24.9.09

सिंदूरदान (एक पौराणिक आख्यान) भाग - 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

गतांक से आगे...

परन्तु क्या यह सब इतना ही सहज था..एक ओर तो क्षोभग्रस्त महारानी लज्जा शोक और पापबोध से घुली जा रही थीं, तो दूसरी ओर कणाद भी मोह और विवेक के मध्य छिड़े गहन द्वंद में घिरा अपना मत और करनीय स्थिर करने में स्वयं को सर्वथा असमर्थ पा रहा था.सरोवर सुन्दरी के आलौकिक सौन्दर्य को विस्मृत कर पाना उसके लिए असंभव हो रहा था.स्मृतिपटल पर अवस्थित वह दृश्य उसे उदिग्न कर दिया करता... सदैव ही उसे आभास होता जैसे वह निष्कलुष सौन्दर्य उसे अपने भुजपाश में आबद्ध होने को प्रतिपल प्रणय निवेदन भेज रहा है.


मोहग्रस्त कणाद कभी तो दर्पण के सम्मुख बैठ विभिन्न प्रकार से अपना श्रृंगार करता, अपनी ही छवि पर मुग्ध होता परन्तु जैसे ही विवेक उसे झकझोर उस पर अट्टहास करता ,वह स्वयं को दण्डित करने लगता. विछिप्त सी हो गयी थी उसकी स्थिति..आर्या गांधारी समस्त उपक्रम देख समझ रही थी,परन्तु कुछ भी कर पाने में वह असमर्थ थी. न तो वे महारानी का सत्य उद्घाटित कर सकतीं थीं न ही शिष्य की भ्रमित बुद्धि पर उनकी धर्मदेशना का किंचित भी प्रभाव पड़ रहा था...दुश्चिंताओं में घिरी आर्या के सम्मुख आचार्यवर के पुनरागमन के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प न रह गया था.महारानी को तो उन्होंने समझा लिया था परन्तु कणाद के सम्पूर्ण गतिविधियों पर दृष्टि रखने के अतिरिक्त उनके पास अन्य कोई साधन न था...


असह्य प्रतीक्षा का वह दीर्घ अन्तराल अंततः समाप्त हुआ और आचार्य के आगमन के साथ ही आर्या गांधारी के व्याकुल मन ने कई दिनों उपरांत अवलंबन पाया . अधीरता से वे रात्रि के एकान्तवेला की प्रतीक्षा करने लगी , जबकि वे आचार्यवर को समस्त वृतांत बता पातीं और इस घोर संकट से मुक्ति का मार्ग संधान वे कर पाते ...

उधर अपने सहपाठियों का संग पा कणाद पुनः प्रफ्फुलित हो गया था.समस्त शिष्य अतिउत्साहित हो यात्रा वृतांत कणाद को सुना रहे थे. परन्तु जो वृतांत कणाद के पास था वह तो अकल्पनीय ही था सबके लिए.. कणाद ने अनुमानित किया था कि ऋषिप्रसाद में गोपनीय ढंग से निवास करने वाली वह अप्सरा कोई ऋषि कन्या ही थी. अंत्यंत उत्साहित हो उसने अपने सहपाठियों को समस्त वृतांत तथा अनुमानित ऋषि कन्या के अनिर्वचनीय अनिद्य सौन्दर्य की विरुदावली सुनाई...

फिर क्या था, कणाद का मोह ऐसे विस्तृत हुआ कि उसके चुम्बकीय प्रभाव में अन्यान्य छात्र भी आ गए और उनके मध्य वाक् युद्ध प्रारंभ हो गया. सभी स्वयं को श्रेष्ठ घोषित कर पाणिग्रहण हेतु स्वयं को उस कन्या का अधिकारी ठहरा रहे थे.ज्येष्ठ शिष्य ने अपने ज्येष्ठता का कारण दिया तो कणाद ने अपने सर्वप्रथम दर्शन और प्रेम का. इसके साथ ही रमणी पर अधिकार हेतु किसी ने अपने बल का तो किसी ने अपने सौन्दर्य का और किसी ने धन का आधार स्थापित किया. आपसी सद्भाव सौहाद्र भाव तिरोहित हो मोह और इर्ष्या ने परस्पर सबको एक दूसरे का प्रबल प्रतिद्वंदी तथा शत्रु बना दिया था...

इस तथ्य से सभी भली भांति परिचित थे कि आचार्य विद्याध्यन के मध्य ब्रह्मचर्य व्रत खण्डित कर गृहस्थ स्थापना की आज्ञां कदापि न देंगे. सो गुरुवर संग किसी प्रकार की मंत्रणा किये या उनकी आज्ञा बिना ही समस्त शिष्य अपने अभिभावकों से विवाह का अनुज्ञान पाने आचार्यवर के नाम एक पत्र छोड़ कर स्वगृह को प्रस्थान कर गए. प्रातःकाल रिक्त संघाराम ने पूर्व से ही दुर्घटना से मर्माहत आचार्य और देवी गांधारी के ह्रदय पर मानों तुषारपात सा कर उन्हें दुःख के सागर में आकंठ निमग्न कर दिया. शोक संतप्त आर्या अपने पुत्रवत शिष्यों के मोह-ग्रस्त अवस्था का ध्यान कर उनका पतन लक्ष्य कर आहत हो विलाप करने लगी.

आचार्य खालित आहत अवश्य थे परन्तु निराश न थे..उन्हें अपनी दी हुई शिक्षा और शिष्यों के सुसंस्कार पर पूर्ण विश्वास था. भग्नहृदया भगिनी को उन्होंने आश्वस्त किया कि कुलीन शिष्यगणों की वर्तमान मनोदशा वयजनित विभ्रम है जो कि नितांत ही क्षणिक है,जैसे ही उनका विवेक जागृत होगा, पश्चात्ताप की अग्नि में शुद्ध हो वे पुनः अपने सुसंस्कार और कर्तब्य का सर्वोत्कृष्ट रूप से वहन करेंगे.... क्षात्रावास में उनका विद्याध्यन हेतु पुनरागमन अवश्यम्भावी है.वस्तुतः विधाता रचित इस घटना के पीछे भी छुपा हुआ उनका कल्याणकारी महत उद्देश्य ही है..दिव्य द्रष्टा आचार्यवर के धीर गंभीर आशापूर्ण वचनों ने आर्या के दग्ध ह्रदय को अनिर्वचनीय शीतलता प्रदान की..

इधर महारानी के गृहत्याग उपरांत क्रोध शांत होने पर जब कोशल नरेश को अपने अकरणीय का आभास हुआ तो वे विह्वल हो उठे और उन्होंने राज्य में चहुँ ओर महारानी का संधान आरम्भ कर दिया..परन्तु सब ओर से उन्हें निराशा ही मिली..निराशा पश्चात्ताप और वियोग महाराजा के दग्ध ह्रदय में हविष्याग्नि बन विरह ज्वाला को और भी उग्र कर दिया करते थे....अंततः चहुँ ओर से निराशा प्राप्ति उपरांत अब नृप के सम्मुख महारानी के संधान हेतु आचार्य के दिव्य ज्ञान का सहयोग लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प न था..

शोक क्षोभ से विह्वल नरेश आश्रम में उपस्थित हो आचार्यवर के सम्मुख व्याकुल भाव से रुदन करने लगे...परन्तु उन्हें कहाँ आभास था कि जिस अभिलाषा से वे आश्रम में उपस्थित हुए हैं, उनका अभीष्ट तो वहीँ सुरक्षित है.जैसे ही उनके सम्मुख यह रहस्योद्घाटन हुआ कोशल नरेश आभारनत हो आचार्यद्वय के चरणों में नतमस्तक हो गए....

दंपत्ति का पुनर्मिलन आह्लाद को भी आह्लादित करने वाला हुआ.परन्तु आचार्यवर ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए नरेश से कहा कि उन्हें उनकी भार्या तभी प्राप्त होगी जब कि वे अग्नि के सम्मुख पवित्र वैदिक मंत्रों के साथ सप्त वचन लेंगे और अग्निदेव को साक्षी मान महारानी की मांग में सिन्दूर भरेंगे...

पवित्र वैदिक मंत्रों संग महारानी का सिंदूरदान संपन्न हुआ.पतिपत्नी ने गृहस्थ धर्म की मर्यादा और अक्षुणता हेतु समस्त देवी देवताओं को साक्षी रख मृत्युपर्यंत एक दूसरे के प्रति प्रेम ,निष्ठां , मर्यादा, आदर और सेवा का शपथ लिया और तभी से परंपरा में सिंदूरदान नाम की इस पावन परंपरा का श्रीगणेश हुआ. सौभाग्य सिन्दूर विवाहित तथा अविवाहित स्त्री के मध्य अंतर स्थापित करने वाला सुगम साधन ही नहीं, स्त्री की मान रक्षा तथा पति के कर्तब्यबोध का सफल वाहक भी बन गया.

पुत्रीवत महारानी को पतिगृह विदा करते आचार्य वर तथा आर्या गांधारी का ह्रदय विह्वल हो उठा,परन्तु उसके सुखी जीवन के आभास और अभिलाषा ने उन्हें परम संतुष्टि और अनिर्वचनीय आनंद भी दिया..

महरानी के गमनोपरांत जब शिष्यगण अपने अभिभावकों से पाणिग्रहण हेतु सहमति ले आश्रम में उपस्थित हुए तो वहां की साज-सज्जा और विवाह वेदी देख अनिष्ट की आशंका से उनका मन विचलित होने लगा. सशंकित ह्रदय वे सभी आर्या तथा आचार्य के सम्मुख उपस्थित हुए तथा अपनी धृष्टता के लिए क्षमायाचना करते हुए अपना प्रयोजन स्पष्ट किया..अपना-अपना पक्ष रखते हुए सबने उस ऋषिकन्या पर अपना अधिकार स्थापित किया तथा पाणिग्रहण की अनुमति मांगी .

आचार्य कुछ पल को तो शांत भाव से समस्त अघटित देखते रहे,यकायक भीषण चीत्कार के साथ उठ खड़े हुए..उस भीषण वज्र ध्वनि ने सभी शिष्यों को स्तब्ध कर दिया.सभी निष्पलक निर्मिमेष दृष्टि से आचार्यवर को देखने लगे...और जैसे ही आचार्यवर ने महारानी का सत्य उनके सम्मुख उद्घाटित किया, लज्जा ग्लानि और पापबोध ने उन्हें विक्षिप्त सा कर दिया...जिन्हें वे अबतक एक कुंवारी ऋषिकन्या मान रहे थे ,वह तो परम वन्दनीय महारानी थीं. क्षणमात्र में मोह तिरोहित हो गया और आत्मग्लानि की भीषण ज्वाला में उनका कोमल ह्रदय दग्ध होने लगा..आचार्यवर के चरणों में भूलुंठित शिष्य अपने इस निकृष्ट कुकृत्य हेतु प्राणदंड की याचना करने लगे.

आचार्यवर ने कठोर शब्दों में उन्हें सावधान किया कि इस घोरतम पाप के लिए उन्हें दंड तो अवश्य मिलेगा परन्तु दंड की उद्घोषणा अगले दिन प्रातः काल की जायेगी इस अवधि-मध्य यदि कोई क्षात्र दंडमुक्ति की अभिलाषा रखता हो तो बिना आज्ञा, आश्रम छोड़कर जा सकता है..

कठोरतम दंड का आश्वासन पा शिष्यों ने मानों नूतन जीवन का आधार पाया था..अत्यंत अधीरतापूर्वक वे उषा काल की प्रतीक्षा करने लगे.अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत पहले ही नित्यक्रिया से निवृत हो वे आचार्यवर के कक्ष के सम्मुख उपस्थित हो गए.

शिष्यों की प्रतिबद्धता ने आचार्यवर को परम सुख और संतोष दिया. पश्चात्ताप की जिस अग्नि में इतने काल तक वे जले थे, उसमे से उनका ह्रदय विशुद्ध कंचन बन बाहर आ गया था.अब इससे बड़ा दंड और क्या हो सकता था कि जीवन भर वे अपने इस अकरणीय से शिक्षा ले मोह बंधन से मुक्त रहते. आचार्यवर ने उन्हें दंडमुक्त कर परम ज्ञान का वह उपदेश दिया जो उनके शिक्षण समाप्ति के पूर्व उन्हें प्राप्त होता. इसके साथ ही आचार्यवर ने अपने इन परमज्ञानी शिष्यों को विश्व कल्याण हेतु ज्ञान प्रसार की आज्ञा दे समाज के बीच भेज दिया..

सर्वविदित है कि महर्षि गौतम, कपिल, जैमिनी, पतंजलि, व्यास और कणाद ने ज्ञान रूपी वह धरोहर विश्व को सौंपी है जो सृष्टि के अंत तक संसार का मार्गदर्शन करती रहेंगी....

(हिंदी साहित्य के सिद्ध हस्ताक्षर, परम आदरणीय श्री रामेश्वर प्रसाद सिंह की ह्रदय से आभारी हूँ,जिनके पुराणों,जैन तथा बौद्ध ग्रंथों के गहन अध्ययन अन्वेश्नोपरांत लिखित महान आध्यात्मिक ऐतिहासिक उपन्यास " पाटलीपुत्र की राजनर्तकी " के अध्ययन क्रम में इस प्रसंग से अवगत होने का सौभाग्य मिला...

उक्त पुस्तक में तो यह प्रसंग अत्यंत विस्तृत रूप में उल्लिखित है,मैंने उसके साररूप को अपने शब्दों में ढाल यहाँ प्रेषित करने का प्रयास किया है.चूँकि यह प्रसंग मेरे लिए सर्वथा नवीन एवं रोमांचक था,सो मैंने सार्वजानिक स्थल पर इसे सर्वसुलभ करने का निर्णय लिया. )

======================================

37 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर आख्यान,
प्रभावशाली लेखन।
बधाई!

Arvind Mishra said...

बहुत रोचक आख्यान -शुक्रिया .अब कम से कम तो मेरे मानद डाक्टरेट की इज्जत तो रखिये डॉ.रंजना जी -कृपया संपादित करें !

पहला पैरा -
करती.. =करता '

दूसरा पैरा

"एक पल को दर्पण के सम्मुख बैठ वह विभिन्न प्रकार से अपना श्रृंगार करता, अपनी ही छवि पर मुग्ध होता पर अगले ही पल विवेक जैसे ही उसे झकझोरता उस के अट्टहास पर वह स्वयं को दण्डित करने लगता."
यदि यह महारानी के लिए है ,जो सचमुच है तो सभी जगह स्त्रीलिंग क्रिया प्रयुक्त होनी चाहिए ! करती ,होती ,लगती
अन्य-
क्षात्र=छात्र ,भ्रह्मचर्य=ब्रह्मचर्य ,भाग्न्ह्रिदया=भग्न हृदया ,क्षात्रावास=छात्रावास ,हविश्याग्नि =हविष्याग्नि ,सपथ=शपथ ,चित्कार=चीत्कार ,विछिप्त=विक्षिप्त ,विसुद्ध=विशुद्ध ,अन्वेश्नोपरांत=अन्वेषणोंपरांत

डॉ .अनुराग said...

आपकी मेहनत की दाद देता हूँ ...ओर आपके उस अहसास की भी जिसने किताब के एक द्रश्य को भीतर तक महसूस किया

M VERMA said...

बहुत ही दिलचस्प ढंग से आपने कथानक को प्रस्तुत किया.
आपको साधुवाद

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

रोचक और ज्ञानवर्धक आख्यान |

आपके लेखन शैली और विषय वस्तु को मैं प्रणाम करता हूँ |

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

कणाद जैसा महान वैज्ञानिक जब स्खलित हो सकता है अपने इन्फैचुयेशन से तो हमारी क्या बिसात| यह पढ़ कर संतोष हुआ।

Kishore Choudhary said...

यह प्रसंग आपके साथ साथ मेरे लिए भी सर्वथा नवीन था. मैं विचार रहा था कि आपकी आगामी पोस्ट की जाने कितने दिन और प्रतीक्षा करनी होगी किन्तु आपने त्वरित गति से मेरी जिज्ञासा का समाधान कर दिया, कहीं भी प्रतीत न हुआ कि किसी कथानक के लघु रूप का पाठ कर रहा हूँ यही तो है आपकी विशेषता, ढेर सारी बधाइयां !

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बहुत ही ज्ञानवर्धक आख्यान...जिसे कि आपकी लेखन शैली ने अति रोचक बना डाला......आभार्!!

अभिषेक ओझा said...

पूरा का पूरा फ्लो में पढ़ गया... खोया हुआ सा. ये पौराणिक जानकारी तो मिली ही. जैसा कि पिछले पोस्ट में भी मैंने कहा था ये शैली बहुत पसंद आई.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

रोचक और नया लगा सब बहुत मेहनत से लिखा है आपने शुक्रिया

singhsdm said...

बहुत सुंदर........... पौराणिक कथा का लेखन उतना ही रोचक प्रस्तुतिकरण.....

अल्पना वर्मा said...

कहानी का अंतिम भाग उस युग की एक झलक दे गया , संशय दूर हुआ.. अंत भला तो सब भला!
श्री रामेश्वर प्रसाद सिंह जी की लिखित पुस्तक में से यह कथा संक्षिप्त कर के हम तक पहुँचाया..आप की मेहनत दिखाई देती है.
आप की आभारी हूँ ki आप के कलम के ज़रिये नया पढने को मिला.

प्रेमलता पांडे said...

’विद्यादान महादान’ यह बात यहाँ सिद्ध है, आपने आपने अध्ययन से सबको लभान्वित किया। आभार आपका।
आपकी लेखन-शैली और भाषा-सौष्ठव आ० हजारीप्रसाद द्विवेद्वीजी के उपन्यासों की याद दिलाता है।

योगेश स्वप्न said...

ranjana ji, aap mere blog par padharin comment kiya hardik dhanyawaad, aapko meri rachna achchi lagin , dhanyawaad, punah padharen.

Shobhana said...

रंजना जी
निशब्द हूँ आपकी लेखनी पर और इस सर्वथा नवीन पौराणिक कथा पढने के बाद |शुरू से अंत तक कथा बांधे रखती है शब्दों का चयन ,और हिंदी संस्कृत का समिश्रण खूब प्रभावी बन पड़ा है
इस पौराणिक प्रेरणादायी कथा को हम सबको पढवाने के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद |
विजयादशमी कि हार्दिक शुभकामनाये |

pran said...

AAPKA PARISHRAM AUR AAPKA LEKHAN
SARTHAK HAI.BADHAAEE.

naveentyagi said...

ati sundar

संतोष कुमार सिंह said...

ब्लांग पर बने रहे इसी शुभकामनाओं के साथ दशहरा की जय हो।

संतोष कुमार सिंह said...

ब्लांग पर बने रहे इसी शुभकामनाओं के साथ दशहरा की जय हो।

ताऊ रामपुरिया said...

इष्ट मित्रों एवम कुटुंब जनों सहित आपको दशहरे की घणी रामराम.

sandhya said...

एक और बेहतरीन और नये अर्थ जगाती रचना..बधाई..

BrijmohanShrivastava said...

वर्णित उपन्यास मे से उक्त भाग का सार प्रस्तुत किया। अच्छा लगा , परन्तु श्री अरविन्द जी की टीप समझ न पाया ।दूसरा पद कणाद से सम्बन्धित था तो स्त्री वाचक कैसे लिखा जा सकता था -एक बात और जब रोमन मे लिखते है तो उस का अनुवाद वैसा नही हो पाता जैसा इन्होने कहा है

BrijmohanShrivastava said...
This comment has been removed by the author.
Mumukshh Ki Rachanain said...

"कठोरतम दंड का आश्वासन पा शिष्यों ने मानों नूतन जीवन का आधार पाया था......."

कितनी अर्थपूर्ण भावनात्मक और सच्ची बात!!!!!!!!!!

पर आज न तो ऐसे शिष्य मिलते हैं और न उनके अभिवावक, शायद ऐसे संस्कार ही लुप्तप्राय हो रहे हैं...........

सुन्दर आख्यान पर आपका हार्दिक आभार.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

saleluz-JESUS É O CRIADOR said...

Bom dia amiga

a paz de JESUS nosso DEUS e salvador esteja contigo.

___________________________________


O Amor de DEUS cresce enm nós medida em que permanecemos unidos a Ele na oração e na escuta da sua plalvra.
___________________________________

Meu nome Gerlado Barreto da Silva
Diamantina BRASIL

दिगम्बर नासवा said...

यह शिक्षाप्रद प्रसंग मैंने पहले पढ़ा नहीं था ......... आपका बहुत बहुत शुक्रिया इतनी रोचक कथा को प्रस्तुत करने के लिए ...... नैतिकता के रास्ते पर अडिग रहना मुश्किल होता है पर सही शिक्षा और उचित मार्गदर्शन जीवन की रह आसान कर देता है .......

रंजीत said...

ज्ञानपरक कथा। भले ही यह आपकी मौलिक कृति नहीं हो, लेकिन पाठ को परोसने की शैली मौलिक है। दरअसल, हमारे अध्येताओं ने जीवन को नियमन करने के लिए गहन संधान किया था। उन्होंने काम की असीम और अल्हड़ ऊर्जा को संयमित करने का जो रास्ता दिखाया है वह आज भी सर्वश्रेष्ठ है। काम और ज्ञान का यह दर्शन अनुकरणीय है। मानव ज्ञानमार्गी है इसलिए उनसे उम्मीद की जाती है कि वह ज्ञान का साथ कभी नहीं छोड़े। ज्ञान हमें मुक्त करता है, यह हमें ज्यादा मनुष्य और अच्छा मनुष्य बनाता है। आज की भोगवादी संस्कृति के अभिशापों को देखने के बाद तो इस कहानी की प्रासंगिकता बहुत ज्यादा है। भोगवादी संस्कृति भोग से मुक्ति की कामना करती है जो गलत है। संयम और समझ के बगैर मुक्ति संभव नहीं और मुक्ति नहीं तो शांति कहां ?

विपिन बिहारी गोयल said...

बहुत बेहतरीन है. उस युग का चित्र साकार हो गया और प्रेरणा तो मिली ही

HARI SHARMA said...

इस प्रसन्ग को आपने जिस तरह सबके बीच रखा, जो शैली आपकी है उस सबकी प्रशन्सा के लिये शब्द नही है. हम अनेक बार बहुत छोटी सी भूल पर अपने बच्चो से निराश हो जाते है़ जबकि जरूरत हर गल्ती से सीखने की होती है.

मुकेश कुमार तिवारी said...

रंजना जी,

यह प्रसंग ही कुछ ऐसा है, पहिला भाग पढने के बाद अगले भाग के लिये मन प्रतिक्षीत था। श्री रामेश्वर प्रसाद सिँह जी के अथक परिश्रम, शोध के बाद यह वर्णित प्रसंग कितना रोचक बन पड़ा है। शब्द जैसे बांधे रखते हैं।

आभार आपके एक नेक और सच्चे उद्यम के लिये।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

shiva jat said...

आदरणीय रंजना जी - जय कृष्ण,,
आपने सही कहा हैं कि बापु को हम सत्य अहिंसा सोहार्द की श्रद्धांजली दे सकते हैं। लेकिन मैने कहा था पहले हमे वो रास्ता तो पता होना चाहिए ना जहां से बापु ने सत्य अहिंसा और अनासक्त के भाव जाग्रत हुए। हम सबके सामने ही शाराब की बोतल पर लिखा होता है कि स्वास्थ के लिए हानिकारक है फिर भी पिते हैं। सबसे महत्वपुर्ण यह है कि कैसे और कहां से आये वो भाव हमारे अंदर कैसे आये इतना दृङविस्वास जैसे बापु के अंदर थे। सबसे बङी परेशानी हो रही है कि बापु के जीवन से वो ही निकाल दिया है किससे मोहनदास कर्मचंद गांधी बापु और राष्ट्रपिता बने थे। शुरूआत तो हमें स्वयं से ही करनी पङेगी लेकिन जब इस बात का ज्ञान होगा तो तो रास्ते पर आगे बढेंगे। जय श्री कृष्ण

निर्झर'नीर said...

पश्चात्ताप की अग्नि में शुद्ध हो वे पुनः अपने सुसंस्कार और कर्तब्य का सर्वोत्कृष्ट रूप से वहन करेंगे


aapka gadh lekhan sarvda utkrist hota hai..

sabdo ka sundar priyog lekhan mein char chand laga deta hai.

khoobsurat gyanvardhak katha ..

bandhai ho

संत शर्मा said...

एक सुन्दर आख्यान और प्रभावशाली लेख लिखने हेतु बधाई |

Suman said...

nice

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

बहुत ही अच्छा प्रसंग उठाया है आपने.

इस जानकारी के लिए आभार.

महेन्द्र मिश्र said...

बसंत पंचमी की आपको और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Very nice Ranjna ji
thank you for this Katha.