23.6.15

चैतन्य वह अचेतन संसार........

सम्पूर्ण भौतिक संसार (यूनिवर्स) भौतिकी के नियम से बंधा हुआ है।यहाँ कोई भी कण एक दुसरे से स्वतंत्र नहीं।कोई भी क्रिया प्रतिक्रिया विहीन नहीं,कोई भी सूचना परिघटना और मनः स्थितियाँ गुप्त नहीं, सबकुछ प्रकट, संरक्षित,अनंत काल तक अक्षय और सर्वसुलभ(जो भी इसे जानना पाना चाहे उसके लिए सुलभ) रहता है, इसी व्योम में, ऊर्जा कणों(इलेक्ट्रॉनिक पार्टिकल) में रूपांतरित होकर।

जैसे प्रसारण केन्द्रों द्वारा निर्गत/प्रसारित दृश्य श्रव्य तरङ्ग वातावरण में सर्वत्र व्याप्त रहते हैं और जब कोई रिसीवर उन फ्रीक्वेंसियों से जुड़ता है, तो वे तरंग रेडियो टीवी इंटरनेट द्वारा हमारे सम्मुख प्रकट उपस्थित हो जाते हैं,ठीक ऐसे ही मस्तिष्क/चेतना रूपी रिसीवर भी काम करता है। यदि हम चाहें तो अपने मस्तिष्क को चैतन्य और जागृत कर व्योम में संरक्षित भूत भविष्य के परिघटनाओं तथा ज्ञान को भी पूरी स्पष्टता से सफलता पूर्वक प्राप्त कर सकते हैं, जो चाहे हजारों लाखों साल पहले क्यों न घट चुके हों या घटने वाले हों.ठीक वैसे ही जैसे युद्ध भूमि से सुदूर बैठे संजय ने अपनी चेतना को दूर भेज वहाँ का पूरा लेखा जोखा धृतराष्ट्र तक पहुँचा दिया था..ठीक ऐसे ही जैसे कई विद्वान लेखकों कवियों को पढ़ हम आश्चर्यचकित हो जाते हैं कि,वर्षों सदियों पहले घटित या भविष्य में सम्भावित इन परिस्थितियों परिघटनाओं को इतनी सटीकता और सुस्पष्टता से इन्होनें कैसे देख जान वर्णित कर दिया। देखा जाए तो यह विशिष्ठ सामर्थ्य केवल उनमें ही नहीं, बल्कि हम सबमें है,यह अलग बात कि उन असीमित आलौकिक शक्तियों को हम साधते नहीं हैं और हममें निहित रहते भी निष्क्रिय रह वे शक्तियाँ हमारे शरीर के साथ ही नष्ट हो जाती हैं। 

यह अनुभव तो सबका ही रहा है कि अपने प्रियजनों, जिनसे हम मानसिक रूप से गहरे जुड़े होते हैं,उनके सुख दुःख संकट का आभास कोसों दूर रहते भी कितनी स्पष्टता से हमें हो जाता है।बस दिक्कत है कि अपनी उस शक्ति पर विश्वास और उसका विकाश हम नहीं करते, कई बार तो उसे शक्ति ही नहीं मानते,बस स्थूल पंचेन्द्रिय प्रमाणों पर ही अपने विश्वास का खम्भा टिकाये रखते हैं।

ऐंद्रिक शक्तियों की सीमा अत्यंत सीमित है,जबकि चेतना की शक्ति अपार विकसित।किसी को देखा सुना न हो,उसके विषय में कुछ भी ज्ञात न हो,फिर भी उसका नाम सुनते ही उसके प्रति श्रद्धा प्रेम वात्सल्य या घृणा जैसे भाव मन में क्यों उत्पन्न होते हैं?
वस्तुतः यह इसी चेतना के कारण होता है.चेतना उसके व्यक्तित्व/प्रभाक्षेत्र/ऑरा को पकड़ मस्तिष्क को सूचना दे देती है,कि अमुक ऐसा है,पर अधिकांशतः उसकी न सुन हम स्थूल प्रमाणों की खोज करने लगते हैं। हाँ, यह बात अलग है कि यदि मन कलुषित हो, उसमें उक्त के प्रति पूर्वनिश्चित पूर्वाग्रह हो, तो चेतना की यह अनुभूति क्षमता भी कुन्द रहती है.जैसे गड़बड़ाया हुआ एन्टीना ठीक से सिग्नल नहीं पकड़ पाता।मन मस्तिष्क को निर्दोष निष्कलुष और सकारात्मक रख ही अपनी प्रज्ञा को जागृत और सशक्त रखा जा सकता है। 

आज शब्दों पर हमने अपनी निर्भरता आवशयकता से अधिक बढ़ा ली है।मन में द्वेष पाला व्यक्ति भी यदि मीठी बोली बोलता है तो चेतना द्वारा दिए जा रहे सूचना कि सामने वाला छल कर रहा है,को हम अनसुना कर देते हैं। स्थूल प्रमाणों (आँखों देखी, कानों सुनी) पर अपनी आश्रयता अधिक बढ़ाने के कारण शूक्ष्म अनुभूति क्षमता अविकसित रह जाती है और उसपर कभी यदि चेतना की सुनने की चाही और वह सही सिद्ध न हुआ तो उससे विद्रोह छेड़ उसे और भी कमजोर करने में लग जाते हैं। 

एक वृहत विज्ञान है यह,जिसे "ऑरा साइन्स" कहते हैं।जैसे भगवान् के फोटो में उनके मुखमण्डल के चारों ओर एक प्रकाश वृत रेखांकित किया जाता है,वैसा ही प्रभा क्षेत्र प्रत्येक मनुष्य के चारों और उसे आवृत्त किये होता है।यह प्रभाक्षेत्र निर्मित होता है व्यक्ति विशेष के शारीरिक मानसिक अवस्था,उसकी वृत्ति प्रवृत्ति,सोच समझ चिंतन स्वभाव संवेदना संवेग स्वभावगत सकारात्मकता नकारात्मकता की मात्रा द्वारा। जिसका प्रभाव जितना अधिक उसी अनुसार निर्मित होता है उसका प्रभामण्डल भी। डाकू रहते अंगुलिमाल का जो प्रभामण्डल रहा, सत्पथ पर आते ही कर्म और वृत्तिनुसार उसके प्रभामण्डल में भी वैसा ही परिवर्तन हुआ.डाकू अंगुलिमाल का प्रभामण्डल भयोत्पादी था, जबकि साधक का स्मरण सुख शान्तिकारी हो गया। 

वैसे अपने कर्म आचरण से जो जितना सकारात्मक होता है, उसका प्रभामण्डल भी उतना ही बली प्रभावशाली होता है। प्रत्यक्ष और निकट से ही नहीं,हजारों लाखों कोस दूर भी बैठे भी संवेदनात्मक रूप से स्मरण करते कोई भी किसी से जो सम्बद्ध (कनेक्ट) होता है, वस्तुतः दोनों के प्रभा क्षेत्र का प्रभाव होता है यह। आजकल तो इस विद्या का उपयोग विश्व भर में "डिस्टेंस रेकी", "ऑरा हीलिंग" नाम से शारीरिक मानसिक उपचार हेतु किया जा रहा है और इसके सकारात्मक प्रभावों परिणामों (सक्सेस रेट) को देखते इसपर आस्था और इसकी प्रमाणिकता भी दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। 

हमने अनुभव किया तो है कि, किसी साधु संत पीर पैग़म्बर देवी देवता भगवान्,चाहे वे हमारे बीच हों या न हों,किसी संकट में जब हम उनका स्मरण करते है,कष्ट हरने की उनसे याचना करते हैं,तो एक अभूतपूर्व शान्ति ऊर्जा और निश्चिंतता का अनुभव करने लगते हैं।असल में यह मन का भ्रम नहीं,बल्कि वास्तव में घटित होने वाला सत्य/प्रभाव है।ठीक रेडियो टीवी की तरह जैसे ही हम उस ऊर्जा स्रोत से जुड़ते हैं,ऊर्जा रिसीव कर ऊर्जान्वित हो उठते हैं।

सात्विक खान पान,रहन सहन,स्वाध्याय और सतसाधना द्वारा हम अपने अंतस की इस आलौकिक ऊर्जा को जगा सचमुच ही उस अवस्था को पा सकते हैं,जैसा पुराणों में वर्णित आख्यानों में ऋषि मुनि संत साधकों अवतारों को पाते सुना है। मिथ नहीं सत्य है यह।

..........

23.3.15

मन्त्र शक्ति

चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मनुष्य योनि इसलिए है क्योंकि इसी योनि में प्राणी अपने सामर्थ्य का सर्वाधिक और सर्वोत्तम उपयोग कर सकता है।इतिहास साक्षी है इसका कि साधारण देह धारियों ने अपनी बुद्धि से कितने और कैसे कैसे असाधारण कृत्य कर डालें हैं।
लेकिन सत्य यह भी है कि बहुसंख्यक लोग ऐसे ही हैं, जो पूरे जीवन में प्रकृति प्रदत्त क्षमताओं का साधारण और सामान्य उपयोग भी नहीं कर पाते। और शरीर के साथ ही उनकी क्षमताएँ भी माटी में मिल जाती है।
सही गलत का ज्ञान रखते हुए भी गलत करते,दुर्व्यसनों में फंसे अधिकांश लोग यह कहते मिल जाएँगे कि क्या करें मोह है कि छूटता नहीं,मन है कि मानता नहीं..
असल में हारे हुए ये वही लोग हैं जिनमें दृढ निश्चय नहीं,जिन्होंने कभी धिक्कारते या दुत्कारते स्वयं को गलत से बरजा नहीं है,अपने आत्मबल को बढ़ाने के यत्न नहीं किये हैं।
तो ऐसे में यदि हम चाहें तो अपने आत्मबल को जागृत और सम्पुष्ट करने हेतु सिद्ध मन्त्रों का सहारा ले सकते हैं।
मन्त्र जाप(मानसिक या सश्वर) वस्तुतः हमारे मन मस्तिष्क में तंत्रियों को झंकृत करते उनमें वह प्रवाह उत्पन्न करता है जो नकारात्मक भावों/शक्तियों से उबरने में हमारी मदद करता है।फलस्वरूप जहाँ हममें सही गलत में भेद करने की क्षमता बढ़ती है,वहीँ नकारात्मकता से उबरते अपनी क्षमताओं के सार्थक सदुपयोग में भी हम समर्थ होते हैं।उदहारण के लिए हम यह देख सकते हैं कि यदि धमनियों कहीं ब्लॉकेज हो जाए या मस्तिष्क तंत्रिकाओं में कहीं कोई अवरोध आ जाए तो हृदय(हार्ट) तथा मस्तिष्क व्यवस्थित रूप से काम करना बंद कर देते हैं,परन्तु इन अवरोधों/ब्लॉकेज को यदि चिकित्सा द्वारा हटा दिया जाता है तो निरोगी स्वस्थ अंग पुनः अच्छे ढंग से काम करने लगते हैं.   
तो चलिए हम जपें -
"ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चै"
जिसका अर्थ है - "हे चित्स्वरूपिणी महासरस्वती,हे सद्रूपिणी महालक्ष्मी,हे आनंदरूपिणी महाकाली,,ब्रह्मविद्या (आत्मज्ञान) पानेके लिए हम सब समय तुम्हारा ध्यान करते हैं.हे महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती-स्वरूपिणी चण्डिके तुम्हें नमस्कार है।अविद्यारूपी रज्जुकी दृढ़ ग्रंथि को खोलकर मुझे मुक्त करो।"
इस छोटे से मन्त्र से सत् रज और तम् तीनों शक्तियाँ सधती हैं।इन तीनों का उत्तम संतुलन ही जीवन को उर्ध्वगामी बनाता है।
अपने अंतः में अवस्थित दुर्गुणों रूपी दानवों तथा जीवन में भाग्य एवं कर्मवश मिलने वाले दुर्दिनों का सामना हम अपने आत्मबल द्वारा ही तो कर सकते हैं न,सो इसे जगाये और बनाये रखना तो जरुरी है।

9.2.15

एकाकीपन


सन्नाटों  का कोलाहल,
नित चित को कर देता चंचल।
एकांत है चिंतन का साथी,
भावों के पाँख उगा जाती ।
शशि की शीतल कोमल किरणें
उर डूब उजास पाता जिसमें।
उस पल में कविता है किलके,
रस शब्द ओढ़ चल बह निकले।
माना आँखों से सब दीखता,
दृग मूंदे ही पर जग दीखता।
नीरवता के कुछ पल खोजो,
दुनियाँ के संग संग मन बूझो।
अन्तरचिंतन बिन सृजन कहाँ,
गहरे उतरो मिले मोती वहाँ। 

22.7.14

लेट्स सेलिब्रेट "डेज"



होली दिवाली शिवरात्रि जन्माष्टमी क्रिसमस गांधी जयन्ती से लेकर ईद बकरीद रमज़ान इफ्तार तक और मदर फादर इन्वायरमेंट वेलेण्टाइन डे से लेकर टमाटर और गे डे तक के दुनियाँ भर के सारे के सारे स्पेशल डे,"मना" डालने में हम भारतीय घनघोर विश्वास करते हैं। स्वभाव से ही उत्सव उत्साह प्रिय हम, मौका मिला नहीं कि कुछ न कुछ "मनाने" तुरत फुरत निकल पड़ते हैं। कभी किसी सीजन अपने यहाँ डेज की कमी बेसी हो गयी तो या तो  अपने देश  का या किसी भी दूसरे देश का मारपीट/खून ख़राबा डे भी उतने ही उत्साह से मना डालते हैं।

अब जैसे कल 21 जुलाई की ही बात ले लीजिये। पूरे शहर का चक्का जाम कर बीच सड़क लाखों लोगों संग यहाँ भी एक डे मना डाला गया। सुना पिछले इक्कीस वर्षों से "शहीद दिवस" के नाम पर यह चक्का जाम दिवस बड़े ही हर्षोल्लासपूर्वक भव्य रूप से मनाया जाता है। 21 वर्ष पहले,जब काँग्रेस तीन मूल वाला नहीं, सिंगल मूल वाला हुआ करता था और हमारी दीदीजी उसकी उभरती हुई नेत्री हुआ करतीं थीं, सत्ता धारी ने राइटर्स मार्च के दौरान उभरते हुए को सलटा डालने अपना जलवा दिखाते, 13 जनों को बुझा दिया।भले 500 वर्षों के इतिहास में देखें तो लाखों करोड़ों लोग शहीद हुए हैं, लेकिन इससे क्या,यह तेरह और ऐड होना, बहुत बहुत गैरवाजिब,बहुत बहुत बुरा हुआ।अकारण,देश प्रदेश हित में जान गँवाएँ ऐसे लोगों का सम्मान और ऐसे काण्डों के जिम्मेदारों को दण्ड मिलना मिलना मिलना ही चाहिए। खैर समय बलवान होता ही है तानाशाहों का क्षय निश्चित है,, सो काण्डवालों का भी क्षय हो गया और अन्ततः सत्य की जीत तर्ज पर, भूत की दमित शक्ति भविष्य के लिए सशक्त होती वर्तमान की सरताज़ हो ही गयीं।एक अबला ने दुनियाँ को दिखा दिया कि दुनियाँ शक्ति के ठेंगे पर।
पर यह जो कहते हैं, शहीदों की शहादत कभी जाया नहीं होती,प्रैक्टिकली सिद्धान्त च सत्य यह कि, शहीदों के शहादत को जो सलीके से "मनाना" जानता हो, इतिहास में अमर और असली विजेता वही होता है। वो एक क्या तो था,कुछ शेर टाईप - "शहीदों के फलाने फलाने पर लगेंगे हर बरस मेले---------  "  पता नहीं,कुछ भला सा ही था, अभी ठीक से याद नहीं पड़ रहा। जो भी हो,कहने का तात्पर्य यह कि शहीदों के कब्र पर शहीदों के तीसरे चौथे पांचवें पुश्त तक मेले बराबर से सजा करेंगे, रैली रैला मंच सजावट सब चकाचक रहेगा,बस अगली पीढ़ियाँ संतोष को वह डेट नहीं "पा और मना" पाएँगी जब उन हतभागे शहीदों के गुनाहगारों का "सज़ा डे" (छोड़िये,ज्यादा हो गया, बस केस का "डिसीजन डे") था। 

14.2.14

प्रेमोत्सव वाया छिनरोत्सव

ज्योतिष शाश्त्र के अनुसार चन्द्रमा मन का कारक है, मन को नियंत्रित करता है,इसलिए जब यह आकाश में अदृश्य रहे या अपने पूर्ण रूप में विदयमान हो, दोनों ही अवस्था में मन पर विशेष प्रभाव डालता है.मनुष्य सहित बाकी जीव जंतु इस प्रभाव को कितना अनुभूत और अभिव्यक्त कर पाते हैं ,पता नहीं,परन्तु सागर को देखिये, वह कोई पर्दा नहीं रखता,उद्दात्त रूप में अपने आवेगों को अभिव्यक्त कर देता है.विछोह में विषादपूर्ण चीत्कार और संयोग में हर्षपूर्ण उछाह,परन्तु एक बात है,समस्त संसार को डुबो लेने की क्षमता रखने वाला वह उदधि और उसकी लहरें चाहे जितना तड़प लें,उत्साह उत्सव में चाहे जितनी दीर्घ उछाल ले लें, परन्तु अपनी सीमाओं का कभी अतिक्रमण नहीं करते ।

माघी पूर्णिमा है आज.वसंत का मधुरतम दिन, चमकते चाँद संग सबसे चमकीली सुन्दर रात। पतझड़ ने पेड़ों को भले उसठ कर दिया है, पर इसकी भरपाई धरती पर बिछे फूलों के पौधों ने कुछ यूं कर दिया है कि ऊपर नजर ही नहीं जा रही है। अरे ये नज़रों को छोड़ें तब तो कोई कुछ और देखे। अब स्वाभाविक है जब बासंती पवन मन में उछाह भर रहा हो, धरती पर बिछे फूल मन में उतर आये हों तो मन में प्रणय/ श्रृंगार/ काम और रति क्यों न उतरें।प्राचीन भारतीय परम्परा में वसंतोत्सव की व्यवस्था थी। बड़े ही हर्षोल्लास से वसंत की आगवानी और सम्मान किया जाता था। धर्म अर्थ के बाद काम की प्रतिस्थापना जीवन का आवश्यक सोपान था क्योंकि इसके बाद ही व्यक्ति मोक्ष तक पहुँच सकता था।धर्म अर्थ काम मोक्ष चारों सोपानों की सामान महत्ता, न कोई कम ,न कोई ज्यादा और तब सम्पूर्णता पाता यह जीवन, यह सृष्टि।

खैर, समय बदला है, धर्म अब जीवन धर्म, मानवता नहीं बल्कि सेकुलरिज्म की बेड़ियों में जकड़ी भौंचक इधर उधर देख रही है कि मैं क्या हूँ,कहाँ हूँ.. अर्थ जीविकोपार्जन नही जीवनधर्म बन गया,बाज़ार के चंगुल में फँस वसन्तोत्सव भाया कामोत्सव छिनरोत्सव में तब्दील हो गया और "मोक्ष",यह चाहिए किसे?
चार खूँटों (धर्म अर्थ काम मोक्ष) पर टिका जीवन दो खूँटों (अर्थ और काम) पर अटका संतुष्टि और संतुलन पाने को बेहाल है. कहाँ से मिले, कैसे मिले?
और उसमे भी कामदेव की लंगोट धर उसपर लटका, सब कुछ पा लेने को बौराया, उन्मुक्त भोगाकाश उड़ रहा किशोर युवा वर्ग जब जीवन का सर्वोच्च सुख और संतोष पाने को निकलता है तो उसके आगे नैतिकता धर्म धराशायी हो जाता है.पुचकार से मान गया/गयी तो ठीक वर्ना बलात्कार के बल पर प्रेमोत्सव/ भोगोत्सव मना लेंगे, उसका अवसर न मिला तो तेज़ाब से जला देंगे.अब भाई पुरुसार्थ के बल पर सुख संतोष पाने निकले हैं तो पाये बिना छोड़ेंगे थोडेही।

महानगरों और नगरों में जहाँ बहुतेरे विकल्प (अड़ोस पड़ोस, दुसरे मोहल्ले आदि) उपलब्ध है, वहाँ की विभीषिका फिर भी थोड़ी कम है, लेकिन गाँवों में जहाँ अधिक विकल्प नहीं, चचेरे ममेरे फुफेरे भाई बहन,चाचा भतीजी, मामा भाँजी,जीजा साली, शिक्षक छात्रा "न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्रेम करे कोई ,तो देखे केवल मन " के मूल मंत्र के साथ भेलेन्टाइन फरियाने निकल पड़ते हैं. नैतिकता जाती है तेल लेने और व्यभिचार आचार में कोई फर्क नहीं बचता। संचार क्रांति (टीवी) की पीठ पर सवार हो बाज़ार ने भोगवाद को लोगों की रगों में ऐसे घोल दिया है कि शिराओं में बह रहे छिनरत्व को पृथक कर उसमे सात्विकता, नैतिकता बहा पाना कैसे सम्भव होगा ,पता नहीं।


............................

18.9.12

दीपुआ का बनेगा..?

मास्साब- अरे गोपिया, ई त बता, के रबरी देबी, राहुल गांधी, मधु कोड़ा औ मनमोहन सिंह, ई सबमे एगो कौमन आ मेन फेक्टर का है ??


 गोपिया - मास्साब, सबके सब गोबर हैं..उहो गाय के नै गदहा के, न लीपे जोग, न पोते जोग..


मास्साब - अबे मरवायगा का.. धीरे बोल ससुरे..

चल इधर तो आ, आ इधर, खा सोंटा..ससुर, इहे सिखाये थे..??
अबे, ई कुल महान भाग्यशाली लोग, महान राजनेता और शासक हुए हैं भारत में देश औ प्रदेस के..
 
अच्छा चल, ई बता के सोनियां गन्धी कौन हैं..?
 
गोपिया- सोनियां अंधी..!!!!
 
मास्साब - अंधी नहीं बे, गन्धी ..
 
गोपिया - लेकिन माई तो कहती है के "सोनियां अंधी है", उको देस, देस के वासी, उनका दुःख दर्द कुच्छो देखाई नहीं देता " त हम सोचे कि उका नाम इहे होगा..
 
मास्साब - अबे माई के बच्चा..जानता है तू ,ऊ केतना बड़ी हस्ती हैं, पूरा भारत उनकै मुट्ठी में है, उप्पर से निच्चे तक सबकुछ.. माता हैं ऊ, माता..देस की माता, महान त्यागमयी माता, सबसे बड़ी माता..
 
 
गोपिया - भारत माता से भी बड़ी...??
 
मास्साब - औ का, सबसे बड़ी माता..ससुर, आदर से नाम ले उनका....ई बात तू भी समझ ले औ अपनी माई के जाके भी समझा देना..
 
गोपिया- ठीक मास्साब, समझ गए, अब आगे से नै होगा गलती..
 
मास्साब - बहुत बढ़िया, सब्बास !!!

 
अच्छा कालू , अब तू बता के महत्मा गांधी कौन थे..??
 
कालू - महत्मा गांधी.......ऊँ...ऊँ .....?????
 
मास्साब - अबे ऊँ ऊँ क्या करता है गदहा ...महत्मा गंधी को नै जनता है..??
ससुर तू लोग ले के रहेगा हमरी नौकरी. कल बीडीओ, सीओ, डीओ, सब का फौज के साथ जब सिक्षा मंत्री आयेंगे, तो इहे सब जबाब देगा..एतना दिन से तुम लोग को सुग्गा जैसे रटा रहे हैं, दिमाग के पटपट सब, इहै परफोर्मेंस देखायगा ..??
 
गोपिया - मास्साब, मास्साब, एका उत्तर हम बताएं ,हम बताएं...?
 
मास्साब - चल सब्बास बेटा, तू ही बता..
 
गोपिया - महात्मा गंधी थे, देस के बाप...
 
मास्साब - कर दिया न गोबर..अबे देस के बाप नै कहते हैं, कहते हैं "राष्ट्र पिता", माने पूरा राष्ट्र के पिता..
 
दीपुआ - लेकिन मास्साब, फरीद्वा त कहता रहा कि महत्मा गंधी खाली नेहरुए के बाप रहे..
 
मास्साब - कौन फरीद्वा..?? कब कहा, केकरा से कहा..??
 
दीपुआ- मोड पर जो ऊ दर्जीया बैठता है न मास्साब , उहे फरीद्वा.. कल जब हम बापू का पैंट मरम्ती को देवे उके पास गए रहे न, तो पंडीजी भी वहीँ रहे, उनके से फरीद्वा कह रहा था. औ साथे ई भी कह रहा था कि अपना ई पोसुआ दुनम्बरी पूत के परधान बने के जिद के आगे गांधी बाबा न झुक्के रहते आ अंग्रेजन के देस के बांटे वाला साजिस तोड़ दिए रहते , त कुल होता ई सब - दंगा फसाद ,खूनम खून, घिरना, भरम...औ आज भी कांगरेसिए सब के लगावल ऊ आग में हम सब जल रहे हैं.उनका बारिस सब आजौ ई आग को पूरा से पोसे हुए हैं, जालिम कहियो बुझने नै देंगे घिरना के ई आग..
 
मास्साब - चोप्प्प .....!!!! एकदम साइलेंट !!!! सब गलत बात...एकदम गलत बात.. सब फालतू बात बोलता है सब... खबरदार जे आगे से ऐसा बात कहीं सूना आ दुबारा अपना मुंह से कहीं ऊ सब उगिला तो, आगे कभी हम सुने तो चमडिया उधेड़ देंगे तुम सब का..
 
कल मंत्री जी के सामने इहे सब बोलेगा तू लोग...?? नलायक !!!! हमरा, अपना औ ई इस्कूल का, सबका नाक कट्वावेगा रे ..?? सबका सब लफंदर हो गया है तू लोग..
 
अच्छा कमला, तू बता, अपना देश का राष्ट्र गान के लिखे हैं ??
 
कमला - महाकवि श्री रबिन्द्र नाथ टैगोर जी लिखे हैं ..
 
मास्साब - वाह .. बहुत बढ़िया, गुड गर्ल ...
 
अच्छा अब ई त बता, के राष्ट्र गान में कै गो नदी, पहाड़ औ प्रदेस का नाम है..?
 
कमला - आठ गो प्रदेस माने कि राज्य, दू गो पहाड़ और दू गो नदी...
 
मास्साब - वाह ...देखो त, केतना होनहार औ तेज बच्ची है..भेरी गुड बेटा, भेरी गुड...
 
गोपिया - लेकिन मास्साब.. ऐसे आधा अधूरा नाम सब काहे है गीत में..?? अब पूरा राष्ट्र का गीत है, त इमे ऐसे आधा अधूरा नाम सब नै न होया चाहिए...ऊ पर भी देखिये, "सिंध" त अब अपने देस में हइये नै, ई है अब पकिस्तान में, त राष्ट्रगीत में ई एतना बरस से सिंध सिंध काहे घोसा रहा है..चाहे त सिंध के पाकिस्तान से लै के गीत सही किया जाए आ न त गीते बदल के कौनो एकूरेट राष्ट्र गीत बनाया आ गया जाए , तबै न ई कुल ठीक रहेगा..
 
मास्साब - हम देख रहे हैं तुमको, देख रहे हैं...बडका तेज बन गया है तू...बात बात में बहस करता है..हाथ गोड़ तोड़ के धर देंगे तोरा, कहे दे रहे हैं ...कल मंतरी जी के भिजिट बाला मामला नै रहता त अभिये तुमको सबक सिखा देते बच्चू...
 
गधऊ ,जानता है, राष्ट्र गीत हो या संसद सत्ता से जुड़ा कोई भी बात, उसपर ओंगली उठाने से राजद्रोह का अपराध माना जाता है, भयंकर अपराध..बेटा, बाप बेटा मिल चक्की पीसते रह जाओगे जिनगी भर जेल में..
 
अरे दीपुआ, कल तू इहाँ अगिला बैंच पर बैठिहो, औ जे किसी से भी अंगरेजी में कोई सवाल पूछा जाए, त धड से लपक लियो सवाल औ धड से दे दियौ जवाब, समझे कि नहीं..नै त औ कोइयो के मुंह खोले के नौबत से दू मिनट में इस्कूल के इज्जत का कचड़ा बन जायेगा..
 
दीपुआ- ठीक मास्साब ..
 
मास्साब - अच्छा चल बता - ह्वाट इज योर फादर्स नेम ..?
 
दीपुआ - माई फादर्स नेम इज मिश्टर मोहनदास करम चन्द गाँधी, माने कि महत्मा गांधी..
 
मास्साब - अबे ससुर , महत्मा गाँधी कब से तोहरे बाप हो गए रे ..?
 
दीपुआ - मास्साब अभिये न थोड़े देर पाहिले आप कहे थे कि महत्मा गांधी हम सबके , पूरा राष्ट्र के बाप हैं..
 
मास्साब - हे प्रभु, हे दीनानाथ ..कैसा कैसा चमोकन सबको भर दिए आप हमरा किलास में..अबे ऊ वाला बाप नै..असली बाला बाप..बाप माने कि तोहरे माई के पति..समझे कि नहीं...
 
दीपुआ - ओ, त ऐसा कहिये न .. माई फादर्स नेम इज मिश्टर गजोधर लाल पासवान, साइकिल मकैनिक ...
 
मास्साब - गुड, ऐसेही बोलियों, एकदम कन्फिडेंस के साथ.. आ जो ऊ पूछें कि बेटे बड़े होकर क्या बनना चाहते हो, .. त का कहोगे ..??
 
दीपुआ- आई वांट टू बी ए मिनिस्टर ...मोर बिग, मोर स्ट्रोंग एंड फेमस देन यू
 
मास्साब - वाह ...ई हुआ न बात.. गुड , भेरी भेरी गुड ...ऐसे ही अकड़ के.. फुल कान्फिडेंस से बोलियो बेटा ..ठीक ..जामे उनका आँख फटा रह जाए, अपना गाँव के इस्कूल आ बिदियार्थी का एस्टेंडर देख के..आ अन्ग्रेजिये में सब जबाब दियो बेटा ..
 
अच्छा, जे पूछें कि मिनिस्टरे काहे बनना चाहते हो, का करोगे मिनिस्टर बनके..त का कहोगे..?
 
दीपुआ - मास्साब, ईका जबाब हम हिंदिये में दै दें त चलेगा..? काहेकी एकरा अंगरेजी ट्रांस्लेसन हमको ठीक से नै आता है..
 
मास्साब - कोई बात नै बेटा, तू हिंदिये में कह ,हम अंगरेजी में ट्रांस्लेसन करके तोका दै देंगे, तू ओका रट लियो रात भर में...
 
दीपुआ - हम कहेंगे, हम मंत्री औ आपसे भी बड़का पावरफुल मंत्री एहिलिये बनाना चाहते हैं कि आप सब मिल के जौन तरह से आज देस का गाँ$$$.. मार मार के बरबाद बरबाद किये हुए हैं, हम बड़ा होके मंतरी, परधान मंतरी बन के आप सब का गाँ$$$... में बांस कई के अपना भारत माता के दुर्गती के बदलैया लेंगे आप सब से..सड़ा गला, आधा अधूरा सब हटा के ... देस को सरिया के... एक नया औ सुन्दर भारत बनायेंगे..

 
धडाम .... !!!!!
 
गोपिया - अरे रे... का हुआ मास्साब !!! अरे कमला, बिमला, मनोजवा सकील्वा ..सब दौड़ो रे..पानी लाओ..अबे दीपुआ भाग, बोला के ला प्रिंसपल साहेब के... मास्साब आँख चियार दिए हैं..देख देख खाली बेहोसे हुए हैं कि मर मुर गए..
__________________________________________________________-

30.4.12

आदर्शवादी ..

घबराए आवाज में बुचिया ने मून बाबू को हंकारा लगाया- "ओ भैया, दौड़ के आओ हो,देखो तो मैया को का हो गया.."
मून बाबू हड़बडाये दौड़ के आँगन में पहुंचे तो देखा मैया का केहुनी रगडाया हुआ है और माथे पर भी गूमड़ निकल आया है..
वो समझ गए कि गिरने के कारण कोई बहुत गहरी चोट तो न आई है ,पर मन पर चोट का क्षोभ गहरा है....
उन्होंने पुचकारा, "का हुआ माई कहाँ और कैसे गिर गई...? अच्छा कोई बात नहीं, बहुत गहरा जखम नहीं है ,दुई चोट दवाई में एकदम ठीक हो जायेगा..जा रे तो सोनू, मेरा दवाई का बकसवा तो दौड़ के उठा ला..आ बुचिया, तू जरा दौड़ के पानी तो गरमा ला, घाव साफ़ कर मरहम पट्टी कर दें..."
 
 
मैया अबतक भरी आँखें और भर्राए गले से जो चुपचाप बैठी हुईं थीं, गुर्राई..खबरदार जो कोई सटा है हमसे.. नहीं कराना है हमको दबाई बीरो..

का हुआ माई, कुछो बताएगी, काहे एतना खिसियायेल है, मून बाबू बोले..और साथ ही उन्होंने लखना के तरफ आँखों के इशारे से पूछा कि बात क्या हुई..

लखना बोला, मालिक बात ई हुआ कि दादी मंदिरवा से फिरल आ रही थी कि घरे के पास वाले रोडवा पर हेंज के हेंज उ जमुन्वा मन्तरी का गुंडवा सब मोटरसाइकिलवा पर जा रहिस था, ओही में से दू गो मोटरसाइकिलवा वाला दादी के एकदम नगीचे आ के मोटर साइकिलवा हेंडा दिहिस..डरे के मारे दादी बगले हटीं त खड्डा में चित्त होई गयीं..सब गुंडवन ठट्ठा उड़ाते निकल लिए हुआं से, एहिसे दादी जोरे खिसियायेल हैं..

ओह त ई बात...

छोड़े न माई, का उ गुंडवन उचकवन सब के बात मन से लगा रही है...जाने दे..मून बाबू बोले..

क्षोभ क्रोध मिश्रित आवाज में माई बोली.. हाँ रे..!! जाने काहे न दें.. जब भाग में कीड़ा पडल हो तो सबे जाने देना पड़ेगा..
सब कसूर तोहरे बाप के है..ओकरे कारण हमको का का भोगना लिखा है राम जाने..


का माई, काहे बात बात में बाबूजी को लई आती हो, ई कौनो अच्छा बात है का,मून बाबू और बुचिया ने एकसाथ प्रतिवाद किया..

काहे न लायें, बोल...काहे न लायें..आज जौन भी दुर्दशा हमरा , हमरा परिवार का हुआ है,इसका जिम्मेवार तोहरे बाप के सिवा है कौन..??

पूरा गाँव का भिखमंगवन के रात दिन जुटाए रहे घर में, अपना बच्चा सब का हिस्सा का खाना पीना, कपडा लत्ता, किताब कलम सबमे बाँट दिया..
कभी न सोचा कि पहले अपना घर में दिया जला लें फेर मंदिर की सोचेंगे..अपना घर फूंक के गाँव उजियार किया जिनगी भर...का मिला फल बोल, का मिला..?

ऐसे काहे कहती हो माई, बाबूजी को भगवान् मानता है सारा गाँव, केतना इज्जत है उनका, ई का छोटा कमाई है. मून बाबू बोले..

कमाई..?? देख, आग न लगा देह में, कहे देते हैं...ई कमाई है ,त काहे नहीं ई कमाई का फीस भरके अंगरेजी डाक्टर बनाया तुझे ..?? फीस का रकम सुनके तो होसे उड़ गया था बाप बेटा का, याद है कि नहीं..?..बाप बेटा मिलके ऊ घड़ी भी हमको ठगा..अंगरेजी डाक्टर त अपना देस में ढेरे  है, बेटा आयुर्वेदी डाक्टर बनेगा, उसमे फीस भी नामे का लगेगा..
और लो बन भी गया डाक्टर तो इसमें भी तो कमाई है, लेकिन बेटा चला बाप के आदर्श की राह...लोक कल्याण करेगा...बाप का दुर्दशा देखा फिर भी नहीं चेता..


क्या बेटा.. क्या बेटी ... सबको बाप वाला आदर्श का रोग लगा है..ई करमजली को कहे कि एतना पढ़ी लिखी,निकल जा शहर , बड़का अफसर बन, खूब कमा और अपना जिनगी सम्हाल...लेकिन नहीं, ई महरानी भी बाप का विरासत ऊ कंगला इस्कूले चलाएगी.दहेज़ लेने वाले से बियाह न करेगी, जिनगी भर बिनब्याही बैठे रहेगी..सब मिल के करो अपने अपने मन का और मरते रहो..

आह!! देखो तो ,फोड़ डाला उस राच्छस के सेना ने, लेकिन खून नहीं खौला मेरे संतानों का, इससे बढ़िया तो हम बांझे रहते...जाने कैसा आदर्श, कैसा क्षमाशीलता है ई ..?


हम कहे थे ,हजार बार कहे थे, कि ई संपोलवा के न पोसो...ई मुसखौका छोटका जात, बचपन्ने से एक नंबर का झुट्ठा , एक नंबर का चोर था,पहला किलास से मैट्रिक, आइये, बीए सब चोरी आ धांधलेबाजी कर के पास किया..का सोचे थे, कि अभी जो छोटका चोरी कर रहा है, आगे जाकर बड़का बडका डाका नहीं डालेगा..कम से कम अनपढ़ रहता त मूसे न खाता, आज त आदमी खाता है..
कोयला बिभाग के किरानी पद पर बहाल हुआ औ एतना चोरी बेईमानी किया कि पंदरह बरस सस्पेन रहा, लेकिन देखो, ई पंदरह बरस में पैसा का अइसा बुरुज लगाया कि झीटकी जैसा पैसा उड़ा, चुनाव जीत गया औ सीधे मंतरिए बन गया..अब आग मूत रहा है तो बस सब मिल के झेलो..

मून बाबू ने साहस कर एक बार फिर प्रतिवाद किया- ऐसे काहे कहती है माई, सब जमुन्वे थोड़े न बन गया..देखो बाबूजी के पढाये आज एक से एक पद पर पहुंचा हुआ है कि नहीं.भला लोक को याद करो न,बुरा को याद करके का फायदा है..

माई का स्वर अब और ऊंचा उठा गया.. हाँ, हाँ, रे देखे. पद उद भी देखे ..
बडका कलक्टर है न पसमनमा ..
अपने से जाके हम घिघियाये, बचवा बचा लो हमरा घर, उ रच्छसवा जमुन्वा से.बड़का मशीन लगा के ढाह रहा है रे ..

त कहा , माफ़ कई दे माई , मंत्री के खिलाफ एक्सन लेवे के पावर हमरा नहीं है..औ उसके पास तो मास्साब का हस्ताक्षर किया भेलिड कागज भी है..केतना कहे हम, बिटवा गुरूजी काहे कागज पर दस्खत करेंगे रे..ऊ सब उसका धोखा है .. उसका पुरखन को हमरे पुरुखन रहे के बास दया खाकर ऐसे ही दिए थे, अपना घर से एकदम अलग हटके..ई फैलाते फैलाते हमरे घर से दीवार सटा लिया और अब अपना घर बगीचा सुन्दर बनाने को हमरे घर का आधा हिस्सा भी चाहिए उसको..अब बता न हम जान बूझके अपना आधा घर आ खलिहान काहे को उसके नाम करेंगे..

पर ऊ..एक सुना हमरा..??

बात में सच्चाई थी, इसका उत्तर किसीके पास नहीं था..लम्बी खामोशी रही..

इस भारी माहौल को हल्का करने के लिए बुचिया ने ही पहल की..नन्हे भतीजों को इशारे से दादी को लाड़ करने को कहा..दोनों बच्चे दादी से लिपट गए और एक हाथ पकड़ कर अपने पिता से कहने लगा देखो बापू दादी को लहरने वाली दवाई न लगाना, प्यारी प्यारी दवाई लगाना जिससे जले भी न और घाव झट्ट से ठीक हो जाए..दूसरा दादी के माथे के गूमड़ को सहलाने लगा. मून बाबू की पत्नी तबतक गरम गरम दूध हल्दी का गिलास ले उपस्थित हो गई थी..इस एकत्रित लाड़ ने माई के क्षोभ की अग्नि को हल्का और ठंढा करने में प्रभावकारी काम किया..
मरहम पट्टी कर चुकने के बाद मून बाबू ने बड़े लाड़ से कहा, माई, तू इतना कोसती रहती है बाबूजी को ,पर बाबूजी जैसा देवता इंसान, इतना बड़ा दिल वाला आदमी दुनिया में कितना देखा सुना है बता ना..और जानती है, बाबूजी ने पैसा भले न कमाया, पर जो नाम, सम्मान और संतोष रूपी धन उन्होंने कमाया, वह बिरले को नसीब होता है..

मैया कराह उठी...बोली- बिटवा , उनके सारे किये मैं माफ़ कर देती, अगर सचमुच वो अपना दिल को बड़ा और कड़ा बनाये रख लेते रे..जिस दिन उनका ई प्यारा शिष्य , यही जमुन्वा ,धोखे के कागज के बल पर घर ढहवा रहा था, उस घड़ी जदि अपना यही बड़प्पन, सहनशीलता कायम रख उस झटके को सह लेते,अपना प्राण न त्यागे होते , तो हमरा दुनिया ऐसे उजड़ता रे, बोल !!! हमरा तो सोहाग भाग,सबकुछ लुटे लिए चले न गए अपने साथ.कैसे माफ़ कई दें उनको, तू ही कह...


यह दुःख केवल उन्ही तक सीमित न रह पाया, सबकी आँखों से झर धरती भिंगोने लगा..
____________________