5.2.09

आमदनी चौअन्नी ,खर्चा अढईया !

बहुत पुरानी नही, बस ढाई तीन दशक पहले तक परम्परा और प्रवृत्ति थी कि कर्ज लेने वाला मुंह छिपाकर चलता था,क्योंकि कर्ज का अर्थ होता था उसकी लाचारी, जिसका उजागर होना लोग प्रतिष्ठा हनन मानते थे ।जबतक कर्ज चुक न जाए,जवान कुंवारी बेटी सा ह्रदय पर पहाड़ बन वह पड़ा रहता था ,रातों की नीद और दिन का चैन मुहाल रहता था....पर कितने कम अन्तराल में पूरा परिदृश्य ही बदल गया... परम्परा और प्रवृति ने सीधे यू टर्न ले लिया...........

वैश्वीकरण क्या हुआ आमजन के चारों और बाज़ार ही बाज़ार फ़ैल गया....बाज़ार के इस दलदल में आम आदमी आकंठ निमग्न हो गया..... क़र्ज़ बोझ और ग्लानि नही,सुविधा और गर्व का विषय बन गया॥बैंकों और बाज़ार ने सहृदयता के नए प्रतिमान स्थापित किए...... उन्होंने अपने हृदयपट ऐसे खोले कि जिसमे प्रवेश करने से शायद ही कोई बच पाया.......बाज़ार दौडा दौडा कर उपभोक्ताओं को अपने उत्पाद पकड़ाने लगे.......बैंक पकड़ पकड़ कर लोगों के जेब में पैसे ठूंस उनके सपने साकार करने लगे.......घर चाहिए,गाडी चाहिए,टी वी,फ्रिज.....क्या चाहिए ????पैसे नही हैं,अरे चिंता काहे का...5 से 10% डाउन पेमेंट और 0% ब्याज (??) पर दुनिया में जहांतक नजर जाती है,किसी भी भौतिक वस्तु का नाम लीजिये,आपके सामने हाजिर है। और परिणाम, निम्न मध्यम आयवर्ग से लेकर ऊपर तक शायद ही कोई घर बचा जो कर्जमुक्त (लोनविहीन) हो.

इस बाज़ार को सरकार का भी वरदहस्त प्राप्त है। घर जमीन इत्यादि के लिए कर्ज लेने पर आमदनी पर कर राहत का प्रावधान है....तीस वर्ष पहले तक आमजनों की जीवन शैली में प्राथमिकतायें भिन्न हुआ करती थीं, विशेषकर वेतनभोगियों में प्रवृत्ति थी कि पहले बच्चों को पढाना लिखना शादी ब्याह कर के निश्चिंत हुआ जाय तब सबसे बड़े व्यय जमीन घर की व्यवस्था की जाय.आज नौकरी के दो से दस वर्ष के अन्दर सबसे पहले भविष्य के अनुमानित आय के आधार पर घर खरीदा जाता है,जिसकी मासिक किस्त उसके मासिक आय की लगभग तिहाई होती है॥

एक समय था,जब बचत के पैसों से ,जमा पूँजी से व्यक्ति वस्तु विनिमय करता था,व्यय तय करता था...आज बचत के पैसों से नही, भविष्य के अनुमानित/संभावित आय के आधार पर संभावित व्यय तय किए जाते हैं......सिर्फ़ अपनी आय ही नही बल्कि आज की सजग सतर्क दूरदर्शी युवा पीढी व्यय योजना अपनी भावी पत्नी (फलां काम करने वाली कन्या जिसकी मासिक आय लगभग इतनी होगी) के अनुमानित आय तक पर तय कर लेती है .......

और इस पूरे आय व्यय का आधार रह जाता है........"नौकरी" ! तय मासिक किस्त भरने को तय मासिक आय। हाँ, यह अलग बात है कि छोटे मोटे व्यापार में लिप्त लोगों पर लोन दाताओं की उतनी कृपादृष्टि नही रहती. पर सामान्यतः जनमानस में मासिक आय से बचत के धन से व्यय की प्रवृत्ति लगभग नही बची है.....और आज जब मंदी की मार में नौकरी पर वज्रपात हुआ...... तो भयावह परिणाम सबके सामने है.अपनी शान बघारने के लिए बेशकीमती गाडी, घर से लेकर घरेलु उपकरणों तक विभिन्न लोनों की किस्त जिस एक नौकरी के बैसाखी पट टिकी है,बैसाखी हटते ही औंधे मुंह गिरती है.यह गिरना केवल आर्थिक स्थिति का ही नही,जीवन की पूरी गाड़ी ही बेपटरी हो हिचकोले खाने लगती है.

मासिक किस्तों के मकड़जाल में फंसी , नौकरी गँवा चुकी तीस से पचास वर्ष तक के,भारत से लेकर विदेशों तक में बसे भारतीय नौकरीपेशाओं की आर्थिक और मानसिक स्थिति आज क्या है, बहुत जल्दी इसका भयावह रूप प्रकाश में आने लगेगा, जब समाचार पत्र जालसाजी,,हत्या, डकैती या आत्महत्या जैसे समाचारों से पटी रहने लगेगी...अभी तो फ़िर भी थोडी आस है कि यह बहुत लंबा न खिंचेगा......पर ईश्वर न करे यह लंबा खिंच गया, तो क्या होगा, यह भयभीत कर देता है.....

अपनी जमीन से कटकर, नौकरी को सुरक्षित भविष्य की गारंटी मानते हुए , पिछले चार दशकों में हमारे देश में पूरी जनसँख्या जिस तरह लघु कुटीर उद्योग और कृषि कर्म को नकारकर अंधी दौड़ में दौडी है, आज उसका करूप स्वरुप सबके सामने नग्न होकर खड़ा है.


विगत तीन चार दशकों में नौकरी को जिस तरह महिमामंडित(ग्लेमेराइज) किया गया है,कि पढ़े लिखे होने का अर्थ या कहें पढ़ाई की सार्थकता ही नौकरी में माने जाने लगी है...जबतक अम्बानी,बजाज या राजू जैसे उद्योगपति नही बनते,लघु कुटीर उद्योग में संलग्न उद्योगपतियों को नौकरी वालों की अपेक्षा समाज में दोयम दर्जा ही प्राप्त है और कृषि कार्य जिसे कभी सबसे उत्तम माना गया था,(उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी, भीख निदान)आज पूर्णतः उपेक्षित है......मनुष्य मात्र को अन्न उपलब्ध कराने का दायित्व अब भी उन कन्धों पर है,जो अनपढ़ और साधनहीन हैं....साक्षर या उच्च शिक्षा प्राप्त युवा पीढी खेती करना अपमानजनक और निषिद्ध मानती है.समय रहते न चेते तो, जिस तरह रिटेल चेन बनाकर बड़े औद्योगिक घरानों ने उपभोक्ता बाज़ार पर कब्जा जमाना आरभ किया है,जिस दिन वह उन्ही किसानो से जो आज अपनी जमीन बेच बच्चों को नौकरी करने लायक बनाते हैं,उनकी उसी धरती से सोना उगाने लगेगी तो यही भीड़ अपने ही जमीन पर नौकर बन नौकरी करने जायेगी.पूरी व्यवस्था फ़िर से एक बार पूंजीपतियों और गुलामो वाली होने जा रही है,पर बदहवाश भाग रही भीड़ को इसपर सोचने का अवकाश कहाँ?


आज की पढी लिखी पीढी यदि कृषि कार्य या लघु उद्योग में जुटेगी और मौजूदा सरकारी योजनाओं के साथ साथ आगे भी सुविधाएं मुहैय्या कराने के लिए सरकार को घेरेगी तो निश्चित ही सुखद परिणाम पायेगी।इस क्षेत्र का विकास संभावनाओं के नए द्वार खोलेगा और तभी सच्चे अर्थों में हम अपनी आजादी पाएंगे,आत्मनिर्भर बनेंगे.अब तो समय आ गया है कि वर्तमान की विभीषिका को देखकर लोग चेतें और नौकरी रुपी इस मृग मरीचिका से बाहर निकलने का प्रयास करें॥


इसके साथ ही इस बात का भी पूरा ध्यान रखना होगा कि उपभोक्ता बाज़ार पर हावी हो ,न कि बाज़ार उपभोक्ता पर .मितव्ययिता को हमें अपने स्वभाव का अभिन्न अंग बनाना पड़ेगा.छोटे दूकान के दो सौ पचास रुपये की सूती सर्ट के लिए बड़े ब्रांड को डेढ़ से ढाई हजार तक देना चाहिए कि नही,यह हमें ही तय करना होगा.......एक या दो व्यक्ति की सवारी के लिए प्रतिलीटर साठ सत्तर किलोमीटर चलने वाले वहां का उपयोग करना है या,प्रतिलीटर बारह पन्दरह किलोमीटर चलने वाले चार पहिये वाहन का उपयोग करना है,एक बार तो ठहरकर सोच ही लेना चाहिए.......यदि समय का अभाव या और कोई परेशानी न हो तो हवाई यात्रा न कर रेल यात्रा किया जाना चाहिए या नही,यह भी हमें ही तय करना है....किसी भी साधन का उपयोग या उपभोग आवश्यकता आधारित हो तो उचित है,वैभव प्रदर्शन हेतु हो, तो सर्वथा अनुचित है....


जिस दिन हम अपनी प्रवृत्ति में चौअन्नी कमाई में से पाँच पैसे बचत का लक्ष्य तय करेंगे और अपने बचत के पैसों के आधार पर ही व्यय की योजना बनायेंगे....बहुत सारी समस्याएं समूल नष्ट हो जाएँगी।


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40 comments:

Nirmla Kapila said...

ranjanaji aapne to kamaal kar diaaaj ke bajarvad ki kya tasveer paish ki haimai aapko apni baat batati hoon ki maine aaj tak koi loan to kya kabhi rashan tak bhi udhaar nahi liya is liye aaj maje me hoon sac hai hame apnee chadar dekh kar hi pair pasarne chahiye na ki andhadhund baajaar ke peeche chalna chaahiye sochna hame hai sarkaar ka tovadrhast is par rahega hi

Darpan Sah said...

badhiya , samayik aur sargarbhit lekh. bhavishya ki chinta ko abhi se ujagar kar diya. Dhanvyaad , poora lekh pad gaya. aur vakai koi vyakti nahi bacha jo karz mukt ho(including me)
:(
ek baar kahin pe ek tippani ki thi wahi yahan pe uddharit kar raha hoon:

"Gadgets Bikete hai, Sale ka sama hota hai.
Aise mausem mein hi to kharcha yahan hota hai,
kharchney ko salry ka hum intzaar nahi karte,
credit card jeb mein jahan hota hai."
Bad but any ways....

राज भाटिय़ा said...

वाह रंजना जी. बहुत ही सुंदर बात कही आप ने , बस यही बात आज लोगो को समझ नही आती, मेने आज तक अपने सर पर एक पेसे का कर्ज नही होने दिया,किराये पर रह लिये, कम खा लिया, लेकिन झुठी शेखि नही मारी दोस्तो मे बेठ कर, ओर यह बात शायद मुझे संस्कारो से मिली. ओर सच माने बहुत शांति है.
दोस्तो को देखता हुं, कमाते मेरे जितना ही है, हां साथ मै बीबी भी काम करती है, लेकिन शांति नही, क्योकि उन के पास टाप की कार है अपना मकान है, ओर बहुत सी सुख सुबिधा है लेकिन शांति, तभी तो कहते है तेते पाव पसारिये जेती लम्बी सॊर.
धन्यवाद, आप ने मेरे दिल की बात बहुत सुंदर शव्दो मे कह दी

रंजना [रंजू भाटिया] said...

आज तो आपने बहुत बढ़िया सीख दे दी .यह बात समझ आ जाए तो बहुत सी मुश्किलों का हल स्वयम ही निकल आएगा ..बेहतरीन पोस्ट है यह

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत लाजवाब बात कही आपने. चुंकि ये समय उपभोक्तावाद का है और हमारी नई पीढी इससे बच नही पारही है. चारों तरफ़ चकाचौंध है, पर अभी जो मंदी का माहोल शुरु हुआ है उससे लगता है कि अब इनको काफ़ी मुश्किल पडने वाली है. और अन्तत: आपके बताये फ़ार्मुले पर ही लौटना पडेगा.

रामराम.

Abhishek said...

सहमत हूँ आपसे. देश में 'उधार संस्कृति' फ़ैल रही है, और सरकार भी इसके समर्थन में खड़ी है.

P.N. Subramanian said...

बहुत ही जोरदार लेख है यह तो. हम पूरी तरह आप से सहमत हैं. एक और उदहारण दूँ. भोपाल के पास सीहोर में सबसे अच्छी शरबती गेहूं पैदा होती है. सीहोर से थोड़ा हट कर हाइवे पर ही आई. टी.सी.वालों ने अपना एक गेहूं खरीदी का केन्द्र बनाया है जहाँ किसानों को अच्छी कीमत मिलती है.लेकिन उन्हीं का लगा हुआ चौपाल नामका एक माल भी है. अब किसान के हाथ में जब पैसा आता है तो माल में जाता है. वहां के आकर्षण के सामने किसान किंकर्तव्य विमूढ़ बन जाता है और आधुनिक जीवन शैली अपनाने के लिए वाध्य हो जाता है. इस तरह ये बड़ी कंपनियां किसानों को बरबाद करने में तुल पड़ी हैं.
http://mallar.wordpress.com

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

मैं भी उधार संस्क्रती का हिमायती हूँ कार खरीदते समय उसकी कीमत नही ई ऍम आई देखता हूँ .

Rahul kundra said...

रंजना जी आपके सुझाव के लिए बहुत बहुत आभारी हूँ। इसी तरह से आप अपने कीमती सुझाव से आगे भी मार्ग दर्शन करती रहेगी ऐसी आशा करता हूँ। एक बार फ़िर धन्यवाद।

दिगम्बर नासवा said...

रंजना जी
आप का लेख वाकई सीख देने वाला है, पर कितने लोग आजकल इस बात पर ध्यान देते हैं. ग्लेमर भरी इस दुनिया में, भागम भागी का ऐसा नशा छाया हुवा है सब पर की हर कोई सब so called सुख आज और अभी ही पाना चाहता है. कोई प्रतीक्षा नही करना चाहता, ऐसा लगता है जैसे अगर रुक गए तो पता नही क्या खो देंगे. ये लोग यह नही जानते की पाने की होड़ में सब कुछ खोता जा रहा है. so called ग्लोबलैज़शन के dour में, मीडिया के प्रभाव में इस परवर्ती मैं कोई सुधार होगा, गुंजायश कम ही है.

डॉ .अनुराग said...

बाज़ार अब बड़ी होशियारी से लोगो के घरो में घुस रहा है...अब विज्ञापनों पर कम्पनिया इसलिए खर्च कर रही है ताकि लोगो को इनकी आवश्यकता महसूस हो...वैसे भी कई विज्ञापन रिश्तो का इस्तेमाल इमोशनल एंगल के तरीके से कर रहे है.

अनिल कान्त : said...

बाजारीकरण जिस तरह से पनपा और लोगो के घरों में घुसा ....ये उसी का नतीजा है कि लोग शर्म महसूस करने लगे हैं अगर कार , टीवी फ्रिज ....न हो तो और उसके लिए वो क़र्ज़ लेते हैं ...लेकिन सुविधाओं को सीमा में रहकर और अपनी आय के अनुसार सोच समझ कर खर्च करे तभी कुछ होगा ....

बढ़िया लेख ....वाकई

विनय said...

मेरे दिल से जुड़ी बात कहने के लिए आपको नमन!

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह.... आपने तो मुझे जड़ कर दिया.. सटीक बात.. सटीक लहजा... वाकई...... वाहवा..

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Ranja jee,
aapne bahut samajhdaree ki baatein batlayee hain.

( sorry to comment in English - i am away from my PC )

shyam kori 'uday' said...

... आपकी कलम व विचारशीलता मे जादू है, सचमुच प्रसंशनीय।

ARVI'nd said...

mai ek yuva hu.....mujhe es lekh se bahut kuchh sikhane ko mila ...ya yun kahen ki jindagi jeene ka tareeka pata chala to atisyokti nahi hogi.Dhanyawaad......Mai aapko Aapke Naam Se Sambidhit nahi kar sakta...Aap bahut badi hai,aadarniye hai.Aap hi bataye aapko Kaise sambodhit Karu.

kumar Dheeraj said...

आपका कहना बिल्कुल सच है । हकीकत को लिखा है आपने । बस फकॆ जमाने का हो चला है खासकर वैश्वीकरण ने सारा कुछ बदल कर रख दिया है । शु्क्रिया

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

रंजना जी, बचत और पूंजी के महत्त्व को कम नहीं किया जा सकता. परन्तु बाज़ार का नियमीकरण भी बहुत ज़रूरी है.

Krishna Patel said...

bahut achchha likha apne.

Udan Tashtari said...

जिस दिन हम अपनी प्रवृत्ति में चौअन्नी कमाई में से पाँच पैसे बचत का लक्ष्य तय करेंगे और अपने बचत के पैसों के आधार पर ही व्यय की योजना बनायेंगे....बहुत सारी समस्याएं समूल नष्ट हो जाएँगी।

--बिल्कुल सही बात कही-विचारणीय! अच्छा लगा तथ्यात्मक आलेख को पढ़कर.

महेन्द्र मिश्र said...

धन की बचत की जा सकती है . असल में भौतिकता की सुख चाह में लोग अपनी आमदनी से ज्यादा खर्च कर लेते है उस स्थिति ऐ बचत करना सम्भव नही है . कहते है कि अपनी चादर के अन्दर पैर सिकोड़ना चाहिए .

रश्मि प्रभा said...

आपकी एक-एक बात तारीफे काबिल है
और सीखने योग्य है.........
बहुत ही सही कहा है आपने

Aaj ka pahad.. said...

aunty bahut bada likha hai par bahut ki achhi baten likhi hai....upar se mahangai ka jamana


http://www.aajkapahad.blogspot.com/

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

बचत और दीर्घ समय का निवेश आर्थव्यवस्था की रीढ़ है चाहे वह लोकल को या भूमण्डलीय।

Pratap said...

सच...आज हम अपने कल को गिरवी रखकर निरर्थक साधनों का उपभोग कर रहे हैं.

Science Bloggers Association of India said...

आपकी बातें सही हैं, पर यह उपभोक्‍ता संस्‍कृति हमें चैन से जीने दे तब न।

कुश said...

लेख आपका बहुत सारी परते खोलता है.. मैं खुद क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करता हू.. कई सारी चीज़े मैने इनस्टालमेंट्स में खरीदी है.. ओर अब वो मेरी हो भी गयी है..

बाकी बाज़ार जीतने भी लुभावने एड्स देता है.. उसका असर बहुत कम आबादी पर देखने को मिलता है.. भारत आदर्शो पर चलने वाला देश है.. यहा आज भी लोग अपनी ज़िंदगी में सिर्फ़ एक सूट सिलवाते है वो भी अपनी शादी पर.. इंडिया शाइनिंग खोखला नाम है.. पूरे बंगाल में कलकता ऐसी जगह है जिसे मेट्रोपोलिटन कहा जा सकता है.. राजस्थान में सिर्फ़ जयपुर है.. एम पी में इंदौर.. महाराष्ट्र में मुंबई या पुणे.. तमिल नाडु में चेन्नई.. कर्नाटक में बंगलोर जब हम गिनेंगे तो महज दस से पंद्रह ऐसे शहर मिलेंगे.. इन शहरो की आबादी देखे तो करीब 10-15 करोड़ जो भारत की कुल आबादी का लगभग दस प्रतिशत है..

बढ़िया ब्रांड के एड्स लोग देखते ज़रूर है.. पर खरीदते शायद उतना नही.. जब रिलायंस फ्रेश जयपुर में खुला तो छोटे व्यवसायियो को लगा की उनके काम पर असर पड़ेगा.. पर ऐसा नही हुआ.. जयपुर में मुश्किल से 10 रिलायन्स फ्रेश है ओर ऐसे ही कुछ ओर स्टोर भी गिन ले तो यही कोई पचास.. इन पर यदि रोज़ 1000 लोग भी आते हो तो पचास हज़ार.. जबकि जयपुर की आबादी करीब 40 से पचास लाख है..

खेती करने के लिए उपजाऊ ज़मीन की आवश्यकता है.. जिस तरह से प्रदूषण बढ़ रहा है.. मौसम अब पहले जैसा नही रहा.. केमिकल्स से सब्जिया उगाई जा रही है.. यही कारण है की लोग गाँवो से बाहर जाने पर मजबूर हो रहे है..

आपका लेख कई बातो पर सोचने को मजबूर कर देता है.. पर उसके बारे में बात बाद में की जाएगी.. अभी इतना ही..

महावीर said...

"जिस दिन हम अपनी प्रवृत्ति में चौअन्नी कमाई में से पाँच पैसे बचत का लक्ष्य तय करेंगे और अपने बचत के पैसों के आधार पर ही व्यय की योजना बनायेंगे....बहुत सारी समस्याएं समूल नष्ट हो जाएँगी।"
बिल्कुल सही कहा है आपने। काश कि लोग आपकी बातों पर अमल करना शुरू करदें तो सारी समस्या हल हो जाए।

BrijmohanShrivastava said...

बहुत दिन बाद सेवामे हाज़िर हो पाया हूँ .ब्लॉग भी बदला बदला सा लगा /शीर्षक नवयुवकों के लिए या कहे आधुनिक पीढी के लिए इसलिए असुविधाजनक है क्यों कि चवन्नी और सवा डेड़ ढाई ,अठन्नी ,आना ,पैसा ,अधन्ना सब चलन से बहार है / खैर /
आज जब हर चीज़ किश्तों में उपलब्ध है ,उपभोक्ता कर्ज़ की दलदल में फंसा है ,बचत की गुंजाइश है ही कहाँ /मध्यम वर्ग ,अपने वैभव प्रदर्शन के चक्कर में आधी से ज़्यादा तनखा किश्त का पेमेंट कर घर वेतन लाता है ,कम्पनिया उपकरण भी देती है और उधार भी /घरों में सब कुछ है सिवाय मानसिक शान्ति के /

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

पहले कर्ज लेने वाले छुप कर चलते थे अब कर्ज लेने वाले सीना तानकर चलते है बहुत ही सटीक पोस्ट. आभार

hem pandey said...

अत्यन्त सामयिक और विचार परक लेख के लिए साधुवाद. सरकारी संरक्षण प्राप्त यह बाजारवाद वास्तव में घातक है. चलना तो इस कहावत पर चाहिए-

ताते पैर पसारिये जेती लम्बी सौर.

लेकिन चला जा रहा है -

'ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत'

इस दर्शन पर चलने वालों को ध्यान रखना चाहिए-

कर्ज की पीते थे मै और समझते थे कि हाँ
रंग लायेगी हमारी फाकामस्ती एक दिन.

NirjharNeer said...

aapke lekhan mein jo gahraai hai vo aaj ke daur ki moolbhoot jarurat hai is dishaheen samaj kii
ni:sandeh kabil-e-daad hai aapka chintan

अजित वडनेरकर said...

भारत के आर्थिक नीति नियंताओं को यह बात समझ आनी चाहिए जो लगातार आम आदमी को कर्ज लेने के लिए प्रलोभन दे रहे हैं। घर के लिए कर्ज तो अच्छी बात है क्योंकि यह जीवन को एक आधार देता है मगर अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के लिए प्रलोभन अच्छी बात नहीं है। अमेरिका का यह हाल इसी वजह से हुआ है। भारत अब तक मंदी से इसलिए बचा हुआ है क्योंकि लाख प्रलोभनों के बावजूद घरेलु बचत के प्रति भारतीयों का रुझान कायम है।
अच्छा लेख ....

राजीव करूणानिधि said...

बहुत बढ़िया...आभार..

Harsh pandey said...

bahut badiya likha hai

Atul Sharma said...

रंजनाजी
एक अच्‍छी और प्रेरक रचना के लिए साधुवाद।

Anup Kumar Srivastav said...

bahut badiya , logo ko jagane kaa kaam kiya hai aap ne....

anup

Dev said...

Ranjana ji
Aapne bahut sahi bat kahi hai..

Regards

प्रकाश बादल said...

पहले सोचा कि बिना पढ़े ही 'वाह बढ़िया रचना' कह कर वही दस्तूर निभाऊं तो सभी ब्लॉगर अपने ब्लॉग पर टिप्पणी पाने के लालच से निभाते हैं लेकिन अचानक भाई राज भाटिया के कमैंट पर नज़र गई, जब देखा कि लेख उस विषय पर है जिससे मैं भी जूझ रहा हूँ तो पूरा पढ डाला। हम लोगों की सेविंग करने की बजाय आदत खर्च करने की बन गई है और हम वित्तीय संकट का शिकार होते जा रहे हैं। हमें इस विषय पर गंभीरता से सोचना चाहिए और कर्ज़ लेने की आदत और प्रलोभन दोनो छोड़ने होंग़े अन्यथा समझिये नींद , आराम और चैन तो गया। बढिया लेख के लिए रंजना जी आपका आभार।