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18.9.12

दीपुआ का बनेगा..?

मास्साब- अरे गोपिया, ई त बता, के रबरी देबी, राहुल गांधी, मधु कोड़ा औ मनमोहन सिंह, ई सबमे एगो कौमन आ मेन फेक्टर का है ??


 गोपिया - मास्साब, सबके सब गोबर हैं..उहो गाय के नै गदहा के, न लीपे जोग, न पोते जोग..


मास्साब - अबे मरवायगा का.. धीरे बोल ससुरे..

चल इधर तो आ, आ इधर, खा सोंटा..ससुर, इहे सिखाये थे..??
अबे, ई कुल महान भाग्यशाली लोग, महान राजनेता और शासक हुए हैं भारत में देश औ प्रदेस के..
 
अच्छा चल, ई बता के सोनियां गन्धी कौन हैं..?
 
गोपिया- सोनियां अंधी..!!!!
 
मास्साब - अंधी नहीं बे, गन्धी ..
 
गोपिया - लेकिन माई तो कहती है के "सोनियां अंधी है", उको देस, देस के वासी, उनका दुःख दर्द कुच्छो देखाई नहीं देता " त हम सोचे कि उका नाम इहे होगा..
 
मास्साब - अबे माई के बच्चा..जानता है तू ,ऊ केतना बड़ी हस्ती हैं, पूरा भारत उनकै मुट्ठी में है, उप्पर से निच्चे तक सबकुछ.. माता हैं ऊ, माता..देस की माता, महान त्यागमयी माता, सबसे बड़ी माता..
 
 
गोपिया - भारत माता से भी बड़ी...??
 
मास्साब - औ का, सबसे बड़ी माता..ससुर, आदर से नाम ले उनका....ई बात तू भी समझ ले औ अपनी माई के जाके भी समझा देना..
 
गोपिया- ठीक मास्साब, समझ गए, अब आगे से नै होगा गलती..
 
मास्साब - बहुत बढ़िया, सब्बास !!!

 
अच्छा कालू , अब तू बता के महत्मा गांधी कौन थे..??
 
कालू - महत्मा गांधी.......ऊँ...ऊँ .....?????
 
मास्साब - अबे ऊँ ऊँ क्या करता है गदहा ...महत्मा गंधी को नै जनता है..??
ससुर तू लोग ले के रहेगा हमरी नौकरी. कल बीडीओ, सीओ, डीओ, सब का फौज के साथ जब सिक्षा मंत्री आयेंगे, तो इहे सब जबाब देगा..एतना दिन से तुम लोग को सुग्गा जैसे रटा रहे हैं, दिमाग के पटपट सब, इहै परफोर्मेंस देखायगा ..??
 
गोपिया - मास्साब, मास्साब, एका उत्तर हम बताएं ,हम बताएं...?
 
मास्साब - चल सब्बास बेटा, तू ही बता..
 
गोपिया - महात्मा गंधी थे, देस के बाप...
 
मास्साब - कर दिया न गोबर..अबे देस के बाप नै कहते हैं, कहते हैं "राष्ट्र पिता", माने पूरा राष्ट्र के पिता..
 
दीपुआ - लेकिन मास्साब, फरीद्वा त कहता रहा कि महत्मा गंधी खाली नेहरुए के बाप रहे..
 
मास्साब - कौन फरीद्वा..?? कब कहा, केकरा से कहा..??
 
दीपुआ- मोड पर जो ऊ दर्जीया बैठता है न मास्साब , उहे फरीद्वा.. कल जब हम बापू का पैंट मरम्ती को देवे उके पास गए रहे न, तो पंडीजी भी वहीँ रहे, उनके से फरीद्वा कह रहा था. औ साथे ई भी कह रहा था कि अपना ई पोसुआ दुनम्बरी पूत के परधान बने के जिद के आगे गांधी बाबा न झुक्के रहते आ अंग्रेजन के देस के बांटे वाला साजिस तोड़ दिए रहते , त कुल होता ई सब - दंगा फसाद ,खूनम खून, घिरना, भरम...औ आज भी कांगरेसिए सब के लगावल ऊ आग में हम सब जल रहे हैं.उनका बारिस सब आजौ ई आग को पूरा से पोसे हुए हैं, जालिम कहियो बुझने नै देंगे घिरना के ई आग..
 
मास्साब - चोप्प्प .....!!!! एकदम साइलेंट !!!! सब गलत बात...एकदम गलत बात.. सब फालतू बात बोलता है सब... खबरदार जे आगे से ऐसा बात कहीं सूना आ दुबारा अपना मुंह से कहीं ऊ सब उगिला तो, आगे कभी हम सुने तो चमडिया उधेड़ देंगे तुम सब का..
 
कल मंत्री जी के सामने इहे सब बोलेगा तू लोग...?? नलायक !!!! हमरा, अपना औ ई इस्कूल का, सबका नाक कट्वावेगा रे ..?? सबका सब लफंदर हो गया है तू लोग..
 
अच्छा कमला, तू बता, अपना देश का राष्ट्र गान के लिखे हैं ??
 
कमला - महाकवि श्री रबिन्द्र नाथ टैगोर जी लिखे हैं ..
 
मास्साब - वाह .. बहुत बढ़िया, गुड गर्ल ...
 
अच्छा अब ई त बता, के राष्ट्र गान में कै गो नदी, पहाड़ औ प्रदेस का नाम है..?
 
कमला - आठ गो प्रदेस माने कि राज्य, दू गो पहाड़ और दू गो नदी...
 
मास्साब - वाह ...देखो त, केतना होनहार औ तेज बच्ची है..भेरी गुड बेटा, भेरी गुड...
 
गोपिया - लेकिन मास्साब.. ऐसे आधा अधूरा नाम सब काहे है गीत में..?? अब पूरा राष्ट्र का गीत है, त इमे ऐसे आधा अधूरा नाम सब नै न होया चाहिए...ऊ पर भी देखिये, "सिंध" त अब अपने देस में हइये नै, ई है अब पकिस्तान में, त राष्ट्रगीत में ई एतना बरस से सिंध सिंध काहे घोसा रहा है..चाहे त सिंध के पाकिस्तान से लै के गीत सही किया जाए आ न त गीते बदल के कौनो एकूरेट राष्ट्र गीत बनाया आ गया जाए , तबै न ई कुल ठीक रहेगा..
 
मास्साब - हम देख रहे हैं तुमको, देख रहे हैं...बडका तेज बन गया है तू...बात बात में बहस करता है..हाथ गोड़ तोड़ के धर देंगे तोरा, कहे दे रहे हैं ...कल मंतरी जी के भिजिट बाला मामला नै रहता त अभिये तुमको सबक सिखा देते बच्चू...
 
गधऊ ,जानता है, राष्ट्र गीत हो या संसद सत्ता से जुड़ा कोई भी बात, उसपर ओंगली उठाने से राजद्रोह का अपराध माना जाता है, भयंकर अपराध..बेटा, बाप बेटा मिल चक्की पीसते रह जाओगे जिनगी भर जेल में..
 
अरे दीपुआ, कल तू इहाँ अगिला बैंच पर बैठिहो, औ जे किसी से भी अंगरेजी में कोई सवाल पूछा जाए, त धड से लपक लियो सवाल औ धड से दे दियौ जवाब, समझे कि नहीं..नै त औ कोइयो के मुंह खोले के नौबत से दू मिनट में इस्कूल के इज्जत का कचड़ा बन जायेगा..
 
दीपुआ- ठीक मास्साब ..
 
मास्साब - अच्छा चल बता - ह्वाट इज योर फादर्स नेम ..?
 
दीपुआ - माई फादर्स नेम इज मिश्टर मोहनदास करम चन्द गाँधी, माने कि महत्मा गांधी..
 
मास्साब - अबे ससुर , महत्मा गाँधी कब से तोहरे बाप हो गए रे ..?
 
दीपुआ - मास्साब अभिये न थोड़े देर पाहिले आप कहे थे कि महत्मा गांधी हम सबके , पूरा राष्ट्र के बाप हैं..
 
मास्साब - हे प्रभु, हे दीनानाथ ..कैसा कैसा चमोकन सबको भर दिए आप हमरा किलास में..अबे ऊ वाला बाप नै..असली बाला बाप..बाप माने कि तोहरे माई के पति..समझे कि नहीं...
 
दीपुआ - ओ, त ऐसा कहिये न .. माई फादर्स नेम इज मिश्टर गजोधर लाल पासवान, साइकिल मकैनिक ...
 
मास्साब - गुड, ऐसेही बोलियों, एकदम कन्फिडेंस के साथ.. आ जो ऊ पूछें कि बेटे बड़े होकर क्या बनना चाहते हो, .. त का कहोगे ..??
 
दीपुआ- आई वांट टू बी ए मिनिस्टर ...मोर बिग, मोर स्ट्रोंग एंड फेमस देन यू
 
मास्साब - वाह ...ई हुआ न बात.. गुड , भेरी भेरी गुड ...ऐसे ही अकड़ के.. फुल कान्फिडेंस से बोलियो बेटा ..ठीक ..जामे उनका आँख फटा रह जाए, अपना गाँव के इस्कूल आ बिदियार्थी का एस्टेंडर देख के..आ अन्ग्रेजिये में सब जबाब दियो बेटा ..
 
अच्छा, जे पूछें कि मिनिस्टरे काहे बनना चाहते हो, का करोगे मिनिस्टर बनके..त का कहोगे..?
 
दीपुआ - मास्साब, ईका जबाब हम हिंदिये में दै दें त चलेगा..? काहेकी एकरा अंगरेजी ट्रांस्लेसन हमको ठीक से नै आता है..
 
मास्साब - कोई बात नै बेटा, तू हिंदिये में कह ,हम अंगरेजी में ट्रांस्लेसन करके तोका दै देंगे, तू ओका रट लियो रात भर में...
 
दीपुआ - हम कहेंगे, हम मंत्री औ आपसे भी बड़का पावरफुल मंत्री एहिलिये बनाना चाहते हैं कि आप सब मिल के जौन तरह से आज देस का गाँ$$$.. मार मार के बरबाद बरबाद किये हुए हैं, हम बड़ा होके मंतरी, परधान मंतरी बन के आप सब का गाँ$$$... में बांस कई के अपना भारत माता के दुर्गती के बदलैया लेंगे आप सब से..सड़ा गला, आधा अधूरा सब हटा के ... देस को सरिया के... एक नया औ सुन्दर भारत बनायेंगे..

 
धडाम .... !!!!!
 
गोपिया - अरे रे... का हुआ मास्साब !!! अरे कमला, बिमला, मनोजवा सकील्वा ..सब दौड़ो रे..पानी लाओ..अबे दीपुआ भाग, बोला के ला प्रिंसपल साहेब के... मास्साब आँख चियार दिए हैं..देख देख खाली बेहोसे हुए हैं कि मर मुर गए..
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7.12.11

हाथ का साथ ....




अईसे काहे बघुआ के, अंखिया तरेर के देख रहा है बे,
साला..नंगा..भुक्खर ...???

आ ...समझा !!! ... भूखा है ???
त ई से हमको मतलब..???
सब अपना अपना भाग का खाते हैं...
हम भी अपना पुन्न का स्टाक से खा और इतरा रहे हैं...
तू भूखा.. नंगा... ई तोरा भाग...
त फिर हमरा भरलका मलाईदार छप्पन भोग थरिया देख के ई जलन काहे.. ई आक्रोस काहे..आयं  ??

चल भाग इहाँ से..

नहीं भागेगा..??

त,,, का कल्लेगा बोल..???

जल्ला कट्टा बोली मारेगा...???

हा हा हा हा...कैसे ??

तोरा जीभ त है, हमरे जेब में ...!!!

त,,, अब का ...???

ओ....गोली मारेगा..???

लेकिन कैसे बे...???

हाथ है...???

सबका हाथ काट के हम जमा कर लिए अपना खजाना में...
अब हाथ, केवल औ केवल हमरे पास है...
आ जिसके हाथ में हमरा दिया हाथ है, ओही किसीको भी बोली या गोली, कुच्छो मार सकता है..

एहिलिये न कहते हैं, धड से आके धर लो ई हाथ...ससुर, राज करेगा राज ...!!!

" हमरा हाथ, हमरा हाथ धरने वाले हर जन- जनावर के साथ "



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15.2.11

प्रेम पर्व ..



प्रेम का पावन साप्ताहिकी अनुष्ठान  हर्षोल्लास के साथ अंततः संपन्न हुआ. एक दो दिन में आंकड़े आ जायेंगे कि इन सात दिनों में फूल,कार्ड तथा गिफ्ट आइटमों का कितने का कारोबार हुआ है. खैर, कल पूरे दिन मुझे मेरी नानी याद आती रही. मन कचोट कचोट जाता रहा कि आज अगर वे होतीं तो कितना मजा आता..उन्हें इस पर्व के बारे में हम बताते और उनकी प्रतिक्रिया देखते. अपना क्या कहें, प्रेम-प्यार, परिवार विस्तार सब हो कर एक दशक से अधिक बीत गया, तब जाकर पहली बार इस पुनीत पर्व का नाम सुनने का सौभाग्य मिला .. भकुआए हम, पतिदेव से पूछे , ई का होता है जी, अखबार ,टी वी सब में इ नाम का घनघोर मचा हुआ है. पहले तो घुड़कते हुए उन्होंने मेरा गड़बड़ाया उच्चारण सुधारा, फिर मेरे गँवईपन की जमकर खिल्ली उडी और तब जाकर इस पावन पर्व की महत कथा श्रवण का सुयोग  मिला.. उस दिन भी सबसे पहले ध्यान में नानी ही आई थी...मन में आया कि अविलम्ब ट्रेन पकड़ नानी के पास जाऊं और उन्हें यह सब सविस्तार बताऊँ...पर अफ़सोस कि मैंने ट्रेन पकड़ने में देर कर दी और जबतक मैं उनके पास जाती उन्होंने गोलोकधाम की ट्रेन पकड़ ली..


हमारे गाँव में नया नया सिनेमा हाल खुला. अब यह अलग बात थी कि मिट्टी की दीवार और फूंस की टट्टी से छराया वह गोहाल टाईप हाल केवल प्रोजेक्टर और परदे के कारण सिनेमा हाल कहलाने लायक था, पर हमारे लिए तो वह किसी मल्टीप्लेक्स से कम न था. क्या क्रेज था उसका.ओह... हम भाई बहन तो भाग कर दो तीन बार उधर हो आये थे ,पर बेचारी मामियों को इसका सौभाग्य न मिला था..उसपर भी जब हम आनंद रस वर्णन सरस अंदाज में उनके सम्मुख परोसते तो बेचारियाँ हाय भरकर रह जातीं थीं..खैर उनकी हाय हमारे ह्रदय तक पहुँच हमें झकझोर गई और हमने निर्णय लिया कि नानी को पटा मामियों का सौभाग्य जगाया जाय. तो बस दो दिनों तक नानी के पीछे भूत की तरह लग आखिर उन्हें इसके लिए मना ही लिया..

नानी के गार्जियनशिप में घर की सभी बहुएं, दाइयां ,नौकर और हम भाई बहन मिला करीब तीस पैंतीस लोग सिनेमा देखने गए..उस अडवेंचर और आनंद का बखान शब्दों में संभव नहीं..पर उससे भी आनंद दायक रहा कई माह तक नानी का उस फिल्म के प्रणय दृश्यों पर झुंझलाना और गरियाना. नानी को घेर हम प्रसंग छेड़ देते और फिर जो नानी उसपर अपनी टिपण्णी देती कि, ओह रे ओह...

" पियार ..पियार ..पियार ...ई का चिचियाने ,ढिंढोरा पीटने का चीज है...कोई शालीनता लिहाज,लाज होना चाहिए कि नही..." जिस अंदाज में वे कहतीं कि हँसते हँसते पेट में बल पड़ जाता...

एक बार घर के सारे पुरुष सदस्य रिश्तेदारी में शादी में चले गए थे. घर में बच गयीं मामियां, बाल बुतरू, नानी और नानाजी. जाते तो नानाजी भी ,लेकिन उनकी तबियत कुछ सुस्त थी सो वे घर पर ही रुक गए थे. इधर पुरुषों को निकले एक पहर भी नहीं बीता था कि उल्टी दस्त और बुखार से नानाजी की स्थिति गंभीर हो गई. वैद जी बुलाये गए. उन्होंने कुछ दवाइयाँ दीं जिसे कुछ कुछ देर के अंतराल पर देनी थी.. लेकिन समस्या थी कि घर में बहुओं के आने के बाद से वर्षों से ही नानाजी दरवाजे (बैठक ) पर ही रहते आये थे, जहाँ घर की स्त्रियाँ जाकर रह नहीं सकती थीं. तो मामियों ने जोर देकर नानाजी को जनानखाने में बुलवाया और खूब फुसला पनियाकर नानीजी को उनकी सेवा में लगाया. एक तरफ पति की बीमारी की चिंता और दूसरी तरफ बहुओं से लिहाज के बीच नानी का जो हाल हमने देखा था, आज भी नहीं भूल पाए हैं..

उम्र के साथ नानीजी के आँख की रौशनी तेजी से मंद पड़ती जा रही थी..नमक की जगह चीनी और दस टकिये की जगह सौ टकिये का लोचा लगातार ही बढ़ता चला जा रहा था..सब समझाते डॉक्टर को दिखाने को, पर नानी टालती जाती थी. पर एक बार जब सात मन आटे के ठेकुए में चार मन नमक डाल  आटा मेवा घी आदि की बलि चढी जिसे कुत्ते और गोरू भी सूंघकर छोड़ देते थे, तो नानी डाक्टर को दिखाने को राजी हुईं. डॉक्टर ने देखा और चश्मा बन गया...

दो दिन बाद मामा जी ने नानी से पूछा , अब तो ठीक से दिख रहा है न माँ, कोई दिक्कत नहीं न. सुस्त सी आवाज में उन्होंने कहा, हाँ बेटा ठीक ही है..मामा ने कहा,ठीक है, तो ऐसे मरियाये काहे कह रही है..तो नानी ने तुरंत बुलंद आवाज में भरोसा दिलाया कि ,सब ठीक है,बढ़िया है..लेकिन मामाजी ताड़ गए थे,उनके पीछे पड़ गए..तब उन्होंने बताया कि डॉक्टर जब आँख पर शीशा लगा रहा था, तो एक जो शीशा उसने लगाया,जैसे ही लगाया ,भक्क से सब उजियार हो गया,सब कुछ दिखने लगा..

मामा परेशान..तो क्या इस शीशा से ठीक से नहीं दिखा रहा ???

नानी - दिखा रहा है बेटा..काम चल जा रहा है..पर उ बेजोड़ था..

मामा अधिक परेशान - तो फिर ई वाला शीशा काहे ली..

नानी- ऐसे ही पैसा लगा देती ???

मामा - माने ?????

नानी- अरे, जादा दीखता तो जादा पैसा लगता न....

नानी ने कम दिखाई पड़ने वाले शीशे से काम चला अपने पति पुत्र का पैसा बचा लिया था...

आदमी तो आदमी कुत्ते बिल्ली से भी नानी प्रेम करतीं थीं. घर के सारे कुत्ते बिल्ली नानी के आगे पीछे  डोलते रहते थे..बिल्लियाँ तो उनके कर(शरीर) लग ही सोती थीं ..गाँव भर में मियाँ बीबी की लड़ाई हो या किसीके घर कोई बीमार पड़े. नानी वहां उपस्थित होतीं थीं..सारे गाँव का दुःख दर्द,पौनी पसारी(मेहमान) नानी के अपने थे..देवीं थीं वे सबके लिए..नानी नाना से लगभग पच्चीस वर्ष छोटी थीं ,लेकिन नानाजी के देहांत के बाद उनकी बरखी से पहले ही उनका साथ निभाने चट पट दुनियां से निकल गयीं. नानाजी के साथ ही जैसे उनका जीवन सोत भी सूख गया .. नानाजी गुजरे उस समय भी उन्हें अटैक आया था,पर यह तब लोग जान पाए जब नानाजी के बरखी के पहले उन्हें मेजर अटैक आया..शहर के सबसे बड़े अस्पताल में उन्हें भरती कराया गया. सबकी दुआ थी कि हफ्ते भर में वे आई सी यू से बाहर आ गयीं... केबिन में उन्हें रखा गया और डॉक्टर ने कहा कंडीशन ठीक रहा तो चार दिन बाद डिस्चार्ज कर देंगे..

जीवन भर पूरे टोले मोहल्ले घर घर को नानी ने जितना प्यार बांटा था, उन्हें देखने वालों का अस्पताल में तांता लगा हुआ था..नानी के उन्ही भक्तों में से एक अभागे ने मामा लोगों की बड़ाई कर नानी को सुखी करने के ख़याल से कह दिया..." ऐसे बेटे भगवान् सबको दें. लाखों लाख बाबू उझल दिए अपनी माँ पर, पर माथे पर शिकन नहीं लाये ,यही तो है आपकी कमाई .. और का चाहिए जीवन में..".. बस इतना काफी था उनके लिए. बेटों का पैसा पानी हो,यह वे बर्दाश्त कर सकतीं थीं ?? दो मिनट के अन्दर उन्होंने प्राण त्याग दिया...

प्रेम क्या होता है ,कैसे निभाया जाता है, मेरे कच्चे मन ने बहुत कुछ समझा गुना था उनसे ..आज सोचती हूँ तो लगता है,व्यक्तिगत सुख के प्रति आवश्यकता से अधिक सजग, हममे क्या प्रेम कर पाने की क्षमता है????

खैर, हम भी न.. का कहने निकले थे और का कहने बैठ गए..आज अखबार में पढ़ा प्रेम पर्व विरोधी, प्रेमियों को झाडी झाडी ढूंढ ढूंढ कर परेशान किये हुए हैं (ई अलग बात है कि पुलिस भी इन संस्कृति रक्षकों को दौड़ा दौड़ा के तडिया रही है)...बड़ा खराब लगा हमको..देखिये न कैसे प्रेम का दुश्मन जमाना बना हुआ है.आज ही क्या सदियों सदियों से.. जहाँ कोई प्रेमी मिला नहीं कि उसे कीड़े की तरह मसल देने को समाज मचल उठता है..बताइये , ई भी कोई बात हुआ.अरे मिलने दीजिये प्रेमी जोड़ों को, ऐसा भी क्या खार खाना. ऐसा कीजिये कि मार काट छोडिये...प्रेमियों में प्रेम पनपे और विरह उरह वाला स्थिति आये, उससे पहले उनके प्रेम को फुल फेसिलिटेट कर परवान चढ़ा दीजिये..ब्याह शादी कर दीजिये और साल भर के लिए प्रेमी जोड़े को स्वादिष्ट भोजन पानी,ओढना बिछौना, शौचालय आदि आदि सभी सुविधाओं से लैस एक खूब सुन्दर कमरे में अच्छी तरह से केवल औ केवल प्रेम कर लेने को बंद कर दीजिये..और भर भर के कमाइए पुन्न..

वैसे मुझे लगता है लैला मजनू,शीरी फरहाद ,रोमियो जूलियट या असंख्य ऐसे जोड़ों को यदि मार डालने के स्थान पर प्रेम करने की इस तरह की एकमुश्त सुविधा दी जाती तो उन्हें मारने वालों को अपने हाथ मैले न करने पड़ते.. साल भर के लिए प्रेमी एक कमरे में सब काम छोड़ केवल प्रेम करने को बाध्य रहते तो हम दावा करते हैं छः महीना के अन्दर प्रेम प्यार साफ़ आ  कत्लेआम मच जाता.. प्रेम में विछोह रहे ,तभिये तक प्रेम प्यारा लगता है...प्रेम कर लेना तो सबसे आसान है ..पर निभाना...
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है...

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6.8.10

धन का सदुपयोग ..

अस्त्र सश्त्रों के विषय में मेरी अल्पज्ञता ठीक वैसी ही है ,जैसी मंत्री पद पर आसीन किसी जनसेवक की अपने क्षेत्र की जनसमस्याओं के विषय में हुआ करती है..सो पूर्णतः अनभिज्ञ हूँ कि एक इंसास रायफल का क्रय या विक्रय (चोर बाजार में)मूल्य क्या होता है, परन्तु इतना मैं जानती हूँ कि यदि इंसास रायफल बेचकर साढ़े तीन लाख रुपये मिले और उस पैसे से एक आटा चक्की लगवाई जाय, एक स्कूटी,एक टी वी तथा कुछ अन्य घरेलू उपकरण खरीदने के उपरान्त भी इसमें से एक लाख रुपये बचाकर भविष्य कोष में संरक्षित रख लिया जाय, तो इससे अच्छा निवेश, इससे अच्छी दूरंदेसी तथा इससे अच्छा धन का सदुपयोग और कुछ नहीं हो सकता..

प्रसंग स्पष्ट न हुआ ?? अरे, स्पष्ट होगा भी कैसे ,राहुल डिम्पी में व्यस्त हमारे राष्ट्रीय चैनलों को यह अवकाश कहाँ कि अपना कैमरा इन उल्लेखनीय समाचारों पर भी घुमाएं. प्रकरण यह है कि, विगत कुछ दिनों से थानों से अस्त्र लुप्त होने की घटनाएं हमारे प्रादेशिक समाचार पत्र को शोभायमान कर रहे थे ,जिसमे कि इसके संरक्षकों (पुलिसकर्मियों) की ही संलिप्तता थी.कई दिनों तक अखबार के पांचवें छट्ठे पन्ने पर स्थान पाता हुआ यह समाचार अंततः मुख्यपृष्ठ को प्राप्त हुआ ,जिसमे प्रमाण सहित उधृत था कि अमुक पुलिसकर्मी के नाम आवंटित, अमुक इंसास को, अमुक व्यक्ति ने कोलकाता के, अमुक व्यक्ति को साढ़े तीन लाख में बेचा और प्राप्त उस धन को, अमुक अमुक मद में व्यय किया...

मेरी दृष्टि में महत्वपूर्ण व उल्लेखनीय यह चौरकर्म नहीं , अपितु वह निवेश है, जिसे इतनी दूरदर्शिता व कुशलता से निष्पादित दिया गया है..यह प्राणिमात्र के लिए प्रेरक और अनुकरणीय है...यह, यह भी सिखाता है कि अपने जीवन यापन हेतु केवल सरकार या किसी संस्था विशेष पर आश्रित न रहा जाय बल्कि व्यक्ति अपने पुरुषार्थ के बल पर अपने तथा अपने परिवार का भविष्य निर्मित करे ..और सबसे महवपूर्ण बात यह कि धन चाहे ईमानदारी से कमाया हुआ हो या चोरी चकारी घूसखोरी,बेईमानी से ,अर्जित धन को ऐश मौज ,हँड़िया - दारू में व्यर्थ न गंवाते हुए व्यक्ति भविष्य संवारने में लगाये ...

असाधारण यह प्रसंग यूँ ही ठठ्ठा में उड़ा दिया जाने योग्य नहीं, बहुआयामी चिंतन योग्य भी है...समाचार पत्र ने उक्त व्यक्ति द्वारा क्रयित उपकरणों की जो तालिका प्रस्तुत की है,यह चतुर्थ वर्ग के सरकारी कर्मचारी की करुण आर्थिक स्थिति की बेमिसाल झांकी है...अवकाश प्राप्ति के निकट पहुंचा एक पुलिसकर्मी , इतने वर्षों की चाकरी के उपरान्त भी अपने लिए एक नंबर के पैसे से स्कूटी, टी वी जैसे सामान्य उपकरण भी न खरीद पाए ,तो इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है...और ऐसे में इस नीरीह जीव से यदि हम अपेक्षा करें कि अपना सर्वस्व न्योछावर करने में तो वह एक पल न लगाये ,पर अपने और अपने संतान के भविष्य के लिए वह किंचित भी चिंतित न हो ,तो यह इनके प्रति अन्याय नहीं तो और क्या है ???

मुझे तो यह नहीं समझ आ रहा कि यह भलामानुष चोर या अपराधी कैसे हुआ..इतने वर्षों में जहाँ झारखण्ड के दिग्गज लालों ने कई कई हज़ार करोड़ की राशि यूँ ही डकार,पचा, अपने तथा अपने पीढ़ियों के लिए स्विस बैंक में संरक्षित रख रखा है, तो उसके सामने सागर जल में से एक बूँद यदि इस झारखंडी लाल ने अपने लिए निकाल लिया तो इसमें हाय तौबा लायक क्या है..इन दिग्गजों के सम्मुख इन निरीहों को चोर कहना इस शब्द तथा कृत्य की घोर अवमानना है . इस महान व्यक्ति को तो गद्दार नहीं ,देशभक्त कहना होगा, जिसने धन से किसी और का घर नहीं भरा बल्कि पूरा का पूरा धन यहीं अपने ही क्षेत्र में,घर के एकदम बगल में ऐसे स्थान में निवेश किया जहाँ आटा,मसाला आदि पिसवाने की भी सुविधा नहीं है..इस तरह एक साथ अपना और अपने आस पास का भला सोचने वाले आज कितने राजनेता हैं...

वैसे भी तो ये अस्त्र शस्त्र नक्सली लूट ही ले जाते और फिर इन्ही के अस्त्रों से इन्हें निपटा डालते...तो अच्छा ही हुआ न कि इन्होने अपने प्राण भी बचाए और इन अस्त्रों को सदगति भी दे दी..अब इन बेचारों को अपराधियों नक्सलियों से भिड़ने, उन्हें मारने की आज्ञा तो है नहीं, क्योंकि उनमे से अधिकाँश या तो सीधे स्वयं ही नेता हैं और बाकी बचे उन नेताओं के सगे संबंधी या लगुए भगुए , तो यूँ ही वर्षों से व्यर्थ पड़े जंग लग रहे अस्त्रों को उपयुक्त हाथों बेच इन्होने पुण्य का काम ही किया है...

रात दिन अपनी तथा इन अस्त्रों की रक्षा करते करते बेचारे पुलिसकर्मियों के प्राण यूँ ही सांसत में फंसे रहते हैं ,ऐसे में स्वयं को तनाव मुक्त रखने का इससे उपयुक्त उपाय और कुछ हो सकता है भला ?? मुझे तो लगता है इस अनुकरणीय कृत्य को प्रत्येक थाने में, प्रत्येक पुलिस कर्मी द्वारा अपनाना चाहिए...बल्कि यही क्यों, अपने पुलिस कर्मियों को समय पर वेतन भत्ते सुविधाएँ दे पाने में अक्षम झारखण्ड सरकार को चाहिए कि अस्त्र शस्त्र सहित पूरा पुलिस बल ही नक्सलियों को इस अनुबंध के साथ आउटसोर्स (हस्तांतरित) कर दे कि सुव्यवस्थित व सुसंगठित ढंग से व्यवस्था चलाने में सिद्धहस्त ये संगठन राज्य तथा पुलिस बल की सुरक्षा करें..अपरोक्ष रूप से नहीं, बल्कि सीधे सीधे प्रत्यक्षतः राज्य व्यवस्था का सञ्चालन करें..

कहने की आवश्यकता नहीं कि पिछले एक दशक से भी कम समय में, जिस प्रकार से इन संगठनों ने अपने आप को सुसंगठित ,सुदृढ़ तथा प्रभावशाली बनाया है,यह इनकी कुशल प्रबंधन क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण है.इनके हाथों राज्य की बागडोर आते ही निश्चित ही राज्य का बहुमुखी विकाश होगा..राज्य व्यवस्था प्रत्यक्ष इनके हाथों होगी तो , न तो इनके द्वारा न आमजन द्वारा हड़ताल, बंदी या अन्य अव्यवस्था की स्थिति बनेगी. तो ऐसे में निश्चित है कि राज्य का आय बढेगा ही बढेगा.इसमें समग्र रूप से नेता ,जनता तथा संगठन सबका हित होगा...

देखिये कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि दस बीस दर्जन पुलिस कर्मी एक साथ मर जाएँ तो भी सरकार कहती है कि ,इन्हें तो रखा ही गया है भिड़ने मरने के लिए..लेकिन एक नक्सली मारा जाये तो पांच पांच राज्यों की सांस एक साथ इनके एक आवाज पर बंद हो जाती है..संगठन में भरती के लिए न शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता ,न जात पात या आरक्षण की किचकिच, बस दिल में जज्बा हो और हथियार चलाने का हुनर,फिर जीवन और भविष्य सुरक्षित..मरने पर परिवार वालों को कम्पंशेशन पाने का कोई चक्कर नहीं.ऐसे में बस एक इस पार से उसपार जाते ही पुलिसकर्मी कितने सुखी और सुरक्षित हो जायेंगे...

खैर, ये सब बड़ी बड़ी बाते हैं, झारखण्ड सरकार पूरे पुलिस तथा शासन तंत्र को नक्सलियों के हवाले करे न करे या जब करे तब करे, अभी मैं सरकार से निवेदन करना चाहती हूँ कि, इस महत घटना में लिप्त पुलिसकर्मियों को अवश्य ही पुरस्कृत करे दे.. क्योंकि यदि यह न किया गया तो जनमानस को कभी न समझाया जा सकेगा कि धन चाहे इमानदारी का हो या बेईमानी का सदा उसका सदुपयोग ही करना चाहिए...

......................

23.1.09

! ! स्वर्ग ! ! ( व्यंग्य )

- देख तेरे लिए तेरी पसंद की कचौड़ी जलेबी लाया हूँ ,एकदम गरमा गरम......चल फटा फट खा ले.......दो दिन से तूने कुछ नही खाया........देख तो कैसे मुंह सूख गया है........चल गुस्सा छोड़...खा ले जल्दी से.......फ़िर हम तुम मजे करेंगे............देख तो कितनी मस्त हवा चल रही है,कितना मस्त मौसम है........अच्छा चल ले, कान पकड़ता हूँ......अपनी कसम......माँ की कसम .......तेरे सर की कसम,अब कभी तेरे पर हाथ न उठाऊंगा.

-चलो हटो,कह दिया न भूल से भी छूना मत मुझे,नही चाहिए...जलेबी कचौडी.......भूखी मर जाउंगी, पर इसको हाथ न लगाउंगी ....याद है, आज तक कितनी बार क़समें खा चुके हो........बस एक बार पेट में बोतल उतारी नही कि सारी क़समें घास चरने चली जाती हैं........अब मैं तुम्हारी बातों में नही आने वाली.....अब किसी भरम में न रहूंगी.......

- अच्छा चल इस बार पक्का.....एकदम से पक्का......कह दिया न ...देख लेना.....तू भी तो बस, उस वक्त ताव दिला देती है जब मेरा दिमाग ठिकाने नही रहता........ देख तेरे बिना मैं जी सकता हूँ ???? तू तो मेरी जान है.....

- अच्छा.... मैं जान हूँ???? तो वो सब कौन हैं ???

- अरे बेवकूफ ,वो सब तो पत्तलें हैं,खाकर बाहर फेंक आता हूँ.........और तू तो थाली है,वो भी सोने वाली,सहेजकर हिफाजत से घर में रखने वाली.....

- अच्छा......सोने की ही सही,मैं भी तो सामान ही हुई न तुम्हारे लिए ???

- अरे, ऐसे बुरा न मान........तू तो जानती है, मैं तुझसे कितना प्यार करता हूँ........

- अच्छा, एक बात बताओ....आख़िर मुझमे क्या कमी है,जिसके लिए तुम्हे बाहर पत्तलों के पीछे जाना पड़ता है ????

- तुझमे कोई कमी नही रे.........देख..... तूने देखा है न,अपने सारे देवता कई कई बीबियाँ रखे हुए हैं,तो भी कोई उनकी शिकायत करता है ? पूजा ही करता है न ... अपने कृष्ण भगवान् को ही ले ले ....सोलह हजार रानियाँ रखे हुए थे......कोई उनकी शिकायत करता है ?.... तू भी तो उनकी पूजा ही करती है,सुबह शाम दिया दिखiती है....अरे यह तो रिवाज है.......मर्दानगी की निशानी है.....अपने यहाँ का शान है......राजा महराजा भी तो इतनी बीबियाँ रखते थे......इनकी तो छोड़........अच्छे करम कर जब लोग स्वर्ग जाते हैं, वहां क्या मिलता है ???? एक से बढ़कर एक दारू और एक से बढ़कर एक अप्सरा .........तो जब धरती से लेकर स्वर्ग तक यह जायज है तो ,तुझे क्यों इतना ऐतराज है ??..........अब मैं कहीं भी जाऊं ......वहां कुछ छोड़ कर आता हूँ ???? एकदम साबुत तेरे पास ही तो लौटता हूँ......तेरे प्यार में, तेरा ख़याल रखने में, कोई कमी रखता हूँ??? चल तू ही बता..........

- अच्छा एक बात पूछूं ???????

- हाँ पूछ न.........जो पूछेगी सब का जवाब दूँगा.........

- एक बात बताओ........अच्छे करम करने से स्वर्ग मिलता है ???? हैं न ??

- हाँ ,बिल्कुल.........

- और स्वर्ग में ,दारू और अप्सराएँ मिलती है ????

- हाँ बिल्कुल..बिल्कुल .........

- तो मान लो, आज से मैं तुमसे कोई शिकायत न करूँ, तुम्हारी हर बात मानू, केवल अच्छे काम करूँ .......तो मुझे पुण्य मिलेगा न ???

- हाँ ,हाँ ....क्यों नही........

- अच्छा ,जो मुझे पुण्य मिलेगा तो स्वर्ग भी मिलेगा ????

- हाँ रे....


- अच्छा ,तो तुम्हारे लिए तो दारू अप्सराएँ होंगी स्वर्ग में ,मेरे लिए क्या होगा ??

- ???????????


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