24.10.08

दो रंग

1. नयन नीर


इन दो नन्ही सी अंखियों में,
कई समन्दर भरे हुए हैं.

बरसों से बरसे ये नयना,
पर घट रीते नही हुए हैं.

नीर, नयन का सखा अनोखा,
क्षण को भी न विलग रहे हैं .

अपना रिश्ता सहज निभाते
हर सुख दुख में तरल हुए हैं.

हर धड़कन में हुए समाहित,
सांस सांस में घुले हुए हैं.

हास तो अपना है एक सपना,
रुदन से समय सजे रहे हैं.

यही नीर निर्झरनी बन कर
शीतल मन को किए हुए हैं.

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2। हर्षित मन...


मन जब आशा हर्ष भरा हो,
जी चाहे मैं साज बजाऊँ.

नख शिख पूर्ण अलंकृत करके,
रच सोलह श्रृंगार सजाऊँ.

सावन हो या जेठ दुपहरी,
झूम के नाचूं झूम के गाऊं.

इन्द्र धनुष के रंग चुराकर,
एक मनोहर चित्र बनाऊं.

पथिक राह में कोई भी हो,
सबको अपने ह्रदय लगाऊँ.

वॄक्ष, फूल हौं, पशु पक्षी हों,
सबपर अपना स्नेह लुटाऊँ.

घूम घूम कर दसों दिशा में,
दया प्रेम का अलख जगाऊँ.

जो जग से दुख सारे हर ले,
उस पर जीवन पूर्ण लुटाऊँ.

***** ***** ***** *****

42 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

सुंदरतम! बस यही कहूँगा...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सावन हो या जेठ दुपहरी,
झूम के नाचूं झूम के गाऊं.

बस यही दुआ है की आप यूँ ही हर वक्त सुंदर गीत गुनगुनाये :) दोनों बहुत अच्छी लगी .दोनों ही बहुत भावपूर्ण है ..दीवाली की शुभ कामनाये आपको व आपके परिवार को

Deepak Bhanre said...

दोनों ही बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति. बधाई .

manvinder bhimber said...

हास तो अपना है एक सपना,
रुदन से समय सजे रहे हैं.

यही नीर निर्झरनी बन कर
शीतल मन को किए हुए हैं.
खूबसूरत अभिव्यक्ति. बधाई .

Udan Tashtari said...

दोनों ही बेहतरीन:

घूम घूम कर दसों दिशा में,
दया प्रेम का अलख जगाऊँ.

जो जग से दुख सारे हर ले,
उस पर जीवन पूर्ण लुटाऊँ.



वाह!! ये बात हुई न!!


आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक मंगलकामनाऐं.

ALTAMASH said...

दोनों गीत अच्छे हैं. दीपावली की शुभ कामनाएं.

शोभा said...

इन दो नन्ही सी अंखियों में,
कई समन्दर भरे हुए हैं.

बरसों से बरसे ये नयना,
पर घट रीते नही हुए हैं.

नीर, नयन का सखा अनोखा,
क्षण को भी न विलग रहे हैं .
बहुत सुंदर लिखा है.

irdgird said...

शब्‍दों को सलीके से पिरोकर आपने जो माला गूंथी है, वह बेहतरीन गीत की शक्‍ल में उभरी है। बधाई हो।

डॉ .अनुराग said...

खूब .....बहुत खूब.......

Arvind Mishra said...

जी बहुत ही हृदयस्पर्शी बन पड़े हैं वियोग और श्रृंगार के ये दो रंग और उनका क्रम संयोजन तथा शिल्प ,शब्द-भाव विन्यास सभी बेजोड़ हैं ! इस श्रेष्ठ सृजन की बधाई !

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

घूम घूम कर दसों दिशा में,
दया प्रेम का अलख जगाऊँ.

जो जग से दुख सारे हर ले,
उस पर जीवन पूर्ण लुटाऊँ.
Bahut hi sundar rachana saral shabdo me , badhaai
diwali ki shubhakamna ke sath.

सुशील कुमार छौक्कर said...

इन दो नन्ही सी अंखियों में,
कई समन्दर भरे हुए हैं.

अदभूत।

इन्द्र धनुष के रंग चुराकर,
एक मनोहर चित्र बनाऊं.

पथिक राह में कोई भी हो,
सबको अपने ह्रदय लगाऊँ.

बहुत उम्दा।

श्यामल सुमन said...

सावन हो या जेठ दुपहरी,
झूम के नाचूं झूम के गाऊं.

घूम घूम कर दसों दिशा में,
दया प्रेम का अलख जगाऊँ.

नीर, नयन का सखा अनोखा,
क्षण को भी न विलग रहे हैं .

किसे कम कहूँ? सुन्दर। बहुत सुन्दर।। बलबीर सिंह रंग की पंक्तियाँ हैं-

कवि के गीत रिझाते जग को,
कवि के गीत रूलाते जग को,
इसमें कवि का क्या, यह तो कविता की जय है।
अभी तो केवल परिचय है।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

Gyandutt Pandey said...

सुन्दर कवितायें। बहुत सुन्दर शब्द पिरोये हैं भावों को!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

दोनोँ कविताएँ सुँदर हैँ -
परिवार के सभी के सँग
दीपावली का त्योहार
खुशी खुशी ,
मनाओ यही शुभकाँक्षा है
स्नेह सहित -
- लावण्या

Manish said...

बहुत अच्छी कविता !!

bhoothnath said...

kaisa laga mujhe..kya bataun..
kya main bolun aur kya chipaaun..
sundar shabon kee sundar rachna..
khud padun auron ko bhi padhaun..
in shabon me main doob-doob kar..
badi mushkil se hi vaapas aa paaun..

bahut acchi..sacchi..mucchi..!!

BrijmohanShrivastava said...

बरसों से बरसे /नीर नयन का साख्य-भावः दुःख सुख में तरल होना इसे ही कहा जाता है आंतरिक अनुभूति की गहराई में जाना /दूसरी रचना काव्य सौंदर्य और दर्शन का अद्भुत संगम है /आपका यह काव्य ही दर्शन बन गया है

श्रीकांत पाराशर said...

Dono hi rachnayen ullekhniya hain. Bahut hi badhia sabd sanyojan, bahut achhe bhav aur shandar prastuti.

राज भाटिय़ा said...

दोनो रंग बहुत ही खुब सुरत लगे, बहुत खुब
धन्यवाद

dr. ashok priyaranjan said...

आपने बहुत अच्छा िलखा है ।

http://www.ashokvichar.blogspot.com

जितेन्द़ भगत said...

सरल मन से लि‍खी गई सहज कवि‍ताऍं-
अपना रिश्ता सहज निभाते
हर सुख दुख में तरल हुए हैं.
सुंदर।

hindustani said...

aap ko dipawali ki shubkamnaye.
mere blog per punah padhare.
samya badal reha hai or bapu ke desh per nathuo ka raj jaroor pade.

Parul said...

bahut sundar bhaav hain, DI

मीत said...

बहुत सुंदर. दोनों ही रचनाएं बाकमाल.

भवेश झा said...

bahot khub, pahli bar visit kar raha hun, par ab hamesha aaya karunga, dhnyabad, दीपावली की हार्दिक शुबकामनाएं

प्रदीप मानोरिया said...

पथिक राह में कोई भी हो,
सबको अपने ह्रदय लगाऊँ.
अद्भुत बहुत सुंदर

सुखमय अरु समृद्ध हो जीवन स्वर्णिम प्रकाश से भरा रहे
दीपावली का पर्व है पावन अविरल सुख सरिता सदा बहे

दीपावली की अनंत बधाइयां
प्रदीप मानोरिया

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

सुन्दर कविताएँ।

दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

swati said...

दीपावली की हार्दिक मंगलकामनाएं...

koi fark nahi albatta... said...

जीवन का इंद्रधनुष!
शुभकामनाएं

koi fark nahi albatta... said...

जीवन का इंद्रधनुष!
शुभकामनाएं

Sachin Malhotra said...

mere new blog pe aapka sawagat hai......
http://numerologer.blogspot.com/

Dr. Chandra Kumar Jain said...

उत्कृष्ट भावों की सुंदर प्रस्तुति.
=======================
बधाई
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

VisH said...

kavita achhi likhi hai....swagat hai....lage raho lakhni aapki pahchan hai....

DHAROHAR said...

जो जग से दुख सारे हर ले,
उस पर जीवन पूर्ण लुटाऊँ.
छु लिया आपकी इन पक्तियों ने.

PREETI BARTHWAL said...

बहुत सुन्दर

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wah..wa
bahut sunder abhivyakti,,,,,,,,
sadhuwaad.......

NirjharNeer said...

यही नीर निर्झरनी बन कर
शीतल मन को किए हुए हैं
aapki is rachna par bahot hi mahan sitaroN ke jo comment hai unke baad yun to kuch kahne ko bacha hi nahii hai ye to rachnakaar hi jaanta hai ki likhte vaqt uske man mai kya-kya bhaav aaye ya yuN kaho ki kaise-kase man bhaavo ko zabt karke lafzo ki zanzeeron main baaNdhta hai..par aapki is rachna mein mai apna naam pakar harshit hue binaa na rah sakaa is khoobtar rachna par ye meri daad kubool karen.निर्झर नीर

अनुपम अग्रवाल said...

इन्द्र धनुष के रंग चुराकर,
एक मनोहर चित्र बनाऊं.

पथिक राह में कोई भी हो,
सबको अपने ह्रदय लगाऊ
behtareen .likhtee rahiye ...

मुकुंद said...

जो जग से दुख सारे हर ले,
उस पर जीवन पूर्ण लुटाऊँ.


bhut achchhi rachana......badhai itni sundar bat kahane ke liye

प्रकाश बादल said...

किस किस पंक्ति को सराहूं सीधी भाषा में एक बढिया रचना।

Rajat Narula said...

its a wonderful poem...