21.3.20

निर्भया के वह नाबालिग कातिल

मन को बहुत समझाया कि,दुनियाँभर में कितने लोग कॅरोना से मर गए/रहे हैं,अकाल मृत्यु।मुझे इस समय इस दुःख को मन में स्थान देना चाहिये, न कि उस एक आदमी के न मारे जाने का आक्रोश और दुःख मनाना चाहिए,पर किसी भी भाँति मन मानने को प्रस्तुत नहीं।

वस्तुतः मेरे लिए उसका जीवित सुरक्षित रहना,एक व्यक्ति का जीवित रहना भर नहीं है,बल्कि वह उनसभी पिशाचों का जीवित रहना है जो निश्चिन्त हैं कि घृणित और जघन्यतम अपराध कर भी वे बिना किसी दण्ड के न केवल जीवित रह सकते हैं बल्कि अपने धर्म के कारण पुरस्कृत भी होंगे।पूरी एक सड़ी हुई सेकुलड़ी व्यवस्था उसे बचा लेगी।क्योंकि वह पिशाचों के रक्षकों के लिए बहुमूल्य है,क्योंकि उनका कोर वोटर हैं।

अभी कुछ लोगों को फेसबुक पर यह कहते देखा कि चलिए उन चारों के आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना कीजिये कि आखिर थे तो वे हिन्दू ही।
यह सुनते आत्मा सिहर गयी।कैसे कोई इन पिशाचों को हिन्दू ठहरा सकता है?असली न्याय तो तब हो जब इनको या इन जैसों को 10-10 बार मरने की पीड़ा से गुजारा जाय।
निर्भया के माता पिता उस तथाकथित नाबालिग को उसके कुकृत्य के लिए कठोरतम दण्ड दिलवाने क्यों नहीं लड़ रहे, मैं नहीं जानती या जानना नहीं चाहूँगी(हो सकता है उन्हें यह विश्वास दिलाया गया हो कि यदि वे ऐसा करते हैं तो उनके पूरे परिवार को मिटा दिया जाएगा,जो कतई असम्भव नहीं)किन्तु राजनीतिक दलविशेष से लेकर न्यायालय तक ने जो परिपाटी आरम्भ की है,उस कौम विशेष का अपराध हेतु जो मनोबल बढ़ाया है,यह सीधे सीधे भारतीय स्त्रियों को यह मुखर सन्देश है कि या तो वे उन पिशाचों के हाथों सहर्ष स्वेच्छा से बलात्कार स्वीकार करें,या फिर अपने साथ आत्महत्या के उपाय सतत लेकर चलें ताकि अन्तिम समय में अपने पसन्द की मौत तो चुन सकें, जीवित रहते उन दरिन्दों के हाथों अपने शरीर के चीथड़े होते तो न देखें।

वाम या काँग्रेस ने कोई कम घृणित राजनीति नहीं की।लाखों लाख हत्या के प्रायोजक रहे वे।लेकिन वे भी खुलकर इस तरह किसी बलात्कारी की रक्षा में नहीं उतरे थे।एक बच्ची के क्षत विक्षत शरीर पर जो राजनीतिक रोटी सेंककर इन्होंने खायी थी,दिल्लीवासियों ने इन्हें माफ़ कर दिया, इन्हें पुनः राजगद्दी पकड़ाई जैसे उस क्रूर बलात्कारी को आपियों ने नगद पुरुस्कार, सिलाई मशीन, नई पहचान और वकीलों की फौज लगाकर दिलाई थी,,लेकिन जैसा कि सुना है, किये हुए सुकर्म या कुकर्म प्रकृति अवश्य ही प्रतिदान में देती है,तो हम तो यह देखना चाहेंगे कि प्रकृति न्याय करती है या नहीं?

जो व्यक्ति बलात्कार कर सकता है,जननांगों को क्षत विक्षत कर सकता है,उसके लिए भी बालिग और नाबालिगता का विचार??न्याय के नाम पर इससे भी बड़ा अन्याय कुछ हो सकता है?क्या नीतिनियन्ता कभी इसपर विचार करेंगे?क्या वे यह विचार करेंगे कि जीवित रहने का जितना अधिकार इन तथाकथित नाबालिग पापियों का है,उतना ही उस बच्ची/लड़की/स्त्री का भी है?क्या हमारे अन्यायालय,संसद कभी स्वतः संज्ञान लेते बच्चियों के मन में निश्चिंतता और बलात्कारियों के मन में गहरा भय भरने के कानूनी उपाय करेंगे?

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सार्थक पोस्ट

Yamini Das said...

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