27.2.09

द्वापर वहीँ ठहरा है........

जीवन में कई बार ऐसा होता है कि कोई स्थिति विशेष, प्रसंग, परिभाषाएं, शब्द, भाव वर्षों तक मन मष्तिष्क के सम्मुख उपस्थित रहते हुए भी अस्पष्ट औचित्यहीन होकर मनोभूमि पर विखण्डित से अवस्थित होते हैं और फिर किसी एक कालखंड में ऐसा कुछ घटित हो जाता है कि वे अपने दिव्य उद्दात्त रूप में नवीन अर्थ के साथ स्वयं को परिभाषित कर प्रतिष्ठित कर जाते हैं.


आस्तित्व का आविर्भाव जैसे ही धरती पर होता है, शरीर की आँखें खुलती नहीं कि जिज्ञासाओं की आँखें भी खुल जाती है. क्यों और कैसे, जैसे बोध और जिज्ञासा ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से इतर,विशिष्ठ करते हैं और यही जिज्ञासा ज्ञान विज्ञान का भी विस्तार करता है..


मेरा प्रबल विश्वास है कि किसी भी धर्म परंपरा में निहित व्रत त्योहारों के प्रावधान में सभ्यता संस्कृति और समाज के व्यापक मंगल के कारक निहित हैं. प्रबुद्ध ऋषियों मनीषियों ने वर्षों तक कठोर साधना और वैज्ञानिक अन्वेशानोपरांत इन्हें धर्म और परंपरा में नियोजित और प्रतिष्ठित किया है.......परन्तु बाल्यावस्था से ही रंगोत्सव (होली) का जो स्वरुप देखा था और इस परंपरा में निहित जितने कारणों/आख्यानों, भावों को जान पायी थी,इसकी प्रासंगिकता और अपरिहार्यता मुझे नितांत ही अनावश्यक लगती थी.उच्श्रीन्ख्लता को धार्मिक आधार देते इस पर्व की प्रासंगिकता मुझे समझ नहीं आती थी. अपितु यदि यह कहूँ कि मानस में इसकी छाप एक निकृष्ट, वीभत्स उत्सव के रूप में थी तो कोई अतिशियोक्ति न होगी......


यह ईश्वर की ही असीम अनुकम्पा थी कि गत वर्ष रंगोत्सव के अवसर पर वृन्दावन जाना हुआ.... सुसंयोग से बांकेबिहारी जी के मंदिर के अत्यंत निकट ठहरने की व्यवस्था भी हो गयी....वहां दो दिनों में जो भी देखा, उस समय की मनोदशा की तो क्या कहूँ, अभी भी उसका स्मरण मात्र ही रोमांचित और भावुक कर देता है और भावावेश शब्दों को कुंठित अवरुद्ध कर देता है....


इतने वर्षों की जिज्ञासा ऐसे शांत होगी,कभी परिकल्पित न किया था. कहाँ तो रंगोत्सव का पर्याय ही , उच्श्रीन्ख्लता, रासायनिक रंगों का दुरूपयोग, मांसाहार ,मादक पदार्थों का सेवन और होली के नाम पर शीलता का उल्लंघन इत्यादि ही देखा था.......और जो वहां देखा तो बस आत्मविस्मृत हो देखती ही रह गयी........


पूरे क्षेत्र में कहीं भी मद्य (नशीले पदार्थ) और मांसाहार का नामोनिशान नहीं था. बच्चों से लेकर बुजुर्ग स्त्री पुरुष, स्थानीय नागरिक या आगंतुक तक सभी संकरी गलियों या सडकों से निर्भीक गुजरते हुए बिना किसी परिचय तथा भेद भाव के, बिना किसी को स्पर्श किये रंग गुलाल से सराबोर किये जा रहे थे. कुछ लोगों का समूह वाद्य यंत्रों के साथ तो कुछ ऐसे ही तालियाँ बजाते हुए, भजन गाते हुए, झूमते नाचते गलिओं से गुजर रहे थे. कौन सधवा है,कौन विधवा न रंग डालने वाले इसका भान रख रहे थे और न ही रंगे जाने वालों को कोई रंज या क्षोभ था......जिस तरह से निर्भीक हो किशोरियां ,युवतियां , महिलाएं मार्गों पर चल रहीं थीं और जितनी शिष्टता से उनपर रंग डाले जा रहे थे ,यह तो अभिभूत ही कर गया....क्योंकि इसकी परिकल्पना हम अपने क्षेत्र में कतई नहीं कर सकते.


बाँकेबिहारी जी के मंदिर का पूरा प्रांगण रंग गुलाल से सराबोर था....जहाँ कहीं भी गयी,जहाँ तक दृष्टि गयी देखा , पूरा वृन्दावन ही भक्तिमय रंगमय हो विभोर हो झूम रहा है, गा रहा है..........इन दृश्यों ने मन ऐसे बाँधा कि ...लगा द्वापर बीता कहाँ है......यह तो यहीं ठहरा है, आज भी........तन मन आत्मा ऐसे रंग गया कि, यह पावन उत्सव - रंगोत्सव, अपने पूर्ण अर्थ और दिव्य स्वरुप में मनोभूमि पर अवतरित हो गया.........


मन बड़ा कचोट जाता है और लगता है कि जिस लोक कल्याणकारी सात्विक भाव के साथ परंपरा में पर्व त्योहारों का प्रावधान हुआ था,क्या हम उन्हें उनके उसी अर्थ और स्वरुप में नहीं मना सकते........समस्या है कि हम सुख तो पाना चाहते हैं, पर यह विस्मृत कर जाते हैं कि सात्विक सुख ही असली सुख है.यही चिरस्थायी होता है और यह सुख आत्मा तक पहुंचकर क्लांत मन को विश्राम तथा सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है.तन रंगने से अधिक आवश्यक मन को रंगना है.........चिर सुख हेतु एक बार सात्विक रंगों से रंगकर देखें इस मन को........देखें कितना आनद है इस रंग मे...........

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45 comments:

दिगम्बर नासवा said...

आपकी लेखनी से निकले हुवे मनोहर भाव दिल को अभिभूत कर गए. सचमुच क्या ऐसा कहीं होता है, आपने इतनी सुन्दर व्याख्या की है की मन करता है कभी न कभी तो होली में वृन्दावन जाना ही चाहिए. कृष्ण के करीब जाना हो तो वृन्दावन जाने से अच्छा कोई स्थान नहीं और दिल को रंगना हो तो होली में वृन्दावन से बेहतर कोई स्थान नहीं.

बहोत ही सुन्दर और सार्थक लेख

विनय said...

सच पूरा वृतांत मनोहारी है

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गुलाबी कोंपलें

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बांके बिहारी के मंदिर जब जब गयी हूँ अनूठा ही अनुभव हुआ हुआ है ..आपने बहुत सुन्दर लफ्जों में वहां के भावों में रंग दिया...वृन्दावन हमें माहौल अद्भुत ही है ..

ताऊ रामपुरिया said...

समस्या है कि हम सुख तो पाना चाहते हैं, पर यह विस्मृत कर जाते हैं कि सात्विक सुख ही असली सुख है.यही चिरस्थायी होता है और यह सुख आत्मा तक पहुंचकर क्लांत मन को विश्राम तथा सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है.तन रंगने से अधिक आवश्यक मन को रंगना है....

बहुत ही सात्विक बात आपने सुंदर शब्दों मे कही. बहुत धन्यवाद.

रामराम.

अक्षत विचार said...

किसी भी धर्म परंपरा में निहित व्रत त्योहारों के प्रावधान में सभ्यता संस्कृति और समाज के व्यापक मंगल के कारक निहित हैं. प्रबुद्ध ऋषियों मनीषियों ने वर्षों तक कठोर साधना और वैज्ञानिक अन्वेशानोपरांत इन्हें धर्म और परंपरा में नियोजित और प्रतिष्ठित किया है
Sundar bhav...

शोभा said...

बहुत सुन्दर लिखा है। बृज में जाकर अलौकिक अनुभव ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। सुन्दर प्रस्तुति।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Banke Biharee Lal ki Jai !!
Jo aapko bhakti ke Gulal se rang diya ...
Hume bhee aisee Rang Panchmi ke darshan ho yehi kamna hai
Bahut sunder likha hai aapne ..

( & sorry for typing in Eng. am away from my PC )

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप" said...

संवेदना संसार वाकई सक्रिय ब्लॉग है।चंद्रशेखर आज़ाद के प्रति बेलाग पर संश्लिष्ट सामग्री पर साधुवाद का पात्र समझ आपने कृतार्थ किया,आशा है इसी प्रकार निरन्तरता बनाये रक्खेंगी।

राज भाटिय़ा said...

रंजना जी बहुत ही सुंदर बात लिख दी आप ने अपने इस लेख मै, सच है आज हम इस ऊपरी सुख को ही सुख मान बेठे है, ओर ज्यादा दुखी हो गये...
धन्यवाद

अजित वडनेरकर said...

आपकी बेहतरीन प्रविष्टियों में गिनूंगा इसे। ललित निबंध...शुरू से आखिर तक मन रमा रहा। शब्द चयन से भाव सम्प्रेषण तक मनोरम।
बधाई...

Kishore Choudhary said...

बहित बढ़िया आलेख सरस सुबोध भाषा प्रवाह अर्थात सब कुछ पसंद आया

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत बढ़िया लिखा है. जैसा कि अजित भाई ने लिखा, बेहतरीन प्रविष्टियों में से एक. तुम्हारे ललित निबंध की तारीफ़ करने वाला मैं अकेला नहीं हूँ, यह बात साबित हुई कि नहीं?

Science Bloggers Association said...

सच्‍चे सुख की पहचान यदि लोगों को हो जाए, तो शायद सारे राग द्वेष भी आपने आप नष्‍ट हो जाएं। गम्‍भीर विवेचन, बधाई।

कुश said...

वाह बड्डे दिनो से आपकी पोस्ट का इंतेज़ार कर रहा था.. आज ख़त्म हुई..

कौन सधवा है,कौन विधवा न रंग डालने वाले इसका भान रख रहे थे और न ही रंगे जाने वालों को कोई रंज या क्षोभ था..

ये पंक्ति पढ़कर यकीन मानिए बहुत खुशी हुई.. कोशिश करिए क़ी कम से कम इटालिक शब्द लिखे.. पढ़ने में थोड़ी असुविधा होती है... बाकी चाहे आप तमिल में भी लिखे तो भी मैं ट्रांसलेट करवा के पढ़ुंगा.. :)

kumar Dheeraj said...

हर बार आपके लेख अत्यंत रोचक रहे है । हर प्रसंग अपने आप में सोचने को मजबूर करता है । संवदना संसार लिखने के लिए आपको धन्यवाद

योगेन्द्र मौदगिल said...

कभी अवसर मिले तो बरसाने की लट्ठमार होली का भी आनंद लें.....

बढ़िया संस्मरण के लिये साधुवाद...

Anup Kumar Srivastav said...

बहुत सही लिखा है आप ने.......समस्या ये है कि पुरे सामाज को किय्से सोचने पे मजबूर किया जाए?

अनूप

प्रदीप said...

सच्चा सुख छोड़कर लोग बेकार की भूल-भुलैया में भटक रहे हैं.....सुंदर विचार......बधाई....

नरेश सिह राठौङ said...

बहुत सुन्दर विचार है आपके ।

प्रकाश बादल said...

रंजना जी आपकी लेखनी में एक बहाव है जो अपने साथ-साथ लिए जाता है। एक और सुन्दर लेख के लिए आपको बधाई!

डॉ .अनुराग said...

हम सुख तो पाना चाहते हैं, पर यह विस्मृत कर जाते हैं कि सात्विक सुख ही असली सुख है.यही चिरस्थायी होता है और यह सुख आत्मा तक पहुंचकर क्लांत मन को विश्राम तथा सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है.तन रंगने से अधिक आवश्यक मन को रंगना है.........चिर सुख हेतु एक बार सात्विक रंगों से रंगकर देखें इस मन को........देखें कितना आनद है इस रंग मे...........




गहरी बात कही है आपने ...गहरी बात

अमिताभ श्रीवास्तव said...

Ab bahut kam is tarah ke lalit nibandh shreni ka lekhan ho raha he..,nibandh yaa is tarah ka jo bhi lekhan hota he usme nipun mansikata ki jarurat hoti he, aapme dikhi..aour bahut sundar bhavo ke saath lekhan kiya he..
dhnyavaad...

Manish Kumar said...

जानकर अच्छा लगा कि वृंदावन की होली वक्त के थपेड़ों के साथ अभी तक कलुषित नहीं हुई है।

NirjharNeer said...

........समस्या है कि हम सुख तो पाना चाहते हैं, पर यह विस्मृत कर जाते हैं कि सात्विक सुख ही असली सुख है.यही चिरस्थायी होता है और यह सुख आत्मा तक पहुंचकर क्लांत मन को विश्राम तथा सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है.तन रंगने से अधिक आवश्यक मन को रंगना है.........


lekhni aapki ungliyon mein naachti hai.
har tathy or har vishy ko is tarah prastut karti hai ki padhne vala bandh jata hai.
jaise chalchitr ,bandhai swikaren

Dr.Bhawna said...

Bahut sundar post bahut2 badhai...

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बेहद ही रोचक तरीके से बृ्ज की आलौकिकता का जिस प्रकार आपने भावपूर्ण चित्रण किया है, वाकई में प्रशंसनीय है.......आभार

अल्पना वर्मा said...

Ranjana ji ,aap ko padhna bahut hi sukhkar lagaa.
behad urjawaan lekhan hai aap ka--badhayee.
der se aane ke liye maafi chahungi.

महामंत्री - तस्लीम said...

मनोहारी आलेख है, आभार।

प्रकाश बादल said...

रंजना जी आप अभिव्यक्ति को जिस कलात्मक तरीके से प्रस्तुत करती हैं वो मुझे बहुत प्रभावित करता है। बहुत खूब लिखा है आपने वाकई हम त्यौहारों को उनकी मूल परंपरा में नहीं मना रहे बल्कि ये बस एक औपचारिकता रह गई है। बहुत बढ़िया लेख
!

Vijay Kumar Sappatti said...

Ranjana ji

sorry for late arrival , i was on tour.

aapka lekha padhkar man ko kahin bheetar bahut sakun mila , is bhaagdaud wali zindagi men aisa kuch padhe to acha lagta hai ...

main bhi kuch likha hai , jarur padhiyenga pls : www.poemsofvijay.blogspot.com

सुमित प्रताप सिंह said...

सादर ब्लॉगस्ते,
कृपया पधारें व 'एक पत्र फिज़ा चाची के नाम'पर अपनी टिप्पणी के रूप में अपने विचार प्रस्तुत करें।

आपकी प्रतीक्षा में...

Prem Farrukhabadi said...

manmohak andaaz hai aapka. badhaai ho.

विनय said...

रंगों के त्योहार होली पर आपको एवं आपके समस्त परिवार को हार्दिक शुभकामनाएँ

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चाँद, बादल और शाम
गुलाबी कोंपलें

Ek Shehr Hai said...

चिट्ठाजगत के सोजन्य से आपके ब्लॉग तक का सफ़र तय हुआ। बहुत अच्छा लगा पढ़कर। कई अनेकों शब्द हैं।

मेरी एक सोच है जो मैं शेयर कर रहा हूँ, जैसे- कई चीज़ें हाथों से कुछ इस तरह से फिसल जाती है कि हम उनके पीछे भाग भी नहीं सकते या कभी-कभी भाग सकते हैं लेकिन भाग नहीं पाते।

आपका लेख किसी छवि मे कैद नहीं होता। वे आज़ाद रहता है।

क्या हम अपनी इच्चाओ के अलावा अपने आसपास मे महसूस करते सकते हैं उन कल्पनाओ को जो रोज़मर्रा की ज़िन्दगी मे ओझल रहती है। हर शख़्स अपने लिए कुछ तलाश रहा है। वे तलाश कभी ख़त्म होने की कगार पर ही नहीं होती।

इन अनदेखी तलाशों को हम कैसे अपने समीप ला सकते हैं? जो आपके लेख की तरह से उड़ान भरती है। कहीं हताशा में नहीं जीती।

लख्मी

सुनीता शानू said...

पहली बार आपका ब्लॉग पढ़ा रंजना जी। एक बेहतरीन पोस्ट के लिये बधाई...
और होली के इस मंगलमय पर्व पर आपको होली की ढेरों बधाईयाँ...

रवीन्द्र प्रभात said...

एक बेहतरीन पोस्ट और
होली की ढेर सारी शुभकामनायें....

Dr.Bhawna said...

होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ...

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

vakai aisa drishya ab milna mushkil hai.
HOLI KI SHUBHAKAMNAYEN.......
aapko tatha aapke pariwar ko...

Bahadur Patel said...

आपको और आपके परिवार को होली मुबारक

bahut achchha blog hai.

ताऊ रामपुरिया said...

आपको होली पर्व की हार्दिक बधाई और घणी रामराम.

योगेन्द्र मौदगिल said...

होली की अनंत असीम व रंगीन शुभकामनाएं

गर्दूं-गाफिल said...

हम सुख तो पाना चाहते हैं, पर यह विस्मृत कर जाते हैं कि सात्विक सुख ही असली सुख है.यही चिरस्थायी होता है और यह सुख आत्मा तक पहुंचकर क्लांत मन को विश्राम तथा सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है.तन रंगने से अधिक आवश्यक मन को रंगना है.........चिर सुख हेतु एक बार सात्विक रंगों से रंगकर देखें इस मन को........देखें कितना आनद है इस रंग मे...........
सुंदर शब्दचित्र के लिए बधाई

BrijmohanShrivastava said...

हर त्यौहार का अपना एक महत्त्व हुआ करता था ,एक लक्ष्य होता था ,एक जन कल्याण की भावना छुपी होती थी /हमने रूप विकृत कर दिया /ईश्वर ने कृपा की जो आपने बृज की होली के दर्शन किये /

रवीन्द्र दास said...

mujhe ummid hai k aapko sukh ki nind aati hogi!
aapka anurag isitarah bana rahe...

sa said...

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