2.2.09

ऐसी वाणी बोलिए ,मन का आपा खोय.....

कहते हैं, ब्रम्हा जी ने श्रृष्टि की रचना के कुछ काल उपरांत जब पुनरावलोकन किया, तो उन्हें अपनी सम्पूर्ण श्रृष्टि नीरव और स्पन्दन्हीन लगी॥ उन्होंने बड़ा सोचा विचार किया कि इतना कुछ रचके भी आख़िर इसमे क्या कमी रह गई है कि जिस प्रकार जलमग्न धरा में पूर्ण नीरवता व्याप्त थी वैसी ही नीरवता भरे पूरे इस श्रृष्टि में अब भी व्याप्त है। श्रीष्टिक्रम गतिवान तो है,परन्तु वह यंत्रचलित सा भाव विहीन जान पड़ता है .तब उन्होंने देवी सरस्वती का आह्वान किया. चार भुजाओं वाली देवी सरस्वती हाथ में वीणा,पुस्तक,कमल और माला लिए अवतीर्ण हुई और फ़िर देवी ने ज्यों ही अपनी वीणा के तारों को झंकृत किया, दसों दिशाओं में नाद गुंजायमान हो समाहित हो गया.उस नाद से समस्त श्रृष्टि में ध्वनि व्याप्त हो गया.जड़ चेतन सबने स्वर/नाद पाया.सारी श्रृष्टि स्वरयुक्त हो स्पंदित हो गई.

नदी,वृक्ष,पशु,पक्षी,पवन,मेघ,मनुष्य सबने स्वर पाया और नीरव श्रृष्टि मधुर ध्वनि से गुंजायमान हो गया.ब्रम्हा की रची श्रृष्टि सच्चे अर्थों में अब ही पूर्ण हुई थी.वसंत ऋतु की पंचमी तिथि को यह घटना घटी थी और तबसे इस दिवस को देवी सरस्वती का अविर्भाव(जन्म) दिवस के रूप में मनाया जाता है और कालांतर से ही वसंत ऋतु की इस पुण्य पंचमी तिथि को देवी सरस्वती का पूजनोत्सव आयोजित किया जाता है.

इस प्रकार यह माना जाता है कि श्रृष्टि मात्र में जो भी स्वर नाद/संगीत और विद्या है वह भगवती सरस्वती की कृपा से ही है. सरस्वती की साधना से कालिदास जैसे मूढ़ भी परम विद्वान हुए जिन्होंने कालजयी कृति रच डाली.तो जिस वाणी में ईश्वर का वास हो उसे उसे तामसिक कर दूषित नही करना चाहिए.असुद्ध स्थान पर ईश्वर (शुभ के पुंज) नही बसते.यदि ईश्वर की अवधारणा को न भी माने तो इससे तो असहमत नही ही हुआ जा सकता है कि मनुष्य मधुर वाणी और मधुर व्यवहार से जग जीत सकता है.यही मुंह हमें गुड भी खिलाता है और यही गाली भी .

कहते हैं कि, जो वाणी सात द्वारों (पेट,स्वांस नलिका,कंठ,तालू,दंत,जिह्वा,ओष्ठ) से होकर(छनकर) निकलती है, वह ऐसी न हो जो किसी के ह्रदय में आघात करे.ईश्वर ने हमें वाणी रूप में जो अमूल्य सामर्थ्य दिया है,जिसके सहारे हम अपने विचारों का संप्रेषण कर सकते हैं, सम्बन्ध बना सकते हैं और सामने वाले को स्नेह बांटते हुए स्वयं भी अपरिमित स्नेह पा सकते हैं,मानसिक ,कायिक या वाचिक किसी भी रूप में उसे दूषित होने से यत्न पूर्वं बचाना चाहिए.वाचन या लेखन किसी भी रूप में शब्द स्वर वाणी के इस दुर्लभ सामर्थ्य का दुरूपयोग करने से सदैव बचना चाहिए......

गुनी जानो ने कहा है.......

"ऐसी वाणी बोलिए,मन का आपा खोय।

औरों को शीतल करे,आपहु शीतल होय."

एक अहम् को परे कर मधुरता से सुवचन बोलकर देखें,जीवन का सच्चा सुख अपने हाथ होगा. कभी सत्य बोलने के अंहकार में ,तो कभी क्रोध और आवेश में कटु वाणी बोल हम अपनी वाणी को तो दूषित करते ही हैं,सामने वाले को कष्ट पहुंचकर अपने लिए हाय भी बटोरते हैं,जो कि हमें शक्तिहीन ही करती है.. परन्तु एक बात है,मधुर वाणी बोलने से तात्पर्य यह नही कि,मन में द्वेष ,कटुता, वैमनस्यता रखे हुए केवल बोली में मिश्री घोलना.यह छल है जिसकी आयु बहुत लम्बी नही होती....बहुत से लोग ऐसा करते हैं,परन्तु यह बहुत समय तक छिपा नही रह जाता.देर सबेर छल क्षद्म खुलने पर सम्मान और सम्बन्ध दोनों से हाथ धोना पड़ता है..

वस्तुतः हम जो बोलकर अभिव्यक्त करते हैं,उससे बहुत अधिक हमारे सोच में पल रहे सकारात्मक या नकारात्मक भाव, उर्जा तरंग माद्यम से सामने वाले तक पहुँचते हैं.इसे नान वर्बल कम्युनिकेशन कहते हैं जो बहुत ही स्पष्ट और प्रभावी हुआ करते हैं. मन बड़ा ही शक्तिशाली होता है और यह बड़े सहज और प्रभावी ढंग से अनभिव्यक्त सकारात्मक तथा नकारात्मक सम्प्रेश्नो को पकड़ लेता है.इसलिए आवश्यकता वाणी को शुद्ध रखने की नही बल्कि मन और सोच को भी सुद्ध और सकारात्मक रखने की है.

मुंह, कान, आँख, नाक, हाथ, पैर इत्यादि समस्त अंग सम होते हुए भी अपने विचार और व्यवहार से ही मनुष्य मनुष्य से भिन्न होता है।अपने सकारात्मक विचार और मधुर व्यवहार से कोई असंख्य हृदयों पर राज करता है तो कोई अपने दुर्विचार और दुर्व्यवहार से सबके घृणा का पात्र बनता है.प्रेम और सम्मान पाना ,किसी को नही अखरता.लेकिन पाने के लिए हमें सच्चे ह्रदय से यह सबको देना भी पड़ेगा.

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29 comments:

Sanjay Sharma said...

शोधपरक लेख आंखों पर लगी पट्टी खोलता है .आभार !

chopal said...

बहुत खूब

रंजना [रंजू भाटिया] said...

मीठा और सच्चा बोलना हमेशा ही दिल मोह लेता है ..बहुत सार्थक लिखा है आपने इस पर ..सही और स्पष्ट ..

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ही सुंदर, सार्थक, पवित्र लेख............माँ सरस्वती की कृपा सब पर बनी रहे........सृष्टि में स्पंदन बना रहे, समय का मुक्त प्रवाह कोलाहल करता रहे..............यही तो जीवन की पूर्ति है. आपने बसंत पंचमी के लेख को सम्पूर्ण रूप से लिखा है..........माँ सरस्वती की कृपा के बिना यह सम्भव नही है, प्रार्थना करता हूँ ऐसी कृपा बनी रहे

parashar said...

बहुत ही सुंदर, सार्थक, पवित्र लेख.....

विनय said...

बहुत स्वस्थ और प्रेरणादायक लेख है

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ज़रूर पढ़ें:
हिन्द-युग्म: आनन्द बक्षी पर विशेष लेख

डॉ .अनुराग said...

शिक्षा प्रद लेख जो मन के दरवाजो को खटखटा जाता है

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत आभार इस लेख के लिये. बहुत कम ही ऐसी रचनाएं आजकल पढने में आती हैं. आपका बहुत आभार और नमन आपको.

रामराम.

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

सचमुच नितांत सुन्दर एवं ज्ञानपूर्ण लेख.......
आभार.......

राज भाटिय़ा said...

एक साफ़ सुधरी , ओर शिक्षा से भरपुर लेख. आप का बहुत बहुत धन्यवाद

P.N. Subramanian said...

लेख सुंदर और प्रेरणादायक है. बहुत ही उत्कृष्ट कह सकता हूँ. आभार

संगीता पुरी said...

सही ही कहा गया है....वचने किम् दरिद्रता।

Anil Pusadkar said...

प्रणाम करता हूं आपको।

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

आपके पोस्ट से सकारात्मकता को बल मिला। एक गहरी सांस ले कर नेगेटिविटी को बाहर ठेलने का प्रयास किया है। आगे चलते हैं!
सच है - मनुष्य विचार से बनता है।

Zakir Ali 'Rajneesh' (S.B.A.I.) said...

शुभ विचार। आपकी पोस्‍ट पढकर मेरे जीवन की पहली कविता याद आ गयी, जो मैंने बच्‍चों के लिए लिखी थी। 'सोच समझ कर के बातें, तब मन के तराजू में तोलो। शत्रु मित्र बन जाए जिससे, ऐसी मीठी वाणी बोलो।'
यह अलग बात है कि यह कविता किसी पत्र पत्रिका में प्रकाशित नहीं हुई थी।

NirjharNeer said...

aapka lekh andheroN mein roshni ki tarah hai.

Harsh pandey said...

yah post achchi lagi ranjanaji thank u

Abhishek said...

Jo swar Ishwar ki den hain kya ham unka uchit pryog kar pa rhae hain! Maan Saraswati ki aaradhna ke saath ispar bhi vichar ki jarurat hai.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

vaani sarsvati he..aour jab vo apni vishudhdha dharapravah me hoti he to man kaa aapa khone hi padta he..aap jo bol rahe he usme sambhav he koi mantra chhupa ho..isliye galat mat boliye..
bahut achcha laga aapka chintanswaroop.

कुश said...

आपके ब्लॉग पेजो का प्रिंट लेकर रखना पड़ेगा..

the pink orchid said...

bahut khoob...

kabhi fursat mein mere blog par tashreef laayein aur mera maargdarshan karein .
mere blog ka link hai
-- http://merastitva.blogspot.com

hem pandey said...

मीठा लेख.

Richa Joshi said...

सार्थक अभिव्‍यक्ति। विचारशील लेखन के लिए बधाई।

मुंहफट said...

आंधियों में भी दिवा का दीप जलना जिंदगी है.
पत्थरों को तोड़ निर्झर का निकलना जिंदगी है.
सोचता हूं मैं किसी छाया तले विश्राम कर लूं,
किंतु कोई कह रहा, दिन-रात चलना जिंदगी है.

मुंहफट said...

यह वेब साइट भी आपकी
www.jaagtashahar.com

Dr.Bhawna said...

बहुत सटीक और सार्थक वर्णन बहुत-बहुत बधाई...

vijaymaudgill said...

आपने बिल्कुल सही कहा। आपकी वाणी ही है, जो आपको गुड़ खिलाती है और गाली भी। मां सरस्वती सबकी वाणी इतनी मधुर करें कि गाली शब्द ही संसार से ख़त्म हो जाए।
मैं माता सरस्वती से प्रार्थना करता हूं कि आपकी कलम और सोच को बल दे।

kumar Dheeraj said...

लेखनी ही ऐसी है कि इसमें कुछ कहना मुश्किल है । वैसे यह लेखनी हर लोगो को अपनी औऱ खीचती है । शु्क्रिया

sa said...

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