Showing posts with label प्रवृत्तियां. Show all posts
Showing posts with label प्रवृत्तियां. Show all posts

8.9.09

समालोचना !!!

सम्पूर्ण श्रृष्टि में चर चराचर, प्रत्येक उद्यम सुख और आनंद प्राप्ति के निमित्त ही तो करते हैं. परन्तु समस्या यह है कि सुख आनंद विभिन्न श्रोतों द्वारा जितना अधिक हम लेने / जोड़ने में तत्पर रहा करते हैं, उतना किसी को देने में नहीं. जबकि यदि हम सचमुच ही शाश्वत सुख के अभिलाषी हैं, तो मन वचन और कर्म से सतत सजग रह कर हमें अपने आस पास अपने से जुड़े प्रकृति से लेकर प्राणिमात्र को सुख देना होगा...क्योंकि भौतिकी का यह सिद्धांत निर्विवादित सत्य है कि, हमारे द्वारा संपादित प्रत्येक क्रिया के सापेक्षिक समानुपातिक प्रतिक्रिया होती है..यदि हम सदैव यह ध्यान रखें कि अमुक कारक यदि मेरे सुख का कारण बनती है तो मैं भी दूसरे को यह सुख दूँ, तो संसार में दुःख का संभवतः कोई कारण ही नहीं बचेगा...

जैसे कि यही देख लें , सामान्य जीवन में हम प्रशंषित प्रोत्साहित होने में तो सुख पाते हैं,परन्तु सच्चे मन से प्रशंशा या प्रोत्साहन देने में संकोच कर जाते हैं. अधिकांशतः ऐसे अवसरों पर हमारा अहम् आड़े आ जाया करता है. यही नहीं, बहुधा जाने अनजाने अपने आत्मीय, अपने प्रिय तक से ऐसा कुछ कह जाया करते हैं, जो उनकी आत्मा को गहरे खरोंच जाया करती हैं. हमारे लिए साधारण लगने वाली बातों को भी मन में चुभ जाने पर हमारे अपने अति गंभीरता से ले लिया करते हैं और फिर ये बातें उनके जीवन की दिशा ही बदल दिया करती है. नकारात्मक बातें जीवन को अधोगामी बना बड़ा ही घातक परिणाम छोडा करती हैं...

मेरी एक प्रिय सखी है. उसके लेखन की मैं कायल हूँ..परन्तु इधर बहुत लम्बे समय से उसका मन लेखन से विरत हो गया था...पहले तो मुझे लगा उसकी अन्मयस्कता का कारण संभवतः पारिवारिक व्यस्तता है, पर वार्ता क्रम में जब उसे बड़ा ही निराश हतोत्साहित सा देखा तो मैं कारण जानने को बाध्य हो गयी.....बहुत खोंदने पर ज्ञात हुआ कि एक वरिष्ठ साहित्यकार , जिनपर उसकी अपार आस्था और श्रद्धा थी तथा जिनके मार्गदर्शन में चलना ही उसने अपना परम कर्तब्य माना था, ने न जाने क्या सोचकर उसके लेखन कला की तीव्र भर्त्सना कर दी...इस घटना से उसका संवेदनशील ह्रदय इतना आहत और हतोत्साहित हुआ कि उसने स्वयं ही अपने आप को अयोग्यता का प्रमाण पत्र देते हुए भविष्य में रचनाशीलता से किनारा करने का मन बना लिया.यह मेरे लिए असह्य था,क्योंकि अपनी श्रीजनात्मकता से वह साहित्य को समृद्धि प्रदान कर रही थी...

अपने जीवन में बहुधा ही इन परिस्थितियों से मैं स्वयं भी गुजरी हूँ तथा असंख्य लोगों को गुजरते देखा है,चाहे वह घर हो,कार्यालय हो, साहित्य/कला का क्षेत्र हो या जीवन से जुड़ा कोई भी अन्य क्षेत्र...और मुझे लगता है इस संसार का कोई मनुष्य नहीं जो इससे अछूता रहा होगा..जिससे हम नकारात्मकता की अपेक्षा किये होते हैं,जो हमारे आत्मीय नहीं होते , उनकी आलोचना से भले हम आहत न हो..परन्तु अपने आत्मीय जनों या जिनपर हमें आपर आस्था हो, अनपेक्षित रूप से यदि आलोचना मिले या प्रोत्साहन न मिले,तो हतोत्साहित हताश होना स्वाभाविक है.

ऐसी परिस्थतियों में हौसला हार कर शिथिल हो बैठा जाना, अपने कर्तब्य से विमुख होना, स्वाभाविक सही पर उतना ही अनुचित है, जितना कि किसी को हतोत्साहित करना. यदि हमने अपने कर्म का मार्ग परोपकार(मन वचन या कर्म से किसी को भी सुख देने का) का चुना है, तो ऐसे मार्ग पर कर्म विमुख कर्ताब्य्च्युत होकर बैठना निसंदेह पाप है. हाँ बात यह है कि संवेदनशील ह्रदय जब आहत व्यथित होगा यह नकारात्मक भाव हमारे रचनात्मक उर्जा का क्षय तो करेगा ही...ऐसे में इससे उबरने के साधनों पर यदि विचार कर लिया जाय तथा उसे सदैव ध्यान में रखा जाय तो नकारात्मक भाव से यथासंभव शीघ्रातिशीघ्र छुटकारा मिल सकता है..

सबसे पहले इसपर विचार करें कि क्या आलोचक की व्यक्तिगत योग्यता, अभिरुचि या कार्यक्षेत्र वह है कि वह हमारे विचारों और कार्यों का सही मूल्यांकन कर सकता है....

दुसरे, कि कहीं अधिकांश व्यक्तियों या उनके कृतित्वों का क्षिद्रान्वेशन आलोचक की स्वाभाविक प्रवृत्ति ही तो नहीं .....(क्योंकि कुछ वरिष्ठ और महत्वपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित तथा महत कार्य संपादित कर रहे व्यक्ति भी कुंठाग्रस्त नकारात्मक प्रवृत्ति के होते हैं और उनसे सकारात्मकता की आशा करना रेत से तेल निकलने सा है)

तीसरे ,यदि आलोचक में उपर्युक्त कोई भी दोष नहीं, तो कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने जब नकारात्मक प्रतिक्रिया दी उस कालावधि में वह तनावग्रस्त ,खीझा चिड़चिडाया हुआ था .

इन तथ्यों को ध्यान में रखकर ही निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए कि आलोचक की बातों को कितना वजन देना है और अंगीकार करना है. यूँ तो सर्वोत्तम यह होता है कि सौ पैसे अपनी भी न सुनी जाय.... सबकी सुन, अपनी तथा बाकियों की बातों को अपने विवेक की कसौटी पर भली प्रकार जांच परख कर,अभिमत स्थिर करना ही श्रेयकर हुआ करता है और तत्पश्चात उस मार्ग पर पूर्ण सकारात्मक उर्जा के साथ अग्रसर हों..सामान्यतया यदि व्यक्ति सकारात्मकता से गहरे जुड़ा होता है तो उसका विवेक भी उतना ही जागृत होता है और फिर छोटी छोटी बातों, दुर्घटनाओं की तो बात ही क्या, बड़ी से बड़ी दुर्घट्नाये बाधाएं उसका कर्मपथ अवरुद्ध बाधित नहीं कर पातीं.

कहते हैं न...... " खुदी को कर बुलंद इतना,कि खुदा भी बन्दे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है..." वस्तुतः सही मायने में जिसने भी अपने आत्मबल को सुदृढ़ कर लिया ,विवेक को सतत जागृत रखा, जीवन उसीने जिया...वही विजेता बना... क्योंकि अंततः जीवन में यदि कुछ माने रखता है तो स्वयं द्वारा निष्पादित सत्कर्म और उससे प्राप्त संतोष और शांति...

यह सतत स्मरणीय है कि समालोचना क्रम में सदैव सकारात्मक रहें,नहीं तो आपकी नकारात्मक उक्ति किसी की रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर सकती है...


***************************