9.2.15

एकाकीपन


सन्नाटों  का कोलाहल,
नित चित को कर देता चंचल।
एकांत है चिंतन का साथी,
भावों के पाँख उगा जाती ।
शशि की शीतल कोमल किरणें
उर डूब उजास पाता जिसमें।
उस पल में कविता है किलके,
रस शब्द ओढ़ चल बह निकले।
माना आँखों से सब दीखता,
दृग मूंदे ही पर जग दीखता।
नीरवता के कुछ पल खोजो,
दुनियाँ के संग संग मन बूझो।
अन्तरचिंतन बिन सृजन कहाँ,
गहरे उतरो मिले मोती वहाँ। 

8 comments:

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

सच कहा रंजना जी . बहुत दिनों बाद आपकी रचना पढ़ने मिली है . अच्छा लगा .

रविकर said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (11-02-2015) को चर्चा मंच 1886 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!

Pratibha Verma said...

भावपूर्ण और प्रभावी प्रस्तुति..

KAHKASHAN KHAN said...

बहुत ही अच्‍छी रचना।

Kamal Upadhyay said...

बहुत ही शानदार
http://puraneebastee.blogspot.in/
@PuraneeBastee

karunavati sahity said...

सुन्दर रचना आदरणीय

Abhishek Ojha said...

सुंदर !

Digamber Naswa said...

भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...