15.2.11

प्रेम पर्व ..



प्रेम का पावन साप्ताहिकी अनुष्ठान  हर्षोल्लास के साथ अंततः संपन्न हुआ. एक दो दिन में आंकड़े आ जायेंगे कि इन सात दिनों में फूल,कार्ड तथा गिफ्ट आइटमों का कितने का कारोबार हुआ है. खैर, कल पूरे दिन मुझे मेरी नानी याद आती रही. मन कचोट कचोट जाता रहा कि आज अगर वे होतीं तो कितना मजा आता..उन्हें इस पर्व के बारे में हम बताते और उनकी प्रतिक्रिया देखते. अपना क्या कहें, प्रेम-प्यार, परिवार विस्तार सब हो कर एक दशक से अधिक बीत गया, तब जाकर पहली बार इस पुनीत पर्व का नाम सुनने का सौभाग्य मिला .. भकुआए हम, पतिदेव से पूछे , ई का होता है जी, अखबार ,टी वी सब में इ नाम का घनघोर मचा हुआ है. पहले तो घुड़कते हुए उन्होंने मेरा गड़बड़ाया उच्चारण सुधारा, फिर मेरे गँवईपन की जमकर खिल्ली उडी और तब जाकर इस पावन पर्व की महत कथा श्रवण का सुयोग  मिला.. उस दिन भी सबसे पहले ध्यान में नानी ही आई थी...मन में आया कि अविलम्ब ट्रेन पकड़ नानी के पास जाऊं और उन्हें यह सब सविस्तार बताऊँ...पर अफ़सोस कि मैंने ट्रेन पकड़ने में देर कर दी और जबतक मैं उनके पास जाती उन्होंने गोलोकधाम की ट्रेन पकड़ ली..


हमारे गाँव में नया नया सिनेमा हाल खुला. अब यह अलग बात थी कि मिट्टी की दीवार और फूंस की टट्टी से छराया वह गोहाल टाईप हाल केवल प्रोजेक्टर और परदे के कारण सिनेमा हाल कहलाने लायक था, पर हमारे लिए तो वह किसी मल्टीप्लेक्स से कम न था. क्या क्रेज था उसका.ओह... हम भाई बहन तो भाग कर दो तीन बार उधर हो आये थे ,पर बेचारी मामियों को इसका सौभाग्य न मिला था..उसपर भी जब हम आनंद रस वर्णन सरस अंदाज में उनके सम्मुख परोसते तो बेचारियाँ हाय भरकर रह जातीं थीं..खैर उनकी हाय हमारे ह्रदय तक पहुँच हमें झकझोर गई और हमने निर्णय लिया कि नानी को पटा मामियों का सौभाग्य जगाया जाय. तो बस दो दिनों तक नानी के पीछे भूत की तरह लग आखिर उन्हें इसके लिए मना ही लिया..

नानी के गार्जियनशिप में घर की सभी बहुएं, दाइयां ,नौकर और हम भाई बहन मिला करीब तीस पैंतीस लोग सिनेमा देखने गए..उस अडवेंचर और आनंद का बखान शब्दों में संभव नहीं..पर उससे भी आनंद दायक रहा कई माह तक नानी का उस फिल्म के प्रणय दृश्यों पर झुंझलाना और गरियाना. नानी को घेर हम प्रसंग छेड़ देते और फिर जो नानी उसपर अपनी टिपण्णी देती कि, ओह रे ओह...

" पियार ..पियार ..पियार ...ई का चिचियाने ,ढिंढोरा पीटने का चीज है...कोई शालीनता लिहाज,लाज होना चाहिए कि नही..." जिस अंदाज में वे कहतीं कि हँसते हँसते पेट में बल पड़ जाता...

एक बार घर के सारे पुरुष सदस्य रिश्तेदारी में शादी में चले गए थे. घर में बच गयीं मामियां, बाल बुतरू, नानी और नानाजी. जाते तो नानाजी भी ,लेकिन उनकी तबियत कुछ सुस्त थी सो वे घर पर ही रुक गए थे. इधर पुरुषों को निकले एक पहर भी नहीं बीता था कि उल्टी दस्त और बुखार से नानाजी की स्थिति गंभीर हो गई. वैद जी बुलाये गए. उन्होंने कुछ दवाइयाँ दीं जिसे कुछ कुछ देर के अंतराल पर देनी थी.. लेकिन समस्या थी कि घर में बहुओं के आने के बाद से वर्षों से ही नानाजी दरवाजे (बैठक ) पर ही रहते आये थे, जहाँ घर की स्त्रियाँ जाकर रह नहीं सकती थीं. तो मामियों ने जोर देकर नानाजी को जनानखाने में बुलवाया और खूब फुसला पनियाकर नानीजी को उनकी सेवा में लगाया. एक तरफ पति की बीमारी की चिंता और दूसरी तरफ बहुओं से लिहाज के बीच नानी का जो हाल हमने देखा था, आज भी नहीं भूल पाए हैं..

उम्र के साथ नानीजी के आँख की रौशनी तेजी से मंद पड़ती जा रही थी..नमक की जगह चीनी और दस टकिये की जगह सौ टकिये का लोचा लगातार ही बढ़ता चला जा रहा था..सब समझाते डॉक्टर को दिखाने को, पर नानी टालती जाती थी. पर एक बार जब सात मन आटे के ठेकुए में चार मन नमक डाल  आटा मेवा घी आदि की बलि चढी जिसे कुत्ते और गोरू भी सूंघकर छोड़ देते थे, तो नानी डाक्टर को दिखाने को राजी हुईं. डॉक्टर ने देखा और चश्मा बन गया...

दो दिन बाद मामा जी ने नानी से पूछा , अब तो ठीक से दिख रहा है न माँ, कोई दिक्कत नहीं न. सुस्त सी आवाज में उन्होंने कहा, हाँ बेटा ठीक ही है..मामा ने कहा,ठीक है, तो ऐसे मरियाये काहे कह रही है..तो नानी ने तुरंत बुलंद आवाज में भरोसा दिलाया कि ,सब ठीक है,बढ़िया है..लेकिन मामाजी ताड़ गए थे,उनके पीछे पड़ गए..तब उन्होंने बताया कि डॉक्टर जब आँख पर शीशा लगा रहा था, तो एक जो शीशा उसने लगाया,जैसे ही लगाया ,भक्क से सब उजियार हो गया,सब कुछ दिखने लगा..

मामा परेशान..तो क्या इस शीशा से ठीक से नहीं दिखा रहा ???

नानी - दिखा रहा है बेटा..काम चल जा रहा है..पर उ बेजोड़ था..

मामा अधिक परेशान - तो फिर ई वाला शीशा काहे ली..

नानी- ऐसे ही पैसा लगा देती ???

मामा - माने ?????

नानी- अरे, जादा दीखता तो जादा पैसा लगता न....

नानी ने कम दिखाई पड़ने वाले शीशे से काम चला अपने पति पुत्र का पैसा बचा लिया था...

आदमी तो आदमी कुत्ते बिल्ली से भी नानी प्रेम करतीं थीं. घर के सारे कुत्ते बिल्ली नानी के आगे पीछे  डोलते रहते थे..बिल्लियाँ तो उनके कर(शरीर) लग ही सोती थीं ..गाँव भर में मियाँ बीबी की लड़ाई हो या किसीके घर कोई बीमार पड़े. नानी वहां उपस्थित होतीं थीं..सारे गाँव का दुःख दर्द,पौनी पसारी(मेहमान) नानी के अपने थे..देवीं थीं वे सबके लिए..नानी नाना से लगभग पच्चीस वर्ष छोटी थीं ,लेकिन नानाजी के देहांत के बाद उनकी बरखी से पहले ही उनका साथ निभाने चट पट दुनियां से निकल गयीं. नानाजी के साथ ही जैसे उनका जीवन सोत भी सूख गया .. नानाजी गुजरे उस समय भी उन्हें अटैक आया था,पर यह तब लोग जान पाए जब नानाजी के बरखी के पहले उन्हें मेजर अटैक आया..शहर के सबसे बड़े अस्पताल में उन्हें भरती कराया गया. सबकी दुआ थी कि हफ्ते भर में वे आई सी यू से बाहर आ गयीं... केबिन में उन्हें रखा गया और डॉक्टर ने कहा कंडीशन ठीक रहा तो चार दिन बाद डिस्चार्ज कर देंगे..

जीवन भर पूरे टोले मोहल्ले घर घर को नानी ने जितना प्यार बांटा था, उन्हें देखने वालों का अस्पताल में तांता लगा हुआ था..नानी के उन्ही भक्तों में से एक अभागे ने मामा लोगों की बड़ाई कर नानी को सुखी करने के ख़याल से कह दिया..." ऐसे बेटे भगवान् सबको दें. लाखों लाख बाबू उझल दिए अपनी माँ पर, पर माथे पर शिकन नहीं लाये ,यही तो है आपकी कमाई .. और का चाहिए जीवन में..".. बस इतना काफी था उनके लिए. बेटों का पैसा पानी हो,यह वे बर्दाश्त कर सकतीं थीं ?? दो मिनट के अन्दर उन्होंने प्राण त्याग दिया...

प्रेम क्या होता है ,कैसे निभाया जाता है, मेरे कच्चे मन ने बहुत कुछ समझा गुना था उनसे ..आज सोचती हूँ तो लगता है,व्यक्तिगत सुख के प्रति आवश्यकता से अधिक सजग, हममे क्या प्रेम कर पाने की क्षमता है????

खैर, हम भी न.. का कहने निकले थे और का कहने बैठ गए..आज अखबार में पढ़ा प्रेम पर्व विरोधी, प्रेमियों को झाडी झाडी ढूंढ ढूंढ कर परेशान किये हुए हैं (ई अलग बात है कि पुलिस भी इन संस्कृति रक्षकों को दौड़ा दौड़ा के तडिया रही है)...बड़ा खराब लगा हमको..देखिये न कैसे प्रेम का दुश्मन जमाना बना हुआ है.आज ही क्या सदियों सदियों से.. जहाँ कोई प्रेमी मिला नहीं कि उसे कीड़े की तरह मसल देने को समाज मचल उठता है..बताइये , ई भी कोई बात हुआ.अरे मिलने दीजिये प्रेमी जोड़ों को, ऐसा भी क्या खार खाना. ऐसा कीजिये कि मार काट छोडिये...प्रेमियों में प्रेम पनपे और विरह उरह वाला स्थिति आये, उससे पहले उनके प्रेम को फुल फेसिलिटेट कर परवान चढ़ा दीजिये..ब्याह शादी कर दीजिये और साल भर के लिए प्रेमी जोड़े को स्वादिष्ट भोजन पानी,ओढना बिछौना, शौचालय आदि आदि सभी सुविधाओं से लैस एक खूब सुन्दर कमरे में अच्छी तरह से केवल औ केवल प्रेम कर लेने को बंद कर दीजिये..और भर भर के कमाइए पुन्न..

वैसे मुझे लगता है लैला मजनू,शीरी फरहाद ,रोमियो जूलियट या असंख्य ऐसे जोड़ों को यदि मार डालने के स्थान पर प्रेम करने की इस तरह की एकमुश्त सुविधा दी जाती तो उन्हें मारने वालों को अपने हाथ मैले न करने पड़ते.. साल भर के लिए प्रेमी एक कमरे में सब काम छोड़ केवल प्रेम करने को बाध्य रहते तो हम दावा करते हैं छः महीना के अन्दर प्रेम प्यार साफ़ आ  कत्लेआम मच जाता.. प्रेम में विछोह रहे ,तभिये तक प्रेम प्यारा लगता है...प्रेम कर लेना तो सबसे आसान है ..पर निभाना...
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है...

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72 comments:

Alexchris123 said...

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Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

आदरणीया रंजना जी
सादर सस्नेहाभिवादन !
प्रेम पर्व के माध्यम से बचपन की स्मृतियों , संयुक्त परिवार की झलक , नानी और नाना … और इतनी प्यारी बातें !
पढ़ कर आनन्द आ गया सचमुच !
… और आपकी शैली कम्माल की है ! बहुत बहुत बधाई और आभार !

आपने लिखा -
अरे मिलने दीजिये प्रेमी जोड़ों को, ऐसा भी क्या खार खाना.
ऐसा कीजिये कि मार काट छोडिये… प्रेमियों में प्रेम पनपे और विरह उरह वाला स्थिति आये,
उससे पहले उनके प्रेम को फुल फेसिलिटेट कर परवान चढ़ा दीजिये…
ब्याह शादी कर दीजिये


आपके द्वारा सुझाए गए इस निदान से मैं भी सहमत हूं ,
लेकिन समस्या यह है कि युवा पीढ़ी विवाह की अपेक्षा व्यभिचार अधिक पसंद करती हुई पाई जा रही है ।
… आज इसके साथ … कल किसी और के साथ ! इसका हल ?

ख़ैर ! होई है सोई जो राम रचि राखा …

♥ प्रेम बिना निस्सार है यह सारा संसार !
♥ प्रणय दिवस की मंगलकामनाएं! :)

बसंत ॠतु की भी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

- राजेन्द्र स्वर्णकार

shikha varshney said...

बेहद सोंधा सोंधा प्यारा सा संस्मरण ..मुझे भी मेरी नानी याद आ गई.वह भी फिल्म के रोमांटिक दृश्यों पर ऐसे ही नाक मुंह बनाती थीं :) फिर हम उन्हें राधा कृष्ण को लेकर चिढाते थे .
बहुत अच्छा लगा पढ़ना .

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

v-day par khoobsurat lekh likha hai aapne Ranjna ji!

Manish Kumar said...

इतना सरस मत लिखिए की ताइवान से लोग आ आ के बधाई देने लगें :)
नानी के किस्से मन को गुदगुदाते हुए निकल गए। बहुत मजेदार रही ये पोस्ट।

मनोज कुमार said...

ऐसा संस्मरण कि गांवघर से घूमते बौआते ले आए सहर में अ‍उर धकेल दिए खद्दा में। ऊ भी आग से भरल!
आज कल का परेम देख कर त सहिए में नानी इयाद आ जाती है। (मुहाबरा बाला भी)। पूरा कलकत्ता में जगह-जगह ऊहे हाल था कि ... का बताएं।
जौन सनीमा हाल का हाल बताए हैं वैसने हाल में देखे थे गरहारा में गोरा और काला, पूरा फ़िलिम गोरा कम काला अधिक लगता रहा। जब हीरो धीरे-धीरे बोल कोई सुन ना ले, गा रहा था तब पूरा हाल चिचिया कर छत सर पर उठा लिया था।
ऊ जमाने का मिलन परसंग सुन कर इयाद आया कि एगो दादी-नानी टाइप की महिला बताए रही कि ऊ जमाना में त मिलन तबे होता था जब घर का बाक़ी लोग सो जाता था। तब घर में होता था अन्हार। और एक दोसर के चेहरा त लोग एकाध गो बाल-बच्चा हो जाने के बादे देखता था।
ऊ आंख का चश्मा बाला परसंग त ऊ जमाने का था, ई जमाने में हमरी माई एक्के आंख का कटेरेक्ट का आपरेसन कराई है, कहती है दून्नू आंख का ई उमिर में करा के क्या होगा। एगो से काम त चलिए जाता है।
बाक़ी इ प्रेम उरेम का परब को टीबी ऊबी पर देख सुन के हम्मर मेहरारू इस बार १४ के रात में बोली दिन भर बीत गया और आप हमको भोलन्टाइन बाबा का बिस किए ही नहीं।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

ए रंजू!
हमत नानिये के प्रेम में डूबल थे, ई सब छुछुरबुद्धि वाला प्रेम त हमको बुझएबे नहीं करता है... अब हम किसी को परेम करते हैं त का लौडिस्पीकर लगाकर हल्ला करते चलें... मगर आजकल का छौंड़ा छौड़ी त लाज सरम सच्चो त्याग दिया है.. आज नानी जिंदा रहतीं त अपना आँख का ऑपरेसन नहिंए करवातीं! त हम त नानी के प्यार में नहा लिये!

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बेहतरीन रंजनाजी .....सुंदर संस्मरण ...नानी की बातें....बचपन और आज के दौर की प्रासंगिकता सब कुछ समेट लिया आपने तो..... प्रेम की स्वीकार्यता को लेकर आपके विचारों से सहमत हूँ...... बहुत सुंदर

ममता त्रिपाठी said...

रंजना जी,

न सभ्यता, न संस्कृत॥
केवल अन्धानुकरण, विकृति।
प्रायोजक बना बाज़ारवाद
इस आँधी में सब बर्बाद।

बेचारे सन्त वेलेण्टाइन के नाम को भी मिट्टी में मिला रहे हैं ये तथाकथित ‘आधुनिकता’ के पक्षधरा-पालक-पोषक, मानवता-संस्कृति-मूल्यों-आस्थाओं एवं विश्वासों के शोषक।

मनाते हैं तो मनाने दीजिये, इन्हें वेलेण्टाइन और जितने डे होते हैं, सबके चोंचले...................खुद-ब-खुद ये शान्त हो जायेंगे...............जब ज़ेब में पैंसे नहीं बचेंगे............वेलेण्टाइन भी साथ छोड़ देगी.............तब देखियेगा कि इनका क्या हश्र होता है। हर विकृति का अन्त होता ही है। प्रेम एकभावना है..............वेलेण्टाइन मनाने वालों ने उसे एक परिधि में, एक सीमा में बाँध दिया है.........................यह तो सर्वविदित है कि जिसकी सीमा है उसका अन्त होगा ही।


सच में रंजना जी उस प्रेम की तुलना यह तथाकथित प्रेमपर्व कैसे कर सकता है।

वह नानी का प्रेम निःस्वार्थ है
यहाँ तो बस स्वार्थ है।

प्रवीण पाण्डेय said...

बलिटाहन बाबा, यही न नाम है।

cmpershad said...

बढिया संस्मरण॥ कुछ पुरानी यादें ताज़ा कर गईं :)

Abhishek Ojha said...

नानी की यादें अच्छी लगी.
बाकी... प्रेम झाडी में तो नहीं ही छुपेगा तो झाडी में प्रेम ढूंढने वाले या तो मुर्ख हैं या वो जो ढूंढ़ रहे हैं वो प्रेम तो नहीं ही है. प्रेम भी कोई छुपने की चीज है और वो भी झाडी में.. ना !
बाकी जो मना रहे हैं मनाने दो क्या है, अब मुझे नहीं मनाना तो मैं तो माँ-बाप दिवस भी नहीं मनाता. अपनी श्रद्धा है जिसे मनाये. नहीं मनाने वाले बहिये मनाएंगे, तो मनाने वालों को क्यों परेशान करना. इसी बहाने बिजनेस भी बढ़ जा रहा है तो मुझे तो उसमें भी कोई बुराई नहीं दिखती...

कुश said...

नानी की बाते सुहानी लगी.. बहुत सुहानी..
प्रेम पर्व की बातो पर तो क्या कहे.. प्रेम तो खुद अपने आप में ही एक पर्व है.. उसके लिए अलग से पर्व क्या.. इसमें मनाने जैसा कुछ नहीं.. मेरे लिए तो नकारने जैसा भी कुछ नहीं.. आज तक तो कभी इस दिन विशेष के लिए कुछ किया नहीं.. अलबत्ता प्रेम में डूबना और डूबते जाना अभी भी प्रिय शगल है..

जो लोग विरोध करते है.. वे प्रेम पर्व का विरोध नहीं कर रहे.. वे दरअसल रोष प्रकट करते है समाज के उन लोगो से जो प्रेम पर्व तो मनाते है पर दिवाली या होली उतने चाव से नहीं मनाते.. अगर हम अपने त्यौहार भी उसी उल्लास से मनाये तो शिकायत किसे रहेगी.. ? वैसे ज़रूरी भी नहीं कि जो मैंने लिखा है.. ठीक वैसा ही हो.. ये तो सिर्फ मेरा मानना है. .

राज भाटिय़ा said...

हम ने तो नानी देखि ही नही, ओर फ़िर गँवईपन यहां बहुत हे जी इस वेलेण्टाइन की जितनी धुम भारत मे हे उतनी तो क्या, उस से आधी भी युरोप मै नही हे, लेकिन आप का लेख बहुत अच्छा लगा, धन्यवाद

वाणी गीत said...

बहुत प्यारी यादें है नानी की ...मुझे भी अपनी नानी याद आने लगी ...सचमुच उन्हें इस ज़माने को देखना चाहिए था ...
अच्छा संस्मरण ...

और प्रेमी जोड़ो को एक वर्ष तक अकेला छोड़ देने का मशविरा भी क्या खूब है ...प्रेम का नशा उतर जाता ...
हमेशा की तरह शानदार !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वैलेंटाइन के अवसर पर लिखा गया बहुत ही सार्थक व्यंग्य!
हैप्पी प्रेमदिवस!

निर्मला कपिला said...

.प्रेम कर लेना तो सबसे आसान है ..पर निभाना...
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है...
सरा निचोड इन पँक्तियों मे है आज के युवा आसक्ति को ही प्रेम समझने लगते हैं जब कि प्रेम इस आसक्ति से कहीँ दूर की चीज़ है। बहुत अच्छा लगा आलेख। बधाई।

करण समस्तीपुरी said...

रंजू दीदी,
मुझे आप से इर्ष्य हो रही है..... प्लीज़ ऐसा न लिखिए कि अपनी दूकान ही श्रीसीताराम हो जाए. ई तो हिरदय की बात कहे मगर यही सब से तो हमहू परेरना लेते हैं. बाकी आप ऐसे संजोये हैं घटनाक्रम को कि एक-दुसरे से अलग होते हुए भी एक्कहि माला के मोती बुझाता है.... ई तो हम नहीं कह सकते हैं कि ई सब काल्पनिक है कि वास्तविक, मगर जो भी है, है बड़ा जीवंत. और सब से अंत मे जो सलूशन दीये हैं ना... उ 'परेम को परेमे से पराजित' करे वाला... उ तो अम्मा कसम लास्ट बाल पर छक्का होय गाया.

Vijai Mathur said...

अपनी नानी जी के उदाहरण से सिद्ध करके लेख की अंतिम पंक्तियीं में सत्य सार दे दिया.

Mithilesh dubey said...

बढिया लगा संस्मरण ।

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

हा-हा... नानी वाला प्रसंग रियली बहुत मजेदार है ! कितने भोले होते थे उस ज़माने के लोग, सच में !

Mukesh Kumar Mishra said...

निष्कपट ममता ऐसी ही होती है रंजना जी,
हम कितना भी ढूढ़े ऐसा प्यार, मिलना असम्भव है।
अपनत्व, स्नेह, प्रेम, दया आदि भावनाओं का दायरा आज सिमट रहा है। मात्र फार्मेल्टी शेष बची है।
http://kavyarachana.blogspot.com/
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डॉ .अनुराग said...

कहते है उस दौर की बढ़ी बुढिया बड़ी निश्चल होती थी....तकलीफों में भी सेन्स ऑफ़ ह्यूमर को पकडे रहती.....ओर मोहल्ले के दुःख पर भी दुखी होती.....चार कदम चलने पर सांस फूल जाए पर गली के अगले नुक्कड़ पर भोलू राम के पोते की दस्तो में दवाई बताना फर्ज समझती थी ........मेरी नानी भी ऐसी थी...सफ़ेद बालो सफ़ेद साडी में पतली दुबली.....

mark rai said...

आदमी तो आदमी कुत्ते बिल्ली से भी नानी प्रेम करतीं थीं. घर के सारे कुत्ते बिल्ली नानी के आगे पीछे डोलते रहते थे.................................yahi to prem ka falsfan hai...

कौशलेन्द्र said...

आग के दरिया मं मझाय के ज़रुरत नई खे ......नानी जी के ज़माना वाला परेम मं गहराई रहे ......आज वाले मं छिछलापन ह .......अब देखिये न रंजना जी ! प्रेम भी अलग-अलग ज़माने के हिसाब से होने लगा ....कमाल है ....हम तो समझते थे की प्रेम प्रेम होता है ...उसमें क्या श्रेणी और वर्गीकरण ...... पर नहीं ........जो सामने दिख रहा है उसे कैसे नकार दिया जाय ? ......पार्क और खंडहर वाला प्रेम हम को भी दिखाई दे जाता है कभी-कभी

ashish said...

आपकी नानी जी की बाते सुनकर मुझे भी नानी याद आयी , और पकड़ लिया मैंने उनको अपनी यादों में . अब प्रेम को किसी विशेष दिन की परिधि में बाँधकर और कोई विशिष्ट (आंग्ल भाषा वाला ) नाम देकर पश्चिम ने हमारी संस्कृति को बड़ा सा घाव दिया है . सचमुच में प्यार में विछोह ना हो तो प्यार का भूत (वेल इन टाइम वाला ) उतरने में समय नहीं लगता . मज़ा आ गया आलेख पढ़कर .

निर्झर'नीर said...

प्रेम में विछोह रहे ,तभिये तक प्रेम प्यारा लगता है...प्रेम कर लेना तो सबसे आसान है ..पर निभाना...
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है...

hum to soch hi rahe the ki is parv pe jaroor kuch aapki taraf se padhne ko milega ..or umiid ke anuroop hi padhne ko mila .

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन संस्मरण..आनन्द आया.

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

रंजना जी अगाध स्नेहमयी नानी के भोलेपन को आपने जिस सहजता से साकार किया है ,अभिभूत करदेने वाला है । चश्मावाली बात पर मुझे अपनी सासजी की याद आगई । हुआ यूँ कि मेरे छोटे देवर रेडियो पर गीत सुन रहे थे-वो जब याद आए...। माताजी ने उन्हें डाँटते हुए कहा कि पढाई छोड कर जब देखो इस तरह के गाने सुनता रहता है । श्याम बोले -माँ तू भी सुन ये रामजी गारहे हैं जब सीताजी को रावण लेगया था ।
अच्छा--माताजी ने तुरन्त हाथ जोडे । और आँसू पौंछती हुई बोलीं--विपत्ति ने भगवान को भी नही छोडा । बस ऐसे ही भोले और निश्छल होते थे पुराने लोग ।

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

रंजना जी अगाध स्नेहमयी नानी के भोलेपन को आपने जिस सहजता से साकार किया है ,अभिभूत करदेने वाला है । चश्मावाली बात पर मुझे अपनी सासजी की याद आगई । हुआ यूँ कि मेरे छोटे देवर रेडियो पर गीत सुन रहे थे-वो जब याद आए...। माताजी ने उन्हें डाँटते हुए कहा कि पढाई छोड कर जब देखो इस तरह के गाने सुनता रहता है । श्याम बोले -माँ तू भी सुन ये रामजी गारहे हैं जब सीताजी को रावण लेगया था ।
अच्छा--माताजी ने तुरन्त हाथ जोडे । और आँसू पौंछती हुई बोलीं--विपत्ति ने भगवान को भी नही छोडा । बस ऐसे ही भोले और निश्छल होते थे पुराने लोग ।

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

रंजना जी अगाध स्नेहमयी नानी के भोलेपन को आपने जिस सहजता से साकार किया है ,अभिभूत करदेने वाला है । चश्मावाली बात पर मुझे अपनी सासजी की याद आगई । हुआ यूँ कि मेरे छोटे देवर रेडियो पर गीत सुन रहे थे-वो जब याद आए...। माताजी ने उन्हें डाँटते हुए कहा कि पढाई छोड कर जब देखो इस तरह के गाने सुनता रहता है । श्याम बोले -माँ तू भी सुन ये रामजी गारहे हैं जब सीताजी को रावण लेगया था ।
अच्छा--माताजी ने तुरन्त हाथ जोडे । और आँसू पौंछती हुई बोलीं--विपत्ति ने भगवान को भी नही छोडा । बस ऐसे ही भोले और निश्छल होते थे पुराने लोग ।

संजय @ मो सम कौन ? said...

रंजना जी,
"भकुआए पतिदेव" में ’भकुआए’ का प्रयोग अनावश्यक है, पतिदेव हैं तो भकुआए ही होंगे, अंडरस्टुड है:))

शुरू से लेकर अंत तक बांधे रखा आपकी लेखनी ने। हँसी भी है, और वर्तमान और अतीत की तुलना भी। संसमरण हमेशा अच्छे लगते हैं। कुल मिलाकर, आनंद आ गया। आभार स्वीकारें।

कुश्वंश said...

लैला मजनू,शीरी फरहाद ,रोमियो जूलियट या असंख्य ऐसे जोड़ों को यदि मार डालने के स्थान पर प्रेम करने की इस तरह की एकमुश्त सुविधा दी जाती तो उन्हें मारने वालों को अपने हाथ मैले न करने पड़ते.. साल भर के लिए प्रेमी एक कमरे में सब काम छोड़ केवल प्रेम करने को बाध्य रहते तो हम दावा करते हैं छः महीना के अन्दर प्रेम प्यार साफ़ आ कत्लेआम मच जाता.. प्रेम में विछोह रहे ,तभिये तक प्रेम प्यारा लगता है...प्रेम कर लेना तो सबसे आसान है ..पर निभाना...
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है...

बहुत सुंदर, बेहतरीन संस्मरण

Mukesh Kumar Sinha said...

sach me hamne bhi apni naani ko yaad kar liya issi bahane..:)

bahut khubsurat sansmaran...ek dum se dil ko chhoo gaya.:)

rashmi ravija said...

बहुत ही खूबसूरती से यादों को धागों में पिरोया है....पढ़कर सबको नानी याद आ गयी...हा हा ...मुहावरे वाली नहीं....अपनी-अपनी नानी...:)
सचमुच....अब टी.वी. के दृश्यों पर उन दादी-नानी....बुआओं के कमेन्ट बहुत मिस करती हूँ....प्रोग्राम-फिल्म देखने का मजा दुगुना हो जाता था ....और फिर वो प्रकरण सबको सुनाते हुए...तिगुना-चौगुना...जैसे आपका संस्मरण पढ़ कर हुआ .

dhirendra said...

अति सुंदर, ऐसा लगा कि कोई समक्ष यह रोचक कहानी सुना रहा है। पूरी कहानी सरस लगी औप सचमुच मेरा मूड बदल गया। अब मैं भी चला कुछ लिखने। धन्यवाद।

धीरेन्द्र सिंह said...

अति सुंदर, ऐसा लगा कि कोई समक्ष यह रोचक कहानी सुना रहा है। पूरी कहानी सरस लगी औप सचमुच मेरा मूड बदल गया। अब मैं भी चला कुछ लिखने। धन्यवाद।

कविता रावत said...

बहुत ही सुन्दर संस्मरण ..नानी की बातें बहुत अच्छी और सच्ची लगी ...
सुन्दर सार्थक प्रस्तुति के लिए शुभकामना

Shiv said...

बहुत बहुत बढ़िया पोस्ट.
प्रेम परब से बात शुरू करके नानी की यादों से गुजरते हुए फिर प्रेम परब और उसका समाधान.
जबरदस्त नैरेशन है.

Ankur jain said...

bahut sundar prastuti.........

Mrs. Asha Joglekar said...

प्रेम में विछोह रहे ,तभिये तक प्रेम प्यारा लगता है...प्रेम कर लेना तो सबसे आसान है ..पर निभाना...
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है...
रंजना जी कितना सही लिखा है आपने । पढ कर आनंद आ गवा ।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

ऐसे संस्‍मरण सभी को अपने से लगते हैं. प्रेम के बहाने बीते दिनों की यादों को ताजा करने के लिये धन्‍यवाद.

छत्‍तीसगढ़ में 'पौनी पसारी' शब्‍द का प्रयोग नौकर चाकरों के लिए किया जाता है. वहां मेहमान को पौनी पसारी कहा जाता है, नई जानकारी मिली.

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

आदरणीया रंजना जी ,
प्रेम त्यौहार पर इतनी मनमोहक शैली में लिखी आपकी पारिवारिक कहानी बहुत अच्छी लगी |
विशेषकर नानीजी ...
हार्दिक आभार

mahendra verma said...

बढ़िया संस्मरण।
नानी की कहानी बहुत ही अच्छी लगी।
शुभकामनाएं।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

1. सब जगह की नानियां एक सी होती हैं। बिल्कुल सेम टू सेम!

2. साल भर के लिए प्रेमी एक कमरे में सब काम छोड़ केवल प्रेम करने को बाध्य रहते तो हम दावा करते हैं छः महीना के अन्दर प्रेम प्यार साफ़ आ कत्लेआम मच जाता.. - यह सवा सौ फीसदी का सच!

BrijmohanShrivastava said...

विलम्ब का कारण बताते हुये हाजिर हो गया हूं
इस दिवस के लेख में नानी की सरलता मन को भा गई कि ज्यादा दिखाई देगा तो ज्यादा पैसे लगेगे। उस वक्त कोई दिवस नहीं हुआ करता था वरन निश्छल प्रेम था घर वालों से कुत्ते बिल्लियों से प्यार सब का सुख दुख तलाश करना प्यार बांटना इस प्यार को स्नेह कहंे तो ज्यादा अच्छा लगेगा । प्यार शब्द कितना प्यारा कितना दुलारा था मगर दुष्टों के हाथ पड गया तो ऐसा नाश किया है कि क्या कहे। लैला शीरीं रोमियों हुये होगे कभी तो उनके किस्सों को क्या कोर्ष में पढाया जाय ? ये प्यार वगैरा कुछ नहीं है नोटंकी है प्यार का भी कभी प्रदर्शन किया जाता है मगर क्या करें हवा ऐसी चल रही है कि अपने आप को सेक्सी कहलाने में बच्चियों को गर्व होने लगा हैं जहां तक एक कमरे में बन्द करने वाला बात है छेै महीने तो ज्यादा कहदिये एक महिना बहुत है

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

नानी का किस्सा और आपकी सीख, दोनों ही पसंद आयीं|

दिगम्बर नासवा said...

prem parv ke madyam se jeevan ki anek bhooli bisri galiyon mein louta le gaya aapka lekhe .... prem ke badalte maayne .... naani ke prasangon ke bahaane anoke prem ki abhivykti rachi है aapne .... ..

Dr (Miss) Sharad Singh said...

संस्मरण और विश्लेषण युक्त आपके इस दिलचस्प लेख के लिए आपके हार्दिक बधाई।

रश्मि प्रभा... said...

.प्रेम कर लेना तो सबसे आसान है ..पर निभाना...
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है...
sach kaha

Mukesh Kumar Mishra said...

नई पोस्ट की प्रतीक्षा है।


कलरव- http://mukeshmishrajnu.blogspot.com

नवांकुर- http://www.mukeshscssjnu.blogspot.com

Sunil Kumar said...

बहुत बेहतरीन संस्मरण, हार्दिक बधाई

रजनीश तिवारी said...

सच्चे प्यार और वैलेंटाइन डे पर आपके विचार , नानी जी के संस्मरण के झरोखे से बहुत सार्थक और बहुत अच्छे लगे !

सञ्जय झा said...

साल भर के लिए प्रेमी एक कमरे में सब काम छोड़ केवल प्रेम करने को बाध्य रहते तो हम दावा करते हैं छः महीना के अन्दर प्रेम प्यार साफ़ आ कत्लेआम मच जाता.. प्रेम में विछोह रहे ,तभिये तक प्रेम प्यारा लगता है...प्रेम कर लेना तो सबसे आसान है ..पर निभाना...
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है...

UPROKT VICHARON SE ITAR KOI KHAYAL RAKHTA HO TO JAROOR BATAYEN.......

MAIN TO IQTAFAQ RAKHTA HOON.....

PRANAM.

Rajey Sha said...

वैसे आखरी पैरा जि‍स कर्म का वर्णन है वो प्रेम नहीं, वो आजकल की टाईमपास मूंगफली है जो बहुत ज्‍यादा देर तक और बहुत सारी नहीं खाई जा सकती।

Avinash Chandra said...

नानियाँ तो सभी ऐसी ही होती हैं न?
मन कितना खुश हुआ, बता नहीं सकता।
ख़ुशी से मेरा छलकना कम ही होता है, अगली छुट्टियां नानी के नाम।
आज आपको बहुत सारा धन्यवाद देता हूँ, रख लीजियेगा।

सतीश सक्सेना said...

नानी की याद बरसों बाद आज आई ...
शुभकामनायें आपको !

amrendra "amar" said...

बहुत सुंदर, बेहतरीन संस्मरण
शुभकामनायें आपको

Jayant Chaudhary said...

"नानी - दिखा रहा है बेटा..काम चल जा रहा है..पर उ बेजोड़ था..

मामा अधिक परेशान - तो फिर ई वाला शीशा काहे ली..

नानी- ऐसे ही पैसा लगा देती ???

मामा - माने ?????

नानी- अरे, जादा दीखता तो जादा पैसा लगता न....
"


:-))))

बहुत सुन्दर..

शालिनी कौशिक said...

jeevant kar diya aapne apne jeevan ko.bahut achchha laga aapka lekhan .

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बाप रे इतने देर से आया कि सीधे कमेंट बाक्स में जंप करना पड़ा। नानी का संस्मरण काभी रोचक है।
प्रेम के हर पहलुओं पर प्रकाश डालती शानदार पोस्ट।
..प्रेम के नाम पर ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता नहीं लगती।

Vijay Kumar Sappatti said...
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Vijay Kumar Sappatti said...

naani ke baare me padhkar bahut accha laga, aap likhti bahut achi hai , aapki bhaasha itni rochak hoti hai ki , bas poochiye mant , maine pahle bhi ek baar aapki bhasha ki tareef ki thi .

aapko bdahyi .

Vijay Kumar Sappatti said...
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Vijay Kumar Sappatti said...
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Hari Shanker Rarhi said...

Ranjana ji
your words are touching . I am sorry for not having hindi transliteration on this computer. Thanks for your comments on my poem -Ek ladki ka pyar.

Rakesh Kumar said...

प्रेम में विछोह रहे ,तभिये तक प्रेम प्यारा लगता है...प्रेम कर लेना तो सबसे आसान है ..पर निभाना...
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है...

अति सुंदर संस्मरण.अति सुंदर वक्तव्य और सीख .
मेरे ब्लॉग 'मनसा वाचा कर्मणा 'पर आपका स्वागत है .

हरकीरत ' हीर' said...

.प्रेम कर लेना तो सबसे आसान है ..पर निभाना...
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है...

आपने नाना नानी का उदहारण दे प्रेम का सही रूप दिखया है ....
यही प्रेम दिवस की सार्थकता है ....
आभार ....!!

Sawai Singh Rajpurohit said...

आज मंगलवार 8 मार्च 2011 के
महत्वपूर्ण दिन "अन्त रार्ष्ट्रीय महिला दिवस" के मोके पर देश व दुनिया की समस्त महिला ब्लोगर्स को "सुगना फाऊंडेशन जोधपुर "और "आज का आगरा" की ओर हार्दिक शुभकामनाएँ.. आपका आपना

Kunwar Kusumesh said...

महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

प्रेम सहज मन-भाव है,चन्दन कर दे साँस !
सीचें जो विश्वास से,बढ़ती जाय मिठास !
आद. रंजना जी,
आपका संस्मरण मन के पोर पोर को छू गया !
पुरानी यादों में जीवन का खजाना छुपा होता है, आज तो जीवन के मूल्यों को ढूढ़ना पड़ता है !
प्रेम की सुन्दर अभिव्यक्ति समयानुकूल एवं सार्थक है !
आभार !

Jayant Chaudhary said...

"प्रेम क्या होता है ,कैसे निभाया जाता है, मेरे कच्चे मन ने बहुत कुछ समझा गुना था उनसे ..आज सोचती हूँ तो लगता है,व्यक्तिगत सुख के प्रति आवश्यकता से अधिक सजग, हममे क्या प्रेम कर पाने की क्षमता है????"

फिर से पढ़ा तो और अच्छा लगा.... बहुत सुन्दर लेख...