17.6.08

प्रिय पत्र तुम्हारा..........

आते ही सुधबुध बिसराता ,प्रिय यह पत्र तुम्हारा,
विरह विदग्ध तप्त धरा पर ,बह जाए रस धारा।

शब्द शब्द प्रतिरूप तुम्हारा,मुझ मे प्राण भरे,
आलिंगन भर भाव ,मुझे आत्मविस्मृत करे.

धुंध घनी यादें तेरी,मुझपर आच्छादित है,
साँस मेरी मिल साँस से तेरी हुई सुवासित है।

रूप तेरा साकार हुआ कागज के इस टुकड़े मे
दूरी का संताप मिटा डाला जैसे एक पल मे।

मुझमे देख स्पंदन तेरा कण कण व्याप्त हुआ,
थके थके मन मे देखो अद्भुत रोमांच भरा.

कली खिली और महकी बगिया मेरे मन उपवन की,
नस नस मे उठ आई लहरें फ़िर से मधुर मिलन की.

मौन मिलन से मेरे प्रियतम हम हैं एक हुए,
कौन बसा है कितना किसमे प्रश्न ही गौण हुए.

कठिन नही होता पीड़ा को बरसों तक भी सहना,
प्रियतम मेरे तुम बन पाती मुझतक आते रहना.

16 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

कौन बसा है कितना किसमे प्रश्न ही गौण हुए.
बहुत सुंदर भाव.. कमाल का प्रवाह लिए हुए है ये रचना. बधाई स्वीकार करे

रंजू ranju said...

कठिन नही होता पीड़ा को बरसों तक भी सहना,
प्रियतम मेरे तुम बन पाती मुझतक आते रहना.

बहुत ही सुंदर भाव पूर्ण है यह कविता .

swati said...

साहित्यात्मक और सार्थक रचना....ऐसी ही भाषा का अभाव है....

रंजना said...

जितने सुंदर शब्द उतने ही सुंदर भाव....बेहतरीन रचना. बधाई

Udan Tashtari said...

कठिन नही होता पीड़ा को बरसों तक भी सहना,
प्रियतम मेरे तुम बन पाती मुझतक आते रहना.

बहुत उम्दा.

mehek said...

मौन मिलन से मेरे प्रियतम हम हैं एक हुए,
कौन बसा है कितना किसमे प्रश्न ही गौण हुए.

behad khubsurat bhav badhai

Lavanyam - Antarman said...

बडी सुँदर कविता है ..इसी तरह लिखती रहीये ..
--लावण्या

Shiv Kumar Mishra said...

धुंध घनी यादें तेरी,मुझपर आच्छादित है,
साँस मेरी मिल साँस से तेरी हुई सुवासित है।

बहुत बढ़िया..

काकेश said...

सुस्वागतम इस ब्लॉग जगत में. आपकी कविता तो माशाअल्लाह.सुन्दर भाव.

केडीके साहब ने आपको सलाम भेजते हुए यह कविता भेजी है.

मौन हो चुके उन शब्दों को,
फिर से लेकर आना
सुन्दर,सुमधुर भावों को,
जी भर कर छ्लकाना

अनुपम ज्योति जगेगी नित अब,
आस जगी है मन में,
फैला कर उजियारा हर दिन,
जग भर में छा जाना

manishi... said...

upar sabne itna kuch kaha hai ke ham aur kya kahein!!!
par itna zaroor kahenge, aapko padh kar aapki hindi par pakad dekh kar garv hota hai ke abhi hindi zinda hai. Aisee bhasha padhne ko nahi milti aaj kal.
Bahut bahut badhai... likhti rahein.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 22 -09 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में ...हर किसी के लिए ही दुआ मैं करूँ

सदा said...

वाह ...बहुत खूब ।

वन्दना said...

बहुत सुन्दर भावो से लबरेज़ कविता।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत खुबसूरत रचना...
सादर...

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

कठिन नही होता पीड़ा को बरसों तक भी सहना,
प्रियतम मेरे तुम बन पाती मुझतक आते रहना.

अतिसुंदर.आत्म विश्वास भरी पंक्तियाँ.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत मधुर और कोमल भाव लिए हुए पत्र की महत्ता लिख दी है ..सुन्दर रचना