23.3.15

मन्त्र शक्ति

चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मनुष्य योनि इसलिए है क्योंकि इसी योनि में प्राणी अपने सामर्थ्य का सर्वाधिक और सर्वोत्तम उपयोग कर सकता है।इतिहास साक्षी है इसका कि साधारण देह धारियों ने अपनी बुद्धि से कितने और कैसे कैसे असाधारण कृत्य कर डालें हैं।
लेकिन सत्य यह भी है कि बहुसंख्यक लोग ऐसे ही हैं, जो पूरे जीवन में प्रकृति प्रदत्त क्षमताओं का साधारण और सामान्य उपयोग भी नहीं कर पाते। और शरीर के साथ ही उनकी क्षमताएँ भी माटी में मिल जाती है।
सही गलत का ज्ञान रखते हुए भी गलत करते,दुर्व्यसनों में फंसे अधिकांश लोग यह कहते मिल जाएँगे कि क्या करें मोह है कि छूटता नहीं,मन है कि मानता नहीं..
असल में हारे हुए ये वही लोग हैं जिनमें दृढ निश्चय नहीं,जिन्होंने कभी धिक्कारते या दुत्कारते स्वयं को गलत से बरजा नहीं है,अपने आत्मबल को बढ़ाने के यत्न नहीं किये हैं।
तो ऐसे में यदि हम चाहें तो अपने आत्मबल को जागृत और सम्पुष्ट करने हेतु सिद्ध मन्त्रों का सहारा ले सकते हैं।
मन्त्र जाप(मानसिक या सश्वर) वस्तुतः हमारे मन मस्तिष्क में तंत्रियों को झंकृत करते उनमें वह प्रवाह उत्पन्न करता है जो नकारात्मक भावों/शक्तियों से उबरने में हमारी मदद करता है।फलस्वरूप जहाँ हममें सही गलत में भेद करने की क्षमता बढ़ती है,वहीँ नकारात्मकता से उबरते अपनी क्षमताओं के सार्थक सदुपयोग में भी हम समर्थ होते हैं।उदहारण के लिए हम यह देख सकते हैं कि यदि धमनियों कहीं ब्लॉकेज हो जाए या मस्तिष्क तंत्रिकाओं में कहीं कोई अवरोध आ जाए तो हृदय(हार्ट) तथा मस्तिष्क व्यवस्थित रूप से काम करना बंद कर देते हैं,परन्तु इन अवरोधों/ब्लॉकेज को यदि चिकित्सा द्वारा हटा दिया जाता है तो निरोगी स्वस्थ अंग पुनः अच्छे ढंग से काम करने लगते हैं.   
तो चलिए हम जपें -
"ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चै"
जिसका अर्थ है - "हे चित्स्वरूपिणी महासरस्वती,हे सद्रूपिणी महालक्ष्मी,हे आनंदरूपिणी महाकाली,,ब्रह्मविद्या (आत्मज्ञान) पानेके लिए हम सब समय तुम्हारा ध्यान करते हैं.हे महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती-स्वरूपिणी चण्डिके तुम्हें नमस्कार है।अविद्यारूपी रज्जुकी दृढ़ ग्रंथि को खोलकर मुझे मुक्त करो।"
इस छोटे से मन्त्र से सत् रज और तम् तीनों शक्तियाँ सधती हैं।इन तीनों का उत्तम संतुलन ही जीवन को उर्ध्वगामी बनाता है।
अपने अंतः में अवस्थित दुर्गुणों रूपी दानवों तथा जीवन में भाग्य एवं कर्मवश मिलने वाले दुर्दिनों का सामना हम अपने आत्मबल द्वारा ही तो कर सकते हैं न,सो इसे जगाये और बनाये रखना तो जरुरी है।

5 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

नवरात्रों की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (25-03-2015) को "ज्ञान हारा प्रेम से " (चर्चा - 1928) पर भी होगी!
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

मंत्र की शक्ति अपार है बशर्ते पूरी आस्था विश्वास और लग्न के साथ जप किया जाए . बहुत सही कहा रंजना जी . नवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ .

Digamber Naswa said...

मन्त्र में शक्ति है इसको तो सदियों से हमारे ऋषि मुनि मानते आ रहे हैं ... जरूरत है इन्हें समझ कर आस्था विश्वास रख कर जप करने की ...अरसे बाद आज इस ब्लॉग पे आको पढ़ के अच्छा लगा ..

रचना दीक्षित said...

मन्त्रों में शक्ति होती है ये युग युगांतर से विश्वाश चला आ रहा

पुरानी बस्ती said...