25.12.17

मेरी क्रिसमस

"मेरी क्रिसमस"

प्रिय ईसाई भाई बंधुओं, आपको आपके परम् पूज्य यीशु मसीह जी के जन्मदिन पर सपरिवार बहुत बहुत बधाइयाँ और मंगलकामनाएँ।खूब हर्ष उत्साह से मनाएँ यह पुण्य पर्व।

लेकिन आपको पता है, जितने उल्लास और श्रद्धा से आप यह पर्व मनाते हैं,उससे अधिक उत्साह से हम सेकुलर हिन्दू यह सेलिब्रेट करते हैं। जन्माष्टमी,रामनवमी,हनुमान जयंती, शिवरात्रि आदि आदि पर्वों पर आप अपने सहधर्मानुयायियों को कभी यह हैप्पी हैप्पी विशिंग देते हैं? नहीं न? लेकिन हम हिन्दू 4 दिन पहले से ही एक दूसरे को विशिंग आदान प्रदान के साथ साथ यह सेलेब्रेशन शुरू कर देते हैं।
तुलसी पीपल में दिये जलाने वालों पर हँसने, मखौल उड़ाने वाले हम, अपने घरों में प्लास्टिक की क्रिसमस ट्री सजा सुख समृद्धि के लिए उसके सामने दण्डवत हो जाते हैं।हमारा मानना है कि आपने कह दिया है तो वह सन्देह से परे है, लाल कोट सफेद दाढ़ी वाले संता अंधविश्वास नहीं,,वे होते ही हैं जो बच्चों के लिए गिफ्ट लेकर आते हैं।

एक ओर जहाँ गाँव देहात या शहरी बस्तियों वाले साधनहीन लोग आज के दिन पिकनिक मनाने अवश्य ही जाते हैं,क्योंकि इस दिन के पिकनिक का पुण्यलाभ मकर संक्रान्ति पर शुभमुहूर्त में गंगा स्नान से भी अधिक पुण्यफलदायी माना जाता है। वहीं दूसरी ओर पढ़े लिखे साधनसम्पन्न हम बुद्धिजीवी सेकुलर हिन्दू आज के दिन धूम धड़ाके वाला क्रिसमस पार्टी मनाते हैं।
अतिसंक्षिप्त लाल कपड़ों में आज की कँपकँपाती ठण्डी को हम वीरांगनाएँ हँसते मुस्कुराते रेड वाइन के साथ आत्मसात कर जाती हैं।असल में हमनें दुर्योधन की दुर्दशा देखी थी, कि उसने माता गान्धारी के कहे की अवहेलना कर पूर्ण वस्त्रहीन अवस्था में उनके सम्मुख उपस्थित नहीं हुआ और केले के पत्ते से ढँका उसके शरीर का वह हिस्सा कमजोर दुर्बल रह गया था और कालान्तर में उसी दुर्बल हिस्से पर आघात लगने से वह मृत्यु को प्राप्त हुआ था।उसी से शिक्षा लेते हम हॉट बेब्स शरीर को वज्रता प्रदान करने के उद्देश्य से शीत वायु को अधिकाधिक मात्रा में अपने शरीर का एक्सपोजर देती हैं।

असल में क्या है न किसी जमाने में "माँ,माटी,मानुष" (मातृभाषा, संस्कृति और परिवार समाज) के विश्वास आस्था से आम हिन्दू जरूरत से ज्यादा ही आवृत्त रहता था,,अपने ही व्रत उपवास त्योहारों को महान मानता था और फलस्वरूप पिछड़ता ही चला गया (हालाँकि अब एक राजनीतिक दल ने इसे अपना चुनाव चिन्ह बना लिया है और सफलता के नित नए झण्डे गाड़ रही)।
इतना पिछड़ा इतना पिछड़ा कि दुनियाँ के दयालु परोपकारी कई अन्य देशों और धर्मावलंबियों को भारत पर शासन करने आना पड़ा ताकि वे यहाँ के लोगों को उनके अन्धकूप से बाहर निकाल उन्हें प्रगतिशील बना सकें।
पहले महान पराक्रमी दयालु मुस्लिम राजवंश और फिर आँग्ल राजवंश, सैकड़ों वर्षों तक प्राणपण से भिड़े रहे, फूहड़ गंवार भारतीयों को प्रगतिशील बनाने में।लेकिन वे हार गए।
तब जाकर देश का सौभाग्य जगा और भारत भूमि से महान चचा उगे। उन्होंने बीड़ा उठाया कि देश को कूपमंडुकता मुक्त कर के ही धरती से उठेंगे। दूरद्रष्टा युगप्रवर्तक परमपूज्य चचाजी ने देश पर "सेकुलरिता" रूपी वह जादू की छड़ी घुमाई कि सदियों से सुप्त पड़ी हिन्दुओं की चेतना फुरफुराकर जग गयी और उसे समझ में आया कि अपनी पुरातन अधोगामी संस्कृति को त्याग कर अँग्रेजी भाषा,पर्व त्योहार,खान पान पूर्ण रूप से अपनाकर ही प्रगतिहीनता के अभिशाप से मुक्ति पाया जा सकता है, एडवांश बना जा सकता है।
सो हम सेकुलर हिन्दू पूरे प्राणपण से उस सेकुलरी छड़ी को थामे आपके बराबर उड़ने में लगे हुए हैं।

अब आप साधिकार नहीं कह सकते "मेरी क्रिसमस", क्योंकि यह केवल आपकी ही नहीं "मेरी भी" उतनी ही है - "मेरी क्रिसमस" !!!

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (27-12-2017) को "सर्दी की रात" (चर्चा अंक-2830) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'