8.9.09

समालोचना !!!

सम्पूर्ण श्रृष्टि में चर चराचर, प्रत्येक उद्यम सुख और आनंद प्राप्ति के निमित्त ही तो करते हैं. परन्तु समस्या यह है कि सुख आनंद विभिन्न श्रोतों द्वारा जितना अधिक हम लेने / जोड़ने में तत्पर रहा करते हैं, उतना किसी को देने में नहीं. जबकि यदि हम सचमुच ही शाश्वत सुख के अभिलाषी हैं, तो मन वचन और कर्म से सतत सजग रह कर हमें अपने आस पास अपने से जुड़े प्रकृति से लेकर प्राणिमात्र को सुख देना होगा...क्योंकि भौतिकी का यह सिद्धांत निर्विवादित सत्य है कि, हमारे द्वारा संपादित प्रत्येक क्रिया के सापेक्षिक समानुपातिक प्रतिक्रिया होती है..यदि हम सदैव यह ध्यान रखें कि अमुक कारक यदि मेरे सुख का कारण बनती है तो मैं भी दूसरे को यह सुख दूँ, तो संसार में दुःख का संभवतः कोई कारण ही नहीं बचेगा...

जैसे कि यही देख लें , सामान्य जीवन में हम प्रशंषित प्रोत्साहित होने में तो सुख पाते हैं,परन्तु सच्चे मन से प्रशंशा या प्रोत्साहन देने में संकोच कर जाते हैं. अधिकांशतः ऐसे अवसरों पर हमारा अहम् आड़े आ जाया करता है. यही नहीं, बहुधा जाने अनजाने अपने आत्मीय, अपने प्रिय तक से ऐसा कुछ कह जाया करते हैं, जो उनकी आत्मा को गहरे खरोंच जाया करती हैं. हमारे लिए साधारण लगने वाली बातों को भी मन में चुभ जाने पर हमारे अपने अति गंभीरता से ले लिया करते हैं और फिर ये बातें उनके जीवन की दिशा ही बदल दिया करती है. नकारात्मक बातें जीवन को अधोगामी बना बड़ा ही घातक परिणाम छोडा करती हैं...

मेरी एक प्रिय सखी है. उसके लेखन की मैं कायल हूँ..परन्तु इधर बहुत लम्बे समय से उसका मन लेखन से विरत हो गया था...पहले तो मुझे लगा उसकी अन्मयस्कता का कारण संभवतः पारिवारिक व्यस्तता है, पर वार्ता क्रम में जब उसे बड़ा ही निराश हतोत्साहित सा देखा तो मैं कारण जानने को बाध्य हो गयी.....बहुत खोंदने पर ज्ञात हुआ कि एक वरिष्ठ साहित्यकार , जिनपर उसकी अपार आस्था और श्रद्धा थी तथा जिनके मार्गदर्शन में चलना ही उसने अपना परम कर्तब्य माना था, ने न जाने क्या सोचकर उसके लेखन कला की तीव्र भर्त्सना कर दी...इस घटना से उसका संवेदनशील ह्रदय इतना आहत और हतोत्साहित हुआ कि उसने स्वयं ही अपने आप को अयोग्यता का प्रमाण पत्र देते हुए भविष्य में रचनाशीलता से किनारा करने का मन बना लिया.यह मेरे लिए असह्य था,क्योंकि अपनी श्रीजनात्मकता से वह साहित्य को समृद्धि प्रदान कर रही थी...

अपने जीवन में बहुधा ही इन परिस्थितियों से मैं स्वयं भी गुजरी हूँ तथा असंख्य लोगों को गुजरते देखा है,चाहे वह घर हो,कार्यालय हो, साहित्य/कला का क्षेत्र हो या जीवन से जुड़ा कोई भी अन्य क्षेत्र...और मुझे लगता है इस संसार का कोई मनुष्य नहीं जो इससे अछूता रहा होगा..जिससे हम नकारात्मकता की अपेक्षा किये होते हैं,जो हमारे आत्मीय नहीं होते , उनकी आलोचना से भले हम आहत न हो..परन्तु अपने आत्मीय जनों या जिनपर हमें आपर आस्था हो, अनपेक्षित रूप से यदि आलोचना मिले या प्रोत्साहन न मिले,तो हतोत्साहित हताश होना स्वाभाविक है.

ऐसी परिस्थतियों में हौसला हार कर शिथिल हो बैठा जाना, अपने कर्तब्य से विमुख होना, स्वाभाविक सही पर उतना ही अनुचित है, जितना कि किसी को हतोत्साहित करना. यदि हमने अपने कर्म का मार्ग परोपकार(मन वचन या कर्म से किसी को भी सुख देने का) का चुना है, तो ऐसे मार्ग पर कर्म विमुख कर्ताब्य्च्युत होकर बैठना निसंदेह पाप है. हाँ बात यह है कि संवेदनशील ह्रदय जब आहत व्यथित होगा यह नकारात्मक भाव हमारे रचनात्मक उर्जा का क्षय तो करेगा ही...ऐसे में इससे उबरने के साधनों पर यदि विचार कर लिया जाय तथा उसे सदैव ध्यान में रखा जाय तो नकारात्मक भाव से यथासंभव शीघ्रातिशीघ्र छुटकारा मिल सकता है..

सबसे पहले इसपर विचार करें कि क्या आलोचक की व्यक्तिगत योग्यता, अभिरुचि या कार्यक्षेत्र वह है कि वह हमारे विचारों और कार्यों का सही मूल्यांकन कर सकता है....

दुसरे, कि कहीं अधिकांश व्यक्तियों या उनके कृतित्वों का क्षिद्रान्वेशन आलोचक की स्वाभाविक प्रवृत्ति ही तो नहीं .....(क्योंकि कुछ वरिष्ठ और महत्वपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित तथा महत कार्य संपादित कर रहे व्यक्ति भी कुंठाग्रस्त नकारात्मक प्रवृत्ति के होते हैं और उनसे सकारात्मकता की आशा करना रेत से तेल निकलने सा है)

तीसरे ,यदि आलोचक में उपर्युक्त कोई भी दोष नहीं, तो कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने जब नकारात्मक प्रतिक्रिया दी उस कालावधि में वह तनावग्रस्त ,खीझा चिड़चिडाया हुआ था .

इन तथ्यों को ध्यान में रखकर ही निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए कि आलोचक की बातों को कितना वजन देना है और अंगीकार करना है. यूँ तो सर्वोत्तम यह होता है कि सौ पैसे अपनी भी न सुनी जाय.... सबकी सुन, अपनी तथा बाकियों की बातों को अपने विवेक की कसौटी पर भली प्रकार जांच परख कर,अभिमत स्थिर करना ही श्रेयकर हुआ करता है और तत्पश्चात उस मार्ग पर पूर्ण सकारात्मक उर्जा के साथ अग्रसर हों..सामान्यतया यदि व्यक्ति सकारात्मकता से गहरे जुड़ा होता है तो उसका विवेक भी उतना ही जागृत होता है और फिर छोटी छोटी बातों, दुर्घटनाओं की तो बात ही क्या, बड़ी से बड़ी दुर्घट्नाये बाधाएं उसका कर्मपथ अवरुद्ध बाधित नहीं कर पातीं.

कहते हैं न...... " खुदी को कर बुलंद इतना,कि खुदा भी बन्दे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है..." वस्तुतः सही मायने में जिसने भी अपने आत्मबल को सुदृढ़ कर लिया ,विवेक को सतत जागृत रखा, जीवन उसीने जिया...वही विजेता बना... क्योंकि अंततः जीवन में यदि कुछ माने रखता है तो स्वयं द्वारा निष्पादित सत्कर्म और उससे प्राप्त संतोष और शांति...

यह सतत स्मरणीय है कि समालोचना क्रम में सदैव सकारात्मक रहें,नहीं तो आपकी नकारात्मक उक्ति किसी की रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर सकती है...


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64 comments:

Pankaj Mishra said...

bilkul sahee baat ranjana jee

M VERMA said...

बहुत सटीक मुद्दा उठाया आपने. ऐसी समालोचना किस काम की जो लेखन से ही विरत कर दे. ऐसे मे स्वविवेक को कायम रखना ही उचित है. बहुत सही कहा है आपने
"यह सतत स्मरणीय है कि समालोचना क्रम में सदैव सकारात्मक रहें,नहीं तो आपकी नकारात्मक उक्ति किसी की रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर सकती है..."

रंजना [रंजू भाटिया] said...

हर बात को चाहे वह लेखन की हो चाहे ज़िन्दगी की सकरात्मक ढंग से लेनी चाहिए ..सही कहा आपने सुने सबकी ..उसके बाद अपने मन से उस बात को सोचे .हमेशा किसी का कहा गलत भी नहीं होता है ..नजिरया ठीक हो तो सब ठीक है ..इस बार भी आपने बहुत अच्छा विषय लिया है रंजना ..शुक्रिया

Shiv Kumar Mishra said...

आपने सही लिखा. भाषा भी सही है. कथ्य भी सही है. लेकिन आप हमेशा सही क्यों लिखती हैं? कुछ अलग सा लिखने का मन नहीं करता आपका? कुछ विरोधी टाइप. कुछ अति विरोधी टाइप. आपसे हमें बड़ी आशा थी कि आप लीक से हटकर भी लिखने की काबिलियत रखती हैं. लेकिन हमें बड़ी निराशा हुई.

(आलोचक की टिप्पणी)

यह किस तरह का लेख है? आज ज़रुरत है मानव को जगाने की. बिना गाली-फक्कड़ के मानव कैसे जागेगा? आपको यह क्यों लगता है कि दुनियाँ में सबकुछ अच्छा ही अच्छा हो रहा है? आप साहित्य को ऐसे लेखन से क्या दे रही हैं?

(समालोचक की टिप्पणी)

आपने बिल्कुल सही लिखा. अब फ़र्ज़ कीजिये, अगर आप सही न लिखतीं तो क्या होता? गलत हो जाता न सबकुछ. इसलिए हमेशा सही लिखने की कोशिश किया करें.

(धमा-आलोचक की टिप्पणी)

आपने एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर बहुत ही गंभीरता से लिखा है. बहुत ही अच्छे विचार.

(पाठक की टिप्पणी)

महेन्द्र मिश्र said...

बढ़िया विचारणीय . आलोचना या समालोचना से डर कर हौसला नहीं खोना चाहिए . आभार

Arvind Mishra said...

यह सब तो जीवन में आता ही जाता रहता है ! इससे मन मार कर नहीं बैठा जा सकता !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"समालोचना क्रम में सदैव सकारात्मक रहें,नहीं तो आपकी नकारात्मक उक्ति किसी की रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर सकती है..."

इस पोस्ट के माध्यम से बढ़िया सन्देश दिया है,आपने।
धन्यवाद।

राज भाटिय़ा said...

रंजना जी मुझे हमेशा आलोचना या समालोचना ही रास्ता दिखाते है,मेरे अपने तो दिखाते ही है, इस लिये हमे इन से(आलोचना या समालोचना) से कभी डरना या घबराना नही चाहिये,क्योकि यह कदम कदम पर हमारी बुराई करते है तो हम सचेत हो जाते है,ओर वो गलत बात से दुर रहते है.

हेमन्त कुमार said...

सही कहा आपने ,आजकल निरपेक्ष भाव सन्दिग्ध नजर आता है ।

पारूल said...

shiv ji kii itni prakaar ki tippaniyon ke baad...baki kya bacha kahne ko ?... RANJANA DI :)

ताऊ रामपुरिया said...

समालोचना हमेशा संयत और निष्पक्ष होगी तो आहत होने के अवसर कम ही रहेंगे. बहुत सुंदर लेख लिखा आपने. शुभकामनाएं.

रामराम.

अनिल कान्त : said...

शिव कुमार जी ने बहुत कुछ साफ़ कर दिया

संगीता पुरी said...

आपका कहना भी सही है कि .. समालोचना क्रम में सदैव सकारात्मक रहें,नहीं तो आपकी नकारात्मक उक्ति किसी की रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर सकती है .. पर यदि इतने लंबे जीवन में कहीं पर ऐसी बात हो भी जाए तो उसपर ध्‍यान न देना भी सकारात्‍मक दृष्टिकोण है .. दूसरों की बात पर अपने पथ से विचलित हो जाना भी सही नहीं !!

रश्मि प्रभा... said...

bahut sahi kaha aapne

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आज आपकी
तथा शिव भाई की
सुन्दर पंक्तियों ने
मन मोह लिया है :)

cmpershad said...

हम शिव कुमार मिश्रजी के सभी टिप्पणियों से सहमत हैं जी:-) बधाई..एक अच्छे चिंतनीय लेख के लिए॥

Swapnil said...

सुंदर् रचना.
सिर्फ़ 10 साल मे बना लेगा मानव मस्तिष्क!

दिगम्बर नासवा said...

सच कहा है ........ अपना आत्मविश्वास इतना गहरा होना चाहिए की किसी की कही कोई बात एक स्तर से ऊपर प्रहार न कर सके .......... अपने आत्न्विश्वास को न डगमगा सके ........ और इसके लिए सकारात्मन सोच बनाना सबसे जरूरी है ..... हर बात को सहज लेना और पूर्ण रूप से विश्लेसन कर के सकारात्मक कदम उठाने पर ही संभव है .......... सुन्दर लेख है आपका ..... बहूत सकारात्मन .............

Mithilesh dubey said...

बहुत सटीक मुद्दा उठाया आपने,,,सुन्दर लेख है .....

भूतनाथ said...

jitni gahri baat aapne aaj kah dee... utnaa gahare bhalaa koi jata hi kahaan hain...samaalochnaa to door....log sthool bhi theek se nahin hai....khair aaj main aapkaa prashansak ho gayaa...!!

Manish Kumar said...

अगर कोई लेखक एक मुक़ाम अपने लिए बनाना चाहता है तो ये जरूरी है कि वो अपने लेखन पर आस्था रखे। साथ ही खुद अपनी ख़ामियों पर भी गौर करे।
समालोचना चाहे तल्ख़ हो या सकरात्मक उसे लेखक को खुद देखना चाहिए कि उसमें कितना वज़न है और उसी अनुरूप अपने में सुधार लाना चाहिए या इग्नोर करना चाहिए।

रही आलोचकों की बात तो मुझे तो लगता है कि सही खरी बात चाहे उसे सकरात्नक या नकरात्मक टिप्पणी के रूप में देखा जाए कहनी चाहिए।

शरद कोकास said...

आलोचक और रचनाकारोर्‍ के अंतर्सम्बन्धों पर मैने एक ब्लॉग शुरू किया है "आलोचक" कृपया वहाँ अवश्य आयें और चर्चा मे भाग लें । -शरद कोकास

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

किसी की आलोचना का हम पर कैसा असर होता है, देखा जाए तो यह बहुत हद तक हमारे अपने नजरिये पर निर्भर करता है। इस सच का एक दूसरा पहलू यह भी है कि इस नजरिये से ही यह तय होता है कि हम अपने क्षेत्र में किस हद तक सफलता प्राप्त कर सकेंगे। इसीलिए बहुधा सजग व्यक्ति आलोचना को भी विकास की योजना का एक जरूरी हिस्सा बना लेते हैं। फिर चाहे बात लेखन की हो या फिर जीवन के किसी भी क्षेत्र की.....
एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर आपका ये साकारात्मक चिन्तन अच्छा लगा!!

Mukesh Khordia said...

वाह !

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

आपने एक गंभीर और सही विषय को बिलकुल सही अंदाज़ मैं पेश किया | आपके शब्दों का चुनाव और भाषा शैली ने मन्त्र मुग्ध कर दिया मुझे | मेरा प्रणाम स्वीकार करें |

Vivek Rastogi said...

आपकी भाषाशैली बांधने वाली है, ऐसे लोगों की पब्लिक प्लेस पर आलोचना होनी चाहिये, जो थोड़ा सा ऊपर पहुंचकर अपने पुराने दिन भूल जाते हैं और नये लेखकों को हतोत्साहित करते हैं।

कुश said...

निर्भर करता है कि आलोचना में किस प्रकार की भाषा का उपयोग किया गया है.. आलोचनाओ से घबराकर बैठ जाना भी कोई उपाय नहीं.. और अहम् के चलते किसी की तारीफ़ नहीं करना भी ठीक नहीं.. एक बेहद संतुलित लेख जिसकी जरुरत थी शायद..

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

दीदी साफ जाहिर है आपकी सखी उस साहित्यकार से बहुत ज्यादा प्रभावित रहीं होंगी अन्यथा किसी एक मनुष्य के कहने से खुद को अयोग्य साबित कर देना ..कम से कम मुझे तो अजीब ही लगता है और असहज भी.

पी.सी.गोदियाल said...

"बहुत खोंदने पर ज्ञात हुआ कि एक वरिष्ठ साहित्यकार , जिनपर उसकी अपार आस्था और श्रद्धा थी तथा जिनके मार्गदर्शन में चलना ही उसने अपना परम कर्तब्य माना था, ने न जाने क्या सोचकर उसके लेखन कला की तीव्र भर्त्सना कर दी..."

सटीक तथ्य रचना जी , हालांकि मेरा मानना यह है की तारीफ़ के अलावा एक रचनाकार को हमेशा ही आलोचनाओं का भी स्वागत करना चाहिए मगर आलोचना देने वाले को संतुलित स्तर पर ही आलोचना देनी चाहिए !

पी.सी.गोदियाल said...

नाम की टंकण त्रुटी के लिए क्षमा !

अनूप शुक्ल said...

लेख अच्छा लगा। आप अपनी सहेली से कहिये कि अपने आलोचक जी का नाम बतायें हम उनकी जो खड़ी की जाती है वो खड़ी कर देंगे और जो गोल किया जाता है वो गोल! तब तक आप उनको हमारे ब्लाग के लेख पढ़ने के लिये कहें। और आप यह बतायें कि शिवकुमार मिश्र जी के खिलाफ़ क्या कार्रवाई की गयी?

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...
This comment has been removed by the author.
कंचन सिंह चौहान said...

बहुत सधा लेख दीदी...! गहन विचारों की उत्पत्ति..! आप जो लिखती है ऐसा लगता है काफी मंथन के बाद लिखती हैं....!

प्रेमलता पांडे said...

सधा हुआ गहन सोचपूर्ण लेख।
पर लेखक के अपने विचार होते हैं और आलोचक के अपने।
सरलता से लें और लेखन जारी रखें।

ओम आर्य said...

रंजना जी
बिल्कुल सही सोच को प्रस्तुत करी आपने..... समालोचना हो तो सकारात्मक होनी चाहिये ....जो साकारात्मक उर्जा को बाढाये .....जिसमे भाषा भी अहम भुमिका अवश्य निभाती है .......अतिसुन्दर .......यह बात सही है कि आप किसी भी मुद्दे को काफी सोच विचार करके उठाती है ..........

vikram7 said...

यह सतत स्मरणीय है कि समालोचना क्रम में सदैव सकारात्मक रहें,नहीं तो आपकी नकारात्मक उक्ति किसी की रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर सकती है...
बिल्कुल सही ,पर आलोचनाओ से घबडाना भी नही चाहिये

Udan Tashtari said...

यह सतत स्मरणीय है कि समालोचना क्रम में सदैव सकारात्मक रहें,नहीं तो आपकी नकारात्मक उक्ति किसी की रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर सकती है...

-आपसे पूर्णतः सहमत..

शिव बाबू तो गजबे कर देते हैं..इत्ता सीरियस माहौल में मजाक किये हैं, जबकि हम पढ़े भी नहीं थे तब तक. अब ईमेल से खबर लेंगे उनकी. :) आप भी डांट लगाईये फोन पर जरा.

विवेक सिंह said...

जब गुरु ही पहले से पहुँच गए तो अब चेला क्या बोले ?

गुरु ने बोलने लायक नहीं छोड़ा,

हमें लगता है कि यही रहे होंगे,

इन्होंने हमें भी कई बार हड़काया है,

न जाने कैसे कैसे अब तक जमे हैं ब्लॉगिंग में हम :)

Mrs. Asha Joglekar said...

Aapane sahee kaha ki aalochana ke liye aalochana ghatiya bat hai. Sakaratmak tippani janha aapko utsahit karati hai nakaratmak ya maun aapko hatotsahit karata hai. Mera to ye manana hai ki aap sochen bhee sakaratmak kyunki jo aap sochenge wahee to laut kar aapke pas aayega. Bahut sahee lekh.

अल्पना वर्मा said...

आप ने लिखा -
सामान्यतया यदि व्यक्ति सकारात्मकता से गहरे जुड़ा होता है तो उसका विवेक भी उतना ही जागृत होता है ..]
जो भी कहना चाहिए बहुत सोच कर कहना चाहिये क्योन्कि कई बार लोग सोचते हैं कि वे जो कह रहे हैं बहुत समान्य सी बात है मगर सामने वाले के मन और दीमाग पर उसका कैसे असर पडेगा यह ना जानने की कोशिश करते हैं न समझने कि ही...
अच्छी लगीं आप की बातें.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

यह शिवकुमार मिश्र को क्या भवा? पीठ का दर्द बढ़ गया क्या?
हमें भी अनुभव है - जब स्पॉण्डिलाइटिस कष्ट देता है तो ज्यादा बुद्धिमानी (पढ़ें न समझ में आने वाली) निकलती है! :)

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

aapke vichar padhe,unme upeksha ki pida hai ,akela kar diye jane ki peeda bhi aur joojhne ki lalasa bhi,aap sada safal hongi yah vishvash hai hame.
shubhkamnayen aapko,
sadar.
dr.bhoopendra

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत काम की बातें बताई हैं आपने. इनके अलावा एक बात और भी हो सकती है. वह यह कि आलोचना चाहे सही हो या गलत, हम उससे हमेशा ही अपना सुधार कर सकते हैं. संत कबीर के शब्दों में, "निंदक नियरे राखिये..." मैं आपकी मित्र से सहानुभूति नहीं रख पा रहा हूँ क्योंकि हममें आलोचना सुनने और सहने की शक्ति होनी ही चाहिए. अगर आलोचना झूठी है तो वह हमारे कर्मों से स्वतः सिद्ध हो जाएगा.

रंजीत said...

jee han, samalochna to isee ka naam hai. alochna bhee to ek tarah kee rachna hee hai, jab log iska istmaal dusre ko kam karne ke liye karte hain to wah aalochna kahan rah jatee. wah to ninda hai.
aap hamesa +ve likhtee hain. badhaee.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

समालोचना से बचा नहीं जा सकता। यह जीवन का अपरिहार्य हिस्सा है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Nirmla Kapila said...

पता नहीं इतना बदिया आलेख कैसे देखने से रह गया । समालोचना सकारात्मक होनी चाहिये मगर कभी कभी आलोचना लेखक को सही राह भी दिखाती है आलोचना की भाशा पर निर्भर करता है बदिया विशय है आभार्

hem pandey said...

पूरी पोस्ट पढने से पहले ही अर्थात अधूरी पोस्ट पढने पर ही टिप्पणि के लिए जो पन्क्तियाँ दिमाग में उपजीं वे आगे आपकी पोस्ट में भी मिलीं -
" खुदी को कर बुलंद इतना,कि खुदा भी बन्दे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है..."

निर्झर'नीर said...

रंजना जी आपकी कलम के बारे मै कुछ कहना शायद बस के बात नहीं ..
या यूँ कहो की मुझमें काबलियत नहीं कुछ कहने की .
आपका लेखन इतना प्रभावशाली है की आपके व्यक्तित्व की छाप जेहन में अमिट है..

गौतम राजरिशी said...

भाषा-प्रवाह, शैली और इतनी सधी हिंदी....आह!

पोस्ट पे शिक कुमार मिश्र जी के अंदाज़े-बयां के बाद कह लेने को तो कुछ शेष रहता ही नहीं अब!

"स्नेह-आधार" वाली तस्वीर बहुत भायी...

sushilkumar.net said...

आपकी बात अर्धसत्य है। समालोचना वह चक्षु है जो हमारा मार्गदर्शन और दिग्दर्शन कराता है। अत: यह जरूरी नहीं कि रचना के पक्ष में सदैव कसीदे ही पढ़ें जायें। समालोचना हमेशा बेहतर कार्य करने के लिये हमें उत्प्रेरित करती है बशर्ते कि समालोचक पूर्वाग्रह से ग्रसित न हो।

ललितमोहन त्रिवेदी said...

रंजना जी ! आपने एक बहुत ज्वलंत और लेखक बिरादरी से सीधे जुड़े मुद्दे को उठाया है और उसका सही समाधान भी प्रस्तुत किया है ! इस नकारात्मक आलोचना का दंश मैंने बहुत निकट से झेला है और वह भी उस उम्र में जब लेखन एक आकार ले रहा होता है ,उमंगों को पंख मिलते है ,परिणाम यह हुआ की २० वर्षों तक मेरा लेखन पूर्णतः बंद रहा और मैं अपने ही खोल में सिमटा रहा (आज भले ही इसे आप मेरा दोष कह सकते हैं ) ! आपका यह सार्थक लेख नए लेखकों को प्रेरणा और नकारात्मक सोच वाले तथाकथित आलोचकों को सद्बुद्धि प्रदान करे , यही कामना है !

डॉ .अनुराग said...

कितना गहरा सोचती है आप....ओर भाषा .......क्या कहूँ....हिंदी भाषा पर आपकी पकड़ बेमिसाल है ..

BrijmohanShrivastava said...

सही बात है कई बार दूसरों द्वारा कही गई साधारण से बात भी हमें मर्मान्तक पीडा पहुंचा देती है ,बस्तुत: उस वक्त हमारा ही मस्तिष्क असंतुलित रहा होता है ,और कभी हम प्रमुदित अवस्था में होते हैं तो गंभीर बात भी सहज स्वीकार कर लेते हैंप्रिय सखी का डिप्रेशन में आजाना स्वभाबिक है ,लेकिन उस बरिष्ठ साहित्यकार की भर्त्सना को यदि सहन कर लिया जाता तो ? मैं एक बात कहूं साहित्यकार संजीव (राम सजीवन प्रसाद ) ने कहानी लिखी 'अपराध ' नरेंद्र नाथ ओझा जी को सुनाई ,सुनकर बोले " और कोई घास भूसा नहीं था जो उसमे भर देते " वह कहानी सारिका में सन ८० में पर्काशित हुई पुरस्कृत हुई ,देश के साहित्यकारों ने संजीव को जाना | आज सर्वाधिक १० प्रकाशित कहानी संग्रह और आठ प्रकाशित उपन्यास उनके खाते में हैं
यह बात कह कर मैं आपके लेख का विरोध जाताना ,या अपना पांडित्य प्रदर्शन करना जैसा कुछ नहीं है क्योंकि आप ने एक आम व्यक्ति की बात की है और मैंने अपवाद की क्योंकि अपवाद बिरले ही हुआ करते हैं
यह बिलकुल सत्य है की आत्मीय जनों की आलोचना ही अखरती है |लेकिन हिन्दी साहित्य का यह दुर्भाग्य ही है की उसके आलोचक नहीं हैं |अज्ञेय जी ने भी कहा था आलोचना है आलोचक है पर आलोक नहीं है | जहाँ तक आलोचक के बजन का प्रश्न है मैंने सुना है शायर की मौत दो तरह से होती है एक तब जब कोई जानकर उसका शेर सुन कर चुप रह जाये और दूसरी तब जब कोई नावाकिफ शेर सुन कर बिना समझे दाद दे दे
वैसे कुछ लोग जन्मजात आलोचक होते है ऐसे लोगों को भी गोस्वामी जी ने प्रणाम ही किया है क्योंकि 'जे बिन काज दाहिने वाये -विघ्न संतोषी -जब तक बिघ्न पैदा न करदें उन्हें संतोष ही नहीं मिलता है
आपका लेख उत्साह वर्धक है

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

"यह सतत स्मरणीय है कि समालोचना क्रम में सदैव सकारात्मक रहें,नहीं तो आपकी नकारात्मक उक्ति किसी की रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर सकती है..."

एकदम सही कहा आपने.. हैपी ब्लॉगिंग

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

"यह सतत स्मरणीय है कि समालोचना क्रम में सदैव सकारात्मक रहें,नहीं तो आपकी नकारात्मक उक्ति किसी की रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर सकती है..."

एकदम सही कहा आपने.. हैपी ब्लॉगिंग

'अदा' said...

bahut hi badhiya likhti hain aap..tareef ke liye shabd nahi hain..
likhti rahein aise hi..

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतरीन.... वाह..

दर्पण साह "दर्शन" said...

aalochna kisi lekh , kavita ya kabhi kabhi vaykti ke aadarshon ki honi chahiye , bina kisi 'poorvagrah' ke...

...tabhi wo alochna ke ek sidhi upar uth kar 'samalochna' ho jaati hai.

Saargarbhit lekh.

singhsdm said...

बिलकुल सही कहा आपने बात आलोचना समालोचना से ऊपर की है......जिसके प्रति आस्थाएं हो और वही इसे खंडित कर दे तो बुरा लगेगा ही..दोस्त को समझाइये जीवन में हार नहीं माना करते रचनाधर्मिता में ये सब चलता रहता है.....

Mumukshh Ki Rachanain said...

"परन्तु अपने आत्मीय जनों या जिनपर हमें अपार आस्था हो, अनपेक्षित रूप से यदि आलोचना मिले या प्रोत्साहन न मिले,तो हतोत्साहित हताश होना स्वाभाविक है."

बात तो सही है,
पर अपने पास तो कथा के रूप में एकदम ठोस उदाहरण या कहें आदर्श है. मन से माने गुरु द्रोण से एकलब्य ने भी तो अपमान ही पाया था, पर वह हताश न हुआ, सिर्फ देख कर अनुभव कर अपने युद्ध कौशल में पूर्ण तन्मयता से ही तो विकास किया था ..................

अपने परम मित्र को एकलव्य बनने की सलाह दें..............

चन्द्र मोहन गुप्त

tulsibhai said...

satik mudda bahut hi gahera visay per aapne sahi muddda uthaya hai .aur aapki nnhasha per pakad acchi hai ye hi aapke lekhan ki kamyabi hai "

----- eksacchai {AAWAZ }

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"लोकेन्द्र" said...

वाकई में भाव तो सकारात्मक होने भी चाहिए.....
लेकिन गलत राह को पकड़ते समय....आलोचना उसे थामती भी है पर यहाँ भी अगले का पहलू सकारात्मक की होना चाहिए.....

कमलेश शर्मा said...

आपके लेखन से प्रभावित हुआ।

विपिन बिहारी गोयल said...

जोधपुर की एक साहित्य गोष्टी में डा.रमाकान्त ने कहा की किसी भी जीवित रचनाकार की आलोचना नहीं की जानी चाहिए.कई अच्छे साहित्यकार आलोचकों की वजह से असमय काल कलवित हो गए.