3.6.19

सावित्री कथा, वैज्ञानिकता के परिप्रेक्ष्य में

सावित्री सत्यवान की कथा,,
वामी विचारधारी भले इसकी खिल्ली उड़ा लें,कोरा गप्प ठहरायें,पर हम गवईं मानसिकता वाले अबुद्धिजीवी लोग वट को भी पूजनीय मानते हैं और देवी सावित्री को भी। तो अपनी छोटी सी बुद्धि लगाकर वैज्ञानिकता की कसौटी पर इसे तोल जो संभावनाएँ अभीतक दिखीं हैं,उन्हें विमर्श द्वारा और स्पष्ट करने की अपेक्षा से इस मंच पर रख रही हूँ। सुधि जनों से आग्रह है कि मेरा मार्गदर्शन करें ताकि मेरा दर्शन व्यवस्थित हो सके।

इस व्रत का नाम "वट सावित्री व्रत" है,जिसमें कथा केन्द्र में पतिपरायणा सती नारी सावित्री हैं,जो यमराज से न केवल पति के प्राण वापस ले आती हैं अपितु अपने मातृ और स्वसुर कुल के लिए भी यमराज से वरदान प्राप्त कर सबको सुखी समृद्ध और अभावहीन कर देती हैं।
सम्बन्धों और सम्बन्धियों के प्रति निष्ठा, समर्पण, सेवा भाव आदि मानवीय भावों को थोड़ी देर के लिए बगल में रख देते हैं और वहाँ जाते हैं जहाँ वन में लकड़ियाँ काट रहे सत्यवान क्लान्त होकर विश्राम की इच्छा प्रकट करते हैं और सावित्री उन्हें वटवृक्ष के नीचे विश्राम का आग्रह करतीं हैं।
सत्यवान प्रगाढ़ निद्रा में लीन होते हैं और यमराज उनके प्राण लेकर अपने लोक को गमन करते हैं।पतिव्रता सावित्री यमराज का अनुसरण करते उनके पीछे चलने लगती हैं।

स्थूल रूप से यह सम्भव नहीं लगता।लेकिन जिनकी इस विषय में रुचि है,यदि उन्होंने थोड़ा भी अध्ययन किया है या जो सिद्ध पुरुष हैं और अपने अनुभवों से यह शक्ति पाया है, वे जानते हैं कि व्यक्ति का स्थूल शरीर केवल एक आवरण है जो पूर्णतः शूक्ष्म शरीर द्वारा संचालित होता है और उस शूक्ष्म शरीर के साथ व्यक्ति कहीं भी गमन कर सकता है।
अब चूँकि सावित्री को ज्ञात था कि(जिसे ज्योतिष शास्त्र का ठीक ठाक ज्ञान हो,जीवन की घटनाएँ आयु मृत्यु आदि की गणना वह आज भी कर सकता है) अमुक दिन सत्यवान की आयु शेष हो रही है तो उसने अपना पूरा ध्यान वहीं केन्द्रित कर रखा था। मानवीय दुर्बलताओं,विकारों से एक सामान्य मनुष्य भी यदि स्वयं को बचा लेता है तो उसमें सात्विक ऐसी शक्तियाँ विकसित हो जाती हैं जिसके बल पर उसका कहा सत्य होता है,उसके आशीर्वाद और श्राप सिद्ध होते हैं और अपने शूक्ष्म शरीर के साथ वह न केवल कहीं आ जा सकता है अपितु परकाया प्रवेश भी कर सकता है( ये बातें केवल पढ़ी सुनी नहीं कह रही, बहुत कुछ स्वानुभूति के आधार पर, इस तरह के कई लोगों के प्रैक्टिकल अनुभूति के आधार पर कह रही हूँ)।
हमारे एक मित्र हैं, जिन्होंने वैज्ञानिक ढंग से यह सिद्ध कर दिया है कि जिसे हम प्राण कहते हैं,उसका भी एक वजन होता है,उसके गमन का एक मार्ग होता है,अँगूठे सी आकृति वाला धुँधला पर उज्ज्वल वह प्रकाशमान होता है जिसे सामान्य दृष्टि/आँखों से नहीं देखा जा सकता।हाई रेज्युल्यूशन सॉफ्स्टिकेसेस ऐसे कैमरे बनाये जा चुके हैं जिसके द्वारा व्यक्ति के ऑरा/प्रभाकिरण तथा प्राण के उस प्रकाश को देखा जा सकता है।ऑरा हीलिंग के लिए तो ऐसे कैमरों के प्रयोग आरम्भ भी हो चुका है।

तो जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर चले तो ध्यान में लीन सावित्री अपने शूक्ष्म शरीर के साथ उनका अनुगमन करने लगी और उसकी प्रतिबद्धता ने जाते हुए उस प्राण का,गमन बाधित किया जो शरीर से निकलने के बाद उससे मुक्त हो अपने गंतव्य की ओर जा रहा था,जहाँ उसे मोहमुक्त होकर एकाकी ही जाना था। उस प्राण/चेतना को ही हम थोड़ी देर के लिए यम मान लेते हैं। 
हममें जो भी शक्ति होती है,स्थूल कार्यों के लिए शारीरिक बल चाहे प्रत्यक्ष रूप में उपयुक्त होती हो,पर इसके पीछे भी असली शक्ति प्राण/चेतना की ही होती है।शरीर में रहते यह शक्ति भले सीमाओं में बन्धा हो,पर शरीर मुक्त होने पर अपनी सात्विकता के अनुपात में अपरिमित सबल सामर्थ्यवान हो जाती है।
तो, अपने मार्ग में बाधा पाने पर मुक्त होने के लिए वह सावित्री से पीछा छुड़ाने के लिए उसको वे सारे वरदान देता चला गया जो सावित्री का अभीष्ट था। परन्तु इस क्रम में यह भी हुआ कि सावित्री का कुल के प्रति निष्ठा और समर्पण भाव देख वह प्राण मुग्ध होता बन्धता भी चला गया और अंततः अपनी प्रिया की संतान प्राप्ति के कोमल भाव के प्रति समर्पित होता हुआ,उसका इच्छित उसे देने को मुक्त होने के स्थान पर पुनः अपने शरीर में वापस आने को प्रस्तुत हो गया।

अब जैसा कि हम सभी जानते हैं, वटवृक्ष को अक्षयवट इसलिए कहा जाता है कि इसका कभी क्षय नहीं होता।आज भी धरती पर हजारों हजारों वर्ष से अमर कई वटवृक्ष हैं जिनकी ईश्वर रूप में ही पूजा होती है।वटवृक्ष और पीपल, ये चौबीस घण्टे ऑक्सीजन ही देते हैं,यह तो आधुनिक विज्ञान ने भी कह दिया है। यही कारण है कि पक्षी और सरीसृप प्राथमिकता से इसी पर अपना बसेरा बनाते हैं।
सावित्री ने इस वृक्ष के नीचे सत्यवान को इसलिए रखा ताकि वह एक तरह से ऑक्सीजन से आवृत्त उस वेंटिलेटर के सानिध्य में तबतक रहें जबतक प्राण पुनः स्थापित हो शरीर को सुचारु रूप से चलाने की अवस्था में न पहुँच जाय।
अब पूरी कथा को एक सूत्र में पिरोकर देखिये।अब भी क्या आपको यह किवदंती, काल्पनिक कथा,असम्भव या हास्यास्पद लगती है?

वटसावित्री पूजन के दिन ऐसे वृक्ष को प्राथमिकता दी जाती है जिसमें बड़गद और पीपल एक साथ हों या फिर पास पास।वृक्ष के चारों तरफ रक्षा सूत्र लपेटती विवाहिताएँ पतिव्रता देवी सावित्री के महान कर्मों का स्मरण करते जहाँ अपने लिए अखण्ड सौभाग्य का वरदान माँगती हैं वहीं अपने धर्म कर्म निष्ठा और प्रेम के प्रति प्रतिबद्धता भी दुहराती हैं।
जहाँ एक जीवनदायी वृक्ष के संरक्षण का यह उद्योग है, वहीं स्वच्छ ऊर्जा ग्रहण कर अधिक सामर्थ्यशाली बनने का उपकरण भी।

विवेक जो जागृत रखते जब हम विज्ञान को साथ लेकर चलेंगे, तभी अपने लिए कल्याणकारी मार्ग निकाल पाएँगे।आधुनिक विज्ञान जो कि पूर्णतः स्थूल साक्ष्यों को ही स्वीकार करता है, जो प्रतिपल नया कुछ सीख जान रहा है,उसकी स्थूल सीमाओं में उस ज्ञान को बाँधना जो शूक्ष्म शरीर द्वारा जाना भोगा गया हो, स्वयं को ही छोटा करना नहीं होगा??

अस्तु, कुछ लोगों ने आज मनाया यह पर्व कुछ कल मनायेंगे। मेरा आग्रह है कि व्रत करें न करें, एकबार शान्त मन इस वृक्ष के नीचे आँखें बन्द करके शान्त मन आत्मलीन होकर बैठिए और फिर बताइये कैसी अनुभूति हुई।यदि आनन्द और ऊर्जा मिले तो चिन्तन को उस आनन्द के मूल की ओर ले जाइए। पौराणिक कथा की प्रासंगिकता और वैधता स्वयं आपका मन आपको बताएगा।

27.4.18

एकलव्य कथा

कक्षा 9-10 के अहिन्दीभाषी बच्चों को हिन्दी पढ़ाते समय श्रुतिलेख लिखवा रही थी और इसी क्रम में शब्द "एकलव्य" लिखवाया। उत्सुकतावश मैनें उनसे पूछ लिया कि क्या वे एकलव्य के विषय में जानते हैं? उन्होंने कथा के विषय में जो बताया,मैं सन्न रह गयी।

उनके अनुसार एकलव्य बड़ा ही कुशाग्रबुद्धि बालक था, लेकिन क्योंकि वह छोटी जाति का था इसलिए उसे ब्राह्मण द्रोणाचार्य ने शिक्षा नहीं दी और जब उसने गुरु द्वारा राजपुत्रों को दी जा रही शिक्षा को छुप छुप कर देखते सबकुछ सीख लिया और गुरु प्रतिमा के सम्मुख निरन्तर अभ्यास द्वारा ऐसी पारंगतता पा ली कि उसकी बराबरी करने वाला कौरवों पाण्डवों में कोई भी नहीं था तो, यह पता चलने पर गुरु द्रोणाचार्य ने छलपूर्वक गुरुदक्षिणा में उससे उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया ताकि वह कभी भी अपनी प्रतिभा दक्षता का उपयोग नहीं कर पाए और सँसार भर में द्रोणाचार्य के राजपुत्र शिष्य ही सर्वश्रेष्ठ रहें।

बच्चों के कोमल मस्तिष्क पर कथा(विष)जिस रूप में अङ्कित हुई, काश कि शिक्षक यह देख समझ पाते। कथा के इस स्वरूप के अनुसार -

* हिन्दुओं में भेदभाव परक जाति व्यवस्था महाभारत काल में भी ऐसी थी कि तथाकथित छोटी जाति में जन्में लोगों को शिक्षा तक से वन्चित रखा जाता था।और यदि कोई प्रतिभावान शिक्षा तक पहुँच भी जाता था तो ऊँची जाति के लोग उनसे छलपूर्वक वह छीन लेते थे।

* गुरुदक्षिणा(फीस) देने में असमर्थ क्षात्रों के प्रति गुरु इतने कठोर/क्रूर होते थे कि उनको अक्षम बनाने में तनिक भी संकोच नहीं करते थे।

*गुरु लोभी होते थे और आर्थिक रूप से समर्थों को ही शुल्क की एवज में शिक्षा देते थे।

*क्षत्रिय तथा ब्राह्मण क्रूर स्वार्थी, दलितों के शोषक होते थे।

इस प्रभाव को निरस्त निष्प्रभावी करना अत्यंत आवश्यक था। सो मैनें बच्चों से कुछ काउण्टर क्वेश्चन पूछे।

प्र.- हिन्दूधर्म के मुख्य ग्रन्थ कौन कौन हैं?
उ.- महाभारत, गीता, रामायण।
प्र.- महाभारत गीता किसने लिखी थी?
उ.- वेदव्यास ने..
प्र.- वेदव्यास की जाति क्या थी?
उ.- शूद्र(मछुआरिन माता)
प्र.- रामायण किसने लिखी थी?
उ.- वाल्मीकि।
प्र.- इनकी क्या जाति थी?
उ.- शूद्र।
प्र.- भारत के कुछ ऋषियों संतो महापुरुषों के नाम बताओ जिनके प्रति लोगों में अपार श्रद्धा है?
उ.- रहीम,कबीर, रैदास,तुलसीदास, सूरदास,मीराबाई,पिछले कुछ सौ वर्षों के और विश्वामित्र, वाल्मीकि, शबरी आदि जैसे असंख्यों सन्त विद्वान पराक्रमी योद्धा जो जन्मे चाहे जिस भी जाति में परन्तु अपना जो कर्म उन्होंने चुना, संसार उसी रूप में उन्हें पूजता है।

ब्राह्मण द्रोणाचार्य सा पराक्रमी योद्धा, शस्त्रज्ञाता उनके समय में बहुत ही गिने चुने थे जबकि जाति से वे ब्राह्मण थे और जाति अनुसार उन्हें केवल शास्त्रज्ञाता होना चाहिए था।इसी तरह विश्वामित्र क्षत्रिय थे,किन्तु उन्होंने ब्राह्मणत्व स्वीकार लिया था। शूद्र वेदव्यास और वाल्मीकि महर्षि बने।

तो, अव्वल तो उस समय कर्म के आधार पर जो वर्ण व्यवस्था थी,वह जन्म आधारित बिल्कुल न थी। बाद में जब जाति व्यवस्था जन्मगत हुई भी तो उसका आधार यह था कि जो जिस जाति में जन्मता है,उसमें अपने परिवारगत पेशे से सम्बन्धित दक्षता सहज ही आ जाती थी, सो लोगों को यह फायदेमंद लगा और लोगों ने इस व्यवस्था को सहर्ष अपनाया।लेकिन जन्मगत जाति व्यवस्था में भी ऊँचनीच छोटे बड़े का कोई स्थान न था क्योंकि सामाजिक ताने बाने में हर व्यक्ति(जाति) उतना ही महत्वपूर्ण था और किसी के बिना किसीका काम नहीं चल सकता था।

अब जहाँ तक बात रही द्रोणाचार्य और एकलव्य के प्रसंग की,,तो पहले तो द्रोणाचार्य प्रतिज्ञाबद्ध थे केवल कुरुकुल के ही बच्चों को शिक्षा देने के लिए, इसलिए वे किसी और को शिक्षा नहीं दे सकते थे।
दूसरे, उस समय गुरुओं का दायित्व बहुत बड़ा होता था। किसी भी कुपात्र(जो उस शिक्षा का सार्थक सात्विक उपयोग न करे) को वे शिक्षा नहीं देते थे। यदि किसी ने उनकी शिक्षा का दुरुपयोग किया तो इसकी जिम्मेदारी स्वयं लेते गुरु स्वयं को दारुण दण्ड देते थे।
द्रोणाचार्य इसके जीते जागते प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि जब उनके शिष्यों(कौरवों) ने उनकी शिक्षा का उपयोग विध्वंसक गतिविधियों में किया तो उन्होंने धर्म के पक्ष में खड़े अपने प्रिय शिष्य अर्जुन के हाथों अपनी मृत्यु को स्वीकारा।इससे बड़ा दण्ड स्वयं को गुरु और क्या दे सकता है कि अपने ही शिष्य के हाथों अपना वध करवाये।

एकलव्य कुशाग्रबुद्धि था,अपार क्षमतावान था, किन्तु गुरु को यह अंदेशा था कि उसकी क्षमता का उपयोग कोई भी विध्वंसक कर सकता है। इसलिए उन्होंने गुरुदक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँगा। दाहिने हाथ का यह अँगूठा फिजिकली काट कर नहीं माँगा या एकलव्य ने दिया,, बल्कि उस अँगूठे के प्रयोग की वर्जना का व्रत/शपथ द्रोणाचार्य ने एकलव्य से लिवाया। कथा बच्चों को सरलता से समझ में आ जाय इसलिए कहीं कहीं चित्र वैसा बना दिया जाता है जिसमें चित्रित होता है कि एकलव्य अपना अँगूठा काट कर गुरु को भेंट कर रहे,,या फिर कथा में इस तरह से वर्णन आता है।एकलव्य के इस महान गुरुदक्षिणा के बदले गुरु ने भी एकलव्य को ऐसी अमोघ शक्ति/वरदान दिया कि एकलव्य अपनी जाति में ही नहीं,सँसार भर में सदा के लिए पूजित सम्माननीय और आदर्श व्यक्ति हुआ।आज भी यदि किसी शिष्य की बात होती है तो एकलव्य को सर्वश्रेष्ठ शिष्य की पदवी प्राप्त होती है जो गुरु के वरदान और शिष्य के उत्तम चरित्र के कारण ही सम्भव हुआ। 

हम जब बच्चों को शिक्षा दे रहे होते हैं तो केवल शब्द या वाक्य ज्ञान नहीं करा रहे होते,बल्कि उनका चरित्र गढ़ रहे होते हैं। ऐसे में हमारा नैतिक दायित्व होता है कि बहुत सोच समझ कर विषय तथा प्रसंगों को उनके सम्मुख रखें। इस क्रम में यदि कुछ नेगेटिव बातों के नैरेटिव हमें बदलने भी पड़ें, तो कोई दिक्कत नहीं। 16-17 के बाद बच्चों में ज्यों ज्यों परिपक्वता आती जाय, चीजें उनके सामने ज्यों की त्यों रखी जाँय, तो कोई दिक्कत नहीं।
वस्तुतः बचपन में नींव में रखी गयी सकारात्मकता की शक्ति ही वयस्क होने पर संसार की नकारात्मकता को झेलने में काम आती है।सात्विक बातों से ही सच्चरित्रता निर्मित होती है और दृढ़ चरित्र के सहारे ही व्यक्ति जीवन में सात्विक सुख और सन्तोष तक पहुँच सकता है। 

25.12.17

मेरी क्रिसमस

"मेरी क्रिसमस"

प्रिय ईसाई भाई बंधुओं, आपको आपके परम् पूज्य यीशु मसीह जी के जन्मदिन पर सपरिवार बहुत बहुत बधाइयाँ और मंगलकामनाएँ।खूब हर्ष उत्साह से मनाएँ यह पुण्य पर्व।

लेकिन आपको पता है, जितने उल्लास और श्रद्धा से आप यह पर्व मनाते हैं,उससे अधिक उत्साह से हम सेकुलर हिन्दू यह सेलिब्रेट करते हैं। जन्माष्टमी,रामनवमी,हनुमान जयंती, शिवरात्रि आदि आदि पर्वों पर आप अपने सहधर्मानुयायियों को कभी यह हैप्पी हैप्पी विशिंग देते हैं? नहीं न? लेकिन हम हिन्दू 4 दिन पहले से ही एक दूसरे को विशिंग आदान प्रदान के साथ साथ यह सेलेब्रेशन शुरू कर देते हैं।
तुलसी पीपल में दिये जलाने वालों पर हँसने, मखौल उड़ाने वाले हम, अपने घरों में प्लास्टिक की क्रिसमस ट्री सजा सुख समृद्धि के लिए उसके सामने दण्डवत हो जाते हैं।हमारा मानना है कि आपने कह दिया है तो वह सन्देह से परे है, लाल कोट सफेद दाढ़ी वाले संता अंधविश्वास नहीं,,वे होते ही हैं जो बच्चों के लिए गिफ्ट लेकर आते हैं।

एक ओर जहाँ गाँव देहात या शहरी बस्तियों वाले साधनहीन लोग आज के दिन पिकनिक मनाने अवश्य ही जाते हैं,क्योंकि इस दिन के पिकनिक का पुण्यलाभ मकर संक्रान्ति पर शुभमुहूर्त में गंगा स्नान से भी अधिक पुण्यफलदायी माना जाता है। वहीं दूसरी ओर पढ़े लिखे साधनसम्पन्न हम बुद्धिजीवी सेकुलर हिन्दू आज के दिन धूम धड़ाके वाला क्रिसमस पार्टी मनाते हैं।
अतिसंक्षिप्त लाल कपड़ों में आज की कँपकँपाती ठण्डी को हम वीरांगनाएँ हँसते मुस्कुराते रेड वाइन के साथ आत्मसात कर जाती हैं।असल में हमनें दुर्योधन की दुर्दशा देखी थी, कि उसने माता गान्धारी के कहे की अवहेलना कर पूर्ण वस्त्रहीन अवस्था में उनके सम्मुख उपस्थित नहीं हुआ और केले के पत्ते से ढँका उसके शरीर का वह हिस्सा कमजोर दुर्बल रह गया था और कालान्तर में उसी दुर्बल हिस्से पर आघात लगने से वह मृत्यु को प्राप्त हुआ था।उसी से शिक्षा लेते हम हॉट बेब्स शरीर को वज्रता प्रदान करने के उद्देश्य से शीत वायु को अधिकाधिक मात्रा में अपने शरीर का एक्सपोजर देती हैं।

असल में क्या है न किसी जमाने में "माँ,माटी,मानुष" (मातृभाषा, संस्कृति और परिवार समाज) के विश्वास आस्था से आम हिन्दू जरूरत से ज्यादा ही आवृत्त रहता था,,अपने ही व्रत उपवास त्योहारों को महान मानता था और फलस्वरूप पिछड़ता ही चला गया (हालाँकि अब एक राजनीतिक दल ने इसे अपना चुनाव चिन्ह बना लिया है और सफलता के नित नए झण्डे गाड़ रही)।
इतना पिछड़ा इतना पिछड़ा कि दुनियाँ के दयालु परोपकारी कई अन्य देशों और धर्मावलंबियों को भारत पर शासन करने आना पड़ा ताकि वे यहाँ के लोगों को उनके अन्धकूप से बाहर निकाल उन्हें प्रगतिशील बना सकें।
पहले महान पराक्रमी दयालु मुस्लिम राजवंश और फिर आँग्ल राजवंश, सैकड़ों वर्षों तक प्राणपण से भिड़े रहे, फूहड़ गंवार भारतीयों को प्रगतिशील बनाने में।लेकिन वे हार गए।
तब जाकर देश का सौभाग्य जगा और भारत भूमि से महान चचा उगे। उन्होंने बीड़ा उठाया कि देश को कूपमंडुकता मुक्त कर के ही धरती से उठेंगे। दूरद्रष्टा युगप्रवर्तक परमपूज्य चचाजी ने देश पर "सेकुलरिता" रूपी वह जादू की छड़ी घुमाई कि सदियों से सुप्त पड़ी हिन्दुओं की चेतना फुरफुराकर जग गयी और उसे समझ में आया कि अपनी पुरातन अधोगामी संस्कृति को त्याग कर अँग्रेजी भाषा,पर्व त्योहार,खान पान पूर्ण रूप से अपनाकर ही प्रगतिहीनता के अभिशाप से मुक्ति पाया जा सकता है, एडवांश बना जा सकता है।
सो हम सेकुलर हिन्दू पूरे प्राणपण से उस सेकुलरी छड़ी को थामे आपके बराबर उड़ने में लगे हुए हैं।

अब आप साधिकार नहीं कह सकते "मेरी क्रिसमस", क्योंकि यह केवल आपकी ही नहीं "मेरी भी" उतनी ही है - "मेरी क्रिसमस" !!!

28.8.17

आरक्षण

बड़े आराम से यह कहा जा सकता है कि लालू मुलायम मायावती से लेकर जातिवादी राजनीति करते अपनी व्यक्तिगत दुकान चलाने वाले आरक्षण पैरोकारों से लेकर नवोदित "हार्दिक पटेल" जैसे लोगों तक की रैलियों में जो विशाल भीड़ उमड़ती है,वह भाड़े की होती है...
लेकिन मुझे लगता है यह सत्य से मुँह मोड़ना होगा।
देशतोड़कों द्वारा लाख पैसे फूँके जाएँ, मिडिया कवरेज दे,,फिर भी उस हुजूम में सारे सेट किये ही लोग होते हैं,यह नहीं कह सकते हम।जेनुइन लोग होते हैं इसमें यह मानना होगा..और जब हम यह मानेंगे,तभी उन मूल कारणों तक भी पहुँच पाएँगे और समाधान की दिशा में बढ़ पाएँगे।

स्कूल कॉलेज में बच्चों का एडमिशन करवाना हो,रेलवे टिकट कटवाना हो,मंदिर में भगवान का दर्शन करना हो या जीवन के किसी भी क्षेत्र में,जहाँ भारी भीड़ हो और अवसर कम हो,यह निश्चितता न हो कि अवसर मिलेगा हमें, क्यू में स्वेच्छा और निश्चिंतता से खड़ा होना चाहते हैं क्या हम?कभी भी,कहीं भी, सही गलत कुछ भी करते, अगर शार्ट कट मिल रहा हो,हममें से कितने हैं ज अपना लोग संवरण कर पाते हैं?121 करोड़ की आबादी में 8-10 हजार लोग बमुश्किल निकल पाएँगे जो अगर उसके अगल बगल के सभी लोग सुविधा/ सिस्टम का बेजा इस्तेमाल भी कर रहे हों तो अपना ईमान पकड़ कर रखते हैं और मुफ़्त मिल रही अन्हक सुविधा को भीख और आत्मसम्मान पर ठेस समझते हैं?

तो कुल मिलाकर बात यह हुई कि पिछले दशकों में सत्तासीनों ने देश का जो चारित्रिक संस्कारण किया है,मुफ्तखोरत्व,निकम्मेपन और बेशर्मी को उस स्तर पर पहुँचा दिया है जिससे कुछ वर्षों में समझा बुझा कर तो नहीं हटाया जा सकता,,तो इसके लिए सुप्रीम कोर्ट को ही आगे बढ़ स्वतः संज्ञान लेते एक बड़ा वाला झाड़ू चलाते सारे ही आरक्षणों को इस आधार पर रद्द करे कि -
*इससे समूहों के बीच वैमनस्यता फैलती है
*प्रतिभावान का हक़ मारा जाता है और अयोग्य लोग अंततः देश की प्रगति में बाधक होते हैं
* कुछ ही परिवारों के पुश्त दर पुश्त आरक्षण मलाई का भक्षण करते फूलते फलते हैं और जो पिछड़े हैं,पिछड़ते ही चले जाते हैं।
अतः यह प्रत्येक दृष्टि से देश की एकता अखंडता,प्रत्येक नागरिकों के लिए सामान अधिकार के समदृष्टिमूलक मूल सिद्धांत के विरुद्ध और प्रगति का बाधक है..और इसका अंत आवश्यक है।
इसके स्थान पर बिना किसी भेदभाव के देश के बड़े छोटे अमीर गरीब सभी नागरिकों के लिए शिक्षा की एक व्यवस्था(सरकारी स्कूलों में सभी सरकारी मुलाजिमों को अपने बच्चों को पढ़वाने की जैसी व्यवस्था अभी इलाहाबाद हाई कोर्ट ने की)हो,प्रतिभा/योग्यता ही एकमात्र आधार आगे बढ़ने का हो।आर्थिक रूप से वंचित वर्ग की उन कठिनाइयों को दूर किया जाय जो उन्हें भोजन संधान में लिप्त रखते शिक्षा से दूर रखते हैं।

14.7.17

जागो ग्राहक जागो


साधु", शब्द सुनते ही हमारे मानस पटल पर औचक जो चित्र उभरता है,वह कटोरा लिए दरवाजे पर खड़े गेरुआधारी भिखारी का या फिर आँखें मूँदे बैठे माला जपते व्यक्ति का होता है।
वैसे तो कुछ 'तथाकथित' लघु गुरु साधुओं के कु-कृत्यों ने और बाकी बची कसर सेकुलर बुद्धिजीवियों के दुष्प्रचारों ने पूरी करते पिछले दशकों में साधुओं की वह छवि बना डाली है, कि इनके झोले में डालने को जनसाधारण के पास संशय घृणा और तिरस्कार रूपी भाव भिक्षा के अतिरिक्त शायद ही कुछ अच्छा बचा है।

ऐसे में किसी गेरुआधारी बाबा को घी तेल सौंदर्य प्रसाधनों से लेकर दैनिक उपयोग की अन्यान्य वस्तुओं के उत्पादक/विक्रेता रूप में कोई कैसे बर्दाश्त कर ले? सो, अपने देश में एक बड़ी संख्या उन लोगों की है,जो पतञ्जलि के प्रॉडक्ट्स केवल इसलिए नहीं खरीदते या बाबाजी से घृणा इसलिए करते हैं कि एक गेरुआधारी साधु भीख माँगना और धूनी रमाना छोड़ सामान क्यों बेच रहा, वह ऐसा कैसे कर सकता है? 
निष्कर्ष - वह ढोंगी है!!!

मेड इन चाइना,जापान,अमेरिका,रशिया,, और तो और पाकिस्तान भी,,के उत्पाद आप सहर्ष खरीदेंगे,पर बाबा वाला नहीं, क्योंकि -
" बाबा गन्दे होते हैं, या फिर बाबा ऐसे नहीं होते हैं"(बचपन से दिमाग में बैठायी गयी बात)।इससे क्या कि सतयुग त्रेता आदि में कोई भी वैज्ञानिक/अविष्कारक गेरुआधारी तपस्वी "साधक/साधु" ही होता था, अस्त्र निर्माण से लेकर इतिहास भूगोल ज्योतिष साहित्य भवन निर्माण विशेषज्ञ और कामयोग तक के सिद्धांतों के प्रतिपादक और इनसे सम्बद्ध उत्पादों के उत्पादन भी इन्हीं की देखरेख में होते थे।
इनके सम्मुख राजसत्ता नतमस्तक रहती थी,जनसाधारण की तो बात ही क्या।
पर सही है, यह वह काल नहीं,,,कल-युग है।जिसमें हम प्रोग्रेसिव हैं और हमारी प्रोग्रेसिवनेस तथा सेकुलरिज्म हमें साधुओं को सम्मान देने से ख़ारिज होती है।

अरे भैया, आप एक उपभोक्ता हैं।आपका प्रथम कर्तब्य अपनी जेब को और फिर उत्पाद की गुणवत्ता को देखना तौलना है। हाँ, कोई दूसरा देश जो भारत को हानि पहुँचा रहा हो,राष्ट्रसेवा के तहत उस देश के वस्तुओं का बहिष्कार कर सकते हैं, जैसे कभी भारत भर में मैनचेस्टर के कपड़ों की होली जला कर की गई थी या अभी हाल ही में लोगों ने अमेज़न की बैंड बजायी थी।

बाबा बोली से हल्के हैं,व्यक्तित्व में भी वह बात नहीं कि स्मरण ही नतमस्तक कर दे,,यह मेरी भी व्यक्तिगत राय है।लेकिन यह तो आपको मानना ही पड़ेगा कि स्वदेशी आंदोलन या योग के प्रचार प्रसार में,इनके प्रति जनस्वीकार्यता बढ़ाने में, बाबा ने जो भूमिका निभायी है, वह अपने आप में अभूतपूर्व है।वरना तो ये दोनों ही सदियों से भारत में रहे हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन में तो लड़ाई का एक प्रमुख हथियार ही स्वदेशी आन्दोलन रहा था। लेकिन उसके बाद से तो लगातार लोगों का वह ब्रेनवाश हुआ कि अंग्रेज,अँग्रेजी और उनके सामान ही श्रेष्ठ और विश्वसनीय होते हैं,यह स्थापित हो गया। चाहे वे अपने कुत्तों वाला साबुन आपके स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम बताते आपको पकड़ा दें या अपने देश का भूसा भूसी हेल्थ ड्रिंक कहते आपको पिला दें या फिर टॉयलेट क्लीनर को शॉफ्ट कोल्ड ड्रिंक कहते उसको आपका प्रिय पेय बना दें, आप पूरी श्रद्धा विश्वास से उसे ग्रहण कर लेंगे।

विकसित देश की श्रेणी में आने को अकुलाए हे भारतवासियों,,कृपया पूर्वाग्रहों से मुक्त होइए।
"जागो,ग्राहक जागो" 
...

10.12.16

गीता

प्रचलन में कर्मकाण्ड को ही धर्म मानने कहने की परंपरा है,पर इससे बड़ा दिगभ्रमण और कुछ नहीं।
पूजा पाठ,जप तप,दान पुण्य,तीर्थयात्राएँ आदि आदि सात्विकता से जोड़ने वाले साधन अवश्य हैं,पर यही धर्म नहीं।

मन मस्तिष्क और व्यवहार में धारणीय वे सद्विचार व्यवहार और नियम, जो व्यक्ति परिवार समाज और प्रकृति सहित सम्पूर्ण संसार में सुख का संचार कर सके,वह धर्म है.. एक शब्द में इसी को "मानवता" कहते हैं. और इसी मानवता को,करणीय अकरणीय के भेद को सुपष्ट करती है "गीता"..
गीता "धर्मग्रन्थ" नहीं अपितु यह एक महान "कर्मग्रन्थ " है।अपने आत्मस्वरूप को पहचाने बिना मनुष्य न तो अपने धर्म को पहचान सकता है ,न अपने सामर्थ्य को और न ही सार्थकता से कर्म प्रतिपादित कर सकता है।  
दुर्भाग्य यह कि इसको हिंदुत्व से जोड़,सेकुलरिता के विरुद्ध ठहराते,इसके विरोध में उतरे छुद्र लोगों के लिए हम यह कामना भी नहीं कर सकते कि इस बात को समझ पाने का उनमें सामर्थ्य आये। क्योंकि इतिहास साक्षी है कि महाज्ञानी कृष्ण को अपने बीच सहज उपलब्ध पाते भी धर्महीन अहंकारी कौरवों ने कृष्ण को नहीं अपितु युद्ध हेतु कृष्ण की चतुरंगिणी सेना को ही चुना था.पर विवेकवान धर्ममर्मज्ञ सदाचारी पाण्डवों ने जीवन के लिए धर्म की उपयोगिता महत्ता जानते निहत्थे योगीराज कृष्ण को।

हमने कबीर को सराहा, रहीम को सराहा, नानक ईसा और मुहम्मद को भी सराहा। आज भी दरगाहों पर मत्था नवाने,सूफी संगीत पर आँसूं बहाते झूमने चल निकलते हैं हम,,,यह रामायण और गीता का ही बल और सम्बल है,जिसने हमारे हृदय को गुणग्राहकता दी,चैतन्यता और विराटता दी, हर अच्छी चीज को ग्रहण करने की सहज स्वाभाविक प्रवृत्ति दी।
 
कर्मग्रंथ गीता,मानवमात्र के लिए मोक्षदायक(सही गलत में भेद कर,सही को साध पाने की क्षमता ही मोक्ष है)है। यदि सृष्टि को अभी आगे बहुत लम्बे सुचारू चलना होगा तो,उसके भाग्य में गीता आएगी। सेकुलर भारत यदि इसे अस्वीकारता भी है,तो विश्व के अन्य भूभागों पर इसे स्थान और महत्त्व मिलेगा,इसमें मुझे कोई शंसय नहीं।

22.2.16

बेशर्म आन्दोलन



हताश निराश आक्रोशित स्वर में वो कराह से उठे,बोले - देखो न,आरक्षण आंदोलन के नाम पर निकले हैं ये और दुकान मॉल लूट रहे हैं।
तो भैये,,ये क्यों नहीं समझते कि तथाकथित यह "आरक्षण" भी तो "लूट" ही है।जाति के नाम पर अवसर की लूट।प्रतिभा ले कर लोग बैठे रहें और जाति लेकर आप उनका हक़ लूट ले जाओ।


अंग्रेज लाट जब अपने होनहार नौनिहालों को अपने राज का केयरटेकर बना अपने मुलुक को निकल रहे थे,,, चचाजान ने पूछा - मालिक मी लॉर्ड, पिलीज से वो सूत्र तो देते जाओ,जिससे हमारी ही पुश्तें इस कुर्सी की अधिकारिणी रहे अनंत काल तक जबतक कि भारत का भ भर भी बचा रहे।
तो मी लार्ड मुस्कियाए औ प्यार से गाल पर पुचकारते रंगीले चचा को कहिन - धू बुड़बक,देखे नहीं,अभिये न तुमको एग्जाम्पल देखाया है रे। धरम कार्ड खेलते एक शॉट में देश तोड़ दिया और तुमको तश्तरी में सजाके कुर्सी धरायी है,,तो तुम भी बस यही फार्मूला धरे रहो।
पंडीजी बोले- लेकिन माई बाप,अभिये न धरम पर भाग किये,फिरसे वही करेंगे तो फोड़ नहीं डालेगें हमको सब मिल के।
तो ऊ कहिन, फिन से- धू बुड़बक,,धरम कार्ड नहीं है तो क्या हुआ,जात कार्ड है न,,खेलो बिंदास खेलो।ऊप्पर उप्पर से कहो,हम दबे कुचलों को मुख्यधारा में लाना चाहते हैं,देश से जाति व्यवस्था को समूल मिटाना चाहते हैं,लोग साधु साधु कह उठेंगे।
और जाति के साथ रिजर्भेसन अटैच कर दो।ससुर,सताब्दियाँ बीत जाएँगी,चिंदी चिंदी टुकड़े टुकड़े में बँट जायेगी भीड़ और फिर ऐश से शासन करियो।


सवा सौ करोड़ का देश,जिसमें कोई जाति ऐसी नहीं जिसकी सदस्य संख्या लाख से कम हो...और आंदोलन के लिए चाहिए क्या,कुछ हजार जांबाज़.. जो रेल सड़क रोकने,गाड़ियाँ जलाने, दुकान मकान लूटने में एक्सपर्ट हों,,फिर हो गया आंदोलन।लीजिये,जाट आरक्षण,पटेल आरक्षण,अलाना आरक्षण,फलाना आरक्षण।


जिनकी राजनीतिक दुकान ही आरक्षण की रोटी सेंक चलती है,वे आपके साथ होंगे और बाकी जो अपनी दूकान साफ़ फ्रेश माल से चलाना चाहते भी हैं,वे भी रिस्क नहीं लेना चाहेंगे,सो झक मारकर देंगे ही आरक्षण।

और बुद्धिजीवी(मिडिया,पत्रकार)? उनकी भी पार्टी लाइन है भाई।वे क्यों और कैसे कहें आपको -"भाइयों सावधान,ये राजनीतिक दल आपको आपस में ही लड़वा रहे हैं,,भाइयों ये आपको रीढ़विहीन बनाना चाहते हैं,,भाइयों उठो और नकार दो इन सबको यह कहते कि हम अपने पुरुषार्थ से लेंगे अपना हक़, भारत में हम सिर्फ भारतीय हैं,हमारी जाति भारतीयता है,हम में से जो साधनहीन हैं उन्हें बस साधन दो,अच्छे स्कूल,कॉलेज,शिक्षक,,इन तक पहुँचने के लिए सड़क,पाठ्य सामग्री,कदाचार रहित परीक्षाएँ.. बस,बाकी हम कर लेंगे।"

पर अफ़सोस,अफ़सोस,अफ़सोस...ऐसा कोई नहीं कहेगा,ऐसे कोई नहीं सोचेगा...क्योंकि एक मुख्य चीज "स्वाभिमान और कर्तब्यबोध" मर चुका है हमारा।मुफ्तखोरत्व नैतिक चरित्र बन चुका है हमारा।

अरे हम तो उस देश के वासी हैं,जहाँ नदियाँ नाले,बनादी हैं।