22.7.14

लेट्स सेलिब्रेट "डेज"



होली दिवाली शिवरात्रि जन्माष्टमी क्रिसमस गांधी जयन्ती से लेकर ईद बकरीद रमज़ान इफ्तार तक और मदर फादर इन्वायरमेंट वेलेण्टाइन डे से लेकर टमाटर और गे डे तक के दुनियाँ भर के सारे के सारे स्पेशल डे,"मना" डालने में हम भारतीय घनघोर विश्वास करते हैं। स्वभाव से ही उत्सव उत्साह प्रिय हम, मौका मिला नहीं कि कुछ न कुछ "मनाने" तुरत फुरत निकल पड़ते हैं। कभी किसी सीजन अपने यहाँ डेज की कमी बेसी हो गयी तो या तो  अपने देश  का या किसी भी दूसरे देश का मारपीट/खून ख़राबा डे भी उतने ही उत्साह से मना डालते हैं।

अब जैसे कल 21 जुलाई की ही बात ले लीजिये। पूरे शहर का चक्का जाम कर बीच सड़क लाखों लोगों संग यहाँ भी एक डे मना डाला गया। सुना पिछले इक्कीस वर्षों से "शहीद दिवस" के नाम पर यह चक्का जाम दिवस बड़े ही हर्षोल्लासपूर्वक भव्य रूप से मनाया जाता है। 21 वर्ष पहले,जब काँग्रेस तीन मूल वाला नहीं, सिंगल मूल वाला हुआ करता था और हमारी दीदीजी उसकी उभरती हुई नेत्री हुआ करतीं थीं, सत्ता धारी ने राइटर्स मार्च के दौरान उभरते हुए को सलटा डालने अपना जलवा दिखाते, 13 जनों को बुझा दिया।भले 500 वर्षों के इतिहास में देखें तो लाखों करोड़ों लोग शहीद हुए हैं, लेकिन इससे क्या,यह तेरह और ऐड होना, बहुत बहुत गैरवाजिब,बहुत बहुत बुरा हुआ।अकारण,देश प्रदेश हित में जान गँवाएँ ऐसे लोगों का सम्मान और ऐसे काण्डों के जिम्मेदारों को दण्ड मिलना मिलना मिलना ही चाहिए। खैर समय बलवान होता ही है तानाशाहों का क्षय निश्चित है,, सो काण्डवालों का भी क्षय हो गया और अन्ततः सत्य की जीत तर्ज पर, भूत की दमित शक्ति भविष्य के लिए सशक्त होती वर्तमान की सरताज़ हो ही गयीं।एक अबला ने दुनियाँ को दिखा दिया कि दुनियाँ शक्ति के ठेंगे पर।
पर यह जो कहते हैं, शहीदों की शहादत कभी जाया नहीं होती,प्रैक्टिकली सिद्धान्त च सत्य यह कि, शहीदों के शहादत को जो सलीके से "मनाना" जानता हो, इतिहास में अमर और असली विजेता वही होता है। वो एक क्या तो था,कुछ शेर टाईप - "शहीदों के फलाने फलाने पर लगेंगे हर बरस मेले---------  "  पता नहीं,कुछ भला सा ही था, अभी ठीक से याद नहीं पड़ रहा। जो भी हो,कहने का तात्पर्य यह कि शहीदों के कब्र पर शहीदों के तीसरे चौथे पांचवें पुश्त तक मेले बराबर से सजा करेंगे, रैली रैला मंच सजावट सब चकाचक रहेगा,बस अगली पीढ़ियाँ संतोष को वह डेट नहीं "पा और मना" पाएँगी जब उन हतभागे शहीदों के गुनाहगारों का "सज़ा डे" (छोड़िये,ज्यादा हो गया, बस केस का "डिसीजन डे") था। 

4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (23-07-2014) को "सहने लायक ही दूरी दे" {चर्चामंच - 1683} पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

मनोज कुमार said...

वाह, लजवाब!

महेश कुशवंश said...

वाह बेहतरीन , लेखकीय प्रतिभा का कायल शुभकामनायें

Prasanna Badan Chaturvedi said...

बेहद उम्दा और बेहतरीन...
नयी पोस्ट@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ