7.7.08

अपनापन

देखो कैसा यह अपनापन,
मन ने तुमको मान लिया मन.

दुख हो सुख या हँसना रोना,
बांटे बिन है चैन कहीं ना .

बुद्धि तर्क कहाँ सुनता है,
यह तो अपनी ही करता है.

दुनियादारी की समझालो,
लाख बचाओ लाख सम्हालो.

यह तो बस बहता रहता है,
अपनी ही धुन में रमता है.

इसने तो इतना ही जाना,
धर्म ध्येय इतना भर माना.

प्रेम योग है एक साधना,
ईश्वर की ही है आराधना.

खोकर इसमे अहम् भाव को
करे परजित हर अभाव को.

प्रेम का तल जब गहरा छाना,
सम्भव तब ईश्वर को पाना.

धन वैभव क्या करना लेकर,
जब साथ न हो कोई अपना होकर.

मन को मन से बांधो ऐसे,
साँस से बंधा देह हो जैसे.

प्रेम तभी पूरन कहलाये,
चार आँख जो साथ बहाए.

दो मुस्कान साथ जब खिलता,
तब ही मानो दो मन मिलता.

10 comments:

DR.ANURAG said...

खोकर इसमे अहम् भाव को
करे परजित हर अभाव को.

प्रेम का तल जब गहरा छाना,
सम्भव तब ईश्वर को पाना.
bahut achhe ......

रंजू said...

धन वैभव क्या करना लेकर,
जब साथ न हो कोई अपना होकर.

मन को मन से बांधो ऐसे,
साँस से बंधा देह हो जैसे.

बहुत सुंदर .

राज भाटिय़ा said...

धन वैभव क्या करना लेकर,
जब साथ न हो कोई अपना होकर
वाह कया बात हे , आप की कविता अति सुन्दर हे.

Advocate Rashmi saurana said...

bhut sundar. likhati rhe.

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत सुंदर रचना है. सरल शब्दों में सहज भाव...

Gyandutt Pandey said...

स्नेह और वैभव में स्नेह श्रेष्ठतर है। निश्चित।
पर अच्छा तब हो जब वैभव में भी स्नेह हो - इन्सानियत हो।

मीत said...

सही है. सुंदर भाव. अच्छी रचना.

Udan Tashtari said...

प्रेम तभी पूरन कहलाये,
चार आँख जो साथ बहाए.

-बहुत बढ़िया.

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह रंजना खूब कहा भई
मन का निर्झर खूब बहा भई

शहरोज़ said...

यह तो बस बहता रहता है,
अपनी ही धुन में रमता है.

ACHCHI ABHIVYAKTI HAI IS KAVITA MEIN .
UKTI PANKTI KO PADH IK SHE'R ZEHAN MEIN TAIR GAYA:
ASHK GIRTE HI KAM NAHIN HOTE
AANKH KITNI AMEER HOTI HAI