14.2.14

प्रेमोत्सव वाया छिनरोत्सव

ज्योतिष शाश्त्र के अनुसार चन्द्रमा मन का कारक है, मन को नियंत्रित करता है,इसलिए जब यह आकाश में अदृश्य रहे या अपने पूर्ण रूप में विदयमान हो, दोनों ही अवस्था में मन पर विशेष प्रभाव डालता है.मनुष्य सहित बाकी जीव जंतु इस प्रभाव को कितना अनुभूत और अभिव्यक्त कर पाते हैं ,पता नहीं,परन्तु सागर को देखिये, वह कोई पर्दा नहीं रखता,उद्दात्त रूप में अपने आवेगों को अभिव्यक्त कर देता है.विछोह में विषादपूर्ण चीत्कार और संयोग में हर्षपूर्ण उछाह,परन्तु एक बात है,समस्त संसार को डुबो लेने की क्षमता रखने वाला वह उदधि और उसकी लहरें चाहे जितना तड़प लें,उत्साह उत्सव में चाहे जितनी दीर्घ उछाल ले लें, परन्तु अपनी सीमाओं का कभी अतिक्रमण नहीं करते ।

माघी पूर्णिमा है आज.वसंत का मधुरतम दिन, चमकते चाँद संग सबसे चमकीली सुन्दर रात। पतझड़ ने पेड़ों को भले उसठ कर दिया है, पर इसकी भरपाई धरती पर बिछे फूलों के पौधों ने कुछ यूं कर दिया है कि ऊपर नजर ही नहीं जा रही है। अरे ये नज़रों को छोड़ें तब तो कोई कुछ और देखे। अब स्वाभाविक है जब बासंती पवन मन में उछाह भर रहा हो, धरती पर बिछे फूल मन में उतर आये हों तो मन में प्रणय/ श्रृंगार/ काम और रति क्यों न उतरें।प्राचीन भारतीय परम्परा में वसंतोत्सव की व्यवस्था थी। बड़े ही हर्षोल्लास से वसंत की आगवानी और सम्मान किया जाता था। धर्म अर्थ के बाद काम की प्रतिस्थापना जीवन का आवश्यक सोपान था क्योंकि इसके बाद ही व्यक्ति मोक्ष तक पहुँच सकता था।धर्म अर्थ काम मोक्ष चारों सोपानों की सामान महत्ता, न कोई कम ,न कोई ज्यादा और तब सम्पूर्णता पाता यह जीवन, यह सृष्टि।

खैर, समय बदला है, धर्म अब जीवन धर्म, मानवता नहीं बल्कि सेकुलरिज्म की बेड़ियों में जकड़ी भौंचक इधर उधर देख रही है कि मैं क्या हूँ,कहाँ हूँ.. अर्थ जीविकोपार्जन नही जीवनधर्म बन गया,बाज़ार के चंगुल में फँस वसन्तोत्सव भाया कामोत्सव छिनरोत्सव में तब्दील हो गया और "मोक्ष",यह चाहिए किसे?
चार खूँटों (धर्म अर्थ काम मोक्ष) पर टिका जीवन दो खूँटों (अर्थ और काम) पर अटका संतुष्टि और संतुलन पाने को बेहाल है. कहाँ से मिले, कैसे मिले?
और उसमे भी कामदेव की लंगोट धर उसपर लटका, सब कुछ पा लेने को बौराया, उन्मुक्त भोगाकाश उड़ रहा किशोर युवा वर्ग जब जीवन का सर्वोच्च सुख और संतोष पाने को निकलता है तो उसके आगे नैतिकता धर्म धराशायी हो जाता है.पुचकार से मान गया/गयी तो ठीक वर्ना बलात्कार के बल पर प्रेमोत्सव/ भोगोत्सव मना लेंगे, उसका अवसर न मिला तो तेज़ाब से जला देंगे.अब भाई पुरुसार्थ के बल पर सुख संतोष पाने निकले हैं तो पाये बिना छोड़ेंगे थोडेही।

महानगरों और नगरों में जहाँ बहुतेरे विकल्प (अड़ोस पड़ोस, दुसरे मोहल्ले आदि) उपलब्ध है, वहाँ की विभीषिका फिर भी थोड़ी कम है, लेकिन गाँवों में जहाँ अधिक विकल्प नहीं, चचेरे ममेरे फुफेरे भाई बहन,चाचा भतीजी, मामा भाँजी,जीजा साली, शिक्षक छात्रा "न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्रेम करे कोई ,तो देखे केवल मन " के मूल मंत्र के साथ भेलेन्टाइन फरियाने निकल पड़ते हैं. नैतिकता जाती है तेल लेने और व्यभिचार आचार में कोई फर्क नहीं बचता। संचार क्रांति (टीवी) की पीठ पर सवार हो बाज़ार ने भोगवाद को लोगों की रगों में ऐसे घोल दिया है कि शिराओं में बह रहे छिनरत्व को पृथक कर उसमे सात्विकता, नैतिकता बहा पाना कैसे सम्भव होगा ,पता नहीं।


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18.9.12

दीपुआ का बनेगा..?

मास्साब- अरे गोपिया, ई त बता, के रबरी देबी, राहुल गांधी, मधु कोड़ा औ मनमोहन सिंह, ई सबमे एगो कौमन आ मेन फेक्टर का है ??


 गोपिया - मास्साब, सबके सब गोबर हैं..उहो गाय के नै गदहा के, न लीपे जोग, न पोते जोग..


मास्साब - अबे मरवायगा का.. धीरे बोल ससुरे..

चल इधर तो आ, आ इधर, खा सोंटा..ससुर, इहे सिखाये थे..??
अबे, ई कुल महान भाग्यशाली लोग, महान राजनेता और शासक हुए हैं भारत में देश औ प्रदेस के..
 
अच्छा चल, ई बता के सोनियां गन्धी कौन हैं..?
 
गोपिया- सोनियां अंधी..!!!!
 
मास्साब - अंधी नहीं बे, गन्धी ..
 
गोपिया - लेकिन माई तो कहती है के "सोनियां अंधी है", उको देस, देस के वासी, उनका दुःख दर्द कुच्छो देखाई नहीं देता " त हम सोचे कि उका नाम इहे होगा..
 
मास्साब - अबे माई के बच्चा..जानता है तू ,ऊ केतना बड़ी हस्ती हैं, पूरा भारत उनकै मुट्ठी में है, उप्पर से निच्चे तक सबकुछ.. माता हैं ऊ, माता..देस की माता, महान त्यागमयी माता, सबसे बड़ी माता..
 
 
गोपिया - भारत माता से भी बड़ी...??
 
मास्साब - औ का, सबसे बड़ी माता..ससुर, आदर से नाम ले उनका....ई बात तू भी समझ ले औ अपनी माई के जाके भी समझा देना..
 
गोपिया- ठीक मास्साब, समझ गए, अब आगे से नै होगा गलती..
 
मास्साब - बहुत बढ़िया, सब्बास !!!

 
अच्छा कालू , अब तू बता के महत्मा गांधी कौन थे..??
 
कालू - महत्मा गांधी.......ऊँ...ऊँ .....?????
 
मास्साब - अबे ऊँ ऊँ क्या करता है गदहा ...महत्मा गंधी को नै जनता है..??
ससुर तू लोग ले के रहेगा हमरी नौकरी. कल बीडीओ, सीओ, डीओ, सब का फौज के साथ जब सिक्षा मंत्री आयेंगे, तो इहे सब जबाब देगा..एतना दिन से तुम लोग को सुग्गा जैसे रटा रहे हैं, दिमाग के पटपट सब, इहै परफोर्मेंस देखायगा ..??
 
गोपिया - मास्साब, मास्साब, एका उत्तर हम बताएं ,हम बताएं...?
 
मास्साब - चल सब्बास बेटा, तू ही बता..
 
गोपिया - महात्मा गंधी थे, देस के बाप...
 
मास्साब - कर दिया न गोबर..अबे देस के बाप नै कहते हैं, कहते हैं "राष्ट्र पिता", माने पूरा राष्ट्र के पिता..
 
दीपुआ - लेकिन मास्साब, फरीद्वा त कहता रहा कि महत्मा गंधी खाली नेहरुए के बाप रहे..
 
मास्साब - कौन फरीद्वा..?? कब कहा, केकरा से कहा..??
 
दीपुआ- मोड पर जो ऊ दर्जीया बैठता है न मास्साब , उहे फरीद्वा.. कल जब हम बापू का पैंट मरम्ती को देवे उके पास गए रहे न, तो पंडीजी भी वहीँ रहे, उनके से फरीद्वा कह रहा था. औ साथे ई भी कह रहा था कि अपना ई पोसुआ दुनम्बरी पूत के परधान बने के जिद के आगे गांधी बाबा न झुक्के रहते आ अंग्रेजन के देस के बांटे वाला साजिस तोड़ दिए रहते , त कुल होता ई सब - दंगा फसाद ,खूनम खून, घिरना, भरम...औ आज भी कांगरेसिए सब के लगावल ऊ आग में हम सब जल रहे हैं.उनका बारिस सब आजौ ई आग को पूरा से पोसे हुए हैं, जालिम कहियो बुझने नै देंगे घिरना के ई आग..
 
मास्साब - चोप्प्प .....!!!! एकदम साइलेंट !!!! सब गलत बात...एकदम गलत बात.. सब फालतू बात बोलता है सब... खबरदार जे आगे से ऐसा बात कहीं सूना आ दुबारा अपना मुंह से कहीं ऊ सब उगिला तो, आगे कभी हम सुने तो चमडिया उधेड़ देंगे तुम सब का..
 
कल मंत्री जी के सामने इहे सब बोलेगा तू लोग...?? नलायक !!!! हमरा, अपना औ ई इस्कूल का, सबका नाक कट्वावेगा रे ..?? सबका सब लफंदर हो गया है तू लोग..
 
अच्छा कमला, तू बता, अपना देश का राष्ट्र गान के लिखे हैं ??
 
कमला - महाकवि श्री रबिन्द्र नाथ टैगोर जी लिखे हैं ..
 
मास्साब - वाह .. बहुत बढ़िया, गुड गर्ल ...
 
अच्छा अब ई त बता, के राष्ट्र गान में कै गो नदी, पहाड़ औ प्रदेस का नाम है..?
 
कमला - आठ गो प्रदेस माने कि राज्य, दू गो पहाड़ और दू गो नदी...
 
मास्साब - वाह ...देखो त, केतना होनहार औ तेज बच्ची है..भेरी गुड बेटा, भेरी गुड...
 
गोपिया - लेकिन मास्साब.. ऐसे आधा अधूरा नाम सब काहे है गीत में..?? अब पूरा राष्ट्र का गीत है, त इमे ऐसे आधा अधूरा नाम सब नै न होया चाहिए...ऊ पर भी देखिये, "सिंध" त अब अपने देस में हइये नै, ई है अब पकिस्तान में, त राष्ट्रगीत में ई एतना बरस से सिंध सिंध काहे घोसा रहा है..चाहे त सिंध के पाकिस्तान से लै के गीत सही किया जाए आ न त गीते बदल के कौनो एकूरेट राष्ट्र गीत बनाया आ गया जाए , तबै न ई कुल ठीक रहेगा..
 
मास्साब - हम देख रहे हैं तुमको, देख रहे हैं...बडका तेज बन गया है तू...बात बात में बहस करता है..हाथ गोड़ तोड़ के धर देंगे तोरा, कहे दे रहे हैं ...कल मंतरी जी के भिजिट बाला मामला नै रहता त अभिये तुमको सबक सिखा देते बच्चू...
 
गधऊ ,जानता है, राष्ट्र गीत हो या संसद सत्ता से जुड़ा कोई भी बात, उसपर ओंगली उठाने से राजद्रोह का अपराध माना जाता है, भयंकर अपराध..बेटा, बाप बेटा मिल चक्की पीसते रह जाओगे जिनगी भर जेल में..
 
अरे दीपुआ, कल तू इहाँ अगिला बैंच पर बैठिहो, औ जे किसी से भी अंगरेजी में कोई सवाल पूछा जाए, त धड से लपक लियो सवाल औ धड से दे दियौ जवाब, समझे कि नहीं..नै त औ कोइयो के मुंह खोले के नौबत से दू मिनट में इस्कूल के इज्जत का कचड़ा बन जायेगा..
 
दीपुआ- ठीक मास्साब ..
 
मास्साब - अच्छा चल बता - ह्वाट इज योर फादर्स नेम ..?
 
दीपुआ - माई फादर्स नेम इज मिश्टर मोहनदास करम चन्द गाँधी, माने कि महत्मा गांधी..
 
मास्साब - अबे ससुर , महत्मा गाँधी कब से तोहरे बाप हो गए रे ..?
 
दीपुआ - मास्साब अभिये न थोड़े देर पाहिले आप कहे थे कि महत्मा गांधी हम सबके , पूरा राष्ट्र के बाप हैं..
 
मास्साब - हे प्रभु, हे दीनानाथ ..कैसा कैसा चमोकन सबको भर दिए आप हमरा किलास में..अबे ऊ वाला बाप नै..असली बाला बाप..बाप माने कि तोहरे माई के पति..समझे कि नहीं...
 
दीपुआ - ओ, त ऐसा कहिये न .. माई फादर्स नेम इज मिश्टर गजोधर लाल पासवान, साइकिल मकैनिक ...
 
मास्साब - गुड, ऐसेही बोलियों, एकदम कन्फिडेंस के साथ.. आ जो ऊ पूछें कि बेटे बड़े होकर क्या बनना चाहते हो, .. त का कहोगे ..??
 
दीपुआ- आई वांट टू बी ए मिनिस्टर ...मोर बिग, मोर स्ट्रोंग एंड फेमस देन यू
 
मास्साब - वाह ...ई हुआ न बात.. गुड , भेरी भेरी गुड ...ऐसे ही अकड़ के.. फुल कान्फिडेंस से बोलियो बेटा ..ठीक ..जामे उनका आँख फटा रह जाए, अपना गाँव के इस्कूल आ बिदियार्थी का एस्टेंडर देख के..आ अन्ग्रेजिये में सब जबाब दियो बेटा ..
 
अच्छा, जे पूछें कि मिनिस्टरे काहे बनना चाहते हो, का करोगे मिनिस्टर बनके..त का कहोगे..?
 
दीपुआ - मास्साब, ईका जबाब हम हिंदिये में दै दें त चलेगा..? काहेकी एकरा अंगरेजी ट्रांस्लेसन हमको ठीक से नै आता है..
 
मास्साब - कोई बात नै बेटा, तू हिंदिये में कह ,हम अंगरेजी में ट्रांस्लेसन करके तोका दै देंगे, तू ओका रट लियो रात भर में...
 
दीपुआ - हम कहेंगे, हम मंत्री औ आपसे भी बड़का पावरफुल मंत्री एहिलिये बनाना चाहते हैं कि आप सब मिल के जौन तरह से आज देस का गाँ$$$.. मार मार के बरबाद बरबाद किये हुए हैं, हम बड़ा होके मंतरी, परधान मंतरी बन के आप सब का गाँ$$$... में बांस कई के अपना भारत माता के दुर्गती के बदलैया लेंगे आप सब से..सड़ा गला, आधा अधूरा सब हटा के ... देस को सरिया के... एक नया औ सुन्दर भारत बनायेंगे..

 
धडाम .... !!!!!
 
गोपिया - अरे रे... का हुआ मास्साब !!! अरे कमला, बिमला, मनोजवा सकील्वा ..सब दौड़ो रे..पानी लाओ..अबे दीपुआ भाग, बोला के ला प्रिंसपल साहेब के... मास्साब आँख चियार दिए हैं..देख देख खाली बेहोसे हुए हैं कि मर मुर गए..
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30.4.12

आदर्शवादी ..

घबराए आवाज में बुचिया ने मून बाबू को हंकारा लगाया- "ओ भैया, दौड़ के आओ हो,देखो तो मैया को का हो गया.."
मून बाबू हड़बडाये दौड़ के आँगन में पहुंचे तो देखा मैया का केहुनी रगडाया हुआ है और माथे पर भी गूमड़ निकल आया है..
वो समझ गए कि गिरने के कारण कोई बहुत गहरी चोट तो न आई है ,पर मन पर चोट का क्षोभ गहरा है....
उन्होंने पुचकारा, "का हुआ माई कहाँ और कैसे गिर गई...? अच्छा कोई बात नहीं, बहुत गहरा जखम नहीं है ,दुई चोट दवाई में एकदम ठीक हो जायेगा..जा रे तो सोनू, मेरा दवाई का बकसवा तो दौड़ के उठा ला..आ बुचिया, तू जरा दौड़ के पानी तो गरमा ला, घाव साफ़ कर मरहम पट्टी कर दें..."
 
 
मैया अबतक भरी आँखें और भर्राए गले से जो चुपचाप बैठी हुईं थीं, गुर्राई..खबरदार जो कोई सटा है हमसे.. नहीं कराना है हमको दबाई बीरो..

का हुआ माई, कुछो बताएगी, काहे एतना खिसियायेल है, मून बाबू बोले..और साथ ही उन्होंने लखना के तरफ आँखों के इशारे से पूछा कि बात क्या हुई..

लखना बोला, मालिक बात ई हुआ कि दादी मंदिरवा से फिरल आ रही थी कि घरे के पास वाले रोडवा पर हेंज के हेंज उ जमुन्वा मन्तरी का गुंडवा सब मोटरसाइकिलवा पर जा रहिस था, ओही में से दू गो मोटरसाइकिलवा वाला दादी के एकदम नगीचे आ के मोटर साइकिलवा हेंडा दिहिस..डरे के मारे दादी बगले हटीं त खड्डा में चित्त होई गयीं..सब गुंडवन ठट्ठा उड़ाते निकल लिए हुआं से, एहिसे दादी जोरे खिसियायेल हैं..

ओह त ई बात...

छोड़े न माई, का उ गुंडवन उचकवन सब के बात मन से लगा रही है...जाने दे..मून बाबू बोले..

क्षोभ क्रोध मिश्रित आवाज में माई बोली.. हाँ रे..!! जाने काहे न दें.. जब भाग में कीड़ा पडल हो तो सबे जाने देना पड़ेगा..
सब कसूर तोहरे बाप के है..ओकरे कारण हमको का का भोगना लिखा है राम जाने..


का माई, काहे बात बात में बाबूजी को लई आती हो, ई कौनो अच्छा बात है का,मून बाबू और बुचिया ने एकसाथ प्रतिवाद किया..

काहे न लायें, बोल...काहे न लायें..आज जौन भी दुर्दशा हमरा , हमरा परिवार का हुआ है,इसका जिम्मेवार तोहरे बाप के सिवा है कौन..??

पूरा गाँव का भिखमंगवन के रात दिन जुटाए रहे घर में, अपना बच्चा सब का हिस्सा का खाना पीना, कपडा लत्ता, किताब कलम सबमे बाँट दिया..
कभी न सोचा कि पहले अपना घर में दिया जला लें फेर मंदिर की सोचेंगे..अपना घर फूंक के गाँव उजियार किया जिनगी भर...का मिला फल बोल, का मिला..?

ऐसे काहे कहती हो माई, बाबूजी को भगवान् मानता है सारा गाँव, केतना इज्जत है उनका, ई का छोटा कमाई है. मून बाबू बोले..

कमाई..?? देख, आग न लगा देह में, कहे देते हैं...ई कमाई है ,त काहे नहीं ई कमाई का फीस भरके अंगरेजी डाक्टर बनाया तुझे ..?? फीस का रकम सुनके तो होसे उड़ गया था बाप बेटा का, याद है कि नहीं..?..बाप बेटा मिलके ऊ घड़ी भी हमको ठगा..अंगरेजी डाक्टर त अपना देस में ढेरे  है, बेटा आयुर्वेदी डाक्टर बनेगा, उसमे फीस भी नामे का लगेगा..
और लो बन भी गया डाक्टर तो इसमें भी तो कमाई है, लेकिन बेटा चला बाप के आदर्श की राह...लोक कल्याण करेगा...बाप का दुर्दशा देखा फिर भी नहीं चेता..


क्या बेटा.. क्या बेटी ... सबको बाप वाला आदर्श का रोग लगा है..ई करमजली को कहे कि एतना पढ़ी लिखी,निकल जा शहर , बड़का अफसर बन, खूब कमा और अपना जिनगी सम्हाल...लेकिन नहीं, ई महरानी भी बाप का विरासत ऊ कंगला इस्कूले चलाएगी.दहेज़ लेने वाले से बियाह न करेगी, जिनगी भर बिनब्याही बैठे रहेगी..सब मिल के करो अपने अपने मन का और मरते रहो..

आह!! देखो तो ,फोड़ डाला उस राच्छस के सेना ने, लेकिन खून नहीं खौला मेरे संतानों का, इससे बढ़िया तो हम बांझे रहते...जाने कैसा आदर्श, कैसा क्षमाशीलता है ई ..?


हम कहे थे ,हजार बार कहे थे, कि ई संपोलवा के न पोसो...ई मुसखौका छोटका जात, बचपन्ने से एक नंबर का झुट्ठा , एक नंबर का चोर था,पहला किलास से मैट्रिक, आइये, बीए सब चोरी आ धांधलेबाजी कर के पास किया..का सोचे थे, कि अभी जो छोटका चोरी कर रहा है, आगे जाकर बड़का बडका डाका नहीं डालेगा..कम से कम अनपढ़ रहता त मूसे न खाता, आज त आदमी खाता है..
कोयला बिभाग के किरानी पद पर बहाल हुआ औ एतना चोरी बेईमानी किया कि पंदरह बरस सस्पेन रहा, लेकिन देखो, ई पंदरह बरस में पैसा का अइसा बुरुज लगाया कि झीटकी जैसा पैसा उड़ा, चुनाव जीत गया औ सीधे मंतरिए बन गया..अब आग मूत रहा है तो बस सब मिल के झेलो..

मून बाबू ने साहस कर एक बार फिर प्रतिवाद किया- ऐसे काहे कहती है माई, सब जमुन्वे थोड़े न बन गया..देखो बाबूजी के पढाये आज एक से एक पद पर पहुंचा हुआ है कि नहीं.भला लोक को याद करो न,बुरा को याद करके का फायदा है..

माई का स्वर अब और ऊंचा उठा गया.. हाँ, हाँ, रे देखे. पद उद भी देखे ..
बडका कलक्टर है न पसमनमा ..
अपने से जाके हम घिघियाये, बचवा बचा लो हमरा घर, उ रच्छसवा जमुन्वा से.बड़का मशीन लगा के ढाह रहा है रे ..

त कहा , माफ़ कई दे माई , मंत्री के खिलाफ एक्सन लेवे के पावर हमरा नहीं है..औ उसके पास तो मास्साब का हस्ताक्षर किया भेलिड कागज भी है..केतना कहे हम, बिटवा गुरूजी काहे कागज पर दस्खत करेंगे रे..ऊ सब उसका धोखा है .. उसका पुरखन को हमरे पुरुखन रहे के बास दया खाकर ऐसे ही दिए थे, अपना घर से एकदम अलग हटके..ई फैलाते फैलाते हमरे घर से दीवार सटा लिया और अब अपना घर बगीचा सुन्दर बनाने को हमरे घर का आधा हिस्सा भी चाहिए उसको..अब बता न हम जान बूझके अपना आधा घर आ खलिहान काहे को उसके नाम करेंगे..

पर ऊ..एक सुना हमरा..??

बात में सच्चाई थी, इसका उत्तर किसीके पास नहीं था..लम्बी खामोशी रही..

इस भारी माहौल को हल्का करने के लिए बुचिया ने ही पहल की..नन्हे भतीजों को इशारे से दादी को लाड़ करने को कहा..दोनों बच्चे दादी से लिपट गए और एक हाथ पकड़ कर अपने पिता से कहने लगा देखो बापू दादी को लहरने वाली दवाई न लगाना, प्यारी प्यारी दवाई लगाना जिससे जले भी न और घाव झट्ट से ठीक हो जाए..दूसरा दादी के माथे के गूमड़ को सहलाने लगा. मून बाबू की पत्नी तबतक गरम गरम दूध हल्दी का गिलास ले उपस्थित हो गई थी..इस एकत्रित लाड़ ने माई के क्षोभ की अग्नि को हल्का और ठंढा करने में प्रभावकारी काम किया..
मरहम पट्टी कर चुकने के बाद मून बाबू ने बड़े लाड़ से कहा, माई, तू इतना कोसती रहती है बाबूजी को ,पर बाबूजी जैसा देवता इंसान, इतना बड़ा दिल वाला आदमी दुनिया में कितना देखा सुना है बता ना..और जानती है, बाबूजी ने पैसा भले न कमाया, पर जो नाम, सम्मान और संतोष रूपी धन उन्होंने कमाया, वह बिरले को नसीब होता है..

मैया कराह उठी...बोली- बिटवा , उनके सारे किये मैं माफ़ कर देती, अगर सचमुच वो अपना दिल को बड़ा और कड़ा बनाये रख लेते रे..जिस दिन उनका ई प्यारा शिष्य , यही जमुन्वा ,धोखे के कागज के बल पर घर ढहवा रहा था, उस घड़ी जदि अपना यही बड़प्पन, सहनशीलता कायम रख उस झटके को सह लेते,अपना प्राण न त्यागे होते , तो हमरा दुनिया ऐसे उजड़ता रे, बोल !!! हमरा तो सोहाग भाग,सबकुछ लुटे लिए चले न गए अपने साथ.कैसे माफ़ कई दें उनको, तू ही कह...


यह दुःख केवल उन्ही तक सीमित न रह पाया, सबकी आँखों से झर धरती भिंगोने लगा..
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12.3.12

गुहार ...


पिता भाई ने विदा किया था, अबकी डोली तुम उठवाना.
पहले मुझको विदा कराके, घर सहेजकर फिर तुम आना.
दाम्पत्य की गरिमा हेतु, सप्त पदी के वचन निभाना,
सांसों की लड़ियाँ जब टूटे, विकल न होना गले लगाना..

भरना मांग सिन्दूर सजन, करना मेरा सोलह श्रृंगार,
सज धज रूप दमक ले मेरा, पहनाना फूलों का हार.
संचित इक अभिलाषा मेरी, पाऊं यह अनुपम उपहार,
प्रिय, आमजन हित लगवाना, कई- कई वृक्ष फलदार..



तुमसे पूर्व पहुँच जो जाऊं, लीपपोत गृह-द्वार संवारूं,
मोहक बंदनवार रचाकर ,कुसुम सुसज्जित सेज बिछाऊं,
मेंहदी बेंदी सेंदुर गहना, पहन के अपना रूप निखारुं,
जैसे ही पहुंचो तुम देहरी, पौ पखार जयमाल पिन्हाऊं..

सजे गृहस्थी फिर से अपनी, ठने रार तो कभी बरसे प्यार.
दोनों मिल जब एक ही हैं तो,किसकी जीत औ किसकी हार.
जन्म जन्म के संगी हों हम, रहे सदा अखंडित यह क्रमवार.
ह्रदय से यह आशीष दो प्रियवर, प्रभु से भी मेरी यही गुहार..
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23.1.12

सेलिब्रेशन ऑफ़ डर्टीनेस ..

धूम मची है, नायिका ने किरदार को जीवंत कर दिया है. इसे कहते हैं कला, और कला के प्रति समर्पण..यत्र तत्र सर्वत्र सेलेब्रेशन हो रहे हैं.मंच शुशोभित गुंजायमान हैं..मंच पर नायिका के अश्लील इशारों,कामुक अदाओं और उघडे देह पर लोग तालियाँ सीटियाँ लुटा हाँफते, बेहोश से हुए जा रहे हैं.कला कई कई सीढियाँ एक साथ फांदता हुआ नयी ऊँचाइयाँ जो पा रहा है..सत्य यह स्थापित और रूढ़ होता जा रहा कि कला का वास नग्नता में है, इसलिए होड़ मची है कि कला को कौन कितना उत्कर्ष दे सकता है और दर्शकों के मुंह से ऊह!! आह!! आउच!! संग ऊ-- ला-- ला!! कौन कितना निकलवा सकता है..

एक फिल्म बनी-"डर्टी पिक्चर" , यह कह कि त्रासदी देखो !!!..पर चकाचौंध में नेपथ्य में जा लुप्त हो गया सन्देश, कि इस मार्ग पर चल, धन भले मिल जाए पर अंततः हताशा निराशा एकाकीपन और असह्य मानसिक संताप के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता ..

महेश बाबू कहते हैं "मुझे पसंद हैं वो लोग जो जिन्दगी अपनी शर्तों पर जीते हैं" . यानि कि अश्लीलता के कीर्तीमान स्थापित करते समय परिवार समाज, आत्मा परमात्मा पर थूकने में जो जितना बड़ा वीर (निर्लज्ज) , वही महान .."बोल्ड एंड ब्यूटीफुल" वही जो जितना बड़ा निर्लज्ज और जो जितना बड़ा निर्लज्ज, वह धन, मान, प्रसिद्धि ,प्रतिष्ठा सबसे उतना ही सफल और बड़ा..

मनोरंजन को जबतक रेडियो उपलब्ध था,लोग दृश्यों की कल्पना करते और सोचते कि काश यह सब दृश्यगत भी होता..यह हुआ और दूरदर्शन ने एक ही मंच पर ज्ञान विज्ञान खेल कूद और समाचार से लेकर मनोरंजन तक सब कुछ उपलब्ध कराया. पर मनोरंजन का यह सिमित कोटा विस्तार पाए,लोग इसके लिए लालायित थे..हमारी सरकार ने जनभावनाओं को समझा, पर उसे आदर देने हेतु दूरदर्शन का विस्तार नहीं किया, अपितु अपने ह्रदय द्वार खोल दिए असंख्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए, कि आओ और मनोरंजन परोसो..इन कंपनियों की सहूलियत के लिए दूरदर्शन को इतना इतना उबाऊ बना दिया कि लोग इसे कूड़ा समझ इससे पूर्णतः किनारा कर लें.

और फिर अचानक ही हमारे देश की सुंदरियाँ विश्व स्तर पर सौन्दर्य प्रतियोगिताएं जीतने लगीं.देश का गौरव ,महान उपलब्धि ठहराया गया इसे.लोग गर्व से गदगद उभचुभ...आश्चर्य यह कि उन दो तीन वर्षों से पहले या बाद भारत में तथाकथित "ब्यूटी विथ ब्रेन" का पूर्ण अकाल पड़ गया..क्यों ?? प्रश्न -ग्लोबलाइजेशन, बाजारवाद का यह रहस्य सात पर्दों में कैद रह गया.

बहुत बड़ा बाज़ार है हमारा देश, जहाँ सौन्दर्य तथा मनोरंजन क्षेत्र एक विस्तृत हरा भरा चारागाह है..लेकिन समस्या यह है कि आत्मोन्नति, सादा जीवन उच्च विचार,भौतिकता से दूरी आदि भारतीय संस्कार विचार बाज़ार का सबसे बड़ा शत्रु है..संस्कारहीन किये बिना व्यक्ति को विलासी, भौतिकवादी नहीं बनाया जा सकता...और जबतक व्यक्ति भौतिकवादी नहीं होगा पूरे बाज़ार को समेट अपने घर में बसा लेने के रोग से ग्रसित कैसे होगा...

पहलेसिनेमा से लेकर बुद्धू बक्से(टी वी)द्वारा महलनुमा घर, बहुमूल्य कपडे व साजो सामान की चकाचौंध में व्यक्ति की बुद्धि को चुंधिया उसे भोग के उन वस्तुओं लिए लालायित करना और फिर लुभावने विज्ञापन द्वारा उपभोक्ता का प्रोडक्ट के प्रति ज्ञानवर्धन कर उसे पा लेने को प्रतिबद्ध करना आठो याम अबाध जारी रहता है.दर्शक/उपभोक्ता इन सब से निर्लिप्त रहे भी तो कैसे..

इस विराट बाज़ार में अन्य समस्त भौतिक वस्तुओं के साथ स्त्री भी एक वस्तु है "पारस" सी अनमोल. एक ऐसी वस्तु, जिसे किसी भी वस्तु के साथ खड़ा कर दो, उस वस्तु को चमका दे, उसे मूल्यवान बना दे.. कार से सेविंग ब्लेड तक और दियासलाई से हवाई यात्रा तक, फ्रंट में सुंदरियों को चिपकाया नहीं कि ग्राहक हँसते हँसते अक्ल और जेब लुटा देता है ...और अब तो हसीनाएं दिखा, पुरुष ग्राहकों को पटाने की प्रथा अपार विस्तार पा, "हैंडसम" दिखा, महिला ग्राहकों को लुभाने का भी आ गया है..

सुन्दर सुगठित मोहक शरीर और अदाओं वाले युवक युवतियों की मार्केट में भारी डिमांड है..पहले जो यह विभेद था कि ए ग्रेड की हसीनाएं इतना ही उघड़ेंगी, बी ग्रेड वाली इससे अधिक और सी ग्रेड वाली इससे काफी आगे बढ़कर, बाज़ार यह फर्क मिटा देने पर आमदा है..उसे कोई सीमा नहीं चाहिए,सब असीम चाहिए... तो, इसमें स्पेशल ग्रेड(पोर्न स्टार) को उतरा गया..अब इस स्पेशल ग्रेड को इतना अधिक महिमामंडित किया जाएगा, इसपर धन प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा की ऐसी वर्षा की जायेगी, कि ए- बी- सी में होड़ मच जायेगी इस ग्रेड में शामिल होने के लिए.."बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा" विश्वास अपार सुदृढ़ता पा सिद्ध अकाट्य हो जायेगा..

संचार के समस्त दृश्य श्रव्य माध्यमो द्वारा व्यक्ति के मन में अहर्निश अश्लीलता, कुसंस्कार, भौतिकवादिता के प्रति प्रेम उतार मनुष्य को केवल और केवल एक उपभोक्ता बनाने का अभियान चल रहा है.. एक वह समाज जिसे पीढ़ियों से यह सिखा पोषित किया गया है कि भोग तुच्छ और अधोगामी है , उन मूल्यों से विलग कर विलासप्रिय भोगवादी बनाये बिना बाज़ार का प्रयोजन कैसे सिद्ध होगा..व्यक्ति जबतक यह न माने कि जीवन और शरीर इन्द्रिय भोग के लिए ही मिला है,भोग की और उन्मुख कैसे होगा..? और सांसारिक समस्त भोगों के साधनों को जुटाने का एकमात्र साधन तो "धन" ही है, तो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित कर, निकृष्ट प्रतिस्पर्धा(जिसमे कोई किसी का संगी नहीं,प्रतियोगी है जिसके हाथ से अवसर लूट अपने कब्जे में करना ही सक्सेसफुल मैनेजर होने की शर्त है) में लगा ,उप्भोग्तावादी संस्कृति को मजबूती देता बाज़ार फलता फूलता जा रहा है,

क्या विडंबना है, एक समय था जब शिक्षा , समाजिक सरोकारों से पूर्णतः काट स्त्री को संपत्ति और केवल उपभोग की वस्तु बना छोड़ा गया था..पिता भाई पति या पुत्र के अधीन जीवन भर उसे हाड मांस के एक पुतले सा चलना पड़ता था..किसीके भी सही गलत का प्रतिवाद करना, उनके सम्मुख ऊंची आवाज में बात करना,बिना उनकी आज्ञा या परामर्श के निर्णय लेना, स्त्री की स्वेच्छाचारिता मानी जाती थी.परिवार के पुरुष सदस्यों से अधिक महिला सदस्य इसके लिए सजग रहती थी कि किसी भी भांति किसी भी स्त्री में स्वविवेक व स्वनिर्णय का विध्वंसक गुण न आ जाये.इसके लिए जो कुछ भी किया जा सकता था, किया गया. शिक्षा से दूर रख उनके व्यक्तित्व को इतना कुंठित किया गया कि दब्बूपना उनके स्वभाव में स्थायी रूप से स्थिर हो गया और सबसे मजे की बात कि इस दब्बूपना को शील, लज्जा,संस्कार,सच्चरित्रता कह पर्याप्त महिमामंडित किया गया. अज्ञान के अंध कूप में पड़ी स्त्रियों ने हथियार डाल दिए और स्वयं को असहाय निर्बल मानते हुए पिता भाई पति तक को ही नहीं पुत्र को भी अपना स्वामी मान लिया..कभी गर्वोन्नत हो यह माना कि वह अमूल्य संपत्ति है जिसकी रक्षा पुरुष सदस्यों(सबल) द्वारा होनी आवश्यक है, तो कभी मान लिया कि वह तो सचमुच एक उपयोग उपभोग की वस्तु मात्र है..

पर समय ने समाज को जब यह सिखाया कि उसका निर्बल पड़ा पूरा आधा भाग परिवार समाज के विकास में सहभागिता नहीं निभा पा रहा, तो जागृति फ़ैली और इस वर्ग सबल करने पर पूरा ध्यान दिया जाने लगा..और आज जब शारीरिक,मानसिक व बौद्धिक विकास का अवसर नारी पुरुष को सामान रूप प्राप्त है, स्त्रियों ने दिखा दिया है कि शारीरिक बल में भले वे पुरुषों से कभी कभार उन्नीस पड़ जाती हों पर मानसिक और बौद्धिक बल में वे सरलता से उन्हें पछाड़ सकती हैं..लेकिन यह अपार सामर्थ्य संपन्न नवजागृत समूह जिस प्रकार दिग्भ्रमित हो रहा है, असह्य दुखदायी है यह..इतने लम्बे संघर्ष के उपरांत प्राप्त अवसर को एक बार पुनः स्वयं को उत्पाद और वस्तु रूप में स्थापित कर स्त्री कैसे नष्ट कर रही है.. इस पेंच को वह नहीं समझ पा रही कि बोल्डनेस कह जिस नग्नता को महिमामंडित किया जा रहा है,वह पूरा उपक्रम उसे मनुष्य से पुनः उपभोग की एक सुन्दर वस्तु बना छोड़ने की है.. व्यभिचार को आचार ठहरा उसका मानसिक विकास का आधार नहीं तैयार हो रहा बल्कि उसके शारीरिक शोषण का बाज़ार तैयार हो रहा है...

आवश्यकता साक्षर भर होने की नहीं बल्कि सही मायने में शिक्षित होने की है, विवेक को जगाने और आत्मोत्थान की है.स्त्री स्वयं जबतक अपने आप को केवल शरीर.. और शरीर को, धनार्जन का साधन नहीं मानेगी , मजाल नहीं कि कोई पुरुष उसे इसके लिए बाध्य कर सकेगा..



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23.12.11

जीवन..

सांस सांस कर चुकती जाती, साँसों की यह पूंजी,
जीवन क्यों,जगत है क्या, है अभी तलक अनबूझी..

कभी लगे यह विषम पहेली, अनुपम कभी सहेली,
संगसाथ चलने का भ्रम दे, कर दे निपट अकेली.

कभी लगे है क्या कुछ ऐसा, जो मैं न कर पाऊं,
काल तरेरे भौं जब भी तो , दंभ पे अपनी लजाऊँ.

कभी लगे है बचा हुआ क्या, जो न अबतक देखा,
तभी रचयिता विहंस के पूछे, क्या है अबतक देखा.

कूड़ा कचड़ा ही तो समेटा, जन्म कर दिया जाया,
महत ज्ञानसागर का अबतक, बूँद भी कहाँ पाया.

सोचा था पावन जीवन को, सार्थक कर है जाना,
अर्थ ढूंढते समय चुका , वश है क्या गुजरा पाना.

जाने किस पल न्योता आये, क्षण में उठ जाए डेरा,
माया में भरमाया चित, किस विध समझे यह फेरा..



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7.12.11

हाथ का साथ ....




अईसे काहे बघुआ के, अंखिया तरेर के देख रहा है बे,
साला..नंगा..भुक्खर ...???

आ ...समझा !!! ... भूखा है ???
त ई से हमको मतलब..???
सब अपना अपना भाग का खाते हैं...
हम भी अपना पुन्न का स्टाक से खा और इतरा रहे हैं...
तू भूखा.. नंगा... ई तोरा भाग...
त फिर हमरा भरलका मलाईदार छप्पन भोग थरिया देख के ई जलन काहे.. ई आक्रोस काहे..आयं  ??

चल भाग इहाँ से..

नहीं भागेगा..??

त,,, का कल्लेगा बोल..???

जल्ला कट्टा बोली मारेगा...???

हा हा हा हा...कैसे ??

तोरा जीभ त है, हमरे जेब में ...!!!

त,,, अब का ...???

ओ....गोली मारेगा..???

लेकिन कैसे बे...???

हाथ है...???

सबका हाथ काट के हम जमा कर लिए अपना खजाना में...
अब हाथ, केवल औ केवल हमरे पास है...
आ जिसके हाथ में हमरा दिया हाथ है, ओही किसीको भी बोली या गोली, कुच्छो मार सकता है..

एहिलिये न कहते हैं, धड से आके धर लो ई हाथ...ससुर, राज करेगा राज ...!!!

" हमरा हाथ, हमरा हाथ धरने वाले हर जन- जनावर के साथ "



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