9.2.10

भक्ति शक्ति युक्ति आगार...

किसी घनघोर मजबूरी में, घटाटोप भुच्च अनहरिया रात में, सुनसान सड़क पर एकदम अकेले, कहीं चले जाय रहे हों,सन्नाटे का साँय साँय कान सुन्न कर रहा हो, झींगुर और टिटही अपना तान राग छेडे ईस्पेसल इफ्फेक्ट दे रहा हो और ऐसे में अचानक से सामने एक ऐसा जीव परकट हो जाय ,जो न आज तलक कहीं देखे, न सुने...हाँ, भूत परेत का खिस्सा कहानी में ऐसा विराट वर्णन खूबे सुने रहै और जमकर ओका ठट्ठा भी उडाये रहै ...तब ऊ सिचुएसन मा सबसे पाहिले मुँह औ दिमाग पर का आएगा?? बड़का से बड़का तोप नास्तिक भी आपै आप बड़बडावे लगैगा ...

" भूत परेत निकट नहीं आवै ,महावीर जब नाम सुनावै "
उस समय जदि भुतवा कहे ... " का रे ससुर, तू तो ढेर विज्ञान बतियाता रहा,अब काहे को बजरंगबली को बुला रहा है बे...हिम्मत है तो चल, हमरे संग सवाल जवाब का हु तू तू खेल के दिखा...."
तब भैया, जरा कलेजा पर हाथ धर के ईमान से कहिये....लेंगे चैलेन्ज,कहेंगे उससे,न भूत वूत होता है,न हनुमान वनुमान ??

अच्छा चलिए, छोड़िये ये काल्पनिक सिचुएशन ,,, फरज कीजिये, हवाई जहजवा में बइठे, ऊपर दूर अकास में सुखी-सुखी औ खुसी-खुसी उड़े जा रहे हैं...आ ठीक बिच्चेइ असमान में डरैवर साहेब उदघोषणा कर दें..." परम आदरनीय भइया औ बहिनी लोग, हमको बहुतै खेद संग कहना पड़ रहा है कि, बिमनवा में आई तकनीकी खराबी का चलते, अब हम ईका आगे नहीं उड़ा ले जा सकते हैं....सो, भाई बंधू लोग,अब अपना लोटा डंडी समेटो औ छतरिया पहिन के कूद लो हमरे पिच्छे पिच्छे ..हमरी पूरी सुभकमना आप सभौं के साथ है.."
अब बताइए,पलेनवा में चढ़े वाला सब लोग असमान से कूदे का टिरेनिंग लेके तब जहजवा में तो बैठते नहीं न... बडका से बडका चुस्त कुदाक के हाथ भी छतरी धरा , जब एतना ऊपर से धकियाया जाएगा त छतरी धर हावा में लटकते अइसन भयंकर सिचुएसन में भाई बहिनी लोग किसको गुहारेंगे ?? जो हनुमान जी का नाम भर भी सुने होंगे, झट बुदबुदाये लगेंगे....

"संकट ते हनुमान छुड़ावै, मन क्रम वचन ध्यान जो लावे..."
"जन के काज विलम्ब न कीजै ,आतुर दौरि महासुख दीजै"
"बिलम्ब केहि कारन स्वामी, कृपा करहु उर अंतरयामी "

चलिए आज उन्हीं बजरंग बली जी की बिना किसी कारण या संकट के भी एक बार सरधा पूरवक याद करते उनके चरित की परिचर्चा उनका जयकारा लगाते करें...
" लाल देह लाली लसै ,अरु धर लाल लंगूर | बज्र देह दानव दलन,जय जय जय कपि सूर || "

अपने ईष्ट श्रीरामजी की ऐसी भक्ति किये बजरंगबली कि भक्त के शिरोमणि बन गए...उनके जइसा भक्त बहुतै कम हुए हैं ई धरती पर.....भगति की  पराकाष्ठा देखिये, कि उ तो यहाँ तक प्रण ले लिए हैं कि, इस संसार में जा तलक एक ठो भी मनुस के मन ध्यान में श्री सीता राम जी बसेंगे , तब तक उ ओके रक्षा का वास्ते इहै संसार में डटे रहेंगे....बजरंगबली जी की एही एकनिष्ठ सरधा देखकर सीतामैया ने भी उनको वरदान दिया था ...

"अजर अमर गुननिधि सुत होहु, करहु सदा रघुनायक छोहू.."

ऐसे संकट मोचन हैं बजरंगी, कि अपने भगतों का ही नहीं बल्कि अपने परभू का भी संकट हरण करते हैं... जब भी प्रभु श्रीराम संकट में पड़े ऊ उपस्थित हो गए उनकी सेबा में...हर संकट में जदि कोई एक नाम प्रभु श्रीराम के मुख पर सबसे पाहिले आया तो उ था ...हनुमानजी का ही ...चाहे सीता मैया को सात समुद्दर लांघ के खोजने का काम हो या कदम कदम पर श्री राम लछमन या जानकी जी सहित धर्म की रच्छा करने का काम...और उनका शील और विनय तो देखिये कि कभी भी किसी भी काम का क्रेडिट अपने नहीं लिए,सब श्री राम की कृपा को दिए..... शक्ति , भक्ति और युक्ति के चरम का जहाँ कहीं भी जिकर होगा, सबसे पहिला नाम बजरंगबलि का ही आएगा...

वानर सेना जब सीता मैया को खोजते हुए समुद्र किनारे पहुँचे और विराट अथाह उस समुद्र को देख कपारे हाथ धरे सब हिम्मत हार बैठ गए, तो ऐसे समय में भी सर्व समर्थ हनुमान जी तबतक आगे बढ़के उद्धत नहीं हुए जबतक कि जाम्बवंत जी उनको आज्ञा और उत्साह नहीं दिए..शिष्टता यही है कि सेनापति या अग्रज जबतक आदेश न दे,ढेर नहीं कूदना चाहिए,समूह के अनुसासन का एही कायदा होता है..चूँकि सेना में वरिष्ट अग्रज जाम्बवंत जी मौजूद थे, सो हनुमान जी उनका मान रखते हुए तब तक चुप हो बैठे रहे जबतक कि जाम्बवंत जी खुदै आगे बढ़के उनको आदेश न दिए..जो सचमुच में सर्व समर्थ होता है,वह विनयशील अवश्ये होता है,यह हनुमान जी हर समय जताए बताये..
लालुआये पन्जुआये हनुमान जी एकै बार उठे औ हुंकार लेकर जब लंका का ओर छलांग लगाये त - " जेहि गिरी चरण देई हनुमंता,चलेहिगा सो पाताल तुरंता" ...उनका चाप से पहार रसातल में धंस गया...आज जदि किसी के पास एतना ताकत/सामर्थ्य रहे,तो दू मिनट में पूरा दुनिया को मचोड़ मचाड़ के सौस लगाके खा जाएगा.. सामर्थ्य बिना शील और संस्कार के विनाशकारी होता है,यह सास्वत सत्य है...

बजरंग बली खाली बलसालिये नहीं रहे,बडका विद्वान् और चतुर भी रहे..ई बात का परमान जगह जगह पर रामायण में मिलता है...जब लंका के रास्ते बीच सम्मुद्दर में सुरसा उनको खाने वास्ते छेकी, त कैसे उको चकमा देके बजरंगबली अपना चतुरता का परदरसन किये, सबे जानते हैं..जब गुप्त रहकर काम बनाना था,गुप्त रह कर बनाये और जब विसाल भूधराकार सरीर परगट कर काम बनाना था,तब वैसा ही किये..सीता मैया को चुप्पे चुप्पे खोज निकालना था,तो मच्छर एतना साइज बनाकर घूम लिए औ जब सतरुअन को प्रभु राम का परभाव देखाना था तो असोक वाटिका को उजार पूरा लंका को जलाकर राख कर दिए...


कल्पना कीजिये ..एकदम अनजान जगह,कोइयो जात जेवार का नहीं, बोली भासा वाला नहीं, चारों तरफ से बिसाल विकराल सर्वभक्षी निसाचर चारों पहर घूम रहे हैं,कब उठाकर मुंह में गड़प जाएँ औ डकारों न लें,कौनो भरोसा नहीं.....ऊपर से दस मुडिया वाला विकराल राच्छस घड़ी घड़ी कहे कि चलो हमसे बियाह करो नहीं तो तुम्हारा चटनी पीस के ई राच्छस लोग खा जायेगा,तुम्हरा पति खोजते रह जायेगा कि कहाँ बिला गयी..नैहर सासुर वाला बोलेगा राम के संग गयी रही जंगल में ,जंगल का दुःख नहीं सहाया होगा, तो भाग भूग गयी होगी कहीं, साथ में फुसफुसाते हुए कहेंगे " सुने हैं कि लंका का राजा, उसको बियाह करने को उठा ले गया, का जाने बियाह उआह करके ओकरे संग घर बसा ली होगी..." तुम तो बचोगी नहीं जवाब देवे का वास्ते ,जेकरे मुंह में जो आएगा उ कहेगा..हम तुमको उठा लाये,जात तो तुम्हरा ऐसे भी चला ही गया..ई से अच्छा है कि हमरे संग बियाह कर लो,हम तुमका सब रानियन का हेडरानी बना के रखेंगे...बतवा मान लो,परेम से समझा रहे हैं, कहीं दिमाग घूम घुमा गया तो फिर सोच लो,अब और हमरा सबर को न हिलाओ..."

मैया सीता ...बेचारी के हिरदय पर का बीतता रहा होगा ई सब सुन सुन कर ,पतिवरता राजरानी का जी केतना पिराता रहा होगा..तबै तो उ खिसिया कर बोली...

" सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा, कबहूँ कि नलिनी कराइ विकासा ||
अस मन समुझु कहती जानकी,खल सुधि नहीं रघुवीर बानकी ||
सठ सूने हरि आनेहि मोही,अधम निल्लज लाज नहीं तोही ||"

लेकिन सीता मैया को भीतरे भीतरे तो लगिए रहा होगा कि ई लम्पट मुंहझौंसा पतित का का ठिकाना, दूसरे की मेहरारू को छल से उठा लाने में एगो घड़ी लाज नहीं आया, का जाने आगे का करेगा...बेचारी बेकल हो गयीं होंगी, एतना दिन हो गया था कि ई संसय होना भी वजिबे था कि का जाने प्रभु राम इहाँ तक पहुँच पायेंगे कि नहीं,कहीं उनके आने से पाहिले रावनवा खा पका गया या जोर जबरदस्ती किया तो अबला अकेली उका सामना कैसे करेगी.....बेचारी कलपते हुए अपन ऊ काया का, जाके कारन सब झोर झमेला रहा,ओकरे अंत करने को कभी राच्छसी त्रिजटा से तो कभी वृच्छ असोक से अग्नी मांग रही हैं कि...उहेई समय धप्प से गाछ पर से कुदुक हनुमानजी परगट हो गए प्रभुराम के संदेस के साथ....

धरमहीनों का ऊ नगरी में मैया सीता को कोई पहली बार इतने दिन बाद सनमान सरधा के साथ 'माता' कहा होगा....कोई अंदाजा लगा सकता है,उस समय मैया सीता के हिरदय में हर्ष और ममता का कैसा अद्भुद हिलोर उछाह उठा होगा...उसमे भी जब पवनसुत अपना विसाल रूप परगट कर के माता को देखाए होंगे तो निरासा का समुद्दर में डूबे उनके कैसा सम्बल मिला होगा...माता का अपमान का बदला लेने का लिए जब कोई पुत्र उसका अपमान करने वाला का पूरा राज पाट महल अटारी जलाकर ख़ाक कर दे,तो उस हिरदय में गर्व संतोस और ममता का जो उफान उठा होगा और उस हिरदय से जो आशीर्वाद निकलेगा,ऊ कैसे खाली जा सकता है...अरे, माता का आशीर्वाद जब दुर्योधन जैसे पापी को भी बज्र जैसा बना सकता है तो ई तो परम पुन्यवान हनुमान जी थे...
माता ने अपने इस सुपुत्र को - " अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता,अस बर दीन जानकी माता"
" माता जानकी की किरपा से पवनसुत को जो वरदान मिला, उससे पवनसुत किसी को भी आठों सिद्धि और नवों निधि दे सकते हैं "
और ये आठों सिद्धि और नौ निधि हैं....

सिद्धि-

१) अणिमा - जिससे साधक किसी को दिखाई नहीं पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ में परवेस कर सकता है..

२) महिमा - जिसमे योगी अपने को कितना भी विशाल आकार का बना सकता है.

३) गरिमा - जिसमे साधक अपने को चाहे कितना भी भारी बना सकता है.

४) लघिमा - जिसमे साधक जितना चाहे उतना हल्का बन सकता है.

५) प्राप्ति - जिसमे इच्छित वस्तु की प्राप्ति संभव है.

६) प्रकामी - जिसमे इच्छा करने पर वह पृथ्वी में समा सकता है, आकाश में उड़ सकता है.

७) ईशित्व - जिससे सब पर शासन का सामर्थ्य पाता है.

८) वशित्व - जिससे दूसरों को वश में किया जा सकता है.

नौ निधि .....

पद्म , महापद्म, शंख, मकर, कछप, मुकुंद, कुंद, नील, बर्च्च ...

माता पिता या अग्रजों का सरधा और सम्मान पूरवक सच्चे हिरदय से सेवा करने से जो फल मिलता है,उसका इससे परतच्छ उदाहरण औ का हो सकता है...

हो सकता है हनुमान जी,राम जी,कृष्ण भगवान्, आदि आदि ई सब के सब कोरे काल्पनिक पात्र हों, इनका कोई आस्तित्व या वास्तविक आधार न हो...पर किसी ऐसे अवधारणा से ,ऐसे आधार से, जिससे घोरतम संकट में भी उबरने का आस विस्वास मिले, इनके चरित्र से अपने चरित्र को ऊपर उठाने संवारने का प्रेरणा मिले...तो इन चरित्रों को नकारना, उचित होगा क्या ???
सुख ही तो पाने के समस्त यत्न विज्ञान भी कर रहा है,पर इसके कतिपय पुरोधा संगे संग नारा दिए जा रहे हैं कि भूत परेत लछमी दुर्गा राम किसन ई सब अंधविश्वास है...तो अँधा ही सही,यह विश्वास बेहतर नहीं जो व्यक्ति को उद्दात्त चरित्र वाला बनने का प्रेरणा दे ???

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36 comments:

Shiv Kumar Mishra said...

"उनका चाप से पहार रसातल में धंस गया...आज जदि किसी के पास एतना ताकत/सामर्थ्य रहे,तो दू मिनट में पूरा दुनिया को मचोड़ मचाड़ के सौस लगाके खा जाएगा.. सामर्थ्य बिना शील और संस्कार के विनाशकारी होता है,यह सास्वत सत्य है..."

अद्भुत! बहुत ही बढ़िया पोस्ट.

हिंदी पर आपकी पकड़ अद्भुत है. चाहे जिस तरह की हिंदी हो....:-)

RaniVishal said...

Bahut gahan chintan ke bad aapane ye post likhi hai, bahut hi acchi post....aapko bahut bahut dhanyvaad !!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

Arvind Mishra said...

भक्तजनों बोलो बजरंग बली की जय

डॉ .अनुराग said...

झकास ठेले हो जी .हम तो पहले कन्फ्यूजिया गए के अपनी रंजना जी है क्या.......ऐसा ही मूड बनाकर रखिये कम से कम दो तीन पोस्ट तक तो.........

डॉ .अनुराग said...

झकास ठेले हो जी .हम तो पहले कन्फ्यूजिया गए के अपनी रंजना जी है क्या.......ऐसा ही मूड बनाकर रखिये कम से कम दो तीन पोस्ट तक तो.........

हिमांशु । Himanshu said...

शानदार पोस्ट । शिवजी ने सही कहा, हर तरह की हिन्दी बखूबी लिख सकती हैं आप ।

अभिनव रूप है यह । आभार ।

रंजना said...

मनोज कुमार said...
भुच्च अनहरिया रात
ई जे बात है न हमरे ईलाक़ा में ख़ूब बोला जाता है।

अद्भुत परिहास बोध आपकी आलेख में एक ताक़त भरता है। आपने विषय की मूलभूत अंतर्वस्तु को उसकी समूची विलक्षणता के साथ बोधगम्य बना दिया है।

बाक़ी त हम बजरंगबली का परम भक्त हूँ इस लिये आज, माने मंगल के रोज़, आपका पोस्ट बार-बार पढ रहा हूँ। सुंदर कांड त भोरे में पढ लिये थे।

February 9, 2010 10:04 PM

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Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...
तो अँधा ही सही,यह विश्वास बेहतर नहीं जो व्यक्ति को उद्दात्त चरित्र वाला बनने का प्रेरणा दे ???
बिलकुल सही कहा आपने. जहां भिक्षुकों पर गोलियां चलाकर बुद्ध की तस्वीरें गयी थीं वहां पर आज बुद्ध की जगह माओ की तस्वीरें पुज रही हैं. इसी तरह जिन दूसरी जगहों पर आज पीरों के मज़ार नहीं हैं वहां तो तानाशाहों के बुत खड़े हैं.

तोप और तानाशाह के चरण चुम्बन से तो पहला वाला अंधविश्वास लाख गुना प्रणम्य है (मुझ जैसे नास्तिक के लिए भी)

February 9, 2010 10:14 PM

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आपने एक क्षेत्र विशेष में बोली जाने वाली भाषा में प्रयुक्त देशज शब्दों और अंग्रेजी के घुले मिलों शब्दों का जितनी सच्चाई से प्रयोग किया है वह चमत्कृत करने वाला है।

अद्‌भुत लेखन है यह। बधाई।

वाणी गीत said...

झूठ काहे बोले ...कई बार सपना में डर जात है तो बजरंगबली ही पार लगावत हैं ...ई बात औरी है कि बच्चा लोग के तो इहे कहाला ...भूत- वूत कुछ नहीं होता ...डरने की क्या बात है ...

बिलकुल अलग तरह की मस्त झक्कास पोस्ट ...

रतिराम चौरसिया said...

बाह! बाह!

का पोस्ट लिखे हैं आप. हम त सोचते थे कि हमको भासा का गियान नहीं है अउ हम ई भासा में लिखते हैं त मनई सब हँसता होगा हमरा ऊपर. बाकी आपका पोस्टवा पर अइसन भासा पढि के पब्लिक सब धन्नी होइ गया है. एही बास्ते हम कहते हैं, भासा कब किसको कईसा भा जाए कोई नहीं जानता है.

अउर पोस्ट के बारे में का कहें? एतना बढ़िया ढंग से भक्ति अउ शक्ति का बखान बहुत कमे देखे हैं. आप त साधुवाद डिजर्भ करते हैं इस पोस्ट का खातिर.

(मिसिर बाबा हमको सूचित किये त हम चले आये. ऊ बोले कि आपने हमरा भासा में पोस्ट लिखा है. ओनका साधुबाद पान में जादा चूना लगाके दे देंगे.)

दिगम्बर नासवा said...

अष्ट सिद्ध नो निधि के दाता .....
पढ़ा और बोला तो हज़ारों बार होगा .... आज जान भी लिया .....
जानना अच्छा है .... पर कभी कभी लगता है, ग्यान होना ज़रूरी है या ईश्वर से प्रेम ........... बहुत अच्छा लग रतहा है आज आपका ब्लॉग ...... बजरंग में डूबा हुवा ... लाल देहि लाली लसे .....

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

बहुत अच्छी पोस्ट है पढ़ा तो मैंने भी कई बार मगर बिना ज्ञान के आज ज्ञान भी हो गया
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

arvind said...

बजरंग बली की जय,अद्भुत!बहुत अच्छी पोस्ट .

krantidut.blogspot.com

शरद कोकास said...

मनुष्य अपने आप में विश्वास उत्पन्न करे । यही काम विज्ञान ने अब तक किया है और कर रहा है । मिथक भी यही काम करते हैं यदि हम उनके सकारात्मक पक्ष से प्रेरित हों ।

Parul said...

mujhe hamesha aapki post padhne ke liye mehnat karni padti hai,karan mera alp gyan hai..par aapki kalam hamesha kuch hatkar kehti hai. :)

अनूप शुक्ल said...

ई त बड़ा झकास लेखन है आपका। वाह!

Udan Tashtari said...

शानदार और वाह-दोनों!!

जय बजरंग बली!!

:)

rashmi ravija said...

बहुत ही बढ़िया आलेख ...इतनी सुगमता से आपने इस भाषा में लिख डाला...पढ़कर बहुत आनंद आया...सचमुच भाषा पर आपकी पकड़..तारीफ़-ए-काबिल है....बहुत सारी गूढ़ बातें आपने इतनी सहजता से कह डालीं....बहुत बहुत शुक्रिया..

निर्झर'नीर said...

इस बार तो आपका अलग अंदाज-ए-बयां रहा..भोजपुरी रंग अच्छा लगा
हमेशा की तरह सार्थक लेख

सागर said...

इतनी रोचक पोस्ट मैंने आज तक नहीं पढ़ी है... मारे हंसी के पेट दुख गया और ऑफिस में हंसी रोक लें त ससुर मुस्कान नहीं रुक रहा... और कमबख्त दफ्तरवा में सब बुझ रहे है की १४ फ़रवरी के कारन मुस्कुरा रहे हैं.

असली देसी हिंदी तो इसे ही कहते हैं... एक प्रकार से यह हिंदी की सेवा है... मनोहर श्याम जोशी और सबसे बड़े रेणु भी त ऐसेहिये लिखते थे अभी ब्लॉग पर एक ठो और ऐसा लेखक है प्रमोद सिंह जी ब्लॉग का नाम है अज़दक.

आपका शुक्रिया.

Kishore Choudhary said...

भाषा ऐसी कि पेट में बल पड़े जाएँ और आप पर गर्व करने के लिए अपना सर भी ना उठ सकें. इधर घर में कुछ मांगलिक कार्य है सो तीन चार दिन से व्यस्तता रही आज सुबह ही नेट खोला तो आपकी पोस्ट ने सब थकान मिटा दी है. और बहुत सी तारीफ , मात्र तारीफ करने को जी चाह रहा है.

BrijmohanShrivastava said...

सुन्दर काण्ड और हनुमान चालीसा पर सम्मिलित लेख ,भाषा भी समझ मे आई ,।भूत प्रेत का निकट न आना पर आपने अच्छी बात कही है अच्छे अच्छे तर्क शास्त्रियों को यही दोहा याद आता है ,हवाई जहाज में आया संकट निश्चित ""संकट ते छुडावे " याद दिलायेगा "भय और संकट के समय इनकी याद मानसिक सम्बल प्रदान करती है ,भय एक स्वाभाविक ब्रत्ति है ,डर सब को लगताहै ।सीता माता का आशीर्वाद देना और को नहि जानत है जग मे कपि संकट मोचन नाम तिहारो इसका वर्णन भी अच्छा लगा ।हनुमान जी का यह कहना कि "सो सब तव प्रताप रघुराई,नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ""उनकी महानता का परिचायक है ।आपने उनकी शक्ति का वर्णन "जेहि गिरि चरन देहि "से और बुद्धि की बात सुरसा के उदाहरण से समझाई । रावण को लम्पट आपने कह दिया परन्तु एक बात तो है ,रावण सीता के पास गया था तब अकेला नही गया था मन्दोदरी को साथ ले कर गया था ,दूसरे उसने कभी महिलाओं का अनादर नही किया जिसने भी सीता को वापस करने को रावण से कहा सब को लातों से मारा लेकिन मन्दोदरी ने ऐसा ऐसा कहा, उसे लताड़ा है है,मगर उस पर कभी गुस्सा नही हुआ ।आपने अष्ट सिद्दि और नौ निधि का वर्र्णन करके बहुत अच्छा किया ।आमतौर पर पाठ करने वालो को मालूम ही नही होता कि ये क्या है और पाठ करे जाते है अब जैसे ही यह लाइन आयेगी उन्के दिमाग मे सिद्धि और निधि आजाया करेगी ।

Manish Kumar said...

हफ्ता भर से बाहरे घूम रहल बानि। आज लौट के देखलीं कि इहाँ तो पूरा हनुमान चलिसाए चला त। बाकी रौआ के ई अंदाज भी नीक लागल।

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

वाह आज हमहूँ सीना तान के लिखातानी की - हम रोज (विदाउट फेल) कम से कम दू बार हनुमान चालीसा पढतानी | हाँ हनुमान चालीसा के पूरा पूरा अर्थ मालुम नहीं, अब तक अर्थ जानेके कोशिश ही नहीं किये .. |

"हो सकता है हनुमान जी,राम जी,कृष्ण भगवान्, आदि आदि ई सब के सब कोरे काल्पनिक पात्र हों..." - ये समझ रहा हूँ की ये पंग्तियाँ किस सन्दर्भ और किसके लिए लिखी गई है फिर भी इ पढके तकलीफ हुई की आपहुं राम जी और हनुमान जी को काल्पनिक .... ! खैर जिन्हें इश्वर, राम.... काल्पनिक लगते हों लगे ..... हमलोग क्यूँ नास्तिकों और सेकुलरों के चक्कर में अपने भेजा में गलत बात घुसाएँ ?

जय हनुमान ... और जय श्री राम कह के इतना जरुर कहूंगा आपका लेखन विशिस्ट और अत्यंत सुन्दर है !!!

प्रणाम !

Suvi said...

Wah maza aa gaya, kya baat hai. Atyant prernadayi lekh hai aapka...

Vijay Kumar Sappatti said...

baap re kya kamaal ki post hai , main to kuch aur padhne aaya tha , hil gaya ji ...

aapki hindi bahut acchi hai ji ...

badhai


vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com

puja said...

हनुमान जी के ऐसन महिमा तो कहियों नहीं पढ़े हैं, न जाने न सुने. बड़ी मज़ा आया आज तो...का कहें कैसे धन्यवाद दें आपको.
आप एकदम्मे ठीक कहत हैं, जब भूतवा पकडे औरो हवाईजहाज से कोई कूदने को कहे तो सब्बे को हनुमान जी याद आ जायें.
हमको ये आठ ठो सिद्दी और नौ ठो निधि नहीं मालूम था, अब तो इहो पता चल गया. कभी कोई मुसीबत में हनुमान जी सच्चे बचने आ गए तो उनसे एक आध ठो सिद्दी और निधि तो मांगिये लेंगे. इस सब आपकी किरपा है.

गौतम राजरिशी said...

बड नीक लागल दी...आहहा!

सिद्धि और निधि के बारे में थोड़े-बहुत जानते थे...अब रट लिये हैं...ज्ञान बघारने के लिये।

बाकि पोस्ट का अंदाज खूबे भाया है। घर में सब को जोर-जोर से पढ़ के सुनाये हैं तो सबे लोग हंस रहे है।

Razi Shahab said...

इतो बहुत बढिया लिखल बा हो...मज़ा आ गईल बा पढि कै...बहुतै बढ़िया...

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

उम्र हो गई है चौव्वन की। पर भय अभी भी लगता है अदृष्य से। और पद्मासन लगा बोल जाते हैं हनुमान चालिसा। फिर हाथ झाड़ काम पर लग जाते हैं।
इन्ही के सहारे कई दुरगम काज किये हैं और करेंगे आगे भी!
जय बजरंगबली!

निर्मला कपिला said...

बहुत ग्यानवर्द्धक पोस्ट है । बहुत बहुत धन्यवाद

अभिषेक ओझा said...

पहले तो डर वाली बात पढ़कर हंसी और अपनी पोल खुलती दोनों नजर आये. बाद में सीरियसली पढ़े... और अंत में रतीरामजी से भी मिल लिए. बिलकुल बढ़िया !

हरकीरत ' हीर' said...

अद्भुत ......!!

श्यामल सुमन said...

आश्चर्यचकित हूँ बहन रंजना का यह अंदाज देखकर। बिल्कुल नूतन आयाम। शुभकामनाएं।

मैं भी हनुमान चालीसा पाठ शुरू करता हूँ।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

Pankaj Upadhyay said...

हा हा हा!! वाह वाह..

नितिन | Nitin Vyas said...

वाह वाह