17.4.09

सप्त्शी के तालीबानी....

किसी भी धर्म के पूज्य ग्रंथोँ, जिन्हें कि न जाने कितने महत अन्वेश्नोपरांत लिखा गया है, को केवल ऊपरी सतही तौर पर पढ़कर, यदि हम शब्द आधारित विश्लेषण करेंगे और उसके विषय में अपना अभिमत स्थिर करेंगे तो यह उस ग्रन्थ और उसके रचयिता के श्रम और उद्देश्य की अवमानना होगी,उसके प्रति सरासर अन्याय होगा..जिस प्रकार गहरे सागर में से मोती चुनने के लिए बार बार गहन तल में उतारना पड़ता है,वैसे ही भाव /ज्ञान रुपी मोती को पाने के लिए एकाधिक बार ग्रन्थ रूपी उस अथाह समुद्र में भी उतरना चाहिए....

जिस किसी ने भी इसका अनुभव किया होगा वह सहज ही इससे सहमत होगा कि रामायण गीता हो या कुरान बाइबिल ,जितनी बार उसे पढ़ा बांचा जाता है,हर बार जैसे नयी नयी परतें खुलती जातीं हैं..हर बार एक नया अनुभव होता है..लगता है.....अरे इतनी बार पहले भी पढ़ा ,पर इसबार तो यह नितांत ही नवीन तथ्य दृष्टिगत हुआ..

कालजयी रचनाओं के विषय में ठोस धारणा स्थापित करने से पहले कम से कम पूर्ण समर्पित भाव से अपने पूर्वाग्रहों को परे कर न्यूनतम दो तीन बार अवश्य पढ़नी चाहिए,इसके पश्चात ही किसी निर्णय पर पहुँच समालोचना देनी चाहिए...

इसी क्रम में एक कथा का स्मरण हो आया..किसी सत्संग सभा में रामकथा पर प्रवचन हो रहा था...कथोपरांत प्रश्न काल में एक महोदय ने तुलसीदास जी के प्रति अपना क्षोभ व्यक्त करते हुए संत से कहा कि, तुलसीदास जी ने रामायण के समस्त पात्रों के साथ सामान न्याय नहीं किया है.राम और सीता का तो उन्होंने इतना गुणगान बखान किया ,पर लक्षमण,उर्मिला,दशरथ इत्यादि पात्रों के उल्लेखनीय व्यक्तित्व को बड़े ही संक्षिप्त कलेवर में समेट दिया.

संत ने उनकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा कि - भाई,अब चूँकि यह रामचरितमानस है,इसलिए इसमें राम के व्यक्तित्व और कृतित्व को प्रमुखता दी गयी है,यदि यह दशरथ वंशावली होती तो निश्चित ही इसमें प्रत्येक पात्र के कृतित्वों की वृहद् विस्तृत व्याख्या की गयी होती.

मैंने अपने अनुभव में अधिकांशतः यह देखा है कि धर्म और धर्मग्रंथों की सर्वाधिक आलोचना करने वालों में बहुलता से वे ही होते हैं, जिन्होंने एक बार भी इन्हें पढने तथा निरपेक्ष भाव से इन्हें जानने का प्रयास नहीं किया है. धर्म हो, चाहे कोई भी अन्य विषय, किसी भी विषय पर अपना अभिमत स्थिर करने तथा उसकी निंदा स्तुति करने से पूर्व उसे एक बार ठीक ठीक जानने का प्रयास अवश्य करना चाहिए तथा अपने मत के साथ साथ दूसरों के दृष्टिकोण को भी सुनना समझना चाहिए..

साधारनतया हमारे धर्मग्रंथों या धार्मिक आख्यानों में जिस प्रकार से कथा वर्णित होती है, प्रथम दृष्टया ग्राह्य नहीं लगते और कुछ हद तक हास्यास्पद भी लगते हैं..परन्तु उन शब्द योजनाओं से आगे जाकर यदि उनके सारगर्भित भावों उद्देश्यों को देखेंगे तो वे बहुत ही समसामयिक लगेंगे..और यही कारण है कि शताब्दियाँ बीत गयीं पर ये आज भी आस्तित्व में हैं और आगे भी रहेंगी.

अभी कुछ दिनों पूर्व नवरात्र में दुर्गा सप्त्शी का पाठ कर रही थी और हटात कथानक को पढ़ मन में कौंधा कि , जिस प्रकार से उसमे वर्णित है कि, देवताओं को राज्यच्युत कर जब राक्षसों ने श्रृष्टि को त्रास देना आरम्भ किया तो उन्होंने रक्षार्थ देवी का आह्वान किया और भीषण युद्ध के उपरांत देवी ने असुरों का विनाश कर सात्विक संस्कृति की रक्षा की...आज के प्रसंग में यदि इस कथा को देखें तो...लगेगा कितनी प्रासंगिक है यह आज भी...इसमें राक्षस और देव दोनों ही रूपक या प्रतीक हैं,संस्कृति के विध्वंसक और पोषक के..

समय के अनंत कालखंड में उत्तरोत्तर प्रगति और विकास के पथ पर चलकर जो सभ्यता सुदृढ़ वैभवशाली हुई है.धार्मिक ,सांस्कृतिक,वैज्ञानिक और सामाजिक प्रत्येक क्षेत्र में जो जीवनोपयोगी अविष्कार किये गए हैं , नवीन मानदंड स्थापित हुए हैं,जिसने जीवन को सुन्दर सुखद बनाने में महत भूमिका निभाई है. मानव जगत का एक वर्ग उसे पूर्णतः नष्ट भ्रष्ट और ध्वस्त कर देना चाहता है.आज भी संसार में देव और दानव मनुष्य के अंतस में विद्यमान हैं.इसमें देव वो लोग हैं,जो किसी भी सकारात्मक प्रगति के पक्षधर हैं तथा किसी न किसी प्रकार इसके पोषण संरक्षण में संलग्न हैं और दनाव वो लोग हैं जो इस प्रगति को नकार कर व्यवस्था को छिन्न भिन्न नष्ट भ्रष्ट कर सभ्यता समाज को, जीवन को मूल्यहीन बर्बर पाषणयुगीन दौर में ले जाना चाहते हैं.

देखिये न ....आज मानव जगत का एक वर्ग जो उग्र विध्वंसक बन प्रगति का धुर विरोधी है,क्या वह पुराण कथाओं में वर्णित दानवों से किसी भांति कम है....तालिबानी के नाम से जाने जाने वाले इस वर्ग के जो भी कार्य कलाप या विचारधारा है,क्या वह बर्बर दानवों से किसी मायने में कम है...

कल्पना कर देखिये की यदि यह वर्ग सचमुच ही सफल हो जाय और पूरे संसार पर इनका आधिपत्य हो जाय...इनके जो भी नियम कानून हैं, उसके अंतर्गत पशुवत जीवन यापन करने को हम बाध्य हों, प्रगति और संस्कृति के पोषक रक्षक इन विध्वंसकों से पराजित हो असहाय हो जायं.....फिर तो लगभग वही स्थिति होगी जो असुरों से पराजित हुई सत्ता शक्ति विहीन शाप्ताशी कथा में वर्णित उन देवों की हुई थी.

आज सभ्यता की विध्वंसक शक्तियां इसलिए सफलता प्राप्त कर रही है क्योंकि वह संगठित है.....अस्त्र शस्त्र दृढ संकल्प शक्ति कठोर अनुशासन और संगठन की वह शक्ति जितनी सुदृढ़ है,रक्षक शक्तियों में इन सबका अभाव है इसलिए चाहकर भी वह इन क्रूर शक्तियों के आगे पराजित हो जाती हैं...जिस दिन देव (रक्षक) शक्तियां संगठित हो जाएँगी और अपने सर्वोच्च तेज पुंज को एकत्रित कर उनके विरुद्ध खड़ी हो jayengee , असुर शक्ति का विनाश हो जायेगा। शांति के पोषक प्रगति के कर्णधार जब तक विखण्डित रहेंगे,असुर शक्तियां फलती फूलती जायेंगी.

दुर्गा का अर्थ ही होता है "संगठित शक्ति" और दुर्गा सप्त्शी की यह कथा मूल रूप में यही दिखाती सिखाती है। सकारात्मक शक्तियां संगठित और अनुशाषित होकर ही दुराचारी विनाशकारी शक्तियों को सहज ही पराजित कर सकती हैं,भले वह शक्ति एक स्त्री शक्ति ही क्यों न हो.

अब बात रही दुर्गा को स्त्री और माँ कहने की,बात तो कुछ लम्बी हो जायेगी,संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि ... शक्ति स्त्रीलिंग है,इसलिए इस शक्तिपुंज को भी स्त्री रूप में माना गया है.दुसरे, जब कभी भी हम कष्ट में होते हैं ,सबसे पहले हमें जिस नाम का स्मरण होता है,वह "माँ" का ही होता है.हम कितने भी कष्ट में रहें " माँ" का नाम दुहराते ही जैसे लगता है जैसे कष्ट कम हो गया....तो शाप्त्शी में भी जो माता के आह्वान की कथा है ,वह इसी भाव में है.

पौराणिक आख्यानों में वस्तुतः जो भी कथा वर्णित है,वह दृष्टान्त या रूपक हैं,जिसे युग विशेष के परिप्रेक्ष्य में देखने समझने का प्रयास करना चाहिए.जिस समय ये कथानक रचित हुए थे ,उस समय के जो भी राजनितिक सामाजिक परिदृश्य थे ,उन रूपकों के साथ ये कथा वर्णित किये गए थे...

एक बात और है,धार्मिक आख्यानों में जिस प्रकार से दंड विधान नियोजित हैं तथा धार्मिक आख्यानों में जिस प्रकार के कथानक रखे गएँ हैं,उनके एकमात्र उद्देश्य यही हैं कि वे अशिक्षित जनसाधारण द्वारा भी सहज ही बोधगम्य ग्राह्य हो और भयवश जनसाधारण नियमों में बंधे रहें। .

"सार्वजानिक स्थान पर धूम्रपान वर्जित है " पता नहीं कितने समय से यह निर्देश सार्वजानिक स्थलों पर उद्दृत रहता था....परन्तु दंड(भय) के अभाव में यह पूर्णतः निरस्त था.जबसे इसके लिए अर्थ दंड का प्रावधान किया गया ,लोग सतर्क रहने लगे. बहुत कुछ इसी आशय से धर्म में भी जो स्वर्ग नर्क ,पाप पुन्य दंड इत्यादि की व्याख्या है,उसका निहितार्थ यही है कि भयवश ही सही लोग धर्माचरण में प्रवृत्त हों और समाज संतुलित सुव्यवस्थित रहे.

एक बात और ....आज हमारे जो भी धर्मग्रन्थ जिस रूप में हमें उपलब्ध हैं,लगभग कोई भी अपने मूल रूप में नहीं रह गए हैं.परवर्ती काल में इसमें बहुत से प्रक्षेपांश जोड़े गए हैं.धर्म को विवादस्पद और दिग्भ्रमित किये रखने के लिए बड़े ही सुनियोजित ढंग से ये प्रयास विशेषकर मध्यकाल में मुस्लिम शासकों द्वारा करवाए गए हैं.उद्देश्य स्पष्ट है,धर्म ही व्यक्ति को दृढ बंधन में आबद्ध कर संगठित करता है,उसमे जितने विवाद होंगे,शासक का काम उतना ही आसान होगा..जात पांत छूआ छूट वैमनस्य फैलाकर और लोगों को असंगठित कर ही कोई भी शासक अपने कुचक्रों में सफल हो सकता है.अब देखिये न एक तरफ जहाँ भगवान् को भी शूद्रों के जूठन खाने की बात कही गयी,स्त्री को सर्वोच्च शक्ति और पूज्य माना गया वहीँ आज उपलब्ध इन्ही ग्रंथों में शूद्रों की उपेक्षा और नारी की अवमानना की बातें भी मिल जातीं हैं...अब सोचने वाली बात यह है कि कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति ऐसी विरोधाभासी बातें कैसे लिख सकता है....यह केवल हिन्दू ग्रंथों के साथ ही नहीं हुआ है,बल्कि अन्य धर्मग्रंथों के साथ भी हुआ है.

इसलिए आज आवश्यकता यह है की अपनी बुद्धि का उपयोग कर हम इन पवित्र ग्रंथों को पढें और इनके प्रक्षेपांशों को नकारते हुए कल्याणकारी सुन्दर बातों को हृदयंगम करने और उनका अनुकरण करने का प्रयास करें.

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38 comments:

डॉ .अनुराग said...

महत्वपूर्ण बात है हम अपने धर्म ग्रंथो से अपने हिस्से ओर अपने स्वार्थ का सच न उठाये ओर किसी परिस्थिति में लिए गए निर्णय को उस वक़्त की भौगोलिक परिस्थितियों ओर समाज के व्यवहार को ध्यान में रखते हुए देखे. ये पुस्तक भी इन्सान द्वारा लिखी गयी है ,जिनका उद्देश्य इतिहास को संजो कर रखना ओर कुछ बातो से सीख लेना है .वर्तमान परिपेक्ष्य में मानवीय बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए क्या सही है क्या गलत इसका आकलन स्वंय करे ...अर्थात धर्म का इस्तेमाल मनुष्य के कल्याण के लिए हो न की उसके विनाश के लिए

Shikha Deepak said...

आप सही कहती हैं। ग्रंथों में गूढ़ ज्ञान को प्रतीकात्मक कथाओं और घटनाओं के मध्यम से समझाया गया है। जरूरत बुद्धि और विवेक से इन पर मनन करने की है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"आवश्यकता यह है की अपनी बुद्धि का उपयोग कर हम इन पवित्र ग्रंथों को पढें और इनके प्रक्षेपांशों को नकारते हुए कल्याणकारी सुन्दर बातों को हृदयंगम करने और उनका अनुकरण करने का प्रयास करें."
सुन्दर आख्यान,
सटीक बात।
बधाई।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत अच्छा लिखा आपने. प्रतिकात्मकता को वास्तविकता समझना ही गलत हो जाता है. कहनियां मे उपमाएं दी गई है. जैसे सुंदरता की तुलना चांद से की गई है तो उसे वास्तविकता पर ना तौले. ऐसे ही शाश्त्रों मे अनेक कहानियों के माध्यम से बात को समझाया गया है. उन्हे मनन करके उनका वास्तविक उद्देष्य समझना चाहिये.

रामराम.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सही और बढ़िया लिखा है आपने ..उस वक़्त जो मान्यताएं बनायी गयी उस में से कई आज के वक़्त में भी बहुत सही लगती है ..पर हम लोग स्वार्थ वश सिर्फ अपने स्वार्थ की बात चुनते हैं

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बहुत ही सही लिखा है आपने....वास्तव में आज तक यही होता आया है कि हम वेद/शास्त्रों/पुराणों में लिखे को सिर्फ कथा-कहानियों के रूप में ही लेते आए हैं, जब कि कथाएं तो मात्र प्रतीकात्मक है, सिर्फ उसमें निहितार्थ मूल त्तत्व को समझने का एक माध्यम भर हैं.किन्तु उस सार त्तत्व को ग्रहण करने के लिए भी हमें अन्तर्मुखी होना होगा.

Manish Kumar said...

Dharmgranthon ka kabhi adhyyan nahin kiya kyunki aisi ruchi nahin rahi.
Geeta juroor thodi bahut padhi kyumki uske shlok sanskrit ki kitabon mein lesson ke bataur the.
Waise aapne is vrihat lekh mein jo vichar prastut kiye hain wo logical hain isliye sahi prateet hote hain.

अनिल कान्त : said...

anurag ji ne baat to bilkul sahi kahi hai

संगीता पुरी said...

बहुत दिन बाद आपको देख रही हूं ब्‍लागिंग की दुनिया में ... बहुत अच्‍छा लगा आपका आलेख।

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

बहुत अच्छा लिखा आपने.
thankx

अल्पना वर्मा said...

आज भी...इसमें राक्षस और देव दोनों ही रूपक या प्रतीक हैं,संस्कृति के विध्वंसक और पोषक के..

बिलकुल सही कहती हैं आप.
हर युग में ऐसा होता आया है..
कई ऐसी बातें भी हैं जो इन ग्रंथों में लिखी है..जैसे शुद्र और नारी के बारे में..तो मेरे ख्याल से उन्हें कभी बात में जोड़ा गया होगा..तब के समाज के अनुसार अपनी सुविधा हेतु.
लेख अच्छा है.
बहुत सी बातें हैं जिन पर आज भी विमर्श की जरुरत है.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

ग्रन्थों का री-इण्टरप्रेटेशन बहुत जरूरी है। यही कारण है कि मैं भग्वद्गीता की अनेक टीकायें खोजता-संग्रह करता फिरता हूं।
यह जरूर है कि इन ग्रन्थों के प्रति मूल श्रद्धा बरकरार रहनी चाहिये।

Arvind Mishra said...

Very well written and convincing article about the subject matters of many of our scriptures which are often misinterpretated by those who naver care to even turn the pages of concerned books.

कुश said...

एक सशक्त लेख! जिसकी जरुरत है आज के समय में..
अक्सर फिल्मो को लेकर मेरे साथ हो जाता है.. मैं कई फिल्मो को बार बार देखता हूँ ऑर हर बार कुछ नया मिल ही जाता है.. धर्म ग्रंथो के साथ छेड़ छाड़ हर युग में हुई है.. आज भी आज से ७०-८० साल पहले के इतिहास में हुई है.. लोगो को राम प्रसाद बिस्मिल, मंगल पांडे जैसे लोगो के बारे में इतना नहीं पता जितना उन्हें गांधी और नेहरु के बारे में पता है.. गांधी को बापू कह दिया नेहरु को चाचा कह दिया बाकी के लोग पता नहीं कहा खो गए.. आने वाले समय में उन्हें जाना जायेगा भी यह नहीं इसमें भी संदेह है.. भला हो राकेश महरा का जिन्होंने 'रंग दे बसंती' फिल्म बनायीं कम से कम लोगो ने भगत सिंह के बारे में कुछ जाना तो सही..

यही हाल धर्म ग्रंथो का भी हो सकता है.. आने वाले समय में अपने अपने मतलब के लिए इनमे संशोधन हो सकता है.. पर स्वविवेक से पढ़कर इनका मर्म समझने का प्रयास करना चाहिए अंत में अनुराग जी की बात का पूर्ण समर्थन करते हुए यही कहूंगा. धर्म का इस्तेमाल मनुष्य के कल्याण के लिए हो न की उसके विनाश के लिए..

आपको एक और बार बधाई इस लेख के लिए..

Parul said...

didi.shiv ji ki lalit nibandh vaali baat yaad aagayi :)..

राधिका उमडे़कर बुधकर said...

आपकी बात बिलकुल सही हैं रंजना जी ,बहुत सटीक लिखा हैं आपने,धर्म ग्रंथो का वचन कई कई बार करने पर ही इनके बारे में टिका टिप्पणी करना योग्य होगा.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बहुत अच्छी लगी आपकी बात !!
- लावण्या

Jayant Chaudhary said...

अति सुन्दर...

सच कहूँ, आपकी कई बातें मेरे पिता जी की बातें याद कराती हैं..
और कई तो मेरे निजी विचारों से बेहद मेल खाती हैं..
और अनेकों नयी बातें सोचने और सीखने में आयी हैं...

आपकी टिपण्णी और सोच बहुत सुन्दर है, यदि सब ऐसा ही सोचे तो कितना अच्छा हो.

मेरे पिता जी कहते हैं..
कई बातें जन साधारण की द्रष्टि से लिखी होती हैं, चमत्कारों और "देवता का कोप" से डरा कर कई काम आम जनता से कराने होते हैं, क्योकि जैसे आपने कहा, भय बिन लोग नहीं मानते...
और कभी लेखक (हम जैसे) उपमा और अलंकारों का प्रयोग कर लेते हैं..

बहुत बधाई हो आपको..

~जयंत

परमजीत बाली said...

प्रत्येक व्यक्ति किसी भी ग्रंथ को पढ कर उसे अपनी बुद्धि व स्वाभावानुसार ही विश्लेष्ण करता है। किसी धार्मिक ग्रंथ की अवमानना करना या ना करना इसी बात पर निर्भर करता है।
आपने अच्छा मंथन किया है।बधाई।

दिगम्बर नासवा said...

बहुत समय के बाद इतना प्रबल और शशक्त लिख पढने को मिला है. स्पष्ट और प्रभावी तरीके से आपने इस बात को रखा है. आज वाकई में हमें जरूरत है अपने अन्दर झाँकने की, क्या हम अपने आप से सच बोल रहे हैं ऐसी कोई भी आलोचना करने से पहले? हमारे ग्रंथों में मुझे नहीं लगता कोई विवादित बात लिखी है.............समय, परिस्थिति की बदलाव को लिखना की भूल नहीं बल्कि आवश्यक है.........जिससे हम कुछ ग्रहण कर सकें. और फिर इतिहासकारों से भी यही माँगा जाता है की समय, परिस्थिति को ज्यों का त्यों उतारा जाए?
हमारे ग्रन्थ एक इतिहास हैं न की कोई एपिक जैसा की पाश्चात्य सभ्यता ने इसे बना दिया सिर्फ अपने स्वार्थ की खातिर. १८ वीं सदी तक रामायण एक एतिहसिक दस्तावेज था जो अंग्रेजों ने एपिक में बदल दिया. और आज के समय में हम से बढ़ कर हमारे ग्रंथों का कोई आलोचक नहीं है ..........इस बात को शायद हम बहुत देर में समझेंगे.

Science Bloggers Association said...

सकारात्‍मक सोच से ओत प्रोत आपका लेख जीवन को उर्जावान बनाने में सहायक है।


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खुशियों का विज्ञान-3
एक साइंटिस्‍ट का दुखद अंत

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

आपने बहुत अच्छा लिखा है।
मैं आप की बात से पूरी तरह सहमत हूँ।

निर्झर'नीर said...

satya ..vachan
samaj in rasto par chalkar hi aman , shanti ,or samaradhi pata hai

सुशील कुमार छौक्कर said...

हम ग्रंथ में लिखे मर्म को कहाँ समझते है। उसकी लिखी सही बात को कहाँ पकड़ पाते है जिसे देखो वही इसका गलत मतलब निकाल लेता है अपने स्वार्थ वश। कही भी इन ग्रंथो में इंसान से नफरत करना नही लिखा पर फिर लोग एक दूसरे से नफरत करते है पर रोज इनका पाठ करते और सुनते है। आपने सही लिखा है। एक अच्छी पोस्ट।

महामंत्री - तस्लीम said...

जब मन दुनिया के जंजाल में बुरी तरह से फंस जाता है, तब इस तरह की रूहानी बातें दिल को बेहद सुकून देती हैं।

----------
TSALIIM.
-SBAI-

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

नमस्कार,
इसे आप हमारी टिप्पणी समझें या फिर स्वार्थ। यह एक रचनात्मक ब्लाग शब्दकार के लिए किया जा रहा प्रचार है। इस बहाने आपकी लेखन क्षमता से भी परिचित हो सके। हम आपसे आशा करते हैं कि आप इस बात को अन्यथा नहीं लेंगे कि हमने आपकी पोस्ट पर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की।
आपसे अनुरोध है कि आप एक बार रचनात्मक ब्लाग शब्दकार को देखे। यदि आपको ऐसा लगे कि इस ब्लाग में अपनी रचनायें प्रकाशित कर सहयोग प्रदान करना चाहिए तो आप अवश्य ही रचनायें प्रेषित करें। आपके ऐसा करने से हमें असीम प्रसन्नता होगी तथा जो कदम अकेले उठाया है उसे आप सब लोगों का सहयोग मिलने से बल मिलेगा साथ ही हमें भी प्रोत्साहन प्राप्त होगा। रचनायें आप shabdkar@gmail.com पर भेजिएगा।
सहयोग करने के लिए अग्रिम आभार।
कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
शब्दकार
रायटोक्रेट कुमारेन्द्र

Vijay Kumar Sappatti said...

ranjana ji , deri se aane ke liye maafi chahunga .. aapne bbahut hi saarthak baat kahi hai .. aur mujhe to ye lagta hai ki dhram ka apna ek judaav hota hai .. aur wahi hame prabhu ke kareeb le jaata hai ..
itne acche lekhan ke liye badhai ..

maine bhi kuch naya likha hai , dekhiyenga jarur.

विजय
http://poemsofvijay.blogspot.com

Vijay Kumar Sappatti said...

ranjana ji , deri se aane ke liye maafi chahunga .. aapne bbahut hi saarthak baat kahi hai .. aur mujhe to ye lagta hai ki dhram ka apna ek judaav hota hai .. aur wahi hame prabhu ke kareeb le jaata hai ..
itne acche lekhan ke liye badhai ..

maine bhi kuch naya likha hai , dekhiyenga jarur.

विजय
http://poemsofvijay.blogspot.com

BrijmohanShrivastava said...

नितांत सत्य है कि ग्रन्थ को जितनी बार पढ़ा या बांचा जाय नई परतें खुलती है और कुछ मन में आई शंकाओं का समाधान भी हो जाता है /" जे श्रद्धा संबल रहित "" वे पढ़ते ही क्यों हैं ,क्या मात्र आलोचना करने के लिए ?जहाँ दुर्गा शप्तशती में राक्षसों के संहार की बात है तो बाबा भी बतला चुके है कि "जिनके ये आचरण भवानी ""राक्षस कौन है उग्र विध्वंसक शक्तियां कभी सफल होती नहीं है -यदा यदा हि धर्मस्व तथा जब जब होय धरम की हानी - के कारण /माँ के वाबत तो आदि शंकराचार्य जी भी कह चुके है -कुपुत्रो जयते क्वचिदपि कुमाता न भवति-नर्क का डर वास्तव में पाप से बचने को ही था लेकिन गरुड़ पुराण लिखने वाले ने अति ही करदी /किसी को इतना भी मत डराओ की वह जी भी न सके / सकल ताड़ना के अधिकारी पर तो बहुत विवाद हो चुका है ,पिष्टपेषण महत्वहीन है / कुछ लोगों की कुतर्की प्रवृत्ति होती है -वे मतलब की बातें और बेतुके प्रश्न लोगों को बड़ा मज़ा आता है /बोले सीता हरण के पूर्व लक्ष्मण ने रेखा तो खींची ही नहीं थी तुलसी जी ने तो यह लिखा है की बन के देवी देवताओं को सौंप कर चले गए थे / एक ने पूछा शत्रुघ्न किसके पुत्र थे -मैंने कहा कि वे कैकई के पुत्र होते तो तू क्या करलेता और वे कैकई के ही थे अब कर तू क्या करना चाहता है /मतलब जबरन खुराफात करने की आदत होती है लोगों की / कुल मिला कर आपका आलेख बहुत बहुत अच्छा होकर आपके गहन अध्ययन को दर्शित करता है /वर्तमान समय में ऐसे लेखों की वास्तविक आवश्यकता है /

mark rai said...

बहुत ही खुबसूरत लिखा है आपने ......
एक श्वेत श्याम सपना । जिंदगी के भाग दौड़ से बहुत दूर । जीवन के अन्तिम छोर पर । रंगीन का निशान तक नही । उस श्वेत श्याम ने मेरी जिंदगी बदल दी । रंगीन सपने ....अब अच्छे नही लगते । सादगी ही ठीक है ।

रवीन्द्र दास said...

dharm kabhi kisi ka nuksan nahi kar sakta.
sanad rahe dharm ka nam aur dharm dono jahir rup se do baten hain.
aur jahan tak vidhvansak shaktiyon ka sawal hai ve sangthit nahi bhay-bhit hain. dara hua janvar anayas hi dusro par hamla karta rahta hai.
main dharm ka adhikari-adhyeta aur shikshak hokar yah bat jor se kah sakta hun k hamse dharm aur dharm ke nam par khel karne valon ko samajhne me kahin chook ho rahi hai.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

आपका आलेख पढ़ा, रुचा...हमारे धर्म ग्रन्थ हमारा इतिहास हैं...समय के साथ भाषा, बिम्ब, प्रतीक, मान्यताएँ बदलने से नव व्याख्या अपरिहार्य है..,दुर्गा सप्तशती की नायिका (केन्द्रीय चरित्र के अर्थ में) वास्तविक है या काल्पनिक? काल्पनिक है तो इसे उपन्यासों की तरह पढ़ कर भुला दें. वास्तविक है तो उसका काल निर्धारण करें...उस काल की भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिस्थितियाँ, नायिका की भूमिका, उसका योगदान, उसके कार्यों का पश्चातवर्ती प्रभाव, वर्तमान में उसे स्मरण करने का औचित्य आदि बिन्दुओं पर अपनी सोच स्पष्ट करें...तब लिखें. अभी तो ऐसा लगता है कि कई बिंदु आप के चिंतन-पथ से बाहर हैं. अगर मैं गलत हूँ तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी...आप के प्रति स्नेह भाव से ही लिख रहा हूँ. तात्विक विश्लेषण में मानसिक श्रद्धा तटस्थता में बाधक नहीं साधक हो सके तो सार तत्व की प्राप्ति हो पाती है.
राक्षस राज रावण सीता का हरण करने के बाद उसे लम्बे समय तक कैद में रखने पर भी उनकी सहमति के बिना उनसे दैहिक सम्बन्ध नहीं बनता...तालिबानी सैंकडों स्त्रियों की आबरू की धज्जियाँ उड़ाते हैं, रावण या अन्य राक्षसों ने स्त्री शिक्षा कब रोकी? तालिबान स्त्री शिक्षा को अधर्म बता रहे हैं. दोनों में कोई समता नहीं. देवासुर संग्राम की भूमि वही है जहाँ तालिबानी हैं. तब सुर (शुभ-सत्य के पक्षधर) मिलकर उन्हें हरा सके थे, अब? कभी दुर्गा ने जो किया क्या आज कोई...? अनेक बिंदु हैं. अपनी चिन्तन-यात्रा को और प्रशस्त होने दें...शुभकामनायें.

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह सार्थक आलेख के लिये साधुवाद

Science Bloggers Association said...

रंजना जी, बहुत दिन हुए आपकी नई पोस्ट आए।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

"मुकुल:प्रस्तोता:बावरे फकीरा " said...

वर्तमान में भले ही समयातीत हो चुके हैं . मुझे भी कर्मकांड से अरुचि सी है क्योंकि एक पंडित इसे
जिस तरह से प्रस्तुत करता है वो गलत है . इसके सटीक उदाहरण हैं प्रयाग राज के पंडे जो गिरोह बंद होकर
भावुक मन को धर्म के नाम पर ब्लेक-मेल करते हुए क्षतिग्रस्त करतें पावन व्यवस्थाओं को . इसका अर्थ ये कदापि नहीं
की मूल रूप से कर्मकान्ड सदैव गलत है.

जितेन्द्र दवे said...

सटीक विश्लेषण, सुन्दर लेखन, आपकी लेखनी को मेरा नमन.
सादर शुभकामनाओं सहित..

sa said...

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अपनीवाणी said...

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