से द्रौपदी पुत्रों को पाण्डव समझकर सोते में मार दिया।

अपना वंश, राज्य का उत्तराधिकारी खोकर समस्त प्रजा ही नहीं द्रौपदी भी सन्ताप से विक्षिप्त सी हो गयी।किसी में भी जीवित रहने की कामना नहीं बची थी।तब ऋषि समाज ने आकर विलाप करती स्त्रियों के उस समूह को आकर टूटने से बचाने का संकल्प लिया।ज्ञान चर्चा से जब उनका मन कुछ सम्हला तो द्रौपदी ने विह्वल कातर भाव से ऋषियों से प्रश्न किया कि यह असह्य दुःख उन्हें ही क्यों सहना पड़ा और आगे भी क्या माताओं को अपने जीवनकाल में ही अपनी संतानों की मृत्यु और वैधव्य का नर्क इसी तरह भोगते रहना होगा?

ऋषिकुल ने तब उन्हें समझाते हुए वे कथाएँ कहीं,जिनमें से कुछ का उल्लेख आज भी जीवित्पुत्रिका व्रत पुस्तिका में उल्लिखित है।
ऋषियों ने उन्हें बताया कि केवल वे ही नहीं हैं जिन्हें सन्तान का यह वियोग सहना पड़ा है, जो स्वयं जगतजननी हैं,उन्हें भी सन्तान पाने और उन्हें दीर्घायु रखने के लिए न केवल असह्य कष्ट भोगने पड़े,तप करना पड़ा,अपितु अनेक यत्न भी करने पड़े हैं।
माँ आदिशक्ति के नौ रूपों में जो पाँचवा रूप- "स्कंदमाता"(स्कन्द-कार्तिकेय) का है, उसे पाने की पूरी कथा ही एक असाधारण तप और त्याग की कथा है।

रति के श्राप से देवी पार्वती कभी स्वाभाविक रूप से गर्भ धारण नहीं कर सकती थीं।इसके लिए उन्होंने गहन तप कर वह स्थितियाँ बनायीं जिससे अपने शरीर से बाहर ही वे भ्रूण का सृजन और पोषण कर सकें।किन्तु ऐन अवसर पर जब वह गर्भ पूर्ण और परिपक्व होने को था, तारकासुर उसे नष्ट करने पहुँच गया और उसकी रक्षा क्रम में अग्निदेव और माता गङ्गा के अथक प्रयास के उपरांत भी वह अक्षुण्ण न रह सका।गिरकर उसके छः खण्ड हो गए जो कृतिकाओं को प्राप्त हुए।
कल्पना कीजिये कि अपने सन्तान को प्राप्त करने की उस अन्तिम बेला में जब ममत्व पिघलकर दूध बनकर स्तनों में उतर आता है, उस घड़ी यदि उस माँ से उसका संतान छिन जाए, तो उसकी क्या मनोदशा होगी।
अपहृत सन्तान को ढूँढती हुई जब माता पार्वती कृतिकाओं के पास पहुँचीं तो कहते हैं छः भाग में बंटे हुए बालकों को पकड़कर इतनी जोर से अपने वक्ष में समेटा कि वे पुनः छः से एक हो गए।किन्तु तबतक कृतिकाओं का ममत्व भी उस बालक से ऐसे बन्ध गया था कि उससे विछोह की स्थिति में वे प्राणोत्सर्ग को तत्पर हो उठीं। 
और तब महादेव ने मध्यस्तता कर माता को इसके लिए प्रस्तुत कर दिया कि बारह वर्ष तक वह बालक कृतिकाओं की ममता को पोषण देता कृतिकालोक में ही वास करेगा और उसके उपरान्त स्वेच्छा से कृतिकाएँ बालक को माता पार्वती को सौंप देंगी।

स्त्री तो छोड़िए, किसी भी नवप्रसूता जीव जन्तु के पास उसके शिशु को स्पर्श करने का प्रयास करके देखिए,अपना सम्पूर्ण बल लगाकर वह आक्रमण को प्रस्तुत हो जाएगी, फिर स्वेच्छा से उस संतान का दूसरे को दान...
वस्तुतः यह तभी सम्भव है, जब ममत्व की परिसीमा इतनी विस्तृत हो, जिसमें व्यक्ति स्वयं को खो दे और सबको उसमें समेट ले।ममत्व के इस स्वरूप की प्रतिस्थापना हेतु ही इन पूरे घटनाक्रम की सर्जना हुई।ममता केवल अपने जाए सन्तान में ही सिमटकर रह जाए, तो यह ममत्व का सबसे संकुचित और छिछला रूप है।

आगे इसी क्रम में ऋषि इस ममत्व की भावना का उद्दात्त रूप और मानव मात्र में इसकी उपस्थिति दिखाने के लिए एक और घटना का उल्लेख करते हैं जब सतयुग में नागवंश और गरुड़वंश में नित्यप्रति के संघर्ष के उपरांत एक व्यवस्था बनी थी कि गरुड़ यदि नागों का अनियंत्रित आखेट न करे तो स्वतः उसके आहार हेतु एक नाग प्रतिदिन उसके सम्मुख उपस्थित हो जाया करेगा।व्यवस्था से अनियंत्रित संहार तो रुक गया, किन्तु नागलोक का प्रतिदिन का किसी न किसी के घर का करुण क्रन्दन निर्बाध चलता ही रह।
एक दिन संयोगवश राजा जीमूतवाहन जो नागों की उन बस्ती से गुजरते अपने ससुराल जा रहे थे,उन्होंने एक नागमाता का विह्वल क्रन्दन सुना जिनका पुत्र शंखचूड़ आज गरुड़ का ग्रास बनने वाला था।
कहा जाता है कि एक प्रसूता ही दूसरे स्त्री के मन की ममता जान सकती है, किन्तु यह मिथ्या भ्रम है।ममत्व का लिंग से कोई लेनादेना नहीं।यह भाव तो किसी में भी हो सकती है और नहीं तो नवप्रसूता में भी नहीं।
राजा जीमूतवाहन ने उस माँ की विह्वलता को उससे भी अधिक तीव्रता से अनुभूत किया और उस आखेट के स्थान पर स्वयं को गरुड़ के सम्मुख आहार रूप में उपस्थित कर दिया।
इधर गरुड़ ने जब देखा कि मृत्यु के भय और घायल होने की पीड़ा से व्याकुल होकर जहाँ बाकी सारे भागते फिरते थे, यह मनुष्य न केवल निश्छल होकर अडिग खड़ा है अपितु पूर्ण प्रयास में है कि मुझे कहीं भोजन क्रम में किसी तरह का व्यवधान न हो।गरुड़ का अहम इस विराट करुणा के आगे बहकर नष्ट हो गया और उसने दिव्य औषधियों द्वारा राजा को जीवनदान देते पूर्णतः स्वस्थ कर दिया।और जगत में ऐसे स्थापित हुआ कि करुणा,ममता से महान कोई भावना नहीं है।

आगे इस कथा में एक कथा चिल्हो सियारो की भी है कि अपने व्रत,अर्थात धर्म में अडिग रहने पर उसका फल संतान को अवश्य प्राप्त होता है और यदि उसका पालन न किया गया तो यदि सन्तान हो भी तो उसमें उत्तम संस्कार नहीं जाएँगे और उसका होना न होना बराबर ही होगा।अतः महत्वपूर्ण केवल संतान को जन्म देना ही नहीं अपितु उसे राजा जीमूतवाहन की भाँति सुसंस्कारी बनाना भी माता का ही कर्तब्य है।जीमूतवाहन जैसी उदार सोच पहले यदि माताएँ स्वयं में धारण करें,तो उत्तम संस्कारी सन्तान शरीर से जीवित रहें न रहें, उनके नाम और अस्तित्व तो अमर रहेंगे ही,जैसे किशोरावस्था भी पार न कर पाए अभिमन्यु का रहा।

जिउतिया पर भाई गिरिजेश राव की 2009 में लिखी यह पोस्ट पढ़िए।मैं तो हर वर्ष व्रत पुस्तिका के इतर इसे अवश्य पढ़ती हूँ।

https://girijeshrao.blogspot.com/2011/09/blog-post_20.html?m=1

17.7.20

धर्म की जय कैसे हो

उन्हें तो छोड़ ही दीजिये जिन्हें वामी प्रभाव में आकर सनातन उपहास करते प्रगतिशील बनना है,सनातन को हेय सिद्ध करना है,,,
उन आस्थावान हिन्दुओं ने भी धर्म को कम हानि नहीं पहुँचाई है जिन्होंने कर्मकाण्डों में से मूल और बाद में जुड़े आडम्बरों में भेद करना नहीं सीखा,प्रतीकों अभ्यासों के वैज्ञानिक मर्म को नहीं समझा जाना और पौराणिक पात्रों के महान चरित्रों को अपने जीवन आचरण में उतारने के स्थान पर उन्हें ऊँचे चबूतरे पर बैठाकर केवल फल पुष्प धूप बत्ती का अधिकारी बना कर मूर्तियों में सीमित कर दिया।अपने आराध्य के जीवन संघर्षों को सामान्य न रहने देकर उनके साथ इतने अस्वाभाविक अलौकिक चमत्कार जोड़ दिए कि भक्तों का ध्यान उनके संघर्ष और सफलतापूर्वक उनपर विजय पर नहीं अपितु चमत्कारों पर केन्द्रित होकर सिमट गया और दुःख में उनके आचरण से प्रेरित होकर धैर्य और सामर्थ्य की आकांक्षा रखने/माँगने के स्थान पर व्यक्ति और अधिक निर्बल कातर होकर उनसे मुक्ति की प्रार्थना करने लगा।चमत्कार कर पल में ईश्वर वह दुःख हर लें, अपार सुख साधन दे दें,इसके आग्रह में धूप दीप नैवेद्य लेकर मूर्तियों के सम्मुख डट गया।
तुलसीदास जी तक ने जब भी प्रभु श्रीराम को वन में पत्नी वियोग में रोते हुए दिखाया उसे सहज स्वाभाविक न रहने देकर "लीला" कह दिया।
राम या कृष्ण ने अपने सम्पूर्ण जीवन काल में जो संघर्ष किये और यह स्थापित किया कि संघर्षों को सुअवसर कैसे बनाया जाता है,वे कौन से गुण हैं जिन्हें साधकर व्यक्ति अनन्त काल तक के लिए विजयी,अमर और पूज्य हो सकता है,,इतने सुस्पष्टता से उन्होंने रूपरेखा सी खींच दी कि यदि मनुष्य जीवन के प्रत्येक परिस्थिति में उनका स्मरण रखे और स्वयं के भीतर भी उन गुणों का विकास करे, तो जीवन में दुःख कातरता हताशा का रंचमात्र भी स्थान बचेगा क्या? या फिर धन पद सत्ता साधन आदि पाकर जो मद में बौराये फिरते हैं और धार्मिक स्थलों, कार्यों में बड़े बड़े दान देकर यह मान लेते हैं कि अपने हिस्से का पुण्य कार्य उन्होंने निबटा लिया अब अपने सांसारिक सामर्थ्य का उपयोग कर अपने लाभ हेतु वे किसी का भी कुछ बिगाड़ सकते हैं,,ऐसी अवस्था बनेगी क्या?

कई ऐसे लोग जिनका दिनभर का अधिकांश समय पूजा पाठ में बीतता है किन्तु मन से अशान्त,सांसारिक मोह माया और दुःख से ग्रसित हताश निराश हैं, जब उनसे उनके आराध्यों के जीवन चरित सुनाकर उनसे प्रेरित होने की बात की है, वे कह उठते हैं,वे तो भगवान थे,यह सब उनकी लीलाएँ थीं।अर्थात वे मन से नहीं मानते कि वास्तव में उनके संघर्ष वास्तविक थे, मानवीय संवेदनाओं और सुख दुःख की अनुभूतियाँ उनकी भी वैसी ही थीं,जैसी हमारी है।
अतिमानवीयकरण का ही यह दुष्प्रभाव है कि हमने अपने आराध्यों को अपने जीवन से काट दिया है, उन्हें मूर्तियों और पूजाघरों में सीमित कर दिया है।

जिस कर्म और कर्मफल से हमारे आराध्यों ने स्वयं को मुक्त नहीं रखा,उस कर्मफल के चुटकी में नाश को हम ईश्वर के सम्मुख बैठ कर याचनारत रहते हैं,यह नहीं सोचते कि हमारे हिस्से का वह फल जो कदापि लुप्त नहीं हो सकता,भोगेगा कौन?क्योंकि कर्मफल तो नष्ट हो नहीं सकता।वह तो समय के कपाल पर अमिट हो अंकित हो जाता है।संसार में फैले अधर्म को समेटने और धर्म स्थापना क्रम में कृष्ण ने महान संहार रचा, महान शक्तिशाली एक पूरे वंश का तो समूल संहार हो गया।सही गलत को अलग कर दें,इसे केवल एक कर्म मानकर चलें।तो इस कर्म का फल श्रीकृष्ण ने गांधारी के यदुवंश के सम्पूर्ण नाश के श्राप रूप में सादर स्वीकार किया।उन्होंने तो जगत का उद्धार किया था।इतना बड़ा पुण्यकर्म। किन्तु इस क्रम में जो कर्म हुआ, उसके फल से उन्होंने स्वयं को मुक्त न रखा।
राम कृष्ण दुर्गा काली शंकर हनुमान, जिन्हें भी हम पूजते हैं या तपस्या कर वरदान में पाए असमनान्य सामर्थ्यवान वे अत्याचारी असुर राक्षस जिनसे घृणा करते हैं, किसी का भी जीवन उठाकर देख लीजिए जो उन्होंने एक ही सत्य स्थापित न किया हो कि कर्मफल अकाट्य है।
अतः दम्भी अत्याचारियों के कर्मों से सीख लेते और अपने आराध्यों के चरितों से प्रेरणा ऊर्जा लेते हुए यदि हम प्राप्त जीवनावधि को ईश्वर प्रदत्त सामर्थ्य सीमाओं में सुखी सफल और सार्थक करने को सचेष्ट हों, तभी उन अवतारों महानायकों का अवतरण और उद्देश्य परिपूर्ण होगा, हमारा समाज स्वस्थ धर्मपरायण और सुखी होगा और सनातन की जय होगी।

ॐ...

26.4.20

सीता का परित्याग या सीता का त्याग

सीता परित्याग या सीता का त्याग
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वल्कल वस्त्र धारण कर जब राम लक्ष्मण और सीता वन को चले और केवट की नाँव चढ़ गङ्गा पार उतरे, तो संभवतः पहली बार राम का मन कचोटा कि केवट ने नदी तो पार करा दी,पर उसे उतराई देने भर भी उनमें सामर्थ्य नहीं। जिस राजपुत्र के हाथ आजतक केवल देने के लिए ही उठे हों,वह सेवा का न्यायोचित दाम भी न चुका पाए, उसके मन की दशा वही स्वाभिमानी मनुष्य जान सकता है, जिसने मातृ पितृ और गुरु के स्वाभाविक कर्तव्य तक को स्वाभाविक नहीं,अपितु ऋण की तरह ही लिया हो,जिसका सतांश चुकाने में वह अपना जीवन लगा दे।

और राम की उस मनोदशा को भाँपकर पतिव्रता सीता ने अगले ही क्षण अपने जीवन की वह अनमोल निधि,जिसे अयोध्या से निकलते समय समस्त राजसी वस्त्राभूषण त्यागने के क्रम में भी वह न त्याग पायीं थीं- पति श्रीराम द्वारा दी गयी कोहबर के रात की वह प्रथम भेंट "स्वर्णमुद्रिका", एक ही क्षण में उतारकर पति के हाथों रख दिया,ताकि वे पारिश्रमिक रूप में वह मुद्रिका देकर सँकोच से उबर सकें।ऐसी थी उस दम्पति की एक दूसरे के मन में पैठ और एक दूसरे के सुख सम्मान हेतु सर्वस्व न्योछावर कर देने की प्रतिबद्धता।

राम और सीता सा प्रेमी इस सँसार में और कौन होगा?राम ने सीता के लिए नङ्गे पाँव समुद्र लाँघकर रावण जैसे सामर्थ्यवान से भी टकरा जाने में सँकोच न किया तो सीता ने पति का साथ देने को न केवल राजभोग छोड़ा अपितु राम को अपनाते उनके सभी सम्बन्धों,परिस्थितियों को ऐसे अंगीकार किया कि वह सबकुछ उन दोनों का हो गया।
नहीं तो सोचिये कोई भी स्त्री अपनी उस सास को कभी सम्मान दे सकती है जिसके कारण उसका पति वन वन भटक रहा हो,सत्ताच्युत हो चुका हो। लेकिन सीता ने वन में भरत के साथ आये परिवार को सम्मुख पाते ही सबसे पहले जाकर पूरी श्रद्धा से न केवल माता कैकयी की वन्दना की,अपितु पूरे प्रवास में सबसे अधिक सेवा उनकी ही की।राम को कभी भी कुछ भी बोलना बताना नहीं पड़ा सीता को कि उनके कौन कितने प्रिय हैं और उनका सम्मान स्थान सीताजी को कैसे देना है।
वस्तुतः राम के मन में सीता और सीता के मन में राम कितने बसे हैं,यह सँसार में कोई जान ही नहीं सकता,क्योंकि किसी भी प्रेमी/दम्पति का प्रेम उस स्तर तक नहीं पहुँचा है कि उस उत्कर्ष और उस असीमता को थाह सके।

जब भी मेरे सम्मुख यह तथ्य इस प्रकार आता है कि "राजाराम ने अपनी प्राणप्रिया जीवनाधार परमसती सीता का परित्याग कर दिया,,,और वह भी तब जब वह गर्भवती थीं और उन्हें पति का सानिध्य सर्वाधिक चाहिए था"
इसको ऐसे ही कभी भी नहीं स्वीकार पाती मैं। चाहे कोई लाख पौराणिक साक्ष्य दे दे, चाहे महर्षि वाल्मीकि या तुलसीदासजी में अगाध श्रद्धा हो मेरी।

मेरी चेतना कहती है, कहीं कोई कड़ी, कोई बिन्दु छूटी हुई है इस पूरे प्रसंग में, जिसे वे महर्षि भी या तो जान न पाए या अनजाने में सामने रखना भूल गए।क्योंकि किसी भी व्यक्ति के जीवन का कोई एक टुकड़ा अन्य सभी टुकड़ों से कटा हुआ, असंगत या तो तब हो सकता है जबकि वह व्यक्ति कुछ समय के लिए विवेकहीन विक्षिप्त हो चुका हो, या कैकयी के समान ही उक्त कालखण्ड विशेष में वह मन्थरा जैसी बुद्धिवाला हो चुका हो।अन्यथा अपने स्वाभाविक आचरण के सर्वथा विपरीत कुछ कैसे कर सकता है?

जिस राम ने गौ, ब्राह्मण (सत्यनिष्ठ,धर्मपरायण मनुष्य) और स्त्री के उद्धार, उनके सम्मान और स्वतंत्रता हेतु ही अवतार लिया, धर्म मर्यादा स्थापित कर "मर्यादापुरुषोत्तम" बने, वे लोकोपवाद के कारण अपनी प्राणप्रिया का परित्याग कर अपनी राजगद्दी बचायेंगे?
क्या मर्यादापुरुषोत्तम यह नहीं जानते थे कि एक व्यक्ति ही पुत्र,पति,पिता और राजा सबकुछ एकसाथ ही है।किसी एक को ऊपर उठाकर दूसरे को गिराने से भी वस्तुतः पतन उस व्यक्ति का ही होता है।व्यक्ति स्वयं के लिए, परिवार समाज और देश के लिए कैसा हो, यही आदर्श स्थापना तो राम का जीवन ध्येय था, फिर वे इस क्रम में एक राजा को व्यक्तिगत जीवन में अधार्मिक होने देते क्या?

असल में होता यह है कि जब भी कोई कवि लेखक अपने नायक के चरित्र को उत्कृष्टता दे रहा होता है, उसपर यह मानसिक दवाब,,या कहें लगभग सनक सी होती है कि अपने नायक को वह उस स्थान पर बैठा दे जो अतुल्य हो,जहाँ तक किसी की भी पहुँच न हो,, तो ऐसे में कभी कभी अनजाने ही वह अन्य पात्र/पात्रों के साथ अन्याय कर जाता है।

अब देखिए न, हमारे मन में कोई विचार आया,हमें लगा उसे लिपिबद्ध करना चाहिए और हम उसे लिखने बैठते हैं।लिख चुकने के बाद उसे स्वयं पढ़कर देखिए,क्या हम हूबहू वही लिख पाए जैसे वे मन में घुमड़े थे?अब आगे उसको किसी और को पढ़ाइये,,क्या उसने उसको वैसा ही ग्रहण किया,जैसे आपने लिखा था?? उस पाठक से कहिये कि पढ़े हुए को लिख दे।अब उसके लिखे को पढ़कर देखिए।आपके मानस में घुमड़े वे विचार और अगले दो लोगों के पास से घूमफिर कर आये उस अंश में जो अन्तर होगा,,कई बार तो यह अन्तर दिन और रात की तरह हुआ मिलेगा आपको।
फिर श्रुति स्मृति परंपरा में चली आ रही कोई गाथा जो विधर्मियों के आक्रमणों, समय के झंझावातों को सहती हजारों वर्षों बाद लिपिबद्ध हुई, क्या वह बिल्कुल वही रहेगी जैसी मूल रूप में थी? 

चलिए मान लिया कि गर्भवती सीता राजभवन छोड़ जँगलों में रहीं और लवकुश का जन्म भी वहीं हुआ।राजसूय यज्ञ के अश्वों को पकड़ने के बाद लवकुश ने लक्ष्मण हनुमान आदि सभी महावीरों को बन्दी बनाया। लवकुश के विषय में ज्ञात होने पर अयोध्या की प्रजा जब रामसाहित लवकुश तथा सीता को लौटा लाने का अनुनय करने मुनि आश्रम पहुँचे तो सीता ने लवकुश को तो उनको सौंप दिया पर स्वयं धरती के गर्भ में समा गयीं,उनके साथ वापस अयोध्या लौटकर नहीं गयीं।सबकुछ ऐसे ही हुआ।

परन्तु मेरा चित्त तो इस प्रसंग में इसी स्थापना में रमता है कि राजा राम और रानी सीता, कोई अलग अलग व्यक्ति नहीं थे,दो देह एक प्राण थे।राम ने सीता परित्याग नहीं किया था,अपितु सीता ने महान त्याग किया।स्वेच्छा से उन्होंने वनगमन चुना। सीता का वन में निवास राम से अधिक सीता का निर्णय था,क्योंकि अपने पति पर कोई प्रवाद सीता जैसी सती कभी नहीं सह सकती थी।फिर यहाँ तो प्रश्न उसके अपने राज्य व्यवस्था(जिसमें अव्यवस्था, स्वेच्छाचार न फैल जाय)का था।सीता स्वयं भी तो परंपराओं के उतने ही अधीन थी।इसके साथ ही सती का अपना एक स्वाभिमान भी था,जिसकी भी उन्हें रक्षा करनी थी।अपने भावी संतान को भी उन्हें वह परिवेश और लालन पालन देना था जो सर्वथा निष्कलुष हो,स्वस्थ हो।
राजाराम ने जगत को यह बताया कि एक राजा रूप में कोई प्रजापालक व्यक्तिगत/पारिवारिक सुखों को कैसे त्याग सकता है,,तो सीता ने भी अपनी पुत्रवत प्रजा को धरती में समाते हुए कठोर सीख/दण्ड दिया कि माता/स्त्री पर अविश्वास करने,उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने पर व्यक्ति और समाज को कैसी क्षति उठानी पड़ती है।सीता के प्राणोत्सर्ग के बाद जीवन के अन्तिम स्वास तक उस पीढ़ी के लोग और बाद की भी कई पीढ़ियाँ आत्मग्लानि के किस अग्नि में जलते रहे होंगे,तनिक कल्पना कीजिये।राम ने दाम्पत्य सुख का त्याग कर जो आदर्श उपस्थित किया, अपने पति, गृहस्थी और जीवन का भी परित्याग कर उस राजरानी, पुरुषोत्तम की अर्धांगिनी ने पूरे समाज के संस्कारों को कैसे सुगठित किया, तनिक विचार कीजिये इसका।
और इसके पश्चात आप कभी न कह पाएँगे कि राम ने सीता का परित्याग किया,,आपके मन से स्वतः ही निकलेगा राम और सीता ने कैसा महान त्याग किया।

!! जय जय सियाराम !!

Ranjana Singh

21.3.20

निर्भया के वह नाबालिग कातिल

मन को बहुत समझाया कि,दुनियाँभर में कितने लोग कॅरोना से मर गए/रहे हैं,अकाल मृत्यु।मुझे इस समय इस दुःख को मन में स्थान देना चाहिये, न कि उस एक आदमी के न मारे जाने का आक्रोश और दुःख मनाना चाहिए,पर किसी भी भाँति मन मानने को प्रस्तुत नहीं।

वस्तुतः मेरे लिए उसका जीवित सुरक्षित रहना,एक व्यक्ति का जीवित रहना भर नहीं है,बल्कि वह उनसभी पिशाचों का जीवित रहना है जो निश्चिन्त हैं कि घृणित और जघन्यतम अपराध कर भी वे बिना किसी दण्ड के न केवल जीवित रह सकते हैं बल्कि अपने धर्म के कारण पुरस्कृत भी होंगे।पूरी एक सड़ी हुई सेकुलड़ी व्यवस्था उसे बचा लेगी।क्योंकि वह पिशाचों के रक्षकों के लिए बहुमूल्य है,क्योंकि उनका कोर वोटर हैं।

अभी कुछ लोगों को फेसबुक पर यह कहते देखा कि चलिए उन चारों के आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना कीजिये कि आखिर थे तो वे हिन्दू ही।
यह सुनते आत्मा सिहर गयी।कैसे कोई इन पिशाचों को हिन्दू ठहरा सकता है?असली न्याय तो तब हो जब इनको या इन जैसों को 10-10 बार मरने की पीड़ा से गुजारा जाय।
निर्भया के माता पिता उस तथाकथित नाबालिग को उसके कुकृत्य के लिए कठोरतम दण्ड दिलवाने क्यों नहीं लड़ रहे, मैं नहीं जानती या जानना नहीं चाहूँगी(हो सकता है उन्हें यह विश्वास दिलाया गया हो कि यदि वे ऐसा करते हैं तो उनके पूरे परिवार को मिटा दिया जाएगा,जो कतई असम्भव नहीं)किन्तु राजनीतिक दलविशेष से लेकर न्यायालय तक ने जो परिपाटी आरम्भ की है,उस कौम विशेष का अपराध हेतु जो मनोबल बढ़ाया है,यह सीधे सीधे भारतीय स्त्रियों को यह मुखर सन्देश है कि या तो वे उन पिशाचों के हाथों सहर्ष स्वेच्छा से बलात्कार स्वीकार करें,या फिर अपने साथ आत्महत्या के उपाय सतत लेकर चलें ताकि अन्तिम समय में अपने पसन्द की मौत तो चुन सकें, जीवित रहते उन दरिन्दों के हाथों अपने शरीर के चीथड़े होते तो न देखें।

वाम या काँग्रेस ने कोई कम घृणित राजनीति नहीं की।लाखों लाख हत्या के प्रायोजक रहे वे।लेकिन वे भी खुलकर इस तरह किसी बलात्कारी की रक्षा में नहीं उतरे थे।एक बच्ची के क्षत विक्षत शरीर पर जो राजनीतिक रोटी सेंककर इन्होंने खायी थी,दिल्लीवासियों ने इन्हें माफ़ कर दिया, इन्हें पुनः राजगद्दी पकड़ाई जैसे उस क्रूर बलात्कारी को आपियों ने नगद पुरुस्कार, सिलाई मशीन, नई पहचान और वकीलों की फौज लगाकर दिलाई थी,,लेकिन जैसा कि सुना है, किये हुए सुकर्म या कुकर्म प्रकृति अवश्य ही प्रतिदान में देती है,तो हम तो यह देखना चाहेंगे कि प्रकृति न्याय करती है या नहीं?

जो व्यक्ति बलात्कार कर सकता है,जननांगों को क्षत विक्षत कर सकता है,उसके लिए भी बालिग और नाबालिगता का विचार??न्याय के नाम पर इससे भी बड़ा अन्याय कुछ हो सकता है?क्या नीतिनियन्ता कभी इसपर विचार करेंगे?क्या वे यह विचार करेंगे कि जीवित रहने का जितना अधिकार इन तथाकथित नाबालिग पापियों का है,उतना ही उस बच्ची/लड़की/स्त्री का भी है?क्या हमारे अन्यायालय,संसद कभी स्वतः संज्ञान लेते बच्चियों के मन में निश्चिंतता और बलात्कारियों के मन में गहरा भय भरने के कानूनी उपाय करेंगे?

8.1.20

राक्षस

बड़े बड़े दाँत नाखून,विकराल मनुष्येतर जीव... फिल्मों, नाटकों या कथाओं के चित्रण ने हमारे मानस पटल पर राक्षसों दैत्यों की कुछ ऐसी ही छवि उकेरी है। इस छवि ने हमें ऐसे दिग्भ्रमित कर रखा है कि हम कभी ध्यान में नहीं रख पाते कि मानवी या दानवी दोनों स्थूल छवियाँ नहीं मनुष्य की ही मनोवृत्तियाँ हैं जो वह अपने आचरण के माध्यम से सिद्ध करता है।महर्षि पुलस्त्य के महान वंश में जन्मे उनके दोनों पौत्रों- रावण और कुबेर में से एक दैत्य बना तो दूसरे पूज्य  देव हुए,,मामा कंस राक्षस तो कृष्ण महामानव हुए,,,असंख्य उदाहरण हैं ऐसे।

देव दानव,,अर्थात दो परस्पर विरोधी प्रवृत्तियाँ, सृष्टि के आरम्भ से ही पृथ्वी पर रहीं हैं,आगे भी रहेंगी।जब भी दानवों की संख्या और उनका वर्चस्व पृथ्वी पर बढ़ता है, सृष्टि विनासोन्मुख हो जाती है,उसकी व्यवस्थाएँ विखण्डित होती हैं।
तो सृष्टि/प्रकृति का सम्मान करने वाले, धर्मशील देव(जिनका मूल स्वभाव अहिंसा करुणा धैर्य सहनशीलता और सहानुभूति होता है), शौर्य धारण कर दानवी वृत्ति के पोषकों के नाश हेतु कृतसंकल्प होते हैं। इन्हीं में से कोई वीर राम बनता है तो कोई कृष्ण, कोई गुरुगोविंद सिंहजी तो कोई शिवाजी...लम्बी श्रृंखला है ऐसे धर्मरक्षक महानायकों की।

बहुधा मेरे ध्यान में रामकथा में वर्णित वे शांतिप्रिय अहिंसक धर्मभीरु लोग और उनकी परिस्थितियाँ आ जातीं हैं जो वनों में,ग्रामों में, सादगी से जीविकोपार्जन करते, अध्ययन मनन शोध चिंतन में रत, अपने विशाल हृदय में जीवित प्राणियों तो क्या प्रकृति के कण कण के लिए करुणा और सम्मान का भाव रखते हुए जीते हैं।किन्तु ऐसे लोगों से भी घृणा करने वाले,इन्हें असह्य कष्ट और अपमान देकर आनन्द और सन्तोष पाने वाले रावण के अनुयायी रक्ष संस्कृति के पोषक हैं, जो अपर धर्मानुयायियों को कष्ट देने,उन्हें मिटाना अपना धर्म मानते हैं।ये राक्षस संगठित हो वनवासियों,ऋषि आश्रमों पर आक्रमण कर इनकी निर्मम हत्यायें करते हैं, इनकी स्त्रियों का बलात्कार करते हैं,इनकी भूमि से इन्हें वञ्चित कर इनके श्रम से अर्जित साधनों का भोग करते हैं।क्योंकि इन ऋषियों वनवासियों ने क्रूर होना,युद्ध लड़ना नहीं सीखा है,अतः मिटाये जा रहे हैं।

त्रेता में महर्षि विश्वामित्र अयोध्या नरेश से उनके पुत्रों को इन्हीं समूहों के रक्षार्थ माँगकर दंडकारण्य लाये थे। किन्तु उनका उद्देश्य केवल इनके द्वारा राक्षसों का नाश करवाना भर नहीं था,अपितु उन्होंने राम से यह वचन भी लिया था कि वे एकबार पुनः आएँगे और दण्डकारण्य से लेकर सुदूर सागर पार दक्षिण तक की भूमि को भोग की इस रक्ष संस्कृति से मुक्त करवाएँगे।जो व्यक्ति या समूह मानवीय मूल्यों सम्वेदनाओं का वहन न कर व्यवस्थाएँ नष्ट भ्रष्ट करे, उसको नष्ट करने की चैतन्यता जबतक समाज के सबसे निर्बल और उपेक्षित समूह नहीं पायेगा,सृष्टि और धर्म का रक्षण असम्भव है।
और राम ने बारह वर्षों के जनजागरण में कोल भील तो क्या,वानर रीछ तक को ऐसी चैतन्यता दे दी कि पत्थर थप्पड़ के आसरे ही सागर लाँघ वे रावण की शस्त्र सुसज्जित सेना से अड़ भिड़ और जीत भी आए।आज जब उन स्थानों पर दृष्टिपात करती हूँ जहाँ की परिस्थितियाँ ठीक वैसी ही हैं जैसी उन दंडकारण्यवासी असहाय वनवासियों की थी, तो लगता है हे ईश्वर इन निरीहों को कौन आएगा बचाने।
वर्तमान भारत सरकार ने सहृदयता दिखाते इन निरीहों के रक्षण हेतु CAA के माध्यम से एक उपाय बनाया...और देखिए राक्षस कैसे व्याकुल हो उठे।अपने ही हाथों सज्जनता, सहृदयता और बुद्धिजीविता का अपना मुखौटा नोच वे सड़कों पर अपनी सेना के साथ उतर आए हैं।

तब जो योग से विरोध रखने वाले और स्त्री को मात्र भोग की वस्तु मानने वाले बहुरूपिये महिषासुर तथा शुम्भ निःशुभ थे, भोग की संस्कृति के पोषक रावण मारीच ताड़का और शूर्पणखा थे,,, वही आज वामी तथा क़ुर-आनवादी नहीं हैं क्या??
रावण कंस आदि ने जन्म चाहे जिस वंश में लिया हो,,पर ये ब्राह्मण क्षत्रिय न थे केवल और केवल राक्षस थे।वैसे ही चाहे आज के ये सेकुलड़ (जिन्होंने भले हिन्दू नाम धारण कर रखा हो) तथा ल्लाहवादी, ये राक्षस नहीं हैं क्या?? ये भी तो रावण महिषासुर आदि की ही भाँति अपनी सोच और आस्था से इतर किसी को सहन नहीं कर सकते, इनका ध्येय और धर्म ही सनातन तथा अन्य उन समस्त विचारों संस्कृतियों को, जिनमें इनकी आस्था नहीं,उन्हें क्रूरतम विधि से मिटा देना है??
हाँ,, एक छोटा सा अन्तर है वामियों तथा ल्लाहवादियों में।वामियों के वस्त्र सुघड़ सुसज्जित और अस्त्र घातक तथा गुप्त होते हैं। बुद्धिजीविता के चमचमाते मुखौटे तले ये अपनी कुत्सित विध्वंसक सोच तथा योजनाओं को बड़ी ही कुशलता पूर्वक छुपा लेते हैं और बौद्धिक आतंक फैला भगवान बने उनसब को जिन्हें ये उनके धर्म से च्युत नहीं कर पाते, हीनभावना से ग्रस्त रखते हैं।अपनी सेकुलड़ी बीन पर मन भर नचाते हुए कभी सर्वसाधारण को चैतन्य नहीं होने देते।
और ल्लाहवादी समूह- इनके राक्षसत्व के पोषक पालक भी वामी ही होते हैं, प्रकट रूप में हाथों में नंगी तलवारें लिए धार्मिक उन्माद में काफिरों को क्रूरतापूर्वक रौंदते कुचलते अपने संख्या बल को बढ़ाते अपनी विजययात्रा अबाधित रखते हैं।
कहीं असहिष्णुता का कोई आक्षेप न लग जाये, इस भय से थरथर काँपता हिन्दू समाज आँख उठाकर नहीं देख पाता कि कैसे विश्व मानचित्र पर से मिटता सिमटता वह उस भूभाग में भी अपना अस्तित्व नहीं बचा पाया जो कहने को भारत का अभिन्न अंग(कश्मीर)था या निरंतर आज भी भारतीय मानचित्र पर से मिटता कई क्षेत्रों में अल्पसंख्यक बन चुका है।वास्तविकता की धरातल पर आकर कभी हिन्दू समाज आँकने को प्रस्तुत नहीं कि आखिर वर्तमान भारत में भारत बचा कितना है??

बन्धुओं,, किसी एक भोर को अपने कानों को खोलिये और अगली भोर तक के बीच अज़ान नाम से उनके आह्वान और उद्घोषणाओं (उनका वह सर्वशक्तिमान ही एकमात्र परम सत्य है।सम्पूर्ण धरा पर केवल उसकी सत्ता में आस्था रखने वाले ही होने चाहिए,इस पर ईमान रखने की शर्त काफिरों को मिटाना है) को सुनिए, अपने चारों तरफ देखिए कि कितने पाकिस्तान अफगानिस्तान या बांग्लादेश आपके चारों ओर उगे बसे हुए हैं।

सदियों तक डिनायल मोड में पड़ा विश्व आज इनके पागलपन और कहर से कराह रहा है।बसे बसाये समृद्ध नगर उजड़ चुके हैं,,पर कोई बड़ा उपाय किसी के हाथ नहीं।

किसी को मिटाना, हमारे DNA में भी नहीं।और कोई रावण कंस की तरह एक दो चार हो तो उससे निपटा भी जाय,,यहाँ तो आसमानी किताब के विषाक्त हर्फ़ों में नहाया एक एक विस्फोटक विषाणु है।
तो, निवेदन केवल यह कि सतर्क रहें,संगठित रहें और अस्तित्व रक्षण को सनद्ध हों।सत्ताओं पर यह दवाब बनाएँ कि इनके विस्फोटक संख्या विस्तार पर वह नकेल कसने की व्यवस्था करे।इन्हें मानवीय संस्कारों में दीक्षित नहीं किया जा सकता,,पर जबतक ये संख्या में अल्प हैं, अपनी दानवी वृत्ति को छिपाये विध्वंस को अकुलाए नहीं रहेंगे।अतः रंच मात्र भी इनका तुष्टिकरण नहीं,अपितु इनपर दृढ़ अनुशासन रखिये।
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Ranjana Singh

7.11.19

प्रेतयोनि

भूख प्यास निद्रा मैथुन आदि का अनुभव और उपभोग शरीरिक है या मानसिक??
गम्भीरता से विचारेंगे तो पाएँगे कि 25 से 30% ही यह शारीरिक है, 70-75% यह विशुद्ध मानसिक है।ऐसा न होता तो हर्ष या अवसाद में कई कई दिनों तक भूख प्यास निद्रा का ध्यान भी न आना न होता, माता पुत्री या भगिनी के साथ शारीरिक संबंध की कल्पना भी पाप न लगता।

और हम कौन हैं, शरीर या आत्मा??
जबतक शरीर में आत्मा अवस्थित हो,हम हैं।जैसे ही आत्मा ने शरीर त्यागा किया, हम हम नहीं बचते, हमारी पहचान एक शब्द "शव" में परिणत हो जाता है जिसे हमारे अपने ही प्रियजन शीघ्रातिशीघ्र नष्ट कर देने को तत्पर हो जाते हैं।

किन्तु जिस शरीर में रमे और इसे ही अपना अस्तित्व समझते आये हम,, मृत्यु पाते ही क्या सहज स्वीकार लेते हैं कि अब "हम" नहीं रहे??
नहीं,,कदापि नहीं।
आत्मज्ञानी सिद्ध जन इसी हेतु जीवन भर ईश्वर से याचना करते हैं कि मृत्यु रूपी इस सत्य को वे/जीव सहज ही और तुरन्त स्वीकार लें।देह के मोह से वे मुक्त हो पाएँ।क्योंकि देह छूटने के बाद आत्मकोश में सञ्चित अभ्यास(भूख प्यास निद्रा मैथुन) अपरिमित कष्ट देने लगता है।वे आवश्यकताएँ पूर्ववत ही नहीं अपितु अधिक उग्र रूप में अनुभूत होने लगते हैं परन्तु इनकी पूर्ति का वह माध्यम -"देह" पास नहीं होता।देह का मोह,परिजनों का मोह,उसके द्वारा जीवन में सञ्चित धन और साधनों का मोह, पद प्रतिष्ठा का मोह, जीव को अत्यन्त व्याकुल कर देता है।सूक्ष्म शरीर जो भौतिक शरीर के आधीन रह सीमित गतिमान था, अशरीरी हो अपरिमित गति पाता है और भटकते हुए अपने प्रिय आधारों से लिपटकर करुण विलाप करता है।

सनातन धर्म में इसी कारण मृत्यु उपरान्त शरीर के अग्निस्नान की व्यवस्था की गयी ताकि जब वह शूक्ष्म शरीर अपने ही परिजनों द्वारा शरीर को नष्ट करते हुए देखे, पुनः शरीर प्राप्त करने की कोई संभावना उसे न दिखे। अगले 12-13 दिन की जितनी भी धार्मिक क्रियाएँ हिन्दू धर्म में सम्पादित होती हैं,हर एक क्रिया वैज्ञानिक भी है और जीव को मुक्त होने हेतु प्रेरित करने वाली भी।क्रियाओं के अन्तिम दिन जब श्राद्ध भोज(श्रद्धा निवेदन) होता है जिसमें उक्त व्यक्ति के समस्त परिजन तथा समाज दिवंगत को श्रद्धांजलि देते एक तरह से उद्घोषित करता है कि उन्होंने दिवंगत का जाना स्वीकार लिया है,अब वह जीव भी इस जीवन से मुक्त हो अपने गंतव्य को प्रस्थान करे, तो अधिकांश जीव यह स्वीकार कर लेते हैं कि उनकी जीवन यात्रा पूर्ण हुई। किन्तु इसी में कुछ जीव जो इसके लिए प्रस्तुत नहीं होते व्याकुल हुए इसी प्रेत योनि में भटकते रहते हैं।

जैसे मनुष्य या अन्य जीव योनि का अस्तित्व और संसार है, ठीक ऐसे ही प्रेत योनि का भी अस्तित्व है और मनुष्यों के समान ही इनकी विभिन्न प्रजातियाँ/प्रकार होते हैं।एक भरा पूरा संसार इस योनि का भी है।
अपनी मृत्यु को न स्वीकारने वाले,आकस्मिक निधन,आत्महत्या आदि को प्राप्त करने वाले अधिकाँश जीव इस योनि में सामान्य से अधिक काल तक रहने को अभिशप्त होते हैं।हालाँकि सनातन धर्म में अकाल मृत्यु को प्राप्त लोगों के लिए सामान्य के अतिरिक्त भी विशिष्ट पूजा/क्रियाओं की व्यवस्था है।लेकिन कोई जीव कितने समय तक इस नर्क योनि(प्रेतयोनि) में रहेगा,यह पूरी तरह उस जीव की स्वयं की मनःस्थिति पर ही निर्भर करती है।ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, सन्यास और वानप्रस्थ आश्रम की व्यवस्था इसी कारण तो हमारे यहाँ की गई थी ताकि एक जीव जो संसार में आया है,समस्त सांसारिक अनुभवों से गुजरता समृद्ध और सन्तुष्ट होता अंततः मृत्यु को सहजता पूर्वक स्वीकार कर पाए।

खौलते कड़ाहे में भुनना, विष्ठा में लोटना, अन्धकूप में भटकना,काँटों पर लोटना आदि आदि जिन नारकीय यन्त्रणाओं का वर्णन किया जाता है, वस्तुतः ये प्रतितियाँ हैं जो मोह में फँसा जीव/प्रेत भोगता है।

जीवनभर सतपथ पर चलता मनुष्य जो सहजभाव से मृत्योपरांत मुक्त हो चुका होता है और कहीं अन्यत्र किसी नूतन शरीर में जीवन जी रहा होता है, उसका भी एक क्षीणकोश(रक्त/DNA रूप में) अपने वंशजों द्वारा तर्पण प्राप्त कर उन्हें आशीर्वाद देने को ब्रह्माण्ड में अवस्थित रहता है।जब कोई जीवित व्यक्ति अच्छे कर्म करता है तो कहा जाता है पितृलोक में अवस्थित उसके पितर संतुष्ट हो अपने आशीर्वाद का बल उसे देते हैं,,अकाट्य सत्य है यह।

बहुत पहले कहीं पढ़ा था कि भले पश्चिमी देश भारत को अंधविश्वासी कूपमंडूक और असभ्य ठहराए, लेकिन उनका अपना समाज इन जंजीरों में अत्यधिक जकड़ा हुआ है।मृत शरीर को नष्ट करने हेतु अग्नि आदि की अनुपलब्धता के कुछ भौगोलिक कारण भले रहे हों, पर कब्रों में उन्हें रख देने की विधि के पीछे मुख्य कारण यही है कि उन्हें विश्वास है कि कयामत के दिन उनके ईश्वर आएँगे और प्रत्येक मृत मनुष्य के कर्मों का हिसाब कर उनका न्याय करेंगे।तबतक जीव शांतिपूर्वक कब्र में पड़ा रहे, किसी को परेशान न करे, इसीलिए RIP( रेस्ट इन पीस) की कामना करते हैं।और सत्य बात यह है कि प्रेत प्रकोप इनके यहाँ सनातनियों की तुलना में बहुत अधिक है।
अभी कुछ ही दिनों पहले (30 अक्टूबर को) बड़े ही धूमधाम से पश्चिम वालों के साथ साथ एलीट भारतीयों ने भी "हैलोवीन" पर्व/पार्टी मनाया।चूँकि उनके यहाँ व्यवस्थाएँ ऐसी हैं कि प्रेत योनि(सनातन धर्म में यह काल 10-11 दिन का ही माना गया है) में कौन कितने दिन रहेगा, इसका ठिकाना नहीं, तो इसके लिए स्वीकार्यता बढ़ाने के साधन उन्होंने खोज लिए हैं।स्वयं भूत प्रेत पिशाच चुड़ैल आदि बनकर भूतों को कम्पनी देना और स्वयं को इस स्थिति के लिए सज्ज करना,यह उनकी मजबूरी है।लेकिन उस धर्म के अनुयायियों द्वारा इसका अनुकरण जिसमें जीवन की तैयारी समस्त कर्तव्य सम्पादित करते मुक्त मन से मोक्ष की ओर जाना है, प्रेत योनि की स्वीकार्यता और इसे मनोरंजन का साधन बनाना, घोर दुर्भाग्यपूर्ण ही तो है।आज तो वैलेंटाइन पर्व के तरह इस पर्व में भी बाज़ार ने असीम सम्भावनाएँ देख ली हैं और इसका अपरिमित विस्तार को कमर कस चुकी है।खैर, जिसका जो अभीष्ट होगा,उसकी उसी ओर कर्म होंगे और वही उसका प्राप्य होगा,निश्चित ही है।
अतः ईश्वर के दिये एक एक साँस का हम सदुपयोग करें,स्वयं का कर्तब्य और दायित्व समझें,आत्मविकास करें तो हमारी सकारात्मकता निश्चय ही हमारे आसपास सात्विकता प्रसारित कर हमें आत्मसंतोष देगी,हमें अपना जीवन सार्थक लगेगा और जीवित रहते हम प्रसन्नतापूर्वक मृत्यु को अंगीकार करने को प्रस्तुत रहेंगे।जीतेजी और मरकर भी भकटने से बचें,यही तो जीवन की सिद्धि है।

Ranjana Singh

23.10.19

दीपोत्सव

पर्यावरण बचाने को पटाखों से और स्वास्थ्य बचाने को भारतीय मिठाइयों से परहेज़ हेतु व्यापक और प्रभावी अभियान स्कूलों से लेकर टीवी विज्ञापनों पर अविराम चल रहा है।बाज़ार यह समझाने में लगभग सफल हो गया है कि दीपोत्सव का अर्थ नए नए कपड़े,सोने गहने की खरीदारी और मिठाई के स्थान पर चॉकलेट खाना खिलाना है।
होली दिवाली जैसे पर्व कितने पर्यावरण अहितकारी, अवैज्ञानिक, दाकियानूसी त्योहार/परंपराएं हैं, यह सिद्ध करने में यूँ भी तथाकथित प्रगतिवादी वर्षों से अपने प्राण झोंके हुए हैं।
ऐसे में बेचारे सामान्य जन जिन्हें पर्व परम्पराएँ भी खींचती हैं और वामी प्रगतिशीलता भी, कनफ्यूज कनफ्यूज हैं।उन्हें साफ दिख रहा कि मिठाइयों में धड़ल्ले से मिलावट हो रही है, पटाखों से ध्वनि प्रदूषण और रंगबिरंगे फुलझड़ियों से वायु प्रदूषण ऐसे हो रहा है कि पर्व के हफ्ते भर बाद तक वायुमण्डल धुएँ से आच्छादित रहता है,साँस लेना दूभर लगता है।

बस यही समय है कि दो घड़ी को बैठकर खुद भी समझें कि हमें क्या और कैसे करना चाहिए और अपने बच्चों को भी यह समझायें-
 
वर्षा ऋतु में जमे पानी के गड्ढे जितने कीट पतंगे मच्छड़ आदि की बहुतायत के कारण बनते हैं,घर के भीतर भी जो गन्दगी फंगस आदि जमा होते हैं, सफाई के द्वारा पहले उनके उत्पादन स्थल को नष्ट करने के लिए ही दिवाली पूर्व व्यापक सफाई की परंपरा "नहीं तो लक्षमी घर में नहीं आएँगी", कहते पुरातन काल से चली आयी है।
तो घर के बड़ों का प्राथमिक कर्तब्य बनता है कि बच्चों को साथ लेकर घर के अन्दर बाहर गली मुहल्लों तक में सफाई करें।यह दीप से दीप जलाने जैसी बात होगी।एक परिवार को इस तरह से सफाई करते और इस क्रम में साथ सहयोग का आनंद लेते लोग देखेंगे तो एक से दो,दो से चार प्रभावित होते चले जाएँगे।

चंद्रविहीन अमावस की काली रात में अधिकाधिक मिट्टी के दीये ही क्यों जलाए जाने चाहिए,बच्चों को यह समझाएँ और उनसे दीये जलवाएँ।जब वे प्रत्यक्ष कीट पतंगों मच्छडों को नष्ट होते देखेंगे तो जीवन भर के लिए इसको अपना लेंगे।

यह दिन और रात मानसिक अंधकार को दूर कर सात्विकता और हर्ष द्वारा मन को उत्तम विचारों से प्रकाशित करने का दिन है, प्रभु राम को हृदय में विराजित कर इसे अयोध्या(जो कभी किसी के द्वारा जीता न जा सके, नकारात्मकता जिसपर कभी भी आधिपत्य न जमा सके) बनाने का दिन है।
और इस हेतु समझिए कि जबतक हम पर्यावरण की, गौ की, मानव मूल्यों की और सम्बन्धों की गरिमा नहीं रखेंगे, उनके संरक्षण हेतु तत्पर नहीं होंगे कभी सच्चे अर्थों में दीपोत्सव नहीं मना पाएँगे।
हमने गौ का बहिष्कार और तिरस्कार कर इसे सेकुलडिता के अन्तर्गत वध्य(फ्रीडम ऑफ फ़ूड या च्वाइस फ़ॉर फ़ूड) स्वीकार लिया, गायों को कसाईखाने और कुत्तों को ससम्मान घर के अन्दर लाकर पूज्य बना दिया,,तो अब मिठाई के लिए छेना खोया की जगह केमिकल कचड़े ही तो मिलेंगे।लेकिन इसके बाद भी उपाय और विकल्प "चॉकलेट" तो कतई नहीं है।हमारे घर की अन्नपूर्णाएँ इतनी सिद्ध हैं कि बिना खोये छेने के भी 50 तरह के मिष्टान्न बना सकती हैं।उनसे अनुरोध है कि थोड़ी सी मेहनत करें और बच्चों को साथ लेकर घर पर ही कुछ मिष्टान्न बना लें।विश्वास करें, जो आह्लाद मिलेगा,वह अपूर्व होगा।इसके साथ ही बच्चे भी यह सब बनाना सीखेंगे।

ध्यान रखें, अमावस्या की यह रात्रि सिद्धिदात्री होती है।काल/समय अपने कालिका रूप में पृथ्वी पर अपने साधकों को वर देने को विचरती रहती हैं। इसमें आप जो सिद्ध करेंगे, वह सिद्ध होगा।सात्विकता सिद्ध करेंगे तो वह सधेगा,यदि शराब जुआ पार्टीज आदि(नकारात्मकता) सिद्ध करेंगे तो हृदय का असुर सिद्ध होगा जो एक पल को भी सकारात्मकता की रश्मियों को हृदयतल तक पहुँचने न देगा।सबकुछ होते हुए भी आप शान्ति सन्तोष और सुख का अनुभव नहीं कर पाएँगे।

इस तरह, दीपमालिका से सजी पावन और सुन्दर दीपावली मनाइए।
और हाँ, दान हमारे सनातन की अनिवार्य प्रक्रिया है, इसके बिना पर्व पूर्ण नहीं होता।
सो, वंचितों को अवश्य कुछ न कुछ दीजिये ताकि उनके हृदय के प्रसन्नता का प्रकाश आपके जीवन को प्रकाशित कर दे।

"आप सभी को शुभ दीपोत्सव की अग्रिम शुभकामनाएँ....जय श्रीराम"