19.1.09

सबब (कहानी)

सबब





घर पहुंचकर निढाल सी बिस्तर पर गिर पड़ी सबिया.नादिरा को सम्हालते हुए अबतक ठीक से रो भी न पाई थी वह. सीने में घुमड़ता बवंडर जिगर फाड़े जा रहा था..अब वह आराम से जी हल्का कर सकती थी,सो खूब बुक्का फाड़ कर रोई.पर क्या इस रोने में अकेले नादिरा का ही दुःख था ? नही, इस दुःख के साथ उसके अपने भोगे हुए दुःख भी थे,जो इस समय आंसुओं की सैलाब के साथ बहार निकल रहे थे..



क्या कुछ नही भोगा था उसने इन सालों में.. लेकिन आज भी जबकि रूमानियत और प्यार जैसा कोई अहसास उसके दिल में नहीं बचा था परवेज़ के लिए, उम्र के इस ढलान पर भी बेवा होने का खौफ उसे हिला जाती है , तो पच्चीस साल की वह जवान लडकी, बेवा होने का गम कैसे सम्हालेगी. क्या करे वह ...अपने बेटे जुनैद से कहे कि वह नादिरा का हाथ पकड़ ले,उससे निकाह कर ले....लेकिन जुनैद मानेगा ?? शायद नही...दो बच्चियों की माँ से वह निकाह करेगा???? फ़िर नादिरा उसके बराबरी की भी नही .वह वेस्टर्न कल्चर में पढ़ा लिखा ,पला बढ़ा है, नादिरा उसकी नज़र में देहातन से ज्यादा नही...फ़िर मौसेरी बहन को अपनी बहन ठहराकर ,इस निकाह को नापाक करार दे देगा, भले उसके मजहब में यह नाजायज नही....बेचारी फूल सी बच्ची,कैसे काटेगी इतनी लम्बी जिंदगी...घर बाहर उसपर बुरी नजर डालने वाले, हमेशा उसका फायदा उठाने की ताक में रहने वाले तो सभी होंगे,पर उसका हाथ पकड़ सहारा देने वाला कोई नही होगा....पढ़ी लिखी भी इतनी नही कि अपने दम पर अपना और बच्चों का खर्चा वह उठा सके,सुकून से जी सके...उसने देखा नही...गम से बेजार अपने देह और कपडों की सुध बुध खोये वह बच्ची जब जार जार रो रही थी तो इस मुसीबत के आलम में भी उसके जेठ की नज़र नादिरा के जिस्म पर कैसे गस्त कर रही थी....चारों ओर दरिन्दे ही दरिन्दे तो घूम रहे हैं....कोई भाई नही,चाचा मामा नही...उसके जिस्म का रखवाला न रहा,अब वह सबके लिए एक जिस्म होगी....परदे के नाम पर बाहरी दुनिया से उसका नाता रिश्ता तोड़ देंगे और सारा कुछ उस पर घर पर ही गुजरेगा.....कभी पैसा दिखा,तो कभी जोर जबरदस्ती, उसकी मजबूरी का फायदा उठाने को सब उतावले रहेंगे........



दुनिया उसने देखी है,एक अकेली औरत की जिंदगी कितनी काँटों भरी हो सकती है ,इसका पूरा इल्म है उसे....तभी तो वह आजतक हिम्मत न जुटा पाई थी अपने लिए भी....अभी क्या उसे तो छुटपन से ही इसका अहसास था,तभी तो तालीम हासिल कर अपनी ऐसी हैसियत बना लेना चाहती थी कि उसे कभी किसी का मुहताज न रहना पड़े.पर कहाँ कर पाई थी वह अपने मन की.अपने भाई बहनों में सबसे अक्लमंद होने और पढ़ाई में अव्वल रहने के बावजूद एक अब्बू को छोड़ हरेक नातेदार को उसके तालीम पर गुरेज था..अम्मी तो कुछ ज्यादा ही कुफ्त रहती थी..



अब्बू ख़ुद भले प्राइमरी के मास्टर भर थे,जिनकी तनख्वाह से सात भाई बहनों के साथ नौ लोगों के इस परिवार का गुजारा एक वक्त के फाके के साथ होता था .पर फ़िर भी वे अपने हर बच्चे को बेहतर तालीम देना चाहते थे. उसमे भी सबिया की अक्लमंदी पर उन्हें ख़ास नाज़ था और उसे वे हमेशा अपना बड़ा बेटा मानते थे.सबिया की तरक्की उन्हें बड़ा ही सुकून देती थी.और इसलिए सारे रिश्ते नाते वालों से लड़कर उन्होंने सबिया का बी ऐ में दाखिला करवा दिया था.लेकिन छः ही महीने बाद परवेज़ का रिश्ता आया. आया क्या ,अम्मी ने ही जुगत भिडाकर यह सब किया था.अब्बू को उन्होंने ऐसा समझाया कि उन्हें भी अपनी बेटी का पढ़ लिखकर भविष्य बनने से ज्यादा बेहतर सउदी में रह रहे अरबपति परवेज़ के साथ निकाह कर घर बसाना ही लगा.



सत्रह साल की सबिया चालीस साल के परवेज़ के साथ ब्याह दी गई. परवेज़ की उम्र से लेकर उसके ऐय्यासी तक की सारी बातें छिपाई गई थी. परवेज़ के पैसे ने सबकी आंखों पर ऐसे पट्टी बांधी कि किसी ने भी किसी तरह की तहकीकात की कोई जरूरत न समझी. निकाह के समय दूल्हे को देख अब्बू जरूर मायूस हुए थे और जब उन्हें पता चला कि परवेज़ पहले ही दो बीबियों को तलाक दे चुका था, माथा पकड़कर बैठ गए. पर उस वक़्त किया क्या जा सकता था ,निकाह तो हो चुका था...कलेजे पर पत्थर रखकर उन्होंने अपनी बेटी को रुखसत किया.लेकिन ताउम्र यह फांस सा उनके सीने में चुभा, कलेजा काटता रहा...



सबिया को जब यह पता चला तो उसका जितना मोहभंग अपने परिवार से हुआ,जिन्होंने कि ऊंची मेहर के लिए एक तरह से उसे बेचा था,ताकि उसकी बाकी की चार बहनों की शादी की जा सके ,उतना ही अपने शौहर से भी हुआ था,जो उसके सपनो का शहजादा नही,उसका खरीदार था,जिसने ऊंची बोली लगाकर हसीन कमसिन सबिया को खरीदा था.बेशकीमती कपड़ो जेवरों से लदी फदी सबिया अपने महलनुमा पिंजडे में कैद होने जा रही थी..



कुछ दिनों तक तो निहायत ही शराफत और मुहब्बत से पेश आए थे परवेज. वे उसके हुस्न पर फ़िदा थे.उसपर पैसा और प्यार लुटाने लगे.यूँ पैसे की कोई अहमियत नही थी सबिया के लिए,पर हाँ प्यार ने बाँध लिया था सबिया को और जल्दी ही उसने इसे अपना नसीब मानते हुए तहे दिल से परवेज़ को अपना लिया,उसपर कुर्बान रहने लगी और एक नेकदिल बीबी का फ़र्ज़ बखूबी अंजाम देने लगी.परवेज़ के हसरत और ख्वाब ही उसके आंखों में सजने लगे.उन्हें मुक्कम्मल करना ही उसने अपना फ़र्ज़ और बंदगी माना था.लेकिन काश यह हमेशा रहता.....



पहले बच्चे के जन्म के साथ ही परवेज़ ने उससे किनारा करना शुरू कर दिया था और दूसरे बच्चे के बाद तो सारा नज़ारा ही बदल गया था. सबिया के हुस्न का तिलिस्म टूट चुका था. घर के बाहर जाकर औरतों से मिलने का सिलसिला बढ़ते बढ़ते घर की दहलीज़ लाँघ उसके बेडरूम तक आ पहुँचा था.अपने ही घर में उसका ठिकाना गेस्टरूम हो गया था.जब यह सिलसिला शुरू हुआ था तो पहले पहल तो कुछ दिनों तक सब नजरअंदाज किया, पर बाद में उसने इसकी पुरजोर खिलाफत शुरू की.वक्त के साथ जैसे जैसे उसका विरोध मुखर होता गया,परवेज़ की हरकतें और जुल्म भी बढ़ते गए..सबिया को तोड़ने और खुलकर ऐय्यासी के लिए परवेज ने छोटे दुधमुहें बच्चों को उससे अलग कर घर से दूर होस्टल भेज दिया.



उसके बाद से तो फ़िर महफिलें घर पर ही सजने लगी.उसके घर और शौहर पर बाहरवालियां राज करने लगीं. परवेज़ की प्यार की जगह अब उसके हिस्से शौहर से दिए जिस्मानी रूहानी जुल्म रह गए थे..परवेज़ ने उसके ऊपर तलाक की वह तलवार लटकाई,जो आठों पहर उसके रूह को काटती रहती थी. दिन बीतने के साथ साथ परवेज़ हरवक्त उसके छुटकारा पाने की ताक में लगे रहने लगे थे.उनके जुल्म बेतहाशा बढ़ गए थे.पर उसने तलाकशुदा लड़कियों की जिंदगियों को भी देखा था. तलाक का ठीकरा लडकी पर ही तो फोड़ा जाता था,उसे ही गुनाहगार ठहराया जाता था.कई बार उसने खुदकुशी की ठानी,पर अपने बच्चों की सोच, इसे अंजाम न दे पाई थी.....कई बार सोचा कि अपने घर हिन्दुस्तान चली जाए......पर वहां भी तो उसका ठौर नही था. जाती भी तो कैसे जाती...अब्बू रहे नहीं थे. एक भाई था जो ठीक से पढ़ लिख नही पाया,तो अब्बू ने अपनी सारी जमा पूँजी दे उसके लिए परचून की दूकान खोल दी थी,जिससे बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी जुटती थी.. दूर थी तो किसीको उसके तकलीफ का इल्म न हो पाता था.जब कभी वह मायके गई भी तो उसके कपडों गहनों की चकाचौंध के आगे उसके परिवार वालों की नजरें उसके मन तक न पहुँच पाई थी......सबकी नजरों में वह मलिका थी. इस भरम में भी उसका मान ही था....इसे वह तोड़ना नही चाहती थी.



अपनी आंखों के सामने अपने शौहर की सारी ऐय्यासियां बर्दाश्त करती,अपनी किस्मत और आत्मसम्मान को धिक्कारते उम्र के छियालीस साल तो उसने निकाल दिए थे,अब बाकी बची साँसों की कैद निकालनी थी. पर अब वह अपने रूह के सुकून के लिए कुछ करना चाहती थी.उसके शौहर को क्या चाहिए था,ऐय्यासी की आजादी ही न...वह उसने दिया है आजतक,पर आज वह उसकी कीमत मांगेगी...वह जानती है अगर वह मनमर्जी परवेज़ के पैसों को इस्तेमाल करना चाहे तो परवेज को कोई ऐतराज न होगा......नादिरा को वह शौहर नही दे सकती पर वह इतना तो कर सकती है कि , नादिरा और उसके बच्चियों की परवरिश और तालीम के लिए कुछ करे. हाँ....अब वह उनका का पूरा खर्चा उठायेगी.नादिरा और उसकी बच्चियों को माकूल तालीम दिलवाएगी और उन्हें एक महफूज माहौल देगी.नादिरा और उसके बच्चियों पर वह सब कुछ न गुजरने देगी जो उसका अपना देखा भोगा हुआ है.अब तो उनको बेखौफ मुक्कम्मल जीते देखना ही उसके सुकून का सबब बनेगा.....



और यह ख़याल फ़िर से उसे मुद्दतों बाद जिला गया था.......




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29 comments:

mehek said...

bahut achhi prernadayi kahani,badhai

अजित वडनेरकर said...

अच्छी कहानी

रंजना [रंजू भाटिया] said...

कहानी तो सुंदर लगी ही इस का अंत बेहद प्रभावित कर गया ...बहुत अच्छी कहानी लगी यह

ताऊ रामपुरिया said...

बेहद प्रभावी और सुन्दर कहानी. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

Udan Tashtari said...

ओह!! अंत ऐसे टर्न लेगा जरा भी अहसास न था. बहुत उम्दा कहानी पूर्ण प्रवाह के साथ. एक सांस में मानो पढ़ गये.

बधाई.

कुश said...

कहानी एक प्रवाह लिए हुए है जो शुरू से अंत तक रहता है.. अंतिम फ़ैसला सही है या ग़लत.. इतनी जल्दी इस बारे में कुछ कहा नही जा सकता..

मुसाफिर जाट said...

good story

रश्मि प्रभा said...

achhi kahani,ek sabak sikhaati

dwij said...

एक बेहद स्तरीय व सार्थक रचना.

Amit said...

bahut acchi kahaani...

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर कहानी, ओर एक शिक्षा भी उन भारत वासियो के लिये जो अपने बच्चो ओर बच्चियो की शादी विदेश के लालच मै बिन सोचे समझे कर देते है, उन्हे चाहिये की पहले पुरी छान बीन करे तभी अपनी बच्ची या बच्चे का हाथ किसी विदेश मै बसे भारतीया के हाथ मे दे,
ऎसे बहुत से केस हम ने देखे है लडकी १८ साल की जब की मर्द ४८ साल का, ओर फ़िर ...
धन्यवाद

विनय said...

ऐसी सुन्दर और प्रभावशाली कहानी के लिए आपको बधाई

---मेरा पृष्ठ
चाँद, बादल और शाम

जितेन्द़ भगत said...

मन प्रसन्‍न हो गया यह कहानी पढ़कर। मुस्‍लि‍म समाज की रूढि‍यों में फँसी नारी और उसके भीतर आजादी की तड़प को अच्‍छी अभि‍व्‍यक्‍ति‍ दी है आपने, शब्‍द चयन भी लाजवाब है।

राधिका बुधकर said...

चलिए ख़ुद के लिए नही औरो के लिए तो कुछ अच्छा किया ही उसने ,अच्छी कहानी

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

कहानी का यथार्थ मन को छू गया ..लिखती रहीये ..कहानियोँ मेँ आपकी अभिव्यक्ति बेहद सशक्त रहती है

prashant said...

aesi kahaani to hamaare aas paas aur bhi ji rahi hongi par jis tarah se aapne is kahaani ko likha hai vo mere dil ko chu gaya.

aap likhati bahut hi acchaa hai. mai aapke aalekh ko hamesha padhtaa hoon.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बधाई हो रंजना जी. आपकी कहानी में मुझे दिखाई दिया की "जब आँख खुले तभी सवेरा" सही कदम उठाने के लिए कभी भी देर नहीं होती है. कथा विषय और विन्यास दोनों ही अच्छे लगे.

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत बढ़िया कहानी. और शानदार लेखन.

दिगम्बर नासवा said...

बहुत marmik kahani है और satya के बहुत पास, जीवन जीने का sabab जब भी मिल जाए svera समझना चाहिए और sabia को vo sabab मिल गया

Vijay Kumar Sappatti said...

ranjana ji , deri se aane ke liye maafi chahta hoon .

kahani bahut hi prabhaavshali ban padhi hai .. ant bhi ek prashan liye hue hai ..

aapne bahut acchi shaili mein katha likhi hai ..

aapko bahut badhai ...

meri nayi kavita avashya padhe..

vijay

Vijay Kumar Sappatti said...

ranjana ji , deri se aane ke liye maafi chahta hoon .

kahani bahut hi prabhaavshali ban padhi hai .. ant bhi ek prashan liye hue hai ..

aapne bahut acchi shaili mein katha likhi hai ..

aapko bahut badhai ...

meri nayi kavita avashya padhe..

vijay

G M Rajesh said...

found a blog of a story writer
many thanks

Hari Joshi said...

प्रभावशाली रचना। बधाई।

योगेन्द्र मौदगिल said...

Behtreen rachna ke liye badhai.

NirjharNeer said...

andaj-e-bayaN khoobsurat raha

aapka gadh lekhan vakai kabil-e-tariff hai.


kya baat hai samaj ki buraai ko aapne kis andaaj se vyakt kiya hai ki padhne vala majboor ho jaye sochne par.
daad hazir hai

vijaymaudgill said...

रंजना जी आपकी कहानी में एक रवानगी है, जो रीडर को बांधे रखती है। बहुत ख़ूब। अच्छी लगी आपकी कहानी।

BrijmohanShrivastava said...

संवेदनशील कहानी

महेंद्र मिश्रा said...

अच्‍छी अभि‍व्‍यक्‍ति‍ ..बढ़िया कहानी.बधाई

प्रभाकर पाण्डेय said...

बहुत ही प्रभावी कहानी के लिए धन्यवाद। आपके लेखन की शैली भी रोचकता से पूर्ण और यथार्थवादी है। सुंदर लेखन। सादर नमस्कार।