21.12.09

स्मृति कोष से...

विशेषकर उस वय तक जबतक कि संतान पलटकर अपने अभिभावक को जवाब न देने लगे,उनकी अवहेलना न करने लगे,विरले ही कोई माता पिता अपने संतान के विलक्षणता के प्रति अनाश्वस्त होते हैं ..संसार के प्रत्येक अभिभावक जितना ही अपनी संतान में विलक्षणता के लिए लालायित रहते हैं,उतना ही सबके सम्मुख उसे सिद्ध और प्रस्तुत करने को उत्सुक और तत्पर भी रहा करते हैं.



ऐसे ही अपनी संतान की योग्यता के प्रति अति आश्वस्त आत्मविश्वास से भरे पिता ने अपनी चार वर्ष की पिद्दी सी बच्ची को संगीत कला प्रदर्शन हेतु मंच पर आसीन कर दिया..घबरायी बालिका ने सामने देखा - अपार भीड़..अपने दायें बाएं पीछे देखा...वयस्क वादक वृन्दों के सिर्फ घुटने ही घुटने .....घबराये निकटस्थ वादक के पतलून पकड़ उन्हें नीचे झुक अपनी बात सुनने का आग्रह किया और रुंधे कंठ से उनके कान में फुसफुसाई - अंकल मैं कौन सा गाना गाऊं, मुझे तो कोई भी एक पूरा गाना नहीं आता ..उन्होंने बालिका को उत्साहित करते हुए कहा..इसमें घबराने का क्या है बेटा, जो आता है जितना आता है उतना ही गा दो.. बालिका ने दिमाग पर पूरा जोर लगाया ,सुबह रेडियों पर सुनी कव्वाली का स्मरण उसे हो आया जो कि उसे बहुत पसंद भी था..कंठ में गोले से अटके आंसुओं के छल्ले को घोंट लगभग तुतलाती सी आवाज में उसने गा दिया..."झूम बराबर झूम शराबी,झूब बराबर झूम..मुखड़ा तीन बार दुहरा अंतरे का एक पद सुनाने के बाद बस, आगे सब साफ़...वादक महोदय ने आगे सुनाने का इशारा किया और बालिका ने सिर हिलाकर प्रत्युत्तर दिया,बस इतना ही आता है...


यह था मंच का मेरा पहला अनुभव, जिसे मैं इसलिए नहीं विस्मृत कर पाई हूँ कि एक पूरा गीत न जान और गा पाने के अपने अक्षमता के कारण मुझे जो ग्लानि हुई थी ,वह सहज ही विष्मरणीय नहीं और मेरे माता पिता इसलिए नहीं विस्मृत कर पाए हैं कि उनकी बेटी ने चार वर्ष के अल्पवय में मंच पर निर्भीकता से कला प्रदर्शित कर उनका नाम और मान बढ़ाते हुए प्रथम पुरस्कार जीता था.यूँ मैं आज तक निर्णित न कर पाई हूँ कि मुझे वह प्रथम पुरस्कार क्यों मिला था...


* औरों ने बहुत बुरा गाया था इसलिए,

* अन्य सभी प्रतियोगियों के चौथाई अवस्था की होने कारण मैं सहानुभूति की पात्र थी इसलिए,

* मेरे पिताजी जो अच्छे गायक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त सबके चहेते थे इस कारण ,

* या फिर मेरे गीत चयन ने जो सबको हंसा हंसा कर लोट पोट करा दिया था उस कारण..


साहित्य और संगीत में अभिरुचि मेरे पिताजी को विरासत रूप में कहाँ से मिली यह तो पाता नहीं, पर मुझमे यह अभिरुचि पिताजी से ही संस्कार रूप में आई, इसके प्रति मैं अस्वस्त हूँ.विज्ञान के विद्यार्थी होते हुए भी मेरे पिताजी जितना लाजवाब गीत लिखा करते थे,उतने ही सुमधुर स्वर में गाया भी करते थे. जहाँ भी वे रहे उनके बिना वहां का कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम पूर्णता न पाती थी..


स्वाभाविक ही पिताजी मुझे संगीत कला में पारंगत देखना चाहते थे,परन्तु दैव योग से हम जिन स्थानों में रहा करते थे अधिकाँश स्थानों पर संगीत प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था ही न थी..परन्तु जब मैं लगभग नौ वर्ष की थी स्थानांतरित होकर हम जिस जगह गए थे जहाँ कि हम लगभग तीन वर्ष रहे , वहां के बांगला स्कूल के एक संगीत प्रशिक्षक के विषय में जानकारी मिलते ही पिताजी ने उन्हें जा पकड़ा..वे विद्यालय तथा अपने आवास के अतिरिक्त कहीं और जाकर सिखाते नहीं थे..पर पिताजी भी मुझे मेरे घर आ प्रशिक्षण देने के लिए ऐसे हाथ धोकर उनके पीछे पड़े कि बेचारे गुरूजी को भागने का रास्ता ही नहीं दिया.. गुरूजी ने पिताजी को बहुत समझाया कि वे रविन्द्र तथा बांग्ला गीत ही सिखाते हैं, मेरे लिए हिन्दी में सब कुछ करने के लिए उन्हें बहुत कठिनाई होगी,उसपर से मेरे घर आकर समय देने का अतिरिक्त श्रम अलग था,परन्तु पिताजी कहाँ मानने वाले थे.उन्होंने उन्हें मना ही लिया..


मेरी संगीत शिक्षा आरम्भ हुई सप्ताह में तीन दिन गुरु जी आने लगे.मेरी वयस्कों की तरह एक पूरा गीत गा पाने की वह साध अब पूर्णता पाने वाली थी.पर यह क्या,गुरु जी जो सरगम पर अटके तो आगे बढ़ने का नाम ही नहीं लेते थे.सुर और संगीत से भले मुझे लाख स्नेह था,पर उन दिनों सरगम पर ही अटके रहना मुझे नितांत ही अरुचिकर लगा करता था..ऊपर से पिताजी भी अजीब थे, अपने मित्र मंडली के समक्ष सगर्व मेरे संगीत कला की विरुदावली गाने लगते और उनके वाह कहते कि मुझे उनके समक्ष अपने संगीत ज्ञान प्रदर्शन का आदेश जारी कर देते..यह दुसह्य आदेश मेरे लिए प्राण दंड से किंचित भी कमतर न हुआ करता था ..क्योंकि ऐसे समय में जब मैं सरगम दुहरा रही होती,पिताजी तो अपना सीना चौड़ा कर रहे होते पर उनके मित्र उबासी लेने लगते..गीत न जानने की टीस उस समय मुझे असह्य पीड़ा दिया करती..


जब करीब पांच मास इसी तरह सरगम गाते बीत गए तो मेरा धैर्य चुकने लगा और एक दिन आशापूर्ण अश्रुसिक्त नयनों और रुंधे कंठ से गुरूजी के सम्मुख अपना निवेदन रखा कि अब तो सरगम पूरी तरह कंटस्थ हो गाया , मुझे गीत भी सिखाएं. संभवतः गुरु जी को मुझपर दया आ गयी और उन्होंने मेरे लिए हिन्दी गीतों की कसरत शुरू की..परन्तु इसमें भी मुझे विशेष उत्साहजनक कुछ न लगा. क्योंकि राग आधारित कोई भी गीत चार पंक्तियों से अधिक के न हुआ करते थे और मेरी अभिरुचि उन दिनों लम्बे लम्बे तानो में तनिक भी न थी. खैर अब जो था सो था.हाँ,बाद के दिनों में इसकी भरपाई मैंने चुपके से अकेले में फ़िल्मी गीतों की धुनों को हारमोनियम पर उतार कर करने के यत्न के साथ किया..


गुरूजी जो भी सिखाया करते थे,सारा मुंह्जबानी ही हुआ करता था. कहीं कुछ लिखित रूप में न था. बाकी तो सब ठीक था,परन्तु उनके सिखाये गीतों में से एक गीत,जिसे मैं लगभग डेढ़ वर्ष पूरे तान के साथ दुहराती गाती रही थी, लाख दिमाग लगा भी उसका अर्थ समझ पाने के मेरे सभी यत्न विफल रहे थे..गीत की प्रथम पंक्ति थी - "अमुवा की डार को ले गाया बोले" .यूँ व्यावहारिक ज्ञान में मैं बहुत बड़ी गोबर थी,फिर भी मुझे यह प्रथम पंक्ति खटका करती कि आखिर इसका अर्थ क्या हुआ..


इधर गुरूजी मेरे संगीत के प्रथम वर्ष की परीक्षा दिलवाने की तैयारी कर ही रहे थे और उधर पुनः मेरे पिताजी के स्थानांतरण का आदेस निर्गत हुआ..तबतक गुरूजी का मुझपर अपार स्नेह हो गया था. उन्होंने असाध्य श्रम से न जाने कहाँ कहाँ संधान करा , राग आधारित गीतों की एक पुस्तक मेरे लिए मंगवाई और उस स्थान से जाने से पहले मुझे वह उपहार स्वरुप दिया जिसमे अन्य गीतों के अतिरिक्त वे समस्त गीत भी संकलित थे,जो गुरूजी ने मुझे सिखाये थे...जब मैंने पुस्तक में उपर्युक्त गीत को देखा,तो मुझे लगा कि मेरी शंका निर्मूल नहीं थी..वर्षों पूरे तान के साथ लगभग प्रतिदिन जिस "अमुवा की डार को ले गाया बोले " को मैंने न जाने कितने सौ बार दुहराया था ,वह गीत वस्तुतः -" अमुवा की डार पर कोयलिया बोले " था......


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49 comments:

संगीता पुरी said...

एक महीने मेरे पास रहने के बाद पापा जी ने अभी तुरंत यहां से विदाई लेकर निकले हैं .. अपने दुखी मन को बहलाने के लिए नेट पर बैठी .. तो आपका यह सुंदर संस्‍मरण पढने को मिला .. एक एक पंक्ति मेरी अपनी कहानी लगी .. विज्ञान के विद्यार्थी होते हुए भी आपके पिताजी की ही तरह मेरे पिताजी को भी भाषा साहित्‍य और संगीत की जगह ज्‍योतिष से लगाव बना .. आपके पिताजी की तरह ही वे मुझे हमेशा से ज्‍योतिष में पारंगत देखना चाहते रहें .. आप भी अपने पिता जी की पहली संतान ही हैं क्‍या ??
परन्तु उनके सिखाये गीतों में से एक गीत,जिसे मैं लगभग डेढ़ वर्ष पूरे तान के साथ दुहराती गाती रही थी, लाख दिमाग लगा भी उसका अर्थ समझ पाने के मेरे सभी यत्न विफल रहे थे..गीत की प्रथम पंक्ति थी - "अमुवा की डार को ले गाया बोले" .यूँ व्यावहारिक ज्ञान में मैं बहुत बड़ी गोबर थी,फिर भी मुझे यह प्रथम पंक्ति खटका करती कि आखिर इसका अर्थ क्या हुआ
बहुत मजेदार .. बचपन में इतनी समझ कहां रहती है .. इसी कारण तो अपने जीवन की कुछ यादें गुदगुदाती रहती हैं !!

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

कुछ याद आ गया ... हारमोनियम ..राग यमन का अभ्यास..और फिर..एक दिन सब कुछ छोड़ देने का कष्टदायक निर्णय ....अब भी टीस देता है.

'अदा' said...

अरे वाह रचना और संगीता जी...
हा हा हा ..गुरु जी बंगाली थे न इसलिए गड़बड़ हुई थी...
ये तो लगता है झारखंडी कन्याओं की यही कहानी है...मेरे पिता जी भी गणित और भूगोल में स्नातकोत्तर होते हुए भी इतना अच्छा लिखते हैं कि क्या बताऊँ.....उन जैसा तो आज तक नहीं लिख पायी...लेकिन धमनी में उनका थोडा सा यह गुण ले आई हूँ....और संगीत का भी यही हाल रहा....'महेश गुरूजी; घर पर ही आते थे .. राग यमन का ''सुमिरन कर मन राम नाम को''' आज तक नहीं उतरा दीमाग से...
सच रचना....संस्मरण तो तुम्हारा है....लेकिन लगा हमरी बात कह रही हो....
सुन्दर अतिसुन्दर....

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बचपन की मीठी मीठी यादे यूँ ही याद आ जाती है ....पापा गणित विषय में चाहते थे की बिटिया खूब ज्ञान हासिल करे पर डिब्बा उस में ही गुल था :)सबको अपना अपना बचपन याद दिला दिया आपने इस संस्मरण से

महफूज़ अली said...

क्या कहूँ? ये पोस्ट दिल को छू गई...

आभार...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बच्ची की पहली परफोर्मेंस देखकर दुःख भी हुआ, हंसी भी आयी और अच्छा भी लगा. ये बच्चियों के बाप भी न बस्स! उनकी दुनिया भी और भगवान् भी सिर्फ बेटियों में ही होता है. शायद उसी भावना में कभी-कभी (हमेशा?) अतिरेक भी हो जाता है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

संस्मरण बहुत बढ़िया है जी!

मनोज कुमार said...

दिलचस्प संस्मरणात्मक विवरण .... यथार्थबोध के साथ कलात्मक जागरूकता भी स्पष्ट है।

'अदा' said...

प्यारी रंजना,
मुझसे बहुत भरी गलती हुई है 'रंजना' नाम में त्रुटी की
और यह मत सोचना कि मन में रचना सोच रही थी....
दरअसल तुमसे पहले ही 'रचना त्रिपाठी' जी को टिपण्णी कि थी बस ये गलती हो गई...
क्षमाप्रार्थी हूँ...
'अदा'

Devendra said...

दिलचस्प संस्मरण
वाकई हम अपने बच्चों से आवश्यकता से अधिक उम्मीद कर के उसका बचपन छीन लेते हैं
दुःख की बात यह कि हमें इसका ग्यान भी देर से होता है

Manish Kumar said...

Shashtriya sangeet ho , Chhayawadi Kavitayein ho ye sab jab humein padhai sikhai jati hain tab uske liye hum mansik roop se bilkul taiyaar nahin hote.

Baad mein bhale hi us gyan ka phaida milta hai par us waqt inhein seekhte waqt aanand utha pana kisi bachche ke liye behad mushkil hai.

Aabha is sansmaran ko sajha karne ke liye.

अल्पना वर्मा said...

'अमुवा की डार को ले गाया बोले !
-हा हा हा!

यह तो वाकयी रोचक संस्मरण था..
आभार इसे हम से बाँटने के लिए.

योगेन्द्र मौदगिल said...

pyara sansmaran...

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

हम्‍म.............. तो आप हैं, हमारे बडे भईया को 'तुम-तुम्‍हारे'
कहते हुए टिप्‍पणी करते हैं. हमहू सोंचें कौन सी रचना है भई यह ?

........ पर आपके ब्‍लाग में आकर मन के सारे संशय दूर हो गए. अध्‍ययन और चिंतन की समर्थता को स्‍पष्‍ट करते पोस्‍ट, बहुत ही दमदार लेखनी. प्रणाम.

Kishore Choudhary said...

आपकी पोस्ट सदैव ऊर्जा की तलाश में होती है. जीवन के सूक्ष्म और स्थूल व्यवहारों और घटनाओं में सार्थक बहस खोजना या चिंतन से सृजन के प्रयास करना ही आपकी खूबी है. मुझे ये अति प्रिय भी हैं. स्मृतियों के खजाने से कुछ और भी बांटने का प्रयास कीजिये, मन लालयित है.

कंचन सिंह चौहान said...

सही कहा दी शुरुआत में सरगम का दोहराव बहुत बोर करता है।

चार पंक्तियों वाले गीत से तो खैर अरुचि नही होती थी मुझे और ताने, आलाप जब पूरी क्लास एक साथ उतार चढ़ाव के साथ गाती तो मन में अजब प्रसन्नता होती।

कोयलिया बोले अमवा की डार पर
रितु बसंत को देत संदेसवा

ये गीत इण्टरमीडियेट में मैने सेलेक्ट किया था...मेरी नई आई भाभी कहती थीं कि मायके जाने पर भी ये गीत उनका पीछा नही छोड़ रहा था। वे बेचारी नवविवाहिता, रात में कितनी देर तक पति की बातों की जगह इसको झेलती होंगी। इस दर्द को अब समझी :) :)

ज्ञानदत्त G.D. Pandey said...

संगीत साधना दुरुह कार्य है। इसी लिये इसे दूर से देखते हुये भी इसके प्रति इज्जत है।
अगर एक अवसर आये तो मैं संगीतकार/गायक बनना चाहूंगा।

दिगम्बर नासवा said...

बचपन की खट्टी मीठी यादें अक्सर आन को गुदगुदा . हैं .......... आपने बहुत ही मर्मस्पर्शीय अंदाज़ में अपना मोहक संस्मरण लिखा है ......... मुझे भी अपना बचपन याद आ गया जब हम मेहमानो के सामने अपना गाना सुनाते थे मां के कहने पर .... और वो उबासियाँ लेते थे ....... बहुत अच्छा लगा आपको पढ़ना .......

rashmi ravija said...

संस्मरण के सागर से नायब मोती चुनकर लाईं हैं इस बार तो,आप ...आनंद आ गया पढ़कर...आप भी, कभी अपना गाना अपलोड कीजिये.."अमुवा की डार को ले गाया बोले"(सुधार हुआ वर्ज़न नहीं)..आपके गुरु जी को टेलीपैथी से पता लग जाएगा और वे खुश हो जायेंगे.
पैरेंट्स की तमन्ना का तो क्या कहें..शायद हर परेंट्स का सपना होता है..उसके बच्चे भी अच्छा गायें...मैंने भी अपने फुटबाल और कराटे के शौक़ीन बेटों को म्युज़िक क्लास में डाला था...जब भी क्लास का वक़्त होता...वो 'सा रे गा मा' की प्रैक्टिस करने बैठ जाते..बाकी समय अपनी शैतानी में मस्त रहते...दो महीने में ही मैदान छोड़ भाग खड़े हुए.

कुश said...

पुरस्कार तो प्रोत्साहन के लिए दिए जाते है.. यक़ीनन आपको प्रोत्साहित ही किया गया होगा..

बहरहाल इस बार आपका मूड कुछ बदला सा था और पोस्ट भी छोटी थी.. :) इशारा अच्छा है.. !

वैसे काम की बात तो आपने शुरूआती पंक्तियों में ही कर दी थी.. जो मैंने अपने जेहन में बुकमार्क कर ली है.. जब बच्चे होंगे मेरे तो काम आएगी.. :)

इस तरह कोयलिया यादो की कूक देती रहे और हमें हमारी खुराक मिलती रहे..

रंजीत said...

इसी कड़ी को पढ़ पाया हूं। अगर पिछली कड़ी पढ़ा होता, तो शायद संस्मरण के मर्म तक पहुंच पाता। लेकिन इस कड़ी में भी सार्थक और रोचक बातों की कमी नहीं है। कभी अज्ञेय जी (जिनकी लेखकीय क्षमता का मैं कायल हूं) ने कहा था, " प्रत्येक आदमी की जिंदगी में एक बेहतरीन उपन्यास की कथा होती है। यह अलग बात है कि लेखन और रचनाकर्म में दक्ष हाथ ही अपनी जिंदगी के अनुभवों को किताब की शक्ल दे पाते हैं।' मैं जानता हूं कि आप रचनाकर्म और लेखनकर्म में दक्ष हैं, यह उम्दा संस्मरण इसका प्रमाण है।
संतान-पिता सबंध के मनोविज्ञान को आपने बखूबी उकेरा है। चाहता हूं कि इससे संबंधित अन्यान्य प्रसंग सामने आये। हालांकि संस्मरण में फरमाइश या सलाह अपराध है। प्रस्तुत प्रसंग अच्छा लगा। कोशिश करूंगा कि अगली कड़ी भी पढ़ूं। बहुत-बहुत बधाई।

Udan Tashtari said...

बहुत ही रोचक और दिलचस्प संस्मरण रहा. बचपन की यादों में गोता लगाने का अपना ही आनन्द है.

बहुत उम्दा!

श्यामल सुमन said...

यह बचपन का संस्मरण रोचक लगा विशेष।
सरगम के अभ्यास ने दिया आपको क्लेश।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

वन्दना अवस्थी दुबे said...

वाह बहुत ही मीठा और सुरीला संस्मरण.

अभिषेक ओझा said...

एक गाकर पॉडकास्ट भी तो कीजिये. मैं एक बार भाषण दे रहा था तो ऐसी ही कुछ हालत हुई थी मेरी. तब मैं शायद तीसरी कक्षा में था.

सागर नाहर said...

आपसे अनुरोध है कि ज्यादा ना सही कमस कम उन चार पंक्तियों को तो गा कर अपलोड करें।
हमें सुनना अच्छा लगेगा।

॥दस्तक॥|
गीतों की महफिल|
तकनीकी दस्तक

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर संस्मरण लगा, आप का मुझे एक बार मंच पर बोलने के लिय़े खडा किया स्कूल मै मै घबरा कर कुछ ना बोला, बस रोने लगा,लेकिन अब तो अमुवा की डार पर कोयलिया बोले ओर यह बोली बहुत मन भावन लगी. धन्यवाद

Suman said...

nice

डॉ .अनुराग said...

सच में पता नहीं क्यों लगता है आप एक बेहतरीन माँ होगी ......ओर एक जिन्दा दिल इंसान ..कुछ लम्हे बाद में अपना असली मीनिंग देते है ना !

cmpershad said...

बचपन का एक छोटा सा कदम कितना आत्मविश्वास भर देता है मनुष्य के जीवन में। प्रेरणादायक संस्मरण के लिए बधाई॥

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Aapki lekhan shaili sachmuch laajawaab hai.

--------
2009 के श्रेष्ठ ब्लागर्स सम्मान!
अंग्रेज़ी का तिलिस्म तोड़ने की माया।

निर्झर'नीर said...

"अमुवा की डार को ले गाया बोले " को मैंने न जाने कितने सौ बार दुहराया था ,वह गीत वस्तुतः -" अमुवा की डार पर कोयलिया बोले " था.....

humen bhi aapki aakhiri pankti padhne ke baad hi samajh aaya ..

sach to hai atiit chahe jaisa ho uski yaden madhur hoti hai.

aapke bachpan ko jaanna accha laga

गौतम राजरिशी said...

अमुआ की डार...हा! हा! जब छोटा था तो मेरी दीदी सीखा करती थी हारमोनियम और तानपुरा लेकर...वो दृश्य याद आ गया।

एक मोहक संस्मरण। आपकी लेखनी बरबस बाँधे रहती है अंत तक...

dweepanter said...

बहुत ही मोहक संस्मरण है।
ब्लाग जगत में द्वीपांतर परिवार आपका स्वागत करता है।
pls visit...
www.dweepanter.blogspot.com

हरकीरत ' हीर' said...

वाह .....रंजना जी आपने तो अंतिम क्षण तक सस्पेंस बनाये रखा ..." अमुवा की डार को ले गाया बोले " पढ़ते ही बंगाली बाबु का वो शे'र याद आगया ''
न सूखा करता है न गीला करता है
तुम साला मत रहो ये दुआ करता है

तो आप गाती भी हैं .....कभी सुनाइए न कुछ .....!!

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत दिलचस्प संस्मरण. बिलकुल किसी बच्चे के दिल से निकली बात की तरह. और लेखन के बारे में नया कहने को क्या है मेरे पास? कुछ भी नहीं.

sangeeta swarup said...

बहुत खूबसूरती से लिखा है आपने संस्मरण....आनंद आया

शोभना चौरे said...

कुछ हमारी भी ऐसी ही स्थिति रही संगीत सीखने का भयंकर शौक |शादी के पहले तो घर में यः शौक वर्जित था शादी के बाद भी शौक जोर मारता हां एक फेक्ट्री के town शिप में रहते थे वही स्कूल के संगीत शिक्षक थे वो हमारी जैसे महिलाओ को
सिखाने को अपना भाग्य मानते थे पर हालत नही अलंकार से ज्यादा आगे बढ़ नहीं पाए और बहुत जिद करने पर य्मंकल्याँ पर आधारित गीत जब दीप जले आना भी आधा ही सीख पाए |
बहरहाल आपकी पोस्ट बहूत ही बेहतरीन ढंग से लिखी है आपने \बधाई

सुलभ सतरंगी said...

वाह! कितना कोमल संस्मरण है.
एक यही संगीत ही हमसे दूर रहा है. आजतक संगीत का क. ख. ग. भी नहीं मालूम.
अब मुझे ग़ज़ल विधा में शायद इसलिए भी कठिनाई होती है.

पिताजी कुछ ज्यादा ही आस लगा देते हैं. है न? बचपन में वे यदि प्रयास नहीं करेंगे तो दुसरा और कौन करने वाला है.

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

उत्क्रिस्ट संस्मरण ... लगा एक बच्चे ने अपने कोमल ह्रदय से ये संस्मरण लिखा है |

दीदी अंग्रेजी नव वर्ष पे शुभकामनाएं !

अजित वडनेरकर said...

सुंदर, रोचक संस्मरण। आप स्मृतियों को गुलदस्ते की तरह तो सामने लाती ही हैं, उन्हें आज के परिप्रेक्ष्य में सही जगह-सही कोण भी देती हैं।

श्रद्धा जैन said...

rochak sansmaran
guru ki shiksha aur pitaji ki umeedon ka dawaab waqayi bahut mushkil dour raha hoga
aapke lekhan mein bahut taqat hai

BrijmohanShrivastava said...

एक नई जानकारी भी मिली कि रचनाकार का साहित्य मे ही नहीं बल्कि संगीत में भी दखल है ।रोचक भाषा सरल शब्दों मे लिखी बचपन की याद (या जीवनी का प्रथम भाग ) अच्छा लगा ।हर पिता की इच्छा होती है कि अपनी बेटी (या बेटा ) के गुणों का न सिर्फ़ बखान करे बल्कि अपने मित्रों और परिचितों को बिटिया के मुंह से सुनवाये भी ।उस वक्त के सरगम का अभ्यास आज किसी भी धुन को बनाने मे कारगर सिद्ध हो रहा होगा वैसे स्वभावत हर बच्चे की इच्छा होती है जल्दी से कोई गाना सिखादे सरगम (नींव) बोर लगता है ।कोयलिया वाली बात भी खूब रही ।भाषा का फ़र्क हो जाता है । बोले-आज शाम को हमारे घर भोजन है जरूर आना ,ये खाना खाने पहुंच गये , मालूम चला वहां भजन संध्या थी ।

रश्मि प्रभा... said...

bachpan ke din bhi kya din the.....

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

इतने इतने दिनों तक ब्लॉग अपडेट नहीं होगा, तो क्या होगा?
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अपना ब्लॉग सबसे बढ़िया, बाकी चूल्हे-भाड़ में।
ब्लॉगिंग की ताकत को Science Reporter ने भी स्वीकारा।

Fighter Jet said...

bahut accha laga padh ke :)

निर्मला कपिला said...

vaah vaah raMjanaa jee ab to sab kaa anurodh maananaa hee paDegaa gaa kar ek posT Daal deejiye n
bahut acchaa lagaa jaan kar saMsmaran sundar lagaa shubhakaamanaayeM

Hari Shanker Rarhi said...

imaandari se kahi gayee baat ek achchha sahitya ban sakti hai. Aapke samsmaran se ye baat sidhh hoti hai.

sa said...

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