30.3.09

श्रद्धा पूजा आधार वही !!!

पथ के कंटक गुंथ ह्रदय मेरे,
जिस पल भी व्याकुल करते हैं.
सब ताप मेरे संताप मेरे,
उन नयनो में घिर झरते हैं.



उन अश्रु कणों के सागर में,
आकंठ निमग्न अस्तित्व मेरा,
जलधि बाहर क्योंकर आऊं,
जो जल ही जीवन सार निरा.



व्रत रक्षा स्नेह समर्पण का,
वह पूर्ण प्रतिष्ठित करता है.
मेरे सुख भर के ही निमित्त,
अपनी हर सांस वह धरता है.



मैं ध्येय हूँ उसके जीवन का,
वह ईश मेरे मन मंदिर का,
कर दिया समर्पित निज अवगुण,
प्रतिरूप है वह परमेश्वर का.



मेरे रोम रोम वह ही रमता,
बन रक्त शिराओं में बहता.
उसके बिन मैं जल बिन मछली,
मेरे बिन वह भी चातक सा.



श्रद्धा पूजा आधार वही,
सपना सुन्दर संसार वही.
वह संग चिरायु सतत रहे,
मेरा तो साज सिंगार वही...

49 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

मेरे रोम रोम वह ही रमता,
बन रक्त शिराओं में बहता.
उसके बिन मैं जल बिन मछली,
मेरे बिन वह भी चातक सा.

सुंदरतम प्रार्थना. शुभकामनाएं.

रामराम.

संगीता पुरी said...

उत्‍तम रचना ... सुदर प्रार्थना ... बधाई एवं शुभकामनाएं।

दिगम्बर नासवा said...

मैं ध्येय हूँ उसके जीवन का,
वह ईश मेरे मन मंदिर का,
कर दिया समर्पित निज अवगुण,
प्रतिरूप है वह परमेश्वर का.

सुन्दर....अति उत्तम है यह रचना, अद्भुद सोच है समर्पण की,
प्रार्थना की घंटियों सा कोमल और पवित्र एहसास होता है इस रचना को पढ़ कर.
हर छंद गीत मय,

रंजना [रंजू भाटिया] said...

मेरे रोम रोम वह ही रमता,
बन रक्त शिराओं में बहता.

सुन्दर भाव और सुन्दर एहसास लगा आपकी इस रचना में ...

कुश said...

गणगौर के इस पावन पर्व पर इतनी सुंदर रचना.. यदि ऐसी ही यदि दोनो पक्षो क़ी भावनाए ऐसी ही हो जाए तो जीवन सुखो का समंदर बन जाए.. आपकी लिखावट ने फिर एक बार मन मोह लिया है..

अनिल कान्त : said...

बहुत ही सुन्दर भाव और सुन्दर एहसास लिए हुई रचना

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

शोभा said...

व्रत रक्षा स्नेह समर्पण का,
वह पूर्ण प्रतिष्ठित करता है.
मेरे सुख भर के ही निमित्त,
अपनी हर सांस वह धरता है.

वाह बहुत सुन्दर लिखा है।

mehek said...

मेरे रोम रोम वह ही रमता,
बन रक्त शिराओं में बहता.
उसके बिन मैं जल बिन मछली,
मेरे बिन वह भी चातक सा.

waah kya baat hai sunder bhav,sunder shabd,sunder alankar,bas man moh liya.

रवीन्द्र दास said...

vah,kya hi samarpan ke sundar bimb! anubhuti-purn aur marm-sparshi! bahut santulit.

कंचन सिंह चौहान said...

उन अश्रु कणों के सागर में,
आकंठ निमग्न अस्तित्व मेरा,
जलधि बाहर क्योंकर आऊं,
जो जल ही जीवन सार निरा.

bahut sundar kaha...!

Manish Kumar said...

पसंद आई आपकी ये कविता।

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ said...

परम्परागत भाषा शैली और सुन्दर भवनाओं के साथ एक मनोहारी रचना - शुभकामना

Arvind Mishra said...

स्नेह समर्पण की भावपूर्ण अभिव्यक्ति !

मा पलायनम ! said...

श्रद्धा पूजा आधार वही,
सपना सुन्दर संसार वही.
वह संग चिरायु सतत रहे,
मेरा तो साज सिंगार वही.....
बहुत सुंदर भावाभिब्यक्ति ,पुरानी तर्ज़ पर लिखी एक पठनीय रचना .आनन्द आ गया .

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" said...

ek bahut hi sundar bhaav poorn aur cjintan karne yogy rachna .
- vijay

navneet sharma said...

aap ka blog bhavpuran aur bahut sachcha sa laga. kavita sunder hai.
navneet sharma

R.K. said...

muje aakhiri para bahut achha laga !!

Achhi kavita likhte hain aap !!

:)

निर्झर'नीर said...

lagta tha ki aap gadh jyada khoobsurat likhti hai par aaj ye kavita padhii to laga ki aap jo bhi likhti hai bahot khoobsurat likhti hai ..jin shabdo ka priyog aapne kiya hai yakinan aapki kabliyat ka aaina hai..

मैं ध्येय हूँ उसके जीवन का,
वह ईश मेरे मन मंदिर का,
कर दिया समर्पित निज अवगुण,
प्रतिरूप है वह परमेश्वर का.

मेरे रोम रोम वह ही रमता,
बन रक्त शिराओं में बहता.
उसके बिन मैं जल बिन मछली,
मेरे बिन वह भी चातक सा.

samarpan ka jo bhaav aapne kavita mein bhara hai ..uske liye koi shabd nahii hai.

bandhai hoo .

मोना परसाई "प्रदक्षिणा" said...

मैं ध्येय हूँ उसके जीवन का,
वह ईश मेरे मन मंदिर का,
कर दिया समर्पित निज अवगुण,
प्रतिरूप है वह परमेश्वर का.
sundar bhav sashkt abhivykti

poemsnpuja said...

बेहद खूबसूरत लिखा है रंजना जी...मन मोह लिया आपकी इस कविता ने.

Science Bloggers Association said...

श्रद्धा पूजा आधार वही,
सपना सुन्दर संसार वही.
वह संग चिरायु सतत रहे,
मेरा तो साज सिंगार वही...

बहुत सुन्‍दर पंक्तियॉं हैं। बधाई।

-----------
तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

सुशील कुमार छौक्कर said...

सुन्दर भाव सुन्दर जज्बात। बहुत ही बेहतरीन लिखा है आपने वाह जी वाह क्या बात।

राज भाटिय़ा said...

मेरे रोम रोम वह ही रमता,
बन रक्त शिराओं में बहता.
उसके बिन मैं जल बिन मछली,
मेरे बिन वह भी चातक सा.
बहुत ही सुंदर कविता. अति सुंदर भाव लिये.
धन्यवाद

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत सुन्दर रचना, बधाई!
समानी व आकूति समाना हृदयानि वः
समानमस्तु वो मनः यथा वः सुसहासति

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

सुँदर कविता लगी
बहुत खूब जी :)

मीत said...

अद्भुत. बेमिसाल.

Neeraj said...

Ranjana ji,
Hindi ka itna achchha prayog aaj bhi dekhkar sukoon milta hai...
Thumbs-up...

Manoshi said...

श्रद्धा पूजा आधार वही,
सपना सुन्दर संसार वही.
वह संग चिरायु सतत रहे,
मेरा तो साज सिंगार वही...

ये बात मन के क़रीब लगी बहुत...वाह!

अल्पना वर्मा said...

मेरे रोम रोम वह ही रमता,
बन रक्त शिराओं में बहता.
उसके बिन मैं जल बिन मछली,
मेरे बिन वह भी चातक सा.
--------
पथ के कंटक गुंथ ह्रदय मेरे,
जिस पल भी व्याकुल करते हैं.
सब ताप मेरे संताप मेरे,
उन नयनो में घिर झरते हैं.


कितना सुन्दर लिखा है रंजना जी आप ने!
बहुत ही खूबसूरत है पूरी कविता..मन के भाव जैसे बोल उठे हैं.
सरल सहज शब्दों से गुंथी यह प्रेम और समर्पण भरी कविता मन में उतर गयी .

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बहुत भाव पूर्ण....
सुन्दर अभिव्यक्ति.
==================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

prasanna vadan chaturvedi said...

श्रद्धा पूजा आधार वही,
सपना सुन्दर संसार वही.
वह संग चिरायु सतत रहे,
मेरा तो साज सिंगार वही...
-सुंदर भाव पूर्ण कविता,सुन्दर अभिव्यक्ति.

Harkirat Haqeer said...

मेरे रोम रोम वह ही रमता,
बन रक्त शिराओं में बहता.
उसके बिन मैं जल बिन मछली,
मेरे बिन वह भी चातक सा.

वाआह...! रंजना जी बहुत अच्छा लिखती हैं ....छंद बढ़ कविताओं में महारत हासिल है आपको...!!

दर्पण साह 'दर्शन' said...

श्रद्धा पूजा आधार वही,
सपना सुन्दर संसार वही.
वह संग चिरायु सतत रहे,
मेरा तो साज सिंगार वही...


wah !!

prasanna vadan chaturvedi said...

Ranjana ji,
Namaskaar,
thanks for comment on my ghazal.Plz see every week new ghazal.
- prasanna vadan chaturvedi

neera said...

मासूम और प्यारी कविता!

Pyaasa Sajal said...

sahi aur shudh hindi ka kitna sundar prayog :)

अवाम said...

बहुत ही सुन्दर रचना
आपके ब्लॉग पर आना अच्छा लगता है..
शुभकामनायें..

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

ब्लॉग जगत में और चिठ्ठी चर्चा में आपका स्वागत है . आज आपके ब्लॉग की चर्चा समयचक्र में ..

ajit.irs62 said...

khubsurat hai.achha blog hai . shubhkamnayen.
AJIT PAL SINGH DAIA

SUNIL KUMAR SONU said...

khojoge kise yahan pe
ki har dagar bhul-bhulaiya he.
koi tere apne mil jaye
to ise ittefaq hi samjho.

SUNIL KUMAR SONU said...

khojoge kise yahan pe
ki har dagar bhul-bhulaiya he.
koi tere apne mil jaye
to ise ittefaq hi samjho.

मीत said...

सुंदर बहुत सुंदर बिलकुल मेरी पसंद की बात की है... मुझे हिंदी बहुत अच्छी लगती है...
मेरी होसला अफजाई के लिए बहुत आभार
मीत

श्यामल सुमन said...

बेहतरीन रचना। प्रशंसनीय।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Rajat Narula said...

bahut sundar rachna hai...

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

sarv pratham namaskaar ranjana ji , aap ki saari rachnaye bahut hi acchi lagi aap bahut achha likhti hai asha hai yese hi likh kar hum jaise chote likhne ke utsuk vyakti ka manobal badhati rahegi
dhanybaad

Hemant Snehi said...

एक निर्मल हृदय के सुंदर भावों की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति. हार्दिक बधाई.

kaustubh said...

अच्छी कविता है । शब्दों में थोड़ी क्लिष्टता है, पर भावों में गहराई है । मेरी भी एकाध रचनाएं मेरे ब्लाग कोलाहल पर देखी जा सकती हैं । वैसे बताना चाहूंगा कि जमशेदपुर में मै भी तकरीबन चार साल तक रहा हूं । 2004 से 08 तक । वहां हिन्दुस्तान अखबार में उपसंपादक था ।

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

मेरे रोम रोम वह ही रमता,
बन रक्त शिराओं में बहता.
उसके बिन मैं जल बिन मछली,
मेरे बिन वह भी चातक सा.
samarpan aur yekatv ki parakastha hai
saadar
praveen pathik
9971969084

sa said...

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