23.1.09

! ! स्वर्ग ! ! ( व्यंग्य )

- देख तेरे लिए तेरी पसंद की कचौड़ी जलेबी लाया हूँ ,एकदम गरमा गरम......चल फटा फट खा ले.......दो दिन से तूने कुछ नही खाया........देख तो कैसे मुंह सूख गया है........चल गुस्सा छोड़...खा ले जल्दी से.......फ़िर हम तुम मजे करेंगे............देख तो कितनी मस्त हवा चल रही है,कितना मस्त मौसम है........अच्छा चल ले, कान पकड़ता हूँ......अपनी कसम......माँ की कसम .......तेरे सर की कसम,अब कभी तेरे पर हाथ न उठाऊंगा.

-चलो हटो,कह दिया न भूल से भी छूना मत मुझे,नही चाहिए...जलेबी कचौडी.......भूखी मर जाउंगी, पर इसको हाथ न लगाउंगी ....याद है, आज तक कितनी बार क़समें खा चुके हो........बस एक बार पेट में बोतल उतारी नही कि सारी क़समें घास चरने चली जाती हैं........अब मैं तुम्हारी बातों में नही आने वाली.....अब किसी भरम में न रहूंगी.......

- अच्छा चल इस बार पक्का.....एकदम से पक्का......कह दिया न ...देख लेना.....तू भी तो बस, उस वक्त ताव दिला देती है जब मेरा दिमाग ठिकाने नही रहता........ देख तेरे बिना मैं जी सकता हूँ ???? तू तो मेरी जान है.....

- अच्छा.... मैं जान हूँ???? तो वो सब कौन हैं ???

- अरे बेवकूफ ,वो सब तो पत्तलें हैं,खाकर बाहर फेंक आता हूँ.........और तू तो थाली है,वो भी सोने वाली,सहेजकर हिफाजत से घर में रखने वाली.....

- अच्छा......सोने की ही सही,मैं भी तो सामान ही हुई न तुम्हारे लिए ???

- अरे, ऐसे बुरा न मान........तू तो जानती है, मैं तुझसे कितना प्यार करता हूँ........

- अच्छा, एक बात बताओ....आख़िर मुझमे क्या कमी है,जिसके लिए तुम्हे बाहर पत्तलों के पीछे जाना पड़ता है ????

- तुझमे कोई कमी नही रे.........देख..... तूने देखा है न,अपने सारे देवता कई कई बीबियाँ रखे हुए हैं,तो भी कोई उनकी शिकायत करता है ? पूजा ही करता है न ... अपने कृष्ण भगवान् को ही ले ले ....सोलह हजार रानियाँ रखे हुए थे......कोई उनकी शिकायत करता है ?.... तू भी तो उनकी पूजा ही करती है,सुबह शाम दिया दिखiती है....अरे यह तो रिवाज है.......मर्दानगी की निशानी है.....अपने यहाँ का शान है......राजा महराजा भी तो इतनी बीबियाँ रखते थे......इनकी तो छोड़........अच्छे करम कर जब लोग स्वर्ग जाते हैं, वहां क्या मिलता है ???? एक से बढ़कर एक दारू और एक से बढ़कर एक अप्सरा .........तो जब धरती से लेकर स्वर्ग तक यह जायज है तो ,तुझे क्यों इतना ऐतराज है ??..........अब मैं कहीं भी जाऊं ......वहां कुछ छोड़ कर आता हूँ ???? एकदम साबुत तेरे पास ही तो लौटता हूँ......तेरे प्यार में, तेरा ख़याल रखने में, कोई कमी रखता हूँ??? चल तू ही बता..........

- अच्छा एक बात पूछूं ???????

- हाँ पूछ न.........जो पूछेगी सब का जवाब दूँगा.........

- एक बात बताओ........अच्छे करम करने से स्वर्ग मिलता है ???? हैं न ??

- हाँ ,बिल्कुल.........

- और स्वर्ग में ,दारू और अप्सराएँ मिलती है ????

- हाँ बिल्कुल..बिल्कुल .........

- तो मान लो, आज से मैं तुमसे कोई शिकायत न करूँ, तुम्हारी हर बात मानू, केवल अच्छे काम करूँ .......तो मुझे पुण्य मिलेगा न ???

- हाँ ,हाँ ....क्यों नही........

- अच्छा ,जो मुझे पुण्य मिलेगा तो स्वर्ग भी मिलेगा ????

- हाँ रे....


- अच्छा ,तो तुम्हारे लिए तो दारू अप्सराएँ होंगी स्वर्ग में ,मेरे लिए क्या होगा ??

- ???????????


_________________________________

48 comments:

Dr.Parveen Chopra said...

जबरदस्त कटाक्ष --- आप की लघु कथा की नायिका ने अपने पियक्कड़ पति से यह पूछ कर कि तुम्हारे लिये तो दारू अप्सराएं होंगी स्वर्ग में, मेरे लिये क्या --- एक करारा सा तमाचा जड़ा है, जिस की गूंज अभी भी आ रही है।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

अच्छा ,तो तुम्हारे लिए तो दारू अप्सराएँ होंगी स्वर्ग में ,मेरे लिए क्या होगा ??

- ???????????

इस बात का जवाब आसान नही होगा पतिदेव के लिए देना ..बहुत बढ़िया व्यंग लिखा है आपने जो एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है

ताऊ रामपुरिया said...

लाजवाब व्यंग रचना.

रामराम.

विनय said...

bahut baDhiya




---आपका हार्दिक स्वागत है
गुलाबी कोंपलें

शाश्‍वत शेखर said...

तीक्ष्ण कटाक्ष| चेहरा देखने लायक होगा पति महोदय का|

Harsh pandey said...

bahut achcha likha hai

Abhishek said...

अफ़सोस, इसका जवाब किसी धार्मिक पुस्तक में नहीं है!

(gandhivichar.blogspot.com)

NirjharNeer said...

- अच्छा ,तो तुम्हारे लिए तो दारू अप्सराएँ होंगी स्वर्ग में ,मेरे लिए क्या होगा ??

- ???????????

accha vyang

अनिल कान्त : said...

लाजवाब कटाक्ष ... लाजवाब रचना

PCG said...

रंजना जी, एक बात कहूँ, आप बुरा न माने, आप अपने व्यंग्य में सुरु से आख़िर तक एकदम ठीक चल रही थी , अगर मैं बिना लेखक का नाम जाने , इस व्यंग्य पर टिपण्णी करता तो यही कहता " भाई साब, आप लगता है पीने के काफ़ी आदी हो चुके जो इस तरह से बीबी को फुसलाने की कला जानते हैं" ! लेकिन व्यंग्य की आखिरी लाईन में स्त्रीत्व का बोध झलक ही गया !

डॉ .अनुराग said...

आपका ये अंदाज भी भाया!

राधिका बुधकर said...

सही हैं ,गज़ब का सवाल हैं ,किसी के पास उत्तर नही होगा इसका .बहुत अच्छी व्यंग कथा

Saurabh Sharma said...

बहुत खूब | क्या सटीक प्रश्न किया है ....

कुश said...

katha ke aarmabh ki teen panktiya padhkar hi main samajh gaya tha ki aap kaha le jaane waali hai..

shyad aapke shabdo ko ab pechaanne laga hu..

ise ek jwalant post kahunga.. aur ha vyangya to kabhi nahi kahunga..

Gyan Dutt Pandey said...

नारी के लिये स्वर्ग?! स्वर्ग में देवता होते हैं, और पति सबसे बड़ा देवता है!
अगर पत्नी स्वर्गवासी पहले हो गयी तो उसके पुण्य से इस पति को देवत्व मिलेगा और उसके पास पंहुचाया जायेगा मृत्योपरान्त!

मनुज मेहता said...

Ranjana ji
bahut umda likha hai aapney. ek hi sans mein padhna pada, vyang ke saath aapne jo prashn par laakar khada kar diya usey vakyee mein samajhne ki zaroorat hai. bahut hi ache samvadon mein Buni hui behtareen rachna
meri badhai sweekaren

manuj mehta

makrand said...

bahut khub vyang ranjana ji

Tapashwani Anand said...

la-javab
niruttar kardiya...........

BrijmohanShrivastava said...

कवितायें भी ,कहानी भी ,व्यंग्य भी एक ही व्यक्ति में कितनी क्षमताएँ भर कर ईश्वर भेजता है -आश्चर्य होता है /तुझमे कोई ........चल तू ही बता -करारा व्यंग्य /

सुप्रतिम बनर्जी said...

बहुत ही अच्छा लिखा है आपने। पर इसे मैं व्यंग्य नहीं कहना चाहूंगा। इतनी सटीक, इतनी बेबाक। सीधा-सपाट और चुभनेवाली पोस्ट। मुबारकबाद।

hem pandey said...

एक के लिए यहाँ भी दारू वहाँ भी दारू. दूजे के लिए जलेबी कचोड़ी.

SWAPN said...

bahut uttam kataksh, vyangya rachna,dheron badhai aisi sateek panktiyon ke liye.swapn

विवेक सिंह said...

मैं तो इसे ऐसे घटिया लोगों के मुँह पर तमाचा कहूँगा ! बेहतरीन !

neeraj badhwar said...

jahan tak pati ke tark ki baat hai...rajneesh ne bhi ek charcha mein kuch kahani suna kar pati ka yahi tark sathapit kiya tha....magar is sawal ke jikr shayad us charcha mein bhi nahin tha....to phir patni ke liye kya hai swarg mein...

sarthak rachna

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

बेहतरीन...

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

स्वर्ग और नर्क यहीँ भोग रहे हैँ मनुज .
.बहुत अच्छा लिखा ..
- लावण्या

राज भाटिय़ा said...

इसे कहते है नहले पे दहला, बहुत ही सुंदर कहानी आज अपनी बीबी को भी सुनाऊगां. केसे केसे लोग भरे है इस दुनिया मै.
धन्यवाद

दीपक कुमार भानरे said...

आपके लेखन का यह नया अंदाज़ भी बहुत अच्छा है . बधाई.

प्रकाश बादल said...

वाह वाह क्या खूब कहा है। कि मर्द कुछ भी कर ले तो उसके लिए तो सब माफ और अगर औरत कोई अच्छा काम करे तो उसे क्या मिलेगा कोई जबाब नहीं । मज़ेदार बात यह है आपकी कहानी में कि ये यह भी बताती है कि पुरुष अपने आप अगर ग़लत काम कर दे तो महिला के समक्ष इस प्रकार के तर्क रखेगा कि उसने गुनाह नहीं बल्कि पुण्य का कार्य किया और अगर यही कार्य महिला कर दे तो बदचलन कही जाती है। वाह रे सड़े हुए समाज!

विक्रांत बेशर्मा said...

बहुत ही जोरदार व्यंग है !!!!!!!

दिगम्बर नासवा said...

सही लिखा............मर्द जो करे सब ठीक...........पत्नी अगर बोल भी दे, नए नए बहाने निकल कर आ जाते है.
अच्छा व्यंग......अच्छी अंदाज़ में लिखा है आपने

मोहन वशिष्‍ठ said...

गणतंत्र दिवस की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं

http://mohanbaghola.blogspot.com/2009/01/blog-post.html

इस लिंक पर पढें गणतंत्र दिवस पर विशेष मेरे मन की बात नामक पोस्‍ट और मेरा उत्‍साहवर्धन करें

मोहिन्दर कुमार said...

बहुत सुंदर लिखा है आपने ये सिर्फ़ व्यंग्य नही है व्यथा है. अपनी कमजोरी छुपाने के लिए क्या क्या बहने हो सकते हैं उसका एक जीता जगता उदहारण है .. बधाई

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अच्छा ,तो तुम्हारे लिए तो दारू अप्सराएँ होंगी स्वर्ग में ,मेरे लिए क्या होगा ?
यह कड़वा सच लाजवाब कर गया.

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत बढ़िया.

वैसे ये पति झूठ बोलता है. स्वर्ग में इसके लिए फटे जूते धरे हैं पिटाई के वास्ते. और यहाँ नहीं तो वहां ये ज़रूर पिटेगा.

shyam kori 'uday' said...

... प्रश्न सुनकर ही दिमाग सुन्न हो गया होगा, जबाव तो बहुत दूर की बात है!
... बहुत ही प्रभावशाली व प्रसंशनीय अभिव्यक्ति है।

Pratap said...

bahut sundar vyang hai.

Goutam said...

इस नश्वर धरती से ले कर आसमान तक--- इट्स ओनली अ मान'स वर्ल्ड!!

योगेन्द्र मौदगिल said...

रंजना जी, अच्छी रचना के जिये साधुवाद स्वीकारें...

Atul Sharma said...

अच्छा ,तो तुम्हारे लिए तो दारू अप्सराएँ होंगी स्वर्ग में ,मेरे लिए क्या होगा ??

- ???????????

LAJAWAAB.

ARVI'nd said...

bezor,lajabab,bahut bahiya....taarif me kya kahu samajh nahi aata....bahut achha likha hai aapne.

आशुतोष दुबे "सादिक" said...

लाजवाब व्यंग रचना.अच्छी रचना के जिये साधुवाद स्वीकारें.

सतीश पंचम said...

अच्छी पोस्ट। बढिया कटाक्ष।

राजीव करूणानिधि said...

बहुत बढ़िया.

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

मन के अन्दर तक भेद गई आपकी लघु कथा-- यहाँ हमारे भारतीय समाज में जो हजारों साल से चली आ रहा नासूर-रूपी झूठी मर्दानी शान का अच्छा चित्रण किया है, हमारा समाज आँख बंद किए हुए इस बेहूदा बात को अपनाने वालों को देवता तक बना दिया.

RDS said...

विडम्बना यही कि आज जो सच है उसे व्यंग कहा जाता है | स्वर्ग की कल्पना भी लम्पट और विलासी बुद्धिजीवियों ने ही रची होगी | सिर्फ हिन्दू ही नहीं हर सम्प्रदाय में स्वर्ग के वर्णन लम्पटता के लिए ढाल बने हुए हैं |

ताना बाना बहुत खूब बुना है और कसावट भी कमाल की है |

और क्या लिखूं ? समाज तो सुधारने से रहा !!

परा वाणी - the ultimate voice said...

सुंदर एवं रमणीय रचना

mastkalandr said...

bahut sundar ...,
ekdam satik...,aur ant mei to kamal ki sikh..un mardo ke liye jo apni khusiya ghar se bahar talasa karte hai..., meri shubhkamnae sweekar karen...mk