17.7.09

बेटी - लक्ष्मीस्वरूपा....

पिताजी की चिट्ठी आई थी,माँ की तबियत कुछ खराब है,तुमसे मिलने की जिद ठाने हुए है,हो सके तो दो दिन के लिए आकर मिल जाओ...चार दिन बाद से थर्ड ईयर के पेपर शुरू होने वाले थे...मैं ऊहापोह में था कि क्या करूँ...लेकिन माँ का मोह सब पर भारी पड़ा और मैं स्टेशन की तरफ निकल पड़ा...सोचा ,जल्दी से जाकर पहली ही ट्रेन पकड़ लूँ और मिलकर कल रात तक वापस आ जाऊं...स्टेशन की तरफ तेज कदमो से बढा चला जा रहा था, दस फर्लांग की ही दूरी बची होगी कि ट्रेन खुल गयी...बदहवास सा मैं दौड़ पड़ा...पर भीड़ में घिरा मैं आगे बढ़ने में असमर्थ रहा और मेरे सामने से सीटी बजाती हुई ट्रेन निकल गयी....


दिमाग सीटियों के शोर से भर गया.....बार बार लगातार किसी न किसी प्लेटफार्म पर सीटियों का जैसे सिलसिला सा चल निकला....उस कनफोडू शोर से बचकर भागने के लिए मैं तेजी से स्टेशन से बाहर की ओर भागा... कि अचानक किसी के सामन से मेरा पैर टकराया और गिरते हुए मैं सीढियों से नीचे चला गया ........


तभी अचानक आँख खुली....अपने चारों तरफ आँखें फाड़ फाड़ कर देखने लगा...सारे दृश्य गायब हो चुके थे.....मैं स्टेशन पर नहीं अपने कमरे में था और अपने बिस्तर से नीचे गिरा हुआ था....लेकिन सीटियों का शोर अब भी वैसा ही था...तभी तंद्रा कुछ भंग हुई और आभास हुआ कि यह शोर सीटियों का नहीं बल्कि लगातार बजते कॉल बेल का था ... दीवार पर लटके घडी पर नजर डाली तो देखा रात के सवा दो बज रहे हैं....


आशंकित सा आगे बढ़ बत्ती जलाते हुए मैंने दरवाजा खोला....एक औरत और मर्द आकर पैरों से लिपट गए....हतप्रभ सा होते हुए मैं पीछे हटने लगा...बड़ी मुश्किल से किसी तरह मैंने उनसे अपने पैर छुडाये....वे खड़े हुए तो पहचाना, गली के अगले छोर पर रहने वाले अम्मा और झुमरू हैं....दोनों घिघिया रहे थे....डाक्टर बाबू रधिया को बचा लो,नहीं तो वह मर जायेगी.


पता चला दो दिनों से उसे जचगी का दर्द उठा हुआ था,पर दाई जचगी करवा नहीं पा रही थी और अब हारकर उसने राधा को अंग्रेजी डाक्टर को दिखने की बात कही थी....मैंने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की कि मैं इसमें कुछ नहीं कर पाउँगा ,वे लोग राधा को लेकर तुंरत अस्पताल के लिए निकल जाएँ...पर उन्होंने ऐसी जिद ठान रखी थी कि आखिर झुककर मुझे वहां जाना ही पड़ा....


जाकर देखा तो सचमुच राधा की स्थिति बहुत खराब थी...बच्चे की धड़कन सुनने की कोशिश की तो वह भी बिलकुल क्षीण हो रही थी....मैंने उनसे अपनी लाचारी बताई और कहा कि अब ज़ल्द से जल्द अस्पताल ले जाकर ओपरेशन करवाए बगैर उन्हें बचाने का कोई उपाय नहीं...


उन लोगों की स्थिति देख मेरा दिल पसीज गया और फिर मैंने अपने एक सीनियर के बड़े भाई के नर्सिंग होम में बात कर किसी तरह केस लेने को उन्हें मनवाया...मेरी निगरानी में दो ओटो रिक्शाओं में बैठकर वह काफिला मेरे संग नर्सिंग होम पहुंचा....


प्रारंभिक जांच के बाद कहा गया की अभी दस मिनट के अन्दर अगर ओपरेशन न किया गया तो जच्चा बच्चा दोनों में से किसी का भी बचना नामुमकिन था...और ओप्रेशन के लिए तुंरत ही पच्चीस हजार रुपये जमा करना था.....


मैं पेशोपेश में पड़ गया....मेरे पास पचीस हजार क्या ढाई सौ रुपये भी न थे और इतनी बड़ी रकम इनके पास होने की कोई सम्भावना मुझे नहीं दिख रही थी...मेरे माथे की शिकन को देख अम्मा ने मानो सब ताड़ लिया....कहने लगी, पैसे की कोई चिंता नहीं बाबू, मैं तीस हज़ार रुपये साथ लेकर आई हूँ ...और जरूरत पड़ी तो भी दिक्कत नहीं सब इंतजाम हो जायेगा,बस आप माई बाप लोग मेरी बच्ची को बचा लीजिये......


सीनियर डाक्टर से रिक्वेस्ट कर मैं भी आपरेशन थियेटर में गया....दो दिनों तक दाई ने जो युक्तियाँ लगायी थी,इससे केस बड़ा ही कॉम्प्लीकेटेड हो गया था...बच्ची के गले में नाड़ इस कदर फंसी हुई थी कि वह बच्ची का दम घोंट रही थी....लग रहा था जैसे गर्भ में ही उसे फांसी की सजा मिल गयी थी..बड़ी मुश्किल से बेजान पड़ी उस बच्ची में जान लायी गयी.....


सबकुछ कुशल मंगल देख मैंने रहत की साँस ली.....डॉक्टर जबतक स्टिचिंग तथा सफाई में लगे हुए थे,मैंने सोचा बाहर जाकर इनके अपनों को यह खबर दे आऊँ....जैसे ही बाहर निकला सबने आकर मुझे घेर लिया...मैं थोडी दुविधा में था,कि बेचारों का इतना पैसा लग भी गया और तीसरे संतान के रूप में फिर से लडकी होने की खबर इन्हें मायूसी ही देगी.......मैंने धीमे से कहा.....चिंता की कोई बात नहीं,सब कुशल मंगल है,राधा को लडकी हुई है.......


मैं अचंभित रह गया.......सब लोग खुशी से झूम उठे थे,एक दुसरे के गले लग रहे थे....अम्मा की आँखों में खुशी के आँसू झड़ी बने हुए थे.....खुशी से कांपती हाथों से मेरा हाथ पकड़ बोली.. ...बचवा तुम्हारे मुंह में घी शक्कर.......हमारे घर तो लछमी आई हैं....तुम हमारे लिए भगवान् हो....सदा सुखी रहो बेटा...खूब बड़े डाक्टर बनो....


सब निपटते निपटते सुबह हो गयी थी....घर पहुंचकर हाथ मुंह धो, मैं कॉलेज होस्टल की ओर निकल पड़ा...वहां अपने सहपाठी अशोक के साथ अगले पेपर की तैयारी और विषय चर्चा करते करते समय का ध्यान ही न रहा.....जब पेट में भूख के मडोड़े पड़ने लगे तो समय का ध्यान आया...रात के दस बज चुके थे...वहीँ पर खाना खा मैं करीब साढ़े ग्यारह बजे अपने घर पहुंचा....


दरवाजे के बाहर अम्मा बैठी थी..पढाई के चक्कर में यह बात दिमाग से निकल ही चुकी थी...मुझे लगा कहीं कुछ और असुविधा तो नहीं हो गयी,जो अम्मा इतनी रात गए दरवाजे के बाहर बैठी है...

मैंने चिंतित होकर पूछा ...क्या अम्मा फिर से कोई परेशानी हो गयी क्या...उसे हमेशा इसी नाम से पुकारा जाते सुना था, सो यही संबोधन दिया.


अम्मा बोली....अरे नहीं बचवा ,कोई परेशानी नहीं...तुम तनिक किवाडी तो खोलो, फिर बताती हूँ...थोडा तो मैं झिझका ,पर फिर भी उस आवाज में जो आग्रह, अपनापन और हर्ष था ,मैं कुछ कह न सका...


दरवाजा खोलते ही वह अन्दर आई और उसने मेरे हाथ पकड़ एक घडी मेरे हाथों में पहना दी और मिठाई का एक डब्बा मेरे मेज पर रख दिया.....मैं अचकचा गया....यह क्या है अम्मा?????


अम्मा बोली, बचवा हम गरीब का यह भेंट तो तुम्हे स्वीकारना ही पड़ेगा,नहीं तो हमें किसी कल भी चैन नहीं पड़ेगा...अगर तुम न होते तो हमारी रधिया निश्चित ही मर जाती और उसके साथ वह लछमी भी मर जाती....अब हम लोगों को कोई डाक्टर बैद अपने यहाँ घुसने थोड़े ही न देता....तो बोलो तुम भगवान् हुए की नहीं....


मैं संकोच में गडा जा रहा था....मैंने कहा...अरे नहीं अम्मा डाक्टर के लिए सब मरीज मरीज ही होता है....उसे भेद करना नहीं सिखाया जाता....यह तो हम सब का फर्ज है,इसके लिए इतना महंगा तोहफा मैं नहीं ले सकता....तुम लोग ऐसे ही जिस नर्क में रह रहे हो,मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा हूँ...इसपर यह तो मैं नहीं ही ले सकता...मुझे तो खेद इस बात का है कि मैं आर्थिक रूप से तुमलोगों की कोई मदद न कर पाया.....


हम दोनों ही भावुक हो गए थे...हालाँकि इस घटना से पहले हम दोनों में कभी कोई बात नहीं हुई थी,जब कभी कोई बीमार पड़ता तो झुमरू मेरे पास आकर दवाई लिखवा जाता था,इसके आगे हमारा कोई परिचय न था, पर नितांत अपरिचित होते हुए भी जैसे हम एक दूसरे की भावनाओ और स्थिति से पूर्णतः भिज्ञ थे...वे लोग जानते थे कि किस मजबूरी में मैं इस गंदी बस्ती में रह रहा हूँ और मैं भी जनता था कि वे लोग कैसी जिन्दगी जी रहे हैं....


मैंने अपने जीवन का लक्ष्य ही यह बना लिया था कि पढाई ख़तम कर जब मैं डॉक्टर बन जाऊंगा तो इन जैसे उपेक्षित लोगों की सेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता दूंगा.... पता नहीं कैसे बिना बताये ही मेरी यह भावना उन तक पहुँच गयी थी....मेरे लिए उनके मन में क्या था ,यह मैं उनकी आँखों में सहज ही दूर से आते जाते पढ़ पाता था...


उस क्षण भावुकता में मेरी बुद्धि ऐसे सठिया गयी थी कि बिना कुछ सोचे समझे मैं पूछ बैठा.....

लेकिन अम्मा, तुंरत के तुंरत इतने रुपये का इंतजाम तुमने कैसे कर लिया,मैं तो घबरा ही गया था कि पैसों का इंतजाम कैसे होगा.........


अम्मा ने कहा...बेटा जब ऊपर वाला जीवन देता है तो उसे चलाने के रस्ते भी दे देता है....अब देखो न,एक रधिया ही तो है जिसे भगवान् ने इतनी खूबसूरती दी है कि दो बच्चे बियाने के बाद भी सबसे ज्यादा कमाई वही करती है..एक तरफ सातों लड़कियों की कमाई है और दुसरे तरफ अकेले रधिया की कमाई है....उसने बच्चे भी ऐसे खूबसूरत दिए हैं ,जिनसे हमारा घराना रौशन है.


हमारे घर की कमाऊ पूत तो वही है....उसे ऐसे कैसे मर जाने देते...और ये पैसे भी तो उसी के भाग के हैं,जो उसके इलाज में लगे....चार दिन पहले ही उसकी बड़ी लडकी निशा की नथ उतराई में पच्चीस हजार रुपये मिले थे,जो इस उल्टे समय में काम आ गए....


मेरे दिमाग की नसें फटी जा रही थीं, मेरी आँखों के सामने उन बच्चियों का चेहरा घूम गया,जिन्हें आते जाते गली में खेलते हुए देखा करता था....मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया.........लेकिन अम्मा वो तो अभी इतनी छोटी सी मासूम बच्ची है....


अम्मा बोली....बच्ची काहे की बाबूजी,बारह बसंत देख लिए हैं उसने....

......................................................................................................................................

79 comments:

सैयद | Syed said...

आपने कहानी में ज्यों ही यु टर्न लिया, कहानी के नायक की तरह ही मेरे दिमाग की नसें भी फटी जा रही है...

Udan Tashtari said...

ओफ्फ!! यह अंत होगा कथा का..सोचा भी न था..लेखन की पकड़ को सलाम!! बिल्कुल सधा हुआ.

संगीता पुरी said...

क्‍या कहूं ? दिमाग सन्‍न रह गया पढकर .. कमाल का लेखन है।

अंशुमाली रस्तोगी said...

अच्छी कहानी।

महामंत्री - तस्लीम said...

Yahi to hamare samaj ka dur bhagya hai.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

"अर्श" said...

SHURUYAAT JAB KAHAANI KI PADHI TO LAGAA KI KISI FILM KI TARAHI HI ANT HONE WAALA HAI BICH ME PADHATE PADHATE AANKHEN THODI NAM HUI MAGAR AAKHIR ME MAN GHRINIT HOGAYA KARTUTON SE .... MAN SANN AUR AAHAT HO GAYAA KYA AISAA SACH ME HOTA HAI ... BAS KAHAANI TAK HAI YE YAHI JAANKAR THIK HAI MAGAR KYA PATAA AISAA SAHI ME HOTA BHI HO.....


ARSH

अनिल कान्त : said...

अच्छी क्या ...बहुत बहुत अच्छी कहानी...अंत को इस तरह मोड़ देने की कला को सलाम

M VERMA said...

बहुत मार्मिक -- इतना मार्मिक् सत्य और दिमाग के सुन्न हो जाने से ही इस बेजोड कहानी की सफ़लता का अन्दाजा लगाया जा सकता है. पर ये भी तो सत्य है हमारे समाज की व्यथा है.
बहुत सुन्दर औ अद्वितीय रचना.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

उफ्फ्फ बहुत मार्मिक कहानी है ...बहुत दर्दनाक अंत किया है ..बारह बसंत देख लिए यह शब्द निशब्द कर गए ..

Nirmla Kapila said...

उफ्फ शब्द मूक हो गये हैं बहुत मार्मिक कहानी है इसे लिखते हुये कितना दर्द सहा होगा--- कैसे जीया इस कहनि को ऐसी कहानी लिख कर मै तो कई दिन उदास रहती हूंम आभार्

ओम आर्य said...

उफ बहुत ही मार्मिक कविता है .....पढने के बाद मन पुरी तरह से करुणा से भर गया है .....बेहरीन अभिव्यक्ति ......लिखते रहे ......बच्ची काहे की बाबूजी,बारह बसंत देख लिए हैं उसने....
इन पंक्तियो पर कलेजा बाहर को आ रहा है.......

Kishore Choudhary said...

संवेदनशील
कमोबेश हर नगर के आस पास कुछ जाति विशेष में इन प्रथाओं ने अपनी जड़ें इतनी गहरी जमा ली हैं और उनके उद्धार की कामना व प्रयास लचर से ही रहे हैं. आपकी कहानी एक ताना बुन कर जाने कितनी ही उम्मीदें जगाती है जिन पर तुषारापात होने क्षण भर भी नहीं लगता.

श्यामल सुमन said...

कहानी तो मजे के साथ पढ़ रहा था, लेकिन अंत ने झकझोर दिया। और शब्द नहीं हैं मेरे पास।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

लता 'हया' said...

शिल्प और कथ्य की दृष्टि से ये एक बेजोड़ कहानी है...अंत तो चौकाने वाला है और शायद वो इस कहानी का सबसे शशक्त पक्ष भी.आपकी लेखनी सतत ऐसी अनूठी कहानियों की रचना करती रहे ये ही प्रभु से प्रार्थना है.
लता

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत आश्चर्यचकित करने वाला अंत हुआ कहानी का. अंत आने के पहले यह बिल्कुल उम्मीद नही थी. बहुत सशक्त. शुभकामनाएं.

रामराम.

surender said...

bahut he achhi rachna hai...
bina palak jhapkaaye poori padhi...
doob sa gaya tha...
keep it up...thanks..

mehek said...

sach behad marmik kahani,aakhir aisa hoga socha na tha.sahi lekhan bahut umda raha,aakhari line tak palak tak nahi jhapki.

dr. ashok priyaranjan said...

nice story

http://www.ashokvichar.blogspot.com

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

ये भी एक दुनिया है !
:-(
- जिसका सच
आपने बखूबी बयान किया
और सशक्त कथा लिखी है
रँजना जी
लिखती रहेँ
स्नेह सहीत,
- लावण्या

Arvind Mishra said...

वाह अद्भुत -कहानी ने तो कुश की लेखनी को भी पटखनी दे दी !अपने कहानीपन ,औत्त्सुक्य भाव और क्लाईमैक्स में तो यह निसंदेह एक बेजोड़ रचना है -पर यह कितनी यथार्थवादी है और कितनी महज एक लेखकीय कौशल का निर्वाह यह विचारणीय हो सकता है -बहरहाल जो भी हो कहानी का अंत दहलाने वाला है -एक आदर्शवादी (सोच ) /चिकित्सक की यह दुर्गति ? कहानी का मोरल आखिर क्या हुआ रंजना जी ?

संतोष कुमार सिंह said...

पिंकी इस देश की बेटी हैं जिसे कुछ दरिंदो ने इस हालात में पहुचा दिया हैं जहां से बाहर निकलने में आप सबों के प्यार और स्नेह की जरुरत हैं।

गौतम राजरिशी said...

अंत झकझोड़ गया...एक सफल कहानी...अत्यंत प्रभावी!
इस सशक्त लेखनी को सलाम, मैम!

श्याम सखा 'श्याम' said...

कहानी में नदी सी सहज रवानी थी बाद में तो नदी किनारे तोड़ बाढ में बदलकर झंझोड़ गई सशक्त कहानी पर बधाई
श्याम सखा श्याम

shiva jat said...

बहुत अच्छा लिखा है
आप कृपा करके एक बार मेरा भी ब्लोग भी पढकर देखें
http://jatshiva.blogspot.com

Shiv Kumar Mishra said...

बढ़िया कहानी.
असल में सच का सामना यह हुआ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सारगर्भित लेखन के लिए बधाई।

रचना त्रिपाठी said...

मुझे तो लगा एक गरीब ने इस समाज को कितना अच्छा संदेश दिया। मगर ए क्या?
मन झकझोंर कर रख दिया।
बहुत अच्छी लेखनी है आपकी। बधाई हो।

डॉ .अनुराग said...

सोचता रहा की आप कहानी का अंत कैसे करेगी...अंत ने यू टर्न लिया...लेना लाजिमी थी..असल .जिंदगी की हैप्पी एंडिंग कम ही होती है...वैसे आपकी इस कहानी में कई सचाइया भी है.....

रश्मि प्रभा... said...

मौन कथानक के मध्य हूँ......

vikram7 said...

मार्मिक, मन को छूती , बधाई

कुश said...

कहानी में जो कसावट होनी चाहिए वो आपकी कहानी में बिल्कुल मिली.. अप्रत्याशित अंत की उमीद तो थी पर इस तरह का टर्न लेगा ये तो दिमाग़ के किसी भी कोने में नही था.. अच्छा हुआ जो ये पोस्ट मुझसे मिस नही हुई.. और भी कुछ कहना है.. फ़ोन करूँगा आपको..

सुशील कुमार छौक्कर said...

मार्मिक। आपकी लेखनी झकझोर देती है। और पाठक बस सोचता रहता है।

HARI SHARMA said...

बहुत से टिप्पणीकारो़ को अन्त ने विस्मित किया लेकिन जब ३०००० रुपये खर्च करने के बाद अम्मा तीसरी लडकी होने पे खुश हुई तो खटका लगा ऐसे ही अन्त का.

कुछ साथियो़ ने कहा कि ये कहानी ही हो सत्य नही़ हो, हम सत्य के सामने घबराते क्यू है़?

अम्मा के नैतिक मूल्यो़ के हिसाब से जो वो कर रही थी वो सही था. और बेचारे डाक्टर से गल्ती कहा हुई? कोई डाक्टर मरीज के इलाज़ से पहले उसके पेशे का प्रूफ़ मा़गता है क्या ?

ये कहानी जिस्मफरोसी की दुनिया के सुख और दुख पर गहरा प्रकाश डालती है जिन्हे जिस्म्फरोसी की बात सुनके घिन आती है वो ये भी जाने कि हमारी मा़ बहने़ इस कीचड से सिर्फ़ इसलिये बची हुई है़ क्योकि बस्ती बस्ती कुछ लोगो़ ने इस जहर को पीना अपनी नियति और पेशा बना लिया है.
"बच्ची काहे की बाबूजी,बारह बसंत देख लिए हैं उसने...." ये कथन मुझे भी चिन्तित करता है लेकिन इसे उन्के जीवन मूल्यो़ के सन्दर्भ मे़ देखे़.

रचना जी आपकी लेख्नी मे़ जादू है.

ललितमोहन त्रिवेदी said...

रंजना जी ,विषयवस्तु और शिल्प दौनों दृष्टियों से आपकी कहानी बहुत मार्मिक है ! कहानी की punch लाइन...' अम्मा बोली....बच्ची काहे की बाबूजी,बारह बसंत देख लिए हैं उसने....' आपकी सिद्धहस्तता का प्रमाण है ,पूरी कहानी झकझोर देने वाली है पर यह सत्य भी तो समाज का एक हिस्सा ही है !सजीव और परिपक्व रचना के लिए आप निश्चय ही बधाई की पात्र हैं !

रविकांत पाण्डेय said...

ओह! दर्दनाक कहानी। कहानी क अंत झकझोर गया।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

यह पढ़ते हुये मालवा की बांछड़ा जाति कि याद हो रही थी - और अंतत: वही निकला!
मैं उस जाति को समझ न पाया।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

कया कहूं रंजना जी, बस अपना एक शेर है:
बेबसी की दास्ताँ है किस्से क्या-क्या बूझिये
कस्साब की दरयादिली इन बकरियों से पूछिए

दिगम्बर नासवा said...

प्रवाह में चलते चलते कहानी में इतना मार्निक टर्न आया की मन विषाद से भर गया............. साहित्य समाज का आइना ही होता है........और आज भी हमारे समाज में ऐसे कुरीतियाँ, ऐसे लोग मौजूद हैं जो इन पात्रों को जीते हैं....... आपका अंदाज इतना धाराप्रवाह है की एक ही सांस में पूरी कहानी पढी जाती है..........

कंचन सिंह चौहान said...

देर से आने के लिये क्षमा दीदी....!

कहानी पढ़ने के साथ ही गरीबी में भी तीसरी बेटी के लिये इतना खुश होना कुछ कुछ भान कराने लगा था अंत का। लक्ष्मी कहाँ इतनी पूज्य होती है जब तक वो इस तरह धन वर्षा का कारण ना हो...!

बहुत ही संवेदनशील और क्रूर सत्य को विषय चुना आपने..! ये सच सच ही है...! क्रूर सच...!

संजय सिंह said...

सत्य कड़वा तो होता है, परन्तु इतना कड़वा... सर चकरा रहा है.
आपने अच्छा लिखा है.

Manish Kumar said...

मैंने आपकी पिछली कहानियों को तो नहीं पढ़ा पर जिस तरह आपने इसका रूप रचा है उससे ये स्पष्ट है कि विषय की भयावहता को पाठकों के मन में कैसे पहुँचाया जाए, ये आपको भली भाँति आता है।

राधिका उमडे़कर बुधकर said...

ओफ्फ,हे भगवान् .लेकिन इस दुनिया में ऐसा भी होता हैं .सच ही हैं

अल्पना वर्मा said...

कहानी का अंत मुझे भी अप्रत्याशित लगा.लेकिन यह भी गरीबी का एक सच है

ABHILASA said...

sayad bahut dino bad kutch aisha pardha....aur kahani ka anth aisha hoga ....soch nahi paya.
apne acha likha.
apke blog par maine pahli post pardhi hai....nai kahaniyon ki talash main aana laga rahega.
dhanyawad.

pran said...

DIL AUR DIMAAG KO HILAA DENE WAALEE
KAHANI.RANJANA JEE,AAPKEE LEKHNEE
AAPKE BLOG "SAMVEDNA SANSAAR" KE
NAAM KO SAARTHAK KARTEE HAI.AAP
MAHADEVI ( VERMA) YA MAHASHVETA DEVI SE KAM NAHIN HAIN.BADHAAEE.

yuva said...

Kahaani ka climax!! Uff!! Jhakjhor diya

Saath hee aap hamaar YUVA par pahlee baar aaye. Iska shukriyaa.

yehmeriduniahai said...

वाह लक्ष्मी स्वरुपा का अच्छा वर्णन किया...पूरे जमाने की सोंच जाहिर कर दी आपने इस रचना में...बहुत खुब..

tourism said...

aapne jo likha hai vahi ho raha hai. par use rokne ki muhim chhedni hogi. aapke ikhne ko dhanyvad.

तरूश्री शर्मा said...

Story me End ke U turn ne jhakjhor ke rakh diya... jindagi aasan thi bhi kab?? bahut achchi kahani..lekhan jab tak sawal khade na kare aur kai ansuljhe sawal hal na kar de...tab tak kamyab ho hi nahi sakta!!!!

Dr. Chandra Kumar Jain said...

आज आपकी कई पोस्ट एक बारगी
पढ़ गया....इधर व्यस्तता अधिक रही.
आप सहज और प्रवाह के साथ सधे हुए
ढंग से अपनी अभिव्यक्ति की पहचान
बना चुकी हैं.....बधाई......
==============================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

शिवम् मिश्रा said...

समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखू ये जानिए ज़िन्दगी शायद कुछ एसी ही हो गयी है आज कल |
हमारे घर के पास में भी कुछ गरीब परिवार रहेते है और उनके यहाँ भी एक प्रकार से लड़की बेचीं ही जाती है शादी के नाम पर | वोह लोग खुद अपने लड़को के लिए भी बहुए युही खरीद के लाते है कहा यह जाता है कि लड़की वाले को शादी का खर्चा दिया गया जबकि सच कुछ और ही होता है |
हम लोग कोई नेता तो है नहीं जो आगे आ कर कुछ करे इस लिए चुपचाप यहाँ के लोकल नेताओ को एसी शादियों में दावत उड़ते देखते रहेते है |
सच को बहुत ही अच्छे ढंग से पेश किया आपने |
बधाई और शुभकामनाये |

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

कहानी सुरु से अंत तक बंधे रखती है | लेकिन अंत का क्या कहा जाए , सोचा नहीं था कहानी की ऐसी अंत होगी |

संतोष कुमार सिंह said...

जिस पत्रकार बन्धु के ब्लांग से आपने खबड़े ली हैं उनके लिए और आपके लिए भी सच जानाना जरुरी हैं मीडिया के खबड़ों पर भावूक होने की जरुरत नही हैं जो बिकता हैं वही दिखता हैं ।(भाई साहब आप पटना में काम कर रहे हो मीडिया कर्मियों की तरह आप भी खबर को मसालेदार तरीके से ही पेश किया ।सच तो यह हैं की अगर कृष्ण जैसा भाई उस भीड़ में नही रहता तो उस महिला की सरेआम बलात्कार हो जाती ।जिस सीआईएसएफ के जवान की तारीफ करते हुए आपने आज खबड़ छापी हैं उस सच को सामने लाने में इतनी देरी क्यों की। मीडिया से जुड़े हैं किसी चैनल वाले से फुटेज लेकर देख ले उस भीड़ में दर्जनों कृष्ण मिल जायेगे।)

पंकज शुक्ल said...

अद्भुत कहानी।

Surbhi said...

आपकी कहानी में जैसे ही अम्मा बिटिया होने की ख़ुशी सुन नाचने लगती हैं मुझे अचानक दिमाग में एक ख्याल आता है कहीं ये परंपरागत देह व्यापार में लिप्त जातियों में से एक में ही कहानी तो नहीं और मुझे अपने शोध क्षेत्र याद आ जाती है. राजस्थान, मध्य प्रदेश के जाने कितने ही इलाकों में नट, कंजर, बेडिया, बंजारा जातियों के कितने ही घरों में रधिया जैसी बेटियाँ पाने के लिए मनोती मांगी जाती हैं, एन बेटियों को अविवाहित रखा जाता है ताकि घर का खर्चा चल सके.

आपने बहुत खूबसूरती से कहानी को उकेरा है. आपकी आगे आने वाली रचनाओं को पढने में उत्सुकता रहेगी.

रंजीत said...

kahani padhkar man bhing gaya... pata nahin yeh sthiti kab badlegee ...

सागर नाहर said...

अम्मा के पास तीस हजार रुपये की बा्त पढते समय आभास होने लगा था कि कहानी का अन्त क्या होगा।
आपकी लेखनी में जादू है, कहानी या लेख पढ़ते समय पाठकों को बांधे रखती है।
एक बार फिर से सुन्दर रचना के लिये साधुवाद।

vishnu-luvingheart said...

kahaani yun badlegi...sach me tassavur bhi nahi ki thi...

abdul hai said...

fabulous

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतरीन कथारचना....... साधुवाद..

Harsh said...

behtareen.............katha.......

शोभना चौरे said...

ni shabd hu
madhy prdesh aur rajsthan ki bardar ak jati vishesh ka yhi pesha hai .aur ye log ghumntu jeevan hi bitate hai .kuch nya krne aur is kuriti ko dur karne me ham kuch mhilao ne kafi prytn bhi kiye the kitu iske peeche ka saty rhsymay hai .
aapki lekhni bhut umda hai .

Jayant chaddha said...

ओ हेनरी और मंटो दोनों याद आ रहे हैं...
सुखद परिदृश्य में चलती कहानी का ऐसा अंत...
कहानी और कहानीकार को सलाम... लेकिन ऐसी सच्चाई को लानत है...
शुभकामनायें,
http://nayikalam.blogspot.com/

amarjeet kaunke said...

रंजना जी,
आपकी कहानी पड़ी...हैरान रह गया मैं....कहानी के अंत में आपने हैरान ही कर दिया...दूसरी बात सोचने वाली यह है कि जो बात हम सोच भी नहीं सकते ये लोग कितनी आसानी से कर देते हैं और इनके मन में इस बात का कोई मलाल नहीं....यह कहानी और भी कई सवाल उठाती है......जिन के जवाब इतने सहज नहीं...ये कहानी बेचैन करने वाली है........डॉ. अमरजीत कौंके

महामंत्री - तस्लीम said...

Dil men utar gayi aapki rachna. Kaise itna maarmik likh leti hain aap?
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

मर्मस्पर्शी कथा हेतु बधाई.

Hari Shanker Rarhi said...

It is very difficult for me to decide whether the end of the story is irony of situation or irony of character !But at one point I am sure that it is an irony of our society. Overall it is very realistic.

Mrs. Asha Joglekar said...

दुनिया का सबसे पुराना व्यवसाय । एक मिनिट को तो लग रहा था कि कितने अच्छे लोग हैं तीसरी बच्ची के जन्म पर भी खुश हैं । पर लडका चाहने के पीछे भी तो हमारी यही सोच है कि कमा कर देगा ।
कहानी का मोड काफी जबरदस्त !

संजीव गौतम said...

दिमाग की नसें सुन्न! वाह!

hem pandey said...

कहानी पढ़ कर स्तब्ध हूँ. कहानी के बारे में तो कुछ नहीं कहूंगा, लेकिन कहानीकार की लेखनी की दाद देता हूँ. अंत कल्पना से परे है.

vishnu-luvingheart said...

जाने कैसे इतने बेदर्द बन जाते है लोग...

जाने कैसे वादा कर के मुकर जाते है लोग...

ख्वाब में भी जो सोच नही पाते हम...

जाने कैसे वो कर गुजर जाते है लोग....

बातें करके चाहतों की कैसे कत्ल कर जाते है लोग...

सीरत में अपनी वफ़ा दिखा के कैसे दगा दे जाते है लोग...

सूरत से भी किसीकी क्या पहचान करें ....

चेहरे पे कई कई चेहरे लगा लेते है लोग....

रुलाके किसीको कैसे ठहाका लगा लेते है लोग...

गिराके किसीको कैसे मंजिल पा लेते है लोग...

वक्त तो हर एक का आता है इस दुनिया में....

फ़िर किस तरह अपना "वक्त" आने पर खुदा से नजरे मिलाते है ये लोग....

Vijay Kumar Sappatti said...

main kya kahun , kahani padhkar sannate me ja chuka hoon ... kya shashakt lekhan hai , aapki lekhni ko naman..

aabhar

vijay

pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

ATI SUNDAR

अर्शिया अली said...

सच के बेहद करीब.
{ Treasurer-T & S }

विपिन बिहारी गोयल said...

इस ह्रदयस्पर्शी कहानी के लिए साधुवाद

vikram7 said...

स्‍वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

दर्पण साह "दर्शन" said...

ye ek aisa mudda hai jiske baare main khul ke bolna hi hoga...

...aur mahilaayein iski pehal karein to sone pe suhaga.

marmik kahani.

APNA GHAR said...

EK MARMIK KAHANI MANVIYA SAMVEDNAYE KO UJAGAR KARTI EK SUNDER RACHNA ASHOK KHATRI

शागिर्द - ऐ - रेख्ता said...

मैं क्या कहूँ ...?
सारे भाव तो आंसुओं के साथ ही बह गए...|
बस आपको और आपके लेखन को कोटिशः नमन |