25.7.08

वह कुलवधू

आज बहुत दिनों बाद सुबह सुबह माँ का फोन आया.कुशलक्षेम के आदान प्रदान के दौरान ही मुझे लग रहा था कि कुछ ख़ास वो मुझसे कहना चाह थी , पर कहने के पूर्व भूमिका बाँध रही हैं.मैं कह ही पड़ी क्या बात है माँ कोई खास बात है क्या,कहो न....गला साफ़ करते हुए उन्होंने कहा " सुमी एक बुरी ख़बर है.विनय की तबियत बहुत ख़राब है,उसे लीवर कैंसर है और वो भी शायद अन्तिम स्टेज में."
दो मिनट मैं कुछ भी नही कह पाई और फ़िर एक ज्वालामुखी सी फटती हुई कह उठी " माँ ईश्वर को किसीने देखा नही है,पर यदि वह है और उसके हाथों में सचमुच कुछ कर पाने की क्षमता है तो मैं उसे चुनौती देती हूँ कि वो इस इंसान को कम से कम पॉँच वर्ष तक और जीवित रखे और घिसट घिसट कर तिल तिल कर इसकी मौत हो.......यदि यह व्यक्ति सहज ही आराम की मौत मरा तो ईश्वर के न्याय को मैं नही मानूंगी............" आवेग में मैं एकदम से हांफने लगी..माँ ने मुझे बीच में ही टोका....." न न बेटा ऐसा नही कहते.सबका हिसाब रखने वाला वह उपरवाला है,उसकी लाठी में आवाज नही होती पर वह सब देखता सुनता है,पर हमारा काम नही कि हम किसी को बद्दुआ दें."
मैं इतनी विचलित हो चुकी थी कि और कोई बात न कर पाई।अगले दस मिनट तक माँ मुझे समझाती और विषयांतर कर बहलाने की कोशिश करती रही पर मेरे दिमाग तक उनकी कोई बात नही पहुँच रही थी॥बाद में फोन करती हूँ कहकर मैंने फोन रख दिया.

अतीत की परछाइयों ने मुझे पूर्णतः आपने गिरफ्त में ले लिया था.अपने वर्तमान से अनभिज्ञ हो मैं उसमे खोयी हुई कब से कब तक रोती रही मुझे स्वयं भी इसका भान न रहा.महरी ने जब आकर मुझे झकझोरा और चिंतित स्वर में घबराकर मुझसे मेरे रोने का कारण पूछा ,अपने गीले गालों पर हाथ फेर तब मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे आंसुओं से मेरे गाल गला और पल्लू गीले हो रहे थे.बड़ी मुश्किल से महरी को समझा पाई कि मेरे एक चचेरे भाई की तबियत बहुत ख़राब है इसलिए मुझे रोना आ गया है.और कोई विशेष बात नही ,उनका इलाज चल रहा है ,जल्दी ही ठीक हो जायेंगे.
उस वक्त किसी से भी बात या जिरह करने की मनःस्थिति में मैं नही थी और महरी के साथ बात करने का मतलब था जबतक घंटा भर लगा उसके सभी सवालों का जवाब दे उसे पूरी तसल्ली न करा लो न ही अगले काम को हाथ लगायेगी और न ही आपको एकांत का मौका देगी.सो उसको जैसे तैसे निपटाकर मैं उसके अंतहीन प्रश्नों से बचने के लिए गुसलखाने में घुस गई.
बाहर निकलकर घड़ी पर नज़र डाला तो ग्यारह बज चुके थे। तैयार होकर दफ्तर पहुँचने में कम से कम बारह बज जाते जो कि किसी भी हाल में जायज न था. इसलिए बेहतर था कि छुट्टी ले ली जाती.सो दफ्तर में फोन कर तबियत ख़राब होना कारन बता उस दिन की छुट्टी ले ली.

सच कहूँ तो किसी से भी बात करने की इच्छा नही हो रही थी.ऐसे में बुझे हुए चेहरे को हरा करना या सहयोगियों को कारन बताना दोनों ही मुश्किल काम था.एक कप चाय पी कर यूँ ही कुछ देर अनमनी सी बैठी रही और फ़िर दिलो दिमाग को हल्का करने के लिए मनपसंद की एक ठुमरी की सी डी लगा कर बैठ गई.एक पुस्तक भी खोल लिया पढने हेतु ताकि ध्यान उसमे बंधकर अतीत की गलियों में भटकना छोड़ कर अन्यत्र रम जाए. पर न ही कानो से होकर मन तक धुन पहुँच पा रहे थे और न ही अक्षर आंखों को बाँध पा रहे थे..

भरा पूरा परिवार था हमारा गाँव में।दादाजी तीन भाई थे.हालाँकि तीनो दादाजी विधुर थे पर मझले निःसंतान भी थे. बड़े दादाजी को एक बेटा और चार बेटियाँ और चाचाजी को भी एक बेटा.और मेरे दादाजी को दो बेटे. विनय भइया मेरे चचेरे भाई थे.बड़े ही लाड प्यार में पले हुए चाचाजी के इकलौते संतान. मेरे पिताजी जुडिसिअल सर्विस में और एक चचेरे चाचा इंजिनयरिंग कर एक प्राइवेट संस्थान में नौकरी में संलग्न गाँव से सदा ही बाहर रहे बाकी परिवार के सभी सदस्य गाँव पर ही रह निजी व्यवसाय तथा जमींदारी के कार्य कलापों में संलग्न थे.

पिताजी के पोस्टिंग के अनुसार ही हमारा भी गाँव आना जाना छुट्टियों में या किसी पारिवारिक उत्सव के अवसर पर ही हो पाता था. पर गाँव में रहने का अवसर मिलना हमारे लिए लाटरी खुलने से कम नही होता था..बड़े बड़े कमरों और खूब बड़ा सा खुला आँगन वाला घर,फलों से लदे फदे पेड़,फूलों के पेड़ पौधे,दूर तक फैले हरे भरे खेत,बड़ा सा मैदाननुमा खलिहान,ढेर सारे गले में घंटियाँ टुन्तुनाते गाय बैल, और तो और भैंस की सवारी.तालाब में भैंस पर बैठ नहाने के आनंद को जिसने उठाया होगा वही समझ सकता है. घर के नौकर जब भैंसों को नहलाने तालाब लेकर जाते थे तो हम सभी भाई बहनों को उसकी सवारी करते थे और उनकी निगरानी में हम तालाब में भैंस की पीठ पर बैठ नौकाविहार का आनंद लिया करते थे.अद्भुत था वह भी सुख.चाचियों बुआओं दादाजी वगैरह के रहते हमलोग माताजी के अनुशाशन से बिल्कुल मुक्त रहते थे और पिटाई की तो नौबत आते ही इतनी जोर से बुक्का फाड़ रोते कि पीटने वाला (माँ या पिताजी) डांट सुन जाए.लाड में फूले और अनुशासनहीन ऐसी जिंदगी स्वर्ग से कमतर थोड़े न थी.

मैं करीब छः सात साल की रही हुंगी।मेरे जीवन का यह पहला मौका था जब घर में किसी की शादी में शामिल होने का मौका मिला था.शादी थी विनय भइया की.बाकि जो दो चचेरी भाभियाँ थी वे काफी बड़ी थीं .लगभग माताजी की उम्र की और उसमे भी एक भाभी कभी कभार छुट्टियों में ही गाँव आया करती थी.जो भाभी यहाँ गाँव में रहती थीं वो मुझे बिल्कुल भी अच्छी नही लगती थीं.निःसंतान थीं वे और अपना सारा समय सजने सवरने और गप्पबाजी में लगाती थीं और हम बच्चों तक से भद्दे भद्दे मजाक किया करती थीं.ऐसे में मन में एक आशा जगी थी कि ये नई वाली भाभी जरूर ही भली होंगी और उनके आते ही अपने सब भाई बहनों को पीछे छोड़ भाभी पर पूरा कब्जा जमा लूंगी और वो केवल मेरी भाभी होंगी.बाकी लोग लेकर सड़ते मरते रहें उस गन्दी वाली भाभी कों.

मेरी उत्सुकता अपनी चरम पर थी.ढेर सारे रस्मो रिवाज के बाद बारात रवाना हुई.सबकी चिरौरी कर थक चुकने के उपरांत अपने अन्तिम हथियार रोने धोने का सहारा लिया पर,हम रोते पीटते रह गए.गाजे बाजे के शोर में हमारा उच्च स्वर रुदन गौण होकर रह गया. हमारी एक न चली हमें साथ नही ले जाया गया.सिवाय बारात वापस आने के इन्तजार के और कोई चारा न रहा.....


तीसरे दिन बाजे गाजे के साथ शाम के धुन्धलुके में नई दुल्हन के साथ बरात वापस आई।जैसे ही ड्योढी में डोली उतरी महिलायों में द्वारचार को लेकर अफरा तफरी का जो माहौल बना उससे अधिक बुरा हाल हम बच्चों के नई भाभी को सबसे पहले देखने और उसपर कब्जा जता शान बघारने की धक्का मुक्की के माहौल से बना.मैं थोडी चतुर निकली धक्कामुक्की में शामिल न हो अपने कृशकाया का लाभ उठाते हुए सुट से डोली में जा घुसी और लम्बी सी घूंघट ताने भाभी के घूंघट के अन्दर घुस उनके चेहरे के ठीक सामने लगभग नाक से नाक सटा उन्हें निहारने लगी॥ यूँ तो भाभी काफ़ी डरी सहमी और घबरायी हुई सी थीं पर मेरे उतावलेपन ,उत्सुकता और विभोर सी मेरी नजरों ने पल भर को सिर्फ़ मेरी और केंद्रित कर सब कुछ विस्मृत करा दिया और उन्होंने स्नेह से मेरा मुंह चूम लिया. फ़िर क्या था,यही तो मुझे चाहिए था.खजाना मिल गया मुझे,गदगद हो खुशी से झूम उठी मैं.भाभी पूरी की पूरी मेरी थी और मैं अपने सभी भाई बहनों को पछाड़ जीत चुकी थी.यही खजाना तो मुझे चाहिए था.खजाना वो जो पूरी की पूरी मेरी थी.अपनी जीत की उद्घोषणा के लिए मन मचल गया पर मैंने अपने आप को इसके लिए रोक लिया क्योंकि यदि बाहर निकलती और कोई और मेरे खजाने तक पहुँच जाता तो मेरी जीत भी छोटी हो जाती और भाभी तक पहुँचने का रास्ता भी सुलभ हो जाता मेरे प्रतिद्वंदियों के लिए.सो मैंने वहीँ उस छोटी सी डोली में छिपकली सा दीवार से सटे बैठे रहना ही मुनासिब समझा.

पूजा द्वारचार के लिए जब भाभी को भी बाहर निकाला गया तो भी मैंने उनके साड़ी के पल्ले की कोर नही छोड़ी और कमरे में जहाँ उन्हें बैठाया गया वहां भी उनसे बिल्कुल चिपकी सी दुबककर बगल में बैठी अपलक उनका मुंह निहारती रही. .थोडी सावली सी जरूर थी वो पर उन जैसी सुंदर आकर्षक स्त्री बहुत कम देखी है मैंने आजतक के अपने जीवन में.बड़ी बड़ी पलकों वाली बड़ी सी आँखें,पतले पतले मुस्कुराते हुए ओंठ,लम्बी नुकीली नाक छरहरा बदन और सबसे बढ़कर व्यक्तिव में एक अजीब सी स्निग्धता और सौम्यता.
अजीब होता है गावों में सुन्दरता का मानदंड।जबतक रंग साफ़ और खूब दुधिया गोरा न हो तो सावंले रंग को तो सीधे सीधे काले की संज्ञा दे दी जाती है और बेझिझक कुरूपता का प्रमाणपत्र दे दिया जाता है.और सबसे बड़ी बात कि यदि ये अपनी प्रतिक्रिया चट मुह पर ही न दें मारें, तो लगता है इनके मुंहदिखाई के पावन पुनीत कर्तब्य का समुचित पालन ही नही किया इन्होने.माना जाता है कि गाँव के लोग बड़े ही सीधे सादे मासूम होते हैं.पर मेरा अनुभव रहा है कि तकनीकी ज्ञान में ये भले शहर वालों से उन्नीस पड़ते हों,व्यवहारिक ज्ञान चल प्रपंच में ये ऐसे निष्णात होते हैं कि खड़े खड़े शहर वालों को दो आने में बीच बाज़ार में बेच आयें और बिकने वाले को पता भी न चले.

औरतों का जो ताँता लगा मुन्हदिखाई का सो देर तक चलता रहा और मेरा हाल यह था कि जो कोई भी नकारत्मक प्रतिक्रिया देता लगता जाकर उसकी चोटी खींच उसे खूब गलियां दूँ.अपनी इस अनिद्य सुंदरी भाभी के ख़िलाफ़ एक लफ्ज भी सुन पाना दुष्कर हो रहा था मेरे लिए..मुझे लगता था किसी के भी पास वह नजर ही नही जो इस सुन्दरता को देख सराह पाए.हालाँकि सारे लोग ऐसे ही नही थे कुछ स्त्रियाँ बड़ाई भी कर रही थी और कुछ चुपचाप देख आशीर्वाद दे चली भी जा रही थीं पर मुझे लगता था दुनिया में एक भी ऐसा न हो जिसे मेरी भाभी प्यारी और सुंदर न दिखे.देर रात जब यह देखा देखी का सिलसिला थमा तो पहले तो खूब फुसलाया गया मुझे वहां से चलने के लिए और जब मैं न मानी तो जबरदस्ती खींचकर मुझे वहां से ऐसे ले जाया गया जैसे गाय के थन से बछडे का मुंह छुडाकर ले जाया जाता है.देर तक रोती रही,पहले बिछुड़ने के कष्ट से और फ़िर माँ से अपने इस जिद के प्रसादस्वरूप पिटाई खाने के वजह से पता नही कब रोती रोती सो गई.सुबह आँख खुलते ही दौडती हुई जा पहुँची अपनी अमूल्य निधि के पास और फ़िर यह जिम्मा भाभी को ही दिया गया कि मुझे मुंह हाथ धोने को राजी करे और नास्ता अपने साथ ही कराये. तब पहली बार भाभी की आवाज सुनी थी.जितनी गहराई से वह मीठी सी आवाज निकलती थी उतनी ही गहराई तक अंतर्मन को भिगो जाती थी अपने स्नेह से.

जबतक छुट्टियों में गाँव में रही,यूँ ही चिपकी रही भाभी से। सारे फुफेरे भाई बहन तो भाभी के आने के सप्ताह भर के बाद ही वापस जा चुके थे और बाकियों ने जब मुझे इस तरह से भाभी पर सर्वाधिकार जमाये उनके साथ इस तरह संलग्न देखा तो अपने पुराने खेल तमाशों में लग गए मुझे मेरे हाल पर छोड़.लेकिन मुझे जो मिला था उसके बाद अपने हमजोलियों के उस छूटे हुए साथ का कोई मलाल न रहा.रात को जब माँ खींचकर मुझे सोने को अपने साथ ले जाती थीं उसके सिवाय सुबह आँख खुलने के बाद से का मेरी सारी दिनचर्या भाभी के साथ ही व्यतीत होती थी.या यूँ कहें कि मेरी दिनचर्या सुव्यवस्थित रखने की जिम्मेदारी भाभी को ही दे दी गई थी.सुख केवल मेरा ही नही था.मेरे लिए हर छोटे बड़े काम को जितने हर्ष और खुशी से भाभी किया करती थीं,छोटी थी तो क्या हुआ मैं स्पष्ट अनुभव करती थी.वहीँ एक बड़ी भाभी थीं जो सबके सामने भले हंसकर बात कर लें अकेले में अक्सर ही दुत्कार दिया करती थी और एक भाभी यह थीं,जो एकांत पाते ही ऐसे प्यार लुटाती थीं मानो मेरी जन्मदात्री वही हों॥बाकी लोग बाग़ भी हमारे इस स्नेह का बड़ा फायदा उठाने लगे थे इनमे अग्रणी मेरी माता थीं जो मुझसे मेरे नापसंदगी की हर बात भाभी के मार्फ़त करवा लेती थी.वो सारी चीजें जिनसे मुझे सख्त नफरत थी भाभी के एक पुचकार पर मैं खा लिया करती थी.उस बार की सारी छुट्टी ऐसे ही इतने आनंद में बीता कि वो एक महीना मानो पलक मारते ही गुजर गया.रोते धोते भाभी से बिछुड़ मुझे अपने परिवार के साथ वापस अपने घर लौट जाना पड़ा.भाभी को अपने ख्यालों में बसाये अगली छुट्टी के इन्तजार में समय बीतने लगा.रोज सवेरे उठ माँ से पूछती कि अभी गाँव जाने में और कितने दिन बचे हैं.तंग आकर एक दिन माँ ने मुझे कैलेंडर में अगली छुट्टी वाले जगह में निशान लगाकर दिया और मुझे ताकीद की कि मैं रोज एक तारीख लाल कलम से काट दिया करुँगी तो दिन जल्दी से ख़तम हो जाएगा.इसी बहने मुझे दिन महीने तारीख भी सिखा रटा दिए माता ने.मुझे पढाकर वो भी खुश और तारीख पर लाल निशान लगा मैं भी खुश.दोनों के ही मतलब सध रहे थे. भाभी के प्यार का प्रालोभन दे माँ मुझे पढने लिखने से लेकर खाने पीने तक को नियमित करवा लेती थी.भाभी के प्रेमपात्र होने का प्रालोभन एक ऐसी उर्जा मुझमे भरती थी जो 'अच्छी लड़की' के खिताब पाने को मुझे हरदम प्रोत्साहित करती थी..

जिंदगी चलती रही,दिन निकलते रहे॥इन्तजार की घडियां अंततः ख़तम हुई जब दशहरे की छुट्टी में हम गाँव पहुंचे।मुझे भाभी की स्नेहिल गोद मिली और मुझसे भाभी के ममत्व को जैसे सहारा मिला.यूँ तो उस बार हम पन्द्रह दिन ही रहे वहां पर एक बात जो मैंने महसूस की वह यह थी की इन कुछ महीनो में ही भाभी का चेहरा बुझा बुझा मुरझा सा गया था.बोलती तो वे ऐसे भी बहुत कम थी ,जो अब और भी संक्षिप्त हो गई थी.ठीक ठाक सबकुछ तो समझ में नही आता था,पर जो देखती सुनती थी वह बड़ा ही अजीब सा लगता था.भाभी सारा दिन काम में लगी रहती थीं.खाना पकाने,खिलाने से लेकर परिवार के प्रत्येक सदस्यों के सेवा के लिए दिन रात एक किए रहती थी.चाचियों के तेल मालिश से लेकर कंघी चोटी करना,उनके हर छोटी बड़ी जरूरतों का ख़याल रखना उन्होंने अपना धर्म मान रखा था.तो भी चाची उन्हें हर वक्त मायके का ,उनके निक्कमेपन और कुरूपता का ताना दिया करती थी. चाची केवल महल्ले के औरतों के सामने ही नही बल्कि ,चाचाजी तथा भइया के सामने भी भाभी की इतनी बुराइयाँ करती थीं कि उन पन्द्रह दिनों के दरम्यान ही दो बार भइया कमरे में बंद कर भाभी को पीट चुके थे .हालाँकि जब मेरे पिताजी के कानो तक बात पहुँची तो उन्होंने भइया को इतना लताडा कि हमारे रहते कोई अप्रिय घटना नही घटी.लेकिन यही भइया थे जो बड़ी भाभी से इतना मधुर व्यवहार करते थे कि मेरी समझ में यह जरूर आता था कि भइया अपनी पत्नी को नही बडकी भाभी को प्यार करते हैं. जसे ही एकांत में भइया बडकी भाभी से मिलते थे दोनों अजीब से लिपटे चिपटे रहते थे और मुझे मौजूद देख जब कभी बडकी भाभी विनय भइया से कहती थी कि सुमी देख रही है,कहीं किसी से कुछ बोल न आए.तो भइया हंस दिया करते थे कि वो तो बच्ची है वो क्या सम्झेगी निश्चिंत रहो .पर जब एक दिन मैंने अपने ज्ञान का परिचय देते हुए भइया से निडर हो कह ही दिया कि आप मेरी भाभी से नही बडकी भाभी से प्यार करते हैं ,मैं सबको जाकर कह दूंगी तो उस समय उनकी डरी सहमी स्थिति देख मुझे एक अजीब से आनंद का आभास हुआ था..भइया को अपने पास देख जिस तरह का डर भाभी के आंखों में तैरा करता था कुछ ऐसा ही डर उस समय मैंने उनकी आंखों में देखा था.फ़िर तो उस दिन विनय भइया और बड़ी भाभी ने मेरी खूब मान मुनौअल की,खूब दुलारा और भइया ने किसी से कुछ न कहने की ताकीद के साथ मुझे तुरत फुरत बाज़ार ले जाकर नई फ्राक खरीदी और लड्डू खिलाया.पर इतना कुछ पाकर भी मेरा मन न बहल पाया और शाम को मैंने भाभी को रिपोर्ट दे ही दी.मेरी बातें सुन भाभी के चेहरे पर जो दर्द उभरा और जिस तरह आँखें बही वह मैं आज तक नही भूल पाई हूँ.लेकिन मुझे लगा भाभी को यह बात पहले से ही पता थी,वह तो मेरे प्रेम की उष्णता ने उनके मन को पिघला आँखें नम कर दी थी.भाभी ने मुझे दुलारा और मुझे अपनी कसम देते हुए कहा कि यह बात मैं किसी से भी कभी भी न कहूँ.कोई पूछे तो भी नही. पर मेरे कहने न कहने से क्या होता था,यह बात शायद घर का हर सदस्य जानता था.

विनय भइया भाभी को प्यार नही करते इसलिए हरदम डांटते पीटते हैं यह बात तो समझ में आती थी पर चाची को भाभी से इतनी नफरत क्यों थी यह बात पल्ले नही पड़ती थी जबकि भाभी तो उनकी हर बात बिना काटे,बिना सफाई दिए चुपचाप सर झुकाए मानती सुनती रहती थीं..यूँ घर में ऐसा कोई न था जिसे चाची पसंद करती थीं या जो चाची को पसंद करते थे.पूरे घर में एक मेरी माँ ही थीं जिनके पास दोपहर में चुपके से आकर भाभी बैठती थीं और अपने दुःख दर्द बांटा और रोया करती थीं..जब भी मैं भाभी को इस तरह रोते देखती तो लगता था जाकर अपना पूरा जोर लगाकर सबको पीट आऊं.एक दिन चाचा और विनय भइया से जाकर मैंने पूछ ही लिया कि वे भाभी को इतना क्यों डांटते हैं,उनसे प्यार क्यों नही करते उन्हें रुलाते क्यों हैं.आपलोग बहुत ही बुरे हैं.यह बात इतनी बढेगी और इसकी कीमत भाभी को चुकानी पड़ेगी यह मेरा बालमन बिल्कुल भी अंदाजा नही लगा पाया था.भाभी पर दोष लगा कि वे घर की बातें सबको जाकर बताती हैं और परिवार खानदान की नाक कटा इज्ज़त डुबा रही हैं. माँ ने तो मेरी क्लास ही लगानी शुरू की थी और मैं पिटने ही वाली थी कि भाभी ने आकर बचा लिया और मुझे पुचकार कर समझाया कि मैं जो भी कुछ देखा सुना करूँ वो किसी को न बताऊँ वरना उनकी रोने वाली बात सबको बहुत बुरी लगेगी और लोग दुखी हो जायेंगे..

समय के साथ सबकुछ बदलता रहा ,मैं बड़ी होती गई,भाभी की दुर्गति भी दिनोदिन बढती गई.पर एक चीज जो नही बदला बल्कि समय के साथ और दृढ़ होता गया वह था भाभी का मेरे लिए स्नेह और हमारा मानसिक जुडाव.मेरे लिए वो ममत्व की साक्षात् मूर्तरूपा देवी थीं.ऐसा नही था कि उनका यह स्नेह केवल मेरे ही लिए था.छोटे बच्चों को देखते ही जिस तरह उनके चेहरे पर खुशी झलकती थी,जिस तरह वो सबपर अपना प्यार लुटाती थी, वह अद्भुत था.हालाँकि मुझे थोड़ा जलन भी होता था पर भाभी के इस हर्ष और सुख के लिए यह मुझे सहज ही सह्य हो जाता था. मेरे लिए वह क्या थीं उनके व्यक्तिव के गरिमा से मन कैसे नतमस्तक रहता था यह बखान पाना बड़ा ही दुष्कर है..वो मुझे गुणों की खान दिखती थी,पर काश ईश्वर मेरी वह आँखें किसी और को भी देता.जब कभी भाभी का उदास चेहरा आंखों के सामने घूमता तो पूजाघर जाकर भगवानजी से विनती करती कि वे ऐसा कोई चमत्कार कर दें कि हर कोई भाभी को प्यार और सम्मान दे .

करीब दो साल बाद एक दिन जब स्कूल से घर लौटी तो माँ पिताजी को खूब गुस्से में चाचा चाची और विनय भइया के ख़िलाफ़ बोलते हुए सुना.जितना सुना उस से यही समझ में आया कि चाचा चाची विनय भइया कि दूसरी शादी करवाना चाहते हैं क्योंकि भाभी बाँझ हैं. माँ खूब रो रहीं थीं और उन तीनो को कोसे जा रही थीं कि इतनी लक्ष्मी सी औरत कि जो इन लोगों ने दुर्दशा कर राखी है,इन्हे ईश्वर से थोड़ा भी भय नही लगता.बाद में मैंने माँ से पुछा था कि माँ ये बाँझ माने क्या होता है?तो माँ ने मुझे उत्तर दिया बिना दूसरी बातों में बहला दिया था.पर मेरे मन में इसके उत्तर जानने की उत्सुकता बहुत समय तक बनी रही.पिताजी और माँ इस बार हम भाई बहन को नौकरों और पड़ोसियों के जिम्मे सौंप अकेले ही गाँव गए.हालाँकि मैंने अपने भर पूरजोर प्रयास किया कि मुझे भी वो साथ ले लें.पर परीक्षाएं नजदीक होने के कारण हमारी मांग पूर्णतः खारिज हो गयीं.

संयोग ऐसा रहा कि उसके बाद से करीब दो वर्ष तक हम गाँव नही नही जा पाए॥छुट्टियों में कहीं न कहीं अन्यत्र ही जाना होता रहा।इसी बीच एक दिन स्कूल से वापस आई तो माँ पिताजी को खूब खुश देखा.माँ ने बड़े प्यार से मिठाई खाने को दी और खुशखबरी सुनाया कि मेरी प्यारी भाभी को नन्हा मुन्ना बाबू होने वाला है.हालाँकि एक पल को मेरा मन आशंकित हो गया कि कहीं भाभी का बाबू मेरा प्यार तो नही बाँट लेगा पर फ़िर याद आया कि इतने सारे बच्चों से प्यार करते हुए भी तो भाभी सबसे ज्यादा मुझे ही मानती हैं,तो मेरी शंका निर्मूल है .मैं भाभी से मिलने जाने को मचल उठी.माँ ने बताया कि दशहरे की छुट्टियाँ होते ही हम गाँव निकल चलेंगे और तबतक भाभी का बाबू भी जन्म ले चुका होगा.

गहमा गहमी और तेज आवाजें सुनकर सुबह सुबह नींद टूटी तो देखा कि घर में अजीब तनाव और चिंता का माहौल था॥चाचा, चाची,बड़ी बुआ सब घर में थे बिकुल अस्त्व्यत अवस्था में और माँ रोये जा रही थी।किसी से कुछ पूछते भी नही बन रहा था और आशंका से दिल भी बैठा जा रहा था.अंततः हिम्मत करके बुआ से पूछ ही लिया तो पता चला कि भाभी का बाबू पेट में ही मर गया है जो अगले तीन महीने बाद जन्म लेने वाला था और भाभी की तबियत बहुत ही नाजुक है.इसलिए रातों रात उन्हें गाँव से लाकर सीधे बड़े अस्पताल में दाखिल कराया गया है. अगले सात दिनों तक लाख अनुनय विनय के बाद भी मुझे भाभी के पास नही ले जाया गया.पर इन सात दिनों में घर का माहौल इतना तनावपूर्ण रहा कि पिताजी को पहले कभी मैंने इतने गुस्से में नही देखा था.चाचा चाची से लगातार झगडे होते रहे.पिताजी ने विनय भइया को तो बस पीटा नही यही बहुत हुआ.उन्होंने उनसे कहा कि यदि बहू को कुछ भी हो जाता है तो अपने हाथों मैं तुझे पुलिस के हवाले कर दूंगा.इनलोगों के बहस से ही यह पता चला कि विनय भइया ने शराब के नशे में द्धुत्त होकर भाभी की ऐसी पिटाई की कि उन्हें मौत के कागार पर पहुँचा दिया.हालाँकि चाची ने सारा कुछ भइया के सर मढ़ दिया था पर मुझे अंदाजा लगते देर न हुई कि सारा खेल बडकी भाभी और चाची का ही है.उन्ही की लगायी आग में भाभी तिल तिल जलती रहती हैं.विनय भइया को तो यूँ भी मनुष्य मानते मुझे घिन आती थी.

जितने भी देवी देवताओं के प्रार्थना,स्तुति मैंने सुन जान रखे थे सबका पाठ किया करती थी और हमारे घर के पास वाले मन्दिर में घंटों बैठ भगवानजी से भाभी को जल्दी से ठीक करने की प्रार्थना करती थी.ईश्वर को अंततः मेरी प्रार्थना स्वीकार करनी ही पड़ी और पाँच दिन तक जिंदगी और मौत के बीच झूलती भाभी को डाक्टरों ने खतरे के बाहर बताया.
सातवें दिन जब मुझे भाभी के पास ले जाया गया तो मुझे अपने पास देखते ही भाभी ने सीने से चिपकाकर जो रोना शुरू किया और हम दोनों की ही ऐसी घिग्घी बंधी कि आस पास खड़े सभी लोग रो पड़े. भले मैं बिल्कुल ही नासमझ और बच्ची थी पर संवेदनाओं को समझने अनुभूत करने की कोई उम्र नही होती.भाभी की पीड़ा को मैं महसूस कर पा रही थी और भाभी को भी जैसे लगता था कि मैं उनके सुख दुःख पूर्णरूपेण अनुभूत कर सकती हूँ.

सब दिन एक समान नही रहता॥अगले साल दीपावली के बाद भाभी की गोद हरी हो गई और बच्चे के छठ्ठी के अवसर पर हमलोग गाँव गए तो भाभी के पीले पड़े मुरझाये चेहरे में जो संतोष और सुख का आब देखा तो मन जुडा गया। छोटे नन्हे मुन्ने ने तो मेरा मन ही बाँध लिया.इस बार अपने घर वापस जाते समय मुझे जितनी तकलीफ हुई उतनी कभी नही हुई थी.

साल गुजरते रहे और पढ़ाई के बोझ तले दबे हमारा गाँव जाने का क्रम बड़ा ही सिमित होता गया।कई बार ऐसा हुआ कि जब कभी हम जाते भी तो भाभी अपने मायके होती और उनसे मिले बिना अनमने दुखी हो मुझे वापस आ जाना पड़ता.फ़िर ऐसा हुआ कि अक्सर बीमार अवस्था में रहने वाली भाभी अपने मायके ही रहने लगी.जब कभी उनके भाई उन्हें यहाँ छोड़ भी जाते तो बीस पच्चीस दिन होते होते उन्हें फ़िर से मायके भेज दिया जाता था.भाभी के मुन्ने मोहित को चाची अपने पास ही रखती थी यह कहकर कि बीमार भाभी बच्चे कि देखभाल करने में पूर्णतया अक्षम हैं.घर गृहस्थी सम्हाल पाने में अयोग्य तो चाची ने बहुत पहले ही ठहरा दिया था.बहुत दिनों बाद पता चला कि भाभी को हार्ट की बीमारी थी और जब इनलोगों ने इनके इलाज का कोई प्रबंध नही किया तो हारकर भाभी के भाइयों ने इनका आपरेसन करवाया तथा अपने घर रख इनके इलाज का प्रबंध किया. जब वे फ़िर से स्वस्थ हो काम धाम करने लायक हुईं तभी जाकर भाभी को विनय भइया वापस गाँव लेकर आए.यूँ भी समाज में इनकी इतनी बदनामी होने लगी थी कि लोक लाज के अंतर्गत इन्हे ऐसा करना पड़ा.

मेरी नौवीं की परीक्षा संपन्न हो चुकी थी और इतने वर्षों जो कुछ भी ख़बर मुझे भाभी के बारे में मिलता रहा था उसने जहाँ एक ओर मेरा सारे परिवार के प्रति मन वितृष्णा से भर शादी ब्याह जैसे रिश्तों के प्रति भी मन में एक अजीब सी धारणा भर दी थी जो कहीं न कहीं इतने गहरे बैठ चुका था जिसके कारण कालांतर में मुझे विवाह के लिए राजी करने में माता पिता को बहुत ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था. जो भाभी ममत्व की साक्षात् मूर्ति थीं,जिन्होंने पराये बच्चों को भी सदा अपने स्नेह से आप्लावित रखा था,जब मुझे पता चला की टी बी से ग्रस्त होने पर साल भर तक उन्हें अपने बच्चे को छूने नही दिया गया था.शारीरिक बीमारी ने जो दुर्दशा की थी उससे सैकड़ों गुना अधिक कष्ट उनके अपनों ने उन्हें देकर क्या पाया ,यह मुझे झकझोर जाता था.उनसे मिलने बातें करने को मैं इतनी बेचैन हो गई थी की किसी तरह माँ को मनाकर गाँव जाने की जुगत लगायी मैंने.

वर्षों बाद जिस स्त्री से मैं मिल रही थी वह किसी तरह जीवित एक हड्डियों का ढांचा मात्र थी..उनकी हालत देख बिलख पड़ी मैं.जितना गुस्सा मुझे घरवालों के आ रहा था उतना ही भाभी पर भी आया, कि इतना सारा कुछ उन्होंने क्यों झेला चुपचाप.क्यों इनलोगों को इतना अत्याचार करने दिया, कभी खुलकर प्रतिवाद क्यों न किया.एक दिन बहस कर ही बैठी उनसे.कि उनको कमजोर मान और जान ही लोगों ने उन्हें सताना अपने रोजमर्रा के मनोरंजन का साधन मान लिया है और इसके माध्यम से बड़े ही सुगमता से वे अपने अपने अहम् की तुष्टि किया करते हैं.भाभी ने जो उस दिन मुझे कहा वह ताउम्र अविस्मरनीय रहेगा मेरे लिए.पहली बार इस तरह से खुलकर उन्होंने मेरे सामने जीवन की वह सच्चाई रखी जिससे मुकर नही पाई थी मैं.उन्होंने कहा था "बचुवा यदि औरत का पति उसे उसका हक दे उसका सम्मान करे ,उसकी पीड़ा समझे तो परिवार में चाहकर भी कोई उस स्त्री को कष्ट नही दे सकता. यूँ सताने की नही सोच सकता.पर वही यदि उसे पीड़ित करने में सबसे आगे हो तो बाकी लोगों के हाथ तो खुले होते हैं,उन्हें कौन रोक सकता है.मेरे लिए तो कहीं जगह नही.ससुराल रही तो ये लोग हैं और बिना माँ बाप के मायके में भी भाभियाँ चार बातें सुना कोसकर ही खाना कपड़ा देती थीं. वह तो भाइयों ने अपनी पत्नियों से लड़कर इलाज करवाया नही तो भाभियों का बस चलता तो भीख का कटोरा दे सड़क पर बैठा देती.नाम है कि बड़े घर कि बेटी बहू हूँ तो कहीं दाई नौकर का काम कर भी इज्ज़त की रोटी जुटाने नही निकल सकती.बिटिया मेरी जिंदगी से यह सीख जरूर लेना कि पढ़ लिखकर अपनी ऐसी हैसियत जरूर बना लेना कि दो रोटी और इज्ज़त भरी जिंदगी के लिए इस तरह कभी जिल्लत न उठानी पड़े. जो पति परिवार प्यार सम्मान दे, तो उसपर जी जान लुटा देना पर यदि वह जान लेने को उतारू हो जाए तो अपनी जान भी न ले लेने देना.मैं प्रतिकार करती भी तो किस बल के बेटा ,किसका सहारा है मुझे.मेरे तो पूर्व जन्म के संचित पाप के फल रहे होंगे जिन्हें भुगत कर मुझे पार पाना है.ये लोग जो हर वक्त मुझे प्रताडित करते हैं ,गलियां देते ,कोसते रहते हैं इनकी बराबरी में उतरकर यदि मैं भी वही सब करने लगूं तो ऐसे संस्कार लाऊं कहाँ से. मैं यह सब कर अपना धर्म क्यों ख़राब करूँ............"
उन्होंने अपने धर्म की चाहे लाख समझाई हो पर उन दिनों मुझे उनका इस तरह अन्याय सहना सरासर अधर्म ही लगता था।उन दिनों उनकी असहाय स्थिति पुर्नरुपेन मैं नही समझ पायी थी. प्रतिवाद के लिए भी सहारे की आवश्यकता होती है चाहे वह आर्थिक समर्थता ही क्यों न हो बाद के वर्षों में इसी ने मुझे शायद आत्मनिर्भर बनने की सबसे बड़ी प्रेरणा दी॥

माँ से भी कभी कभी मैं लड़ पड़ती थी जब वे भाभी कि यह स्थिति देख समझ रही हैं और उस से क्षुब्ध भी हैं तो भाभी को अपने पास ही लाकर हमारे घर क्यों नही रखतीं..अथाह पीड़ा के साथ माँ ने कहा था एक बार कि बेटा उसी अभागी की भलाई के लिए उसे अपने पास नही रखती बेटा ,नही तो कोई बड़ी बात नही की तेरे चाचा चाची और विनय भइया उस बेचारी का नाम तेरे पिताजी के साथ जोड़ दें. ऐसे ही उसके लिए हम जो सहानुभूति रखते हैं उसके कारण कम नही सुनना पड़ता उसे.यह सब सुनकर कैसे सह पायेगी वह.मैं निरुत्तर हो गई थी..

भाभी के ह्रदय के शल्य चिकित्सा के बाद डाक्टरों ने शक्त हिदायत दी थी कि इनके खान पान तथा आराम का पूरा ख़याल रखा जाए तथा किसी भी हालत में अगले तीन वर्ष तक इनका गर्भवती होना इनके लिए मौत को दावत देने के बराबर है. डाक्टरों के निर्देशों का ठीक उलट पालन हुआ और डेढ़ साल बाद छः महीने के गर्भ के साथ भाभी परलोक सिधार गयीं.
भाभी की बरषी के अगले ही महीने ढेर सारे दान दहेज़ और धूम धाम के साथ विनय भइया की दूसरी शादी हो गई.दूसरी शादी में मिले इस भरपूर दहेज़ का कारण था पैंतीस पार कर चुकी इस कन्या का कुरूपा और कर्कशा के रूप में प्रसिद्द होना.के यह इश्वर की ही कृपा थी कि उन्होंने चाचा चाची के आंखों पर लोभ की वह पट्टी बाँध दी कि पैसे के सामने न ही चाचा चाची को कुछ देखने सोचने की जरुरत महसूस हुई न ही विनय भइया को क्योंकि बुरी तरह से बदनाम हो चुकी बडकी भाभी ने भी अपना प्रेम सम्बन्ध का आधार खींच भइया को अकेला कर दिया था. पर इस नई नवेली प्रौढा दुल्हन ने जब अपना रूप गुन दिखाया तो चाची के पास सिवाय सर धुनने के और कोई रास्ता न बचा था और समय ने भी वह सारा हिसाब चुका लिया जो उस बेचारी के दुखों का मूक गवाह था.

पर वह एक जिंदगी तमाम अच्छाइयों के बावजूद भी क्यों अभिशप्त रही यह आज भी मेरे समक्ष निरुत्तर है.







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16 comments:

Gyandutt Pandey said...

अच्छाई को इतनी बुराई क्यों झेलनी पड़ती है। ईश्वरीय न्याय (?) इतना अटपटा क्यों होता है - समझ नहीं आता।
बहुत से प्रश्न अनुत्तरित रहते हैं। अन्तत: लगता है कि पुनर्जन्म और पूर्वजन्म के सिद्धान्त के सहारे ही उत्तर खोजे जा सकते हैं!
बहुत मार्मिक रही यह पोस्ट।

Lovely kumari said...

padh kar man bhing gaya..koi itna kamjor kyon ho jata hai? ghut ghut ke marne se ek baar marana hi achchha hai.

बाल किशन said...

बहुत ही दुखद और मार्मिक.
कभी कभी भगवान् के खेल हम नहीं समझ पातें है.
मैंने ख़ुद भी इस बात को शिद्दत से महसूस किया है कि "एक जिंदगी तमाम अच्छाइयों के बावजूद भी क्यों अभिशप्त रह जाती है?"
पर शायद संतोष के लिए ज्ञान भइया कि बात मान लेन ही ठीक है.

रचना said...

ek bahut achchi post ko likhna aur aap beete ko post mae bahut achchey tarikae sae likhnaa
aap ko dono aata haen
yahii haen hamara samaj aur uskii sachaaii jisaey haem vidhi kii vdambna keh kar bhulnaa chahtey haen
bahut achcha likha bahut hee achcha

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

बहुत गहरे तक उतर गयी आपकी ये पोस्ट.. कितनी ही ऐसी भाभीया होंगी जो चुपचाप सब सह जाती होगी.. उनकी तो कहानी भी कहने वाला कोई नही होगा..

Suitur said...

बहुत ही मार्मिक है यह पोस्ट ....

mani said...

ranjana ji -bahut hi marmik aur dil ko chune wali prastuti hai aap ki.pata nahi ye kahani hai ya ek sachi ghatna. jindagi main bahut se prashn anutarit rahtyen hain.kai sawal hotye hai jinhye iss jindagi ke karyekalap ki sath jod kar dekhnye se uter nahi mil pata.punerjanm aur purvjanm ke paap punye ka fal iss janam main milta hai - iss baat pe vishwash karney ki bhadyeta bhi ban jati hai.
BAHUT HI SUNDER ABHIVAKTI HAI AAP KI. LIKHTYE RAHIYE AUR HUMLOG KO BHAVBIBHOR KARTYE RAHIYE

mani said...

रंजनाजी बहुत ही कमाल की प्रस्तुति है.खुदा के सुक्र्गुज़र हैं हम जो आप को इतना सम्वेदेंसिल बनाया है. आप ने अपने भावना के अनुरूप ही अपने ब्लॉग का भी नाम चुना है . लिखते रहिये . हम लोग भावना से अरोत्प्रोत होते रहने का सौभाग्य प्राप्त करते रहेंगे.

us said...

कहानी पड़ कर आंखे नम हो गई. भावपूर्ण प्रस्तुति की लिए तहे दिल से धन्यवाद.

Udan Tashtari said...

अति दुखद और मार्मिक पोस्ट. लम्बी होने के बावजूद पूर्ण प्रवाह में बाँधे रही.

Rajesh Roshan said...

बेहद ही मार्मिक पोस्ट... औरतो के जितने बड़े दुश्मन पुरूष हैं उससे जरा भी कम अन्य औरते नही हैं.... इस में आपकी भाभी ने यह जरुर कहा कि पति ही जब..... सच बात है लेकिन साथ ही आपकी चाची का भी इसमे कम योगदान नही है....... दुखद.... सास अपनी बहु को कहती है कि गर्भ में जो लड़की है, उसे गिरा दो..... कई बार इसे सहज रूप से मान लिया जाता है.... अफ़सोस तीनो फिमेल हैं.....

अनुराग said...

हम जिस समाज में रहते है उसमे ढेरो पशु भी है ....मानव शरीर में ......जो धीरे धीरे दूसरे मनुष्य को नोच डालते है ....कभी कभी यही सोचता हूँ की इश्वर क्या वाकई कोई दंड निर्धारित करता है ?ऐसे लोगो के लिये ?

महामंत्री-तस्लीम said...

मार्मिक एवं हृदयस्‍पर्शी कहानी है। आपने जीवन की विडम्‍बनाओं का बखूबी चित्रण किया है।

mani said...

rajesh roshan ji - aap ne likha hai ki "aap ki bhabhi" "aap ki chachi". bhai ranjana ji ne ek kahani likhi hai aur aap unki bhabhi aur chachi ko bhala bhur koshne chal pade . koi baat nahi main ye comments sirf mohaal ko halka karne ke liye likha hu ranjana ji aur rajesh ji aap dono se anurodh hai ki aap anyetha na legye.

mani said...

rajesh roshan ji - aap ne likha hai ki "aap ki bhabhi" "aap ki chachi". bhai ranjana ji ne ek kahani likhi hai aur aap unki bhabhi aur chachi ko bhala bhur koshne chal pade . koi baat nahi main ye comments sirf mohaal ko halka karne ke liye likha hu ranjana ji aur rajesh ji aap dono se anurodh hai ki aap anyetha na legye.

सुभाष नीरव said...

रंजना जी, आपकी यह कहानी लम्बी अवश्य हो गयी है, पर इसमें पाठक को बांधने की अद्भुत क्षमता है। औरत की सबसे बड़ी दुश्मन अगर कोई है तो वह औरत ही है। आपकी यह मार्मिक और हृदयस्पर्शी कहानी पढ़कर आपमें रचनात्मक ऊर्जा के साथ-साथ संवेदना का अज्रस स्रोत भी दिखाई देता है।