14.7.17

जागो ग्राहक जागो


साधु", शब्द सुनते ही हमारे मानस पटल पर औचक जो चित्र उभरता है,वह कटोरा लिए दरवाजे पर खड़े गेरुआधारी भिखारी का या फिर आँखें मूँदे बैठे माला जपते व्यक्ति का होता है।
वैसे तो कुछ 'तथाकथित' लघु गुरु साधुओं के कु-कृत्यों ने और बाकी बची कसर सेकुलर बुद्धिजीवियों के दुष्प्रचारों ने पूरी करते पिछले दशकों में साधुओं की वह छवि बना डाली है, कि इनके झोले में डालने को जनसाधारण के पास संशय घृणा और तिरस्कार रूपी भाव भिक्षा के अतिरिक्त शायद ही कुछ अच्छा बचा है।

ऐसे में किसी गेरुआधारी बाबा को घी तेल सौंदर्य प्रसाधनों से लेकर दैनिक उपयोग की अन्यान्य वस्तुओं के उत्पादक/विक्रेता रूप में कोई कैसे बर्दाश्त कर ले? सो, अपने देश में एक बड़ी संख्या उन लोगों की है,जो पतञ्जलि के प्रॉडक्ट्स केवल इसलिए नहीं खरीदते या बाबाजी से घृणा इसलिए करते हैं कि एक गेरुआधारी साधु भीख माँगना और धूनी रमाना छोड़ सामान क्यों बेच रहा, वह ऐसा कैसे कर सकता है? 
निष्कर्ष - वह ढोंगी है!!!

मेड इन चाइना,जापान,अमेरिका,रशिया,, और तो और पाकिस्तान भी,,के उत्पाद आप सहर्ष खरीदेंगे,पर बाबा वाला नहीं, क्योंकि -
" बाबा गन्दे होते हैं, या फिर बाबा ऐसे नहीं होते हैं"(बचपन से दिमाग में बैठायी गयी बात)।इससे क्या कि सतयुग त्रेता आदि में कोई भी वैज्ञानिक/अविष्कारक गेरुआधारी तपस्वी "साधक/साधु" ही होता था, अस्त्र निर्माण से लेकर इतिहास भूगोल ज्योतिष साहित्य भवन निर्माण विशेषज्ञ और कामयोग तक के सिद्धांतों के प्रतिपादक और इनसे सम्बद्ध उत्पादों के उत्पादन भी इन्हीं की देखरेख में होते थे।
इनके सम्मुख राजसत्ता नतमस्तक रहती थी,जनसाधारण की तो बात ही क्या।
पर सही है, यह वह काल नहीं,,,कल-युग है।जिसमें हम प्रोग्रेसिव हैं और हमारी प्रोग्रेसिवनेस तथा सेकुलरिज्म हमें साधुओं को सम्मान देने से ख़ारिज होती है।

अरे भैया, आप एक उपभोक्ता हैं।आपका प्रथम कर्तब्य अपनी जेब को और फिर उत्पाद की गुणवत्ता को देखना तौलना है। हाँ, कोई दूसरा देश जो भारत को हानि पहुँचा रहा हो,राष्ट्रसेवा के तहत उस देश के वस्तुओं का बहिष्कार कर सकते हैं, जैसे कभी भारत भर में मैनचेस्टर के कपड़ों की होली जला कर की गई थी या अभी हाल ही में लोगों ने अमेज़न की बैंड बजायी थी।

बाबा बोली से हल्के हैं,व्यक्तित्व में भी वह बात नहीं कि स्मरण ही नतमस्तक कर दे,,यह मेरी भी व्यक्तिगत राय है।लेकिन यह तो आपको मानना ही पड़ेगा कि स्वदेशी आंदोलन या योग के प्रचार प्रसार में,इनके प्रति जनस्वीकार्यता बढ़ाने में, बाबा ने जो भूमिका निभायी है, वह अपने आप में अभूतपूर्व है।वरना तो ये दोनों ही सदियों से भारत में रहे हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन में तो लड़ाई का एक प्रमुख हथियार ही स्वदेशी आन्दोलन रहा था। लेकिन उसके बाद से तो लगातार लोगों का वह ब्रेनवाश हुआ कि अंग्रेज,अँग्रेजी और उनके सामान ही श्रेष्ठ और विश्वसनीय होते हैं,यह स्थापित हो गया। चाहे वे अपने कुत्तों वाला साबुन आपके स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम बताते आपको पकड़ा दें या अपने देश का भूसा भूसी हेल्थ ड्रिंक कहते आपको पिला दें या फिर टॉयलेट क्लीनर को शॉफ्ट कोल्ड ड्रिंक कहते उसको आपका प्रिय पेय बना दें, आप पूरी श्रद्धा विश्वास से उसे ग्रहण कर लेंगे।

विकसित देश की श्रेणी में आने को अकुलाए हे भारतवासियों,,कृपया पूर्वाग्रहों से मुक्त होइए।
"जागो,ग्राहक जागो" 
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7 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "प्यार का मोड़ और गूगल मॅप“ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार

रंजना said...

आभार आपका

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16-07-2017) को "हिन्दुस्तानियत से जिन्दा है कश्मीरियत" (चर्चा अंक-2668) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रंजना said...

आभार आपका

ताऊ रामपुरिया said...

बिल्कुल सही आपने.
रामराम
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

ktheLeo (कुश शर्मा) said...

तर्कसंगत लेखन।

ktheLeo (कुश शर्मा) said...

तर्कसंगत लेखन।